Tuesday, October 4, 2016

काल चक्र

दृश्य एक:
धूप ढल चुकी है। सांझ अभी आई नही है। मुहल्लो से उबासी निकल कर गलियों में भटक रही है। उसके पास करवटों के कुछ खाली लिफाफे है। वो ध्यान से अपनी कलाई देखती है उस पर बंधी घड़ी का फीता थोड़ा ढीला करती है फिर एकटक घड़ी की सुईयों को देखती जाती है। एक ठंडी आह भरके घड़ी उतार कर टेबल पर रख देती है।

दृश्य दो:
वो अपने स्लीपर सीधे करती है। उसे कोई द्वंद नही है वो उदास भी नही है मगर फिर भी काफी देर से एक ही जगह बैठी है। अचानक वो कुछ गुनगुनाने लगती है उसे गीत का मुखड़ा ठीक से याद नही है वो बीच का कोई अंतरा गा रही है। इस तरह से कई अंतरे उसने अधूरे छोड़े और अधूरे ही गाए।

दृश्य तीन:
उसने खुद को आईने में देखा और खुद के होने की तसदीक की। अपने कानों को देखकर उसे सन्देह हो रहा है कि ये बोझ में दबे हुए है इसलिए उसने इयररिंग उतार दी है। थोड़ी देर कान को छोटे बच्चे की तरह छुआ। इस छुअन में कोई नयापन नही है उसके कान उसकी उंगलियों को शायद ठीक से पहचानते नही है। उसके कान गीले है जिन्हें साँसों से सुखने की जरूरत है। वो अनिच्छा से अपनी इच्छा से सवाल करती है उसे जवाब ना में मिलता है। उकता कर आईने के आगे से हट जाती है।

दृश्य चार:
उसके हाथ में एक किताब है। वो कुछ पन्ने पलट रही है। वो कहानी का सारांश चाहती है इसलिए कुछ कुछ हिस्से पढ़ती है मगर उसे कहानी के अंत का कोई अनुमान नही मिलता है। वो किताब का अंत पढ़कर उसे बन्द करके रख देती है।

दृश्य पांच:
उसके पास कुछ खत है। ये अलग अलग वक्त पर लिखे गए है मगर उनकी केंद्रीय विषय वस्तु में कोई ख़ास भिन्नता नही है। वो लिखावट से कल पकड़ने का कोण देखना चाहती है उसे लिखने वाले की हथेली की रेखाओं की प्रतिलिपि चाहिए। जब नही मिलती तो खुद की रेखाएं देखनें लगती है। उसकी रेखाओं का मानचित्र साफ़ है कोई किसी को समकोण पर नही काट रही है। उसकी हथेली सिंधु घाटी सभ्यता से इतर किसी कोई हुई सभ्यता का पता है मगर वो तथ्य और शोध को अनुपयोगी मानते हुए अपनी ऊंगलियां चटकाने लगती है।

दृश्य छह:
वो एक अंगड़ाई लेती है और खिड़की से आती रौशनी को देखने लगती है कुछ महीन कण रौशनी में साफ़ नज़र आ रहे वो फूंक से उसे उड़ाती है। उसकी फूंक से बिखरे कण एक त्रिकोण बनाते है जिसे देख उसकी आँखों में पहली बार हंसी नजर आती है। खिड़की पर खड़े होकर उसे बाहर का दिखाई नही दे रहा है ये खिड़की घर के अंदर ही है। खिड़की के नजदीक एक मकड़ी का जाला है जिसके मध्य में मकड़ी सो रही है वो अपनी फूंक से उसे भी जगाना चाहती है मगर उसकी फूंक केवल कणों को तोड़ सकती है वो मकड़ी और जाले तक नही पहुँच पाती है। वो खिड़की बंद करती है खिड़की बंद होने की आवाज़ दिल को अच्छी नही लगी।

दृश्य सात:
वो सड़क पर है। रास्ते उसके पैर के तलवों में गुदगुदी करना चाहते है मगर उसके तेज कदम देख वो समझ जाते है आज का दिन उपयुक्त नही है ऐसे सात्विक किस्म के मजाक के लिए। वो चौराहे पर जाकर आसमान की तरफ देखती है दाएं बाएं जाने की बजाए वो सीधा जाती है अपनी मूल सड़क को वो छोड़ना नही चाहती। दो नई सड़कों की तरफ अपने दोनों हाथ फैला कर उन्हें विलम्ब का संकेत देकर वो आगे निकल जाती है।

सूत्रधार:
काल नित्य और अनन्त है। मन का अपना दिशाशूल है। जो विभक्त है सम्भव है वो उतना ही तटस्थ है। मन की अनन्त हजार कोने कहीं ख्वाब कहीं सपनें सलोने।
उचित अनुचित सब समय सापेक्ष जिसका स्थान जहाँ सुरक्षित उसके लिए नही है कुछ भी वर्जित।
अपने और सपनें साथ रहने की जिद है पाले एक तन्हा दिल भला कैसे सब सम्भालें।
नही ये कोई थकान नही। नही ये कोई उड़ान नही। खुद से एक अदद मुलाक़ात है जिसके पीछे दिन आगे रात है।
सवेरा हमेशा कल में नही होता है। सवेरा आज में भी होता है।

© डॉ.अजित

Sunday, October 2, 2016

लाइव

दृश्य एक:
बस में एक आदमी चढ़ता है। कद दरम्याना रंग काला शरीर पतला उम्र तकरीबन पचास के पार। बस तेज चल रही है सड़क टूटी फूटी हुई है सो आदमी लड़खड़ाता हुआ ड्राइवर के पास की सीट तक पहुँचता है।
ड्राइवर ने तेज आवाज़ में गाने बजाए हुए है वो भी ओल्डीज़।

दृश्य दो:
गानो की धुन पर वो आदमी झूमने लगता है। उसकी देह में वक्रता आने लगती है। गाने के लिरिक पर वो मुग्ध है और वाह वाह करता है। यहां से बाकि यात्रियों में ये सन्देश जाता है कि आदमी ने पी हुई है। जैसे जैसे वो सहज और मुक्त होता जाता है उसके पीए हुए की पुष्टि हो  जाती है।
अब वो समस्त बस यात्रियों के लिए कौतुहल और मनोंरजन का विषय बन गया है।

दृश्य तीन:
आज प्रकृति उसके साथ है अस्तित्व उसकी बंधी कलाओं को खोलने के लिए आतुर है इसलिए संयोग से अब जो गाना बजा वो है मेरा मन डोले मेरा तन डोले...! उधर बीन का लहरा बज रहा है इधर आदमी के सर पर साक्षात भरत मुनि ने हाथ रख दिया है। अब अपने पूरे 'रौ' में आ गया है सीट से खड़ा होता है और बस के बीच आकर डांस करने लगता है। उसकी भाव भंगिमाएं इतनी लाइव किस्म की है मानो वो शब्द शब्द संगीत को जी रहा है उसके स्टेप गति में बहुत संतुलित है। उसे नाचते देख लगता है वो नृत्य न जाने कब से उसके अंदर दबा हुआ था।

दृश्य चार:
बस में गाना और नाचना साथ चल रहा है बस के ड्राइवर और कंडक्टर को छोड़कर सब उस आदमी के डांस का लुत्फ़ उठा रहे है। ड्राइवर कंडक्टर उसको बैठाने के निर्णय पर विचारमग्न है। बस के यात्री आपसे में एक दुसरे के चेहरे को देख हंसते है फिर उस आदमी का डांस देखने लगते है।
ड्राइवर बार बार गाना बदल रहा है मगर उस आदमी के लिए अब गाना गौण हो गया है वो हर गाने पर उतनी ही तन्मयता से नाच सकता है। फ़िलहाल एक गाना बजा मैं हूँ खुश रंग हिना...इस गाने पर आदमी की आंखें छलक आई है शायद कोई दर्द पुराना याद आ गया है उसे।
ड्राइवर गाना बदल देता है वो कहता है इसे दोबारा बजाइए है ड्राइवर उसकी बात अनसुना कर देता है।

दृश्य पांच:
वो आदमी थकता है तो सीट पर बैठ जाता है मगर उसकी देह में नृत्य नही थका है। वो गाने के हिसाब से अपने चेहरे के एक्सप्रेशन बदलता है हाथ और कंधे मटकाता है। यात्री साक्षी भाव से हँसतें हुए उसे देखते है।

दृश्य छह:
कंडक्टर जोर से चिल्लाते हुए उसके बस स्टॉप का नाम लेता है ऐसा करके वो एक अवांछित हस्तक्षेप करता है। उस आदमी की तन्द्रा टूटती है वो गुनगुनाता हुआ खिड़की तक आता है। अपनी दुनिया में मग्न मुक्त लोक लज्जा से निस्पृह वो आधे घंटे से केवल खुद के साथ था। मदिरा इसका माध्यम जरूर बनी मगर मदिरा ने उसको हिंसक या बदतमीज़ नही बनाया। उसकी आँखों की चमक उतनी ही दिव्य थी जितनी यज्ञ के बाद किसी ऋषि की होती है।
उसने एक एक लम्हे में खुद को जीया और खुद को अनुभूत किया वो नाच रहा था तो ईश्वर उसे देख खुद का अवसाद मिटा रहा था।

दृश्य सात:
मैंने उसके उतरने से पहले उसको धन्यवाद कहा और उसके नृत्य की तारीफ़ की मगर वो मलंग था उसे किसी की तारीफ़ या निंदा की परवाह ही कब थी वो औघड़ अपनी दुनिया में मस्त था। उतरने से पहले वो मुड़ता है और अपनी उसी लय में सैल्यूट की मुद्रा बनाता है ये सैल्यूट मुझे नही था समस्त यात्रियों के लिए था उसकी आँखे जरूर मुझ पर थी।

नेपथ्य से:
मन करता है उदघोष। जीना महत्वपूर्ण है या जीने का अभिनय। ओढ़े हुए आवरण और छवि के पाखण्ड को भूलकर जब जीया जाता है तब हर क्षण में नाद प्रस्फुटित होता है। वहां 'मैं' नही होता और कोई वहां 'मैं' के लिए भी नही होता है।
सच्ची मुक्ति खुद से चाहिए होती है खुद के करीब जाना डराता है अगर एक बार ये डर चूक जाए फिर क्या फर्क पड़ता है आप कौन है और कहां है।

© डॉ.अजित

Wednesday, September 14, 2016

गुलमोहर

तुम्हारे शहर का गुलमोहर मुझे याद करता है।कल ही उसकी एक चिट्ठी मिली।चिट्ठी में लिखा है वो मुझसे मिलना चाहता है।आख़िरी बार जब उसके नीचे मै खड़ा था उसने मेरी आत्मा के कई तस्वीरें ली थी।वो उनके निगेटिव मुझे दिखाना चाहता है। मै सोच रहा हूँ कि निगेटिव ही क्यों दिखाना चाहता है फोटो क्यों नही।

