हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह की एक कविता की पंक्ति है—
“हिंदी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है…”जब भी यह पंक्ति मेरे सामने आती है, उससे ठीक पहले मैं उन्हीं की एक और कविता पढ़ता हूँ—
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा—
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।
और तब मन में एक प्रश्न उठता है—क्या ये दोनों कविताएँ एक ही व्यक्ति को संबोधित हैं?
मेरा मन कहता है—हाँ।
जब हाथ, हाथों से छूटते हैं, तो उनकी गर्माहट ध्रुवीय शीतलता में बदल जाती है। मन की सीमाओं से उपजी क्रूरताएँ एक अनकहा भय जन्म देने लगती हैं। जो स्पर्श कभी आत्मीय, अंतरंग और अपना था, उसकी स्मृतियाँ धीरे-धीरे धुंधलाने लगती हैं। मनुष्य का मन अनुराग के कई निजी संस्करण रचता है, ताकि अच्छे-बुरे समय में वह उन्हीं के सहारे स्वयं को सांत्वना दे सके।
दोस्ती, प्रेम और अनुराग के ये मिलते-जुलते रूप मनुष्य को एक ऐसी माया में बाँधते हैं, जहाँ बुद्धि और हृदय के बीच अक्सर एक शीतयुद्ध चलता रहता है। दर्शन और धर्म कहते हैं कि कुछ भी स्थायी नहीं—हर चीज़ की एक निश्चित यात्रा है। किंतु मनोविज्ञान इस सत्य को चुनौती देता हुआ, समय के साथ व्यक्तित्व में अनेक परिवर्तन करता रहता है। कभी-कभी इन परिवर्तनों को देखकर मनुष्य स्वयं से ही पूछ बैठता है—क्या यह सचमुच मैं ही हूँ?
मन की हर कातर पुकार जब भटक जाती है, तो भीतर एक विचित्र कोलाहल जन्म लेता है। उस कोलाहल में सही-गलत, उचित-अनुचित की पवनचक्कियाँ घूमती रहती हैं। उनके घर्षण से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, वह क्षण भर के लिए मन के अँधेरे को दूर कर देती है। पर प्रकाश और अंधकार का यह द्वंद्व इतना गहरा होता है कि मन स्वयं को जुगनू समझने के अलावा कुछ और नहीं कर पाता।
जब कोई अचानक जीवन से विदा हो जाता है, तो मन उसकी विदाई के प्रारंभिक बिंदु तक उलटे पाँव लौटता है। वह रास्तों से अपने ‘अच्छा होने’ की गवाही माँगता है, पर रास्तों के पास धूल के सिवा देने को कुछ नहीं होता।
किसी का मिलना और फिर बिछड़ जाना भले ही एक सहज, शाश्वत प्रक्रिया हो, लेकिन इस पूरी यात्रा में मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु वे स्मृतियाँ होती हैं, जो साझा सपनों को संजोकर कहीं विश्राम कर रही होती हैं। उन्हें जगाना ऐसा है मानो किसी बुज़ुर्ग को अपने जीवन के सबसे कठिन प्रसंग सुनाने के लिए आमंत्रित करना। एक बार वे बोलने लगती हैं, तो फिर चुप होना नहीं जानतीं।
एक संताप निरंतर पीछा करता रहता है—कि यथार्थ को भुलाकर जीना दरअसल एक बड़ा अपराध है। और जिस दिन इस अपराध के आरोप तय होते हैं, उस दिन हमारी सारी अच्छाइयाँ मानो खिड़की से कूदकर आत्महत्या कर लेती हैं।
दो लोगों के दूर होने की प्रक्रिया में यह जैसे अनिवार्य हो जाता है कि वे एक-दूसरे को आहत करके ही अलग हों—ताकि मन की दासता पर उस कड़वी औषधि का लेप चढ़ सके, जिसे समय ने आवश्यक समझा। और जिसे हमने, बिना किसी आरोग्य की आशा के, उसी के हाथों से पी लिया—जिसे कभी हमने अपनी हर बीमारी की दवा कहा था।
जीवन में ऐसे वैद्य भी मिलते हैं, जो निस्संदेह हमारा भला चाहते हैं, किंतु उनकी निस्पृहता देखकर यह कसक रह ही जाती है—कि उन्होंने जो लक्षण पूछे थे, दवा उन्हीं के अनुरूप क्यों न दी।
‘रफ़ नोट्स’
© डॉ. अजित
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