Friday, December 13, 2019

फुटकर_नोट्स


मैं निष्क्रियता का औचित्य सिद्ध करने का कौशल सीख गया हूँ.
कोई मुझसे  सवाल करे उससे पहले मैं उसको उसकी स्मृतियों में उलझा देता हूँ. उसके बाद उसे लगता है ऐसे वक्त में मुझसे कोई भी सवाल करना उचित नही होगा. हाँ ! वो मन ही मन मेरे लिए प्रार्थनाएं जरुर करता है. प्रार्थना वैसे एकवचन में प्रभावी लगती है मगर मेरे लिए बहु वचन में इसलिए करनी पडती है कि मैंने इस लोक और उस लोक के कई ज्ञात ईश्वरों का कई बार दिल दुखाया है. मेरे शुभ चिंतको को इस बात का भय है कि मेरे लिए की गई किसी भी प्रार्थना को वे ईश्वर अपने प्रतिशोध के कारण निस्तेज कर देंगे.
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मुझे यदि यह पूछा जाए कि मनुष्य के लिए प्रेम जरूरी है या रोटी. तो मैं इसका सीधा साधा जवाब दूंगा कि रोटी और प्रेम दोनों यदि जरूरत की तरह किसी के लिए जरूरी है फिर दोनों में चुनाव का कोई प्रश्न ही नही उठता है. प्रेम और रोटी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ये आपके लिए संयोग की बात हो सकती है कि आपके हिस्से कौन सा पहले आता है.
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संसार में बहुत कुछ ऐसा है जिस के कारक-कारण के बारें हम कुछ कहने से पहले बार-बार सोचते हैं. और कहने के बाद भी हमें अपने कहे हुए पर हमेशा संदेह होता रहता है. कारक-कारण एक समानुपातिक रिश्ता जरूर प्रतीत होता है मगर वास्तव में देखा जाए तो कारक-कारण को तलाशना शोध का एक अंग है और दुनिया के सारे शोध मन की मान्यताओं की बाह्य पुष्टि के यांत्रिक साधन भर है इसलिए जीवन में हमेशा कुछ ऐसे सवाल बने रहते हैं हमें जिनका एक सही और एक गलत जवाब पता होता है और ये दोनों जवाब अपना घर बदलते रहते हैं.
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मुझसे यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि मैं किसी के मन को कैसे पढ़ लेता हूँ?  मेरे पास इस सवाल के दो जवाब होते है मगर मैं हमेशा तीसरा जवाब देता हूँ ताकि जिसका मन पढ़ा गया है उसे भविष्य में मुझसे डर या खतरा महसूस ना हो. जब कोई हमें जानने लगता है तब हमें उससे कुछ अंशों में डर लगने लगता है. मैं किसी का मन पढ़ना नही जानता हूँ. यदि मैं ऐसा करना जानता तो यकीनन सबसे पहले अपना मन पढ़ता.
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लव यूसहज स्फूर्त अक्सर निकल जाता है. यहाँ लव और यू दोनों में आपस में कोई सार्थक अंतर नही होता है. दरअसल लव यूकहने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि तुम्हें और अधिक प्यार की आवश्यकता है. मनुष्य प्रेम में पहले गरिमापूर्ण होता है और बाद में अराजक. यदि कोई तुम्हें लव यूकहे तो इसे अभिवादन समझ प्रतियुत्तर मत देना .क्योंकि इसका कोई प्रतियुत्तर अभी तक शब्दकोश में नही बना हैं.
#फुटकर_नोट्स

© डॉ. अजित


Wednesday, September 25, 2019

अकेलापन-अकेलामन

अकेलापन के कितने ही पाठ हो सकते हैं. कोई भीड़ में भी अकेला होता है तो किसी के अकेलेपन पर रश्क हो सकता है. अपने अन्तस् में अकेलेपन के अलग-अलग टापू होते हैं. जो हमें हाथ पकड़कर अपने साथ ले जाते है. दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक अकेलेपन को अपने ढंग से परिभाषित करते हैं. दार्शनिक एकांत और अकेलेपन को आत्म जागरण के टूल के तौर पर देखतें है और रचनात्मक लोग अकेलेपन को खुद से मुलाकात के लिए जरूरी समझते हैं.

बुनियादी तौर पर यह सवाल थोड़ा टेढ़ा मगर रोचक है कि मनुष्य को अकेलेपन से डर क्यों लगता है? ऐसा क्या है उसके पास जिसे वो शेयर चाहता है? और क्यों करना चाहता है.

मन के विराट आंगन में एक कोना ऐसा होता है, जहां हम किसी का हाथ पकड़कर घूमना चाहते हैं उसके जरिए अपने अंदर कि वो दुनिया देखना चाहते है जिसे देख पाने की शायद अकेले हमारी हिम्मत नही होती है.
कहना क्यों जरूरी होता है? और उस कहने के लिए एक साथ क्यों अपरिहार्य लगने लगता है? क्यों के जवाब अकेलेपन के सन्दर्भ में जानने की कोशिश करना एक जोखिम भरा काम हो सकता है क्योंकि यहाँ बात खिसक कर मानवीय कमजोरी की तरफ जा सकती है.

खुद के अंदर पसरे एकांत से बिना अभ्यास और तैयारी के मिलनें से गहरा अवसाद जैसा कुछ प्रतीत हो सकता है और बोध के साथ अन्तस् में उतरने में यही अकेलापन उत्सव में भी परिवर्तित हो सकता है. मनुष्य के मन और जीवन को समझने के लिए विश्लेषण प्राय: किसी काम नही आता है. विश्लेषण भ्रम को बढ़ाता है हमें पूर्वाग्रहों से भरता है. जबकि जीवन को देखने के लिए उसे केवल जीना पड़ता है. यहाँ मैं केवल इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह केवल हर दौर में एक दुर्लभ घटना के तौर पर उपस्थित रहा है.
सोल मेट एक उत्तर आधुनिक और रोमांटिसिज्म से उपजी अवधारणा है. क्या सोल मेट और मनुष्य के अकेलेपन में कोई सकारात्मक सह-सम्बन्ध हो सकता है? मूलत: मैं इस अवधारणा को अप्राप्यता का मानवीयकरण के तौर पर देखता हूँ शायद खुद की बेचैनियों के जब सही जवाब न मिलें होंगे तो मनुष्य ने उनके जवाब एक अज्ञात सोल मेट के भरोसे हमेशा के लिए स्थगित कर दिए होंगे.

‘अकेलापन एक राग है
एक आधा-अधूरा राग
जिसके आरोह-अवरोह
में जीवन सांस लेता है
और जिसकी बंदिशों पर
सोल मेट रहता है
हमारा मन वो उन छोटी-छोटी
मुरकियों से बना होता है
जो आह और वाह के मद्धम स्वर के साथ
गाई जाती है मन ही मन में.’


‘अकेलापन-अकेलामन’


© डॉ. अजित

Thursday, September 12, 2019

‘तुम्हारे जन्मदिन पर’


