Saturday, February 27, 2016

हीरो बनाम जीरो

ये एक खेदजनक बात थी कि हमारे नायक असल जिंदगी में बेहद अस्त व्यस्त थे। असल जिंदगी का यहां मतलब बेहद निजी किस्म की जिंदगी है इसलिए उनके नायकतत्व के साथ हमेशा कुछ अप्रिय प्रसंगों का सिलसिला चलता रहा।
व्यवस्था और अनुशासन बड़ी जटिल चीज है मूलतः मनुष्य एक अराजक प्राणी ही है हिंसा उसके अस्तित्व का बड़ा हिस्सा है। सिविलाईजेशन के चलते उसने अराजकता को छोड़ा है मगर एक हद तक ही।
तो क्या नायक हमेशा हमसे बेहतर होने या रहने के लिए बाध्य है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। एक परिष्कृत मस्तिष्क चित्त और सम्वेदना के बावजूद कुछ कुछ हिस्सों में आदर्श बेहद क्रूरतम रूप से बिखर जाता है वहां सब कुछ अप्रत्याशित चीजों की स्थाई शरण स्थली है।
मैं नायक और नायकतत्व से एक सीमा के बाद एक सुरक्षित दूरी बना लेता हूँ ताकि जब मैं कुछ अंदरुनी सच का साक्षात्कार करूँ तब मेरा मन कोई प्रतिकार न करें।
टूटे बिखरे कमजोर होते इंसान की दुनिया में नायकतत्व एक अभिशाप जैसा है जिसके बोझ में उसकी पीठ झुकती जाती है और एकदिन सूखी लकड़ी की तरह आग में जलकर चटक कर टूट जाती है।
शिकायतें ऐसी चटक की ही ध्वनियों का एक औपचारिक दस्तावेज़ है जिसका पाठ हमें राहत भरी बैचेनी देता है।

'हीरो इन जीरो ऑवर'

Monday, February 1, 2016

भोजपत्र

स्मृतियों की प्रतिलिपियां एकत्रित कर रहा हूँ इनदिनों।
बात आवश्यकता की नही है इसलिए तुमसे कुछ भी पुनर्पाठ करने का आग्रह मैंने नही किया। मैं अतीत में अलग अलग मार्ग और माध्यम से उतरता हूँ क्योंकि जिस रास्ते से मैं तुम्हारे साथ आगे बढ़ा उस पर वापस लौटने की सुविधा नही है।
मैं कभी याद करता हूँ तुम मेरी किस बात पर पहली बार मुस्कुराई थी कब मेरे बेवकूफ़ाना सवाल पर खुल कर हंसी थी। तुम्हारी नाराज़गियों के किस्से मैं डाक टिकिट की तरह इकट्ठा कर रहा हूँ ताकि खुद के अलग होने के अहसास को जी सकूं।
स्मृतियों के आख्यान स्थाई नही होते है ये मनोदशा के हिसाब से अपना पाठ बदल लेते है ये बात मुझे उसदिन पता चली जब तुमनें एकदिन अचानक मुझसे पूछा था
'तुम मुझे किस रूप में याद रखना चाहते हो?' मैंने कहा था तुम्हें किसी एक आवृत्ति में बांधने के बारें में सोचा नही कभी। जानता हूँ इस जवाब से तुम थोड़ी निराश हुई थी क्योंकि मेरे लिहाज़ से भी यह एक सही जवाब नही था मगर इसका सहारा ले मैं तब तुम्हारी सम्भावनाओं का विमर्श कर रहा था। ये मेरी बड़ी गलती थी।
तुमसे मिलने के बाद सच कहूँ तो मैं कुछ अंशो में स्थगित हो गया हूँ और तुम्हारी स्मृतियां उसी स्थगन से छनकर मुझतक आती है। ज़िन्दगी के हिस्सों और किस्सों में तुम कहीं मेरी तरफ पीठ किए बैठी हो तो कहीं इतनी नजदीक हो कि मेरी छाया का आकार विस्तृत हो गया है।
इस बात तो मैंने तुमसें संकेतो में कहा भी मगर तुम शायद मेरे द्वन्द को समझ गई थी इसलिए जब मैं नदी का जिक्र करता तुम मुझे रेगिस्तान की मृगमरीचिका का वैज्ञानिक कारण पूछने लगती मैं समन्दर की मजबूरी जानना चाहता तो तुम क्षितिज की ख़ूबसूरती पर एक कविता लिखने का आग्रह कर बैठती।
तुम्हारी स्मृतियों की छायाप्रति मेरे पास थोड़ी अस्त व्यस्त जरूर है मगर सब की सब है इसलिए इनके दस्तावेजीकरण को लेकर आश्वस्त हूँ।
ऐसा करने की जरूरत क्या है? ये तुम्हारा पहला सवाल होगा जिसका जवाब इनदिनों इन्ही स्मृतियों के सहारे तलाश रहा हूँ मैं।

