Thursday, March 19, 2026

‘रफ़ नोट्स’

 हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह की एक कविता की पंक्ति है—

“हिंदी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है…”

जब भी यह पंक्ति मेरे सामने आती है, उससे ठीक पहले मैं उन्हीं की एक और कविता पढ़ता हूँ—

उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा—
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।

और तब मन में एक प्रश्न उठता है—क्या ये दोनों कविताएँ एक ही व्यक्ति को संबोधित हैं?
मेरा मन कहता है—हाँ।

जब हाथ, हाथों से छूटते हैं, तो उनकी गर्माहट ध्रुवीय शीतलता में बदल जाती है। मन की सीमाओं से उपजी क्रूरताएँ एक अनकहा भय जन्म देने लगती हैं। जो स्पर्श कभी आत्मीय, अंतरंग और अपना था, उसकी स्मृतियाँ धीरे-धीरे धुंधलाने लगती हैं। मनुष्य का मन अनुराग के कई निजी संस्करण रचता है, ताकि अच्छे-बुरे समय में वह उन्हीं के सहारे स्वयं को सांत्वना दे सके।

दोस्ती, प्रेम और अनुराग के ये मिलते-जुलते रूप मनुष्य को एक ऐसी माया में बाँधते हैं, जहाँ बुद्धि और हृदय के बीच अक्सर एक शीतयुद्ध चलता रहता है। दर्शन और धर्म कहते हैं कि कुछ भी स्थायी नहीं—हर चीज़ की एक निश्चित यात्रा है। किंतु मनोविज्ञान इस सत्य को चुनौती देता हुआ, समय के साथ व्यक्तित्व में अनेक परिवर्तन करता रहता है। कभी-कभी इन परिवर्तनों को देखकर मनुष्य स्वयं से ही पूछ बैठता है—क्या यह सचमुच मैं ही हूँ?

मन की हर कातर पुकार जब भटक जाती है, तो भीतर एक विचित्र कोलाहल जन्म लेता है। उस कोलाहल में सही-गलत, उचित-अनुचित की पवनचक्कियाँ घूमती रहती हैं। उनके घर्षण से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, वह क्षण भर के लिए मन के अँधेरे को दूर कर देती है। पर प्रकाश और अंधकार का यह द्वंद्व इतना गहरा होता है कि मन स्वयं को जुगनू समझने के अलावा कुछ और नहीं कर पाता।

जब कोई अचानक जीवन से विदा हो जाता है, तो मन उसकी विदाई के प्रारंभिक बिंदु तक उलटे पाँव लौटता है। वह रास्तों से अपने ‘अच्छा होने’ की गवाही माँगता है, पर रास्तों के पास धूल के सिवा देने को कुछ नहीं होता।

किसी का मिलना और फिर बिछड़ जाना भले ही एक सहज, शाश्वत प्रक्रिया हो, लेकिन इस पूरी यात्रा में मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु वे स्मृतियाँ होती हैं, जो साझा सपनों को संजोकर कहीं विश्राम कर रही होती हैं। उन्हें जगाना ऐसा है मानो किसी बुज़ुर्ग को अपने जीवन के सबसे कठिन प्रसंग सुनाने के लिए आमंत्रित करना। एक बार वे बोलने लगती हैं, तो फिर चुप होना नहीं जानतीं।

एक संताप निरंतर पीछा करता रहता है—कि यथार्थ को भुलाकर जीना दरअसल एक बड़ा अपराध है। और जिस दिन इस अपराध के आरोप तय होते हैं, उस दिन हमारी सारी अच्छाइयाँ मानो खिड़की से कूदकर आत्महत्या कर लेती हैं।

दो लोगों के दूर होने की प्रक्रिया में यह जैसे अनिवार्य हो जाता है कि वे एक-दूसरे को आहत करके ही अलग हों—ताकि मन की दासता पर उस कड़वी औषधि का लेप चढ़ सके, जिसे समय ने आवश्यक समझा। और जिसे हमने, बिना किसी आरोग्य की आशा के, उसी के हाथों से पी लिया—जिसे कभी हमने अपनी हर बीमारी की दवा कहा था।