‘तुम्हारे जन्मदिन पर’
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जन्मदिन पर कुछ उपहार देना जमाने की रवायत रही है. मगर मैं जब भी तुम्हें कुछ देने की सोचता हूँ तो सिवाय प्यार के मुझे अन्य कोई भौतिक वस्तु दिखायी ही नही देती है. सुनने में यह एक छायावादी बात है मगर महसूसने पर यह उससे अधिक कुछ है. अब दूसरा सवाल यह मेरे मन में अक्सर उठता है कि किसी को प्यार कैसे दिया जा सकता है. प्यार इतना भारहीन शब्द है कि शायद यह मेरे शब्दों से तुम्हारे कान तक पहुँचने की यात्रा तक में इस दुनिया में कहीं न कहीं खो जाएगा. इसी डर से मैंने आज तक इस प्यार को तुम तक पहुंचाने की कोशिश नही की यह अलग बात है कि मेरे अंदर इस प्यार का पर्याप्त भार मौजूद है शायद इसी कारण आजतक मेरे पैर ज़मीन पर टिके हुए है.
जन्मदिन पर लोग किस्म-किस्म की बातें करते हैं सबके अपने तौर-तरीके है बधाई देने और लेने के मगर मैं आजतक वो एक तरीका नही तलाश पाया जिसके माध्यम से मेरे मन की एक छोटी सी शुभकामना ठीक वैसे स्वरूप में सम्प्रेषित हो.वो मेरे मन में जन्म लेती है मगर शुभकामनाएं जग में इस कद्र अकेली है कि उन्हें भीड़ में अकेला साफ तौर परे  देखा जा सकता है इसलिए मैं फिलहाल तुम्हें कोई एकांत से भरी चीज देने की हिम्मत खुद के अंदर नही पाता हूँ.
जानता हूँ. उम्र का क्या है? तो पल-प्रतिपल बढ़ती ही जाती है. जन्मदिन के दिन मेरा वह हिसाब मांगने का मन होता है जो तुम्हारे अंदर दिन प्रतिदिन के हिसाब से घट रहा है. शायद प्यार भी उसी भीड़ में कहीं दुबका खड़ा है मगर मैं उसे घटने वाली भीड़ से निकाल लूंगा इसका मुझे पूरा भरोसा है. तुम भी सोचोगी कि आज के दिन मैं क्या हिसाब-किताब लेकर बैठ गया? और मुझे यह अधिकार किसने दिया है कि मैं तुम्हारे अन्तस् की मांग और आपूर्ति की आर्थिकी तय करने लग जाऊं? इसलिए यह विचार भी मुझे बहुत आकर्षक नही लगता है. अधिकार से मुझे याद आया कि एक बार तुमनें हँसते हुए कहा था अधिकार का आरक्षण पुरुष बिना सहमति के तय कर देता है और मैं तब गम्भीर होकर जवाब दिया था अधिकार का आरक्षण नही होता है बल्कि अधिकार मन के हर किस्म के आरक्षण को समाप्त करके अपनी एक जगह बनाता है और वो जगह कभी एक दो आँखों से नही देखी जा सकती है उसके लिए चार आँखे जरूरी होती है. उसके बाद तुमनें अपने हाथों से मेरी आँखे बंद कर दी थी.
आज के दिन मैं कोई मायूस बातें नही करना चाहता हूँ क्योंकि तुम्हीं ने एक बार कहा था कि निराश पुरुष धरती को असहनीय लगता है और निराश स्त्री के लिए आसमान धरती पर एक रास्ता बनाता है. आज खुशी का दिन है. खुशी के दिन अच्छी बातें करनी चाहिए और अच्छी बातों में एक सबसे अच्छी बात मेरे पास यह है कि जिन दिनों मैं तुमसे कुछ प्रकाशवर्ष की दूरी पर था उन दिनों मैंने काल गणना की एक नई विधि सीखी है जिसके माध्यम से मैं देह और जन्म से परे तुम्हारे साथ भूत और भविष्य की यात्रा कर सकता हूँ. इस विधि के माध्यम से मैं यह जान पाया कि अधिकाँश जन्मों में तुम मुझे अप्राप्य ही रही. यह बात मुझे खुशी देती है क्योंकि मुझे यह बात इस यात्रा के दौरान पता चली कि किसी को पा लेना ठीक उसी दिन उसको खो देना भी होता है और मैं तुम्हें कभी खोना नही चाहता.
थोड़ी सी बातें तुम्हारी हँसी पर करना चाहता हूँ मगर उससे पहले तुम्हारा गुस्सा मेरे सामने खड़ा हो जाता है. तुम्हारा गुस्सा इतना अपरिमेय किस्म का होता है कि उस पर यह उक्ति बिल्कुल लागू नही होती है कि क्रोध में विवेक का क्षय हो जाता है. तुम्हारे क्रोध में मैंने तुम्हें प्राय: सत्य के निकट पाया है. हाँ रुखी बातें सुनने में किसे अच्छी लगती है? मगर अगर उन बातों के निहितार्थ विकसित किए जाएं तो उन सब बातों में तुम्हारी मेरे लिए एक दीर्घकालिक चिंता साफ़ तौर पर पढ़ी जा सकती है. तुम्हारे गुस्से के बाद मेरा आत्मलोचन अह्म से मुक्त रहा है इस बात के लिए मेरा मन सदैव कृतज्ञ रहता है.
तुम्हारी हँसी के बारें में बातें करना तुम्हें पसंद नही है कि क्योंकि तुम्हें लगता है कि बातें बनाना मेरा अधेय्वसाय है. और ऐसी बातें मैं अलग-अलग लोगों से अलग-अलग समय पर एकसाथ करता रहता हूँ. मेरी बातों में छल नही होता है इस पर तुम्हें भरोसा है इसलिए मैंने कभी तुम्हारी मान्यताओं का खंडन नही किया. मगर तुम्हारी हँसी ठीक वैसी है जैसे कवियों में शशि. जिसकी कलाओं पर भिन्न पर टीकाएँ की जा सकती है और तुम्हारी हँसी के इतने पाठ हो सकते है कि मैं उनमें से व्यंग्य,प्रेम,मनुहार और प्यार को छानकर निकालना किसी भी मनुष्य के लिए लगभग असंभव है. मगर तुम्हारी यह गुह्यता तुम्हारी सबसे बड़ी पूँजी है.
खैर ! मेरी आदत है कम बोलता हूँ मगर जब बोलने लगता हूँ तो फिर बातों में से बातें निकालता चला जाता हूँ ऐसा करना मेरी किसी योजना का हिस्सा नही है मगर आज तुम्हारे जन्मदिन पर जब मेरे पास देने के लिए कोरी शुभकामनाएँ नही थी तो सोचा कम से कम से ये फुटकर बातें ही तुम तक पहुंचा दूं जिन्हें जल्दबाज़ी पढ़कर तुम कहो कि फुरसत मिलते ही पढ़ती हूँ और वो फुरसत फिर एक साल के लिए टल जाए.
इस तरह से एक साल बीते और अगले साल फिर से मैं ऐसा कहूँ जिस पर तुम्हारा दिल यकीं करें और दिमाग उसे खारिज करें. तुम्हारी ये कशमकश ताउम्र चलती रहे और मेरी आधी-अधूरी कलम फ़िलहाल यही शुभकामना मेरे पास बची है जो न भीड़ में अकेली है और न नितान्त ही औपचारिक.
शेष सब सुख हो.
अजित  

Saturday, May 11, 2019

'उसने कहा'


उसने कहा, कभी-कभी मुझे तुम्हारी ठीक वैसी फ़िक्र होती है जैसे अपने किसी अनुज की होती है.
तुम संभावना से भरे हो, मगर तुम्हें छोटी-छोटी चीजें परेशान कर देती है. तुम अभी तक इग्नोर करने की ढीटता सीख नही पाए हो. यह सोचकर मैं अक्सर उदास हो जाती हूँ. तुम एकदम दूसरी दुनिया के हो. मैं चाहती हूँ तुम्हें किसी की क्या तुम्हारी खुद की भी नजर न लगे. मैं तुम्हें कोलाहलमुक्त और हस्तक्षेपरहित देखना चाहती हूँ.
प्रेम के इतने अलग-अलग स्तर होते है कि आप उसे किसी एक तयशुदा फ्रेम में नही बाँध सकते हैं. मुझे तुमसे प्रेम है. मगर यह प्रेम किस किस्म का प्रेम? यह बता पाना मेरे लिए मुश्किल काम है. तुम्हारे प्रति मेरे मन में किसी किस्म की आवेग की हिंसा नही है और न ही मैं तुम्हें केवल मुझ तक सीमति देखना चाहती हूँ. कभी क्षण भर के लिए यदि मैं पजेसिव हो भी गई हूँ तो अगले ही पल मुझे खुद की समझ पर करुणा आने लगने लगती है.
तुम किसी किस्म के बंधन में बंधने के लिए नही बने हो तुम्हें अपनी लय और अपनी गति से बहना है. सच कहूं तुम्हें इतना महत्वकांक्षाहीन देखकर मुझे अच्छा और खराब दोनों एकसाथ महसूस होता है. अच्छा इसलिए कि तुम किसी नियोजन के विरक्त नही हो दुनियावी दौड़ में न दौड़ने का निर्णय तुम्हारा अपना खुद का चुनाव और जिसके लिए कभी तुम्हारे मन में कोई अफ़सोस मैंने नही देखा. और खराब यह सोचकर लगता है कि तुम इस क्रूर दुनिया में अपने इस मौलिक स्वरूप के साथ आखिर कितने दिन सर्वाइव कर पाओगे. जीवन में व्यावहारिक होने का एक अर्थ यह भी होता है कि दुनिया की चालाकी सीखी जाए जिसे बाद में तर्कों से बुद्धिमान होना सिद्ध कर दिया जाए.
मैं तुम्हें  कोई सलाह देकर भ्रमित नही करना चाहती क्योंकि प्राय: दूसरों के द्वारा दी गई सलाहें हमारे किसी काम की नही होती है हमें अपना सच खुद ही खोजना पड़ता है और मुझे इसमें कोई संदेह नही है कि तुम्हें खुद का सच ठीक -ठीक पता है.
मेरे पास अपने हिस्से का बहुत अधिक प्रेम नही बचा है क्योंकि मैं अलग-अलग हिस्सों में रोज खर्च हो रही हूँ और मगर फिर भी मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ संरक्षित प्रेम है जो मैंने उस लम्हों में बचाया था जब जीवन में कुछ भी ठीक नही चल रहा था. तुम इतने तटस्थ हो कि मुझे संदेह है कि यह प्रेम शायद ही कभी स्थानांतरित हो पाएगा. ऐसे निस्तेज प्रेम को लेकर मेरे मन में जब भी गहरी निराशा उत्पन्न होती है मैं तब तुम्हारी बातों को रिवाइंड करके सुनती हूँ. यकीन करना तुम्हारी उन बातों को सुनकर मुझे सबसे पहले जो बात महसूस होती है वह यह होती है कि मैंने हमेशा अतीत की बातें की और तुमने भविष्य की.
हमारी बातें जिस बिंदु पर मिलती है उस पर कान लगाकर बहुत कुछ ऐसा सुना जा सकता है जिसकी पुनरावृत्ति संभव नही है. इनदिनों मैं तुम्हारी फ़िक्र से बातें शुरू करती हूँ और अंत में खुद की फ़िक्र पर आकर खत्म होती हूँ कि यदि तुम इतने अस्त-व्यस्त-मस्त रहे हो दुनिया को बहुत सी अच्छी चीजों से वंचित रहना पड़ेगा यहाँ मैं दुनिया का नाम लेकर खुद का जिक्र कर रही हूँ.
तुम्हें देखकर मेरा मन स्वार्थी होता जाता है और तुम्हारा मन जन्मजात जैसे किसी संन्यासी का मन हो. हमारे सत्संग का इसलिए शायद कोई हासिल नही हो सकता है क्योंकि हम दो अलग-अलग विरोधाभास एक सही समय और एक गलत जगह आकर टकरा गए हैं.