'स्मृतियों के भोजपत्र'

Sunday, January 31, 2016

इश्क

इश्श्क...! कभी मर्तबान में कैद मछली सा हसीन तो कभी कच्ची पेंसिल सा नाजुक। इबारत और इबादत के बीच किस्सागोई सा फंसा एक अफ़साना जो रूह के उलझे अहसासों में कंघी करता है। चाहतों का ऐसा आसमाँ जिसमें परिंदे अक्सर अपना घौसला भूल जाते है और उड़ान में भटक कर खुद अपनी किस्मत में जलावतनी लिख देते है।
इश्क इबादत भी है और अदावत भी ये जिंदगी में इस कदर शामिल होता है कि फिर इंच भर कुछ भी हासिल करने की तमन्ना नही रह जाती। मासूम ख्यालों और ख़्वाबों को सिराहने रख सोती पलकों से पूछिए उनकी मुस्कुराहटो का हाल कैसे लब उनसे रश्क करने लगतें है वो नींद में चमकती है। जिंदगी जब करवट बदलती है इन्ही ख़्वाबों से वो रास्ता पूछती है ये अलग बात है कि इश्क की खुमारी में कहाँ से निकले और कहाँ पहूँचे।
इश्क पर तकरीर मुमकिन नही इसमें हौसला कहाँ से अता होता है खुद खुदा भी बयाँ नही कर सकता है। इश्क की पाकीजगी में जब कोई मुर्शीद अपने मुरीद की आँख में गुमशुदगी का सूरमा लगाता है तब कायनात का जर्रा जर्रा रोशन हो उठता है।
इश्क की चोटें गहरी और निशान हलके हुआ करते है ये जितना जताया जाता है उससे कई गुना छिपाया जाता है। इश्क महज महबूब को हासिल करने की तमन्ना नही रखता बल्कि ये दिल की धड़कनों के जरिए सजदा करने की ज़ुस्तज़ु लिए गाफिल रहता है।
हर्फ़ हर्फ़ इश्क की आयत इबादत का पता देती है रूह को कलन्दर बनाती है इश्क का दरवेश महबूब का दीदार रोज़ चश्म ए तर कर लेता है वो मुलाकतों का मुहाजिर नही होता।
जिसकी दीद में ईद परदानशीं रहती है वो उन आँखों की बिनाई में रोज़ इल्तज़ा और हया की तुरपाई करता है ताकि जिस्म के हवाले से इश्क सरे आम न हो जाए।
इश्क महज़ एक लफ्ज़ नही बल्कि एक हादसा है जिस पर जो ईमान लाता है फिर वो खुद पे हंसता है और खुद पर रोता है।
किसी के लिए दुआ करना तो इस इल्म की दुआ करना रब्बा इश्क न होवें....रब्बा इश्क ही होवें।

