दु:ख, अवसाद, अप्रिय मन:स्थिति
और प्रेम – कुछ बातें
__
प्यार एक खूबसूरत शै है। यह आपको खुद से प्यार करना सिखाती है। प्यार जीवन को उम्मीद
से भरती है। यह सवाल अनेक ढंग से पूछा जाता रहा है कि आखिर आदमी प्यार क्यों करता है।
बावजूद इसके कि उसे पता होता है कि प्यार की अंतिम मंजिल दु:ख है। वह सब कुछ जानते
हुए उस तकलीफ को नजरअंदाज़ करके जीता है क्योंकि प्यार उसे यह नजरअंदाज़ करने की सहूलियत
देता है। प्यार के अनुभव और प्यार को लेकर दृष्टिकोण सबके अपने-अपने हैं और यह एक दूसरे
के कम ही काम आते हैं।
मैं आज प्यार की बातें करता-करता जीवन के स्याह पक्षों दु:ख और अवसाद की तरफ लौटना
चाहता हूँ क्योंकि जीवन का एक सिरा यहीं बंधा
हुआ होता है। यह एक लोकप्रिय जन विश्वास है दु:ख बांटने से घटता है। सतही तौर पर यह
सच भी है आखिर आदमी एक दूसरे का दुख दर्द सुनकर ही जिंदा रहता है। मगर दु:ख का ‘एनकोर’ या ‘इनर सेल्फ’ दु:ख के अनावृत्त होने पर शर्मिंदगी से खुद
को घिरा हुआ भी पाता है। जैसे दुख को कहने से दुख अब निजी न रहा और उसकी गरिमा क्षत-विक्षत
हो गई। हमें यह लगता है कि कोई हमारे दुखों का संवेदनशील श्रोता है तो वह उनकी तीव्रता
ठीक वैसी समझता है जैसा हम भोग रहे हैं या भोग कर आए हैं। मगर दु:खों के एक विचित्र
कोडिंग हमारा मन करता है वे एक सीमा तक ही संप्रेषित किए जा सकते हैं और कोई दूसरा
जन एक सीमा तक ही उन्हें सुनकर समझ सकते हैं।
दुख न कहे जाएँ तो बोझ बन जाते हैं और कह दिए जाएँ तो वे आपको घेर कर आपका पुन:
शिकार करने के लिए संगठित होते हैं इसलिए कई बार दुखों को दफन करने को सही माना जाता
रहा है। मगर दुखों का अपना एक नियोजन है वे मन:स्थिति पर उतने निर्भर नहीं हैं उनका
अपना एकाधिकार है और वे उनका अपना एक भूगोल है एक प्रकार से वे किसी भी प्रकार के बोध
की सत्ता को एक सिरे से खारिज करते हैं और वे कहीं भी कभी प्रकट हो सकते हैं।
संयोगवश मैंने एक से अधिक व्यक्तियों के जीवन की दुखों, असहजताओं और असुविधाओं को सुना है और कुछ को
नजदीक से देखा भी है इसलिए मैं अपने दुखों को लेकर अतिरिक्त रूप से सावधान रहा हूँ
मैंने उनका जब जिक्र करता हूँ तो वो एक अंधेरी सुरंग मुझे हाथ पकड़ ले जाते हैं मैं
वहाँ से अपने श्रोता को तेज आवाज से बार-बार एक ही बात या घटना दोहरा कर यह विश्वास
दिलाता हूँ कि मैं कहीं अंधेरे की दुनिया में हूँ और मैं लगातार चल रहा हूँ ताकि इस
सुरंग से निकाल सकूँ मगर मेरी आवाज एक समय के बाद इतनी असपष्ट हो जाती है कि उसे सुनकर
कोई ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा पाता है कि मेरे दिशा कौन सी है।
एक श्रोता के तौर भी मैंने इनदिनों खुद को अधैर्यशील पाया जिन्हें मुझे अपने तकलीफ
सुनाने की आदत लगी हुई हैं वे मेरे इस खीज भर व्यवहार से थोड़े मुझसे निराश भी दिखें
उन्हें लगता है कि मैं अब पहले जैसा ऊर्जावान,आत्मीय या नैदानिक व्यक्ति नहीं रहा हूँ। दरअसल, कई बार
मैंने देखा कि मेरे निजी दुख और मेरे द्वारा सुने गए दुखों के मध्य एक गहरी मैत्री
हो गई है वे मिलकर संगठित हो गए हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य यह है कि वे मुझे कमजोर
या झूठा साबित कर सके।
जब आप एक ट्रामा लेकर बड़े होते हैं तो आपके अंदर आश्वस्ति का अभाव होता है कुछ
न कुछ खो जाने का सतत भय बना रहता है आपका एक पैर अतीत में और एक पैर भविष्य में अटका
हुआ होता है आप विस्मय से अपने वर्तमान को नष्ट हुए देखते हैं मगर आपको उसकी चिंता
नहीं होती है। आपकी चिंता यह होती है जो आज है वह कल नहीं रहेगा। दु:ख इस चिंता से
ऊर्जा पाते हैं वे आपको ऐसी अपेक्षाओं का दास बनाते हैं जो कभी पूरी नहीं होती है।
प्यार का दूसरा नाम आशा है और आशा को विकृत करके ही दुख खुद को सुरक्षित कर पाते
हैं। इसलिए दो दुखी लोग कभी अच्छे प्रेमी साबित न हो पाते हैं। एक दिन आप या आपके प्रियजन
एक दूसरे के दुख सुन-सुन कर ऊब से भर जाते हैं वे चाहते हैं कि आपके दुखों का अंत हो
अगर दुखों का अंत इतना आसान उपक्रम नहीं है। दुख समाप्त नहीं होते हैं वे स्थूल हो
जाते हैं या स्थगित। जिस दिन उन्हें प्यार की कोई नाउम्मीदी आवाज देती है वे फिर से
जीवित हो शिकार पर निकाल पड़ते हैं।
यह कोई निबंध नहीं है कि मैं दुखों के संभावित समाधानों पर कोई नैदानिक पर्चा लिखूँ
जिसे कोई अपने दुखों के रेफरेस पॉइंट के रूप में प्रयोग कर सके। मैंने प्यार से बात शुरू की और दुख पर आकर ख़त्म की
यही फिलहाल का मेरे जीवन का सबसे बड़ा दुख है जिसको लिखकर मैंने थोड़ी रोशनी पैदा की
ताकि मैं उस अंधेरी सुरंग में इस तरह चल सकूँ कि मेरे घुटने न छिले।
‘ दुख-सुख’
©डॉ. अजित
No comments:
Post a Comment