'उसने कहा'

©डॉ. अजित



Friday, February 1, 2019

‘देह-मोक्ष’


देह के विकट अरण्य में भटककर तुम तक पहुंचा हूँ. मुझसे अभी नैमिषारण्य तीर्थ के सत्संग की भांति प्रवचन की अपेक्षा न रखो. मैं विचार,तर्क,जिज्ञासा और कौतूहल के सारे बाण रास्ते में मिली एक छोटी नदी में बहा आया हूँ. पढ़ने के लिए तुम मेरी आँखें पढ़ सकती हो और सुनने के लिए तुम मेरे हृदय की ध्वनि सुन सकती हो दोनों समवेत स्वर में तुम्हारे प्रोमिल स्पृशों की कातर अपेक्षा में कराह रहें हैं.
जानता हूँ तुम्हें पराजित पुरुष पसंद नही है ,मगर मैं विजय-पराजय के चक्रव्यूह को तोड़कर तुम तक पहुंचा हूँ .मुझे प्राश्रय दो. और यदि कुछ देना ही चाहती हो तो विस्मय नही अपनी लता समान भुजाओं में मुझे एक मासपरायण विश्राम दो.यदि मुझसे कुछ लेना ही चाहती हो तो मेरे कौतुक को मुझसे विछिन्न कर दो. मेरे मस्तक पर शीत स्वेद की कुछ बूंदे आवारा भटक रही हैं उन्हें अपने अंगवस्त्र का पता दो ताकि वें हवा की हत्या से बच जाएं.
तुम्हें तलाशता हुआ मैं मन के बीहड़ वनों से अकेला गुजरा हूँ मेरे अनेक युद्ध मन की कामनाओं और असुरक्षाओं के साथ कथा प्रान्तर में चलतें रहें है. मैंने हार और जीत में संतुलन साध लिया था तभी एक ऋतुपर्ण पर तुम्हारी तर्जनी प्रतिलिपि मुझे मिल गई है मैं उसकी गंध में आधे दिन तक अचेत लेटा तुम्हारी अंगुलियों की नाप लेता रहा इसके लिए मैंने अपने निकट की वनस्पतियों पर अवांछित हिंसा भी की मगर उन्होंने मेरी आँखों की चमक देखकर मुझे क्षमा कर दिया.
मैंने ओक से जल पीते हुई झरने की तरफ देखा तो मुझे वो तुम्हारी पीठ की भांति दिखने लगा मुझे ऊपर देखतें हुए चक्कर नही आ रहें थे और न मेरी प्यास ही तृप्त हो रही थी ठीक उस वक्त मैंने तुम्हारी पीठ के भूगोल को समझा और मैं अंगुल से तुम्हारी मेरुदंड के इर्द-गिर्द चैतन्य नाड़ियो की संख्या को गिनता हुआ समय का एकदम सटीक आकलन सीख गया. अब मैं यह वाक्य तभी पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मेरा समय खराब चल रहा है जब मैं तुम्हारी नाड़ियाँ गिनने से कई प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित रहूँ.
मुझे घाटियों ने तुम्हारे तलवों के एकांत का सच्चा पता दिया. मैं रास्तें में मिली गुफाओं को जब भी कौतूहल से देखता और उनमें दाखिल होने को तत्पर होता तभी घाटी के गुप्तचर मेरे कान में यह बात कह जाते कि अभी मुझे अपने तलवों का मिलान तुम्हारे तलवों से करना है उसके बाद ही मैं अपनें जीवन की अधिकतम छलांग लगा सकता हूँ. उनकी बात सुनकर मुझे हँसी आ गई क्योंकि मेरे तलवों की गहराई देखकर एक बार एक सैनिक ने कहा था तुम युद्ध के लिए बने हो जब मैंने उसको अपनी एक प्रेम कविता सुनाई तो उसकें खुद को संपादित करने में लज्जा का अनुभव किया और मुझ से बिना नेत्र सम्पर्क किए उसनें धीरे से कहा, सच बात तो यह है कि तुम केवल प्रेम के लिए बनें हो.
एकदिन मैं पहाड़ी लताओं के झूले पर एक लम्बी पींग भरी तो मुझे पहाड़  ने उस तरफ धकेला जहां से समंदर दिखाई देता था. पहाड़ पर समंदर देखने का अनुभव मेरा पास है इसलिए मैं दावे से कह सकता हूँ तुम्हारे हृदय के निकट से तुम्हारी आँखों में देखना ठीक वैसे ही झूले झूलने जैसा अनुभव है. समंदर की सुबह उदास होती है और पहाड़ की शामें मगर तुम्हारे तुम्हारी आँखों में झांकते समय समंदर और पहाड़ मिलकर आईस-पाइस खेलने लगते हैं. तुम्हारी धडकनों में बसनें वाली लज्जा मौसम की गुप्तचर है इसलिए तुम्हारी साँसों के आरोह-अवरोह में मौसम अपना घर बदल लेते हैं.
मुझे अब कोई प्रतिप्रश्न न करों !  मेरी टीकाएँ और भाष्य अब सब निस्तेज हो चुके हैं समय के आचार्यों ने उनसे गुण को छान लिया है अब वो केवल कोरी शुष्क बातें हैं. उनकी विवेचना से कोई मार्ग नही मिलेगा. मैं अपने सब मार्ग बंद करके तुम्हारे मार्ग पर आया हूँ. इसलिए मुझसे मानचित्र पर चर्चा न करो.मैं सामीप्य की आकांक्षा में आतुर हूँ मगर उदंड या अनुशासनहीन नही हूँ इसलिए मेरा आग्रह से अधिक निवेदन में भरोसा हैं. मैं चाहता हूँ तुम अपनें विस्तार के निर्जन टापू की तरफ अपनी ऊँगली से एक संकेत कर दो ताकि मैं अपने उत्साह को बचा रखूं. मुझे पता है कि तुम्हारा संकेत कभी निरुपाय नही रहता है यदि तुमनें अपनी देह में मुझे शरण दी तो निसन्देह इस चैतन्य आतुरता का अंतिम पाठ मोक्ष की तरह ही उच्चारित किया जाएगा और काया पर पूर्वाग्रह बनने कम होंगे.