© डॉ.अजित

Thursday, January 28, 2016

फेसबुक

डायरी के पन्ने नही थी ये न्यूज़ फीड
टाइमलाईन पर कोई सहारा न मिला

मुद्दत बाद दोस्त तो जरूर मिलें यहां
दोस्ती का वो पुराना नजारा न मिला

ग्रीन लाइट जलती हो रात दिन पाबन्द
दूसरा यहां हम सा कोई आवारा न मिला

इनबॉक्स के दिन जवानी के जैसे मिले
जो बीत गया वो लहज़ा दोबारा न मिला

किन रिश्तों दोस्ती की बात करते हो मियाँ
फेसबुक पर डूबकर कभी किनारा न मिला

© डॉ. अजित

Sunday, January 24, 2016

सफर

जब तक तुम लौट कर आई मैं जा चुका था।
तुम्हारा लौटना सम्भावित था और मेरा जाना निश्चित। हम दोनों अपने अलग अलग कोण पर घूम रहे थे इसलिए एकदूसरे में सामनें अलबत्ता तो बेहद कम पड़े और यदि पड़े भी तो अपने अपने दृष्टि दोष के साथ।
साथ चलना हमेशा साथी नही बनाता ये बात तुमने एकदिन किसी दुसरे सन्दर्भ में कही थी मगर यकीनन सच कही थी। कई बार हम खुद ही अप्रासंगिक हो जाते है इसमें किसी का कोई दोष नही होता है इसलिए इस विलगता पर किसी भी किस्म की व्याख्या बेमानी है।
मैं जाने के बाद कुछ देर तक विचार शून्य रहा दिशाबोध भी लोप हो गया था कई चौराहे मैंने इसलिए छोड़ दिए कि रास्ता अगले वाले बदलूंगा फिर एक दोराहे से मैंने एक रास्ता पकड़ लिया और इसी रास्ते पर चलतें चलतें मैंने एकदिन पाया मैं तुमसे इतनी दूर निकल आया हूँ कि तुम किसी भी जरिए मुझे तलाश नही सकती।
जाहिर सी बात है जब तुम लौटी होगी तुमनें उसी आवृत्ति से मेरे बारें में पूछताछ की होगी मगर मेरी छाया गंध स्मृतियां कुछ न तुम्हें मिलेगी इसका इंतजाम मैं करके आया था।
जानता हूँ तुम लेशमात्र भी निराश नही हो न ही तुम इस पड़ताल में पड़ना चाहती कि हम में से किसने पलायन किया है ना ही तुम्हारे पास कुछ सवाल है मगर तुम रास्तों के चरित्र से विस्मित जरूर हो। तुम चौराहों के कौतुहल से अनजान नही हो मगर रास्तों के बदल जाने से थोड़ी परेशान जरूर रहोगी।
सफर एकसाथ कई स्तरों पर जिन्दा रहता है हमारा और तुम्हारा भी रहेगा क्या फर्क पड़ता है बस उसका साथ न हो जिसका साथ हमारे हाथ,काँधे और कदमों ने चाहा था?
या कुछ फर्क पड़ता है !

