Friday, October 17, 2025

शरद

 

शरद का आगमन है. प्रेमिल मन शरद की प्रतीक्षा करते हैं. शीत के अपने गीत हैं जिन्हें गुनगुनाने के लिए सुर की परवाह न करनी पड़ती है. विगत की स्मृतियाँ शीत में आकर ठहर जाती हैं वे पिघलने से इनकार कर देती हैं. उनके स्तम्भन में सुख भी है और दुख भी. मन का मौसम समय के कालचक्र से लगभग मुक्त है उसका अपना अलग पंचांग है उसके महूर्त और ईष्ट दोनों ही भिन्न है.

आसमान की तरफ देखता हूँ और हरीतिमा के हवाले से कुछ पीले फूल तुम्हारे लिए चुनता हूँ. पीला रंग स्वेच्छा से हरियाली को छोड़ने का प्रतीक है. जिससे मुझे साहस मिलता है कि अंतत: मेरी यात्रा भी यही है एकदिन मैं भी इसी तरह टूटकर रंगबोध से मुक्त होता हूँ पीतवर्णी होकर स्थगित होता चला जाऊँगा.

कितना सुंदर होता कि बातों में उदासी और आशाओं में विरोधाभास न बुना होता है. एक लय है जो छंद से बिछड़ गयी है एक सुर है जो सध नहीं रहा है और एक राग है बैराग बनता जा रहा है. जीवन की तमाम अनित्यताओं के मध्य एक दिशाशूल है जिसे देखने के लिए मन की यंत्र मानक त्रुटि के शिकार हो गए हैं.

शीत को आगमन यह बताता है कि मनोविज्ञान की गोद से निकल कर जीवन गणित की शुष्क धरती पर निर्वासित हो गया है. अब गणनाएँ यह बताएंगी कि कौन कितने अक्षांश और देशांतर पर अटका हुआ है और अँधेरे के बाद के अँधेरे को खगोल की भाषा में क्या कहते हैं. यह समय मन के भूगोल को समझने का नहीं है बल्कि यह नि:सहायताबोध से संबंधों के उन कोमल तंतुओं को निहारने का है जो दूर से देखने पर एक चोट की शक्ल लिए दिखते हैं और जिनका स्पर्श खुरदरा हो गया है.

यह समय उपचार तलाशने का नहीं उपचार से मुक्त होने का भी है.

Wednesday, July 23, 2025

दु:ख, अवसाद, अप्रिय मन:स्थिति और प्रेम – कुछ बातें

 

दु:ख, अवसाद, अप्रिय मन:स्थिति और प्रेम – कुछ बातें  

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प्यार एक खूबसूरत शै है। यह आपको खुद से प्यार करना सिखाती है। प्यार जीवन को उम्मीद से भरती है। यह सवाल अनेक ढंग से पूछा जाता रहा है कि आखिर आदमी प्यार क्यों करता है। बावजूद इसके कि उसे पता होता है कि प्यार की अंतिम मंजिल दु:ख है। वह सब कुछ जानते हुए उस तकलीफ को नजरअंदाज़ करके जीता है क्योंकि प्यार उसे यह नजरअंदाज़ करने की सहूलियत देता है। प्यार के अनुभव और प्यार को लेकर दृष्टिकोण सबके अपने-अपने हैं और यह एक दूसरे के कम ही काम आते हैं।

मैं आज प्यार की बातें करता-करता जीवन के स्याह पक्षों दु:ख और अवसाद की तरफ लौटना चाहता हूँ  क्योंकि जीवन का एक सिरा यहीं बंधा हुआ होता है। यह एक लोकप्रिय जन विश्वास है दु:ख बांटने से घटता है। सतही तौर पर यह सच भी है आखिर आदमी एक दूसरे का दुख दर्द सुनकर ही जिंदा रहता है। मगर दु:ख का एनकोर या इनर सेल्फ दु:ख के अनावृत्त होने पर शर्मिंदगी से खुद को घिरा हुआ भी पाता है। जैसे दुख को कहने से दुख अब निजी न रहा और उसकी गरिमा क्षत-विक्षत हो गई। हमें यह लगता है कि कोई हमारे दुखों का संवेदनशील श्रोता है तो वह उनकी तीव्रता ठीक वैसी समझता है जैसा हम भोग रहे हैं या भोग कर आए हैं। मगर दु:खों के एक विचित्र कोडिंग हमारा मन करता है वे एक सीमा तक ही संप्रेषित किए जा सकते हैं और कोई दूसरा जन एक सीमा तक ही उन्हें सुनकर समझ सकते हैं।

दुख न कहे जाएँ तो बोझ बन जाते हैं और कह दिए जाएँ तो वे आपको घेर कर आपका पुन: शिकार करने के लिए संगठित होते हैं इसलिए कई बार दुखों को दफन करने को सही माना जाता रहा है। मगर दुखों का अपना एक नियोजन है वे मन:स्थिति पर उतने निर्भर नहीं हैं उनका अपना एकाधिकार है और वे उनका अपना एक भूगोल है एक प्रकार से वे किसी भी प्रकार के बोध की सत्ता को एक सिरे से खारिज करते हैं और वे कहीं भी कभी प्रकट हो सकते हैं।

संयोगवश मैंने एक से अधिक व्यक्तियों के जीवन की दुखों, असहजताओं और असुविधाओं को सुना है और कुछ को नजदीक से देखा भी है इसलिए मैं अपने दुखों को लेकर अतिरिक्त रूप से सावधान रहा हूँ मैंने उनका जब जिक्र करता हूँ तो वो एक अंधेरी सुरंग मुझे हाथ पकड़ ले जाते हैं मैं वहाँ से अपने श्रोता को तेज आवाज से बार-बार एक ही बात या घटना दोहरा कर यह विश्वास दिलाता हूँ कि मैं कहीं अंधेरे की दुनिया में हूँ और मैं लगातार चल रहा हूँ ताकि इस सुरंग से निकाल सकूँ मगर मेरी आवाज एक समय के बाद इतनी असपष्ट हो जाती है कि उसे सुनकर कोई ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा पाता है कि मेरे दिशा कौन सी है।

एक श्रोता के तौर भी मैंने इनदिनों खुद को अधैर्यशील पाया जिन्हें मुझे अपने तकलीफ सुनाने की आदत लगी हुई हैं वे मेरे इस खीज भर व्यवहार से थोड़े मुझसे निराश भी दिखें उन्हें लगता है कि मैं अब पहले जैसा ऊर्जावान,आत्मीय या नैदानिक व्यक्ति नहीं रहा हूँ। दरअसल, कई बार मैंने देखा कि मेरे निजी दुख और मेरे द्वारा सुने गए दुखों के मध्य एक गहरी मैत्री हो गई है वे मिलकर संगठित हो गए हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य यह है कि वे मुझे कमजोर या झूठा साबित कर सके।

जब आप एक ट्रामा लेकर बड़े होते हैं तो आपके अंदर आश्वस्ति का अभाव होता है कुछ न कुछ खो जाने का सतत भय बना रहता है आपका एक पैर अतीत में और एक पैर भविष्य में अटका हुआ होता है आप विस्मय से अपने वर्तमान को नष्ट हुए देखते हैं मगर आपको उसकी चिंता नहीं होती है। आपकी चिंता यह होती है जो आज है वह कल नहीं रहेगा। दु:ख इस चिंता से ऊर्जा पाते हैं वे आपको ऐसी अपेक्षाओं का दास बनाते हैं जो कभी पूरी नहीं होती है।

प्यार का दूसरा नाम आशा है और आशा को विकृत करके ही दुख खुद को सुरक्षित कर पाते हैं। इसलिए दो दुखी लोग कभी अच्छे प्रेमी साबित न हो पाते हैं। एक दिन आप या आपके प्रियजन एक दूसरे के दुख सुन-सुन कर ऊब से भर जाते हैं वे चाहते हैं कि आपके दुखों का अंत हो अगर दुखों का अंत इतना आसान उपक्रम नहीं है। दुख समाप्त नहीं होते हैं वे स्थूल हो जाते हैं या स्थगित। जिस दिन उन्हें प्यार की कोई नाउम्मीदी आवाज देती है वे फिर से जीवित हो शिकार पर निकाल पड़ते हैं।