आगे चिट्ठी में लिखा है वो मुद्दत से मेरी इंतजार में था। जिस दिन नगर निगम ने उसे पौधे के रूप में लगाया था, उसी दिन से उसे पता था मै एकदिन जरूर आऊंगा। वो एक बोझिल शहर में खड़े खड़े थक गया था। मगर जिस दिन मै उसकी छाँव में खड़ा था उसने हवाओं की मदद से एक स्वागत गान गाया और अपनी बारीक पत्तियों से फूलों का काम लिया इस तरह से उसने मेरा स्वागत किया।
जब मै अपने बालों में फंसी उसकी पत्तियां हटा रहा था तब वो जोर से हंसा था जोकि उसकी आख़िरी हंसी थी।ये बात भी उसने अपनी चिट्ठी में लिखी है।

आगे गुलमोहर लिखता है कि जब भी तुम फर्र से उसके सामने से गुजर जाती हो वो पूछना चाहता है तुमसे कि मै कब आऊंगा?मगर तुम्हारी गति और व्यस्तता देखकर वो अपना सवाल और आत्मविश्वास दोनों खो बैठता है।

तुम्हारे शहर का गुलमोहर रास्तों से मेरे बारें में पूछता है मिट्टी उसकी व्याकुलता पर हंसती है।धूल उसकी चोटी पर जाकर बैठ जाती है और बहुत कम आवाज़ में मेरे बारे में खुसर फुसर करने लगती है। उसे उसकी आवाज़ सुनाई नही देती है वो कहता है जोर से बोलो मगर तब तक हवा उसे अपने साथ उड़ा ले जाती है। हवा के पास मेरे पसीने का डीएनए है धूल और हवा मिलकर तय करती है कि उन्हें ये पता लगाना होगा मै मूलतः हूँ किसका।

गुलमोहर ये सब देखकर उदास हो जाता है तुम्हारे शहर की हवा मिट्टी धूल रास्ते चौराहें सब मिलकर मेरी पड़ताल में लगे है मगर मै कैसा हूँ कहाँ हूँ इसकी कोई खोज खबर नही ले रहा है।

चिट्ठी के मध्य में गुलमोहर कहता है कि उसने कल सूरज से बात की और कहा कि आज वो एक दिन के लिए उपवास पर रह लेगा इसके बदले वो चाहता है कि सूरज की किरणें रोशनदान या खिड़की से तुम्हारे कमरें में दाखिल हो और तुम्हारी पलकों में सोए हुए ख्वाब से बातचीत करें और इस बातचीत में इस बात का सुराग लगा लें कि मै कब आ रहा हूँ। या ये ही पता चल जाए कहीं हमारे बीच अबोला तो नही चल रहा है।

सूरज ने उसकी बातें मान ली है मगर किरणों ने सूरज को मना कर दिया है उनका तर्क है पहले तो  ये दो लोगो की निजता में दखल है दूसरा तुम उस वक्त तक नही सोती जब किरणें तुम्हारे आंगन में दाखिल होती है इसलिए वो बस इतना बता सकती है कि तुम उदास हो या खुश हो।

सूरज खेद सहित गुलमोहर से कहता है कि वो इतनी ही जानकारी लाने में समर्थ है। इस पर गुलमोहर कहता है ये जानकारी उसके किसी काम की नही है क्योंकि तुम उदासी में खुश और खुशी में उदास दिख सकती हो इससे उसे कोई अनुमान न मिलेगा।

सूरज खुद के ओजविहीन होने पर थोड़ा निराश होकर बादलों के पीछे छिप गया है उसकी ग्लानि को गुलमोहर समझता है इसलिए वो दो दिन उपवास करता है सूरज के जाने पर बादलों की एक टोली मसखरी करती है क्योंकि उनके पास मेरी कल की एक खबर है जब मै अचानक से आई बारिश में भीग गया था। बादल अपने संचार तंत्र पर मोहित है वो अपनी बूंदों के हाथों के ये खबर गुलमोहर तक पहुँचाते है मगर इसके बदले वो चाहते है उसके नीचे की धरती जल से आप्लावित हो जाए।

गुलमोहर बताता है कि बादलों की सद्कामना के साथ छिपे हुए स्वार्थ को वो स्वीकार कर लेता है क्योंकि मै बारिश में भीग रहा हूँ इस बात से मोटे तौर पर एक बात तो पता चलती है कि मै स्वस्थ हूँ।
बूंदे बरसती है बादलों के खत पढ़कर गुलमोहर उसे धरती के हवाले कर देता है।

एकदिन जब तुम उसके सामने से गुजर रही थी तो अचानक से फोन आने पर तुमनें अपनी गाड़ी गुलमोहर के पास रोक दी ये देखकर गुलमोहर को खुशी हुई उसने उल्लास में कुछ पत्तियां तुम्हारी शक्ल देखनें के लिए भेजी मगर वो तुम्हारी कार के वाइपर पर अटक कर रह गई। तुम आगे बढ़ गई और गुलमोहर पीछे रह गया।

अंत में गुलमोहर मुझसे कहता है मै थक गया हूँ हवा बादल सूरज से अनुनय विनय करते हुए कोई भी मेरे बारे में प्रमाणिक सूचना देने में असमर्थ है वो नाराज़गी की लहजे में कहता है मैने खुद को इतना बंद क्यों बनाया हुआ है कि किसी कोई अनुमान नही मिल पाता है मै कहाँ हूँ और कैसा हूँ।

गुलमोहर कहता है चिट्ठी मिलते ही आने के बारे में सोचना और सोचना नही आना ही पड़ेगा इससे पहले वो अनमना होकर शहर की तरफ से आँख मूँद ले वो मुझे एक बार देखना चाहता है मिलना चाहता है। क्यों मिलना चाहता है इस बात का जवाब वो इस बार मिलकर ही देगा ये लिखकर गुलमोहर ने चिट्ठी को खत्म किया और कलम कागज़ पर ही तोड़ दी है।

मैं पहले चिट्ठी पढ़कर खुश हुआ बाद में उदास हो गया हूँ। अब मुझे जाना ही होगा भले ही मेरे इर्द गिर्द कितनी हो भौतिक मानसिक बाधाएं हो गुलमोहर के लिए कम से कम एक बार उस शहर में जरूर जाऊँगा भले ही ये हमारी आख़िरी मुलाकात क्यों न हो।

'एक खत गुलमोहर का'

Thursday, August 25, 2016

कुछ लोग

कुछ लोग सम्भवानाओं की खोज के राजदूत थे। वो बड़ी जल्दी में भी थे। दरवाजा नॉक किया बैल बजाई जब तक विलंबित अस्तित्व उठकर आया उनका धैर्य जवाब दे गया वो आगे बढ़ गए। किसी को तलाशना उनकी जिद थी और इसके लिए छोड़ना उनके लिए कोई बड़ी बात नही थी।
फिर भी वो पूर्णतः अतीत से मुक्त नही थे सम्भावनाओं के निष्क्रिय बीज वाले वृक्ष की खोजखबर वो यदाकदा जरूर लेते रहते थे उनके पास नियमित मुस्कान थी कुछ मशविरे थे बस उनके पास शून्य और धैर्य नही था वो हड़बड़ी में थे कभी कभी अपना वक्त मिलाने वो उन पुराने घण्टा घरों की घड़ियों की तरफ विश्वास से देखते थे।
उनका विश्वास इतना अस्थाई था वो सबके मित्र थे मगर वो किसी के मित्र नही थी। उनके पास वक्रोक्ति थी सवाल थे और किसी के जैसा बनने की एक विचित्र सी अपरिभाषित चाह भी उनके साथ छाया की तरह हमेशा चिपकी हुई रहती थी वो जब भीड़ में थे तभी धूप में थे तभी वो सबसे ज्यादा अकेले थे।

'सम वेस्ट नोट्स'

Wednesday, August 3, 2016

आईना

वो एक लम्हा था
भीगा हुआ दरकता हुआ। नदी के नजदीक उसके गीत सुनता दरख़्त अचानक से उसी के वेग में जड़ से उखड़ गया था। ये वक्त सियासत थी या किस्मत की बगावत तय करना थोड़ा मुश्किल था।
आसमान के कुछ कोण उड़न झूले में सवार हो गए थे जहां से अपना ग्रह नही दिख रहा था इसलिए ये तय करना मुश्किल था कहाँ डर कर इसे रुकवाना है या फिर चलते हुए से कूद पड़ना है चिल्लाते हुए।ये बात कुछ कुछ आत्महत्या जैसी लग सकती थी।
उम्मीद के दायरों में उसके लिए रोना मना था इसलिए वो इकट्ठा करता गया दर्द के छोटे छोटे कर्जे।उसकी आँखों में कुछ कबीले बगावत पर उतर गए थे ऐसे में बड़ा मुश्किल था ये पता करना कि दुश्मन अंदर का था या बाहर का।
दिल एक फकीर है और मुहब्बत के पास मांगने के अलावा कोई दूसरा काम नही है वो जिद पे आकर मांगती है उसनें एकदिन जान के साथ जीने का गुरुर ही मांग लिया उसके बाद दिल के तमाशे में जेहन सबसे बड़ा किरदार बनकर उभरा।
माथे की लकीरों में शिकन नही थी बस कुछ शिकवे रफू हो गए थे उसके बाद जख्मों की तासीर जुदा हो गई वो दिखते बेहद शुष्क थे मगर वो अंदर से हरे थे उन पर वफ़ा के पट्टी भी शिफ़ा अता करने की कुव्वत नही रखती थी।
आंसूओं को बेरंग कहे जाने की रवायत रही है मगर उन आंसूओं का जो रंग था उससे कोई इंद्रधनुष नही बन सकता था इसलिए उसे आवारा कह कर छोड़ दिया गया। हां वो आवारा आंसू थे मगर कलेजा चाक करके जिसकी याद में निकलें थे उसके पास वफ़ा की एक फेहरिस्त थी कच्ची पैंसिल से लिखे कुछ जवाब थे इसलिए उन्हें पढ़कर सबसे पहले अपनी कलम याद आई।
उसकी कलम ही उसके कत्ल का हथियार थी जिसे मौक़ा ए वारदात से बरामद किया गया था।
इस तरह एक खूबसूरत ख्वाब ख्याल अपनी मासूमियत के साथ तन्हा बर्बाद हुआ तमाम ऐतिहातन हिफाजतों के बाद।
इश्क़ के बिछोड़े आंसूओं का सफर तय करके आए थे इसलिए उन पर वक्त और खुशफ़हमियों की गर्द चढ़ी थी
आईना उस देश में केवल महबूब के पास था इसलिए वो सबसे पहले खुद की ही शक्ल भूल गया।

