Monday, May 15, 2017

पहाड़ डायरी-1

आज सुबह की चाय पीने के बाद मैं टहलने के लिए जंगल की तरफ चला आया. पिछले दो दिन से यहाँ हूँ. पहले दिन कमरे में अकेला पड़ा रहा. किसी नई जगह जाकर मुझे एकदिन उस जगह को अपनाने में लगते है. आज सुबह जब मेरी आँख खुली हल्की बारिश हो रही थी. बारिश की आवाज़ मुझे अच्छी लग रही है मैंने अपनी घड़ी देखी और थोड़ी देर तक एक करवट लेटा रहा.
अभी जिस जगह मैं हूँ वो पहाड़ की चोटी के नजदीक है. थोड़ी सुनसान जगह है मगर मुझे रास्तो की गुमरही से लेकर मंजिलों का सुनसानपन पसंद है. मैं यहाँ किस लिए हूँ ये तो नही बता सकता हूँ मगर मैं यहाँ होश में पहली बार हूँ. ये बात ठीक से जानता हूँ.
आते समय मेरे पास थोड़े से रूपये थे और मन में कुछ शंकाएं भी फिर मैंने दोनों को अलग अलग जेब में डाल दिया और यहाँ चला आया हूँ .अब दोनों की आईस-पाईस खेलते हुए मेरे पास से गुमशुदा हो गये है.
जिस जगह मैं फिलहाल हूँ  यहाँ मोबाइल के सिग्नल कमजोर है मुझे इससे कोई दिक्कत नही है मैंने एक मैसेज भेजकर बस इतना भर चैक किया कि एसएमएस जा रहे है या नही जैसे ही मैसेज डिलीवर्ड हुआ मैंने फोन को बंद करके जेब में रख लिया.
जिस पहाड़ी गेस्ट हाउस पर मैं रुका हुआ हूँ वहां केवल दो सुईट है और एक केयरटेकर है वही खाने का व्यवस्था भी करता है. मुझे देखकर वो ज्यादा खुश नही हुआ है क्योंकि मैं किसी की सिफारिश से यहाँ रुका हुआ हूँ उसने आते ही  मुझसे पूछा कि क्या मैं कोई अधिकारी हूँ? मैंने जब उसको कहा नही मैं एक आवारा हूँ. उसे मेरे जवाब में सच्चाई नही चालाकी लगी.
आज शाम सोच रहा हूँ कि उसे थोड़ी शराब ऑफर करूं ऐसा करने से वो मेरा सम्मान नही करेगा बस इससे इतना भर होगा अब वो मेरा अपमान नही करेगा और चाय वक्त पर पूछ लेगा. हालांकि मेरे पास ज्यादा शराब नही है मगर उससे कम मेरे पास पैसे है इसलिए मुझे वस्तु-विनिमय पर यकीन करना होगा.
आज की सुबह में धूप शामिल नही है. ठंडी हवा चल रही है. बादल पहाड़ के कान पर बैठकर उसका चश्मा ठीक कर रहे है ताकि वो धरती को साफ-साफ़ देख सके. मैं एक पत्थर पर बैठकर सुस्ता रहा हूँ यहाँ से से वैली दिख रही है. वैली में  दिखते मकान शहर जैसा नक्शा बनाते है. ये देखकर मेरी ऊब बढ़ जाती है मैं कंक्रीट के जंगल से बचना चाहता हूँ  इसलिए सुस्ताना छोड़कर आगे की तरफ बढ़ जाता हूँ.
(जारी....)

#मेरी_पहाड़_डायरी  




Saturday, May 13, 2017

डियर जॉन अब्राहम

डियर जॉन अब्राहम,
लव यू !
तुम्हारा फैन होना कोई अनूठी बात नही है. हजारों लाखों तुम्हारी फैन होंगी इसलिए ये जान लो कम से कम मैं तुम्हारी फैन नही हूं.  फिर मैं तुम्हारी क्या हूँ? फिलहाल इसका ठीक ठीक जवाब नही है मेरे पास. या सच कहूं मेरे पास जो जवाब है वो ठीक-ठीक है या नही ये बता पाना ज़रा मुश्किल है. फिर सवाल और जवाब में क्या रखा है मजा तो तब है कि लोग दो लोगो को देखकर कयास लगाते रहें और उनको कुछ हवा भी न लगे. ये बात थोड़ी शरारती किस्म की है मगर मैं तुमसे कुछ इसी तरह जुडी हूँ कि किसी को कोई खबर नही है किसी को क्या खबर होगी फिलहाल तो मुझे ही  पूरी खबर नही है.
एनीवे...!  तुम कम फिल्मों में काम करते हो मगर तुम्हारी फिल्मों को देखकर लगता है तुम्हारे लिए कम ही फ़िल्में करना ठीक है मैं कतई नही चाहती कि तुम  किसी स्टारडम में खो कर रह जाओं. तुम बेहद-बेहद प्रिसियस हो जैसे ईश्वर ने तुम्हें मनुष्यों के बीच मनुष्यों की मुखबरी करने के लिए धरती पर भेजा हो. मुझे तुम कभी दक्षिण के पठार में भटकते कोई सूफी फ़कीर लगने लगते हो तुम्हारी आँखों में चरवाहे के बेटे का कौतुहल और एक बढ़ई के बेटे के जैसी कातरता है तुम्हें देख मुझे जीसस याद आ जाते है. इस कलियुग में मैं तुम्हें जीसस का पुत्र घोषित करती हूँ भले ही इसके बदले मुझ पर ईशनिंदा का दोष लगे.
जॉन, तुम कम बोलते हो ये तुम्हारी सबसे अच्छी बात है, दरअसल इस दुनिया में आकर ज्यादा वो बोलते है जिनके पास सुनने का धैर्य नही होता है. तुम्हारे पास बस एक चीज़ नही है और वो है जल्दबाजी. तुम्हें कहीं नही पहुंचना है और ना ही किसी को कुछ सिद्ध करके दिखाना हो. जब तुम मुस्कुराते तो तुम्हारे दोनों गालों पर दो नए ग्रह उतर आते है इन दो ग्रहों को केवल वही लोग ध्यान से देख पाते हैं जो धरती के कोलाहल से ऊब कर यहाँ से कहीं दूर एकांत में कुछ दिन जीना चाहते हो, तुम्हारे गाल के दो ग्रह उनके निर्वासन के लिए सबसे मुफीद जगह है. मगर वहां आश्रय पाने की अर्जी दाखिल होने से पहले ही तुम गंभीर हो जाते हो. इस तरह से तुम कुछ गुमशुदा लोगो को उनके हाल पर छोड़ने के दोषी बन जाते हो, मगर तुम्हें इसका पता  नही है इसलिए मैं इस बात के लिए तुम्हें अक्सर दोष मुक्त कर देती हूँ.
तुम्हारी काया मुझे वैदिक काल में हाथ पकड कर ले जाती है तुम इस जन्म में भले ही  ईसा के मानने वालों के यहाँ जन्मे हो मगर तुम्हारी देह मुझे  किसी निर्जन जंगल में  एक वैदिक ऋषि का आश्रम लगती है जहां निरंतर अग्निहोत्र मन्त्रों से यज्ञ चल रहा है. मैं जब कुछ लौकिक मन्त्रों के भाष्य सुनने के लिए तुम्हारे नजदीक पहुँचती हूँ तो मेरे कान में नियाग्रा फाल का शोर गूंजने लगता है, दरअसल देह के भूगोल में तुम किसी एक देश और काल के बाशिंदे नही हो. अलग अलग अक्षांश पर तुम्हारे देह के कोण से मैं साइबेरिया के जंगल,यूरोप के पहाड़, अज्ञात ज्वालामुखी  और स्पेन की नदी के चित्र एक साथ देख सकती हूँ. तुम्हारे बाल ऋषि की जटा नही है मगर तुम्हारा मस्तक ऋषि का यौवन जरूर है. अखंडता,दृढ़ता और अमोघता का विज्ञापन तुम्हारे माथे पर साफ़ तौर पर पढ़ा जा सकता है.
जॉन, अगर तुम्हारी आँखों पर मैं दो बातें न करूं तो ये खुद के साथ एक किस्म की ज्यादती होगी.तुम्हारी आँखें दरअसल हर वक्त उस किस्म की सोफी में डूबी दिखती है जैसे किसी अरब के रेगिस्तान में कोई मुसाफिर के पास केवल खाने पीने के लिए शराब बची हो और वो अपने कारवाँ से बिछड़ गया हो.
तुम्हारों आँखों में गहरे बवंडर पनाह लिए है उनमें झाँकने के लिए मैं अक्सर अपने दुपट्टे को गले से लपेट लेती हूँ क्योंकि उनमे देखते हुए मेरी गुमशुदगी एकदम से तय है. मैं इन आखों में देखते हुए रेगिस्तान से निकल कर नोर्थ पॉल के की बर्फीले दर्रे पार करती हूँ. धरती पर रहते हुए गुरुत्वाकर्षण खोना किसे कहते है इसका अनुभव केवल और केवल मेरे ही पास है. क्योंकि तुम्हारी आँखों में देखते हुए मैं भारहीन होकर तैरते हुए दुनिया के ईर्ष्या से पुते वें चेहरे देख सकती हूँ  जो तुम्हें देखकर तुम्हारे जैसा न होने की कसक में जीते है.
ये कोई खत नही है जो तुम तक पहुंचेगा दरअसल ये एक मोनोलोग है जिसे मैं चाहती हूँ कि यह  कम से कम मुझ तक जरुर पहुँच जाए. क्योंकि जब दुनियादारी से जी घबरा जाता है युद्ध और अशांति से घिरी दुनिया को देखकर जब जी उकता जाता है तब मैं जॉन अब्राहम को देखती हूँ उसे एक खत के माफिक पढने लगती हूँ. तुम्हें देखते हुए अचानक ख्याल आता है कि आखिर तुम भी तो एक मनुष्य ही हो...ऐसे में इतने निरपेक्ष कैसे जी लेते हो कि तुम्हें दुनिया की कोई चीज़ प्रभावित नही करती है.
सच कहूं तुम्हारा यह मामूलीपन मेरी उस धारणा को और पुख्ता करता है कि तुम इस दुनिया के लिए नही बने हो तुम जिस दुनिया के लिए बने हो मैं उसी दुनिया की खोज में हूँ जिस दिन उस दुनिया पता मिल गया मैं तुमसे एक बार वहां जरुर मिलूंगी तब तक चाहती हूँ तुम दुनिया के लिए यूं ही अलभ्य बने रहो. तुम्हारी कलाई पर उम्मीद की शिरा सबसे अधिक उभरी हुई है एकदिन मैं उसको चूमकर कहूंगी  उम्मीद मुक्ति से बड़ी चीज़ है जिसे बिना मरे हासिल किया जा सकता है.
फिलहाल के लिए इतना ही.... अब विदा !
तुम्हारी
एक अप्रशंसिका J J   


