Tuesday, March 15, 2016

खत

प्यारी माँ,
दिन बीत रहें हैं साथ में मैं भी बीत रही हूँ धीरे धीरे। आज तुम्हें तुम कहकर ही सम्बोधित करूंगी क्योंकि अब मैंने प्यार को उस आदर में तब्दील कर दिया है जिसको बता पाना मुश्किल है।कहनें को हमारी दो अलग दुनिया थी तुम बीत चुकी थी और मैं अलग अलग भूमिकाओं में खुद को जांच परख रही थी। तुम मेरे लिए कभी आदर्श नही रही मगर तुम से मेरा एक अजीब सा रिश्ता रहा है मैंने भरसक कोशिश की तुम्हारी तरह मजबूर न बनूं मगर कुछ कुछ हिस्सों में मैं तुमसे अधिक मजबूर थी इसलिए हमेशा बातों को अदल बदल कर जीती रही। दरअसल हम दोनों ने एकदुसरे को तब जाना जब तुम अपना अस्तित्व को भूल जीने की आदी हो गई थी और मैं अस्तित्व के सवालों में उलझी हुई थी। तुम्हारे साथ ने मुझे ये बताया कि जीवन तमाम असमानताओं के बाद भी जीने के लायक बच ही जाता है। बहुत से ऐसे सवाल थे जिनके जवाब तुमसे चाहिए थे मगर बाद में मैंने शिद्दत से महसूस किया वो सारे सवाल बेज़ा थे तुमसें उनके जवाब पूछना तुम्हारे प्रति अनादर ही होता।
हम और तुम एक दुसरे से बेहद अमूर्त ढंग से जुड़े थे शब्दों से इतर अहसासों की जमानत पर हम एक दुसरे की दुनिया में रिहा थें। आज भी मेरे रक्त की बूंदों में धड़कनों की ध्वनि में तुम्हारे होने के प्रमाणिक मंत्र चुपचाप यात्रा करते है।
भले ही मेरा होना तुम्हारे लिए कोई ख़ास अर्थ न रखता हो और मैं खुद तुमसे कनेक्ट के मामलें में कमजोर रही हूँ मगर बावजूद इसके मेरा अस्तित्व तुम्हारे ही अस्तित्व का एक विस्तार था। माया और मोह से इतर तुम्हारे साथ मैं जीवन को हिस्सों और किस्सों में जी पायी इसके लिए मैं अंतर्मन की गहराई से बेहद कृतज्ञ हूँ।
ऐसा कई दफा हुआ दुनियादारी की खीझ के चलतें मैं तुम पर बरस पड़ी मगर बाद में महीनों अपराधबोध ने मेरा पीछा किया मेरी नींद के कुछ गहरे पल विलम्बित भी इस ग्लानि ने किए ये बात आज तक तुम्हें न बता पाई मगर आज बता रही हूँ।
मेरी यात्रा की निमित्त तुम बनी और तुम्हारी यात्रा अलग अलग केन्द्रो में विभाजित थी फिर भी मैंने तुम्हें अपने आसपास रखा बाह्य तौर पर भले मेरे कुछ स्वार्थ हो सकतें है मगर आन्तरिक स्तर पर वो सब कुछ छोटी छोटी आशाएं थी जिनसे मैं तुम्हें बांधकर रखना चाहती थी।
माँ, तुम दरअसल इतनी सजीव और जीवन्त हो कि तुम्हें कल्पना में किसी अन्य स्थान पर रख पाना मेरे सामर्थ्य से परे की बात है इसलिए हमेशा तुम मेरा यथार्थ बनकर मेरे जीवन में शामिल रही हो। हिम्मत रोशनी सम्बल ये सब बाहर से भी मिल जातें है तुमसे मुझे हमेशा पवित्र ध्वनियों वाली आश्वस्ति मिली है जिसके सहारे मेरा अस्तित्व प्रखर हुआ है।
जानती हूँ तुम्हारा प्रेम हमेशा अमूर्त रहा है और तुमनें हमेशा ये सोचा मैं अपना ध्यान खुद रख सकती हूँ कई बार मुझे ऐसा भी लगा कि तुम स्नेह के मामलें में निष्पक्ष नही हो मगर फिर भी एक मामलें में जरूर निष्पक्ष थी तुम्हें मेरी फ़िक्र हमेशा एक समान रही मेरी उदासी तुम्हारे लिए असहनीय थी भले ही कारण तुमनें न पूछे हो मगर तुम्हें पता सब होता था।
बिना ज्यादा पढ़े हुए भी तुम जानती थी छोटे छोटे सुख को उस दुःख से बचाकर रखना जो एक स्त्री के जीवन में जन्म से तय हो जातें है। तुम्हारी चुन्नी के कोने में बंधी होती थी जीवन की सबसे बड़ी पूँजी जो तुमनें मुझे हमेशा दी बिन मांगें न जानें कहाँ से माएं जान जाती है गाँठ में सुख को बान्धना और ठीक उस वक्त खोलना जब उम्मीद बेहद बोझिल हो।
मैं खुद कैसी माँ साबित हूँगी ये भविष्य के गर्भ में छिपा है मगर कुछ अर्थों में तुमसे अच्छी माँ होना मेरे लिए इस जन्म में सम्भव न होगा जिसकी वजह यह नही कि मुझमे सामर्थ्य नही है इसकी वजह है क्योंकि मैं तुम नही हूँ।
मुझे तुमसें कुछ शिकायतें है मगर आज एक न कहूँगी बल्कि मैं अपनी उन गलतियों को आज याद करना चाहती हूँ जिनकी माफी तुमसें न मांग सकी और अच्छा हुआ नही मांग सकी इन्ही गलतियों के चलते मैं तुम्हारे उतना नजदीक जा सकी जितना कभी पहले नही गई थी। माफ़ी मांगने से शिकायत करने से मन का बोझ हलका होता मगर तुम्हारा मेरा रिश्ता कुछ इस किस्म का रहा है कि मेरे बोझ में हमेशा तुम्हारा बोझ शामिल रहेगा इसलिए तुम्हें खुद से अलग करके मुक्त नही होना चाहती बल्कि तुम्हारे साथ मुक्त होना चाहती हूँ।
शायद दोबारा जिंदगी में ऐसी मोहलत न मिलें इसलिए आज कहना चाहती हूँ तुम मेरे जीवन की वो प्रस्तावना हो जिसका कोई उपसंहार नही है मैं चाहती हूँ तुम मेरे अंदर किसी आवारा नदी सी बहती रहो बिना किसी कोलाहल के जब तक मेरी सांसे चल रही है तुम चलती रहो और देखो बतौर माँ मैं कितनी यात्रा तय कर पाती हूँ जानती हूँ तुम्हें मेरी कोई भौतिक उपलब्धि उतनी खुशी नही देगी जितनी खुशी ये बात देगी कि मैं तुमसे अलग किस्म की माँ बन गई हूँ।
शेष कभी नही कहूँगी यही मेरा तुमसें पहला और आख़िरी खत है क्योंकि बिन कहे समझना तुम्हें खूब आता है।

तुम्हारी बेटी (जो अब थोड़ी बड़ी हो गई है)