जीवन में ऐसे वैद्य भी मिलते हैं, जो निस्संदेह हमारा भला चाहते हैं, किंतु उनकी निस्पृहता देखकर यह कसक रह ही जाती है—कि उन्होंने जो लक्षण पूछे थे, दवा उन्हीं के अनुरूप क्यों न दी।

‘रफ़ नोट्स’
© डॉ. अजित

Wednesday, March 11, 2026

‘ निर्वेद’

 

अनुराग की बेहोशी अजीब शै है. हम वही सुनते हैं जो हम सुनना चाहते हैं. कई बार वो अनसुना रह जाता है जो अलग-अलग समय पर अलग-अलग ढंग से और काफी स्पष्टता से कहा जा चुका होता है. हम उसे एक तात्कालिक आवेग समझ गंभीरता से नहीं लेते हैं. हमें लगता है यह स्थायी सच नहीं है. जबकि वो सच घटित हो चुका होता है. हम वक्त के बदलने का इंतज़ार करते रहते हैं और जबकि वक्त हमें बदल कर कब का आगे निकल चुका होता है.

किसी भी रिश्तें में वस्तुत: कोई सही या गलत नहीं होता है. सबके अपने सही और अपने गलत संस्करण होते हैं. कोई तटस्थ व्यक्ति भी यह नहीं बता सकता है कि आखिर यहाँ कौन गलत है क्योंकि पक्ष-विपक्ष के पास अपने समर्थन में पर्याप्त तर्क मौजूद होते हैं.

अर्थशास्त्र में मुद्रास्फीति को लेकर एक सिद्धांत है- लॉसाफेयर का सिद्धांत. जब मुद्रास्फीति किसी भी उपाय से काबू न आ रही हो तो उसे कुछ समय के लिए मुक्त कर देना चाहिए. मनुष्य के जीवन में यह सिद्धांत अर्थशास्त्र से निकलकर मनोविज्ञान की शक्ल लेकर शामिल होता है. जब आपके जब जतन निरर्थक जा रहे हो तो फिर एकदम से सब प्रयास रोक देने चाहिए और परिस्थितियों को खुला छोड़ देना चाहिए. जो अस्तित्व का नियोजन होगा अंतत: चीजें वहीं आकार लेंगी.

मनुष्य की सारी यात्रा उसके अतीत के अनुभवों से बनती है. अतीत मनुष्य को बाध्य करता है कि वो वर्तमान में उसकी दासता करे इसलिए जो भविष्य के सपनों से मुक्त हैं वे प्राय: वर्तमान की दासता में जकडे हुए हैं अतीत उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करता है. मनुष्य के पास यदि कोई सबसे खूबसूरत चीज है वो है दु:साहस की हद तक सपने देखने की उसकी आदत. सपने देखने के लिए मनुष्य प्राय: अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है. सपना भले यथार्थ न हो मगर सपने की कल्पना में एक गहरी ऊर्जा छिपी होती है. दुनिया के तमाम बड़े संकट मनुष्य ने इस उम्मीद से काटे हैं कि कल बेहतर होगा. यदि किसी के पास कल को लेकर कोई यूटोपिया नहीं है तो उसका वर्तमान प्रेम भी उसकी कोई खास मदद नहीं कर पाता है.

कितनी ही आत्मीय पुकार हो, कितने ही गहरे सम्बन्ध हो यदि अपरिहार्यता का बोध धूमिल पड़ने लग जाता है तो एक समय के बाद मनुष्य के पास रोष, तर्क, शिकायत और अन्यमन्सकता के अतिरिक्त कुछ बचता नहीं है. मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी और ताकत यही है कि वो अपने प्रिय चीज के लिए सब कुछ छोड़ सकता है और यदि वह उम्मीद खो बैठे तो अपनी प्रिय से प्रिय चीज को भी छोड़ देता है.

जीवन को इसलिए भी विरोधाभासी समझा जाता है.