यह कोई निबंध नहीं है कि मैं दुखों के संभावित समाधानों पर कोई नैदानिक पर्चा लिखूँ जिसे कोई अपने दुखों के रेफरेस पॉइंट के रूप में प्रयोग कर सके।  मैंने प्यार से बात शुरू की और दुख पर आकर ख़त्म की यही फिलहाल का मेरे जीवन का सबसे बड़ा दुख है जिसको लिखकर मैंने थोड़ी रोशनी पैदा की ताकि मैं उस अंधेरी सुरंग में इस तरह चल सकूँ कि मेरे घुटने न छिले।

दुख-सुख

©डॉ. अजित

Tuesday, April 29, 2025

कथा दर्शन : प्रथम टीका

 

कथा दर्शन : प्रथम टीका

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प्रतीतवाद की स्थापना के बाद अपनी दर्शन यात्रा में मैंने एक नया संप्रत्य जोड़ने का रहा हूँ. जिसका नामकरण मैं कथा दर्शन के रूप में किया है. यह प्रतीतवाद का ही एक प्रकार का विस्तार समझा जाए. प्रतीतवाद में छलरहित एक अन्य छवि निर्माण किया जाता है जिसके फलस्वरूप बिना अधिक प्रयास किए आपका वह होना आसानी से संप्रेषित हो जाता है जोकि वस्तुत: आप अन्तस् के स्तर पर नहीं होते हैं. ज्ञान और विमर्श की दुनिया में प्रतीतवाद के सहारे लम्बे समय तक टिके रहना संभव हो जाता है क्योंकि यह  आपके लिए एक ऐसी बुनियाद बनाता है जिसके सहारे आप अपने विलक्षण होने की सामाजिक छवि के साथ सहजता से रह सकते हैं.

अब बात कथा दर्शन की. पिछले दिनों मेरी मेरे अपने एक अभिन्न मित्र से लड़ाई हो गयी और लड़ाई की वजह यह थी कि मुझे लगा कि वह मेरे होने के मूल्य को दरकिनार कर मुझे ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ ले रहा है. इस बात पर जब मैंने आपत्ति की तो उसने मुझे समझाने की दृष्टि से कहा आप मेरी बात सुनिए मैं कहाँ फंसा था. इतने सुनते ही मेरा पारा और अधिक गर्म हो गया मैं उसकी एक न सुनते हुए बस एक बात की रट लगा ली कि- कथा मत सुनाओ ! और मैंने उसके द्वारा अपने बचाव में कही गयी एक बात न सुनी. कुछ दिन हमारे मध्य अबोला रहा. मगर चूंकि दोस्ती गाढ़ी है इसलिए फिर सब कुछ भूलकर बातचीत शुरू हो गई.

उसदिन कथा के नाम किया गया व्यंग्य या रोषोक्ति अब हास्य में बदल गयी और हम दोनों ने अपनी-अपनी कथा का रूमानीकरण अपने-अपने ढंग से किया. इस द्वंद और संवाद से मेरे अंदर एक नया दर्शन पैदा हुआ जिसका नामकरण कल मैंने  कथादर्शन के नाम से किया. इस दर्शन के प्रवर्तक आचार्य के रूप में कथा दर्शन की कुछ प्रमुख स्थापनाओं को मैं लिपिबद्ध कर रहा हूँ जिसे मेरे उत्तराधिकारी देश काल और परिस्थिति के अनुसार संवर्द्धित एवं सम्पादित करते रहेंगे.

कथा दर्शन:  बुनियादी स्थापनाएं

·       प्रत्येक मनुष्य के पास अपने जीवन यात्रा को लेकर एक मौलिक कथा होती है उसे वह विलक्षण, अपरिहार्य और अद्भुत प्रतीत होती है.

·       मनुष्य की अधिकतम रूचि अपनी कथा को कहने में रहती है वह जितना अपनी कथा का जितना कुशल वक्ता होता दूसरो की कथा का वह उतना ही बोझिल श्रोता होता है.

·       जीवन दरअसल एक कथा के भीतर कई कथाओं के चलने का परिणाम है. ये कथाएँ समानांतर हो सकती है साथ ही एकदम अलग भी.

·       जब किसी की जीवन कथा कथ्य से भटकती है तो वह उसकी पूर्ति अपनी लौकिक संबंधों से करने की चेष्टा करता है. अनुभव भी कथा का एक अनुभूतिपरक नाम है.

·       कथा की असत्यता वह मनुष्य तीव्रता से पहचान लेता है जो अपनी कथा के सच-झूठ को स्वीकार कर आगे बढ़ता है.

·       कथा वस्तुत: न तो सच होती है और न झूठ यह मात्र एक कथा होती है. जैसे संसार में अन्य ऐसे पदार्थ होते हैं जो अपने सहगामी के जैसे परिणाम देने लगते हैं इसी प्रकार कथा परिवेश पर आश्रित होती है.

·       जब कोई अपनी कथा को बार-बार सम्पादित करता है तो वह कथा रूचि, आकर्षण और संवेदना की चमक को खो देती है.

·       वाचिक और श्रुति परम्परा की कथा से अलग होती है मनुष्य की  कथा इसमें कई बार वाचक और श्रोता व्यक्ति को खुद ही होना पड़ता है.

·       दुनिया की अनेक कथाएँ बिना कहे ही समाप्त हो गयी. आत्महत्याओं से पहले ये सब कथाएँ एकत्र होकर शोक करती हैं.

·       कथा को कहते हुए इतनी सावधानी अवश्य बरतनी चाहिए कि श्रोता को सच पर उतना भर संदेह हो जितना दाल में नमक होता है.

·       जो कथाएँ रोमांच रहित शुष्क और दुःख से सनी हुई हैं उनका सूखकर टूटना तय होता है मगर वे फिर ऐसी कथाओं जो जन्म देती हैं जो अमरबेल की तरह मनुष्य से लिपट जाती है.

·       कथा दर्शन में कथा से आशय कहानी से नहीं है कहानी लौकिक गल्प है कथा दर्शन में कथा से आशय गल्प और कहानी से इतर कल कथा से होता है जो सदैव अथाह संभावनाएं लिए होती है.

·       कथा कहने वाले और कथा सुनने वाले लोग एक दूसरे की कथाओं से ऊबने बाद एक बात हमेशा कहते हैं- वक्त है बदल जाएगा.

·       कथा के अंदर बैठी दूसरी कथा हमेशा इस उम्मीद मैं रहती है कि उसे अनोखे ढंग से कहा जाएगा मगर जब उसकी उम्मीद उठती है तो वह कथा कहने वाले पर क्रोध नहीं करती बल्कि चुप हो जाती है.

·       जीवन की तरह मृत्यु की भी एक कथा है जिसे हमेशा अपात्र व्यक्ति सुनाता है और पात्र व्यक्ति सुनता है. कथा दर्शन का यह सबसे मार्मिक और त्रासद पक्ष है.

 

इति.

©डॉ. अजित

 

 

 

Wednesday, February 12, 2025

‘मृत्यु-अबोध’

 

मृत्यु एक शाश्वत चीज है. मृत्यु को स्वीकार कर लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. मृत्यु के दुःख को प्रोसेस करने के सबके तरीके भिन्न हो सकते हैं. जीवन में अधिक मृत्यु देखने से कुछ लोग मृत्यु को एक आर्य सत्य के रूप में स्वीकार कर लेते हैं उनके लिए किसी का जाना तकलीफ देता है मगर एक समय के बाद उस तकलीफ का बोध अमूर्त हो जाता है उसे बहुत डिकोड किया जाए तो ही वह प्रकट होता है.

जिन्हें जीते जी उतना प्यार नहीं मिला होता है जिसके वे हक़दार रहे होते हैं वे चाहते हैं उनके मरने के बाद लोग उन्हें उनके हिस्से का प्यार जरुर दे हालांकि यह एक अवास्तविक चाह है क्योंकि जब आप स्वयं ही जीवन के चित्र से अनुपस्थित हो गए हैं तो फिर कोई आपकी याद में कितना ही द्रवित बना रहे उसका कोइ खास अर्थ नहीं बचता है.