Thursday, March 10, 2016

बातें

तुमनें उस दिन कहा कि 'तुम्हारे कान बहुत सुंदर है'
पहली बार किसी ने मेरे कान की तारीफ की अमूमन बढ़िया सौंदर्यबोध में भी कान पर कोई ध्यान नही देता है सुंदरता को देखनें के मानक दुसरे होतें हैं। तुमनें मेरे कान के निचले नरम हिस्से को ठीक वैसे छुआ जैसे कोई मन्दिर की घण्टी को छूता है अपनी तर्जनी से तुमनें उसे थोड़ा हिलाकर देखा।
दरअसल,कान की ख़ूबसूरती के जरिए तुम मेरी सुनने की क्षमता की तारीफ़ करना चाह रही थी कि तुमको मैं ऐसे ही बिना किसी तर्क वितर्क कई बार सुनता रहा हूँ लम्बे समय तक। जब मैंने तुम्हें ये बात बताई तो तुम हंस पड़ी तुम्हें लगा कि आत्ममुग्धता के लिए मैं सामान्य सी बातों का भी दार्शनिककरण कर देता हूँ।
हंसते हंसते तुमनें कहा तुम्हारी नाक थोड़ी बड़ी है मैं बोलनें ही वाला था कि तुम कहने लगी अब इसका अर्थ ये मत निकाल लेना कि तुम्हारा अह्म बहुत बड़ा है।
मैंने कहा हाँ यही सोच रहा था इस पर तुम थोड़ा गंभीर हो गई और बोली जो मैं कहती हूँ तुम उसके निहितार्थ क्यों विकसित करते हो मैंने कहा पुरानी आदत है मेरी।
फिर तुमने कहा चलो एक खेल खेलतें है मैं एक टिप्पणी करूंगी और तुम उसके निहितार्थ बताना मैं उस वक्त उस खेल के लिए तैयार नही था मगर फिर भी मैंने हांमी भर दी।
मेरी हां के बाद तुमनें कहा नही खेल की कोई जरूरत नही है तुम बातों को डिकोड करना जानते हो ये पता है मुझे मगर हर बार तुम्हारा अनुमान सही हो ये जरूरी नही। अनुमान कई बार इस कदर गलत होते है कि हम उसके बाद सच तक बोलना छोड़ देते है।
मैं चाहती हूँ कि तुम कभी सच बोलना मत छोड़ो।
मैंने कहा अब तुम कान से दिमाग तक पहूंच गई हो अब ये मत कह देना मेरा दिमाग बहुत सुंदर है। इस पर तुम हंस पड़ी नही नही जानती हूँ तुम्हारा दिमाग नही तुम्हारा दिल तुम्हारे कान की तरह बहुत सुंदर है।
मैंने कहा कान की तरह? ये क्या तुलना हुई इस पर एक लम्बी सांस लेते हुए तुमनें कहा हां ! कान की तरह क्योंकि ये भी मेरी बातें सुनता बहुत हैं।
मेरे पास मुस्कराहट से बढ़िया कुछ नही था जो उस वक्त तुम्हें दे सकता था इसलिए वही दे दी उस वक्त जिसें तुम ले गई हो अपने साथ हमेशा के लिए।


'बातें है बातों का क्या'

Monday, March 7, 2016

स्त्री

स्त्री होने का अर्थ
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सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति को चैतन्य माना है। अहर्निश और योगक्षेम अवस्था को प्राप्त करनें के लिए दोनों के मध्य समन्वय और संतुलन की अनिवार्य आवश्यकता है यदि यह संतुलन नही सध पाता है फिर जीवन का सृजनात्मक पक्ष निसन्देह उज्ज्वल नही रह सकता है।
दर्शन स्त्री की चेतना को प्रखर मानता है मगर जब आध्यात्म से निकल कर स्त्री धर्म की दुनिया में दाखिल होती है तब इसके अस्तित्व पर पुरुषवादी सम्पादन के स्पष्ट चिन्ह दिखनें लगतें है। धर्म का मनोविज्ञान आस्था से जुड़ा है और आस्था सवाल करने  की इजाज़त नही देती है इसी कम्फर्ट जोन का लाभ लेता हुआ पुरुष नेतृत्व करते हुए अपने लिए सारी सुविधाएं रख लेता है स्त्री के लिए वर्जनाओं का जाल बुन देता है। धर्म का बड़ा भार स्त्रियों के कन्धे पर लदा है इसमें कोई सन्देह नही है मगर इस परम्परा में स्त्री को इस बात के लिए अभ्यस्त किया जाता है कि विश्वास और सेवा उसका परम् धर्म है सवाल खड़े करने की इजाज़त उसे नही है।
धर्म के दायरों से निकल कर जब स्त्री समाज में दाखिल होती है तब उसकी भूमिकाएं बेहद अलग किस्म की निर्धारित कर दी जाती है। बहुत समाजशास्त्रीय दृष्टि से विश्लेषण नही करूंगा मगर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से स्त्री कमजोर या दोयम साबित करने की एक लम्बी कंडीशिंग समाज में  दिखाई देती है। जबकि वस्तुतः स्त्री और पुरुष में जैविक भेद जननीय क्षमता भर का है।
विमर्शों की ध्वनियां भी अंतोतगत्वा वैचारिक संघर्षो तक आकर दम तोड़ देती है समाज मनोविज्ञान की दृष्टि से वो कोई समाधान प्रस्तुत नही करती है। स्त्री और पुरुष दो प्रतिस्पर्धा बिन्दू पर लाकर विमर्श छोड़ देते है मगर स्त्री संघर्ष की यात्रा महज यही समाप्त नही हो जाती है। हम अक्सर यह ध्येय वाक्य सुनतें है स्त्री पुरुष एक दूसरे के पूरक है मगर इस पूरक तत्व को कैसे स्वीकर किया जाए उसका कोई प्रशिक्षण समाज के किसी स्तर पर मौजूद नही है।
लिंग आधारित भेद का मूल कारण असुरक्षाबोध है अपने ईगो एंड एग्जिस्टेंस को बचाए रखने के लिए पुरुष तमाम तरह की हाइपोथिसिस प्रचारित करने में सफल रहा है क्योंकि एक ग्रन्थि के तौर में पुरुष की ये बड़ी ग्रन्थि है वो स्त्री से बेहतर है।
अब मूल प्रश्न पर लौटता हूँ कि स्त्री होने का अर्थ क्या है? स्त्री सृजन की निमित्त है मगर महज महिमामण्डन या आदर्श वाक्यों से स्त्री विमर्श का कोई भला नही होने वाला है ये बाह्य तौर पर आकर्षक लगता है मगर इसका मूल समस्या पर कोई प्रभाव नही पड़ता है।
स्त्री होने का अर्थ स्त्री को पुरुष को समझनें की आवश्यकता है इस समझ के लिए सोच और व्यवहार के स्तर पर लोकतांत्रिक होना एक अनिवार्य शर्त है। जब तक पुरुष खुद को एक अथॉरटी के रूप में देखता रहेगा तब तक समानता की बातें करना बेमानी है। बिहेवियर मैकेनिज़्म के तौर पर समानता एक यूटोपिया ही है इसलिए समानता से पहले जेंडर सम्वेदनशीलता और अस्तित्व के प्रति लोकतांत्रिक सोच इन दो अवधारणाओ के लोकजीवन में अनुशीलन की आवश्यकता है यदि ये दो तत्व हमारें व्यवहार और सोच में शामिल हो जाए तो स्त्री को लिंग भेद से मुक्ति मिल सकती है।
और अंत में मुक्ति से ही अपनी बात समाप्त करूँगा स्त्री का अस्तित्व चेतना के स्तर पर बेहद व्यापक और संभावनाशील है उससे जुड़कर पुरुष के अस्तित्व का विस्तार अपरिमेय हो जाता है यह एक कृतज्ञता का विषय होना चाहिए। तत्व सम्वेदना और चेतना के समन्वय की दृष्टि से स्त्री की भूमिका न केवल बेहद व्यापक है बल्कि सतत् प्रगति के लिए जीवन में अनिवार्य भी है।
स्त्री होने का अर्थ मुक्त होने से है और सच्ची मुक्ति के लिए स्त्री को आदर के वागविलास से इतर अपने जीवन में मुक्त अवस्था में स्वीकार करना होगा उसकी भूमिका को स्वयं उसे रेखांकित करने देने होगा जबतक आप खुद को एक ऑथॉर्टी की तरह देखतें है और विचार व्यवहार के स्तर पर लोकतांत्रिक नही है तब तक अपने जीवन में स्त्री होने का अर्थ नही समझ पायेंगे।