‘देह-मोक्ष’
© डॉ. अजित

Thursday, January 31, 2019

‘आधे-अधूरे ख़त’


इनदिनों जी उदास रहने लगा है. शायद ये बदलते मौसम का असर है. सर्दियों के जाने की बाट मन अब जोहने लगा है. पिछली सर्दियों में तुमसे मिलना हुआ था इस बार की सर्दियां तुम्हारी यादों के अलाव सेंकते हुए कटी मगर आखिर होने तक यादें भी जलकर भस्म बन गई हैं. मौसम के हिसाब से तुमसे कभी मिलना नही रहा मगर तुमसे मिलने का जरुर एक मौसम हमेशा रहा है. मन का क्या है. मन तो रोज ही करता है तुम्हें सामने देखूं मैं मन की नही सुनता हूँ मैं दिमाग की सुनता हूँ जो मुझसे रोज यह कहता है कि दुनिया में हर हासिल चीज की एक कीमत होती है और तुमसे मिलने की भी एक कीमत है. उस कीमत को जानने के बाद मैं अपनी जेब टटोलता हूँ तो वहां कभी न चलनें वाले कुछ सिक्के पड़े हैं मैंने उनका उपयोग यदा-कदा अकेले में टॉस करने के लिए करता हूँ. मैं टॉस में अक्सर तुम्हें हार जाता हूँ और एकदिन मेरी जीत होगी इसलिए मैं कुछ सिक्के इसलिए हमेशा अपनी जेब में रखता हूँ.
इनदिनों मुझे एक खराब आदत यह भी हो गई है कि मैं रात को अकेला गलियों में भटकता हूँ मुझे पता है कि ये रास्तें आपस में भाई है और ये मनुष्य को कहीं नही पहुंचाते हैं फिर भी मैं रास्तों को चकमा देने की एक निष्फल कोशिश करता हूँ इसके लिए मैं जिस रास्तें से जाता हूँ उस रास्तें से लौटता नही हूँ मेरे ऐसी पकड़ में आने वाली चालाकी देखकर आसमान भी हँस देता है. मैं रात को तारें देखकर उनसे मन ही मन एक सवाल पूछता हूँ मगर उन तक मेरी बात चाँद नही पहुँचने देता है. चाँद आसमान का अकेला ऐसा मसखरा है जो सबकी बातें जानता है मगर उन बातों का कहीं जिक्र तलक नही करता इसलिए मेरी कोई बात, मेरा कोई सन्देश कभी तुम्हें नही मिलेगा.
आज भोर में मैंने एक सपना देखा. सपनें में मैंने देखा कि मेरे दोनों कानों में दो झूले पड़ गए है और उन झूलों पर कोई झूल नही रहा है मगर वो जोर-जोर से अपनी पींग भर रहें हैं.उन्हें अकेला पींग भरता देखा मुझे थोडा डर लगा मगर फिर सपनें में ही मुझे किसी ने बताया कि अकेले पींग भरना एक शुभ संकेत है. उसके बाद मैं आँखें बंद करके तुम्हारी हँसी के बारें में सोचकर मुस्कुराने लगा. उसके बाद एक नीरव शान्ति छा गई. मैंने मुस्कुराते हुए आँखें खोली तो सपना टूट गया. आँख खुलने पर मैं देर तक यही सोचता रहा कि वो सपनें कैसे होते होंगे जिनकी टूटने की कोई वजह नही होती होगी मगर फिर भी टूट जाते होंगे? यह सोच कर फिर से मेरा जी उदास हो गया.
अच्छा सुनो ! मैं कई दिनों से यह बात सोचा रहा हूँ कि मैं  कुछ दिनों के लिए खुद को नेपथ्य में रख लूं मुख्यधारा के प्रकाश से मुझे असुविधा होती है. मैं मंचो के सत्कार से ऊब गया हूँ. मेरी अंदर कोई थकन नही है फिर भी मैं विश्राम की कामना में लगभग प्रार्थनारत हूँ.  यह विश्राम हो सकता है अलगाव या पलायन की ध्वनि दे रहा हो मगर वास्तव यह दोनों ही बातें नही है. दरअसल मैं तुम्हें याद करते-करते अब  पुनरुक्ति दोष का शिकार हो गया हूँ मुझे नही पता तुम मुझे कितना,कब और कैसे याद करती हो मगर इतना जरुर पता है कि तुम्हें  जब भी मैं याद आता हूँगा तो कम से कम तुम मेरी तरह खुद से बातें जरुर करनें लगती होंगी.
मेरे पास अब केवल कुछ अनुमान बचें है और अनुमानों के भरोसे तो ज्योतिष में भी कोई भविष्यवाणी नही की जा सकती जबकि उसे अनुमानों का विज्ञान कहा गया है इसलिए मैं अपने अनुमानों को अब विराम देना चाहता हूँ मैं चाहता हूँ कुछ दिन तुमसे तुम्हारे अनुमानों के बारें में बातें सुनूं वो भी इतनी स्पष्ट की अनुमानों को सच करनें के लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपनी समस्त ऊर्जा लगा दें. कलियुग में जिसे संभवाना का षड्यंत्र कहा गया है मैं उसे घटित होते हुए देखना चाहता हूँ क्योंकि फिलहाल विकल्पों के रोजगार से मैं ऊब चुका हूँ.

‘आधे-अधूरे ख़त’
© डॉ. अजित




Thursday, January 24, 2019

‘चाय और यादें’


आज सुबह चाय पीते वक्त तुम्हारी याद आयी. याद क्या आयी मैं चाय बनाते वक्त एक गीत गुनगुना रहा था उस गीत में नायिका अपने नायक को कहती है कि शायद अब इस जन्म में तुमसे मुलाक़ात हो न हो. तभी चाय पर उबाल आ गया मैंने उबाल को फूंक से नीचे धकेलना चाहता था मगर ठीक उस वक्त मुझे तुम्हारी इतनी गहरी याद आई कि मैंने पेन को बर्नर से उतार दिया. चाय का उफान उतर चुका था मगर मेरे मन में बरबस एक उफान उठ खड़ा हुआ. चाय छानते हुए मैंने सोचा चाय छानते समय तुम्हारी हड़बड़ी क्या अब भी पहले के जैसे होगी? या अब तुमने खुद की साँसों का अनुशासन साध लिया होगा.
सुबह की चाय की घर घूँट पर मैंने तुम्हारी न बदलनें वाली आदतों को बड़ी शिद्दत से याद किया. यादों की एक सबसे खराब बात यह होती है कि ये अपनी सुविधा आती है भले ही हम उसके लिए तैयार हो या न हो. यादें आकर हमें हद दर्जे तक अस्त-व्यस्त करने की जुर्रत रखतीं हैं. आज चाय में थोडा मीठा कम रह गया हालांकि मैं कम मीठी चाय ही पीता हूँ मगर आज उतनी मिठास नही थी जितनी मुझे चाहिए फिर मैंने किसी सिद्ध मान्त्रिक की तरह चाय में फूंक मारते हुए तुम्हारी चंद मीठी बातों को चाय के अंदर फूंक दिया ऐसा करने के लिए मुझे अपनी याददाश्त पर थोड़ा जोर जरुर देना पड़ा क्योंकि तल्खियों की स्मृतियाँ हमेशा अधिक जीवन्त रहती है मगर एक बार तुम्हारी मीठी बातें जब याद आई तो फिर चाय की मिठास खुद ब खुद बढ़ गई. मैंने अपने होंठो पर ज़बान फेरी तो याद आया कि कुछ अक्षर वहां अकेले ठहल रहें थे मैं उनके निर्वासन में हस्तक्षेप का अधिकार खो बैठा हूँ यह सोचकर मेरा जी थोड़ा उदास जरुर हो गया.
इनदिनों मैं चाय के बहाने किसी को भी याद नही करता हूँ मुझे लगता है याद के लिए किसी बहाने की जरूरत नही होती है . बीते कुछ दिनों से मैंने चाय मौन के इर्द-गिर्द और लगभग निर्विचार होकर पी है. अधिकतम मैं यह करता हूँ कि छत पर चला जाता हूँ फिर वहां से शहर को देखता हूँ. रोचक बात यह है कि शहर को देखते हुए मैं केवल शहर को देखता हूँ मुझे गलियाँ और मकान दिखने बंद हो जाते है. कभी लगता है शहर ऊंघ रहा है तो कभी मुझे शहर भागता दिखायी देता है. कुल जमा दो –चार-छह दृश्यों में चाय खत्म हो जाती है.
आज सुबह चाय पीने के बाद मैंने सोचा कि आज तुम्हें फोन करूंगा मगर दिन चढ़ते-चढ़ते यह विचार भी निस्तेज होकर मन के पतनाले से बह गया. मैं देर तक सोचता रहा कि याद आने और बात करने में कोई सह-सम्बन्ध हो है नही इसलिए किसी की याद आने पर उसे क्या फोन करना. हो सकता है मैं तुम्हें उस दिन फोन करूं जिस दिन मुझे तुम्हारी बिलकुल याद न आई हो. फोन शायद एक जरूरत से जुडी क्रिया और यादें किसी जरूरत की मोहताज़ नही हैं.
शाम को तुम्हारी याद मुझे खुद से बेदखल न कर दें इसलिए मैंने तय किया है कि आज शाम कॉफ़ी पियूंगा वो इसलिए क्योंकि कॉफ़ी तुम्हें पसंद थी और मुझे नापसंद. मगर इसका यह मतलब बिलकुल भी नही है कि तुम्हारी यादें मुझे अकेला छोड़ देंगी वो कॉफ़ी के बहाने से भी जरुर आएँगी इस बार फर्क बस इतना होगा वो मुझसे कोई सवाल नही करेंगी और सवालों से बचता-बचाता मैं जीवन के उस दौर में पहुंच गया हूँ जहां अब मुझे एकांत में शराब और भीड़ में चाय दोनों की ही जरूरत महसूस नही होती है. हालांकि यह एक खराब बात है. खराब क्यों हो तुम बेहतर जानती हूँ. हमारी आखिरी चाय इसी बात के कारण आज स्थगित पड़ी है.  