'भूली बिसरी बातें'

Sunday, July 31, 2016

फ़्यूजन

तुम इतनी असाधारण थी कि बिना किसी अपराधबोध के ऐन वक्त पर अस्वीकार कर सकती थी प्रणय निवेदन। तुम्हारी यही असाधरणता मेरे मन में कहीं गहरे धंस गई थी। पूर्णता के आवेगों के मध्य तुम जानती थी एक अमूर्त स्पेस को बचाकर रखना ताकि हमेशा बची रहे रिश्तों में एक उदीप्त लौ जिसके ताप में सिकती रहें आत्मा।
तुमनें किस्म किस्म से यात्रा को आरम्भ करके देखा मगर तुम्हारी समाप्ति हमेशा निर्विवाद रूप से अकल्पनीय रही तुमसे प्रेम और आदर एक साथ किया जा सकता था।
मेरे देह के गठन में किसी यूनान के देवता या लड़ाके की झलक नही थी मगर मेरे मन के गठन में तुमनें एक गहरी आश्वस्ति को अपनी तर्जनी की तूलिका से रेखांकित किया था उसके बाद कुछ भी अप्रिय होना सम्भावित ही नही था इस अप्रियता चाहे ईश्वर ही क्यों न चाह लेता।
दरअसल, तुम किसी जल्दी में नही थी न ही जिंदगी ने तुम्हें रिक्त स्थान की पूर्ति करो जैसे सवाल तुम्हें हल करने के लिए दिए थे।
एक दिन किसी पहाड़ी गेस्ट हाउस की खिड़की तुमनें खोली और वहां से दूर कही पीठ किए मैं खड़ा नजर आया तुमनें कोई आवाज़ नही दी बस खिड़की के कांच पर खुद को देखा और मुस्कुराई उसके बाद मेरी दिशा स्वतः बदल गई। मैं इसे आत्म सम्मोहन का नाम देता हूँ।
तुम्हें कहीं नही पहुँचना था इसलिए तुम्हारी यात्रा को रोमांच थोड़ा शुष्क मगर गहरा था। जैसे बांसुरी बजाते समय उसके कुछ छिद्र बारी बारी बंद करने और खोलने होते है तभी वो मधुर गान रचती है ठीक ऐसे ही तुमनें सवाल और जवाब के जरिए मेरी सुर परीक्षा ली हालांकि मेरे हिसाब से इसकी जरूरत नही थी मगर फिर मैंने पाया ये मेरी बेहतरी के लिए है,इसके लिए मैंने खुद को एक जगह इकट्ठा किया और खुद के अजनबीपन को दूर कर खुद को एक साथ एक जगह समग्रता से देख पाया।
तुम्हारे असाधारण होने पर मैंने एकदिन विषयांतर करते हुए कहा धरती और आसमान का कोई रंग नही होता हमनें अपनी सुविधा से उनके रंग तय कर दिए है इस पर तुमनें सहमति या असहमति नही जताई बल्कि कहा रंग देखनें की मनुष्य की अपनी सीमाएं है और स्मृति भी। उस दिन मै समझा कि तुम्हारा विस्तार अलहदा किस्म का है कथनों और परिभाषाओं में तुम्हारी कोई ख़ास रूचि नही है।
एक दिन तुमनें पूछा एकांत की क्या सीमा है तुम्हारे हिसाब से? मुझे लगा तुम एकांत की दुनिया पर बात करना चाह रही हो मगर दरअसल तब तुम मौन की व्याख्या करना चाह रही थी जब मै लौकिक दुःख बताकर चुप हुआ तब ये बात पता चली कि निसन्देह एकांत के बारे तुम अवसाद नही प्रेम की दृष्टि से एक सूत्र वाक्य सुनना चाहती थी।
तुमनें मेरे समानांतर कोई बड़ी छोटी रेखा नही खिंची बस रेखा को जोड़कर एक पुल बनाया और उस पर एक झूला डाल दिया जिस पर झूलते हुए मै कम से कम दो बार तुम्हें पुल पर अकेले खड़े और मुस्कुराते देख सकता था।

'फ़्यूजन का कंफ्यूजन'

देह यज्ञ

देह को अनावृत्त करता हूँ तो दिगन्त तक दिगम्बर स्तुतियां लय बद्ध होकर अनहद नाद में रूपांतरित हो जाती है।

स्पर्शों को ब्रह्म महूर्त की धूप देता हूँ उन पर अनासक्ति के केवड़े के जल का अभिषेक करता हूँ। छाया को छाया के समीप ले जाकर तृप्त कामनाओं का दीप जलाता हूँ।
 जिसमें दो आकार स्वतः दैदीप्यमान हो उठतें है।

अस्तित्व से प्रतिरोध शून्यता की दिशा में आगे बढ़ जाता  है समानांतर एक नूतन मार्ग बनता है जिसमें दिशा की कामना नही बल्कि किसी आकाशगंगा की देहरी पर बैठ कर देह को पवित्रता से चमकते हुए देखना दृश्य में शामिल होता है।

काया के मनोविज्ञान पर दर्शन की टीका करने के लिए मन के सम्पूर्ण श्वांस से अंगुलियों में अंगुलिया फंसाकर प्राणशक्ति से शंखनाद करता हूँ फिर उसकी ध्वनि में हृदय के गहरे और एकांतिक स्नानागार में निःसंग स्नान करने उतर जाता हूँ।

देह के मध्यांतर पर कुछ कीलित मंत्रो के यज्ञ मुझे करने है इसके लिए थोड़ी समिधा उधार मांगता हूँ। फिर वक्री आसन लगाकर मूलबन्ध को साधता हुआ नाभि के इर्द गिर्द स्पर्शों की समिधा सजा देता हूँ। वैदिक ऋचाओं अव्यक्त भावों और सम्बन्धों के दिव्य अग्निहोत्र मंत्र सिद्ध करने के लिए संयुक्ति का कपूर देह की यज्ञ वेदी के ठीक मध्य रख कर प्रथम अग्नि प्रज्वलित कर देता हूँ।

ये एक कालचक्र का षड्यंत्र नही है बल्कि अस्तित्व की संपूर्णता का एक स्व:स्फूर्त आयोजन है जिसकी आवृत्ति किसी नियोजन से मिलती है।

तुम्हारे पैरो तले एक निषेद्ध प्रश्नों का एक युद्ध सनातन से चल रहा है जिसकी कराह में तुम्हारे माथे पर कान लगा कर सुनता हूँ न्याय और औचित्य के तर्क एकत्रित करने की अपेक्षा मैं स्वयं दूत बनकर एक संधि प्रस्ताव तुम्हारी एड़ियों की गुफाओं में दाखिल कर आता हूँ जिस की चर्चा तुम्हारी पलकें गुप्तचर की तरह मेरी आँखों से करती है।

मन के अमात्य थोड़े बैचेन है उन्होंने हमारी हथेलियों को तपा कर गर्म कर दिया है अब उनका प्रभाव को आरोग्य में रूपांतरित करने का उचित समय है इसलिए पीठ की निर्जनता पर ठीक मध्य में बहती नदी में उनको भावना देकर शुद्ध किया जा रहा है ये जन्म जन्मान्तरों के जख्मों पर मरहम पट्टी करने जैसा द्विपक्षीय अनुभव कहा जा सकता है।

काया के असंख्य रुष्ट रोमकूपों ने सन्धि के प्रस्ताव पर आह्लादित होकर मौन को तिरोहित कर दिया है अब वो एकदूसरे की कुशलक्षेम पूछने को लेकर उत्साहित एवं आतुर प्रतीत हो रहे है ये सघन और शाश्वस्त अंतरग परिचय का एक शास्त्रीय सत्र जिसका विधान स्वयं प्रकृति के देवता ने दिगपालों की सम्मति से पंचाग में तिथि देखकर निर्धारित किया है।

अवचेतन के स्वप्न को अमूर्त वीथि से निकाल कर मूर्त अनुभूतियों के दिव्य स्नान के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है तमाम सहमतियों के बावजूद समय ने अपना विद्रोह जारी रखा हुआ है वो भागता है और हाँफते हुए हमारे कान में कहता मैं फिर दोबारा लौटकर नही आऊंगा।
इस बात पर पहले हंसा जा सकता है बाद में थोड़ा नाराज़ भी मगर फ़िलहाल समय को बोध से बाहर कर दिया गया है।

ये देहातीत ही नही कालातीत होने का समय है। ये लिंग और अनुभूतियों की वर्जनाओं का संधिकाल है। ये मूल अस्तित्व के नाभकीय संलयन का प्रथम चरण है जिसके बाद स्मृतियों की बंजर ज़मी से नवसृजन की कोंपले फूटेंगी उन्ही के सहारे यथार्थ की धूप में हम अपनी देह को भस्म होने से बचा सकेंगे।

'न भूतो: न भविष्यति'

Saturday, July 30, 2016

याद शहर

आज तीसरे पहर जब उन्ही रास्तों से लौट रहा हूँ जिन पर तुम साथ थी तो मैंने पाया मेरा गला रुंध रहा है जानता हूँ इस बात में कोई कलात्मक या साहित्यिक गुणवत्ता नही थी मगर इसमें ऐसी सच्चाई थी जिसने मुझे कई घंटो के लिए चुप कर दिया है।

इस चुप्पी में मैं तुमसे बात करता रहा वक्त का सबसे क्रूर पक्ष यह भी होता है आप उसे रिवाइंड करके नही सुन सकते हां उसे गर्दन नीची करके देखने की कोशिश कर सकते है क्योंकि इसके लिए खुद के ही दिल में बार बार झांकना होता है।

जिस खिड़की पर मै फिलहाल बैठा हूँ वहां से रास्ता उलटा दौड़ता नजर आ रहा है मै रास्ते की आँख में रात देखता हूँ रात की आँख में तुम्हारी इमेज बनाने लगता हूँ ये देख रास्ता मेरी तरफ पीठ कर लेता है  मैं उसकी दौड़ती पीठ पर अपनी पलकें झटक देता हूँ मगर कुछ बूंदों को हवा ले उड़ती है वो कहती है इसकी जरूरत तीन रंगों में बंटे बादलों को ज्यादा है जब कल सुबह शहर में बारिश होगी तो इनकी नमी अपने ठीक पते तक पहूंच जाएगी।

मैं बादलों की तरफ देखता हूँ तो यादों की मुस्कान एक आग्रह करती है मगर यकीन करों उदासी मेरे लबो पर ऐसी आ बैठी है मानो न जाने कौन से उधार का तकादा करने आई हो।

छूटते लम्हों की कतरन की तुरपाई करता हूँ और एक छोटा रुमाल बना लेता हूँ बहुत देर से उसी रुमाल को हाथ में लिए बैठा हूँ कभी कभी उसे अपने कानों के पास ले जाता हूँ वहां तुम्हारी हंसी अभी लिपगार्ड के साथ चाय पी रही है इसलिए कान को छूता नही हूँ।

अभी बूंदाबांदी शुरू हो गई है शायद बारिश मुझे थोड़ा और उदास देखना चाहती है वो खुद बादलों से लड़कर आई है ठंडी हवा मेरे माथे पर अपनी अनामिका से लिखती है बी हैप्पी ! मैं कहता हूँ हम्म !