©डॉ.अजित

Saturday, February 27, 2016

हीरो बनाम जीरो

ये एक खेदजनक बात थी कि हमारे नायक असल जिंदगी में बेहद अस्त व्यस्त थे। असल जिंदगी का यहां मतलब बेहद निजी किस्म की जिंदगी है इसलिए उनके नायकतत्व के साथ हमेशा कुछ अप्रिय प्रसंगों का सिलसिला चलता रहा।
व्यवस्था और अनुशासन बड़ी जटिल चीज है मूलतः मनुष्य एक अराजक प्राणी ही है हिंसा उसके अस्तित्व का बड़ा हिस्सा है। सिविलाईजेशन के चलते उसने अराजकता को छोड़ा है मगर एक हद तक ही।
तो क्या नायक हमेशा हमसे बेहतर होने या रहने के लिए बाध्य है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। एक परिष्कृत मस्तिष्क चित्त और सम्वेदना के बावजूद कुछ कुछ हिस्सों में आदर्श बेहद क्रूरतम रूप से बिखर जाता है वहां सब कुछ अप्रत्याशित चीजों की स्थाई शरण स्थली है।
मैं नायक और नायकतत्व से एक सीमा के बाद एक सुरक्षित दूरी बना लेता हूँ ताकि जब मैं कुछ अंदरुनी सच का साक्षात्कार करूँ तब मेरा मन कोई प्रतिकार न करें।
टूटे बिखरे कमजोर होते इंसान की दुनिया में नायकतत्व एक अभिशाप जैसा है जिसके बोझ में उसकी पीठ झुकती जाती है और एकदिन सूखी लकड़ी की तरह आग में जलकर चटक कर टूट जाती है।
शिकायतें ऐसी चटक की ही ध्वनियों का एक औपचारिक दस्तावेज़ है जिसका पाठ हमें राहत भरी बैचेनी देता है।

'हीरो इन जीरो ऑवर'

Monday, February 1, 2016

भोजपत्र

स्मृतियों की प्रतिलिपियां एकत्रित कर रहा हूँ इनदिनों।
बात आवश्यकता की नही है इसलिए तुमसे कुछ भी पुनर्पाठ करने का आग्रह मैंने नही किया। मैं अतीत में अलग अलग मार्ग और माध्यम से उतरता हूँ क्योंकि जिस रास्ते से मैं तुम्हारे साथ आगे बढ़ा उस पर वापस लौटने की सुविधा नही है।
मैं कभी याद करता हूँ तुम मेरी किस बात पर पहली बार मुस्कुराई थी कब मेरे बेवकूफ़ाना सवाल पर खुल कर हंसी थी। तुम्हारी नाराज़गियों के किस्से मैं डाक टिकिट की तरह इकट्ठा कर रहा हूँ ताकि खुद के अलग होने के अहसास को जी सकूं।
स्मृतियों के आख्यान स्थाई नही होते है ये मनोदशा के हिसाब से अपना पाठ बदल लेते है ये बात मुझे उसदिन पता चली जब तुमनें एकदिन अचानक मुझसे पूछा था
'तुम मुझे किस रूप में याद रखना चाहते हो?' मैंने कहा था तुम्हें किसी एक आवृत्ति में बांधने के बारें में सोचा नही कभी। जानता हूँ इस जवाब से तुम थोड़ी निराश हुई थी क्योंकि मेरे लिहाज़ से भी यह एक सही जवाब नही था मगर इसका सहारा ले मैं तब तुम्हारी सम्भावनाओं का विमर्श कर रहा था। ये मेरी बड़ी गलती थी।
तुमसे मिलने के बाद सच कहूँ तो मैं कुछ अंशो में स्थगित हो गया हूँ और तुम्हारी स्मृतियां उसी स्थगन से छनकर मुझतक आती है। ज़िन्दगी के हिस्सों और किस्सों में तुम कहीं मेरी तरफ पीठ किए बैठी हो तो कहीं इतनी नजदीक हो कि मेरी छाया का आकार विस्तृत हो गया है।
इस बात तो मैंने तुमसें संकेतो में कहा भी मगर तुम शायद मेरे द्वन्द को समझ गई थी इसलिए जब मैं नदी का जिक्र करता तुम मुझे रेगिस्तान की मृगमरीचिका का वैज्ञानिक कारण पूछने लगती मैं समन्दर की मजबूरी जानना चाहता तो तुम क्षितिज की ख़ूबसूरती पर एक कविता लिखने का आग्रह कर बैठती।
तुम्हारी स्मृतियों की छायाप्रति मेरे पास थोड़ी अस्त व्यस्त जरूर है मगर सब की सब है इसलिए इनके दस्तावेजीकरण को लेकर आश्वस्त हूँ।
ऐसा करने की जरूरत क्या है? ये तुम्हारा पहला सवाल होगा जिसका जवाब इनदिनों इन्ही स्मृतियों के सहारे तलाश रहा हूँ मैं।

'स्मृतियों के भोजपत्र'

Sunday, January 31, 2016

इश्क

इश्श्क...! कभी मर्तबान में कैद मछली सा हसीन तो कभी कच्ची पेंसिल सा नाजुक। इबारत और इबादत के बीच किस्सागोई सा फंसा एक अफ़साना जो रूह के उलझे अहसासों में कंघी करता है। चाहतों का ऐसा आसमाँ जिसमें परिंदे अक्सर अपना घौसला भूल जाते है और उड़ान में भटक कर खुद अपनी किस्मत में जलावतनी लिख देते है।
इश्क इबादत भी है और अदावत भी ये जिंदगी में इस कदर शामिल होता है कि फिर इंच भर कुछ भी हासिल करने की तमन्ना नही रह जाती। मासूम ख्यालों और ख़्वाबों को सिराहने रख सोती पलकों से पूछिए उनकी मुस्कुराहटो का हाल कैसे लब उनसे रश्क करने लगतें है वो नींद में चमकती है। जिंदगी जब करवट बदलती है इन्ही ख़्वाबों से वो रास्ता पूछती है ये अलग बात है कि इश्क की खुमारी में कहाँ से निकले और कहाँ पहूँचे।
इश्क पर तकरीर मुमकिन नही इसमें हौसला कहाँ से अता होता है खुद खुदा भी बयाँ नही कर सकता है। इश्क की पाकीजगी में जब कोई मुर्शीद अपने मुरीद की आँख में गुमशुदगी का सूरमा लगाता है तब कायनात का जर्रा जर्रा रोशन हो उठता है।
इश्क की चोटें गहरी और निशान हलके हुआ करते है ये जितना जताया जाता है उससे कई गुना छिपाया जाता है। इश्क महज महबूब को हासिल करने की तमन्ना नही रखता बल्कि ये दिल की धड़कनों के जरिए सजदा करने की ज़ुस्तज़ु लिए गाफिल रहता है।
हर्फ़ हर्फ़ इश्क की आयत इबादत का पता देती है रूह को कलन्दर बनाती है इश्क का दरवेश महबूब का दीदार रोज़ चश्म ए तर कर लेता है वो मुलाकतों का मुहाजिर नही होता।
जिसकी दीद में ईद परदानशीं रहती है वो उन आँखों की बिनाई में रोज़ इल्तज़ा और हया की तुरपाई करता है ताकि जिस्म के हवाले से इश्क सरे आम न हो जाए।
इश्क महज़ एक लफ्ज़ नही बल्कि एक हादसा है जिस पर जो ईमान लाता है फिर वो खुद पे हंसता है और खुद पर रोता है।
किसी के लिए दुआ करना तो इस इल्म की दुआ करना रब्बा इश्क न होवें....रब्बा इश्क ही होवें।