‘चाय और यादें’
© डॉ. अजित

Wednesday, March 28, 2018

‘शायद’


मैं तुमसे खफा बैठी हूँ!
और तुमको कोई खबर नही है. दूर खिड़की पर रेडियो पर एक गाना बज रहा है लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो न हो..शायद इस जन्म में फिर मुलाकात हो न हो.

मेरा मन ‘शायद’ में अटक गया है. इस शायद के भरोसे मैं कुछ छूटे सपनों को रफू कर रही हूँ. मैं जमीन की तरफ अपलक देखती हूँ, ऐसा करना मुझे अजीब सा सुख दे रहा है. मैं शायद खुली आँखों से कुछ सपनें जमीन में बो रही हूँ. मुझे पता है ये सपनें जब तक जवान होंगे मुझे नींद आ चुकी होगी.

प्यार एक अजीब शै है. लोग इसे टूटकर करते है मगर मैंने प्यार बिखर कर किया है. मैं कुछ हिस्सों में तुम्हें बेहद चाहती रही हूँ जबकि कुछ हिस्सों में तुम कहीं नही थे. जिन हिस्सों में तुम अनुपस्थित थे उन हिस्सों में तुम्हारी जगह जो उपस्थित था उससे मैंने कभी तुम्हारा मिलान नही किया. मगर जहां तुम अपनी गुमशुदगी के साथ बैठे थे वहां मैंने हवा को बांध दिया था. मैं उस जगह में कोई बाह्य हस्तक्षेप नही चाहती थी. यहाँ तक कि मैंने अपनी सांस भी बहुत संभल कर ली कि कहीं उसकी आवाज़ से तुम अपनी जगह न बदल लो
.
शुरुवात में मुझे लगता था कि मैं शायद अपनी कोई मिसिंग कैपिटल तलाश रही हूँ मगर अब मैं यह बात ठीक से जान गई हूँ कि तुम्हें खोने के बाद शायद मैं अपनी उस मिसिंग कैपिटल की तलाश में लगूंगी. मेरी बातों में ‘शायद’ इस कदर पसर गया है कि मेरी बातें अपनी कथन के वेग को ढ़ोने में असमर्थ हो गई है वो थककर मेरी पीठ पर सवार है और मुझे वो बिस्तर नही मिल रहा है जहां उन्हें आराम से सुला सकूं.

तुम गुमशुदा हो गए मुझे इसका इतना बड़ा गम नही है मुझे गम बस इस बात का है कि तुम देखतें-देखतें आँखों से ओझल हो गए और मुझे इसका भान तक न हुआ. मैं सपनों और कामनाओं से तुम्हें यह सोचकर अलग रखती थी कि तुम्हें इनकी नजर न लग जाए मगर तुम्हें किसी की नजर नही लगी तुम्हें खुद ही खुद की नजर लग गई शायद.

आज सुबह मुझसे मेरे एक कंगन ने पूछा कि क्या तुम उदास हो? मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी मगर बाद में मैं यह सोचकर सच में उदास हो गई कि मैंने उसकी बातें क्यों अनसुनी कर दी.

मैं किसी भावुकता को अंतिम नही मानती आयी हूँ मगर तुम्हें लेकर मेरे राग अपना रास्ता भटक गए है मैं उनसे सुबह मिलना चाहती हूँ तो वो मुझे शाम की दिलासा देकर मौन हो जाते है. मैं शाम को उनकी खबर लेती हूँ तो वो मुझसे जल्दी सोने का आग्रह करने लगते है. अपने अंदर इतनी अवज्ञा और हिंसा मैंने पहली बार देखी है.
मैं तुमसे खफा हूँ ये कहकर मैं खुद को बचाना चाहती हूँ मगर सच बात तो यह है कि मैं तुमसे नही दरअसल खुद से खफा बैठी हूँ.

कल रात मुझे एक अजीब सा सपना आया उस सपने में तुम मुझसे पूछ रहे हो कि जो मुलाक़ात अधूरी रह जाती है क्या वो अगले जन्म में पूरी हो सकती है ? मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नही था मगर मैं इसका जवाब तलाशने के लिए उस वक्त तुम्हारा हाथ पकड़ कर ऊँचाई से छलांग लगा देती हूँ. उसके बाद पता नही वो मुलाकत पूरी हुई या नही मगर मैंने खुद को तुम्हारे साथ ऊंचाई से गिरते वक्त बेहद हल्का महसूस किया.
जब मेरी आँख खुली मैं बिलकुल भी घबराई हुई नही थी मैंने पानी पीया और पानी पीते वक्त सोचा कि जरुर अगले जन्म में अधूरी मुलाकात पूरी होती है इसके बाद मुझे गहरी नींद आयी. मैं तुम्हारे सवाल का हंसते हुए जवाब देना चाहती थी मगर तुम सवाल पूछने के बाद मुझसे नही मिले इसलिए मैं उस सवाल के जवाब के बोझ में दबी हुई हूँ और इसी कारण मैं शायद कभी कभी चुपचाप रो पड़ती हूँ.

मैंने अपने रोने और रोकर अचानक चुप होने का अनुवाद किया है मगर मैं उसकी प्रतिलिपि तुम्हें इसलिए नही सौंपना चाहती कहीं तुम उससे भी अपनी एक कविता न विकसित कर लो.  हमारी अधिकतर बातें कविताओं की शक्ल में मोक्ष पा गई है.

इसलिए तुम्हें बिलकुल नही पता है कि मैं तुमसे खफा बैठी हूँ. तुम्हें मेरे बारें में सब कुछ पता है मगर वो बात बिलकुल नही पता है जो वास्तव में तुम्हें पता होनी चाहिए.
इस बात का यह अर्थ बिलकुल नही है कि मुझे तुमसे प्रेम हो गया है? दरअसल इस बात का कोई अर्थ ही नही है ये शायद एक बोध है जो मेरे अंदर तब घटित हुआ है जब तुम नही हो. जाहिर सी बात है ये बोध अनुपस्थिति की मांग करता है.

तुम मेरे जीवन से अनुपस्थित हो गए इसलिए ये बोध घटित हो गया और मैं तुम्हारे जीवन से अनुपस्थित नही हो पाई इसलिए शायद तुम्हें अब भी ये उम्मीद है कि देर सबेर तुम मेरा पता खोज लोगे.
अंत में यही कहूंगी कि शायद तुम मुझे खोज लोगे मगर इस बात में शायद लगी है ये सोचकर एक ठंडी आह भरी जा सकती है उदास हुआ जा सकता है मगर कोई उम्मीद नही पाली जा सकती है.
शायद यही मेरे जीवन का स्थायी दुःख है.

‘शायद’  

© डॉ. अजित

Tuesday, December 19, 2017

‘आवारगी’

लौटना एक क्रिया है.
और मैं इसे विशेषण में बदलने से बच रहा हूँ. मन का व्याकरण हर बार की तरह व्युत्पत्ति के सिद्धांतो का अतिक्रमण करना चाहता है. जब हम कहीं जाते है तो लौटते वक्त उतने नही लौट पाते जितने हम गए होते है कई बार हम थोड़े से बढ़कर आते है तो कई बार हम थोड़े से घट कर आते है.
समय एक महीन आवरण भर है जिस इस पर अतीत है तो दुसरे पार भविष्य मैं वर्तमान में यात्राएं करता हूँ और अतीत को याद करता हूँ मेरे सामने जो भविष्य खड़ा है वो थोड़ा उलझाऊ किस्म का है इसलिए मैं उसकी तरफ पीठ कर लेता हूँ.
देह की अपनी एक मौलिक गंध है मगर देह की गंध देह से विलग होकर बहती है उसे महसूस करने के लिए हम खुद नही हो सकते है उसे वही महसूस कर पाता है जो उसके लिए पात्र है.यह पात्रता किसी भी योग्यता से अर्जित नही की जा सकती है यह खुद के अंदर स्वत: स्फूर्त घटित होती है. तुम्हारे साथ मेरी देह की गंध मेरा साथ छोड़ देती है इसलिए भी मैं हल्का महसूस करता हूँ. मेरे पास तुम्हारी देह गंध की कुछ स्मृतियाँ बची है. मगर उन स्मृतियों का मिलान कभी संभव नही है इसलिए मैं उन्हें अपनी देह पर वहां छोड़ देता हूँ जहां-जहां मेरा खुद का हाथ बमुश्किल जाता है.
रास्तों और बादलों के अलावा हवा के पास अपनी एक अय्यारी है वो अपनी दिशा हमें देख बदल लेती है और हमारा वहां तक पीछा करती है जहां से हमारी साँसों की गति असामान्य न हो जाती हो.हवा की आदर देने की इस अदा पर धरती फ़िदा है और वो आसमान को कहती है कि प्रेम में निजता का एक गहरा मूल्य यदि तुम्हें समझना है हवा से सीखना चाहिए.
उदासी मुझे अब संक्रमित करती है मैं अचानक से खुश होता हूँ और फिर बेहद उदास हो जाता हूँ.उदास रहते हुए मैं सबसे ज्यादा खुद के बारें में सोचता हूँ इसका अर्थ यह हुआ कि तुम्हारी प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई रिश्ता उदासी से नही है.
जब मैं लौट रहा होता हूँ तो मेरे साथ बहुत कुछ लौट रहा होता है जो मुझे रोज अलग-अलग शक्ल में दिखाई देता है मैं उस सब से बात नही करना चाहता हूँ मगर वो मुझे अपने अपने हिस्से की बातें रोज़ करते है. कल मुझसे एक रास्ते ने कहा कि तुमने चौराहे से लेफ्ट क्यों लिया था? जबकि वो रास्ता थोडा ऊबड़-खाबड़ था. मैंने कहा मुझे जीवन में असुविधाएं पसंद है इस बात पर रास्ता कोई ख़ास खुश नही हुआ मगर उसी रास्ते पर खड़े आवारा घास ने मुझसे गले मिलकर कहा तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो.
‘आवारगी’