© डॉ.अजित

Thursday, January 21, 2016

याद शहर

उस शहर से इश्क था मुझे।
जिसके रास्ते अलग अलग मगर सब एक साथ थे जिसकी ईमारतें एक बिछड़ा हुआ कुनबा था एकदूसरे से नाराज़ मगर एकदिन मिलनें की आस पर जो खड़ी थी।
जिसकी गलियों में बच्चों का पसीना धूल को ठंडक देता था। उस शहर में हवाएं समझाईश का खेल खेलती थी ठेठ दुपहरी में भी पेड़ हवा के चेहरें पर ठंडे पानी के छीटें मारते थे।
दुनिया भर के लिए वो शहर भले ही हरजाई था मगर वो मेरा महबूब शहर था। उस शहर के पंछी निर्वासन के बावजूद बहुत खुश थे वें अपना वतन कभी याद न करतें थे सुबह सुबह उनको शहर के बालों में कंघी करते देखा जा सकता था।
सबसे बड़ी बात उस शहर में दरवाजे थोड़े से हमेशा खुले रहते थे वहां बंद कुछ भी नही था बाजार शहर में टापू की तरह था जिसे एकांत चाहिए होता वो खरीददारी के लिए भीड़ का हिस्सा बन जाया करता था।
उस शहर के ऊपर आसमाँ कुछ सीढ़ियां नीचे उतर कर आता था सूरज कुछ किरणों को वापिस नही मांगता था और चाँद घटता बढ़ता हुआ किसी को शिकायत का मौका नही देता था।
उस शहर के इश्क में मैं बर्बाद हुआ हूँ जिसे मेरी भले ही कोई खबर न ली हो मगर मेरी आह और वाह को डायरी की शक्ल में अपनी अलमारी में सम्भाल कर रखा था।
कल जब वो डायरी शहर के सिराहने छूट गई तब मुझे पता लगा कि शहर का दिल आज भी मेरे लिए उतनी ही बेचैनी से धड़कता है जितना कभी पहले धड़कता था बंद में कमरें में वक्त के रोशन से कुछ सर्द हवा अंदर आई और डायरी के पन्ने खुद ब खुद पलटनें लगे यह देख शहर ने खुद को समेट लिया और डायरी पर यादों का वजन रख करवट ले सो गया।
शहर से मुझे इस बात की शिकायत है मगर कभी जताऊंगा नही।


'वो शहर'

Wednesday, January 13, 2016

हंसी

सुबह कुछ तरह से हुई जैसे समन्दर किनारे सीप को कतार से सूरज की सलामी के लिए सजा दिया गया हो।
उदासी के घने जंगल में धूप पत्तियों की सीढ़ियां से उतर कर धरती की मांग को सीधा करने चली आई।
तुम हंसी तो उजाला गया मन्दिर में शंख के नाद सी दिव्य थी तुम्हारी हंसी जिसे मन के गर्भ ग्रह में प्राण प्रतिष्टित कर दिया गया है।
लबों का व्यास मुस्कान की गोद में चैन से सो रहा है और तुम्हारें दो डिम्पल नही है दरअसल वो नदी के दो किनारें है जो तुम्हारी हंसी के पुल पर उम्मीद से एकदुसरे को देख रहे हैं।
तुम्हारी हंसी में लेशमात्र भी कृत्रिमता नही है ये ठीक उतनी नैसर्गिक और पवित्र है जितनी किसी देवालय की घण्टी होती है।
तुम हंसी तो पछियों के बच्चें भूखे रहे गए उनकी माएं तुम्हें देख अपने अपने भूले हुए गीत याद करने लगी इसी हंसी को देख नदी का वेग कम हो गया है वो किनारों के कॉलर ठीक करती है और आगे बढ़ जाती है। किनारें तुम्हें दुआ दे रहे हैं तो झरनें अपने नेपथ्य में अंखड रुद्राभिषेक कर रहें है एक तुम्हारी अखण्ड हंसी के बदले कुछ उपेक्षित मूर्तियों पर जलधार पड़ने लगी है।
तुम्हारी गर्दन शास्त्र की दृष्टि से किसी बड़ी मीमांसा से कम नही है तुम्हारी चैतन्यता का पुल है जहां से तुम दिल और दिमाग को एकसाथ देख सकती हो। सृष्टि के निमित्त ये सदी का सबसे पुराना वृक्ष है जिस पर बाहर एक भी वलय का निशान नही है।
तुम्हारी दो आँखें  पहाड़ के एकांत के दूत है ये उनका सन्देशा समन्दर तक पहुँचाती है इनके जरिए ही समन्दर नदी की दूरी का अनुमान लगा अपनी प्रतिक्षा को स्थगित करता रहता है। इन पलकों के जरिए धूप अपना दुपट्टा सुखाती है और आंसू देवताओं से मिलने की यात्रा की रुपरेखा तय करतें है।
तुम्हारे माथे पर कुछ आधे अधूरे पते दर्ज़ है जिन्हें पढ़ने के लिए आसमान रोज़ चश्मा लगता है वो किसी बहाने इसे छूना चाहता है जिसके लिए न जाने कितनी बार बेमौसमी बारिश की गई मगर तुम न मिली इस बात पर आसमान आजतलक बादलों से नाराज़ है बादल  बूंदों से हवा से दोस्ती करने के लिए कहते है तुम्हारा भाग्य आजकल उनका इष्ट देव हो गया है वो जिसे रोज़ जपतें हैं।
तुम हँसती हो तो कहीँ धूप खिल जाती है कहीं बारिश हो जाती है बहुत कुछ दुनिया में इसी हंसी के जरिए घटित हो रहा है। कुछ लोग खुश रहें इसे देखकर तो कुछ अपने अतीत को याद करके उदास भी हो जातें हैं।