सड़क पर पेड़ो को जब झुका देखता हूँ तब खुद की समझाईश सारे तर्क ध्वस्त हो जाते है मै फिर उलटे पाँव दौड़ने लगता हूँ मगर रास्ता मेरे नीचे से निकल गया है इसलिए अब जिस दिशा में मैं जा रहा हूँ वो मुझे कहां ले जाएगी ये कहना जरा मुश्किल होगा। शायद एक शहर या घर तक मै पहुँच जाऊं मगर मेरे मन को आने में अभी वक्त लगेगा वो जिद करके उतर गया है मुझे नही पता उसे क्या साधन मिलेगा मगर वो तुमसे मिलकर जरूर लौटेगा ऐसा मेरा भरोसा है।

तो क्या मैं तक यूं ही बेमन के रहूंगा? अभी यही सोच रहा हूँ सोचते सोचते जब थक जाता हूँ खिड़की से मुंह बाहर निकाल लेता हूँ और आँखे बंद करके विस्मय से मुस्कुरा देता हूँ।
फ़िलहाल विस्मय यादों और सफर में एक जंग छिड़ी है जो मुझे कतरा कतरा बिखेर रही है मुझे इस पर कोई ऐतराज़ नही इस तरह से भी खत्म हुआ जा सकता है।

किस्सों और हिस्सों की बीच मैं करवट लेता चाहता हूँ मगर बगल में तुम्हारी छाया आराम से सो रही है इसलिए मै समाधिस्थ हो गया हूँ बेशक ये उदासी की समाधि अच्छी नही है मगर फ़िलहाल यही बस मेरे इर्द गिर्द अपनेपन से मंडरा रही है इसलिए मैंने बाहें फैला दी है।

'उदासी: कुछ अधूरे किस्से'

Friday, July 1, 2016

मानसून

सुबह बादलों की राजाज्ञा लेकर मुझसे मिली।
बूंदों ने नींद से जगाया जरूर मगर उनकी आवाज़ लोरी के जैसी थी। बूंदों की जुम्बिश धरती को लेकर बेकरारी वाली नही दिख रही है कुछ मोटी और कुछ छोटी बूंदों के बीच आईस पाईस का खेल जरूर चल रहा है एक दिखती है तो दूसरी छिप जाती है।
इत्तेफ़ाकन थोड़ी हवा भी चल रही है इसलिए ठण्ड अब इसी के भरोसे घर में दाखिल होना चाहती है मगर घर की दीवारें सूरज के यहां गिरवी रखी हुई है इसलिए वो हवा से कहती है कुछ दिन यूं ही आती रहो एक दिन हम तुम्हें जरूर अपने सीने से लगाएंगी।
दूर कही से एक चिड़िया बोल रही है मेरा अनुमान है वो अपने बच्चों को घर ही रहनें की हिदायत दे रही है उसकी आवाज़ में दोहरी चिंता है एक अपने बच्चों को लेकर दूसरी आज के भोजन के प्रबन्ध को लेकर।
बारिश आती है तो मेरी चाय की तलब मुझे इस कदर घेर लेती है कि मेरा मन अलग उड़ान भरता है और तन कुछ अलग किस्म की मांगे रखना शुरू कर देता है।
मैंने अभी अभी तुम्हें याद किया है इसलिए नही कि बारिश है बल्कि इसलिए मुझे तुम्हारे हाथ की बनाई वो चाय याद आ गई जिसमें तुम चीनी डालना भूल गई थी ठीक आज की तरह उस दिन भी बारिश थी। आज मैंने जानकर फीकी चाय बनाई मगर अफ़सोस ये आज सच में फीकी लग रही है उस दिन नही लगी थी शायद इसलिए क्योंकि उसमें तुम्हारी हंसी की मिठास घुली थी।
इस कमरें में एक खिड़की है जब उसके सामनें खड़ा होता हूँ तो लगता है उम्रकैद का कैदी हूँ बाहर बूंदों को देखता तो मुझे मुहब्बत का हश्र याद आता है बादल देखता हूँ तो वक्त के सारे षड्यंत्र याद आते है फिर एक ठण्डी हवा का झोखा मेरे कान में आकर कहता है बी पॉजिटिव हालांकि मुझे इस जुमले से सख्त चिढ़ रही है मगर इसबार मैं चिढ़ता नही बल्कि कहता हूँ चलो मान लेता हूँ।
इसके बाद मैं बूंदों से कहता हूँ मेरी आँखों में जो आंसू सूख गए है उनको पिघला दो वो कहती है बारिश में रोते नही है फिर हम दोनों हंसने लगते है और कुछ गुनगुनाते भी है आखिर में बारिश मुझसे कहती है एक गीत मेरे लिए भी लिखना ताकि मैं तुम्हारे सहारे खुद एकाध गहरी मुलाकात कर सकूँ।
मैं हांमी जरूर भरता हूँ मगर मुझे पता नही कैसे लिख पाऊंगा वो गीत क्योंकि जिसके लिए कभी लिखा था उसकी खुद से मुलाकातें हुई  या नही ये तो नही पता मगर मुझसे मुलाकातें बिलकुल बंद हो गई उसके बाद।
बारिश का एक मतलब इंतजार भी है मेरे लिए ये बात मैंने बूंदों को नही बादलों को बताई है क्योंकि वो मेरे ज्ञात दोस्त और दुश्मन है।

'मानसून टॉक'

Wednesday, June 22, 2016

सम्वाद

दृश्य एक:

देवताल में यह ऋषि मार्तण्ड का आश्रम है।
यज्ञ धूम्र से वातावरण दिव्य सुगंधी से आप्लावित है। गौशाला में गाय भोर के स्वागत में आत्मातिरेक संतुष्ट हो एक लय में अपने कान हिला रही है। ऋषि पुत्र खरपतवारों के पुष्पों पर मोहित हो कौतुहलवश कुछ फूल तोड़कर अपनी माता को दिखातें है तथा उनके रंग एवं कुल की समस्त जानकारी चाहतें है। उनकी माता उनके इस अवांछित कर्म से पहले थोड़ी कुपित होने का अभिनय करती है फिर वो अपने पुत्रों की सरलता पर मुग्ध उनको वनस्पति तथा मनुष्य के सम्बन्ध पर एक सरस कोमल पाठ पढ़ाती है।

दृश्य दो:
आश्रय के निकट एक छोटी नदी कल-कल की ध्वनि में बह रही है। उसके अंदर जो छोटी शिलाएं है वो अपनी दिशा को लेकर आश्वस्त नही है वो शीघ्रता से किनारे का आश्रय चाहती है बड़ी शिलाएं उनके भाग्य की अनिश्चितता पर लेशमात्र भी चिंतित नही है। नदी का जल वेग के अधीन है मगर फिर भी छोटी शिलाओं को न्यूनतम चोट पहुँचाना चाहता है इसलिए वो छोटी कंकरों से कहता है कि उसको अधिकतम हिस्सों में विभाजित कर दें। बड़ी शिलाएं अपने हिस्से का एकांत ढो कर बूढ़ी हो चुकी है मगर उनके अभिमान में किंचित भी कमी नही है उनकी उदारता संदिग्ध है बावजूद इसके वो नीचे से टूटनी शुरू हो गई है।

दृश्य तीन:

मार्तण्ड ऋषि के प्रिय शिष्य वसन्त सुकुमार और ऋषि पुत्री प्रज्ञा में प्रेम को लेकर एक सार्वजनिक विमर्श चल रहा है। शास्त्र में रूचि रखने वाले अन्य शिष्य इसे व्यर्थ का विषय मानतें है इसलिए वो लगभग अरुचि से दोनों के तर्क सुन रहें है।

वसन्त सुकुमार कहता है ' प्रेम का उत्स मन है मगर इसकी यात्रा देह से गुजरती है। देह से विवर्ण होकर न प्रेम सम्भव है और न आराधना। प्रेम का विपर्य प्रायः घृणा समझा जाता है मगर यह पूर्णत: सच नही है प्रेम का कोई विपक्ष नही है यह एकल मार्ग है जो विपक्ष दिखतें है वो मात्र रास्ते के कुछ पड़ाव है जिन्हें कुछ प्रेमी लक्ष्य के रूप में रूपांतरित कर देते है।
प्रेम अनुराग की देहरी पर बैठा सांख्य सिद्ध पुरुष है जो आदि से समन्वय अभिलाषी है इसका विस्तार मुक्ति की सापेक्षिक चाह भर नही है बल्कि ये विस्तार के साथ अनन्त के शून्य में विलीन होने की यात्रा है।'

प्रज्ञा प्रतिवाद करती है और कहती है ' मन की यात्रा मन से आरम्भ होकर मन पर ही समाप्त होती है। मन को देह की इकाई नही है मगर ये देह को भौतिक अवस्था में स्तम्भित रखनें में समर्थ है। प्रेम दरअसल मनुष्य की नैसर्गिक आवश्यकता भर नही है यह प्रकृति का एक हस्तक्षेप है जो मनुष्य की संवेदना को परिमार्जित और परिष्कृत करनें के लिए अस्तित्व का एक सहयोगी उपक्रम है।
मैं प्रेम को प्रतिछाया के रूप में देखती हूँ मगर ये नियंत्रण से मुक्त है प्रारब्ध और नियति के हाथों ये शापित है अनुराग वर्जनीय नही मगर अनुराग को उसकी सही दशा और दिशा में समझनें के लिए प्राणी प्रायः त्रुटि कर बैठता इसलिए प्रेम मार्ग और लक्ष्य दोनों से च्युत होकर विभरम की ध्वनि देना लगता है।