Sunday, May 7, 2017

थाप

ढ़ोल बजता है तो धरती की तन्द्रा टूटती है ढ़ोल की हर थाप आसमान के नाम धरती का एक कूट संकेत भेजती है जिसे रास्ते में अधर में लटका मनुष्य पकड़ लेता है वो उससे अपने दुःखों की ऊब सुख की शक्ल में सुनाना चाहता है।

धरती और आसमान जब मनुष्य को उत्सव के निमित्त थिरकता देखते है तो दोनों बारी बारी से अपने बोझ की अदला-बदली मनुष्य की ओट में करके देखते है।

नृत्य मनुष्य की ओट है जिसमें दो बिछड़े लोग कुछ देर के लिए बेपरवाह होकर मिलते है। ढ़ोल की आवाज़ डूबी आत्मा को इतने मनोयोग से आवाज़ देती है कि वो अपने अल्हड़पन के साथ बावरी हो मन की सारी खिड़कियां एकसाथ खोल देती है।

ढ़ोल के पीठ पर कसे सूत के डोरे स्त्री की एड़ी के पसीने से अपना मुंह धोते है दोनों अवसर की दृष्टि से एक दूसरे के प्रति कृतज्ञ भी महसूस करते है क्योंकि दोनों ये बात अच्छी तरह जानते है।

 थिरकता हुआ तन और निकलती हुई ध्वनि दोनों अपने साथ को छोड़कर कहीं वहां दूर निकल जातें है जहां एक कबीला अनजाने लोगों का बसता है।
ढोल के सहारे नाचना उन्ही लोगों से मिलने की एक दैहिक हरकत भर है जिसमें आत्मा पहली बार हमारी देह को धन्यवाद कहती है वो भी दिल के जरिए।

इस घटना पर लोग केवल अपना दिमाग लगा सकते है क्योंकि दिल तब तक उनके दिल से निकल कहीं और निकल चुका होता है।

'थाप की नाप'

Friday, April 21, 2017

डायरी अंश

रात की तीसरे पहर में आँख खुल जाती है इनदिनों.
क्यों खुल जाती है नही मालूम है. दूर जंगल से आती एक बासुरी की धुन शायद मुझे बुलाती है. मैं जगने के बाद अपने आसपास विस्मय से देखता हूँ क्योंकि मैं इस वक्त कंक्रीट के जंगल में हूँ.
ये बासुरी कौन बजा रहा है मुझे नही पता है मगर इसकी धुन अनहद नाद के नजदीक जाकर खत्म होती है. थोड़ी देर मैं ईश्वर को खारिज करता हूँ और करवट बदल लेता हूँ. ईश्वर को खारिज करना मेरी उस असमर्थता का उपक्रम है जिसमें मैं इस समय किसी के निवेदन पर जा नही पा रहा हूँ.
मैं दोबारा सोने की कोशिश करता हूँ मगर फिर मैं अपनी असमर्थताओं की एक सूची बनाने लगता हूँ . अपनी असमर्थताओं की सूची का वरीयता क्रम मैं ठीक से निर्धारित नही कर पा रहा हूँ और इसकी बेचैनी मुझे नींद से कोसो दूर पटक देती है.
फिर मैं उस बासुरी की धुन पर अपनी असमर्थताओं को बुनने लगता हूँ और एक नया गीत बन जाता है जिसे गुनगुनाया नही जा सकता है मगर बहुत गहरे तक महसूस जरुर किया जा सकता है.
ख़ुशी के ऐच्छिक चुनाव में मैं द्वंद में हूँ
दुखों के तिरस्कार में मैं निपुण नही हूँ
फिर एक सपने की कल्पना में नींद को बुलाता हूँ सपना तो नही आता है मगर कल्पना नींद जरुर ले आती है और मैं अपनी गीत को भूल कर मन के गर्भ गृह में कुछ बिखरे हुए स्त्रोतों का पाठ करते हुए पुनः सो जाता हूँ.
सुबह उठकर मुझे कुछ भी याद नही रहता है. यह एक अच्छी बात है.
वरना मैं इसके विज्ञापन में दिन भर लगा रहता है और लोग समझते मैं एक अच्छा कलाकार हूँ जो नींद के उचटने पर गीत बना सकता हूँ.
दरअसल, मैं रात के तीसरे पहर में खुलने वाली नींद की स्मृतियों को बेहद निजी बनाकर रखना चाहता हूँ इतना निजी कि मेरे बिस्तर को भी इसकी खबर न हो.
‘डायरी अंश’

Monday, April 17, 2017

ख़त

संबोधन के अपने उलझाव है इसलिए एक खत बिना संबोधन का
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बात यहाँ से शुरू करता हूँ कि मेरे पास अब कोई बात नही बची है. मेरे पास कुछ अधूरे सपनों की कतरन है जिनको जोड़कर एक बंदनवार बनाई जा सकती है उनकी अधिकतम खूबसूरती इतनी भर बची है. कई दिनों से दिल खिंचा-खिंचा सा रहता है शायद कोई मौसमी अवसाद है. हम अपने अपने हिस्से के सफर पर निकले लोग है  जो अनायास ही एक सवारी पर सवार हो गए है. सफ़र और मंजिल के बीच में रास्ता होता है और यही रास्ता जिन्दगी में स्मृतियों को एकत्रित करने का साधन भी बनता है.
तमाम असंगत बातों के बीच में अगर मैं यह कहूं कि मेरे पास मुद्दत से कोई उत्साहित करने वाली खबर नही है तो तुम्हें ये बात एक पुनरावृत्ति जैसी लगी है मगर ये मेरे जीवन का तात्कालिक यथार्थ है. शब्दों को दुखो के अधीन कर देने से दुःख अनादर महसूस करते है वो हमारे अंदर अमूर्त पड़े रहकर हमें परखने में यकीन रखते है. तुम्हें देखकर न जाने क्यों मुझे अपने दुखों की बातें याद आ जाती है और इस प्रकार से मैं एक उलझा हुआ आदमी साबित होता हूँ.
यह सच है दुःख बेहद निजी होते है और एक समय के बाद दुखों पर चर्चा करना मानसिक शगल भर रह जाता है क्योंकि अपने अपने हिस्से की विषमताएं हर कोई जी रहा होता है. परसों मेरी आँख लग गयी तो मैंने सपनें में देखा कि तुम मेरे सामने एक लम्बा सा आईना लेकर खड़ी हो मैं आईने को एक दीवार से टिका देता हूँ और  तुमसे मेरे पास खड़े होने के लिए कहता हूँ तुम मेरे पास खड़ी हो गई हो मगर उस आईने में केवल मेरी शक्ल मेरे दिख रही है. तुम्हारा प्रतिबिम्ब उस आईने में नही बनता है. मुझे इस बात पर जब थोड़ी हैरानी होती है तुम विषय बदल देती हो और तभी मेरी आँख खुल जाती है. तब से लेकर अब तक मैं कई बार यह बात सोच चुका हूँ क्या ऐसा संभव है कि हम साथ-साथ खड़े हो और हमारे प्रतिबिम्ब में केवल मैं अकेला खड़ा नजर आऊँ? मेरे दिल और दिमाग के पास इसके दो जवाब है मगर मैं दोनों से ही संतुष्ट नही हूँ.
पिछले दिनों से  मैं अकेला चाय पी रहा हूँ  आजकल शराब पीने का मन नही होता है न अकेले ही और न किसी सभा संगत में. चाय की अच्छी बात यह है कि ये अकेली पी जा सकती है. मैंने देखा मेरी खिड़की पर एक चिड़िया बैठी है और बाहर की तरफ देख रही है मैंने चिड़िया को पहली बार इतना उदास या शांत देखा. उदास लिखते हुए लगा कि शायद उदासी मेरे अन्दर की हो जबकि चिड़िया शांत हो, इसलिए अब मैं उसे शांत कहूंगा.
मैं चाय पीते हुए सोच रहा था ये खिड़की अगर बंद होती तो ये चिड़िया शायद किसी और खिड़की पर बैठी होती है चिड़िया के पास विकल्प होने  की बात सोचकर मैंने तुरंत खिड़की बंद करनी चाही और इसके लिए अपनी चाय कप भी बीच में ही छोड़ दिया मैंने जैसे ही खिड़की के नजदीक पहुंचा वो चिड़िया उड़ गया. मेरी चाय थोड़ी ठंडी हो गयी थी मगर मैं मन ही मन अपनी आंतरिक क्रूरता पर शर्मिंदा था इसलिए दोबार चाय गर्म की और अपना निचला होंठ जला बैठा, मगर मुझे दुःख नही हुआ. शायद ग्लानी में दुःख अपनी तीव्रता खो देते है.
दिखने में यह एक ख़त के जैसा है मगर ये खत नही है क्योंकि खत में वृत्तांत होते है इसमें कोई वृत्तांत नही है मैं इसे डायरी की शक्ल में दर्ज कर रहा हूँ ये दरअसल मेरी उस बेख्याली का एक पुरजा है जिसमें जगह-जगह तुम बैठी हो. जीवन को समझने की कोशिश अब दिल नही करना चाहता है ये दरअसल अपने किस्म की ज्यादती को पसंद करने लगा है. लोक की भाषा में इसे खुद को खुद की नजर लग जाना कहते है. ऐसा नही है मेरे पास तमाम उदास करने वाली ही बातें मगर हां ! ये सच है कि  मेरी बातों में रोचकता का अभाव है.
कल क्या हुआ मैं शाम को रास्ते से लौट रहा था मुझसे एक स्त्री ने पूछा ये ये रास्ता चौराहे पर मिल जाएगा? मैंने कहा शायद ! उसने दोबारा फिर वही प्रश्न दोहराया मैंने कहा रास्ते तो सारे एक दिन चौराहे पर मिल ही जाते है आपको किस रास्ते पर जाना है? उसने कहा मुझे चौराहे से लेफ्ट लेना है मैंने आप पहुँच जाएगी बशर्ते मुझ पर यकीन करें! यदि आपने किसी और से रास्ता पूछा तो फिर मैं गलत सिद्ध हो सकता हूँ उसने कहा अजनबी पर यकीन करना मुझे अच्छा लगता है मगर आज तक कोई रास्ता नही भटकी हूँ. मैंने फिर कुछ नही कहा बस हाथ से उसको दिशा बताई. विदा पर वो मुस्कुराई नही ये एक खराब बात लगी मुझे फिर मैंने सोचा शायद वो कहीं पहुँचने की जल्दी में थी.
अच्छा अब ये आत्म प्रवंचना बंद करता हूँ क्योंकि इनमें कोई सार नही है ये कई असंगत बातों का एक जुटान है. सार तलाशना न तुम्हारा उद्यम है और न मैं किसी सार का दावा कर सकता हूँ.  कुछ दिन ऐसे खत तुम्हें मिलेंगे मुझे पता है पहले तो वाक्य ही तुम्हारी पत्र पढने की रूचि की हत्या कर देंगे मगर मुझे केवल लिखना आता है.
पढ़ना तो तुम्हें ही सीखना पड़ेगा. सीखने में कोई आग्रह या निवेदन नही है ये तुम्हारी इच्छा पर निर्भर करता है. वैसे भी तुम्हारी इच्छा पर ही तो सबकुछ निर्भर करता है.
ख्याल रखना अपना.