©डॉ. अजित 

Sunday, December 17, 2017

मायालोक

वो एक मायावी स्त्री थी।
मायावी इसलिए नही कि उसकी बातों में कोई इंद्रजाल था मायावी इसलिए कि उसको देखकर अलग सम्मोहन होता था और सुनकर अलग।
मैं जब उसको अपने नाखुनों को तराशते हुए देखता था तब मैं जान पाता था कि कोई तीव्रता कलात्मक रूप से कैसे खूबसूरत हो सकती है आप खुद चाहे कि वो आपके गर्दन का ग्लेशियर तोड़कर पर पीठकर कुछ नदियों के गलियारें बना दें।
उसकी हंसी में नाराजगी और नाराज़गी में हँसने की तमाम वजह मौजूद रहती थी उसकी आँखों के नीचे गहरे डार्क सर्कल बने हुए थे मैंने जब पढ़ी पढ़ाई बातों के हिसाब से उसको कहा कि ये डार्क सर्कल स्ट्रेस से बनते है तो वो मेरी इस बात पर ठहाका मारकर हंस पड़ी और बोली कम से कम तुम इन पढ़े लिखे बौड़म लोगों में मत शामिल हो। आंखों के नीचे डार्क सर्कल स्ट्रेस से नही सपनों के अलावा में मुस्कान सेकनें से बनते है मगर ये बात कभी कोई स्त्री तुम्हें नही बताएगी वो स्ट्रेस वाली स्थापना से खुद का तादात्म्य स्थापित करके तुम्हारी बात की पुष्टि कर देगी।
उसने एकदिन अपनी आंख से थोड़ा काजल लिया और मुझसे कहा क्या तुम इसका स्वाद बता सकते हो मुझे लगा काजल का क्या स्वाद होगा मैनें कहा काजल तो बेस्वाद होता है इस बात पर वो फिर हंस पड़ी और बोली, क्या तुमनें कभी चखा है किसी स्त्री की आंखों का काजल? मैनें कहा नही। फिर उसने चखने के लिए सहमति नही दी मगर वो मेरी आँखों में डर को पढ़ चुकी थी उसने मुस्कुराते हुए कहा- काजल के स्वाद से डरता हुआ पुरुष मुझे सुंदर लगता है क्योंकि यहां वो अपनी सीमा को स्वीकार करता है। कुछ ही दुःसाहसी स्त्री का काजल का स्वाद चख कर उसका स्वाद बता पाते है क्योंकि क्या तो यह मनुष्य को मौन कर देता है या फिर विद्रोही।
उसकी पैर की अंगूठे के नजदीक वाली उंगली अंगूठे से बड़ी है मैंने उसे देखकर एकदिन अंदाजन कहा कि तुम स्वेच्छाचारी हो उसने कहा यदि यह तुम्हारा अनुमान है तो मैं इस पर कुछ नही कहूंगी मगर यदि यह तुम्हारा अनुभव है तो मैं कहूंगी यह सच है।

#मायालोक

©डॉ. अजित

Monday, December 11, 2017

‘बारिश के वजीफे’

बारिश का अलगोजा बड़ी मद्धम तान  छेड़ रहा है. इसके सुर बादलों की गोद में बिखरे पड़े हैं. बारिश जब हंसती है तो हवा थोड़ी उससे चिढ़ जाती है और बूंदों को अधिकतम दूरी पर पटक देती है. बूंदे इस बात पर नाराज़ नही होती है बल्कि खुश होती है क्योंकि इस बहाने से उन्हें अपनी सखी सहेलियों को दूर से देखकर जोर से चिल्लाकर आवाज़ लगाने का सुख मिलता है.
इस हल्की फुलकी बारिश में तुम अपनी खोयी हुई चीजें तलाश रही हो ये भी एक अजीब संयोग है कि पुरानी चीजों को तलाशते वक्त तुम एक नया गाना गुनगुना रही हो उस गाने को सुनकर बूंदों को अपने गीत थोड़े अरुचिकर लगने लगते है इसलिए वो थोड़ी देर के लिए थमकर तुम्हें देखने लगी है. मैं मन ही मन कहता हूँ कि बारिश थम गई है मगर असल में बारिश तुम्हें देखने के लिए रुकी हुई है जैसे ही तुमनें गाना बदला बूंदे जोर से हंसी और फिर से तेज बारिश शुरू हो गई है.
मैं तुम्हारी अंगडाई में छिपा इन्द्रधनुष देखता हूँ मगर इधर रौशनी जरा कम है इसलिए उसके आधे रंग मेरी एक आँख देख पाती है और आधे रंग दुसरी. मैं सोचता हूँ कि इन बूंदों की एक फुहार तुम्हारी पलकों के छज्जे पर आकर बैठ गई है और तुम अपनी गति से पलक झपकती जा रही हो, मैं तुम्हें थोड़ा विलंबित करना चाहता हूँ मगर मैं बूंदों के गुप्तचर के रूप में फ़िलहाल तुम्हें मुखातिब नही होना चाहता हूँ. इसलिए चुपचाप उस फुहार को आंसुओं के जल में मिलता देखकर एक विचित्र से संतोष से भर जाता हूँ.
बारिश की बात हो और चाय की न हो ऐसा करना कुफ्र होगा इनदिनों अकेले चाय बनाता हूँ अब मुझे खराब चाय और अच्छी चाय में भेद करने की आदत नही रही.अब मैं चाय पीता हूँ तो उसके गुणधर्म पर कोई चर्चा नही करता मुझे लगता है मेरी ये आदत भी तुम्हारे साथ ही चली गई. मुझे याद है एक बार मैंने चाय पीते हुए कहा था कि चाय मुझे एक बिछड़ी हुई प्रेमिका लगती है. इस पर तुमने हंसते हुए पूछा था कि और शराब? मेरे पास तब इस सवाल का कोई ठीक-ठीक जवाब नही था मगर अब है. शराब एक रंजिश की तरह है जो गाहे-बगाहे बदला लेने आती रहती है. दोस्त और दुश्मन के बीच का कोई रिश्ता अगर होता हो तो शराब फिलहाल वही है मेरे लिए.
बारिश की बूंदे देख मैं चाय और शराब दोनों को भूल गया हूँ मैंने हवा को महसूसने के लिए अपना हाथ खिड़की से बाहर निकाला तो पाया हवा थोड़ी सर्द जरुर है मगर वो इतनी सर्द बिलकुल नही कि तुम्हारी यादों की बुक्कल खोलने का ही मन न करें.
इसलिए फिलहाल मैं देहरी पर बैठकर बारिश को विदा गीत सुना रहा हूँ मगर वो तुम्हारी खोयी हुई चीजों को तलाशने के कभी इस दर तो कभी उस दर भटक रही है मैं उनकी बेचैनी देख और समझ रहा हूँ फिलहाल तुम्हें उनकी कोई खबर इसलिए नही है क्योंकि ठीक इसी वक्त तुम बादलों को देखकर अनुमान लगा रही हो कि ये बारिश कब थमेगी?
जब बारिश थम जाए समझ लेना मैंने फिर से तुम्हें याद करना शुरू कर दिया है.
‘बारिश के वजीफे’