© डॉ.अजित

Thursday, January 28, 2016

फेसबुक

डायरी के पन्ने नही थी ये न्यूज़ फीड
टाइमलाईन पर कोई सहारा न मिला

मुद्दत बाद दोस्त तो जरूर मिलें यहां
दोस्ती का वो पुराना नजारा न मिला

ग्रीन लाइट जलती हो रात दिन पाबन्द
दूसरा यहां हम सा कोई आवारा न मिला

इनबॉक्स के दिन जवानी के जैसे मिले
जो बीत गया वो लहज़ा दोबारा न मिला

किन रिश्तों दोस्ती की बात करते हो मियाँ
फेसबुक पर डूबकर कभी किनारा न मिला

© डॉ. अजित

Sunday, January 24, 2016

सफर

जब तक तुम लौट कर आई मैं जा चुका था।
तुम्हारा लौटना सम्भावित था और मेरा जाना निश्चित। हम दोनों अपने अलग अलग कोण पर घूम रहे थे इसलिए एकदूसरे में सामनें अलबत्ता तो बेहद कम पड़े और यदि पड़े भी तो अपने अपने दृष्टि दोष के साथ।
साथ चलना हमेशा साथी नही बनाता ये बात तुमने एकदिन किसी दुसरे सन्दर्भ में कही थी मगर यकीनन सच कही थी। कई बार हम खुद ही अप्रासंगिक हो जाते है इसमें किसी का कोई दोष नही होता है इसलिए इस विलगता पर किसी भी किस्म की व्याख्या बेमानी है।
मैं जाने के बाद कुछ देर तक विचार शून्य रहा दिशाबोध भी लोप हो गया था कई चौराहे मैंने इसलिए छोड़ दिए कि रास्ता अगले वाले बदलूंगा फिर एक दोराहे से मैंने एक रास्ता पकड़ लिया और इसी रास्ते पर चलतें चलतें मैंने एकदिन पाया मैं तुमसे इतनी दूर निकल आया हूँ कि तुम किसी भी जरिए मुझे तलाश नही सकती।
जाहिर सी बात है जब तुम लौटी होगी तुमनें उसी आवृत्ति से मेरे बारें में पूछताछ की होगी मगर मेरी छाया गंध स्मृतियां कुछ न तुम्हें मिलेगी इसका इंतजाम मैं करके आया था।
जानता हूँ तुम लेशमात्र भी निराश नही हो न ही तुम इस पड़ताल में पड़ना चाहती कि हम में से किसने पलायन किया है ना ही तुम्हारे पास कुछ सवाल है मगर तुम रास्तों के चरित्र से विस्मित जरूर हो। तुम चौराहों के कौतुहल से अनजान नही हो मगर रास्तों के बदल जाने से थोड़ी परेशान जरूर रहोगी।
सफर एकसाथ कई स्तरों पर जिन्दा रहता है हमारा और तुम्हारा भी रहेगा क्या फर्क पड़ता है बस उसका साथ न हो जिसका साथ हमारे हाथ,काँधे और कदमों ने चाहा था?
या कुछ फर्क पड़ता है !

© डॉ.अजित

Thursday, January 21, 2016

याद शहर

उस शहर से इश्क था मुझे।
जिसके रास्ते अलग अलग मगर सब एक साथ थे जिसकी ईमारतें एक बिछड़ा हुआ कुनबा था एकदूसरे से नाराज़ मगर एकदिन मिलनें की आस पर जो खड़ी थी।
जिसकी गलियों में बच्चों का पसीना धूल को ठंडक देता था। उस शहर में हवाएं समझाईश का खेल खेलती थी ठेठ दुपहरी में भी पेड़ हवा के चेहरें पर ठंडे पानी के छीटें मारते थे।
दुनिया भर के लिए वो शहर भले ही हरजाई था मगर वो मेरा महबूब शहर था। उस शहर के पंछी निर्वासन के बावजूद बहुत खुश थे वें अपना वतन कभी याद न करतें थे सुबह सुबह उनको शहर के बालों में कंघी करते देखा जा सकता था।
सबसे बड़ी बात उस शहर में दरवाजे थोड़े से हमेशा खुले रहते थे वहां बंद कुछ भी नही था बाजार शहर में टापू की तरह था जिसे एकांत चाहिए होता वो खरीददारी के लिए भीड़ का हिस्सा बन जाया करता था।
उस शहर के ऊपर आसमाँ कुछ सीढ़ियां नीचे उतर कर आता था सूरज कुछ किरणों को वापिस नही मांगता था और चाँद घटता बढ़ता हुआ किसी को शिकायत का मौका नही देता था।
उस शहर के इश्क में मैं बर्बाद हुआ हूँ जिसे मेरी भले ही कोई खबर न ली हो मगर मेरी आह और वाह को डायरी की शक्ल में अपनी अलमारी में सम्भाल कर रखा था।
कल जब वो डायरी शहर के सिराहने छूट गई तब मुझे पता लगा कि शहर का दिल आज भी मेरे लिए उतनी ही बेचैनी से धड़कता है जितना कभी पहले धड़कता था बंद में कमरें में वक्त के रोशन से कुछ सर्द हवा अंदर आई और डायरी के पन्ने खुद ब खुद पलटनें लगे यह देख शहर ने खुद को समेट लिया और डायरी पर यादों का वजन रख करवट ले सो गया।
शहर से मुझे इस बात की शिकायत है मगर कभी जताऊंगा नही।


'वो शहर'