मृत्यु को निकट से जानने और समझने के बाद इसका रूमानीकरण आसान हो जाता है मगर अपने संघर्षों की तरह ही हमें अपनों की मृत्यु का दुःख सर्वाधिक अधिक तीव्र लगता है शेष के प्रति हम एक सामान्य मानवीय संवेदना जरुर अनुभव करते हैं.  जीवन और मृत्यु के मध्य का जो समय है उसकी अनेक दार्शनिक व्याख्याएं हैं. ये समस्त व्याख्याएं मृत्यु के बोध को सहजता से घटित होने के में मददगार हो सकती हैं मगर आदतन हम मृत्यु को भूलकर जीने के आदी होती हैं.

ऐसे लोगो सबसे अधिक व्यवहारिक होते हैं जो कहते हैं उन्हें किसी की मृत्यु से विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है ऐसा बुद्धिमान लोग कहते हैं. मगर व्यवहार और जीवन से इतर भी किसी को खोने से जो निर्वात उपजता है वह इतना मौलिक किस्म का होता है कि उसमें कोई दूसरा आकार जगह नहीं बना पाता हैं.

जीवन और मृत्यु को एक ही वाक्य में प्रयोग कर बोलने से जीवन का मोह और मृत्यु का भय भले ही कम हो जाता हो मगर मृत्यु एक प्रतीक्षा और जीवन के प्रस्थान बिंदु एक वृत्त जब पूरा होता है तब हम चलने और रुकने से मुक्त होकर अपनी उस नियत कक्षा में स्थापित होते हैं जिसे बाहर से देखा जा सकता है और अंदर यह लगभग अदृश्य रहता है.

‘मृत्यु-अबोध’

©डॉ. अजित

Tuesday, March 14, 2023

धीमी मौत

 

मैंने खुद को उसके अंदर एक धीमी मौत मरते हुए देखा था।

यह किसी उपन्यास के पात्र का संवाद हो सकता था। मगर यह एक किस्म का निजी यथार्थ था जो इतनी सफाई से और न्यून गति से घटित हुआ था कि जब तक इसका बोध हुआ यह घटित हो चुका था। हालांकि किसी के अंदर खुद को धीमी मौत को आप स्थगित कर सकते हैं मगर यदि यह एक बार शुरू हो जाए तो फिर इसे टाला नहीं जा सकता है।

किसी के गहरे अनुराग,अभिरुचि और सपनों के संसार से निर्वासन मिल जाना सुखद नहीं था।  मगर उसे देखते हुए यह जाना जा सकता था कि सम्बन्धों का भूगोल मनोविज्ञान तय करता है यह विषयगत अतिक्रमण है। मगर किसी के मन जब आपको लेकर दिलचस्पी समाप्त होने लगती है तो सबसे पहले इसकी सूचना मन ही मन को देता है।

दो लोगों की गहरे अपनत्व से भरी यात्रा को यूं यकायक खत्म होना दिखने में एक तात्कालिक बात लग सकती है मगर इसकी भूमिका धीरे-धीरे बहुत पहले लिखी जा चुकी होती है। एक अंधविश्वास से भरा कथन यह भी कहा जा सकता है- 'बाज़ दफा हमें खुद ही खुद की नजर लग जाती है'। यहाँ भी कुछ-कुछ ऐसा समझा जा सकता था।

दरअसल, एक लोकप्रिय बात यह कही जाती है कि दो असंगत लोग लंबे समय तक साथ रह सकते हैं क्योंकि उनका अलग होना एक किस्म की ऊर्जा पैदा करता है मगर मैं इस कथन की प्रमाणिकता से कम ही सहमत हुआ था। मुझे लगता था कि साथ रहने या साथ चलने के लिए साम्य-वैष्मय से इतर एक चीज जरूरी होती है कि हमारे पास कितना धैर्य है। और मैंने धैर्य से चूकने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए थे। धैर्य से चूकना एक खास किस्म की अनिच्छा या खीज भरता है और मनुष्य को अपने चुनाव पर संदेह होने लगता है। मूलत: मेरा अस्तित्व इसी संदेह के ट्रेप में आकर फंस गया था।

दो व्यस्क लोगों के मध्य असहमतियाँ हमेशा होती हैं और सहमत या असहमत होना मनुष्य का मन:स्थिति सापेक्ष मसला भी है। मगर उसके अंदर मैंने सहमति-असहमति से इतर मुझे लेकर एक महीन निराशा दिखी थी और वो इतनी महीन निराशा थी कि शायद उसे भी वह स्पष्ट नजर नहीं आ रही थी। उसने उसका कोई दूसरा नामकरण किया था जो न सच था न झूठ।

अंतत: मनुष्य के पास कारक-कारण के पैटर्न को समझने के लिए कुछ तर्क तलाशने के अलावा ज्यादा कुछ बचता नहीं है। मैंने थोड़ी देर वह उपक्रम किया और अन्तर्मन ने जब मुखरता यह कहा कि तुम्हारी उड़ान अब रास्ता भूल चुकी है तो उसके पास असीम आकाश को देखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। मेरे पास आकाश के सौंदर्य को लेकर मुग्धता नहीं थी डरती पर लौटने का भय भी नहीं था। मेरे पास जो था उसे नियति नहीं कहा जा सकता था बस अंदर से ही आवाज़ आती थी आखिरकार एकदिन यह तो होना ही था।

'अधूरे-वृतांत'

©डॉ. अजित

Monday, March 13, 2023

अपात्र

 उसके लिए मैं सुपात्र था

कुछ-कुछ अंशो में शायद मैं था भी। मगर वस्तुतः मैं पात्र-अपात्र के मध्य कहीं किसी बिंदु पर मुद्दत से किसी उपग्रह की भांति टिका हुआ था। मेरे पास मन के संचार केंद्र को भेजने के लिए बड़े धुंधले मानचित्र थे इसलिए उनके भरोसे कोई एक सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी। 

प्रेम में हीनताबोध नहीं उपजता है हीनताग्रन्थि वाला व्यक्ति कभी प्रेम नहीं कर सकता है मगर मैं स्वतः ही आत्म मूल्यांकन करने लगता और इस पात्र-अपात्र की बाईनरी से खुद को देखता। उस वक्त मेरी घड़ी दो अलग-अलग वक्त बताती और मैं हमेशा गलत समय को सही मानता।

एक क़िरदार के अंदर इतने किरदार गडमड थे कि अक्सर यह लगता कि प्रेम जिस किरदार से मिलने आया था वो हमेशा कहीं दूर अकेला दुबका बैठा हुआ है। आत्मदोष और अन्यमनस्कता इस कदर तारी थी कि अवचेतन में इस बात की गिल्ट रहती कि मेरी व्यवहारगत असमान्यताओं के बावजूद कोई कैसे मुझसे प्रेम कर सकता है? कहीं मैं किसी किस्म की विकल्पहीनता का तो परिणाम नहीं हूँ आदि-आदि।

जब आप वक्त के आगे-पीछे चल रहे होते हैं तो अपने होने को एक कुसमय का सच स्वीकार कर जीने की आदत विकसित करते हैं। प्रेम की कामना रहती है मगर प्रेम में चोटिल होने का डर भी सतत बना रहता है। किसी भी किस्म का गहरा अनुराग या केयर समानांतर काम्य और अकाम्य बनी रहती है क्योंकि आपको पता होता है कि आप प्रतिदान के मामले में लगभग शून्य है। आपके हिस्से का प्रेम आपका वक्त कब का चट कर चुका है।

मैं सुपात्र नहीं था मगर कुपात्र भी न था हाँ मैं अपात्र जरूर था। जब-जब उसका दिल मेरे कारण दुखा मेरे इस अपात्र होने की पुष्टि होती गई और यह मलाल बढ़ता गया कि मैं क्यों किसी के जीवन में मानसिक कष्ट का निमित्त बना हूँ। और मैं किसी मांत्रिक की भांति उसके जीवन में एक आदर्श काल्पनिक प्रेमी का आह्वाहन करने लगता यह बात तकलीफ देती थी मगर मैं यह करता था।

दरअसल, खुद को अपात्र समझना या बताना उस तात्कालिक गिल्ट से उबरने का एक जतन भर था जिसके चलते मुझे अक्सर यह लगता कि मेरे साथ कोई खुश नहीं रह सकता है। मै अपनी छाया और दुःख के संक्रमण से उसे बचाना चाहता था कम से कम यह बात जरूर प्रेम के पक्ष में जाती थी। 