दृश्य चार:
ऋषि पुत्र आसमान की तरफ देखकर वर्षा का अनुमान लगा रहे है उनके पास कुछ अनुमानित कथन है वो उसकी पुष्टि आश्रम के आचार्यो से चाहतें है मगर आचार्य कहते है प्रकृति के बारें में अनुमान विकसित करना शास्त्रोक्त नही है। केवल सिद्ध पुरुष मौन के बाद इस पर कुछ बोलने के अधिकारी है।वे उन्हें प्रतीक्षा के कुछ मौलिक सूत्र देते है जिन्हें सुन ऋषि पुत्र असंतुष्टि की हंसी हंसते है और अपनी अपनी भविष्यवाणी प्रकाशित कर देते है।

सूत्रधार:
प्रकृति,प्रेम,प्रतीक्षा तीनों पर भाष्यों की आयु बेहद सीमित है तीनों अनित्य है मगर उनकी नित्यता भी असंदिग्ध है।
जो ज्ञात है वही अज्ञात है और जो अज्ञात है उसको जानने के लिए मनुष्य व्याकुल है। ये व्याकुलता उसे मुखर बनाती है। जैसे बादलों के सहारे धरती करवट बदलती है जैसे नदियों के किनारे हर साल समन्दर के लिए गुप्तचरी करते है ठीक वैसे ही मनुष्य अपने लिए असंगतताओं का चयन करता है। ये चयन मनुष्य की सबसे बड़ी सुविधा है और यही सबसे बड़ी असुविधा।

(समाप्त)

©डॉ.अजित

Tuesday, June 21, 2016

सुबह

ये डेनमार्क की एक सुबह है।

सूरज अपने औसत क्षेत्रफल से डेढ़ गुना छोटा निकला है। खगोलशास्त्र के लिहाज़ से ये कोरा गल्प है मगर प्रार्थनाओं का मनोविज्ञान साफ तौर पर इसकी वजह जानता है। सुबह हर देश की लगभग एक जैसी ही होती है किसी भी देश के देर तक सोते हुए लोग हमेशा कुछ न कुछ खो देते है ये अलग बात है जो रात में देर से सोते है वो पहले से कुछ बेहद प्यारा सामान कहीं खो चुके होते है।

सुबह की अच्छी और खराब बात यही है कि ये समय से नही आती है सब अपनी सुबह के इंतजार में है। कुछ फूल बिना किसी के इंतजार में खिल गए है उन्हें बारिश का भी इंतजार नही है बारिश यहां की सबसे उपेक्षित चीज़ है मगर वो धरती के सहारे जब भी मिलनें आती है हमेशा धरती को रुला कर जाती है।

कुछ रास्तों के कान थोड़े बड़े है वो मुद्दत तक करवट नही लेते है मगर उन्हें बच्चें बूढें जवान सबके कदमों के निशाँ साफ तौर पर याद है। लोग गुजर जातें है फिर रास्तें उन कदमों के निशान को उठाकर अपने संग्रहालय में ले जातें वहां किस्म किस्म के लोग यूं ही बेजान टंगे है रास्तों के पास हंसने का केवल एक ही विषय है वो उन लोगो के बारें में अनुमान लगाते है जो लौटकर नही आतें।

पार्क में कुछ बुजुर्ग बातें कर रहें है मगर मजे की बात ये है उन बातों में किसी की कोई दिलचस्पी नही है खुद उन बुजुर्गों की भी नही एक आदमी के पास अतीत की बातें है तो एक के पास भविष्य की चिंता दो आदमी ऐसे है जिनके पास केवल सहमति है उनके पास कोई विचार नही है वो मुग्ध भी नही है मगर फिर अचानक से एक खड़ा होता है और एक पेड़ की तरफ इशारा करता है और कहता है कोई बता सकता है ये पिछले जन्म में कहाँ पैदा हुआ था इस बात पर सब हंस पड़ते है इस तरह से सुबह के हिस्से में पहली बूढ़ी हंसी आती है।

एक बच्चा रो रहा है ऐसा लग रहा है उसका ईश्वर से सीधा संवाद हो रहा है। एक बच्चा हंस रहा है उसे देख सुबह अपनी यात्रा की थकान भूल गई है। धूप है मगर ठण्ड अनुपस्थित नही है फिर भी लोग धूप का आदर करतें है मगर वो चाहती है लोग उससे प्यार करें।

और मैं इस वक्त उपग्रह की तरह अपनी कक्षा के चक्कर काट रहा हूँ ताकि कुछ पूर्वानुमान भेज सकूं मेरी मदद से सुबह यह तय करेगी कि उसे धरती के किस हिस्से से प्यार करना है और किससे बातचीत कुछ दिन के लिए बंद रखनी है।

'ओ रे यायावर'

Sunday, June 19, 2016

खत: नंदिता दास

डियर नंदिता दास,
मन के ऊष्णकटिबंधीय मौसम पर खड़ा सोच रहा हूँ इस खत को शुरू कहाँ से करूँ?
ख्याल इस कदर आपसे में गुथे है कि एक का सिरा पकड़ता हूँ तो दूसरा छूट जाता है।

तुम्हें कुछ कहने के लिए धरती के सबसे उपेक्षित टुकड़े पर मैं समाधिस्थ बैठा हूँ यह लगभग प्रार्थना के क्षणों के जैसा है या फिर मन के सूखे निर्जन रेगिस्तान में एक आवारा बदली के टुकड़ी के इंतजार में आसमान की तरफ देखनें जैसा भी इसे समझा जा सकता है।

तुम्हें कुछ कहने से पहले किसी मांत्रिक की तरह मेरे होंठ कंपकपा जाते है। तुम्हारे अस्तित्व का सम्मोहन सीधे मेरी सोई हुई रूह के बालों में  कंघी कर उसके हाथ में एक पतंग थमा जाता है फिर वो बिना के डोर के आसमान में आवारा उड़ती फिरती है।

खूबसूरती की जिस दुनिया में गोरे लोगो का कब्जा था वहां तुम्हारे सांवलेपन ने एक ऐसा समयोचित हस्तक्षेप किया किया तुम्हारे कारण सांवले लोग खुद से प्यार करना सीख गए। तुम्हारा होना उनकी आँखों में आत्मविश्वास का होना है। तुमनें बताया यदि खुद पर भरोसा किया जाए तो दुनिया की हर स्थापित मान्यता को बेहद अकेला किया जा सकता है।

तुम्हारे अस्तित्व का सम्मोहन इतना गहरा है कि मैं निर्बाध इस पर बोलता रह सकता हूँ और उतनी ही सघनता के साथ तुम्हें देख मुद्दत तक मौन रह सकता हूँ। ये एक बड़ी दुलर्भ सी बात है।

तुम हंसती हो तो लगता है दिन में सूरज के आतंक के बीच भी कुछ सितारे बादलों को हटा धरती को देखनें चले आए हो। तुम्हारे अस्तित्व को देखने के लिए उपग्रह की तरह सतत् यात्रा में रहना पड़ता है तभी तुम्हें पूर्णता के कुछ अंशो में देखा जा सकता है। जब चेतना की ऊंचाई से तुम्हें देखता हूँ तो तुम्हारा कद और भूमिका बेहद व्यापाक पाता हूँ मानो धरती के दो ध्रुवों के मध्य तुम्हारे अस्तित्व का एक पुल बना हो एक तरफ हारे हुए लोग हो और दूसरी तरफ जीत से मायूस बैठे लोग।

मैं यदा कदा असंगत कविताएँ लिखनें वाला एक अकवि हूँ मगर तुम्हें देखता हूँ तो सम्वेदना के न जानें कितने अमूर्त प्रतीक और बिम्ब मुझे बताते है कि तुम्हारे व्यक्तित्व की अनगिनत ढंग से टीकाएं की जा सकती है।

तुमनें देह को वर्ण से मुक्त नही किया बल्कि देह को इस वर्ण के साथ अभिमान के साथ रहने का कौशल सिखाया है तुम्हें देख न जानें कितने लोग सन्तोष की रोटी आत्मविश्वास की चटनी के साथ सार्वजनिक तौर पर खा सकते हैं।
एक इंटरव्यू में मैंने तुम्हारा काजल ध्यान से देखा तो पाया कि यह कुछ कुछ वैसा है जैसे ईश्वर ने धरती की सबसे उपेक्षित झीलों की अपनी चूल्हें के कोयलें से मेढ़बंदी कर दी हो ताकि वो आपस में मिलें बिना भी सहजता से रह सकें और उनका जलस्तर बचा रहें।

तुम्हारी आँखें निरुपाय मनुष्य को बताती है कि दुःख उतनी भी व्यक्तिगत चीज़ नही है जितना इसे समझ लिया जाता है तुम्हारी पलकों पर दुनिया के उस हिस्से का पता लिखा है जहां दुनिया के सताए हुए लोग एक दूसरे के ज़ख्मो की मरहम पट्टी करते है और कोई अहसान भी नही जताते।

तुम्हारी ऊँगलिया अपेक्षाकृत लम्बी है मानो ईश्वर ने इन्हें आसमान के बालों में कंघी करने के लिए बनाया हो तुम्हारे नाखूनों की कलात्मक बुनावट मेसोपोटामिया के छोटे पहाड़ी टीलों के जैसी है जहां से छलांग लगा कर सभ्यता के विकास का पूरा पाठ बहते हुए पढ़ा जा सकता है।

परम्परा के लिहाज़ से तुम उस मिट्टी से आती हो जो इंसान को छूकर उसे उसकी समस्त कमजोरियों के बावजूद देवता बना देती है मगर मैं देवता बननें का अभिलाषी नही हूँ देवत्व के ग्लैमर से कई गुना बड़ा परिचय यह है कि मैं नन्दिता दास को थोडा बहुत जानता हूँ थोड़ा बहुत इसलिए कहा क्योंकि तमाम प्रज्ञा तन्त्र के बावजूद तुम्हें पूर्णता में जान पाना मेरे सामर्थ्य से परे की बात है।

जहां तक मेरी जानकारी है तुम ज्यादा लम्बे बाल नही रखती हो यदि लम्बे रखती तो और अच्छा होता इसलिए नही कि मुझे लम्बे बाल पसन्द है बल्कि इसलिए फिर तुम्हारी छाया में अधिक लोग प्राश्रय पा सकतें है।फिलहाल जो तुम्हारे बाल है वो महज तुम्हारे बाल नही है बल्कि असमर्थताओं के पहाड़ की पीठ पर बादलों की आवश्यक छाया है ताकि सृष्टि के अंत के समय जीने लायक कुछ वनस्पतियां संरक्षित बच सके और जिंदगी की क्रूरता को थोड़ी दिन के लिए स्थगित किया जा सके। बहुत मतलबी होकर सोचने लगता हूँ तो तुम्हारे बाल मुझे उच्च हिमालय की तलहटी के कुछ छोटे छोटे अज्ञात जंगल लगनें लगते है जिनकी छाया में सुना है सिद्ध लोग समाधिस्थ है। दुनियावी झंझटो से निबटकर एकदिन उसी जंगल में सुस्ताने की कामना मन में लिए मुद्दत से मैं धरती पर भटक रहा हूँ।