बहरहाल,
कुल मिलकार बात यही है यूं ही हंसती रहा करो।

Monday, January 11, 2016

बेसबब सफर

उस दिन तुमनें तेज दौड़ती गाड़ी का शीशा थोड़ा नीचा किया और अपना हाथ बाहर निकाल दिया तुम हवा को छूना चाहती थी।
हवा तुम्हारे हाथ की रेखाओं के बालों में कंघी करने लगी थी तुम्हारी ऊंगलियां मयूर पंख की तरह आह्लाद में खुल गई थी।
हवा शीशे से गुजरती तुम्हारी एक लट को उलझा रही थी सूरज तुम्हारे माथे की नाप ले रहा था तुम्हारे आँखें बेपरवाही में आधी बंद थी आधी खुली थी। तुम्हारी पलकों में क्षितिज के स्वप्न अंगड़ाई ले रहे थे।
वो एक दिव्य चित्र था जब हवा धूप और छाँव मिलकर तुम्हें संवार रही थी और तुम बिखर रही थी। तुम्हारे हाथ के जरिए हवा ने सीधी दस्तक दिल के उस कोने में दी थी जहां एक अलहदा ख़्वाब सो रहा था उसकी नमी हवा से दूर हुई तो तुम्हारी आँखों ने उसको सूरज़ से मिलवाया फिर वो एक आजाद पंछी की तरह तुम्हारी हंसी के जरिए उड़ गया।
तुम्हारे चेहरे पर हंसी और मुस्कान के मध्य का कोई भाव था ये भाव एकदम दुर्लभ किस्म का था इसलिए मैं किसी बात के हस्तक्षेप से इसे बदलना नही चाहता था क्योंकि मेरी आवाज़ से तुम सावधान हो सकती थी इसलिए मैं चुप रहा और तुम्हें हवा के गले में कुछ खत बांधते देखता रहा हूँ तुम्हारे हथेली और उंगलियो के बीच से हवा ठीक ऐसे बह रही थी जैसे कोई पहाड़ी नदी बहती है तुम्हारी रेखाएं आपस में आइस पाईस खेलनें लगी थी ये देखकर अच्छा लगा था।
तुम्हारी पलकों के रोशनदान पर दो अलग अलग ख़्वाब उड़ने की तैयारी में थे वहां जैसे ही नजदीकियों की धूप उतरी तुमनें हड़बड़ा कर आँखें खोले दी उसके बाद तुम सम्भल गई और हाथ अंदर करके शीशा बन्द कर लिया।
मैंने पूछा क्या हुआ ?
तुमनें कहा कुछ नही बस आँख लग गई थी!
मैं हंस पड़ा मेरी हंसी को तुमने इस तरह देखा जैसे मैंने छिपकर तुम्हारी वो सारी चिट्ठियां पढ़ ली हो जो तुमनें कभी लिखी ही नही।
फिर तुमनें तुरन्त विषय बदलते हुए कहा और कितना वक्त लगेगा?
मैंने कहा शायद थोड़ा और। फिर न तुमनें किलोमीटर पूछे और न घड़ी देखी शायद तुम समझ गई थी कि अलग होने का वक्त नजदीक आ गया है।
तुमनें सफर को छोटा कर दिया था और वक्त बीत रहा था बेहद तेजी से जिसको मैंने ठीक उस वक्त तुम्हारे चेहरे पढ़ा जब तुमनें अपना पर्स अपनी गोद में भींच लिया था जोर से।