उसके लिए मैं सुपात्र था इस कथन में दोष हो सकता है मगर वह मेरे लिए पात्र-सुपात्र से इतर एक अनिवार्य ईश्वरीय हस्तक्षेप की तरह थी जिसके कारण मैं यह जान पाया कि खुद से प्रेम करने की आदत को एक अतिरिक्त योग्यता की तरह देखना बन्द करना चाहिए। उसके कारण मुझे पहली दफा यह अहसास हुआ कि मैं प्रेम में जो जवाबदेही महसूसता हूँ वह इतनी ईमानदार जरूर है कि मैं आईने में खुद की पीठ देख सकता था जिस पर पलायन नहीं लिखा था।


©डॉ. अजित

Saturday, March 11, 2023

मस्टर्ड कलर

 उसके पास एक मस्टर्ड कलर का शॉल था।


उस शॉल को वो गले में लपेटे रखती थी। वस्त्र विन्यास के जानकार लोग उसे शॉल की बजाए स्टॉल भी कह सकते हैं मगर मैं उसे शॉल की कहता हूँ। मैं उसे देख पीले और मस्टर्ड कलर में भेद करने लगता था। जिनकी ज़िन्दगी एकरंगी रही हो उनके लिए रंगों में अंतर करना मुश्किल काम होता है। पहली दफा मुझे यह भेद समझ आया और मस्टर्ड कलर मुझे पीले से अधिक आकर्षक लगने लगा। इस आकर्षक लगने में रंग का नहीं उसका अधिक योगदान था।

उस शॉल पर कहीं-कहीं हल्के रुएँ भी दिखते थे शायद उसे बेतरतीबी में ओढ़ने के कारण उभर आए थे मगर उस शॉल की खूबसूरती में इससे लेशमात्र भी कमी न आई थी। उसकी अपनी एक मौलिक गंध थी जिसे मैं मीलों दूर बैठा भी आसानी से महसूस कर सकता था। 

बसंत का रंग पीला कहा जाता है मगर वो मस्टर्ड कलर मन में सर्दी में बसंत ले आता था उसकी गर्माहट मन की सतह पर जमीं शंकाओं की बर्फ को पिघला देती थी। उसे देखकर मैं मानवीय हस्तक्षेप की जुगत से चूक जाता था अक्सर क्योंकि उसे देखना एक सम्पूर्ण सुख था।उसे निर्बाध देखते हुए यह सुख अक्सर महसूस किया जा सकता था।

उसने बताया कि यह शॉल उसे बहुत पसन्द है क्योंकि यह उसकी माँ लाई थी। बाज दफा वस्तुओं से अधिक हमें वस्तुओं के संदर्भ उससे बांधने में मददगार होते थे यह बात कमोबेश मनुष्य पर लागू की जा सकती है। उस शॉल का अपना एक दिव्य ऑरा था जो उसके अभौतिक सौन्दर्य में विलक्षण इजाफा करता था। उसे उसके गले के इर्द-गिर्द लिपटा देख यह साफ तौर पर एक गहरा अपनत्वबोध देखा जा सकता था।

जिन तस्वीरों में वो मस्टर्ड कलर का शॉल था मैं उन तस्वीरों को देख मन के अलग-अलग भाष्य करता जोकि लौकिक और अलौकिक के साम्य बिंदु पर स्थिर नहीं हो पाते थे। उस शॉल के साथ जो हँसी मैं पढ़ पाता वह मुझे उस दुर्लभ पहाड़ी वनस्पति की याद दिलाती जिसका नामकरण अभी वनस्पति विज्ञानी नहीं कर पाए हैं। उस शॉल पर चिपके उसके एकाध सर के बाल मुझे जीवन की नश्वरता और जीवन के अनुराग का पाठ सिखाते थे। 

उसे ओढ़ते समय उसकी बेफिक्री यह बताती कि खुश होने के लिए कारण की नहीं एक लम्हे की जरूरत होती है।

दरअसल वो मस्टर्ड कलर का शॉल महज एक सवा दो

 मीटर का कपड़ा नहीं था बल्कि वो रिश्ते की गर्माहट का बेहद आत्मीय दस्तावेज़ था जिसे मैं उसकी अनुपस्थिति में आंख मूंदकर अक्सर पढ़ा करता था। उसके जरिए उससे मैं वो बातें कर पाता जो वो जानती तो थी मगर मेरे मुंह से सुनने की कामना रखती थी। 

मस्टर्ड कलर से बैराग की ध्वनि भी आती है एक ऐसा ही बैराग उससे मेरा जुड़ गया था जो विज्ञापन की तरह कहता था कि दूरियों का मतलब फासले नहीं होते। 

वो मस्टर्ड कलर का शॉल एक दरवाजा था जिसके दोनों तरफ सांकल लगी थी मगर मैं दोनों तरफ से उसे खोलने का कौशल जानता था।


©डॉ. अजित

Thursday, March 9, 2023

यात्रा

 एक सुरंग है। अंधी सुरंग। उसमे दाखिल होते वक्त कोई कौतूहल नहीं था। विकल्पहीनता भी न थी। एक सम्मोहन कहा जा सकता है जो अनायास घटित हुआ था। और मैं उसमे लगभग उत्साह के साथ के दाखिल हुआ। लगभग इसलिए क्योंकि बीच रास्ते में एक दफा ख्याल आया कि यदि यह सुंरग कहीं भी न खुली तो? क्या मैं वापस लौट सकूंगा। शायद नहीं। 

प्रेम के अनुभव कहने के लिए प्रतीकों का सहारा लेना पुरानी रवायत है। ऐसा क्यों है? शायद इसलिए कि एक समय के बाद प्रेम हमें रूपांतरित कर देता है और हम अपने नए रूप के साथ तादात्म्य स्थापित करने में थोड़ी असहजता भी महसूस करते हैं।

जिस रास्ते पर चलते हुए आपका खोना तय हो और जिस पर आपके पदचिन्ह के निशान किसी दूसरे के लिए मार्कर न बनते हो उसे रास्ते पर चलते जाना एक दिलचस्प चीज है। बाज दफा इस बात का इल्हाम हमें होता है कि उस पार पीड़ा है,संत्रास है,वेदना है मगर वर्तमान के अनुराग का लोभ हमारे कदमों की ऊर्जा बन हमें उस तरफ ले जाने का काम करता है।

सबकुछ जानते हुए भी खुद को एक संभावित पराजय या दुर्भिति के लिए खुद को मनोवैज्ञानिक तौर पर तैयार करने की जुगत बनाते जाना उस यात्रा का अनिवार्य हिस्सा थी।पहले लगता था कि मेरे पास औचित्य और बुद्धि का अद्भुत संस्करण मौजद है जिसके बल पर मैं यह तय कर सकता हूँ कि मुझे कितना संलिप्त होना है और कितना निरपेक्ष रहना है मगर वस्तुतः यह एक कोरा भरम था। एक समय के बाद हम केवल साक्षी हो सकते है प्रवाह के समक्ष बहने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं होता है।

किसी पहाड़ी गदेरे की फिसलन में फिसलने जैसा एक अनुभव हुआ और अपनी मान्यताओं की उबड़ खाबड़ घाटियों से फिसलता हुआ मैं एक अनजान गंतव्य की और तेजी से बढ़ रहा था। मेरे कंधे भले ही जिम्मेदारियों से चोटिल थे मगर रास्ते के पत्थरों के एकांत से मैंने कुछ हौसला उधार लिया था। कुछ जंगली वनस्पतियों ने मेरी चोटों का उपचार किया मगर उनकी गन्ध ने मुझे बताया कि मैं जिस रास्ते पर पर बहता हुआ जा रहा हूँ वह उस मुहाने पर खत्म होता है जिसके बाद रास्ते नहीं है।

मनुष्य ऐसा जानबूझकर क्यों करता है? यह सामान्य ज्ञान का प्रश्न हो सकता है मगर इसका उत्तर जीवन के अनुभव से नहीं मिलता है। वो एक गन्ध,एक पुकार या एक अज्ञात की स्वरलहरी होती है जिसके कारण हम अपरिहार्य रूप से घटित होने वाले दर्द को भूलकर उस अज्ञात के मोहपाश में बंध जाते हैं और उस दिशा की तरफ बढ़ने लगते हैं जहां रास्ते में वह एक सुरंग हमारा इंतज़ार कर रही होती है।