©डॉ. अजित

‘ निर्वेद’

Monday, March 9, 2026

‘शनि’

 

वो उसके जीवन में शनि के जैसा था. फ्रीजिंग पॉइंट तक कोल्ड. सब कुछ जमा देने वाला. उसके होने से सबकुछ यथास्थिति का शिकार हो गया था. दुःख जमकर ब्लैक आइस बन गए थे. जिन्हें पहाड़ी इलाके में काला पाला कहा जाता है वो ठीक वैसे थे उन पर चलते हुए गिरना तयशुदा मगर अनापेक्षित होता था. वो कई बार गिरते-गिरते बची. भले वो चोटिल न हुई हो मगर फिसलना आपके आत्मविश्वास पर जो चोट करता है वो उसके साथ भी घटित हुआ.

वो शनि की तरह काला नहीं था मगर उसका रंग चौबीस घंटे में इतनी बार बदलता था कि उसके रंग का मिलान दुनिया के किसी रंग से कर पाना संभव नहीं था. वो विलंबन का राजदूत था. उसके पास जीवन से उपलब्धियों को स्थगित करवाने की राजाज्ञा थी जिसे वो अनिच्छा से एकदम एकांत में बांचता था. वो आत्महीन नहीं था न किसी प्रकार ही हीनताग्रंथि से पीड़ित था मगर उसके होने से जीवन की प्रमेय उलझती जाती थी जब कि वो वास्तविक  समाधान देने के लिए विख्यात था.

शनि मात्र ग्रह या ज्योतिषीय फलादेश का प्रतीक नहीं है वो न्याय, कर्म और वस्तुनिष्ठता का प्रतिनिधि भी है. मनुष्य ग्रह या पिंड न होते हुए भी कारकतत्वों से ग्रह के गुणधर्म कैसे ढ़ोता है यह समझने के लिए उसका उदाहरण नव ज्योतिष जरुर दे सकते थे.

वो अपने वलय में कैद था वो ध्वनिरहित, अतिभारित था मगर उसकी गति का आभास इतना महीन था कि उसे देखकर अपने खराब समय की घोषणा करने वाला भी उदार होकर कहता था नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल बात तो यही थी वो जहां भी था वहां चीजें अप्रत्याशित ढंग से खराब होने लगती थी. उसे पिता ने त्यागा था और उसने पिता से बिना प्रतिशोध लिए खुद को सदा एक गहरे त्रासद एकांत में पाया था. वो साढ़े सात साल शायद ही किसी के जीवन में रुका हो इसलिए उसकी काल गणना को उसकी गति से नहीं जाना जा सकता है.

जब वो आया था जो चीजों ने एक नया आकार लिया मगर धीरे-धीरे वो आकार इतना अपरिमेय हो गया कि उसके किसी भी यंत्र से नहीं नापा जा सकता था और इस बेढंगे आकार के रोशनदानों से सबसे पहले प्यार से कूदकर आत्महत्या की. वो एक उपेक्षित यान की तरह मन-मस्तिष्क के अन्तरिक्ष में घूम रहा था जिसे नष्ट होने से पहले यह निश्चित करना था कि उसकी चपेट में वो न आए जिसे उसने प्राश्रय दिया था.

उसे देखकर एक बात ठंडी आह भरते हुए कही जा सकती थी कि यह तो एकदिन होना ही था. इस कथन को कहते हुए मनुष्य इतना सपाट दिखता था कि जीवन की काई पर फिसलते हुए कहीं पैर न अटकता था फिर अपनी छिली कोहनी को देखते हुए वक्त की गर्द को झाड़ते हुए एक थोडा लड़खड़ाते हुए अकेला आगे चलना था. पीछे से देखने वाला कोई भी व्यक्ति यह न कह सकता था कि इसकी चाल में जो वक्रता है वो अनिमंत्रित थी. इसलिए भी वो चलते हुए पीछे मुड़कर नही देखता था. क्या पता पीछे कोई देखने वाला भी न हो. उसके जाने के बाद का दिन इतवार का होता जिस दिन सब कुछ सामान्य और खुश दिखता था. यह उसके जाने की एकमात्र ज्ञात उपलब्धि थी.

 

© डॉ. अजित

‘शनि’