तुम्हारा कोई नही,

अजित  

जंगल मंगल

दृश्य एक:
ऋषि पुत्री अभ्यारण्य में अकेली गुनगुना रही है बसंत तुम छलिया हो, पतझड़ को भी छलते हो बहार को भी छलते हो, न जाने कौन दिशा में तुम मिलते होउसका मन आज अकारण उत्साहित है वो फूल तोड़ना चाहती है मगर अचानक से केवल पंखुड़ियों को छूकर छोड़ देती है. उसकी आँखों में आज असीम प्यार है. वो आज बिरहन है जानबूझकर रास्ता भटक रही है कभी विस्मय से जंगली बेलों को देखती है तो कभी सबसे अकेल खड़े बूढ़े पेड़ के तने से जाकर लिपट जाती है.
वो प्रकृति के सौन्दर्य पर कोई टीका नही करना चाहती है उसकी चाल में आज थोड़ा आयुजन्य अल्हडपन है. इस जंगल में आज वो अकेली है मगर उसे कोई भय नही है. वो एक जंगली फूल से पूछती है क्यों रे ! तुझे ले चलूँ अपनी कुटिया में? हवा फूल का तना हिलाती है तो फूल हिलने लगता है ऋषि पुत्री इसे फूल का इनकार समझती है. इसके बाद वो कोई सवाल नही करती है.
जंगली नदी के किनार कुछ छोटे पत्थर कतार में पड़े है वो उन्हें देख एक बार सूरज की तरफ देखती है फिर जमीन पर एक कुंडली बनाती है और कुछ गणना करती हुई कुछ बुदबुदाती है फिर एक ठंडी सांस लेकर कहते है मेरे दोस्तों ! अभी तुम्हारा निर्वासन शेष है तल से अलग होने की पीड़ा मैं समझ रही हूँ मगर मैं हस्तक्षेप करने की स्थिति में नही हूँआगे बढ़ती है फिर अचानक से लौटकर एक पत्थर उठाकर नदी के बीचोबीच फेंक देती है और हंसते हुए कहती है तुम मेरे पिछले जन्म के प्रेमी थे इसलिए तुम्हारे लिए इतना दोष मैं इस जन्म में भी ले सकती हूँ.
तभी रास्ते में एक जंगली लता उसके कान से टकराती है वो उसको थोड़ी देर अपने कान की अलगनी पर टांग कर खड़ी रही फिर उसको उतार कर उदास मन से कहती है सखी तेरी बिपदा सुनूंगी किसी दिन और..जंगली लता को कोई शिकायत नही है क्योंकि आज का दिन बिपदा सुनाने का नही है आज का दिन ऋषि पुत्री ने प्रकृति की समस्त विपदाओं को स्थगित करने के लिए चुना है और वो ऐसा कर भी रही है.

© डॉ. अजित

Tuesday, April 11, 2017

ईश्वर

दृश्य एक:

विल्सन आज थोड़ा उदास है. कल उससे कैथरीन ने कहा अब शायद हमारे अलग होने का वक्त आ गया है. ‘शायद’ एक शब्द ऐसा है जिससे विल्सन को बड़ी उम्मीद है वो मन ही मन कैथरीन को धन्यवाद देता है कि उसने यह नही कहा कि ‘ हमारे अलग होने का वक्त आ गया है’ मगर ये धन्यवाद ज्ञापन उसको हौसला नही दे पार रहा है उसे लगता है शायद का प्रयोग एक विनम्रता भर है वरना असल बात यही है अब कैथरीन अलग होना चाहती है.
विल्सन फिलहाल यह सोच रहा है आदमी इस मिलने और अलग होने की प्रक्रिया का हिस्सा आखिर क्यों बनता है? वो समय के षड्यंत्र को देखता है और यह तय नही कर पा रहा है कि वो कैथरीन से मिलने से पहले कितना खुश था? उसे साथ के दौरान की ख़ुशी किस किस्म की थी? और अब जब कैथरीन नही रहेगी क्या वो कभी खुश रह सकेगा?
तभी उसके पास एक भिखारी आता है वो शायद भूखा है विल्सन से खाना खिलाने के लिए बोल रहा है विल्सन के पास पैसा है मगर आज मन नही है किसी को कुछ भी देने का वो खुद में सिमटा हुआ बैठा है और यह सोच रहा है कि इस अलग होने को कैसे स्थगित किया जा सके इसलिए वो भिखारी को अनसुना कर देता है, भिखारी को यह बात ठीक नही लगी मगर फिर भी उसने फिर विल्सन को टोकना उचित न समझा मगर जाते वक्त वो मुडा और दूर से ही चिल्लाकर उसने विल्सन से कहा ‘जरूरत मनुष्य दयनीय बना देती है दया और प्रेम एक साथ खड़े नजर आ सकते है मगर वो दोनों साथ बैठ नही सकते है’.
विल्सन को भिखारी की बात फिलासफी के कोट के जैसी लगी मगर उसने उसका कोई जवाब नही दिया और मन ही मन उसकी बात में अपनी इतनी बात जोड़ी-
‘जरूरत मनुष्य दयनीय बना देती है दया और प्रेम एक साथ खड़े नजर आ सकते है मगर वो दोनों साथ बैठ नही सकते है बावजूद इसके जरूरत को आदत में तब्दील होने से बचना चाहिए यदि कोई बच सके तो’

दृश्य दो:

सिटी कैफे में कैथरीन आज अकेली बैठी है उसका अपना एक कोना है प्राय: वह वही पर बैठती है. कैफे में आज भीड़ नही है उसकी बगल की सीट पर एक दम्पत्ति बैठी है. कैथरीन के पास एक किताब है जो ईश्वर के अस्तित्व से जुड़ी बहस पर आधारित है. कैथरीन ने बुकमार्क उस पेज पर लगा दिया जहां पर यह लिखा हुआ था ‘ईश्वर मनुष्य की एक सुंदर उपकल्पना है जिसके भरोसे वो विश्वास को दुनिया में सुन्दरतम रूप में बचा पाने में समर्थ हुआ है’
ईश्वर के अस्तित्व की बहस से अब उसे ऊब हो रही है उसने अपना चश्मा उतार कर किताब पर रख दिया और कॉफ़ी ऑर्डर की.
बगल में बैठी दम्पत्ति घर के बाहर मिलने वाले एकांत पर बात कर रहे है वो अपने अतीत में खो जाते है और पुराने दिनों को याद करने लगते है जब वो दोनों पति पत्नी नही थे. उनकी बातों में कोई नूतनता नही है मगर कैथरीन को उनकी बातें किताब से ज्यादा चमत्कारिक लग रही है न चाहते हुए भी उनकी बातें सुनने में उसकी दिलचस्पी बढ़ गई है.
वो दोनों पति पत्नी कोई बहस नही कर रहे है बस अपने अपने अतीत को याद करके खुश हो रहे है उनके पास भविष्य की चिंताए फिलहाल नही है. स्त्री कहती है कभी कभी लगता है कि विवाह अपने साथ अकेला नही आता है वो साथ में बच्चे भी लाता है एक उपद्रव की शक्ल में...इस बात से पुरुष उतना सहमत नही है मगर फिर भी वो प्रतिवाद नही करता है. पुरुष पूछता है अच्छा यह बताओं क्या अब हमारा प्यार अब वैसा ही है जैसा कभी हम पहले दिन मिले थे? स्त्री कहती है नही वैसा बिलकुल नही है अब मुझे तुम्हें एक सीमा तक जान गयी हूँ इसलिए अब प्यार वैसा रहना संभव नही है और मेरे ख्याल प्यार को एक जैसा रहना भी नही चाहिए. एक जैसा प्यार ठहरे हुए पानी की तरह सड़ जाता है.प्यार बदलता नही है हां रूपांतरित हो जाता है अब मैं तुम्हें नापसंद और पसंद एक साथ करती हूँ.
स्त्री पूछती है क्या प्यार कोई दैवीय चीज़ है? पुरुष इस पर थोड़ा सोचता है और फिर कहता है मेरे ख्याल से नही ! मनुष्य के जीवन में कुछ भी दैवीय नही है सब कुछ मानवोचित ही है. दिव्य या ईश्वरीय बता कर हम उसे संरक्षित करने की कोशिश जरुर करते है क्योंकि ईश्वर से जुडी हर चीज प्रश्नों से परे हो जाती है. हम प्यार को प्रश्नों से बचाना चाहते हैं इसलिए शायद उसे दैवीय कहते है.
शायद शब्द सुनन के बाद स्त्री थोड़ी मुस्कुरा देती है.
कैथरीन ने यह बातचीत सुनी और जल्दी से अपनी कॉफ़ी खत्म की और घड़ी देखते-देखते विल्सन को कॉल लगाया मगर विल्सन का फोन बंद है शायद उसने किताब के शीर्षक को दोबारा पढ़ा और वहां से चली गई.