मुझे उम्मीद है एक दिन तुम्हारी हंसी की बारिश में मौसम को चिढ़ाते हुए एक निर्जन पगडंडी पर मैं दिल की सिम्फनी बजाते हुए बहुत दूर निकल जाऊँगा तब ये खत एक वसीयत की तरह मेरे चाहनें वाले लोग पढ़ेंगे।

दुनिया की तमाम उम्मीदों के बावजूद मुझे बात की कतई उम्मीद नही कि एकदिन तुमसे मेरी मुलाकात होगी इंफैक्ट मैं चाहता भी नही तुमसे कभी मुलाकात हो मैं बस यूं ही दूर से तुमसे देखतें हुए दिन को ढलतें हुए देखना चाहता हूँ और इस तरह तुम्हें देखना ठीक वैसा है जैसे समन्दर के सफर में किसी अकेले मुसाफिर को शाम हो जाए।

किसी मोड़ पर यूं ही फिर मुलाकात होगी और हां!अंत में एक बात कहकर विदा लेता हूँ
तुम्हारी मुस्कान तुम्हारी हंसी से ज्यादा खूबसूरत है।

तुम्हारा
एक ईमानदार दर्शक

खत:निमरत कौर

डियर निमरत कौर,
उम्र में तुम शायद कुछेक साल मुझसे बड़ी हो फिर भी तुम ही कह कर सम्बोधित कर रहा हूँ। वजह ये नही कि मैं आयुबोध को मिटाना चाहता हूँ,बल्कि इसकी वजह ये है कि 'लंचबॉक्स' में तुम्हारी बातों ने मुझे बताया कि जीवन औपचारिकताओं के साथ बाँध लेना बुद्धिमानी नही है।जीवन तो हिस्सों में बटा होता है और खुशियों का कोई तयशुदा पता नही होता है वो संयोग से जीवन में दाखिल होती है बशर्ते हमनें एक खिड़की उम्मीद की खुली छोड़ रखी हो।

तुम्हारी फ़िल्म 'लंचबॉक्स' देखें मुझे अरसा बीत गया है मगर ये फ़िल्म मेरी दुनिया से बीत नही पाई तुम्हारी अति साधारण घरेलू छवि की एक प्रतिलिपि मैंने हमेशा अपनी बाई जेब में रखी उसका बाहर की दुनिया में मिलान किया मगर हुबहू तुम्हारे जैसा कोई नही मिला। खुशियों के लिहाज़ से तुम भूटान जाना चाहती थी और अपने दुखों के हिसाब से मुझे लगा तुम्हारा पड़ौसी बन जाऊँगा तो मेरी तकलीफे भी कुछ कम हो जाएगी मगर तुम बिना पता बताए ही निकल गई। मैं तब से भूटान का नक्शा अपने तकिए नीचे रख कर सोता हूँ मगर अफ़सोस आजतक एक भी ख़्वाब तुम्हारे देश का नही आया।

फ़िल्म तो बहुत से लोगो ने देखी और तुम केवल उसमें अपना किरदार निभा रही थी ये बात भी सभी जानतें है मगर मैंने तुम्हें जब पहली बार इस फ़िल्म में देखा तो मेरे मन में पहला ख्याल ये आया कि रसोई के छौंक में एक स्त्री के मन की कुछ परतें भी भांप बन रोज़ उड़ती है तुम्हारे जरिए मैं गले में लटके मंगलसूत्र की यन्त्र विधान की दृष्टि से विवेचना कर पाया छोटे काले दानों की माला के मध्य स्वर्ण जड़ित पैंडिल स्त्री को स्तंभित रखने का एक शास्त्रोक्त यन्त्र मंगलसूत्र है ये बड़ी पवित्र किस्म की सनातनी चालाकी है ये बात मैं  तुम्हें देखने के बाद ही जान पाया।

स्त्री सवाल न करें बल्कि अपने ध्येय पर अड़िग बनी रहे ये तो बरसों की कंडीशनिंग का हिस्सा रहा है मगर तुमनें बिना ख़ास कोशिशों के अपनी इच्छाओं का सम्मान करने के छोटे छोटे नुक्ते भी जरूर बताए। टिफिन बॉक्स में रखी छोटी छोटी पर्चियां कोई प्रेम पत्र नही थे दरअसल वो अस्तित्व के वो छोटे छोटे सूत्र थे जिन्हें कभी कामनाओं तो कभी वर्जनाओं के दबाव के चलतें किसी ने भाष्य के लिए उपयुक्त नही समझा था जबकि वो जीवन की मनोवैज्ञानिक सच्चाई और सेल्फ के विस्तार के बड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ थे।

कुल जमा एक फ़िल्म और एक डेयरी मिल्क चॉकलेट के विज्ञापन में तुम्हें देखा है मगर सच कहूँ डेयरी मिल्क के विज्ञापन तक मैंने तुम्हें नोटिस नही किया था और न ही तुम्हारा नाम जानता था मगर लंचबॉक्स देखनें के बाद सबसे पहले मैंने गूगल करके तुम्हारा नाम पता किया।

निमरत की ध्वनि अमृत से मिलती है जानता हूँ भाषाविज्ञानी मेरी इस धारणा से सहमत नही होंगे उनके हिसाब से तुम्हारे नाम का अर्थ अलग होगा मगर मुझे तुम्हारा अस्तित्व अमृत के जैसा ही लगता है हो सकता है निजी जिंदगी में तुम बिलकुल अलहदा हो मगर लंचबॉक्स के इस किरदार में तुम्हारा अस्त व्यस्त और हमेशा थोड़े तनाव में रहनें वाला नाखुश सा चेहरा ठीक वैसा लगता है जैसे किसी मन्दिर के कपाट बिना पंचाग में महूर्त देखे खोल दिए हो और ईश्वर भक्तों की न शक्ल देखना चाहता हो और न उनकी आवाज़ सुनना चाहता हो या फिर जिस तरह से दो कोयल जंगल में कूक उठाने की प्रतिस्पर्धा में स्वर की जिद पर उतर आती है और अंत में एक थक कर चुप हो जाती है तुम मुझे ऐसे ही थकी हुई एक कोयल भी लगी हो।

इस फ़िल्म में बिन चुन्नी जब तुम सब्जी काटती हो तो लगता है अनन्यमयस्कताओं की कतर ब्योंत कर रही हो उनकी सद्गति का पुख्ता इंतजाम तुम्हें पता है। एक अमूर्त आलम्बन ध्वनि और शब्दों के जरिए तुमनें जिया और सम्बन्धों का पुनर्पाठ बहुत से शापित लोगो को करवा गई इस बात के लिए कम से कम व्यक्तिगत रूप से मैं तो तुम्हारा कृतज्ञ हूँ।

बहरहाल,फ़िल्म में तो तुम भूटान चली गई थी और इरफ़ान यही अटक गए थे हकीकत में इरफ़ान तुमसे कभी भी मिल सकते है मैं शायद ही कभी मिल पाऊंगा और अगर कभी मिला भी तो इन सब बातों का वो वाचिक अर्थ नही बचेगा जो अब मैं लिखकर बताना चाहता हूँ इसलिए अंत में शुक्रिया कहूँगा इस बात के लिए कि तुम्हारे लंचबॉक्स ने मेरे जैसे चटोरे आदमी को खाने से ज्यादा पढ़ना सीखा दिया है अब मैं खत ही नही चेहरा भी पढ़ता हूँ और निसंदेह इसकी बड़ी वजह तुम्हारा चेहरा भी है जिस पर साफ साफ़ लिखा था खुशियों का एक सिरा संयोग से भी जुड़ा होता है और संयोग उम्मीद बचाने के काम आता है। जहां तक मन के खत का सवाल है क्या पता कब गलत पते पर एक सही खत पहूंच जाए।

आदतन खत लम्बा हो गया है उम्मीद है आगे कभी बात होगी तो तुम्हारे लंचबॉक्स की पर्चियों की तरह होगी तुम जीवन में विस्तार पाओं मैं तब तक सिमटने का हुनर सीख कर आता हूँ।

तुम्हारा
एक ईमानदार दर्शक


जिन दिनों...

जिन दिनों फेसबुक पर नही था मैं
याद कर रहा था
अपनी तमाम बदतमीजियां
जो की थी कभी फेसबुक पर
मसलन
इनबॉक्स में बेवजह बिफर जाना
खुद को बहुत आदर्शवादी दिखाना
रिक्वेस्ट न भेजना
न एड करते जाना

किसी से नम्बर मांग लेना
किसी के पवित्र आग्रह पर
इनकार कर देना
जिसको नम्बर दिया
उसका फोन न उठाना

जहां जहां ईगो हुआ घायल
तर्को की मदद से बहस को विषयांतर की तरफ ले जाना
विपक्ष को लगभग निःशस्त्र करने जैसी जिद पर उतर आना

जिन दिनों फेसबुक पर नही था मैं
याद कर रहा था तमाम बेवकूफ़िया
जैसे शराब पीकर ऑनलाईन आ जाना
पव्वे से लेकर बियर बार तक तस्वीरें चिपकाना
फिर कुछ दोस्तों से लड़खड़ाती जबान में बतियाना
भावुक होकर इमोशनल कमेंट लिख जाना
फिर सुबह उठकर पछताना

उन दिनों
याद तो मुझे मेरी बेढंगी सेल्फ़ी भी बहुत आयी
खीझ की हद तक
दोस्तों को खुद की तस्वीरों से पकाना
आत्ममुग्धता को भी एक क्वालिटी बताना

रिपोस्ट के जरिए दोस्तों की याददाश्त आजमाना
पूछनें पर मुकर जाना
कमेंट के इंतजार में रातें बिताना
टच स्क्रीन का गर्म हो जाना
बेट्री एक प्रतिशत रहनें पर
घनिष्ठ दोस्त का इनबॉक्स में आना

जिन दिनों फेसबुक पर नही था मैं
याद कर रहा था
वो तमाम बातें जिनके साथ
फेसबुक पर था मैं।
© डॉ.अजित