प्रेम या अनुराग की आंतरिक दुनिया जितनी जीवंत और वैविध्यपूर्ण होती है उतनी ही बाहर की दुनिया में उसका एक असम्भव मिलान उपस्थित होती है।हम दृष्टा और साक्षी होते है और उस दर्द के गवाह को हमारा इंतज़ार पहले दिन से कर रहा होता है, शायद तभी शायर 

वामिक़ जौनपुरी ने यह शे'र कहा था-

'जहां चोट खाना, वहीं मुस्कुराना

मगर इस अदा से कि रो दे जमाना

©डॉ. अजित 


Tuesday, September 13, 2022

जाने वाला जाने के बहाने तलाश लेता है

 

जाने वाला जाने के बहाने तलाश लेता है

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मानवीय सम्बन्धों की एक दिलचस्प बात यह है कि यह हमेशा नूतनता की चाह रखता है। एक सी बातों से ऊब कर हम कुछ नया चाहते हैं। भले ही यह नई बात एक लड़ाई से क्यों न शुरू होती हो। कई बार एडिटिंग के चक्कर में हम एक खूबसूरत और सहज तस्वीर को बेज़ा खराब कर बैठते हैं। आना और जाना दो नियत प्रक्रियाएं हैं। मन का काम है कि वो हमें हमेशा एक नया टास्क देकर रखना चाहता है। और प्राय: ये टास्क मन की असुरक्षाओं से जुड़ें होते हैं।मनुष्य को हमेशा जुते हुए देखना मन प्रिय शगल है।

किसी को पाना बड़ी बात नहीं है किसी को खोना भी एक स्वाभाविक घटना है मगर किसी को संभाल कर रखना एक कौशल है जो बहुत मुश्किल से अर्जित होता है। प्राय: हम अपने पूर्व के अनुभवों को अंतिम सच की तरह मानने के अभ्यस्त होते हैं। ऐसे मे किसी नये अनुभव को स्पेस मिलने की संभावना न्यून हो जाती है। वास्तव में यथार्थ की दुनिया सपाट होती है और हमारी ज़िंदगी कुछ कल्पना और कुछ भ्रम के सहारे ही आगे बढ़ती है।

जब आप भावनात्मक रूप से अस्थिर होते हैं तो प्राय: मन में शंकाओं को भरपूर स्थान मिलता है कि कहीं ऐसा न हो कहीं वैसा न हो। मनमुताबिक चीजें ज़िंदगी मे कभी घटित नहीं होती है। हमें अपने जीवन की असुविधाओं के मध्य ही कुछ यूटोपिया रचना होता है और यह ठिया ही हमारे सुस्ताने के काम आता है।

मूलत: दुनिया इम्परफ़ेक्ट है और ऐसा होना ही इसकी खूबसूरती है। मगर किसी को संपूर्णता में महसूस करने के लिए हमें सबसे पहले उसके अधूरे हिस्सों को आत्मसात करना जरूरी होता है। यदि हम किसी के अधूरेपन को नहीं समझ सकते हैं तो हम उसे संपूर्णता मे कभी नहीं जा सकेंगे।

अब बात जाने वालो की, जैसा मैंने शीर्षक मे लिखा कि जाने वाला शख्स हमेशा जाने का एक आकर्षक बहाना तलाश ही लेता है। उस बहाने पर अकेले मे अफसोस किया जा सकता है और भीड़ में हँसा जा सकता है। इसलिए जो जा रहा है उसे रोकने की कोशिशें प्राय: कारगर नहीं होती है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि जाने वाले शख्स को रोकना नहीं चाहिए मगर इतना जरूर है जिसे जाना है वह हर हाल मे जाकर रहेगा उसे आपकी कोई कातर पुकार नहीं रोक सकेगी क्योंकि उसकी जाने को लेकर की गयी प्रतिबद्धता रोज एक बहाने से मजबूत होती है।

हाँ यह तय है कि किसी का जाना तकलीफदेह जरूर होता है मगर हम मनुष्यों की निर्मितियाँ तकलीफ के साथ जीने की ही बनी हुई है तभी तो जब सब कुछ सहज और सुखपूर्वक चल रहा होता है तो हमें दुख की अनुपस्थिति का दुख होने लगता है।

इसलिए जाने वाले ध्यानस्थ होकर देखा जा सकता है एक बिन्दु के बाद वो क्षितिज की तरह दिखने लगता है और हम अपनी दृष्टि की सीमा मान आंखे फेर लेते हैं।

© डॉ. अजित

Thursday, September 1, 2022

उस बात को जाने भी दो जिसके निशाँ कल हो न हो..

 

उस बात को जाने भी दो जिसके निशाँ कल हो न हो..

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यह एक फिल्म के एक गीत का एक अन्तरा है. जाहिर सी बात है कि गाने फिल्म की सिचुएशन के हिसाब से होते हैं मगर ज़िन्दगी और फिल्म में एक समानता यह होती है कि दोनों ही क्लाइमेक्स से गुजरती हैं इसलिए फिल्मों के जरिए हम खुद के सेल्फ का विस्तार देख पाते हैं.

क्या वास्तव में उस बात को जाने देना चाहिए जिसके निशाँ कल नहीं रहेंगे. सिद्धांत: यह बात सही है . इस कथन की ध्वनि कुछ-कुछ ऐसी है कि हमने भविष्य को देख लिया है और कल जिस बात का संताप बने उसको आज ही समाप्त कर देते हैं. यह एक बुद्धिवादी बात है मगर अक्सर दिल के मामलें बुद्धि के भरोसे डील नहीं होते हैं. दिल और दिमाग के द्वन्द ही प्रेम में मनुष्य को कभी हिम्मत देते हैं तो कभी कमजोर बनाते हैं. यह एक शाश्वत प्रक्रिया है. जो हमें प्रिय होता है हम उसे हमेशा के लिए सहेज कर रखना चाहते हैं मगर यह भी उतना ही सच है दुनिया की हर प्रिय चीज को एकदिन उसके चाहने वाले से दूर होना पड़ता है. इसे नियति ,प्रारब्ध,विडंबना या अस्तित्व का नियोजन कुछ भी समझा या कहा जा सकता है.

प्राय: अनुराग द्वंद, औचित्य, पाप-पुण्य, सही-गलत आदि के मध्य फंसा होता है आज तक कोई एक तयशुदा फार्मूला नहीं बन सका है जिसके आधार में हम किसी सम्बन्ध के विषय में एक मुक्कमल राय बना सकें. मानव व्यवहार के डायनामिक्स बहुत जटिल चीज है. एक लोकप्रिय अवधारणा यह रही है कि मनुष्य के अंदर किसी किस्म की रिक्तता उसे बाहर प्रेम या अनुराग को तलाश करने के लिए बाध्य करती है जबकि यह बात पूर्णत: सच नहीं है. कई बार हमारे अंदर किसी किस्म की कोई रिक्तता नहीं होती है मगर हम अपने सेल्फ के एक्सटेंशन के चलते कहीं कनेक्ट हो जाते हैं. हमें लगता है कि हमे इसी की तलाश थी.

किसी का मिलना और मिलकर साथ चलना और फिर एकदिन अलग हो जाना लिखने में जितना सरल वाक्य बनता है असल ज़िन्दगी में यह उतना ही जटिल अनुभव लेकर उपस्थित होता है. किसी दार्शनिक ने लिखा है कि प्रेम भीरु लोगो के लिए उपलब्ध नहीं होता है यानि प्रेम में दुस्साहसी होना एक अनिवार्य शर्त है मगर मेरा यह मानना है कि डरपोक और कायर व्यक्ति को प्रेम करने और प्रेम पाने का उतना ही हक़ है जितना एक दुस्साहसी व्यक्ति को होता है.

एक समय के बाद हम किसी को खोने को लेकर डरने लगते हैं कि क्योंकि किसी को खोना खुद को खोने के जैसा ही होता है लगभग. इसलिए हम भविष्य की कल्पना में हम संयुक्त नहीं पाते तो शायद यह कहना आत्मसांत्वना देने का एक तरीका हो सकता है कि उस बात को जाने भी दो जिसके निशाँ कल हो न हो. ये कल की तकलीफ को आज भोगने की एक ईमानदार चाह भी हो सकती है क्योंकि शायद तब इसकी तीव्रता अपेक्षाकृत कम हो.