Wednesday, January 13, 2016

हंसी

सुबह कुछ तरह से हुई जैसे समन्दर किनारे सीप को कतार से सूरज की सलामी के लिए सजा दिया गया हो।
उदासी के घने जंगल में धूप पत्तियों की सीढ़ियां से उतर कर धरती की मांग को सीधा करने चली आई।
तुम हंसी तो उजाला गया मन्दिर में शंख के नाद सी दिव्य थी तुम्हारी हंसी जिसे मन के गर्भ ग्रह में प्राण प्रतिष्टित कर दिया गया है।
लबों का व्यास मुस्कान की गोद में चैन से सो रहा है और तुम्हारें दो डिम्पल नही है दरअसल वो नदी के दो किनारें है जो तुम्हारी हंसी के पुल पर उम्मीद से एकदुसरे को देख रहे हैं।
तुम्हारी हंसी में लेशमात्र भी कृत्रिमता नही है ये ठीक उतनी नैसर्गिक और पवित्र है जितनी किसी देवालय की घण्टी होती है।
तुम हंसी तो पछियों के बच्चें भूखे रहे गए उनकी माएं तुम्हें देख अपने अपने भूले हुए गीत याद करने लगी इसी हंसी को देख नदी का वेग कम हो गया है वो किनारों के कॉलर ठीक करती है और आगे बढ़ जाती है। किनारें तुम्हें दुआ दे रहे हैं तो झरनें अपने नेपथ्य में अंखड रुद्राभिषेक कर रहें है एक तुम्हारी अखण्ड हंसी के बदले कुछ उपेक्षित मूर्तियों पर जलधार पड़ने लगी है।
तुम्हारी गर्दन शास्त्र की दृष्टि से किसी बड़ी मीमांसा से कम नही है तुम्हारी चैतन्यता का पुल है जहां से तुम दिल और दिमाग को एकसाथ देख सकती हो। सृष्टि के निमित्त ये सदी का सबसे पुराना वृक्ष है जिस पर बाहर एक भी वलय का निशान नही है।
तुम्हारी दो आँखें  पहाड़ के एकांत के दूत है ये उनका सन्देशा समन्दर तक पहुँचाती है इनके जरिए ही समन्दर नदी की दूरी का अनुमान लगा अपनी प्रतिक्षा को स्थगित करता रहता है। इन पलकों के जरिए धूप अपना दुपट्टा सुखाती है और आंसू देवताओं से मिलने की यात्रा की रुपरेखा तय करतें है।
तुम्हारे माथे पर कुछ आधे अधूरे पते दर्ज़ है जिन्हें पढ़ने के लिए आसमान रोज़ चश्मा लगता है वो किसी बहाने इसे छूना चाहता है जिसके लिए न जाने कितनी बार बेमौसमी बारिश की गई मगर तुम न मिली इस बात पर आसमान आजतलक बादलों से नाराज़ है बादल  बूंदों से हवा से दोस्ती करने के लिए कहते है तुम्हारा भाग्य आजकल उनका इष्ट देव हो गया है वो जिसे रोज़ जपतें हैं।
तुम हँसती हो तो कहीँ धूप खिल जाती है कहीं बारिश हो जाती है बहुत कुछ दुनिया में इसी हंसी के जरिए घटित हो रहा है। कुछ लोग खुश रहें इसे देखकर तो कुछ अपने अतीत को याद करके उदास भी हो जातें हैं।

बहरहाल,
कुल मिलकार बात यही है यूं ही हंसती रहा करो।

Monday, January 11, 2016

बेसबब सफर

उस दिन तुमनें तेज दौड़ती गाड़ी का शीशा थोड़ा नीचा किया और अपना हाथ बाहर निकाल दिया तुम हवा को छूना चाहती थी।
हवा तुम्हारे हाथ की रेखाओं के बालों में कंघी करने लगी थी तुम्हारी ऊंगलियां मयूर पंख की तरह आह्लाद में खुल गई थी।
हवा शीशे से गुजरती तुम्हारी एक लट को उलझा रही थी सूरज तुम्हारे माथे की नाप ले रहा था तुम्हारे आँखें बेपरवाही में आधी बंद थी आधी खुली थी। तुम्हारी पलकों में क्षितिज के स्वप्न अंगड़ाई ले रहे थे।
वो एक दिव्य चित्र था जब हवा धूप और छाँव मिलकर तुम्हें संवार रही थी और तुम बिखर रही थी। तुम्हारे हाथ के जरिए हवा ने सीधी दस्तक दिल के उस कोने में दी थी जहां एक अलहदा ख़्वाब सो रहा था उसकी नमी हवा से दूर हुई तो तुम्हारी आँखों ने उसको सूरज़ से मिलवाया फिर वो एक आजाद पंछी की तरह तुम्हारी हंसी के जरिए उड़ गया।
तुम्हारे चेहरे पर हंसी और मुस्कान के मध्य का कोई भाव था ये भाव एकदम दुर्लभ किस्म का था इसलिए मैं किसी बात के हस्तक्षेप से इसे बदलना नही चाहता था क्योंकि मेरी आवाज़ से तुम सावधान हो सकती थी इसलिए मैं चुप रहा और तुम्हें हवा के गले में कुछ खत बांधते देखता रहा हूँ तुम्हारे हथेली और उंगलियो के बीच से हवा ठीक ऐसे बह रही थी जैसे कोई पहाड़ी नदी बहती है तुम्हारी रेखाएं आपस में आइस पाईस खेलनें लगी थी ये देखकर अच्छा लगा था।
तुम्हारी पलकों के रोशनदान पर दो अलग अलग ख़्वाब उड़ने की तैयारी में थे वहां जैसे ही नजदीकियों की धूप उतरी तुमनें हड़बड़ा कर आँखें खोले दी उसके बाद तुम सम्भल गई और हाथ अंदर करके शीशा बन्द कर लिया।
मैंने पूछा क्या हुआ ?
तुमनें कहा कुछ नही बस आँख लग गई थी!
मैं हंस पड़ा मेरी हंसी को तुमने इस तरह देखा जैसे मैंने छिपकर तुम्हारी वो सारी चिट्ठियां पढ़ ली हो जो तुमनें कभी लिखी ही नही।
फिर तुमनें तुरन्त विषय बदलते हुए कहा और कितना वक्त लगेगा?
मैंने कहा शायद थोड़ा और। फिर न तुमनें किलोमीटर पूछे और न घड़ी देखी शायद तुम समझ गई थी कि अलग होने का वक्त नजदीक आ गया है।
तुमनें सफर को छोटा कर दिया था और वक्त बीत रहा था बेहद तेजी से जिसको मैंने ठीक उस वक्त तुम्हारे चेहरे पढ़ा जब तुमनें अपना पर्स अपनी गोद में भींच लिया था जोर से।

'बेखबर बेसबब इक सफर'

Sunday, January 10, 2016

हक

सबसे मुश्किल था तुम्हें हिस्सों में चाहना।
ऐसा नही तुम मुझे सबसे ज्यादा पसन्द थे कुछ जगह तुम औसत तो कुछ जगह औसत से भी कमतर थे मगर जहां तुम बेहतर थे वहां सच में इतने बेहतर थे कि तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना से मुझे डर लगने लगता था।
मैं चाहती थी तुम्हें कुछ इस तरह से सहेज लूँ कि तुम्हारी इस बेहतरी की तुम्हे भी कानो कान खबर न हो। कुछ मामलों में तुमसे असमहत होने के बावजूद भी कुछ बिंदु ऐसे भी थे जहां मैं खुद से असहमत होते हुए भी तुमसे सहमत हो जाती थी।
तुम्हारी अनुपस्थिति में मैंने महसूस किया कि सामान्य होने का अपना एक आकर्षण है जहां आपके पास बहुत कुछ बखान या व्याख्यान के लिए न हो वहां भी अनुराग की छाँव पहुँच सकती है।
तुम समय से आगे थे या पीछे ये नही जानती मगर इतना जरूर जानती हूँ तुम्हारे साथ बिताया मेरा छोटा समय इतना विस्तार पा जाता था कि मैं उसके कोलाज़ में मनमुताबिक़ रंग भर सकती थी।
तुम्हें सोचते हुए मैंने करवटों के अंतराल पर अलग अलग भाव महसूस किए कभी मुझे खुद पर गुस्सा आया तो कभी तुम पर बेशुमार प्यार भी और ये वो प्यार था जिसे मैं कब की भूल चुकी थी। ये सच है प्रेम जितना प्रतिदान मांगता है उतनी क्षमता नही है मुझमें और न ही तुम कहीं ठहरे हुए हो तुम सतत् एक यात्रा में हो यह मैं मुद्दत से देख रही हूँ मगर फिर भी तुम्हारे अस्तित्व के कुछ ऐसे निर्मल पक्ष है जिन्हें सोच कर मेरे चेहरे पर एक इंच मुस्कान आ जाती है और पलक बेसबब छलक उठती है।
इस मतलबी दुनिया में तुम इतने लापरवाह हो कि तुम्हें खुद नही पता है कि तुम क्या हो और इसी लापरवाही से मुझे रश्क हो रहा है कोई ऐसा कैसे हो सकता है जबकि तुम्हारे अंदर असीम सम्भावनाएं है तुम उन पर बात करना पसन्द नही करते तुम बात भी क्या करते हो पहाड़ से उतरते वक्त चक्कर ज्यादा आए थे या पहाड़ पर चढ़ते वक्त...धत्त ! यहां मैं तुम्हारे सामने घूम रही होती हूँ और तुम पहाड़ की कहानी सुनना सुनाना चाहते हो।
मुझे डर लगता है कभी कभी क्योंकि वक्त ऐसा हमेशा नही रहेगा न ऐसी मैं रहूंगी और न शायद तुम ऐसे रहोगे शायद इसलिए लगा रही हूँ तुम ऐसे रह भी सकते हो क्योंकि तुम बेपरवाह जीने के आदी हो।
मैंने तुमसे एकदिन पूछा कि क्या बदलाव एक अपेक्षित छल होता है? तुमनें कहा अपेक्षा है तो छल का होना कोई बड़ी बात नही ! या ये अपेक्षाभंजन का युक्तिकरण भी हो सकता है उस दिन मैंने जाना तुम किसी और दुनिया के हो।
खैर ! जिस भी दुनिया के हो ऐसे ही रहने मैं भले ही कल बदल जाऊं तुम मत बदलना।
इतना कहने का हक समझती हूँ तो कह रही हूँ।

