अनुराग की बेहोशी
अजीब शै है. हम वही सुनते हैं जो हम सुनना चाहते हैं. कई बार वो अनसुना रह जाता है
जो अलग-अलग समय पर अलग-अलग ढंग से और काफी स्पष्टता से कहा जा चुका होता है. हम
उसे एक तात्कालिक आवेग समझ गंभीरता से नहीं लेते हैं. हमें लगता है यह स्थायी सच
नहीं है. जबकि वो सच घटित हो चुका होता है. हम वक्त के बदलने का इंतज़ार करते रहते
हैं और जबकि वक्त हमें बदल कर कब का आगे निकल चुका होता है.
किसी भी रिश्तें में
वस्तुत: कोई सही या गलत नहीं होता है. सबके अपने सही और अपने गलत संस्करण होते
हैं. कोई तटस्थ व्यक्ति भी यह नहीं बता सकता है कि आखिर यहाँ कौन गलत है क्योंकि
पक्ष-विपक्ष के पास अपने समर्थन में पर्याप्त तर्क मौजूद होते हैं.
अर्थशास्त्र में मुद्रास्फीति
को लेकर एक सिद्धांत है- लॉसाफेयर का सिद्धांत. जब मुद्रास्फीति किसी भी उपाय से
काबू न आ रही हो तो उसे कुछ समय के लिए मुक्त कर देना चाहिए. मनुष्य के जीवन में
यह सिद्धांत अर्थशास्त्र से निकलकर मनोविज्ञान की शक्ल लेकर शामिल होता है. जब
आपके जब जतन निरर्थक जा रहे हो तो फिर एकदम से सब प्रयास रोक देने चाहिए और
परिस्थितियों को खुला छोड़ देना चाहिए. जो अस्तित्व का नियोजन होगा अंतत: चीजें
वहीं आकार लेंगी.
मनुष्य की सारी यात्रा
उसके अतीत के अनुभवों से बनती है. अतीत मनुष्य को बाध्य करता है कि वो वर्तमान में
उसकी दासता करे इसलिए जो भविष्य के सपनों से मुक्त हैं वे प्राय: वर्तमान की दासता
में जकडे हुए हैं अतीत उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करता है. मनुष्य के पास यदि
कोई सबसे खूबसूरत चीज है वो है दु:साहस की हद तक सपने देखने की उसकी आदत. सपने
देखने के लिए मनुष्य प्राय: अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है. सपना भले यथार्थ
न हो मगर सपने की कल्पना में एक गहरी ऊर्जा छिपी होती है. दुनिया के तमाम बड़े संकट
मनुष्य ने इस उम्मीद से काटे हैं कि कल बेहतर होगा. यदि किसी के पास कल को लेकर
कोई यूटोपिया नहीं है तो उसका वर्तमान प्रेम भी उसकी कोई खास मदद नहीं कर पाता है.
कितनी ही आत्मीय
पुकार हो, कितने ही गहरे सम्बन्ध हो यदि अपरिहार्यता का बोध धूमिल पड़ने लग जाता है
तो एक समय के बाद मनुष्य के पास रोष, तर्क, शिकायत और अन्यमन्सकता के अतिरिक्त कुछ
बचता नहीं है. मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी और ताकत यही है कि वो अपने प्रिय चीज के
लिए सब कुछ छोड़ सकता है और यदि वह उम्मीद खो बैठे तो अपनी प्रिय से प्रिय चीज को
भी छोड़ देता है.
जीवन को इसलिए भी
विरोधाभासी समझा जाता है.
©डॉ. अजित
‘ निर्वेद’