© डॉ.अजित   

Tuesday, March 28, 2017

अला-बला

उस लड़की के हाथ में सिखणी वाला कड़ा था. उसी हाथ की बाजू पर किसी मौलवी का दिया एक काला ताबीज़ भी बंधा था।
वो चप्पलों में ऐसे अंगूठे गड़ाकर चलती जैसे उसे खुद के जमीन पर होने का पूरा यकीन न हो।

उसको पीछे मुड़कर देखते हुए लगता है जैसे कोई जंगली बेल दूसरे पेड़ को अपनी गिरफ्त में लेना चाहती हो।
मेले और साप्ताहिक हाट बाजार में उस लड़की को देखकर ऐसा लगता जैसे वो मनुष्यों की जरूरत और उत्सवधर्मिता का दस्तावेज़ीकरण करने के लिए नियुक्त की गई हो।

वो चंचल नही थी उसमें कोई ठहराव भी नही था वो नदी के जैसी तरल थी और किनारों के जैसी सुनसान।
उसके हाथ में जो स्टील का कड़ा था वो उसके हाथ में ऐसा दिखता था जैसे ग्रह का कोई उपग्रह अपनी नियत कक्षा में चक्कर लगाता हो उसकी बाजू पर कसा हुआ ताबीज़ उसे भला कैसे किसी अला बला से महफूज़ रख पाता  क्योंकि वो लड़की खुद में एक हसीन बला थी।

एक ऐसी बला जो जिधर से गुजर जाए उन रास्तों पर हकीकी सुरमें बिखर जाए।
उसकी आँखों में सूखा काजल था वो बेपरवाह और बेफिक्र जीने की आदी थी उसने रच ली थी अपनी लापरवाही में एक अनूठी खूबसूरती।

वो हवा को लोरी से सुला सकती थी बादल को गुनगुनाकर बुला सकती थी। बारिश को वो ओक में भरके मंत्र की तरह उड़ा सकती थी।
आसमान उसे देख रश्क करता था ज़मीन उसके वजन के बराबर के दुःख देख रोया करती थी।

'वो लड़की'
© डॉ. अजित

Friday, March 24, 2017

सुविधा-असुविधा

दृश्य एक:
बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री की एक शाम है. बौद्ध भिक्षुक शाम की प्रार्थना के लिए तैयार है. एक बच्चा अंदर दाखिल होता है. वो जोर से कोई गाना गा रहा है. उसके गाने की आवाज़ मोनेस्ट्री की शान्ति में बड़ी बाधा है.
एक लामा उसको रोकना चाहता है वो उसके नजदीक आकर कहते है. 
बच्चे यहाँ गाना मत गाओ ये साधना करने की जगह है!
बच्चा रुक जाता है फिर वो लामा से पूछता है साधना करने की चीज़ है या घटित होने की?
लामा इस अप्रत्याशित सवाल से हैरान होता है वो बच्चे से कहता है ये अभी तुम्हारा विषय नही इसलिए इसका जवाब तुम्हे नही दिया जा सकता
तो गाना आपका विषय कैसे हुआ? बच्चा लामा से पूछता है
मेरा विषय यहाँ की व्यवस्था से सम्बंधित था. गाना उसमे एक बाधा उत्पन्न कर रहा था अब लामा बच्चे से थोड़े चिढ गया है
बच्चा हंसता है और कहता है व्यवस्था तो एक सुविधा हुई और साधना तो सुविधा को तोड़ने की प्रक्रिया है
लामा अब शास्त्रार्थ की मुद्रा में आ गया है उसका अहम् आहत हुआ है बच्चे की बातों से
मगर बच्चा तेजी से गाना गाता हुआ हुआ बाहर निकल जाता है
लामा चिल्लाता हुआ कहता है दीप जाओ अँधेरा हो गया है.
दृश्य दो:
शशि के पास एक चश्मा है. चश्मा उसका दोस्त है ऐसा दोस्त कि उसे वो मंजन करते वक्त भी नही उतारती है उसका बस चले तो वो चश्मा लगाए ही मुंह भी धो ले.
आज शशि का चश्मा नही मिल रहा है रात उसने बिस्तर के नजदीक किताब पर रखा था. सुबह जगी तो चश्मा वहां नही था. शशि परेशान है वो बेहताशा तलाश रही है मगर नही मिला. थक कर वो बालकनी में बैठ गयी है.
शशि थोड़ी उदास है. शशि खुद से सवाल कहती है कि जिंदगी में कोई चीज़ इस तरह शामिल नही करनी चाहिए कि जिसके बिना काम न चल सके. वो खुद को छूकर देखती है उसकी देह उसका खुद का स्पर्श भूल गई है. वो अपनी आँखे बंद करके बैठ जाती है अपने दोनों कानों बारी बारी हाथ फेरती है दरअसल वो यहाँ भी अपना चश्मा तलाश रही है.
खोई चीजे बार बार तलाशने की आदत मनुष्य को बहुत कष्ट देती है वो हर जगह एक ही चीज तलाशता है. यह आदत निर्जीव और सजीव दोनों में कोई भेद करना नही जानती है.
शशि अपने चश्मे का कवर देखती है और अपने ऑप्टिकल शॉप का फोन नम्बर कागज़ पर नोट करती है. फिर उस कागज़ को फाड़कर बालकनी से नीचे फेंक देती है. शशि ने कुछ दिन बिन चश्मे के रहने का निर्णय किया है.
तभी चश्मा उसे दिख जाता है मगर उसे देखकर उसे ख़ुशी नही हुई उसे अपने निर्णय के कमजोर होने का दुःख जरुर हुआ उसने चश्मे को फिलहाल कवर में बंद करके रख दिया अपने निर्णय के प्रति यह उसका अधिकतम आदर था क्योंकि चश्मा लगाने वो बच नही पाएगी ये बात वो भी अच्छी तरह जानती है.
© डॉ. अजित

Thursday, March 23, 2017

सफ़र

दृश्य एक:

समन्दर में क्रूज़ पर शाम हो गई है. डॉक पर एक किशोर अकेला बैठा है. वो आसमान की तरफ देखता है मगर कोई पक्षी नजर नही आता है. ये उसकी उम्मीद की पहली हत्या है. वो आसमान और समन्दर के रंग का मिलान करता है उसे समन्दर काला दिखाई देता है और आसमान नीला. समंदर और आसमान के मध्य दूरी अधिक है इसलिए वो प्रतिबिम्ब के विज्ञान को अस्वीकार कर देता है.
एक बुजुर्ग वहां आते है जिनके हाथ में एक बीयर की कैन है. दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते है बुजुर्ग की मुस्कान किशोर से कई गुना लाइव है. बुजुर्ग किशोर से पूछता है समंदर में अकेले कैसा लगता है? किशोर जवाब देता है ठीक ऐसा कि जैसे कि मैं समंदर का छोटा भाई हूँ.
किशोर बुजुर्ग के नजदीक जाकर कहता है जीवन में क्या चीज हमेशा प्यारी रहती है? बुजुर्ग कहता है आदमी को अतीत हमेशा प्यारा लगता है. किशोर फिर एक प्रतिप्रश्न करता है जिनका अतीत गौरवशाली न रहा हो वो कैसे अपने अतीत को प्यार समझ सकते है? बुजुर्ग इस परिपक्व सवाल पर थोड़ी देर ठहर कर सोचते है और कहते है जिनका अतीत गौरवशाली नही रहा हो और वो वर्तमान और भविष्य की कल्पना पर अतीत को खारिज करके अतीत को याद करते है. अतीत जीवन में कभी अप्रासंगिक नही होता है. किशोर इस जवाब से संतुष्ट है फिर दोनों एक दूसरे की तरफ पीठ कर लेते है इस तरह से अतीत और भविष्य एक दूसरे से दूरी बनाते है.

दृश्य दो:

ये समंदर की सुबह है. एक नव विवाहित जोड़ा क्रूज़ पर हनीमून मनाने आया है जिनका नाम फिलिप और मारिया है. फिलिप पेशे से कारपेंटर है और मारिया एक नर्स है. दोनों एक दूसरे का हाथ थामे समंदर को देख रहे है. मारिया फिलिप से पूछती है कि सच्चा प्यार क्या समंदर के जैसा अनंत होता है? फिलिप कहता है नही सच्चा प्यार डेजर्ट के जैसा शुष्क और अनिश्चित होता है. मारिया इस बात पर कोई व्याख्या नही चाहती.
फिलिप मारिया की आँखों में झांकते हुए कहता है तुम्हारी आँखों में इस समंदर का एक टापू दिखता है मगर वहां मैं खुद को नही देख पा रहा हूँ वहां तुम अकेली हो. मारिया कहती है तुम सच देख रहे हो हर स्त्री के मन में एक टापू ऐसा होता है जहां उसका सबसे प्यारा व्यक्ति नही होता है. फिलिप कहता है क्यों बचा कर रखा जाता है इस टापू को? मेरे ख्याल से आँखों की बारिश के रास्ते इसे बहा देना चाहिए. मारिया एक फीकी मुस्कान के साथ कहती  है इस टापू की न कोई नियत जगह और न कोई नियत आकार और ये इतनी तेजी से अपनी जगह बदलता है कि हम स्त्रियाँ इसका अनुमान नही लगा पाती है. इस टापू का होना एक उम्मीद का होना भी है कि हम अपने हिस्से का निर्वासन एकांत की गरिमा के साथ काट लेंगी और हमें भीड़ का हिस्सा बन गुम नही होना पडेगा.
फिलिप मारिया को गले लगाता है और अनायास ही टापू का एक पतनाला मारिया की आँखों के रास्ते फिलिप के कंधे पर आकर गिरता है समंदर इस तरह की पहली बारिश देखता है जिसकी एक भी बूँद उसे हासिल नही होगी.