अंत में यह कहूँगा कि प्रेम या अनुराग में सबके निजी अनुभव होते हैं और किसी एक का अनुभव किसी अन्य के किसी काम का नहीं होता है. इसलिए हम किसी के अनुभव को सुनकर उदास हो सकते हैं या चमत्कृत हो सकते हैं  मगर इससे हमारे अनुभव का कोई मिलान संभव नहीं हो पाता हैं.

हाँ ! इतना जरुर है कि जिस बात के निशाँ कल नहीं रहने की संभावना होती है उसे सोचकर हम यह जरुर सोचते हैं कि जो आज है वो शायद कल हो न हो.

 

'कल हो न हो'

© डॉ. अजित

Tuesday, August 9, 2022

बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता

 

बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता

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फिल्म मजबूर में किशोर कुमार के द्वारा गाए एक गाने की ये पंक्तियाँ हैं. बहुत ज्यादा कितना ज्यादा होता है या कितने ज्यादा को बहुत ज्यादा कहा जा सकता है यह सवाल जरुर पेचीदा है मगर यह सच है कि एक समय के प्यार की तीव्रता कतिपय अर्थों में आत्मघाती होने की तरफ बढ़ने लगती है.

कुछ दोस्तों को इस कथन पर आपत्ति हो सकती है कि बहुत ज्यादा के क्या कोई एक नियत पैमाने हो सकते हैं? या फिर वे कह सकते हैं प्यार कभी इतना सोच समझकर नहीं किया जाता कि उसमे यह ध्यान रखा जाए कि कितना प्यार करना है या कितना नहीं करना है.

मनोवैज्ञानिक तौर पर प्यार एक खूबसूरत एहसास है जो हमें अंदर से खूबसूरत बनाता है जब हम किसी से प्यार कर रहे होते हैं तो हम समानांतर रूप से खुद से भी प्यार कर रहे होते हैं. प्यार एक ऐसा इमोशन है जिसकी प्रकृति अत्याधिक तरल होती है. यही कारण होता है कि प्यार के साथ-साथ अधिकार,शंका, दुविधा,ईर्ष्या, डर,असुरक्षाबोध आदि अन्य भाव भी गडमड होकर साथ चलते हैं इसलिए प्यार के सबके अनुभव अलग-अलग होते हैं.

किसी को पाने की चाह रखने में कोई बुराई नहीं है मगर किसी को हमेशा के लिए संभाल कर रखने के लिए एक अलग किस्म के कौशल की आवश्यकता होती है. प्राय: सभी प्रेमी यह कौशल अर्जित नहीं कर पाते हैं.

जिस गीत का जिक्र शीर्षक में किया गया है उसी गीत में आगे दामन छुड़ाने की बात आती है. सवाल तो यह भी उठता है कि कोई व्यक्ति हमारी ज़िन्दगी के लिए इतना महत्वपूर्ण है तो फिर उससे दामन छुडाने का ख्याल ही क्यों लाना? क्या उसे सदा के लिए अपने संग संजो कर नहीं रखा जा सकता है? शायद हम जिसे चाहते हैं उसे एकदिन खोना ही नियति होती है इसलिए बाद की तकलीफों से बचने की युक्ति के तौर पर गाने में कहा गया है कि बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता.

खोना-पाना,मिलना-बिछुड़ना यह सब पहले से तय होता है यह बात हमारा दिमाग एकबारगी मान सकता है मगर हमारा दिल इस सच को स्वीकार करने में हमेशा ना-नुकर करता है. प्यार की क्या कोई एक नियत मात्रा हो सकती है? शायद नहीं. प्यार की मूल प्रकृति अपरिमेय है. बल्कि यह लगातार विस्तार की तरफ आगे बढ़ता जाता है. यदि हम प्यार को किसी  ख़ास दायरे में सीमित भी करना चाहे तो भी हम ऐसा नहीं कर सकते हैं  क्योंकि एक समय के बाद बात हमारे बस से बाहर हो ही जाती है.

जब कोई किसी से प्यार करता है तो फिर वह भविष्य के बारे में न्यूनतम सोचता है उसके वर्तमान ही सबसे अधिक सुखद लगता है ये अलग बात है कि अतीत और भविष्य मिलकर अपनी कार्ययोजना को अंजाम देने में लगे रहते हैं.

प्यार को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी. फ़िलहाल मुझे वामिक जौनपुरी साब का एक शे'र याद आ रहा है जिसका जिक्र यहाँ करना मौजूं होगा-

'जहां चोट खाना,वहीं मुस्कुराना

मगर इस अदा से , कि रो दे जमाना

  

Friday, June 10, 2022

डायरी

 उसके पास प्रेम के कई उल्लेखनीय प्रसङ्ग थे। उसके नायकों से मुझे कभी कोई ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा महसूस नहीं हुई। यह बात उसे खराब लगती थी। प्रेम का एक अर्थ किसी अन्य से बेहतर सिद्ध करना भी था। और मैं कमतर या बेहतर की दौड़ से मुक्त होकर कुछ साथ बिताए वक्त हो याद रखना चाहता था बस।

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कभी-कभी लगता था मुझे कि प्रेम के लिए जितना साहस चाहिए होता है उससे कुछ दशमलव साहस कम था मेरे अंदर। इसलिए प्रेम के जुड़े मेरे प्रत्येक दावे में हमेशा एक मानक त्रुटि विद्यमान रही सदा। मैं प्रेम करने के लिए नहीं प्रेम का दस्तावेजीकरण करने के लिए उपयुक्त था सदा।

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मेरी निकटता कतिपय अर्थों में आह्लादकारी भी थी और कुछ अंशों में मैं असहनीय भी था। इन दोनों के मध्य वह बिंदु था जिस पर खड़े होकर मुझे पसन्द और नापसन्द एक साथ किया जा सकता था। इस बिंदु पर कोई पुल नहीं था इसलिए यहां से कोई रास्ता कभी न गुजर पाया।

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किसी को खोने का डर हमेशा पीछा करता था। यह डर दरअसल खुद के दुर्भाग्य पर विश्वास और नियति के षड्यंत्रों की जुगलबंदी से उपजा था। मेरे मन में में किसी को हासिल करने की चाह शायद ही कभी रही मगर हर निकट व्यक्ति को खोने का डर हमेशा साथ चलता रहा।

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एक समय के बाद हम सम्बन्धों में इस कदर लोकार्पित हो जाते हैं कि धीरे-धीरे हमारा मामूली होना ज्ञापित होता जाता है। मनोविज्ञान के स्तर पर यह बात महत्वपूर्ण थी कि सतत खुद को चमकीला बनाए रखना एक चुनौतिपूर्ण काम था। हम जैसे ही धूमिल होने लगते तो हमें अपने वाक कौशल पर सन्देह बढ़ता जाता था।

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एक समय ऐसा आता है जब हमें चीजें छोड़नी पड़ती हैं। वे अपना आकार तय कर लेती हैं। किसी जगह को छोड़ने से पहले हम उस दृश्य को कैद करना चाहते है मगर केवल वही दृश्य कैद किए जा सकते हैं जहां हम अपने आकार को लेकर सन्देह से न भरे हो।


©डॉ. अजित

Thursday, October 7, 2021

दुश्मन-दोस्त

 

प्रिय दोस्त,

खत के दिन अब नहीं रहे मगर फिर भी कुछ बातें केवल खत की मार्फत ही कही जा सकती हैं. इसलिए यह खत लिखना जरूरी हो गया है. तुम्हें आश्चर्य होगा कि इस खत में तुम्हारे नाम से संबोधन नहीं है. कायर पुरुष किसी भी स्त्री को प्रिय नहीं होते है वे अपने अंदर की कायरता से नफरत करती हैं इसलिए कायरता से उन्हें एक खास किस्म की चिढ होती है. मगर मुझे लगता है तुम इस खत को देखकर अपनी उस चिढ पर काबू पा लोगी क्योंकि यह खत किसी कायर मन का परिणाम नहीं है. सम्बोधनों के अपने उलझाव होते हैं. हर संबोधन खुद में एक बंधन होता है. और नेह के बंधन को सोचने के बाद ही हमनें यह तय किया था कि हम एक दुसरे को हमेशा बन्धनों से मुक्त रखेंगे. इसलिए हम प्राय: सम्बन्ध को संबोधन की कैद से बचाते आए हैं.

