कथा दर्शन : प्रथम टीका
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प्रतीतवाद की स्थापना
के बाद अपनी दर्शन यात्रा में मैंने एक नया संप्रत्य जोड़ने का रहा हूँ. जिसका
नामकरण मैं कथा दर्शन के रूप में किया है. यह प्रतीतवाद का ही एक प्रकार का विस्तार
समझा जाए. प्रतीतवाद में छलरहित एक अन्य छवि निर्माण किया जाता है जिसके फलस्वरूप
बिना अधिक प्रयास किए आपका वह होना आसानी से संप्रेषित हो जाता है जोकि वस्तुत: आप
अन्तस् के स्तर पर नहीं होते हैं. ज्ञान और विमर्श की दुनिया में प्रतीतवाद के
सहारे लम्बे समय तक टिके रहना संभव हो जाता है क्योंकि यह आपके लिए एक ऐसी बुनियाद बनाता है जिसके सहारे
आप अपने विलक्षण होने की सामाजिक छवि के साथ सहजता से रह सकते हैं.
अब बात कथा दर्शन की.
पिछले दिनों मेरी मेरे अपने एक अभिन्न मित्र से लड़ाई हो गयी और लड़ाई की वजह यह थी
कि मुझे लगा कि वह मेरे होने के मूल्य को दरकिनार कर मुझे ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ ले
रहा है. इस बात पर जब मैंने आपत्ति की तो उसने मुझे समझाने की दृष्टि से कहा आप मेरी
बात सुनिए मैं कहाँ फंसा था. इतने सुनते ही मेरा पारा और अधिक गर्म हो गया मैं
उसकी एक न सुनते हुए बस एक बात की रट लगा ली कि- कथा मत सुनाओ ! और मैंने उसके
द्वारा अपने बचाव में कही गयी एक बात न सुनी. कुछ दिन हमारे मध्य अबोला रहा. मगर
चूंकि दोस्ती गाढ़ी है इसलिए फिर सब कुछ भूलकर बातचीत शुरू हो गई.
उसदिन कथा के नाम
किया गया व्यंग्य या रोषोक्ति अब हास्य में बदल गयी और हम दोनों ने अपनी-अपनी कथा
का रूमानीकरण अपने-अपने ढंग से किया. इस द्वंद और संवाद से मेरे अंदर एक नया दर्शन
पैदा हुआ जिसका नामकरण कल मैंने कथादर्शन
के नाम से किया. इस दर्शन के प्रवर्तक आचार्य के रूप में कथा दर्शन की कुछ प्रमुख
स्थापनाओं को मैं लिपिबद्ध कर रहा हूँ जिसे मेरे उत्तराधिकारी देश काल और
परिस्थिति के अनुसार संवर्द्धित एवं सम्पादित करते रहेंगे.
कथा दर्शन: बुनियादी स्थापनाएं
· प्रत्येक
मनुष्य के पास अपने जीवन यात्रा को लेकर एक मौलिक कथा होती है उसे वह विलक्षण, अपरिहार्य
और अद्भुत प्रतीत होती है.
· मनुष्य
की अधिकतम रूचि अपनी कथा को कहने में रहती है वह जितना अपनी कथा का जितना कुशल
वक्ता होता दूसरो की कथा का वह उतना ही बोझिल श्रोता होता है.
· जीवन
दरअसल एक कथा के भीतर कई कथाओं के चलने का परिणाम है. ये कथाएँ समानांतर हो सकती
है साथ ही एकदम अलग भी.
· जब
किसी की जीवन कथा कथ्य से भटकती है तो वह उसकी पूर्ति अपनी लौकिक संबंधों से करने
की चेष्टा करता है. अनुभव भी कथा का एक अनुभूतिपरक नाम है.
· कथा
की असत्यता वह मनुष्य तीव्रता से पहचान लेता है जो अपनी कथा के सच-झूठ को स्वीकार
कर आगे बढ़ता है.
· कथा
वस्तुत: न तो सच होती है और न झूठ यह मात्र एक कथा होती है. जैसे संसार में अन्य
ऐसे पदार्थ होते हैं जो अपने सहगामी के जैसे परिणाम देने लगते हैं इसी प्रकार कथा
परिवेश पर आश्रित होती है.
· जब
कोई अपनी कथा को बार-बार सम्पादित करता है तो वह कथा रूचि, आकर्षण और संवेदना की
चमक को खो देती है.
· वाचिक
और श्रुति परम्परा की कथा से अलग होती है मनुष्य की कथा इसमें कई बार वाचक और श्रोता व्यक्ति को
खुद ही होना पड़ता है.
· दुनिया
की अनेक कथाएँ बिना कहे ही समाप्त हो गयी. आत्महत्याओं से पहले ये सब कथाएँ एकत्र
होकर शोक करती हैं.
· कथा
को कहते हुए इतनी सावधानी अवश्य बरतनी चाहिए कि श्रोता को सच पर उतना भर संदेह हो
जितना दाल में नमक होता है.
· जो
कथाएँ रोमांच रहित शुष्क और दुःख से सनी हुई हैं उनका सूखकर टूटना तय होता है मगर
वे फिर ऐसी कथाओं जो जन्म देती हैं जो अमरबेल की तरह मनुष्य से लिपट जाती है.
· कथा
दर्शन में कथा से आशय कहानी से नहीं है कहानी लौकिक गल्प है कथा दर्शन में कथा से
आशय गल्प और कहानी से इतर कल कथा से होता है जो सदैव अथाह संभावनाएं लिए होती है.
· कथा
कहने वाले और कथा सुनने वाले लोग एक दूसरे की कथाओं से ऊबने बाद एक बात हमेशा कहते
हैं- वक्त है बदल जाएगा.
· कथा
के अंदर बैठी दूसरी कथा हमेशा इस उम्मीद मैं रहती है कि उसे अनोखे ढंग से कहा
जाएगा मगर जब उसकी उम्मीद उठती है तो वह कथा कहने वाले पर क्रोध नहीं करती बल्कि
चुप हो जाती है.
· जीवन
की तरह मृत्यु की भी एक कथा है जिसे हमेशा अपात्र व्यक्ति सुनाता है और पात्र
व्यक्ति सुनता है. कथा दर्शन का यह सबसे मार्मिक और त्रासद पक्ष है.
इति.
©डॉ. अजित