© डॉ. अजित 

Saturday, December 9, 2017

ईश्वर और प्यार

दृश्य एक:
चर्च की बेल्स अभी बजते-बजते थमी है। प्रेयर का मॉर्निंग सेशन खत्म हो चुका है। मनुष्य चुप है मगर कामनाओं,प्रार्थनाओं और ईश्वर में गहरा सम्वाद चल रहा है। ईश्वर ने अपने अनेक प्रतिरूप बनाए मगर फिर भी उसके कान पर्याप्त नही पड़ रहे है। मनुष्य मौन है मगर चर्च के अंदर भारी कोलाहल है।
फादर बाइबिल हाथ मे लिए खड़े है मगर उनके हाथ बंधे हुए है उनके आशीर्वाद में कागज की खुशबू है मगर वो जीसस के भरोसे रोज़ आशीर्वाद बांट देते है। जीसस ने अब उन्हें आशीर्वाद देना बंद कर दिया है।
एक खत आज मदर मेरी के नाम मिला है फादर उसे पढ़ रहे है खत की भाषा से यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि खत स्त्री ने लिखा है या पुरुष ने। यह खत मनुष्य के दुःखों के वर्गीकरण की बात करता है और ईश्वर पर सन्देह करता है। ईश्वर इस बात पर संतुष्ट है कि ईश्वर पर सन्देह करने की बात उसे चर्च के माध्यम से पता चली है।
फादर के पास खत का कोई जवाब नही है इसलिए वो इसे जीसस के कदमों में रख देते है जीसस खत पढ़ना चाहते है मगर वो खुद सलीब पर टँगे है इसलिए मनुष्य के रोष की बात शब्दों की यात्रा तय करके वही समाप्त हो गई है।

दृश्य दो:
कैथरीन अपने प्रेमी से पूछती है
क्या तुम प्यार को जानते हो?
वो जवाब देता है मैं प्यार को जानने की कोशिश में हूँ!
वो फिर दुसरा सवाल करती है
क्या तुम ईश्वर को मानते हो?
वो जवाब देता है मैं ईश्वर को मानने की कोशिश में हूँ
दोनों सवाल एक दुसरे से भिन्न है
दोनों में कोशिश एक कर्म है जो घटित हो रहा है
कैथरीन अब कोशिश को समझना चाहती है
मगर इसके लिए कोई सवाल नही करती है
वो अपने प्रेमी का माथा चूमती है और कहती है
कोशिश करो कि जल्द दोनों को जान जाओ
वो पूछता है क्या तुमनें दोनों को जान लिया है?
कैथरीन थोड़े आत्मविश्वास से जवाब देती है
मैंने जानने कभी कोशिश नही की
मैं ईश्वर और प्यार को प्रक्रिया के तौर पर शायद ही कभी जान पाऊँ
हां ! तुम परिणाम के तौर पर
ईश्वर और प्यार को जरूर जान लेना
मैं तुम्हारे अनुभव से दुनिया के अनुभव का मिलान करूंगी
ईश्वर और प्यार दोनों को समझने का मेरा यही तरीका है
दोनों में मेरी दिलचस्पी बस इतनी है।
अब कैथरीन और उसका प्रेमी प्यार और ईश्वर से साक्षात्कार के अपने-अपने तरीके के अनूठेपन पर मुग्ध होकर एक दुसरे के लगे लगते है और विदा लेते है।

©डॉ. अजित

Tuesday, December 5, 2017

देवता का मनुष्य होना

दृश्य एक:
ऋषि पुत्री विहार कर रही है. यौवन के अपने कौतूहल है. वो फूलों को देखती है और उन पर मंडराते भंवरों को अपलक निहारती है. वो नही चाहती है कि उनकी आवृत्ति में कोई व्यवधान उत्पन्न हो. मंद-मंद हवा बह रही है मगर हवा लौटकर वापस आने में इतना विलम्ब कर देती है कि फिर हवा की जरूरत समाप्त हो जाती है.
ऋषि पुत्री सामवेद का एक मन्त्र गीत की शक्ल में गुनगुना रही है यदपि यह यज्ञ का मन्त्र है मगर उसके कोकिला कंठ से इस मन्त्र को एक सुगम गीत में परिवर्तित कर दिया है. वो रास्ते से छोटी-छोटी कंकर उठाती है और बार-बार अपनी मुट्ठी में उन्हें बंद करके उनकी मन ही मन गणना करना शुरू कर देती है. यह एक विचित्र खेल वो खेल रही है जिसमें खुद ही खुद की परीक्षा ली जाती है.
इस अरण्य में एक मीठा पानी का सोता बहता है वो आज वहां नही जाएगी बल्कि वो आज अपनी प्यास को लेकर वन में भटकना चाहती है.ऐसा करके वो अपने हृदय स्पंदन में मधु के अनुराग को देखना चाहती है. उसी गति देख अनुमान लगता है कि वो आज खुश है मगर वास्तव में वो आज न खुश है और न दुखी. वो अनजान रास्तों से गुज़र रही है क्योंकि आज उसे कहीं पहुंचना नही है.

दृश्य दो:
ईश्वर के सम्मुख उपेक्षित देवता एक अधियाचन लिए खड़े है. उनके अंदर इस बात का रोष है कि देवत्व होने के बावजूद उनका जिक्र मृत्यु लोक में मात्र किसी मन्त्र या किसी ग्रन्थ तक सिमटकर रह गया है. बहुधा मनुष्य उनका नाम और उनकी शक्तियों से अपरिचित है. न कोई उनका आह्वाहन करता है और न ही उनका विर्सजन होता है. देवलोक में उनका उपेक्षा से भरा एकांत उनके अंदर उद्गिग्नता और रोष भर रहा है. जब उनकी शक्तियों का कोई उपयोग ही नही है और न ही उनसे कोई भयभीत महसूस करता है तो फिर वें उन शक्तियों का क्या करें? आज वो ईश्वर को अपना देवत्व लौटाने के लिए आए है. उन्हें मनुष्य अपने से अधिक आकर्षक दिखता है जो अपनी इच्छा इसे मनुष्य,देवता और यहाँ तक ईश्वर के तरह पेश आता है.
ईश्वर के पास उनकी शंकाओं का कोई ठीक-ठीक समाधान नही है वो उन्हें शास्त्र के किसी तर्क से संतुष्ट नही कर सकता है यह बात ईश्वर ठीक से जानता है. देवताओं के उपेक्षाबोध को तोड़ने के लिए ईश्वर उन्हें मनुष्य बनाने का खतरा नही लेना चाहता है क्योंकि उसके बाद खुद ईश्वर की सत्ता को चुनौति मिलने की संभवाना बढ़ जाती है.
ईश्वर पूजा, प्रार्थना, वरदान शक्ति से वंचित देवताओं से कहता है कि तुम मनुष्य की तरह व्यवहार कर रहे हो जबकि तुम देवता हो इस पर देवता हसंते हुए कहते है कि आप भी मनुष्य की तरह व्यवहार कर रहे है जबकि आप तो स्वयं ईश्वर है !
ईश्वर अब चुप है मगर देवता उसकी आँख में प्रत्युत्तर की अपेक्षा से झाँक रहें है अंत में ईश्वर ने ध्यान के नाम पर आँख बंद कर ली और देवताओं में हार कर मनुष्य की आँखों में उसी उम्मीद से देखा आरम्भ कर दिया.

© डॉ. अजित  

Monday, December 4, 2017

नीदरलैंड की सुबह

दृश्य एक:
नीदरलैंड की एक दोपहर है मगर ये दोपहर शाम और सुबह के मध्य टंगी दोपहर नही है. धूप बढ़िया खिली है मगर कितनी देर खिली रहेगी इस बात का कुछ पता नही है. पार्क में एक बच्चा खेल रहा है और उसे दो महिलाएं देख रही है इस घटना में कोई नूतनता नही है मगर दोनों बच्चें को खेलता देखकर खुश है. यह बच्चा इन दोनों महिलाओं में से किसी का नही है. एक प्रेमी युगल एक दुसरे का हाथ थामे चल रहा है. अचानक से लड़की ने लडके का माथा चूमते हुए कहा तुम सूरज की तरह हमेशा मुझे रौशनी देते रहना.लड़का खुद को सूरज नही चाँद समझता है इसलिए वो एक फीकी मुस्कान से हंसता है इस बात पर लड़की हैरान नही है मानो उसे खुद के कथन की असत्यता को पहले से बोध था.  
दृश्य दो:
स्ट्रीट फ़ूड की एक छोटी सी दूकान है जिसे एक बुजुर्ग महिला चलाती है. दो लड़कियां वहां आती है और उससे पूछती है कि आप कितना कमा लेती है इससे? बुजुर्ग महिला हंसते हुए कहती है बस उतना जितने में मुझसे हंसते हुए सोचना न पड़े. इस जवाब को समझने के लिए अभी दोनों लड़कियों की उम्र कम है इसलिए वो पास्ता ऑर्डर करके स्टूल पर बैठ जाती है. पास्ता खाते हुए दोनों बातें कर रही है. एक लड़की कहती है कि दुनिया में मनमुताबिक मिलना आसान काम नही होता है दुसरी इस पर जवाब देती है कि बेहद आसान होता है बस हमें पता होना चाहिए कि असल में हमें चाहिए क्या? ये बात बुजुर्ग फ़ूड वेंडर भी सुन रही है वो कहती है क्या तुम्हें फिलहाल पास्ता ही चाहिए था? दोनों इस बात पर हंस पड़ती है और कहती है शायद नही.
दृश्य तीन:
क्रिस्टीन को प्यास लगी है उसके पास पानी है . वो एक कैफे में दाखिल होती है और एक पानी की बोतल खरीदती है. पानी को पीने से पहले वो एक बीयर केन लेती है और बाहर निकल जाती है. प्यास अभी भी लगी है मगर उसके पास बीयर और पानी दो तरल पदार्थ है. वो पहले एक बीयर केन पीती है अब उसे पानी कि प्यास नही बची है मगर बोतल वो साथ लिए घूम रही है. वो सोचती है कि जीवन में विकल्प हमेशा हमें हमारी पहली ख्वाहिश से दूर कर देता है. उसका मूल्य कम हो जाता है वो हमारे साथ होकर भी किसी काम का नही रहता है. क्रिस्टीन पानी की बोतल से मुक्ति चाहती है मगर उसमें उसका निवेश शामिल है इसलिए फिलहाल उसे साथ लिए घूम रही है . क्रिस्टीन को अपनी उस प्यास पर संदेह होता है जो पानी की बजाए बीयर से बुझ गई मगर फिलहाल उसे अच्छा लग रहा है इसलिए पानी कि बोतल कोई बोझ नही है. जब मनुष्य को अच्छा लगता है तब वह हर किस्म के बोझ को भूल जाता है यह सोचकर वो एक घूँट पानी पीती है वो भी बिना प्यास लगे ही.