तुम एकदिन कहा था कि दुखों के श्रोता बनने का साहस हर किसी के बस की बात नहीं होती है. उस दिन मुझे लगा था शायद तुम्हारे इस कथन में एक छिपी हुई व्यंगोक्ति है. मगर एकदिन मैंने पाया कि दुःख ही नहीं सुख के भी श्रोता बना रहना मुश्किल काम है. जब अपने किसी नजदीकी के सुख को बदले उस अपना एक नया दुःख सुनाने की चाह रखते हैं ताकि वह अपने सुख पर शर्मिन्दा महसूस कर सके. दुःख के बदले सुनाए गए दुःख हमें सांत्वना नहीं देते मगर हमारे दुःख ब्यान करने की इच्छा को कुछ दशमलव जरुर कम कर देते हैं.

कोई किसी के दुःख को सुनकर कब तक उत्साहित रह सकता है. हर कोई अपनी ज़िन्दगी में अलग अलग किस्म की लड़ाई रहा है ऐसे में वो दुखों का श्रोता बनना पसंद नहीं करता है. वह खुद से एक किस्म की रिहाई चाहता है और इस रिहाई की कीमत वो अलग अलग ढंग से चुकाता भी है. दरअसल सुख और दुःख बेहद निजी चीज है. बार-बार कहने पर दुःख अपना अर्थ खो देते हैं और सुख को नजर लग जाती है ऐसा अक्सर लोगों ने अपने अनुभव में पाया है.

मैं दुःख या सुख का भाष्यकार नहीं हूँ बल्कि मैंने खुद कुछ संदर्भो में दोनों की अभिव्यक्ति के मामलें में लगभग असफल पाया है. हम खुद के इर्द-गिर्द एक समय सीमा तक ही भटकना चाहते हैं. इसका अर्थ यह भी निकाला जा सकता है प्राय: हम खुद से उकता कर बाहर देखना शुरू करते हैं.

जब मैंने यह खत लिखना शुरू किया था तो मेरे मन में कोई एक विचार नहीं था और न उपदेशक की भांति मैं तुम्हें तुम्हारी अज्ञानता पर ग्लानि से भरना चाहता था. दरअसल जीवन में अंतिम ज्ञान जैसी कोई चीज नहीं होती है हमें एक समय जो बात बेहद गुणवत्तापूर्ण लगती है कुछ समय बीतने के बाद वह हास्यास्पद या मूर्खतापूर्ण लगने लगती है. इसलिए शायद कहा जाता है कि कुछ भी पूर्ण सत्य नहीं है. आंशिक सत्य और आंशिक असत्य के मध्य कहीं वो बिंदु होता है जो हमे आकर्षित करता है.

मुझे पता है कि तुम अभी जीवन के उस दौर से गुजर रही हो जहाँ अपने निर्णयों की समीक्षा करने का मन नहीं करता है और मेरे ख्याल यह समीक्षा किसी काम आती भी नहीं है. मेरे ख्याल हमारा जीना महत्वपूर्ण है और हम कैसे जीते हैं इसकी वजह यदि आंतरिक हो तो जीना कुछ अंशों में आसान हो जाता है.

दोस्त या प्रेमी की भूमिका तुम्हें सदैव संदिग्ध ही लगी है शायद तुम्हें ऐसा लगता है कि एक समय के बाद मनुष्य का अपना एक वास्तविक चेहरा सामने आ जाता है जोकि बहुधा कुरूप ही होता है. मगर मैं कहूंगा कि मनुष्य का वास्तविक या अवास्तविक चेहरा जैसा कुछ नहीं होता है. हमारा जीवन अभिनय की पाठशाला है. कभी हम बिना श्रोता और बिना दर्शक भी उत्कृष्ट अभिनय करते हैं तो कभी हम अपनी अभिनय क्षमता से चूक जाते हैं. यदि कोई तुम्हारे जीवन में अर्थ खो देता है तो मैं कहूंगा कि वह कहीं न कहीं अपनी अभिनय क्षमता से चूक गया है.

तुमनें अक्सर मुझे पूछा है कि सुखी होने का क्या मूलमंत्र है? इस सवाल का जवाब कथावाचकों के पास अधिक प्रभावी मिल सकता है बशर्ते तुम्हारा मन कीर्तन में रमता हो. मैंने हर बार इस सवाल का जवाब अलग दिया उसकी एक वजह यह थी कि सुखी होने का मूलमंत्र को निजी तौर पर विकसित करना होता है अलबत्ता तो मेरे पास ऐसा कोई मन्त्र नहीं है और यदि होता भी तो वह तुम्हारे किसी काम का नहीं था जैसे ही तुम उसका उच्चारण करती वो खुद ब खुद निस्तेज हो जाता. इसलिए मैं कहूंगा सुखी होने का मूलमंत्र खोजने की अपेक्षा तुम अपना वो मन्त्र खोजो जिसके लिए तुम्हें ध्यान लगाने की आवश्यकता नहीं पडती है.

लम्बे खत देखने में अच्छे लगते हैं मगर पढ़ते हुए हम कई दफा अरुचि का शिकार हो जाते हैं मगर मुझे उमीद हैं कि तुम इस खत को पढ़ते हुए अरुचि का शिकार होते हुए भी अंत में अपनी रूचि का एक केंद्र जरुर विकसित  कर लोगी.

बस और क्या लिखूं... तुम खुद समझदार हो. इन तीन शब्दों से कविता नहीं बनती हैं मगर किसी को सलाह देने के कारोबार से मुक्त अवश्य हुआ जा सकता है.

वैसे मेरी मुक्ति अभी संभव नहीं है. कविता या कहानी न सही मेरे पास कुछ असंगत बातें जरुर हैं जिन्हें तुम आरम्भ से पढ़ोगी तो कहानी लगेंगी और आखिर से पढ़ोगी तो कविता जैसा महसूस होगा. मेरे पास इतनी ही कलाकारी शेष बची है. शायद ये तुम्हें नई बात लगे. किसी भी सम्बन्ध में नूतनता को बचाकर रखना एक जिम्मेदारी भरा काम है. और मेरी गैर जिम्मेदारी तुम बखूबी जानती हो.

शेष फिर....

तुम्हारा दुश्मन-दोस्त

डॉ.अजित

 

Wednesday, October 6, 2021

रुलाई

 

उसकी बातों को सोचते हुए रुलाई का फूट पड़ना महज एक घटना नहीं थी. दरअसल ये कई सालों से एक जगह पर तह करके की गयी शिकायतों और खुद की गलतियों की मिली जुली एक तात्कालिक प्रतिक्रिया जरुर समझी जा सकती थी. भावुक होना अच्छी बात थी मगर भावुकता का कोई बुद्धमार्ग नहीं था.

उससे अलग होते समय जो पीछे छूट गया था उसे सिलसिलेवार पढ़ पाना मुश्किल काम था. उसे बस देखा जा सकता था जैसे हुई वो महसूस होता तो आँखें खुद ब खुद बहने लगती थी.

उसकी बातों से एक बंदनवार बनाई जा सकती थी मगर उन बातों ने आखिरकार एक गुबार की शक्ल ले ली थी. ऐसा क्यों होता है यह जानने से बेहतर था कि यह जानना कि ये सब कैसे घटित हुआ. पुरुषों के लिए रोना एक अपशकुन की तरह रहा है वे रोते समय भी रोने की बाद की बातों को सोचकर शर्मिंदगी से भरे रहते हैं.

उसकी स्मृतियां न हँसा सकती हैं और न रुला मगर उसकी स्मृतियाँ हाथ पकड़कर वहां जरुर ले जा सकती है जहां रोने और हँसने के बीच की जगह पर दिल अकेला भटकता रहता है. किसी का साथ होना हमेशा साथी नहीं बनाता है मगर किसी का साथ होना इस बात की आश्वस्ति पालने की छूट जरुर देता है कि हम खोएंगे नहीं.

वो रुलाई दरअसल खुद के खो जाने से फूटी थी. अब इसके बाद कोई उसे यह न बता सकेगा कि आसमान का रंग नीला नहीं है और पानी का रंग वही दिखता है जो हमारी आँखों का होता है. खो जाने से भी बढ़कर दुःख इस बात का था कि हमनें उसे उस बात के लिए ही खो दिया था जिस बात के कारण कभी वो हासिल हुई थी.