© डॉ. अजित 

Thursday, March 16, 2017

नीलामी

लंदन की मशहूर ऑक्शन गैलरी क्रिस्टीज़ में एक युवा लड़का ऑफिस में पूछ्ताछ करने के उद्देश्य से दाखिल होता है.रिसेप्शन पर पूछ्ताछ करता है. रिसेप्शन पर अटेंडेंट उसकी क्वारी को समझ नही पा रही है. लड़का कहता है वो अपने जीवन के सबसे अमूल्य सपनें नीलाम करना चाहता है क्या उनका यहाँ कोई खरीदार मिल सकता है?

सपने कैसे नीलाम किए जा सकते है अटेंडेंट यह जानना चाहती है वो लड़के से पूछती है सपने कोई वस्तु है? जो उन्हें नीलाम किया जा सके !

लड़का कहता है नीलाम करने के लिए वस्तु होना एक छोटी चीज़ है उसे ऐसा ब्रोकर चाहिए जो उसके सपने नीलाम कर सके. लड़का कहता है उसके पास ऐसे सपने जिन्हें कोई भी खरीदकर दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन सकता है.

अटेंडेंट जानती है वह उसकी कोई मदद नही कर सकती है मगर फिर वो उस बहुमूल्य सपने के बारें में जानना चाहती है जिसे बेचकर लड़का पैसा हासिल करना चाहता है. वो पूछती है आपके सपनें की क्या कीमत है?

लड़का हंसता हुआ कहता है काश ! मैं खुद अपने सपने की कीमत जान पाता मुझे उसकी जो कीमत पता है वो उसकी असल में कीमत नही है वो दरअसल मेरी जरुरत की कीमत है. अटेंडेंट थोड़े कौतुहल से घिर जाती है और कहती है आप अपने सपने को नीलाम करके कैसा महसूस करेंगे?

लड़का कहता है सपना नीलाम करके कोई भी खुश तो नही हो सकता मगर मैं इतने भर से संतोष कर लूंगा कि किसी ने मेरे सपने की सही कीमत लगाई. बेचने वाला खुद को हमेशा एक आत्मसांत्वना देता है कि उसका न्यूनतम मूल्य अभी गिरा नही है, यही हाल मेरे सपने का है मैं इसी उम्मीद पर यहा हूँ कि मेरे सपने का मूल्य शायद यहाँ मिल जाए.

अटेंडेंट कहती है चलिए फर्ज कर लेते है मेरे पास एक पार्टी है जो आपका सपना खरीदने में दिलचस्पी रखती है तब आप अपने सपने की बोली कितने से स्टार्ट करना चाहेंगे?

लडका अब थोडा उदास हो जाता है आपने मुझे यकीन दिलाकर अच्छा नही किया मैं ये सोचकर आया था कि इंसान खुद के सपनों में इतना खोया है वो दूसरे के सपने में क्यों दिलचस्पी लेगा? यदि सपनों की नीलामी सच में हो सकती है तो फिर दुनिया भर में सपने देखने वाले लोग सबसे बड़े व्यापारी है.

माफ़ी चाहूंगा मैंने आपका कीमती वक्त लिया मैं सपने नीलाम तो करना चाहता हूँ मगर उनकी कीमत जानने के लिए मुझे कुछ सपने और देखने होंगे, तब तक यदि आपकी पार्टी रुक सके तो देखिएगा, लडका इतना कहकर वापिस मुड़ जाता है.

अटेंडेंट कहती जिस दिन ये नीलामी हुई उस दिन ये नीलामी घर की आखिरी नीलामी होगी क्योंकि सपनें जहां बिकने शुरू हो जातें है वहां दूसरी चीजें खुद मूल्यहीन हो जाती है.

लडका ये सुनकर मुस्कुराता है मगर अटेंडेंट उसका चेहरा नही देख पाती है.

‘ड्रीम्स अनलिमिटेड’

© डॉ. अजित

चर्च

दृश्य एक:
विलियम चर्च के गार्डन की देखभाल करता है। मैरी उसकी बेटी है दोनों पिता पुत्री ईश्वर को बहुत मानते है।
मैरी एकदिन विलियम से पूछती है क्या गिल्ट मनुष्य को ईश्वर द्वारा दिया जाने वाला दंड है? विलियम उसको चर्च के गार्डन सबसे नाजुक फूल दिखाता है और कहता है हवा और बर्फ से लड़ने की जिद देखो ये जिद ईश्वर की प्रतीक है। मैरी समझ नही पाती वो कहती है क्या जिद को गिल्ट का एक कारण माना जा सकता है? विलियम उसके हाथ में टूटी हुई पत्तियां देता है और कहता मनुष्य की गिल्ट उसका टूटा हुआ अतीत है। जब मनुष्य अपने सन्दर्भ से कटा महसूस करता है तभी उसे गिल्ट होती है।
मैरी एक फूल को तोड़ना चाहती है मगर विलियम उसे मना करता है वो कहता है इसके तुम्हें फूल से आज्ञा लेनी होगी। मैरी पूछती है फूल से आज्ञा लेने का क्या तरीका है? विलियम कहता है किसी को तोड़ने के लिए उसकी देखभाल जरूरी होती है ताकि उसके मन ने जो सन्ताप बचे उसे घृणा शामिल न हो।
इसके बाद मैरी फूल को पानी देती है कोई गीत गुनगुनाने लगती है।

दृश्य दो:
फादर डिफोर्ड के पास एक कपल बैठा है। कपल फादर से पूछता जीसस के पास जिन प्रॉब्लम्स का कोई सॉल्यूशन नही होता है जीसस उनका क्या करते है फादर?
फादर के लिए ये सवाल अनापेक्षित है वो कहते है जीसस के पास किसी प्रॉब्लम्स का सॉल्यूशन नही होता है समाधान बताना उनका काम नही है!
फिर लोग उनसे अपनी प्रॉब्लम्स क्यों शेयर करते है? कपल पूछता है
लोग जीसस से नही खुद से अपनी प्रॉब्लम शेयर करते है जीसस केवल देखतें है जीसस के लिए यह देखना ईश्वर के द्वारा तय किया गया सबसे पवित्र काम है।
तो जीसस क्या केवल साक्षी है? वो हस्तक्षेप नही कर सकते? कपल थोड़े असंतुष्ट होकर सवाल करते है
बिलकुल मनुष्य की प्रॉब्लम को देखना जीसस का काम है प्रॉब्लम क्रिएट करना और उनके समाधान तलाशना मनुष्य का।
दरअसल इस धरती से लेकर उस लोक तक मनुष्य और ईश्वर अपने अपने काम में व्यस्त है दोनों की एक दुसरे में लगभग न के बराबर रुचि है, फादर इतना कहकर अपनी स्टडी रूम में चले जाते है।
कपल जीसस को देखते है और मुस्कुराते है जीसस यथास्थित में सलीब पर टँगे है उन्होंने क्या देखा ये केवल वही बता सकते है।

 © डॉ.अजित

Wednesday, March 8, 2017

सोफी

समन्दर किनारे सोफी अकेली बैठी है। वो रेत पर खुद का नाम लिख कर उसे एक गोल घेरे में कैद कर देती है फिर उसके नीचे एक कोने में स्माइल बनाकर केवल एस लिख देती है।
मुस्कान उसका स्थाई भाव है जो उसके चेहरे पर उदासी पढ़ने का अवसर नही देता है यहां तक खुद उसको भी।
***
सोफी कहती है समन्दर एक बहलावा है मै उससे पूछता हूँ फिर नदी क्या है? नदी एक यात्रा है जिसके सहारे हम किनारों का दुःख पढ़ सकते है।
दुःख क्या केवल लिखे जा सकते है मैंने दुःख पढ़ने पर उसकी प्रतिक्रिया चाहता हूँ इस पर सोफी कहती है दुःख केवल अपने अंदर बसाए जा सकते है वो निकले या न निकले ये उनकी मर्जी।
***
क्या तुम्हें खुद के स्त्री होने पर खेद है? मैंने यूं ही पूछ लिया उस दिन जबकि उस दिन समन्दर किनारे इस बात को पूछने का माहौल नही था।
खेद दरअसल एक सुविधा है मगर खेद कोई मुक्ति नही इसलिए मेरी खेद में रूचि नही है मैं उत्सव और खेद से दोनों से मुक्त रहना चाहता हूँ स्त्री होना मेरे लिए मात्र एक अवस्था नही बल्कि एक अवसर है मै दुःखों को प्राश्रय दे सकती हूँ।
क्या अभी तुम्हारे गले लग सकता हूँ? मैने संकोच से पूछा
गले लगने का कोई समय नही होता है तुम जब चाहों लग सकते हो बशर्ते तुम्हें राहत नसीब हो।
सोफी इतना कहकर मुस्कुरा पड़ती है फिर गले लगने का ख्याल लहर के साथ समन्दर की तरफ लौट जाता है।
***

#सम्वाद 

Tuesday, February 14, 2017

अधूरे खत

कभी कभी लगता है तुम दूर जा रहे हो। इतने दूर कि दोनों आँखों से तुम्हें ठीक से देख नही पाती हूँ। एक आंख बंद करके तुम्हें देखने की कोशिश करती हूँ और ये कोशिश भी तब करती हूँ जब तुम सामने नही होते। तुम्हारी तस्वीर को एक आँख बंद करके देखती हूँ ठीक वैसे ही जैसे किसी को अच्छा खासा नशा हो गया हो।