Friday, June 17, 2016

नदी खत

तुम एक पहाड़ थे मेरे लिए।
जिसकी पीठ से लिपट मुझे थोड़ी देर सिसकना था। इन सिसकियों में कुछ ठण्डी आहें शामिल थी जिन्हें आंसूओं से गर्म करना था ताकि वे चाहतों के समन्दर में गिरने से पहले ही उड़ जाए।
मैं आंसूओं को बादल बनाना चाहती थी उसके लिए मैंने तुम्हारी पीठ चुनी तुम मेरे जीवन के पहले वो शख्स थे जिसकी रीढ़ की हड्डी झुकी हुई नही थी इसलिए मन में कहीं एक गहरी आश्वस्ति थी कि तुम्हारे आलम्बन से मेरी गति पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा तुम्हारा पास अपेक्षाओं का शुष्क जंगल भी नही था इसलिए मैंने मन के अरण्य की कतर ब्योंत कर एक साफ रास्ता तुम तलक आनें का बनाया।
अमूमन पीठ का आलम्बन पलायन की ध्वनि देता है या फिर इसमें किसी को रोके जाने का आग्रह शामिल हुआ दिखता है मगर तुम्हारे साथ दोनों बातें नही थी।
तुम्हारी पीठ चट्टान की तरह दृढ़ मगर ग्लेशियर की तरह ठण्डी थी मेरे कान के पहले स्पृश ने ये साफ तौर पर जान लिया था कि तुम्हारे अंदर की दुनिया बेहद साफ़ सुथरी किस्म की है वहां राग के झूले नही पड़े थे वहां बस कुछ विभाजन थे और उन विभाजन के जरिए अलग अलग हिस्सों में तनाव,ख़ुशी और तटस्थता को एक साथ देखा जा सकता था।
तुम्हारे अंदर दाखिल होते वक्त मुझे पता चला कि जीवन में प्लस और माइनस के अलावा भी एक चुम्बकीय क्षेत्र होता है जिसकी सघनता में दिशाबोध तय करना सबसे मुश्किल काम होता है तुमसे जुड़कर मैं समय का बोध भूल गई थी संयोगवश ऊर्जा का एक ऐसा परिपथ बना कि यात्रा युगबोध से मुक्त हो गई निसन्देह वो कुछ पल मेरे जीवन के सबसे अधिक चैतन्य क्षण है जिनमें मैं पूरी तरह होश में थी।
तुम पहाड़ थे तो मैं एक आवारा नदी मुझे शिखर से नीचे उतरना ही था सो एकदिन
बिना इच्छा के भी मैं घाटी में उतर आई मगर मगर मेरी नमी अभी भी तुम्हारी पीठ पर टंगी है इनदिनों जब मैं यादों की गर्मी में झुलस कर एकदम शुष्क हो गई हूँ तो मैं चाहती हूँ तुम मेरी नमी को बारिशों के हाथों भेज दो मैं रोज़ बादलों से तुम्हारे खत के बारें में पूछती हूँ इस दौर के बादल बड़े मसखरे है वो कहते है उनके पास बिन पते की चिट्ठियां है उनमें से खुद का खत छाँट लो! अब तुम्ही बताओं जब तुम्हारी लिखावट पलकों के ऊपर दर्ज है मैं कैसे पता करूँ कि कौन सा खत मेरे लिए है?

'पहाड़ नदी और खत'

Tuesday, May 31, 2016

विदा

प्यास जब बहुत उत्कट किस्म की होती है तब पानी को रास्ते से गुजरता हम देख पातें है। स्वाद की ग्रन्थियां तब क्षणिक रूप से आँखें बन जाती है।
भूख में इसके ठीक उलट हो जाता है हमें दिखना बंद हो जाता है और महसूस करना शुरू देते है,तब तरल जल भी चुभता हुआ मंजिल तक पहुँचता है।
दूरी उतनी जरूरी होती है जितने में दिखता भी रहे और चीजो का नजदीक आनें का भरम भी बचा रहे।
मगर जरूरत कई दफा अपने ही ढंग से परिभाषित होती है जब बातों के दो सिरे नही जोड़ पाते तो द्वैत को जीने लगते है।
दरअसल, हिस्से में कई बार एकांत आना चाहता है वो प्रतिक्षा करता करता बूढ़ा हो रहा होता है फिर एकदिन वो देह छोड़ देता और उसकी आत्मा मोक्ष की कामना मे हमारे इर्द गिर्द चक्कर काटने लगती है।
निर्वासन एक घोषणा है या फिर एक सुविधा इस पर इतने अलग अलग किस्म के भाष्य है कि सम्बोधि के घटित होने से पहले वो बहुधा कुप्रचारित हो जाती है।
राग की एक अपनी अलग दुनिया है वो हमारे चेहरे को इतने हिस्सों में बांट देती है कि फिर मन और चेतना दोनों अपनी अधिकतम उड़ान पर उड़ते है दोनों के अंतिम अरण्य अभी अज्ञात है इसलिए वो निकटतम टापूओं के मानचित्र अपने पंजो में दबाकर लौट आते है।
मनुष्य भीड़ क्यों चाहता है या फिर मनुष्य अकेलापन क्यों चाहता है इन दो प्रश्नों से अधिक जरूरी है मनुष्य की चाह पर अपूर्णता का बोध कब तक टिका रह सकता है?
स्नेह अनुबंधन और जुड़ाव की त्रयी के ठीक मध्य एक त्राटक का बिन्दू है जिस पर जैसे ही नजर जमती है एक दरवाज़ा अंदर की तरफ खुलता और एक बाहर की तरफ वहां कुछ ही क्षण में निर्णय करते हुए आगे या पीछे हटना होता है निर्णय एक घटना नही बल्कि एक प्रतिक्रिया है इसलिए उसकी विश्वसनीयता कुछ अंशो में हमेशा संदिग्ध रहती है। कुछ आत्मप्रवंचनाएं इसलिए भी हमेशा अनाथ रहती है।
आना जाना और फिर आना ये आवागमन के तीन रास्तें ही नही बल्कि काल के तीन संस्करण भी है तीनों को पढ़ते हुए विमर्श में नही उलझना चाहिए बल्कि उनसे गुजरकर उसी एकांत के टीले पर बैठ सुस्ताते हुए मुस्कुराना चाहिए जो मन के मानचित्र में सबसे उपेक्षित पड़ा था।

पुरोवाक् के बाद लोक की चार पंक्तियों में लौटता हूँ न जाने किसनें किस के लिए लिखी थी मगर जिसनें भी लिखी थी ठीक वैसे ही लिखी होगी जैसे आरती के बाद शंख बजता है फिर घण्टी की शान्ति के साथ प्रसाद दिया जाता है।
अहसासों की धूप में आश्वस्ति की इलायची और स्नेह की मिश्री अपने सभी चाहनें के मध्य बांटता हूँ और पहले मासपरायण विश्राम के लिए तन मन के गर्भ ग्रह में लौटता हूँ।

"किसी के आनें से न जानें से जिंदगी रुकी है कभी
माना कि मेरा जाना भी तय हुआ है अभी
फिर भी इस कदर तुम्हारी बेकरारी रुला देती है
मेरे बाद भी तुम्हें हंसना है जिंदगी सब सिखा देती है।"

सादर, सस्नेह
डॉ.अजित
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ताकि सनद रहें:

याद करना या याद आना जिनके लिए मजबूरी है वो जून की तपन में कुछ गीले खत इसे पते पर रवाना कर सकते है उम्मीद भर है वो रास्तें में सूख जाएंगे मगर उनकी स्याही पर टिके स्पर्शों से मैं धरती और चाँद के बीच एक समकोण देखूँगा जिससे कूदकर चोट न लगती हो और दूरी भी तय हो जाती हो।अक्षरों की बुनावट में मित्रता के बेड़े को अकेला खोल समन्दर की एक लम्बी यात्रा पर निकल जाऊँगा। न कोई आग्रह न कोई निवेदन न कोई अपेक्षा मात्र खुद को परखनें का इम्तिहान बना रहा हूँ जिसके जवाब देकर मुझे सवाल लिखनें है।

खोज खबर का डाकिया पता:

डॉ.अजित सिंह तोमर
ग्राम+पत्रालय- हथछोया
जनपद- शामली
247778, उत्तर प्रदेश।

Friday, May 27, 2016

आवारा मन

यूरोप के एक बूढ़े शहर का सबसे पुराना चर्च है। पादरी अब सुबह शाम नही दोपहर को आता है। उसके हाथ में बाईबिल नही किसी बच्चे की पोयम्स की एक बुक है।
चर्च की घण्टी अब ईको नही करती है उसकी ध्वनि एकदिशा में आगे बढ़ती है मगर लौटती नही है। चर्च के बाहर एक छोटा लॉन है वहां बर्फ के नवजात शिशु घास के साथ नींद का अभ्यास कर रहें है हवा की लोरी उन्हें सुलाती है तो कुछेक घण्टों की धूप उनकी पीठ पर मालिश करती है।
जीसस अंदर बेहद अकेले है वो तस्वीर से निकल कर चर्च के पीछे बने कब्रिस्तान में सोई चेतनाओं को देखनें निकल गए है रोज़ रात वहां पाप पुण्य और अपराधबोध का उत्सव होता है।
चर्च की पियानों की कुछ कड़ियां ढीली हो गई है वो सूर को बीच में ही आवारा छोड़ देती है फिर प्रार्थना का पूरा ट्रेक आउट ऑफ़ ऑर्डर हो जाता है ये सुनकर मोमबत्तियां हंसते हंसते बुझ जाती है।
चर्च के अहाते में एक बूढ़ी औरत रोज़ शाम आती है वो जीसस को दिल खोलकर अपनी गलतियां बतानी चाहती है मगर वो अंदर नही जाना चाहती वो चाहती है जीसस उसके पास आकर बैठे और वो एक उदास गीत गाए और अंत में जोर से हंस पड़े वो चाहती है ईश्वर का पुत्र उसके आंसूओं को चखकर उन्हें सृष्टि का दिव्य पेय घोषित कर दें।
चर्च का वास्तु थोड़ा रहस्यमयी है उसकी दीवारें थोड़ी टेढ़ी हो गई है वो देखती है कि कुछ नव युगल दम्पत्ति प्रेम को बरकरार रखनें में असफल रहें ये सोच कर वो उदास हो जाती है वो चर्च के रोशनदानों से कहती है विवाह दुनिया की सबसे झूठी संस्था है।
चर्च अब थक गया है वो थोड़ी देर उकड़ू बैठना चाहता है मगर जैसे ही मनुष्य को मजबूर देखता है वो अपने आराम करने का विचार बदल देता है।
एक बूके चर्च में रखा है उसके फूल ताज़ा है मगर उनकी टहनी सूख गई है फूल की खुशबू कन्फेशन करना चाहती है कि उसका कौमार्य उसनें भंग किया जिसको वो बिलकुल प्रेम नही करती थी चर्च मना कर देता है तो वो टूटकर बिखर जाती है।
यूरोप के बूढ़े शहर का यह एक बूढ़ा चर्च है मगर इसकी अंदरुनी दुनिया अभी भी बेहद जवान है।

'आवारा मन'

