Wednesday, February 12, 2025

‘मृत्यु-अबोध’

 

मृत्यु एक शाश्वत चीज है. मृत्यु को स्वीकार कर लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. मृत्यु के दुःख को प्रोसेस करने के सबके तरीके भिन्न हो सकते हैं. जीवन में अधिक मृत्यु देखने से कुछ लोग मृत्यु को एक आर्य सत्य के रूप में स्वीकार कर लेते हैं उनके लिए किसी का जाना तकलीफ देता है मगर एक समय के बाद उस तकलीफ का बोध अमूर्त हो जाता है उसे बहुत डिकोड किया जाए तो ही वह प्रकट होता है.

जिन्हें जीते जी उतना प्यार नहीं मिला होता है जिसके वे हक़दार रहे होते हैं वे चाहते हैं उनके मरने के बाद लोग उन्हें उनके हिस्से का प्यार जरुर दे हालांकि यह एक अवास्तविक चाह है क्योंकि जब आप स्वयं ही जीवन के चित्र से अनुपस्थित हो गए हैं तो फिर कोई आपकी याद में कितना ही द्रवित बना रहे उसका कोइ खास अर्थ नहीं बचता है.

मृत्यु को निकट से जानने और समझने के बाद इसका रूमानीकरण आसान हो जाता है मगर अपने संघर्षों की तरह ही हमें अपनों की मृत्यु का दुःख सर्वाधिक अधिक तीव्र लगता है शेष के प्रति हम एक सामान्य मानवीय संवेदना जरुर अनुभव करते हैं.  जीवन और मृत्यु के मध्य का जो समय है उसकी अनेक दार्शनिक व्याख्याएं हैं. ये समस्त व्याख्याएं मृत्यु के बोध को सहजता से घटित होने के में मददगार हो सकती हैं मगर आदतन हम मृत्यु को भूलकर जीने के आदी होती हैं.

ऐसे लोगो सबसे अधिक व्यवहारिक होते हैं जो कहते हैं उन्हें किसी की मृत्यु से विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है ऐसा बुद्धिमान लोग कहते हैं. मगर व्यवहार और जीवन से इतर भी किसी को खोने से जो निर्वात उपजता है वह इतना मौलिक किस्म का होता है कि उसमें कोई दूसरा आकार जगह नहीं बना पाता हैं.

जीवन और मृत्यु को एक ही वाक्य में प्रयोग कर बोलने से जीवन का मोह और मृत्यु का भय भले ही कम हो जाता हो मगर मृत्यु एक प्रतीक्षा और जीवन के प्रस्थान बिंदु एक वृत्त जब पूरा होता है तब हम चलने और रुकने से मुक्त होकर अपनी उस नियत कक्षा में स्थापित होते हैं जिसे बाहर से देखा जा सकता है और अंदर यह लगभग अदृश्य रहता है.

‘मृत्यु-अबोध’

©डॉ. अजित

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