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गज़लगो की तरह आध्यात्म की दुनिया से जुड़े लोगों
का दिल भी बड़ा नाजुक होता है. वे इसे अनुशासित और पवित्र कर्म मानते हैं. जिसके लिए
धैर्य और समर्पण का व्याकरण अनिवार्य रूप से चाहिए होता है. आप बिना मीटर की कुछ
तुकबंदी करो तो गज़ल के जानकार सबसे पहले यह बताएंगे कि मियां तुम्हें गज़ल कहनी
नहीं आती है थोड़ा गज़ल का ग्रामर समझो किसी उस्ताद की शागिर्दी में लिखना पढ़ना शुरू
करो फिर कहना कि मेरी गज़ल सुनो. ठीक इसी तरह जो व्यक्ति आध्यत्मिक जगत की
दुश्वारियों को जानता समझता है जब वह किसी चुस्त जुमलेबाज को धर्म, दर्शन,
आध्यात्म और रहस्यवाद पर ज्ञान पेलता हुआ देखता है तो वह अपनी मानसिक शान्ति कई
बार खो देता है और कहता है तुम्हें पता भी है कि ध्यान-ज्ञान-आध्यात्म की दुनिया
क्या होती है? बकवास करना अलग कौशल है.
संयोग से मैंने इन दोनों ही विधाओं में हाथ
आजमाया और दोनों के निपुण निष्णात विद्वानों से पर्याप्त दुत्कार भी सही. पहले
मुझे बुरा लगता था फिर मैं सायास छेड़ने लगा और इस कर्म में मुझे इसमें मजा आने
लगा.
मसलन, संन्यास और चमत्कार आज भी मेरे प्रिय
विषय है. इन दोनों को आधार मानकर मैंने और मेरे दिवंगत मित्र अभिषेक यादव ने एकदिन
‘प्रतीतवाद’ नामक एक नया दर्शन संसार को दिया. प्रतीतवाद की केन्द्रीय स्थापना यह
है कि आप जो है नहीं वो आप लोक में आसानी से प्रतीत करवा देते हैं और फिर इसके
सुख-दुःख का उपभोग करते हैं.
मै पहाड़ की यात्राएं करते समय सदा से यह
कल्पना किया करता कि पहाड़ पर एक छोटा सा भूखंड लेकर एक कुटिया बनाऊंगा और यहाँ एकान्तिक
जीवन जीयूंगा. इस कुटिया पर मेरे कुछ चुनिन्दा दोस्त गाहे-बगाहे आते-जाते रहा
करेंगे. मैं इस मेल-मिलाप को सत्संग का नाम देता था. हालांकि सत्संग एक दिव्य आभा
लिए होता है ईश्वर को सबसे कारुणिक होकर सत्संग में ही पुकारा जाता है. मगर मेरी
कुटिया का सत्संग खुद से भागे हुए लोगों का एक कम्यून भर होना था. जो सब चीज से
जल्दी उकता जाते हैं वे एकदिन इस सत्संग से भी उकता जाएंगे ऐसा मैं सोचा करता था.
बचपन से ही मुझे संन्यास की दुनिया आकर्षित
करती थी मगर यह आकर्षण इतना सघन कभी न था कि मैं सब कुछ छोड़-छाड़कर निकल जाऊं. शायद
मैं एक समीक्षक भाव से उस दुनिया को देखना-जानना या समझना चाहता था. मुझे प्रत्येक
संन्यासी एक रहस्यमयी दुनिया का बांशिदा लगता था और मुझे लगता कि इसे आदमी के पास
चमत्कारिक शक्तियां है. जब मैंने मनोविज्ञान की पढ़ाई की तो मैं यह जान पाया कि वो
आकर्षण संन्यास के प्रति नहीं बल्कि शक्तियों के प्रति था जिसका एक सिरा मेरे मन ही
हीनताग्रंथियों से बंधा हुआ था.
मैं दुनिया को चमत्कृत कर देना चाहता था ताकि
दुनिया मेरा विलक्षण होना समझ पाए. इसलिए मैंने यात्राओं, मंदिरों, मठों और चर्च
आदि के वास्तु को लेकर भांति-भांति के सम्मोहन पाले रखे. मगर जब मैं किसी
आध्यात्मिक पुरुष से मिलता तो मुझे वो मुझसे अधिक उलझा हुआ नजर आता उस पर वैसा बने
रहने के गहरे मनोवैज्ञानिक दबाव मैं देख पाता था. फिर धीरे-धीरे मुझे यह समझ आने
लगा कि मुझे वस्तुत: न तो संन्यास में और न संन्यासियों में रूचि है मुझे केवल
संन्यास की बातों में रूचि है क्योंकि वो एक ऐसा माहौल बनाने की क्षमता रखती थी
जिसमे गहरा विस्मय और सम्मोहन बचा रहे.
जब मैं कहता यह सब मन के रचे हुए पाखंड हैं.
तब मेरा मन इसका प्रतिकार नहीं करता है बल्कि वो हल्का महसूस करता है अब मैं मुक्त
हूँ और मुक्त होना संन्यासी जीवन की पहली शर्त है.
जिस मुक्ति का विज्ञापन संन्यासी मन करता है
वो दरअसल मुक्ति नहीं थी वो मुक्ति की छोटी बहन युक्ति थी जो मुझे मेरे अवचेतन मन
के रास्ते मिली थी और इस युक्ति के भरोसे ही मैंने अक्सर ऐसी माया रची कि कोई कोई
मुमुक्षु मुझे सचमुच का संन्यासाभिलाषी मान कर मेरे प्रति गहरी श्रद्धा से भर जाता
है. उसे देख मुझे क्षणिक ग्लानि होती मगर मैं फिर उसे पूरे आत्म विश्वास से आशीर्वाद
की शक्ल में एक शब्द सौंपता- ‘तथास्तु’ जबकि वो कोई मनोकामना लेकर मेरे निकट नहीं
आया था.
आश्चर्यजनक रूप से लोगों के जीवन में ‘तथास्तु’
घटित भी होने लगता और मुझे मेरे सिद्ध होने पर संदेह बढ़ने लगता. मेरे जीवन में
जितने भी किंकर्तव्यविमूढ़ पसरे हुए हैं वे सब इसी ‘तथास्तु’ की उपज है. मुझे यह
आशीर्वाद कभी हासिल नहीं हुआ बल्कि मुझे एक श्राप मिला कि मैं निषेध से भाग न
सकूंगा.
अंतत: संन्यास की परिणिति इतनी खराब हुई कि
मैं गृहस्थ में संन्यासी और संन्यासी में गृहस्थ के सपने देखते-देखते हुए तेजी से
बूढ़ा होता गया. जिसके लिए मुझे अस्तित्व ने कभी माफ़ न किया.
©डॉ. अजित
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