परिभाषाऐं

पहाड़ का अर्थ होता है ऐसी असीम ऊंचाई जहां से दुनिया दिखनी बंद हो जाए और खुद का सही कद पता चले।
नदी का अर्थ होता है धरती पर बिछी एक खण्डित रेखा जिसको हिस्सों में तरलता का सुख दुःख छिपा होता है।
झरनें का अर्थ होता सतह से हटकर जीना और अपनी नमी को बचाए रखना बोझ का तिरस्कार इसी नमी का पुरस्कार होता है।
समन्दर का अर्थ होता है गहराई के बावजूद ऐसा धीमा शोर करना कि कोई भी दुनियावी शख्स हमेशा के दुनिया को भूल जाए।
जंगल का अर्थ होता है एक बिछड़ा हुआ कुनबा जो अलग अलग हिस्सों में अपने कुल के अभिमान में तना रहता है।
हवा का अर्थ होता है आवारगी का एक ऐसा गुमशुदा चस्का जो कभी दुनिया की हकीकत जानने के बावजूद दिल बहलाने का हुनर सीख जाना।
मनुष्य का अर्थ होता है भटकना कभी किसी के भरोसे कभी किसी के जो मंजिल पा जाते है मनुष्य उन्हें ईश्वर घोषित कर देता है।

'परिभाषा की भाषा'

Thursday, May 26, 2016

दर्द की दुनिया

दर्द एक क्षेपक है। कुछ कुछ अर्थों में सूत्रधार भी हो सकता है। दर्द चैतन्यता की सबसे निकटतम परीक्षा है या फिर दर्द सापेक्ष और निरपेक्ष के मध्य टंगा दही का कटोरा है जिसका गुणधर्म दिन और रात में बदल जाता है। दर्द के साथ रहकर देह की याद आती है मगर दर्द के बाद हम पहली चिट्ठी उस मन के मीत को लिखतें है जिसें मीलों दूर भी हमारे दर्द से दर्द होता है इस तरह से देखा जाए तो दर्द बेतार का एक तार है जो बेहद कम शब्दों में लिखना होता है बस एक अदद पता सही होना चाहिए।
दो दिन से मेरी गर्दन में दर्द है इससे पहले मैंने अपनी गर्दन को कभी ध्यान से नही देखा अपनी गर्दन को देखनें की मेरी अधिकतम स्मृति नाई की दुकान की है मगर अब मैं अपनी प्रेमिका के बालों की तरह इसकी सतह पर उंगलियो से कंघी करता हूँ निसन्देह ये बात गर्दन को अच्छी ही लगती होगी तभी वो इश्क की तरह अकड़ कर  सीधी हो गई है वो मेरी दृष्टि में एकाधिकार चाह रही है नही चाहती उसके द्वारा घोषित कोण से इतर कुछ भी देखूँ। मैं देखना चाहता हूँ तो गर्दन दर्द के पहरेदार को हुक्म देती है और कहती है इसकी आह का एक परवाना तैयार करों और उसे पीठ पर कील से टांक दो जब करवट बदलता हूँ तो दर्द के उस परवाने के भिन्न भिन्न ध्वनियाँ निकलती है ये बात मेरी गर्दन तकिए को बताती है और कहती है इसके लिए बेहतर यही है सीधा रहा जाए।
गर्दन मेरी खुद की है इसलिए यह नही कह सकता कि मेरी दुश्मन है मगर उसने दर्द का एक अजीब सा मानचित्र खिंचा है उसनें दर्द की रियासत के लिए मेरी पीठ के एक हिस्से को बिना उसकी इच्छा के अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया जबकि मेरी पीठ मुझसे आजतक बेहद संतुष्ट रही है उसे लगता था मैंने चरम दुःख में भी उसको सामनें नही किया बल्कि आकाश से दुःख भी अपनी छाती पर सहता रहा।
अब गर्दन ने मांसपेशियों का एक ऐसा समूह तैयार कर लिया है जो वास्तव में स्वपीड़ा में आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है दर्द की रियासत की सीमाओं पर आजकल बाड़बंदी का काम चल रहा है मैं जब अपना हाथ पीठ पर ले जाता हूँ तो मुझे ताप महसूस होता है मानों अंदर कोई बरसों से संतृप्त ज्वालामुखी अब धीरे धीरे सक्रिय हो गया हो और लावे की एक नदी गर्दन से लेकर पीठ के एक हिस्से में बह रही हो।
जब जब करवट बदलता हूँ या गर्दन की स्वेच्छाचारिता को लेकर आदेशात्मक होने की कोशिश करता हूँ दर्द मुझे घनी नींद से भी जगा देता है मैं कराहता हूँ तो तकिया मेरी मदद करना चाहता है मगर उसकी अपनी भौतिक सीमाएं है फिर भी वो मुझसे कहता है कुछ दिन गर्दन को बिना सहारे बिस्तर पर पड़ा रहने देने चाहिए तब शायद इसकी कुछ अकड़ कम होगी। तकिए और डॉक्टर की सलाह लगभग एक जैसी है इसलिए मैं मान लेता हूँ मगर आदतन मेरा हाथ गर्दन के नीचे टिक जाता है गर्दन के मन में मेरी पूर्व की ज्यादतियों को देखतें हुए मेरे प्रति कोई राहत या करूणा नही उपजती है न वह मेरे हाथ के प्रति कोई कृतज्ञता महसूस करती है।
इस दर्द ने मेरे मन और तन की लोच को बेहद जटिल और स्थिर कर दिया है ये चाहता है कि मैं दर्द के इस विस्तार को सघनता से महसूस करूँ और अपनी तमाम लापरवाहियों के लिए शर्मिंदा भी महसूस करूँ जबकि सच बात ये है मैंने कुछ भी जानबूझकर नही किया मुझे नही पता था एकटक मोबाइल स्क्रीन पर देखना या तकिए को मोड़कर गर्दन के नीचे लगाना गर्दन को इतना नागवार गुजरेगा कि वो एकदिन मुझे स्थैतिक करके अपने सारे बदलें लेगी।
बहरहाल, दर्द ने मुझे अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील और चैतन्य बनाया है इसलिए मैं कोई शिकायत नही कर रहा हूँ मगर अपने देह के एक हिस्से पर देखते ही देखतें एक विद्रोह की दुनिया का खड़ा हो जाना निसन्देह मेरे लिए कोई प्रिय अनुभव नही है।
मैं मुक्ति चाहता हूँ देह के षडयंत्रो से।भले ही मिट्टी को एकदिन मिट्टी में ही मिलना है मगर मैं यह चाहता हूँ ये मिट्टी अपनी अखण्डता और निष्ठा के साथ भष्म हो।
इनदिनों औषधि,व्यायाम और जीवनशैली तीनों अमात्यों को सन्धि प्रस्ताव भेजा है वो आए और इस आपदकाल में मेरी मदद करें क्योंकि इनदिनों उनका राजा दर्द के विद्रोह के समक्ष बेहद अकेला पड़ गया है।

'दर्द की दुनिया'

Saturday, May 7, 2016

फ़िल्मी बातें

शर्मिला टैगोर और दीपिका पादुकोण की मुस्कान और खिलखिलाती हंसी के बीच का पॉज़ बेहद क्लासिक किस्म का है अपनी इन दो कृतियों को यूं देखकर ईश्वर अपने हाथ चूम लेता होगा।
माधुरी दीक्षित के और विद्या बालन के आँखों के सवालों का जवाब खुद ईश्वर के पास भी नही होंगे।
परिणीति चोपड़ा की आवाज़ सुनकर फूलों के छोटे बच्चें जल्दी बड़े होने की जिद अपनी माँ से करते होंगे उसकी गले की खराश से झरनें अपने तल की चोट को सहन कर पातें होंगे।
तब्बु को उदास देख बादलों को भी डिप्रेशन हो जाता होगा वो धरती पर बरसनें से इनकार कर देते होंगे और आसमान में टुक लगाए दूसरी धरती तलाशतें होंगे।
माही गिल के आँखों में लगा काजल धरती पर सुख और दुःख का पाला खिंचता है जिस पर वक्त के मारें खुद से हारे मनुष्य उम्मीद की कबड्डी खेलतें होंगे।

'इतवारी ख्याल'
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पुनर्पाठ:

इस पोस्ट पर संवाद की श्रृंखला में कुछ अन्य अभिनेत्रियों के बारे में मेरी टिप्पणियाँ आई है मित्रों की सुविधा के लिए उन सब को मूल पोस्ट के साथ रख रहा हूँ।

" ऋचा चड्ढा की आँखें सवाली है जैसे उन्हें कुछ सवालों के संभावित जवाब पहले से ही पता हो। उनके वजूद से छुपना सम्भव नही हो पाता है वो हमारी पड़ताल करती है और लौट जाती है।

हुमा कुरेशी, एक बड़ी नदी से निकली एक छोटी नदी है जिसनें अपना रास्ता बदल लिया है उसनें पत्थरों से दोस्ती की मगर उन्हें अपनी जगह से हिलाया नही उसके किनारे अपने कुनबे से बिछड़ी चिड़ियाएं साल में एक बार साथ बैठ कर उदास गीत गाती है। हुमा में एक संतुलित वेग है जिसके सहारे और किनारे किनारे चलतें आप एकदिन इंसानी बस्ती तक पहुँच जातें है अपनी समस्त कमजोरियों के साथ।

कोंकणा सेन शर्मा, एक आवारा बदली की प्रतिलिपि है जो धरती के सबसे उपेक्षित कोने के बयान दर्ज करने के लिए भेजी गई है वो धरती के कान में सन्देश कीलित करती है तो धरती उसका हाथ पकड़ लेती है उसकी हंसी धरती के उपेक्षित समझे गए खरपतवारों की के बालों में कंघी करती है। कोंकणा का कद अनुमानों से मुक्ति का अघोषित पैमाना है जिसके कनवीक्षन से हम अपने मन त्रिज्या को बड़ी आसानी से नाप लेते है।

अनुराधा पटेल, की नाक धरती के मध्य पर खींची एक विभाजन रेखा है जिसके दोनों तरफ की दुनिया एक दुसरे से बिलकुल अनजान है दोनों दुनिया के आंसूओं का द्रव्यमान भिन्न है इसलिए उनके खारेपन में एक मिठास भी बहती है। अनुराधा की हंसी में सुख से उपजे दुःख के पोस्टकार्ड तह दर तह रखे मिलते है। उसकी पलक झपकनें के अंतराल में काल के कुछ कोण बड़ी चालाकी से बदल जातें है इसलिए जो नजर आता है वो आधा अधूरा होता है समय की प्रत्यंचा पर कसा हुआ एक आत्मिक सच का बेहद अलौकिक संस्करण वहां पढ़ा जा सकता है।"