कभी कभी किसी शायर की शेर की शक्ल में दी गई नसीहत याद आती है कि तुम्हें नजर के ज्यादा करीब ले आई मैं एक हद होती है दिखाई देने की। खाली वक्त में कभी कभी अपनी उंगलिया चटकाते हुए ऐसा लगता है जैसे कुछ हसीन लम्हो को चटकाकर तोड़ रही हूँ मुझे खुद की क्रूरता पर आश्चर्य होता है मै खुद के प्रति इतना निर्मम कब से हुई मुझे खुद ही पता न चला।

आज सुबह मैंने अपने नाखुनों को गौर से देखा उनकी नेलपॉलिश जगह जगह से उतर गई है,नेलपॉलिश उतरना कोई अनूठी बात नही है ये अक्सर होता है मगर मैंने इस बार महसूस किया बची हुई नेलपॉलिश ने नाखुनों पर कुछ अजीब से नक़्शे खींच दिए मुझे कभी वो अधूरे अक्षर लगने लगते है तो कभी कोई समंदरी टापू।

उन्हें देख मुझे खुद पर संदेह होने लगता है कभी इन्ही नाखुनों की कलात्मक बुनावट की मदद से मैंने तुम्हारी हाथ की रेखाएं ठीक वैसे पढ़ी थी जैसे कोई दाल से कंकर बीनता है। अब मुझे खुद के नाखून निर्वासन के पते दिखने लगे है उन पर अलग अलग द्वीपों के मानचित्र और पते रोज़ बन बिगड़ रहे है इन्हें पढ़ने के लिए मुझे तुम्हारी उस गुप्त विद्या की जरूरत है जिसमें तुम उदासी में नाराजगी और और मुस्कान में छिपा दुःख पढ़कर बता दिया करते थे।

क्या तुम सच में बहुत दूर निकल गए हो? या यह मेरा महज एक वहम है! मेरा दिल इसे वहम ही करार देता है मगर दिमाग कहता है कि जो आदमी सामने खड़ा होने के बावजूद धुंधला दिखाई दे रहा है उसका वजूद अब शायद जगह बदल चुका है।
मैं तुम्हें परछाईयों में नही तलाशना चाहती ना तुम्हारी छाया की पीछा करना चाहती हूँ, हो सके तो मुझसे किसी दिन अँधेरे में मिलो मैं तुम्हारी उपस्थिति महसूसना चाहती हूँ इसके लिए मुझे रोशनी की जरूरत नही है क्योंकि रोशनी में केवल तुम्हारी छाया दिखाई देती है तुम नही।

मैं चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष से कृष्ण पक्ष में जाने तक प्रतिक्षा करूंगी मैं तुम्हें अँधेरे में खुली आँखों से देखना चाहती हूँ ये चाह थोड़ी अजीब जरूर है मगर मुझे रोशनी में तुम्हें एक आँख से देखने में अब अच्छा नही लगता यदि तुम सोच रहे हो कि मै कहूंगी कि मुझे ऐसा करके डर लगता है तो ये सच नही है तुम्हारे साथ मुझे इतनी आश्वस्ति है अब मुझे डर किसी बात का नही लगता।

फ़िलहाल जगजीत की एक गजल बज रही है अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना...मैं ऐसी मासूम तमन्ना पर हंस पड़ी हूँ मुझे पता है तुम जाने के लिए ही आओगे मगर मैं पूरे दिल से चाहती हूँ तुम एक और जरूर आओ।

'अधूरे खत'

Saturday, February 11, 2017

सजदा

पीर की मज़ार है। लोबान जल रहा है। सुना है पीर बड़े जलाली थे मगर रहमतों के सदके भी दिल खोल कर बरसाते थे। खादिम जो गद्दानशीं है उसने फ़िरोज़ा पत्थर की कई अंगूठियां पहनी हुई है।

पीर कलन्दर सो रहे है उन्हें जगाने के लिए कव्वाल जूनून के साथ कव्वालियां गा रहें है। पीर एक जरिया है खुदा तलक पहुँचने का खुदा आजकल बैचेन है इसलिए उसने कुछ ताकतें पीर को ही अता कर दी है वो नही चाहता कि इंसान कोई इल्तज़ा करें।

दो आशिक अलग अलग इस मज़ार पर आते है दोनों के मसले और मुकाम जरा अलहदा है। दोनों यहां आकर थोड़े जज़्बाती हो जाते है वो सजदे में झुकते है मगर खुद को भूल जाते है उनकी फ़िक्र में एक दुसरे की फ़िक्र शामिल है।

आदतन वो मन्नतों का कारोबार करते है। गलतफहमियों को भूलने की दरकार करते है। कव्वाली की आवाज़ आ रही है जो कह रही है 'तस्कीन ओ' कल्बे हैदर मेरा सलाम ले जा'
दोनों किसी मुफकिर के कौल से मुतमईन है उन्हें लगता है कि उनकी हाजिरी उनकी जुदाई को हसीं कर देगी। इश्क मजाज़ी में दिल की हरारत जब हसरत बन जाती है तब आशिक का एक किरदार दरवेश से मिलता जुलता हो जाता है।

रूहानी मौसिकी है मगर रूह को यहां भी करार कहाँ है दिल जंगली कबूतर की माफिक न जाने किसका सन्देशा लेकर उड़ गया है उसे न मंजिल का पता है न रहबर का।
मज़ार की तन्हाई जरूर रूह को सुकूँ अता करती है ये तन्हाई मुरीद और मुर्शिद के दरम्यां हसीं गुफ्तगु को देखती है फिर दोनों को इश्क की कलंदरी सिखने के लिए सब्र का वजीफा दे जाती है।

अच्छी बात है दोनों आशिक एक साथ मज़ार पर नही जाते गर ऐसा होता तो दोनों साथ जाते जरूर मगर साथ लौट न पातें। अब अकेले जाते है मगर लौटते है अपने अपने माशूक को साथ लेकर उनके पल्ले एक गिरह मजार बाँध देती है जिस पर हकीकत के सुरमें से लिखा होता है मिलना है तो बिछड़ने का हुनर सीख।

© डॉ. अजित

Wednesday, February 8, 2017

कौतुहल

दृश्य एक:

जंगल में बच्चा अपनी दादी से पूछता है कि पेड़ बड़े है या आदमी?
रास्ते खत्म क्यों होते है?
टूटकर कर पत्ता अकेला क्यों पड़ जाता है?
धूल की एक दिशा क्यों नही होती?
सवाल बड़े वाले है मगर बच्चे के मुंह से सुनकर दादी को अचरज नही होता है वो मुस्कुराती है और कहती है
मेरे बच्चे ! ना पेड़ बड़ा है ना आदमी। दोनों लम्बे छोटे जरूर हो सकते है बड़ा वही है जो शिकायत नही करता है इस लिहाज से पेड़ आदमी से बड़ा हुआ।
रास्ते इसलिए खत्म नही क्योंकि उन्हें मंजिल ने अकेला छोड़ा है जिन्हें मंजिल अकेला छोड़ देती है वो खतम होने की जद से बाहर चले जाते है।
टूटकर पता इसलिए अकेला पड़ जाता है क्योंकि वो मुक्ति का सुख भोग चुका होता है और प्रकृति हर सुख का प्रतिदान लेती है उसका अकेला पड़ जाना उसी प्रतिदान का हिस्सा है।
और धूल की एक दिशा इसलिए नही होती क्योंकि धूल खुद के बस में नही होती वो वेग के लिए हवा और तापमान आदि पर आश्रित है इस जग में जो भी किसी पर आश्रित है उसकी एक दिशा सम्भव नही है।
बच्चा अब कोई सवाल नही करता है वो दादी की पीठ को छूता है और कहता है आपकी पीठ क्यों झुकी है?
दादी उसे हंसते हुए गोद में उठा लेती है और कहती है इसलिए कि तुम्हें आसानी से उठा सकूं।
झुकना हमेशा गिरना नही होता है कभी कभी ये उठाने के लिए भी होता है।

दृश्य दो:

समंदर किनारे दो प्रेमी बैठे है।
प्रेमिका पूछती है
लहर जब लौटकर जाती है तब वो समंदर को क्या बताती है?
प्रेमी जवाब देता है वो किनारे की उदासी समंदर को बताती होगी।
नही तुम श्योर नही हो इसलिए अनुमान व्यक्त किया
थोड़ा सटीक उत्तर दो। सोचो जरा दोबारा सोचो।
लहर बताती होगी किनारे पर कितने उलझे हुए लोग रहते है।
मगर हर वक्त तो किनारे पर लोग नही रहते फिर ऐसा क्यों कहेंगी भला?
लोग चले जातें है मगर उलझन यही छोड़ जाते है प्रेमी ने अपनी बात इस तर्क से पुष्ट की।
तो क्या लहर छूटी हुए बातें गिनने आती है किनारे तक?प्रेमिका कौतुहल से पूछती है।
लहर समंदर की खबरी है ये बात मानने को दिल नही करता मगर तुमने पूछा है इसलिए बता रहा हूँ
लहर समंदर को ये बताती है किनारों के आगे एक समंदर और है।
समंदर का धैर्य अपने बिछड़े भाई से मिलने का धैर्य है।
प्रेमिका अब अपने प्रेमी से कोई सवाल नही करती वो बस अनमनी होकर ज़मीन पर एक दिल बनाती है और उसके नीचे दस्तखत की तरह लिख देती है
ज़िन्दगी !