सोचता हुआ और रोता हुआ मनुष्य एक मामलें में एक जैसे होते हैं दोनों ही उस बात के लिए परेशान होते हैं जिसका कोई ज्ञात हल नहीं होता है.

वो आगे बढ़ रहा था मगर पीछे जो छूट रहा था वो पीठ से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था. आगे बढ़ते हुए यह जाना कि गति खुद में एक भ्रम हैं बाजदफा हम आगे चलते दिखते जरुर हैं मगर हम वास्तव में अतीत की यात्रा पर होते हैं.

किसी को याद करके रोना अच्छी बात नहीं है मगर यह नहीं कहा जा सकता है कि रोना ही अच्छी बात नहीं है. रोना दरअसल कोई बात नहीं है यह हँसने का विपर्य भी नहीं है. अचानक से फूट पड़ना किसी अज्ञात ग्लेशियर के छिटकने के जैसा है लगभग जो न जाने कौन से तापमान के बढ़ने से एकदिन अपने घर से निकाला ले लेता है.

किसी से प्रेम करना उसके साथ हँसना मगर एकांत में कभी मत रोना. ऐसी रुलाई जब अचानक से थमती है तो हम खुद को दुनिया की सबसे निर्जन जगह पर खड़ा पाते हैं. शायद इसी कारण कहा जाता है कामनाएं मनुष्य को एकदिन अकेला कर देती हैं.

 

© डॉ. अजित

Friday, December 13, 2019

फुटकर_नोट्स


मैं निष्क्रियता का औचित्य सिद्ध करने का कौशल सीख गया हूँ.
कोई मुझसे  सवाल करे उससे पहले मैं उसको उसकी स्मृतियों में उलझा देता हूँ. उसके बाद उसे लगता है ऐसे वक्त में मुझसे कोई भी सवाल करना उचित नही होगा. हाँ ! वो मन ही मन मेरे लिए प्रार्थनाएं जरुर करता है. प्रार्थना वैसे एकवचन में प्रभावी लगती है मगर मेरे लिए बहु वचन में इसलिए करनी पडती है कि मैंने इस लोक और उस लोक के कई ज्ञात ईश्वरों का कई बार दिल दुखाया है. मेरे शुभ चिंतको को इस बात का भय है कि मेरे लिए की गई किसी भी प्रार्थना को वे ईश्वर अपने प्रतिशोध के कारण निस्तेज कर देंगे.
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मुझे यदि यह पूछा जाए कि मनुष्य के लिए प्रेम जरूरी है या रोटी. तो मैं इसका सीधा साधा जवाब दूंगा कि रोटी और प्रेम दोनों यदि जरूरत की तरह किसी के लिए जरूरी है फिर दोनों में चुनाव का कोई प्रश्न ही नही उठता है. प्रेम और रोटी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ये आपके लिए संयोग की बात हो सकती है कि आपके हिस्से कौन सा पहले आता है.
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संसार में बहुत कुछ ऐसा है जिस के कारक-कारण के बारें हम कुछ कहने से पहले बार-बार सोचते हैं. और कहने के बाद भी हमें अपने कहे हुए पर हमेशा संदेह होता रहता है. कारक-कारण एक समानुपातिक रिश्ता जरूर प्रतीत होता है मगर वास्तव में देखा जाए तो कारक-कारण को तलाशना शोध का एक अंग है और दुनिया के सारे शोध मन की मान्यताओं की बाह्य पुष्टि के यांत्रिक साधन भर है इसलिए जीवन में हमेशा कुछ ऐसे सवाल बने रहते हैं हमें जिनका एक सही और एक गलत जवाब पता होता है और ये दोनों जवाब अपना घर बदलते रहते हैं.
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मुझसे यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि मैं किसी के मन को कैसे पढ़ लेता हूँ?  मेरे पास इस सवाल के दो जवाब होते है मगर मैं हमेशा तीसरा जवाब देता हूँ ताकि जिसका मन पढ़ा गया है उसे भविष्य में मुझसे डर या खतरा महसूस ना हो. जब कोई हमें जानने लगता है तब हमें उससे कुछ अंशों में डर लगने लगता है. मैं किसी का मन पढ़ना नही जानता हूँ. यदि मैं ऐसा करना जानता तो यकीनन सबसे पहले अपना मन पढ़ता.
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लव यूसहज स्फूर्त अक्सर निकल जाता है. यहाँ लव और यू दोनों में आपस में कोई सार्थक अंतर नही होता है. दरअसल लव यूकहने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि तुम्हें और अधिक प्यार की आवश्यकता है. मनुष्य प्रेम में पहले गरिमापूर्ण होता है और बाद में अराजक. यदि कोई तुम्हें लव यूकहे तो इसे अभिवादन समझ प्रतियुत्तर मत देना .क्योंकि इसका कोई प्रतियुत्तर अभी तक शब्दकोश में नही बना हैं.
#फुटकर_नोट्स

© डॉ. अजित


Wednesday, September 25, 2019

अकेलापन-अकेलामन

अकेलापन के कितने ही पाठ हो सकते हैं. कोई भीड़ में भी अकेला होता है तो किसी के अकेलेपन पर रश्क हो सकता है. अपने अन्तस् में अकेलेपन के अलग-अलग टापू होते हैं. जो हमें हाथ पकड़कर अपने साथ ले जाते है. दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक अकेलेपन को अपने ढंग से परिभाषित करते हैं. दार्शनिक एकांत और अकेलेपन को आत्म जागरण के टूल के तौर पर देखतें है और रचनात्मक लोग अकेलेपन को खुद से मुलाकात के लिए जरूरी समझते हैं.

बुनियादी तौर पर यह सवाल थोड़ा टेढ़ा मगर रोचक है कि मनुष्य को अकेलेपन से डर क्यों लगता है? ऐसा क्या है उसके पास जिसे वो शेयर चाहता है? और क्यों करना चाहता है.

मन के विराट आंगन में एक कोना ऐसा होता है, जहां हम किसी का हाथ पकड़कर घूमना चाहते हैं उसके जरिए अपने अंदर कि वो दुनिया देखना चाहते है जिसे देख पाने की शायद अकेले हमारी हिम्मत नही होती है.
कहना क्यों जरूरी होता है? और उस कहने के लिए एक साथ क्यों अपरिहार्य लगने लगता है? क्यों के जवाब अकेलेपन के सन्दर्भ में जानने की कोशिश करना एक जोखिम भरा काम हो सकता है क्योंकि यहाँ बात खिसक कर मानवीय कमजोरी की तरफ जा सकती है.

खुद के अंदर पसरे एकांत से बिना अभ्यास और तैयारी के मिलनें से गहरा अवसाद जैसा कुछ प्रतीत हो सकता है और बोध के साथ अन्तस् में उतरने में यही अकेलापन उत्सव में भी परिवर्तित हो सकता है. मनुष्य के मन और जीवन को समझने के लिए विश्लेषण प्राय: किसी काम नही आता है. विश्लेषण भ्रम को बढ़ाता है हमें पूर्वाग्रहों से भरता है. जबकि जीवन को देखने के लिए उसे केवल जीना पड़ता है. यहाँ मैं केवल इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह केवल हर दौर में एक दुर्लभ घटना के तौर पर उपस्थित रहा है.
सोल मेट एक उत्तर आधुनिक और रोमांटिसिज्म से उपजी अवधारणा है. क्या सोल मेट और मनुष्य के अकेलेपन में कोई सकारात्मक सह-सम्बन्ध हो सकता है? मूलत: मैं इस अवधारणा को अप्राप्यता का मानवीयकरण के तौर पर देखता हूँ शायद खुद की बेचैनियों के जब सही जवाब न मिलें होंगे तो मनुष्य ने उनके जवाब एक अज्ञात सोल मेट के भरोसे हमेशा के लिए स्थगित कर दिए होंगे.

‘अकेलापन एक राग है
एक आधा-अधूरा राग
जिसके आरोह-अवरोह
में जीवन सांस लेता है
और जिसकी बंदिशों पर
सोल मेट रहता है
हमारा मन वो उन छोटी-छोटी
मुरकियों से बना होता है
जो आह और वाह के मद्धम स्वर के साथ
गाई जाती है मन ही मन में.’


‘अकेलापन-अकेलामन’


© डॉ. अजित