Friday, January 8, 2016

इदम् न मम्

रोज़ सुबह जब सूरज निकलता है धरती से इजाज़त नही लेता वो जानता है उसका इन्तजार किया जा रहा है इसलिए आ जाता है बिन बुलाए मेहमान की तरह।
बादल कभी कभी सूरज को उसके कद का अहसास दिलाने के लिए ढक लेते है ताकि वो धरती को थोड़ा बैचेन देख सके।
चाँद छलिया है वो अलग अलग कोण से धरती को देखता है खासकर जब रात को कुछ दिनभर की सलवटों को समेटकर धरती सोने को होती है चाँद उसके कान प्रेम की स्मृतियों का मन्त्र फूंक देता है। चाँद धरती के मन को जानता है और सूरज धरती के तन धरती मगर चाँद सूरज दोनों से बेखबर है वो आधा अधूरा खुद को जानती है।
मन का खगोल शास्त्र कम ग्रहण से भरा हुआ नही है धरती की तरह किसी न किसी पल कोई ग्रहण मन की सतह पर रोज़ घटित होता रहता है। इसलिए अब ग्रहण के साथ जीने की आदत हो चली है कोई ख़ास फर्क नही पड़ता थोड़ी देर के लिए अगर अन्तस् में अंधेरा भी पसरता है तो।
सूरज चाँद धरती और ग्रहण इन्हें खगोलीय पिंड से हटकर गहरे प्रतीक के रूप में तुम्हारी वजह से देख पाया मुश्किल वक्त में इनसे थोड़ी हिम्मत मिलती है लगता है कोई बिछड़े दोस्त है जो अपनी बीते हुए कल की कहानी सुनाना चाहतें है।
इनकी कहानी सुनकर मेरे कान बड़े हो गए और नाक छोटी हो गई है एक छोटी नदी मेरे अंदर बहने लगी है वो किसी मुख्य स्रोत नही निकली बस एक जमें हुए अवसाद का सीना उसनें तोड़ दिया है वो भटक रही है अपना रास्ता बनाने के लिए मुझे उम्मीद है वो अपनी तलहटी विकसित कर लेगी एकदिन। मेरे छाती पर एक हरा भरा जंगल उग गया है जिसकी छाँव इतनी गहरी है कि सूरज की रोशनी तक अंदर नही आ पाती है वहां कुछ ऐसे दरख्त उगे है जिनको वानिकी विज्ञानियों ने लुप्तप्रायः मान लिया था यहां उनकी पैदाइश मन के विज्ञान से सम्भव हुई है।
बहुत विषयांतर नही करूँगा जैसा हो भी गया है बस इतना कहूँगा एक तुम्हारी वजह से मैंने रच ली है अपनी एक समानांतर सृष्टि जहां जंगल नदी झरने पहाड़ चाँद सूरज सब के सब मेरे अपने है।
हां धरती की तरह ये मेरा स्थाई दुःख है बस तुम मेरे न हो सके।
चलो कोई बात नही अपना पराया वैसे क्या होता है ये सब तो समय के सापेक्ष मनुष्य के भरम ही तो है।
आना कभी मिलनें एकांत के जंगल में शायद तुम्हारी हंसी से कुछ मन के उदास पंछियो को अच्छा लगे।

'इदम् न मम्'

Thursday, January 7, 2016

सफर के नोट्स

अनामिका से उम्मीद की आँखों में काजल लगाता हूँ मैं
मेरा हाथ जरा सा कांपने लगता है।
इस दृश्य में तुम भी अप्रत्यक्ष: शामिल होती हो। बादलों के पीछे एक डाकघर है जहां बैरंग और गलत पते के खत रखे जातें है। डाकिया हम दोनों का पता याद नही कर पाता है हाँ वो लिखावट से बता सकता है कौन सा खत किसका है।
कई दिनों से समन्दर मुझे बुलाता है उसके बुलावे देख तुम्हें याद करता हूँ मगर समन्दर की जिद है कि मुझसे मिलनें अकेले ही आना, तुम्हारे बिना कहीं जाने में एक खतरा यह भी है कि मैं फिर उतना नही लौट पाऊंगा जितना कभी गया था।
तुमनें एक दिन पूछा था मैं कितना लम्बा जीने की इच्छा रखता हूँ तब मैंने कोई प्रभावित करने वाला जवाब दिया था क्योंकि जहां तक मुझे याद है मैंने कुछ साल बताए दरअसल इतने साल जीना चाहता हूँ ये कहना एक किस्म का तात्कालिक छुटकारा था जब मैंने इस सवाल पर गौर किया तो मेरे जीने की चाह साल महीनें या दिन में नही आई मैं जीना चाहता हूँ कुछ किलोमीटर कुछ बसन्त और कुछ पतझड़ थोड़ी सी सुनसान बारिशें रात और दिन के सन्धिकाल पर उदासी के पल गिनते हुए हिसाब लगाना चाहता हूँ वक्त का।
इसलिए अपना पहला वक्तव्य वापिस लेता हूँ वो तुम्हारे किसी काम का नही है।
धरती पर कान लगाता हूँ वो मेरे वजन का हिसाब मेरे कान में बताती है साथ ही वो यह भी कहती है मेरे वजन का बोझ किसी और की ज़िन्दगी में भी शामिल है जब मैं उससे मानचित्र मांगता हूँ तब वो मेरा कान खींचकर कहती है इतने भी मतलबी मत बनों।
फिर मैं चल पड़ता हूँ अनन्त की ओर अज्ञात की ओर।
जो मुझे बाहर से देख रहा है वो बता सकता है मेरी दिशा और भटकाव का मानचित्र।
मेरे पदचिन्हों से जिस दिन लिपि विकसित की जाएगी उस दिन हमारा तुम्हारा सम्वाद सार्वजनिक होगा।

'सफर के नोट्स'