© डॉ.अजित

Saturday, February 4, 2017

कॉफी

दृश्य एक:

आयरलैंड का कोस्टा कॉफी हाऊस। कॉफ़ी हॉउस का मालिक मैथ्यू अख़बार पढ़ रहा है।
एक कपल कोने में बैठा है उनमें किसी बात को लेकर बहस हो रही है। मैथ्यू के कान उस बहस में पड़ना नही चाहते है वो सेंसेक्स पढ़ रहा है मगर एक बात उसका ध्यान खींच रही है।
लड़की कह रही है तुम झूठे हो लड़का स्वीकार कर रहा है हां मैं झूठा हूँ मगर फिर लड़की कहती है तुम झूठ को ग्लोरिफाइड करने का कौशल जानते हो। लड़का कहता है तुम्हारे अंदर इस कौशल को पहचानने का कौशल है इसलिए उसकी तारीफ करता हूँ।

दृश्य दो:

मैथ्यू उनसे कहता है कि वो उन्हें फ्री में कॉफी ऑफर करना चाहता है दोनों विनम्रता से इस ऑफर को इनकार कर देते है। मैथ्यू दोबारा आग्रह नही करता है वो खुद के आग्रह की वजह नही समझ पाता है ,वो खुद को अन्य काम में बिजी कर लेता है। मगर उनकी बहस से खुद को मुक्त नही कर पा रहा है अब लड़का कह रहा है तुम्हारा प्लान क्या है? क्या तुम ब्रेकअप चाहती हो? लड़की इस पर कहती है ब्रेकअप प्लानिंग से नही लिया जाता है कितनी स्टुपिड बातें करने लगे हो तुम अब।
अब का क्या मतलब है? मेरे सवाल तो हमेशा से ही स्टुपिड रहे है ये अलग बात है तब तुम्हें वो क्यूट लगते थे ये कहकर लड़का हंसने का अभिनय करता है।

दृश्य तीन:

माहौल में अजीब सी शुष्कता पसरी हुई है। कॉफी के झाग पर बना दिल अब अपना आकार बदल रहा है वो सिकुड़ रहा है यही हाल कमोबेश दोनों के दिल का भी है। अचानक से लड़की कहती है 'यू नो सच बात तो ये है तुम अब मुझसे ऊब चुके हो' लड़का इस बात से पूरी तरह सहमत नही है मगर फिर भी वो कहता है मै तुमसे नही खुद से ऊब रहा हूँ दरअसल।
कोई नई बात कहो ये बड़ी पॉपुलर बात है लड़की झिड़कते हुए कहती है।

दृश्य चार:

मैथ्यू एक स्टाफ बॉय से कहता है। तुम कल और आज में क्या फर्क करते हो? स्टाफ बॉय सोच रहा है बात उसकी सेवा की गुणवत्ता से सम्बंधित है इसलिए वो कहता है मै कल की अपेक्षा आज अधिक तत्पर हूँ।
मैथ्यू हंसता है और कहता है डरा हुआ आदमी आकर्षक आधा सच बोलता है। स्टाफ बॉय इसका अर्थ नही समझ पाता वो सहमति में केवल मुस्कुराता है। ज़ाहिर तौर पर यह एक झूठी मुस्कान है।

दृश्य पांच:

बिल कपल की टेबल पर है लड़के ने बिल मंगाया है मगर लड़की चाहती है कि बिल वो भरे इसलिए वो एक कॉफी और ऑर्डर कर देती है। लड़का अब मैथ्यू के ऑफर का जिक्र करता है इस पर लड़की कहती है दुनिया में कुछ भी फ्री नही मिलता है। हर चीज की एक कीमत चुकानी पड़ती है। मुफ़्त शब्द एक यूटोपिया है इसलिए इस पर कम ही भरोसा करना।
इस बात पर दोनों सहमत है। मैथ्यू को ये बात थोड़ी खराब लगी मगर उसे ये बात सच लगी इसलिए उसने खुद को अब जाकर पूरी बातचीत से अलग किया।

पुनश्च:

दोनों ने समय को विमर्शो और तर्कों के जरिए समझने की कोशिश की मगर नाकाम रहे अंत में एक दुसरे के गले लगकर उसी बात को प्यार के जरिए समझना चाहा इस बार वो कामयाब हुए ऐसा नही कहा जा सकता मगर इस बार बातें अपनी सम्पूर्णता में संप्रेषित हुई।
दोनों ने तय किया अगली मुलाकात क्या तो नदी किनारे होगी या फिर किसी चर्च में।

©डॉ.अजित

पूरणमासी

पूर्व पाठ:

कुछ लम्हें हमने चुराए है। ये चोरी वक्त के खिलाफ है इसकी ध्वनि एक सात्विक षड्यंत्र से मिलती है। इस चोरी के लिए बोला गया झूठ कभी ग्लानि या अपराधबोध नही पैदा करता।
इन लम्हों को जीते हुए समय ठहर जाता है इसलिए ब्रह्माण्ड की काल गणना में इनका कोई दस्तावेजी प्रमाण नही मिलेगा। इन लम्हों को चुराने पर अस्तित्व मुग्ध रहता है और ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करता है।

दृश्य एक:

अंग्रेजी में कहा जाए तो ये फुल मून की शाम है मगर यहां मै भारतीय पंचांग की भाषा में कहूँगा आज पूर्णिमा है। दो आवारागर्द वजूद की जुम्बिश में बंधे अपने अपने ठिकाने की तरफ लौट रहे है। दिन भर वो साथ या यूं कहूँ उनके साथ आज दिन था तो ज्यादा ठीक रहेगा। आज मन थोड़ा कुलीन थोड़ा भदेस हुआ जाता है इसलिए वो कहता है आज पूरणमासी है। फुल मून,पूर्णिमा और अब पूरणमासी इन तीन नामकरण में एक बात का साम्य है तीनो पूर्णता का बोध कराते है। सच में आज का दिन एक पूर्ण दिन है सुबह से लेकर शाम तक पल पल को जीने के बाद इस दिन का हिसाब किसी को दिया नही जा सकता है मगर इस दिन को याद करके मुद्दत तक बेवजह जरूर जीया जा सकता है।

दृश्य दो:

चाँद ठीक आसमान के कदमों में आकर बैठ गया है उसे देख चाँद और सूरज में फर्क करना मुश्किल है मगर उसकी सौम्यता को देख ये अनुमान लगाया जा सकता है कि ये धरती से मिलने अपनी पूर्णता के साथ आया है। हो सकता है उसके पास आसमान का कोई पैगाम हो मगर फिलहाल ऐसा लग रहा है ये उन दोनों का निगेहबान है उनके साथ साथ चल रहा है।
रास्तों के हिस्से उसके सवाल आए है मगर रास्ते जिस तेजी से छूट रहे है उन सवालों का जवाब देना सम्भव नही है। फ़िलहाल सवाल सब नेपथ्य में चले गए है आसमान साफ है तो चाँद के दाग भी साफ़ दिख रहे है मगर इस दागों का भी अपना एक सौंदर्य है ऐसा लगता है चाँद पर दो प्रेमी एक दुसरे से रूठे हुए बैठे हो और चाँद उन्हें धरती के नजदीक ले आया हो ताकि वो धरती पर प्रेम की नाराज़गियां देखकर खुद का गुस्सा भूल जाए और सुलह कर लें।

दृश्य तीन:

दिल आज रूमानी होना चाहता है। चाँद की मौजूदगी ने बिखरे एहसासों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। गति के बावजूद चाँद एक पल के लिए आँखों से ओझल नही होता है। उनकी आँखों की चमक बताती है कि ये खुली आँख सपनें देखने की जुर्रत का लम्हा है हाथों में फंसे हाथ अपनी पकड़ मजबूत करते है फ़िलहाल एक आत्मीय मौन पसर गया है दोनों के मध्य। ये सम्मोहन का समय है।
नेपथ्य में मद्धम आवाज़ में कोई गाना बज रहा है मगर फिलहाल उसके संगीत के अलावा किसी और की जरूरत नही है इसलिए गाने के बोल आवारा भटक रहे है।

दृश्य चार:

पुरकशिश लम्हों की चादर ओढ़ ली गई आँखों में थोड़ी बेचैनी थोड़ी उदासी और ढेर सी आश्वस्ति एक साथ बैठी है। पलकों पर विस्मय का बोझ है मगर लबों पे तबस्सुम है। ये तबस्सुम हरकत का मोहताज नही है मगर इसकी अपनी हरारत है। चाँद के पैगाम सीधे दिलों में दस्तक दे रहे गोया उनसे दिल अपने सारे राज बयाँ करना चाहता हो मगर फ़िलहाल वो चुप है उसको चाँद के शिकवे सुनने है। चाँद जब पेड़ो की ओट में छिप जाता है तब दिल एक छोटे बच्चे की तरह मायूस होकर उसे तलाशता है। चाँद दोनों को देख रहा है और अपनी डायरी में उनकी आवारागर्दी के किस्से दर्ज कर रहा है। हो सकता है उसे ये कहानी उन्हें सुनानी हो जिन्हें यकीन करना मुश्किल होता है कि दो लोग बेवजह भी साथ हो सकते है।

सूत्रधार:

चाँद तुम एक धोखा नही हो तुम एक सच हो ठीक वैसे जैसा हमारा सच हमारे मध्य बैठा है। तुम आज बेहद नजदीक हो कल ठीक उतने दूर चले जाओगे मगर उम्मीद है कि गति और प्रेम के सम्मोहन में तुम एक लंबी यात्रा तय करके फिर एकदिन धरती से मिलने आओगे। धरती तुम्हारी प्रेमिका नही है उस पर शायद आसमान का हक ज्यादा है क्योंकि वो उस पर छाया हुआ है।मगर तुम धरती के सच्चे दोस्त हो तुम्हें देख वो उदासी में भी मुस्कुरा सकती है। आज जब तुम इतने नजदीक हो वो तुम्हारे कान के पीछे एक काला टीका लगाना चाहती है उसने अपनी आँख से काजल चुराना चाहा मगर उस वक्त आँख की कोर गिली हो गई इसलिए उसने अपनी तर्जनी से तुम्हारी पीठ पर स्वास्तिक बना दिया है। इसे शुभता का प्रतीक समझना तुम्हारा होना भर धरती के लिए पर्याप्त है वो तुम्हें हासिल नही करना चाहती वो बस तुम्हें यूं ही देखना चाहती है तुम्हें यूं देखकर वो अपने आज को बीते और आने वाले कल से मुक्त कर लेती है।
तुम चाँद हो इसलिए सब समझते हो ज्यादा कहने की जरूरत नही बस आते रहा करो यूं ही कभी मिलने तो कभी किसी को मिलानें।