© डॉ.अजित 

Sunday, December 3, 2017

‘बेपते की चिट्ठी’

तुम किस तरह से जीवन में आए थे और किस तरह से जीवन से चले गए इस बात को यदि मुझे समझाने की दृष्टि से कहने के लिए कहा जाए तो मेरा शब्दकोश एकदम निष्प्रयोज्य सिद्ध होगा. मेरे पास कोई ऐसा प्रतीक और बिम्ब नही है जिसके माध्यम से मैं तुम्हारे आने और तुम्हारे जाने की घटना को ठीक ठीक ढंग से बता सकूं.
कभी लगता है कि तुम एक स्वप्न की तरह आए और एक यथार्थ की भांति की चले गए मगर दुसरे ही पल मुझे लगता है कि तुम एक यथार्थ की तरह जीवन में शामिल हुए और स्वप्न की भांति अपनी विलुप्त हो गए. तुम्हारा आना न किसी प्रार्थना का परिणाम था और और तुम्हारा जाना न मेरी किसी सायास गलती का परिणाम है.
तुम्हारा आना कभी कभी किसी दैवीय हस्तक्षेप की तरह लगता है जो मुझे यह बताने आया हो कि जीवन की हर समस्या का समाधान आंतरिक होता है बाहर से हम केवल कुछ अंशो में प्रेरणा हासिल कर सकते है. तुम्हारा जाना मुझे किसी ऋषि के श्राप के जैसा लगता है जो अचानक ही मेरी किसी असावधानी से नाराज़ होकर मुझे दे दिया गया हो.
फ़िलहाल मैं तुम्हें देव और असुर,वरदान और श्राप दोनों से मुक्त रखना चाहती हूँ.तुम एक औसत मनुष्य थे मगर अपने औसतपन में भी तुम्हारे अन्दर आत्मीयता बहुत सघन रूप से विद्यमान थी. तुम उदासी का अनुवाद करना जानते थे इसलिए तुम्हारे सामने मुझे कभी अभिनय नही करना पड़ा.
तुम मुस्कानों पर ऐसी टीका कर सकते थे कि खुद की आँखों से खुद की मुस्कान देखने की एक अदम्य प्यास जाग जाती थी. ऐसा नही है कि तुम्हारे पास मेरे सारे दुखों के ज्ञात समाधान थे मगर इतना जरुर है कि तुम्हें यह ठीक-ठीक पता था कि दुखों को कैसा अकेला छोड़कर उनको तड़फते हुए देखा जा सकता है. तुम्हारे पास सुख का यह बेहद मौलिक किस्म का संस्करण था.
तुम सुख के एक खराब भाष्यकार थे मगर फिर भी तुम्हारे पास सुख एक ऐसी परिभाषा था कि मैं अक्सर इस बात को लेकर कन्फ्यूज्ड हो जाती थी कि मैं सुख को दुःख कहूं या दुःख को सुख. मैंने गाहे-बगाहे तुम्हारे मूड की परवाह किए बगैर तुमसे बहुत से ऐसे सवाल किए जो मुझे नही करने चाहिए थे मगर अब मैं तुम्हारे धैर्य की एक मौन प्रशंसक बन गई हूँ.
जिस दिन तुम मिले थे ठीक उसी दिन मुझे इस बात का बोध हो गया था कि तुम्हें सहेज कर रखना मेरे बस की बात नही है और एकदिन मैं तुम्हें जरुर खो दूँगी. और एकदिन वही हुआ मैंने तुम्हें अचानक से खो दिया. अच्छी बात यह रही कि मैंने कभी तुम्हारे ऊपर अनुराग की दृष्टि नही रखी अन्यथा तुम्हारी अनुपस्थिति में मेरे लिए खुद से बात करना बेहद मुश्किल हो जाता. मगर अनुराग की अनुपस्थिति का यह अर्थ बिलकुल नही था कि मुझे तुम पसंद नही थे. मुझे तुम पसंद थे और ठीक उतने पसंद थे जितनी मुझे अपनी एक कलम पसंद थी जिसमें बार-बार मैं रिफिल कराती थी. दरअसल तुम मेरे एक मौलिक किस्म के हस्ताक्षर से थे जिसकी एक कलात्मक ख़ूबसूरती थी मगर मैंने जिसकी मदद से मैंने कभी लाभ के लिए कोई धन आहरित नही किया. तुम लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, यश-अपयश से परे थे मगर मैं तुम्हें विधि हाथ नही कहना चाहती क्योंकि विधि के हाथ अक्सर बेहद छोटे होते है.
तुम एक आकाश थे जो थोड़ी देर सुस्ताने के लिए धरती पर आए थे तुम्हारी जरूरत इस ग्रह जैसी अनेक धरतियों को है. तुम एक चित्र में शामिल होते हो तो दुसरे चित्र से अनुपस्थित.
हीरा है सदा के लिए यह अक्सर हम सुनतें आए है मगर तुम सदा के लिए नही थे  इसलिए तुम हीरे से भी अधिक मूल्यवान थे. तुम्हारा होना अब एक चमत्कार सरीखा लगता है और तुम्हारा न होना इस बात की पुष्टि करता है कि कलयुग में कोई चमत्कार कभी घटित नही होता है.
तुम अपनी गति से शामिल हुए और अपनी लोक की गति से विलग यह कोई अनूठी बात नही है मगर अनूठी बात यह है कि तुम जब तक थे अपनी पूरी सम्पूर्णता में थे तुम्हें खोने के भय को मैंने कभी अपने मन में स्थान नही दिया उसका एक लाभ यह हुआ कि अब जब तुम नही हो तो मैं तुम्हें याद करते हुए भावुक नही होती बल्कि तुम्हारी बातें दोहरा कर मुझे एक अलग किस्म का आत्मविश्वास मिलता है और उसी आत्मविश्वास के बल पर मैं तुम्हारे खोने की बातें हंसते हुई बता रही हूँ.जबकि मैं यह जानती हूँ कि मेरे पास तुम्हारा नया पता नही है.
तुमनें एक यात्रा की और तुम्हारे साथ एक यात्रा मैंने भी की इस यात्रा की स्मृतियाँ मुझे हमेशा यह बात याद दिलाती रहेगी कि एक मनुष्य से प्रेम करने के हज़ार बहाने हो सकते है और उसे भूलने का एक बहाना भी कभी-कभी कम पड़ता है. मैं तुम्हारे साथ रहकर प्रेम और घृणा का भेद समझ पायी इसलिए अब मुझे प्रेम की आवश्यकता नही है. ये बात कहने का आत्मबल मेरे पास तब नही था जब तुम मिले थे.
तुम्हरा मिलना मेरे लिए खुद से मिलने जैसा है और तुम्हारा बिछड़ना भी मुझे मेरे और नजदीक ले आया है इसलिए मेरे मन में कोई खेद या संताप अब शेष नही है. मुझे बोध है कि तुम ठीक इसी वक्त किसी दुसरे वक्त और हालत से लड़ते शख्स की मदद कर रहे होंगे क्योंकि तुम इस दुनिया में इसी लिए आए हो.

‘बेपते की चिट्ठी’

© डॉ. अजित