Tuesday, January 5, 2016

मिलना

तुम मुझे तब मिले जब मिलना कोई घटना नही थी मेरे जीवन में।
इसलिए तुम्हारा मिलना किस रूप में मैं स्मृतियों में संरक्षित करूँ यह तय नही कर पाया आजतक।
एक बेहद जीवन्त बातचीत में तुमने एक जम्हाई ली और अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को देखा मैंने इस बात को तुम्हारी अरुचि नही समझा बल्कि तुम उस वक्त ये बताना चाह रही थी कि मुझे बातों को उनके सही वक्त पर करने का पता होना चाहिए।
एक दुसरे की कमजोरियों पर अक्सर हमनें खूब बातें की यह खुद को अधिक परिपक्व और पारदर्शी जताने का एक उपक्रम था वैसे खूबियों पर भी क्या बात करनी थी खूबियां समय सापेक्ष होती है अदलती बदलती रहती है आज जो मेरे ऐब है कल वो मेरी खूबी हुआ करती थी।
तुमने एक दिन पूछा चाय में चीनी कितनी लोगे एक चमच्च? मैंने कहा अपनी चाह का अनुमान मुझे लगाना नही आता इसलिए खुद के अनुमान पर भरोसा नही है फिर मैंने देखा तुमनें आधी चमच्च चीनी डाली इसका अर्थ मैंने यह विकसित किया कि तुम भी मेरे बारें में किसी अनुमान को बचती थी।
कुछ बेहद छोटी और मामूली सी बातें है जो विषय के वर्गीकरण के अभाव में भटक रही है मसलन अक्सर यह हमनें एक दूसरे से यह पूछा कैसे है? मेरी समझ में शिष्टाचार की शक्ल में इससे बेवकूफाना सवाल और कोई हो नही सकता है कोई कैसा है यह बात वो ठीक ठीक बता पाएं यह बेहद मुश्किल है एक ही पल के अलग अलग छोर पर मनुष्य बेहद जीवन्त या अनमना हो सकता है।
तुमसे मिलना समय का एक युक्तियुक्त हस्तक्षेप था या फिर एक बेहद अवैज्ञानिक किस्म का मानवीय षड्यंत्र इन दोनों बातों के अलावा मैं तीसरी बात सोचता हूँ यदि तुम न मिली होती तो क्या मैं इस तरह असंगत बातों को एक शृंखला में कह पाता? शायद नही।
तुम्हारा मिलना असंगतता को अर्थ दे गया यह कम बड़ी बात नही है इसे जीने के बहाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
वही मैं कर रहा हूँ।

'मॉर्निंग रागा'

Wednesday, December 30, 2015

आँखें -2

एक वर्जन यह भी:

छल और प्रेम में विश्वास और सन्देह में तुम्हारी आँखों के फेरे बंधे थे। सप्तपदी की तरह इन आँखों के अपने कुछ वचन थे जिन्हें दोहराना नही पड़ता था। तुम पलकें झपकती तो कुछ वादे आईस पाईस खेलनें लगतें। इन खंजन नयनों में आग्रह आमन्त्रण या सपनों का बासीपन नही था बल्कि इनमे खुली आँखों से देखे कुछ अलहदा ख़्वाबो के जोखिम की बन्दनवार टँगी थी।
इन दो आँखों की कैफियत समन्दर किनारे अधलेटे दो आवारा परिंदों के माफिक थी जो साँझ ढलनें के बाद कहीं लौटना नही चाहते थी वो बाहों के घेरों में कुछ कुछ अंतराल में चारों युगों को पहरेदार बना इश्क में अय्यारी करने का हुनर सीखना चाहते थे।
अपनी अनामिका से तुमनें काजल एक टीका मेरी मुस्कान पर लगा दिया मुझे अचानक देख जो एक बूँद आँख से छलक आई थी उससे तुमनें मेरी पीठ पर एक वृत्त बनाया और उसके ठीक मध्य कामनाओं का एक अमूर्त चित्र खींच दिया।
दरअसल ये महज दो आँखें नही थी बल्कि ये दो खिड़कियां थी जिन पर कांधा टिकाए हम दोनों एक दुसरे के मन की गिरह खोलनें के लिए अपने अपने उदास गीत गुनगुना रहे थे। तुमनें एक अंगड़ाई ली और कुछ देर के लिए तुम्हारी पलकें सुस्तानें नीचे उतर आई उसी दौरान में मैंने एक गुजारिश का छींटा तुम्हारी आँखों पर मार दिया तुमनें आँखे खोली मेरे हिस्से में कुछ गुमशुदा शाम आई।
इन्ही आँखों के सहारे मैंने ख्वाहिशो की कतरनें तुम्हारे मन के पते पर पोस्ट की और तुमनें उनकी सिलवट को सीधा करते हुए अपने लबो पर ज़बां फेरी यकीं करना इन लम्हों में मेरा वजूद इस कदर बह गया कि आज तलक मैं गुजिश्ता लम्हों से गुजारिश करता हूँ कि तुम्हारी आँखों के जरिए मुझे मेरा गुमशुदा पता चल जाए ताकि मेरी गुमराही खत्म हो और इन्तजार की शक्ल मुझे तुम हासिल हो फिलहाल तुम मुस्कुरा सकती  हो मगर हंसना मत क्योंकि तुम्हारी पलकों के छज्जे पर कुछ मेरी ख्वाहिशें बैठ डूबता सूरज देख रही है।

Tuesday, December 29, 2015

उसकी आँखें

' उन आँखों में एक कातरता थी। करुणा और अवसाद का सम्मिश्रण बन आँखों सी तलहटी से बह रहा था। आँखों के कोण  उन अक्षांशों पर स्थापित हो गए थे जहां निकटता और दूरी को एक साथ देखा जा सकता था।
आँखों के जरिए एक जीना ठीक उसके दिल में उतरता था मगर दिल के दरवाजे पर सांकल चढ़ी थी। वो जब देखती तो कोई प्रश्न शेष न बचते उसकी आँखों का भूगोल निर्जनता के कई खोए मानचित्र लिए थे जिनकी शिनाख्त करने की हिम्मत बड़ी मुश्किल से जुटा पाता था।
वो नदी की तरह विकल थी मगर उसने अपने किनारों को तन्हा नही छोड़ा था उसके पास कुछ वजीफे थे जो उसनें स्पर्श की शक्ल में किनारों को दिए थे। उसकी आँखों में नदी के जलस्तर को नापने का पैमाना था वहां वेग की उथल पुथल उतनी साफ़ नही पढ़ी जा सकती थी मगर उसकी आँखों के जरिए कुछ अनुमान और गणनाएं अवश्य की जा सकती थी मसलन आंसूओं की आद्रता का स्तर क्या है वो सूखकर ग्लेशियर बनेंगे या फिर बहकर समाप्त हो जाएंगे हमेशा के लिए।
वो प्रकृति का अनहद नाद थी जिसकी ध्वनि आँखों के रास्ते सुनी जाती थी उसका काजल आवारा बदरी की टुकड़ियों का एक समूह था जो वक्त बेवक्त बरस जाया करता था इसी के जरिए आँखों की नमी चमक में तब्दील होती थी।
वो जब देखती तो शब्द दुबक जाते वाणी और स्वर अर्थ खो देते और आँखें भाषा का अधिकार पा लेती उसकी आँखों के महाकाव्य पढ़ने के लिए गर्दन नीची नही करनी पड़ती। उसे पढ़ते हुए जाना जाता शब्द का ब्रह्म हो जाना उसकी आँखों का अपना एक स्वतन्त्र शब्दकोश था जिसके पन्ने स्वतः पलक झपकनें के अंतराल पर पलटते जाते।
वो एक नदी थी वो एक महाकाव्य थी वो एक जीवन्त आख्यान थी और उसकी आँखें इल्म और अदब की दरगाह थी जहां कलन्दरो को पनाह मिलती थी उसकी निगाह में आतें ही खाकसार मुरीद और मुर्शिद एक साथ हो जाते थे।