©डॉ.अजित 

Monday, January 30, 2017

चाय की बातें

दृश्य एक:
सुबह की चाय पी रहा हूँ।चाय पीना एक सामान्य घटना है मगर चाय को महसूस करना एक विलक्षण अनुभव। चाय के ज्ञात अरोमा में बहुत सी गुमशुदा खुशबुएँ भी शामिल रहती है उन्हें महसूस करने के लिए बस नाक छोटी करनी पड़ती है यही कारण है मैं अपनी तमाम निपुणताओं के बावजूद तुम्हें खुद चाय बनाकर पिलाना चाहता हूँ। मुझे पता है मीठा तेज हो गया और अपनी अकुशलता छिपाने के लिए मैं दूध ज्यादा डाल दूंगा। मैं इतना बेख्याल और जल्दबाजी में रहूँगा कि अदरक अपना अर्क उबाल के बीच भी बचा कर ले जाएगा भले ही उसकी चाय की पत्तियों से कोई दोस्ती मरते दम तक न हो मगर वो मेरे हाथ की बनी चाय में अपना स्वाद नही छोड़ना चाहता है। क्यों? वो इसलिए क्योंकि उसे तुम्हारे कंगन और चूड़ियों की जुगलबंदी उसे उपजे संगीत की आदत जो लग गई है।
मुझे पता मेरे हाथ से बनी चाय औसत होगी मगर फिर भी तुम उसे बढ़िया घोषित कर दोगी और इस घोषणा के पीछे मेरी झूठी प्रशंसा शामिल नही होगी अलबत्ता तुम चाहती हो कि मै चाय के लिए किसी पर निर्भर न रहूँ जब दिल करे बनाकर पी लूँ इसलिए तुम चाय की गुणवत्ता पर कोई चर्चा नही करती जबकि मैं तुमसे कुछ टिप्स की उम्मीद लिए बैठा हूँ। मैं तुमसे निराश नही होता हूँ बल्कि चाय के अपने औसत से भी कम स्वाद की प्रशंसा को तुम्हारे बिन रहने की आदत विकसित करने के तौर पर ग्रहण करता हूँ तुम्हें ये बात अच्छी लगती है ये बात मुझे तुम्हारी चाय की आख़िरी चुस्की बताती है।

दृश्य दो:
आज चाय तुमने बनाई मैं चाहता था तुम्हारे साथ किचन में खड़ा रहूँ मगर तुम्हें न जाने क्यों ये शिष्टाचार विरुद्ध लगता है तुम्हें मेरा इस कदर आम होना पसन्द नही है शायद की मै सिंक में हाथ धोकर तुम्हारी ही चुन्नी से हाथ पूँछ लूँ या फिर उचक कर वहीं किचन की स्लेप पर बैठ जाऊं एकाध बार मैंने ऐसा किया तो तुम्हें मेरी यूं बैठकर टांग हिलाना कतई पसन्द नही आया इसलिए कहा चला बैठो मैं वही आती हूँ बनाकर।
ये हमारी पसन्द का पहला मगर बड़ा प्यारा टकराव है जिसे मै टालता नही हूँ और अक्सर वही किचन में खड़ा हो जाता हूँ और कुछ ऐसी हरकतें करता हूँ जो तुम्हें पसन्द नही है मसलन मैं सिंक के दोनों टैप खोलकर बेवजह पानी चेक करता हूँ और दोनों हाथ गीले कर लेता हूँ पिछले दफा तुमनें चिढ़कर कहा भी था पिछले जन्म में पलम्बर थे क्या?
मैं यही नही रुकता फिर मसालों के ब्रांड पर अपनी बिन मांगी राय देने लगता हूँ ये अपने आप में कितनी बेतुकी बात है कि मै कहूँ की छौंक के लिए तुम कौन सा तेल यूज़ करती हो? जबकि गैस पर चाय चढ़ी हो। पसन्द तो तुम्हें मेरा लाइटर को बेवजह कट-कट करके चलाना भी नही है इसलिए मेरे हाथ से लाइटर लेकर कहती हो बिस्किट कौन से लोगे बेकरी के या सिम्पल वाले जबकि तुम्हें पता है मुझे बिस्किट नही पसन्द है मैं तुम्हें चिढ़ाने के लिए बिस्कुट बोलता हूँ इस पर तुम हंसती हो और किचन में की गई मेरी सारी हरकतों को माफ़ कर देती हो।
मैं कहता हूँ कि मै केवल नमकीन लूँगा इस पर तुम व्यंग्य करते हुए कहती हो ये चाय है बाबु!शराब नही इसे चाय के अंदाज़ से पीना पड़ेगा।

दृश्य तीन:
हम चुपचाप एक दुसरे के चाय का कप पकड़ने के तरीके को देखते है। मेरी ग्रिप तुमसे थोड़ी कम 'क्लासी' किस्म की है उसमें एक देहातीपन है जो एक बढ़िया ड्राइंग रूम में छिप नही पाता है। तुम मुझे चमच्च से नमकीन देती हो मगर मै हाथ फैलाने में थोड़ा संकोची हूँ मगर फिर भी हथेली में चमच्च लायक जगह बना लेता हूँ तुम्हें ये बात अच्छी लगती है कि मेरे हाथ कांपते नही है।
मैं चाय की तारीफ़ नही करता और मुझे पता है तुम तारीफ़ सुनना नही चाहती क्योंकि तुम्हें पता है तुम चाय बनाने में इस कदर माहिर हो कभी खराब चाय बना ही नही सकती।
पिछली दफा दूध नही था तो तुमनें ब्लैक लेमन टी बनाकर पिलवाई थी, मुझे याद है।अमूमन मुझे चाय हेल्थ के एंगल से पीने की आदत नही मगर उस दिन सच में वो चाय डिटॉक्स करने वाली थी सुबह के हैंगओवर को उसने ऐसा विदा किया कि मैंने साधिकार कह दिया आज नाश्ता भी यही करूँगा वरना पहले ये सोच रहा था आज चाय पीने को कैसे मना करूँगा और सुबह सुबह तुमसे लेमन सोडा बनाने के लिए कहता तो तुम तुरन्त समझ लेती कि बीती रात ज्यादा शराब पी है मैंने।

चाय की बहुत सी बातें है मगर कुछ बातें ऐसी है जिन्हें बताने का दिल करता है और कुछ ऐसी जिन्हें छिपाने को।

© डॉ.अजित

Friday, January 20, 2017

उसने कहा था- दो

उसने कहा था
रिश्तों की कभी नैसर्गिक मौत नही है !

तब मैने कोई प्रतिवाद नही किया था शायद तब मै जीवन के नशे में था इसलिए मौत के विमर्श में उलझना नही चाहता था। जीवन और मृत्यु के प्रश्न वैसे भी बेहद निजी किस्म के होते है। मृत्यु की महानता पर मुग्ध हुआ जा सकता है मगर एक घटना के तौर मृत्यु बाह्य तत्वों के लिए कब सुखद रही है भला?

इन दिनों मैं सोचता हूँ नैसर्गिकता आखिर क्या है? क्या जीवन में घटनाक्रमों को सहजता से घटने देने में यकीन रखना नैसर्गिकता है या फिर कुछ मान्यताओं के मध्य किसी आत्मीय रिश्तें को अकेला छोड़ देने को भी  नैसर्गिक कहा जा सकता है।

दिल दरअसल बड़ा मतलबी होता है वो दिमाग के तमाम सवालों को टालता रहता है उसे साथ चाहिए शायद कोई एक साथी भी जिसके साथ वो हंस सके रो सके। दिमाग की अपनी गणनाएं है वो रिश्तों के भविष्य के प्रश्नों में उलझाकर वर्तमान में उस मौत की भूमिका रच देता है जिसको बाद अप्रत्याशित समझ खुद को कोसा जा सकता है।

किसी भी रिश्तें की नैसर्गिक मौत शायद इसलिए नही होती क्योंकि हमारा चुनाव उसे दुखांत के जरिए विस्मृत करने का होता है या अस्तित्व का हस्तक्षेप कुछ ऐसी निर्मितियां बनाता है जिसे सोचकर विलग होने के कारणों का औचित्य सिद्ध किया जा सके।

नैसर्गिक न होना औचित्य के लिए अनिवार्य है यदि मृत्यु नैसर्गिक हो तो शोक की तीव्रता में सार्थकता के स्तर पर अंतर आ जाएगा। जो छूट गया है उसमें उस छूटे जाने की आत्मप्रवंचना जीवनपर्यन्त प्रताड़ित करती है। किसी रिश्तें की नैसर्गिक मौत न होने का एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है उसमें दीर्घायु की परिकल्पना पहले दिन से ही नही थी।

जिस साथ का छूटना जन्म के साथ आया हो उसके लिए कुछ भी अनैसर्गिक नही है मनुष्य की चाह के रूप में वो एक नियोजित हस्तक्षेप है वो समानान्तर हमारे साथ पलता है। एकदिन स्वतः आत्मघाती हो हमारी सबसे प्रिय वस्तु को हमसे मांग लेता है और हम अतिशय परिपक्व होने का अभिनय करते हुए इस सच को स्वीकार कर लेते है कि ये तो एकदिन होना ही था।

रिश्तों की नैसर्गिक मृत्यु नही होती है इसमें एक पंक्ति यह जोड़कर कि ये तो एकदिन होना ही था हम मृत्यु की वेदना कम नही कर सकते मगर इसके अलावा और बचता भी क्या है जब देखते ही देखते दृश्य से एक चित्र नेपथ्य में चला जाता है और स्मृतियां सही गलत के मुकदमें में हमे आजीवन कारावास की सजा सुनाकर खुद स्मृतिलोप को चुन लेती है।

© डॉ.अजित

#उसनेकहाथा