Thursday, December 17, 2015

छायायुग

वहां हर स्त्री पर एक पुरुष की छाया थी और हर पुरुष पर एक स्त्री की छाया की तलाश में गुम था।
एक बात जो तय थी वहां शायद हमेशा धूप रहती थी दिन निकलनें और साँझ होने जैसे सुंदर कल्पनाएं वहां मिथ्या थी।
आकृतियों के मध्य जीवन था और जीवन के ठीक बीच में कुछ रिश्तें आड़े तिरछे फंसे हुए थे वहां बाहर की दुनिया में एक व्यवस्थित कोलाहल था मगर अंदर की दुनिया में एक ख़ास किस्म की नीरवता पसरी हुई थी।
अधिकार वहां सबसे अधिक करुणा का पात्र था क्योंकि ये दिन में इतनी दफा जगह बदलता था कि ये समझना मुश्किल था कि सुबह का निकला रात तक कहाँ पहुँचेगा।
वहां की दुनिया थोड़ी तिलिस्मी थी वो दावों की दुनिया था जिसमें दिन भर कोई न कोई किसी का खण्डन करके अपने जगह सुरक्षित करने की जुगत में था।
छायाओं के मध्य वास्तविक आकार थोड़े धूमिल हो गए थे इसलिए वहां पुरुष और स्त्री के लिंग पर प्रायः सन्देह किया जाता वो अनुमानों और सम्भावनाओं की उजड़ी हुई मगर हरी भरी दुनिया थी।
उस दुनिया को देखनें के लिए रोशनी नही सघन अंधेरा चाहिए था तभी दीवारों पर हाथ लगाते हुए अनुमान के भरोसे मंजिल की तरफ रोज़ कुछ लोग निकल पड़ते थे।
वो दुनिया था या एक छाया थी इसका भेद अज्ञात रहा मगर उस दुनिया का आंतरिक सच रहस्यमयी ढंग से बिखरा हुआ था जिसे देखनें के लिए कभी कभी ऊकडू बैठना पड़ता या फिर किसी से महज बस इतना पूछ लेना होता है कोई है क्या वहां?

'छायायुग'

Wednesday, December 16, 2015

सम्बोधि

तुम मेरे जीवन का एक मात्र असंपादित अंश थी
अंश इसलिए कहा क्योंकि तुम्हें सम्पूर्णता में पाने की मेरी पात्रता थोड़ी कमजोर थी।
तुमनें एकदिन महर्षि रमण का एक किस्सा सुनाया उनके एक जिज्ञासु शिष्य ने कहा गुरुदेव क्या आप मुझे शक्तिपात से सम्बोधि की अवस्था में पहूंचा सकते हो? महर्षि रमण बोलें हाँ ! मगर क्या तुम इस अवस्था में हो कि तुम शक्तिपात को ग्रहण कर सको?
इस किस्से के जरिए तुम मुझे मेरी अपात्रता नही बता रही थी बल्कि तुम कहना चाह रही थी कि देने वाला कई बार देने की इच्छा होने के बावजूद भी नही दे पाता है। तुमनें एक प्रसंग का सहारा लिया और प्रेम की दुनिया में मेरी उपस्थिति का भौतिक आंकलन कर लिया।
फिर मैंने विषय बदलते हुए कहा क्या तुम मुझे सम्पादित करना चाहती है तुमनें तुरन्त इनकार किया नही मैं इसके लिए पात्र नही हूँ।
दरअसल पात्रता और अपात्रता के मानकों की दुनिया के जरिए तुम प्रेम की इस सम्बोधि में मुझे देखना चाहती थी जहां मैं केवल रहूँ और अनुराग की दासता में कोई ऐसा हस्तक्षेप न करूं जिससे हमारी अपनी स्थापित दुनिया थोड़ी भी अस्त व्यस्त हो।
अचानक तुमनें एकदिन पूछा समय क्या हुआ है मैंने घड़ी देखनी चाहिए तो तुमनें मेरी कलाई को अपनी हथेली से बन्द कर दिया और कहा अनुमान से बताओं
मैंने कहा मेरे अनुमान अक्सर सही नही निकलतें है मैं अंदाजन चूक जाता हूँ फिर भी मैंने कहा एक बजा है शायद।
तुमनें उसके बाद घड़ी नही देखी और न मेरे अनुमान की सत्यता की जांच की तुम्हारी इस बेफिक्री ने सच कहूँ मुझे समय से बहुत दूर कर दिया।
इस घटना के बाद हमारा दोनों का अपना एक मौलिक समय तय हुआ जो अधिक प्रमाणिक लगा मुझे।
बोध जब गहराता गया तब ये तय करना मुश्किल हो गया कि तुम निकट हो या दूर जब मैंने इसके बारें में तुमसे सवाल किया तब तुमनें सिर्फ इतना कहा निकटता और दूरी मेरी दिलचस्पी का विषय नही है तब शायद तुम यह कहना चाह रही थी कि हमें नदी पुल के जरिए नही झूला डालकर पार करनी चाहिए।

'बोध-सम्बोधि'

Saturday, November 21, 2015

अंतिम आश्रय

तुम्हारे पास मेरा अंतिम अरण्य था।
मेरे भटकाव का एक अंतिम पड़ाव था जहां से मुझे मंजिल नजर आ रही थी मैंने दूर से मंजिल को देखा और केवल एक बार मुस्कुराया। तुमनें उस क्षण मुझे देखा और बातचीत का विषयांतर कर दिया मैंने इसे हस्तक्षेप की तरह नही लिया बल्कि मुझे अच्छा लगा तुमनें मेरे सम्मोहन को तोड़ दिया।
तुम्हारी यात्रा मुझसे अलग थी इसलिए हमारी थकन और अनुभव दोनों भिन्न थे मगर आत्ममोह की अवस्था में भी कोई एक दुसरे को कमतर नही समझता था। हमारी रूचि के केंद्र अब विमर्श नही थे शायद हमारी अनुभूतियां आपस में ठीक ठीक बात कर लेती थी। जैसे मैंने एकदिन कहा कि मेरा अप्रासंगिकताबोध कहीं अधिक गहरा है तुमनें मुझे करेक्ट तो नही किया मगर कहा तुम असावधानी में जीवन जीने के आदी हो गए हो। तुम्हारी उपस्थिति का एक अमूर्त मूल्य था मेरे लिए इसलिए सारे संयोगो में से एक संयोग ऐसा बन जाता था जब तुम्हारे आसपास मेरी ध्वनियाँ आश्रय पा जाती थी।
समय के आर पार लौटते हुए मैंने एक बार हाथ हिलाया तो तुम्हें लगा कि मैं विदा चाह रहा हूँ तुमनें मेरे चेहरे पर अरुचि नही पढ़ी थी इसलिए तुमनें कहा आगे देखो कही चोट न लग जाए उस समय मैं समझ पाया तुम आगे देखने की बात के जरिए मुझे सचेत करना चाह रही थी क्योंकि तुम्हारे अर्थो में सबसे गहरी चोट चैतन्यता से अस्त व्यस्त हो जाने की थी।
हमनें एक दुसरे को देखा और बस इतना कहा चलो चलतें है उस वक्त चलना एक क्रिया थी मुझे लगा ये हम दोनों के अस्तित्व का विशेषण है।

'अंतिम आश्रय'