'बेखबर बेसबब इक सफर'

Sunday, January 10, 2016

हक

सबसे मुश्किल था तुम्हें हिस्सों में चाहना।
ऐसा नही तुम मुझे सबसे ज्यादा पसन्द थे कुछ जगह तुम औसत तो कुछ जगह औसत से भी कमतर थे मगर जहां तुम बेहतर थे वहां सच में इतने बेहतर थे कि तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना से मुझे डर लगने लगता था।
मैं चाहती थी तुम्हें कुछ इस तरह से सहेज लूँ कि तुम्हारी इस बेहतरी की तुम्हे भी कानो कान खबर न हो। कुछ मामलों में तुमसे असमहत होने के बावजूद भी कुछ बिंदु ऐसे भी थे जहां मैं खुद से असहमत होते हुए भी तुमसे सहमत हो जाती थी।
तुम्हारी अनुपस्थिति में मैंने महसूस किया कि सामान्य होने का अपना एक आकर्षण है जहां आपके पास बहुत कुछ बखान या व्याख्यान के लिए न हो वहां भी अनुराग की छाँव पहुँच सकती है।
तुम समय से आगे थे या पीछे ये नही जानती मगर इतना जरूर जानती हूँ तुम्हारे साथ बिताया मेरा छोटा समय इतना विस्तार पा जाता था कि मैं उसके कोलाज़ में मनमुताबिक़ रंग भर सकती थी।
तुम्हें सोचते हुए मैंने करवटों के अंतराल पर अलग अलग भाव महसूस किए कभी मुझे खुद पर गुस्सा आया तो कभी तुम पर बेशुमार प्यार भी और ये वो प्यार था जिसे मैं कब की भूल चुकी थी। ये सच है प्रेम जितना प्रतिदान मांगता है उतनी क्षमता नही है मुझमें और न ही तुम कहीं ठहरे हुए हो तुम सतत् एक यात्रा में हो यह मैं मुद्दत से देख रही हूँ मगर फिर भी तुम्हारे अस्तित्व के कुछ ऐसे निर्मल पक्ष है जिन्हें सोच कर मेरे चेहरे पर एक इंच मुस्कान आ जाती है और पलक बेसबब छलक उठती है।
इस मतलबी दुनिया में तुम इतने लापरवाह हो कि तुम्हें खुद नही पता है कि तुम क्या हो और इसी लापरवाही से मुझे रश्क हो रहा है कोई ऐसा कैसे हो सकता है जबकि तुम्हारे अंदर असीम सम्भावनाएं है तुम उन पर बात करना पसन्द नही करते तुम बात भी क्या करते हो पहाड़ से उतरते वक्त चक्कर ज्यादा आए थे या पहाड़ पर चढ़ते वक्त...धत्त ! यहां मैं तुम्हारे सामने घूम रही होती हूँ और तुम पहाड़ की कहानी सुनना सुनाना चाहते हो।
मुझे डर लगता है कभी कभी क्योंकि वक्त ऐसा हमेशा नही रहेगा न ऐसी मैं रहूंगी और न शायद तुम ऐसे रहोगे शायद इसलिए लगा रही हूँ तुम ऐसे रह भी सकते हो क्योंकि तुम बेपरवाह जीने के आदी हो।
मैंने तुमसे एकदिन पूछा कि क्या बदलाव एक अपेक्षित छल होता है? तुमनें कहा अपेक्षा है तो छल का होना कोई बड़ी बात नही ! या ये अपेक्षाभंजन का युक्तिकरण भी हो सकता है उस दिन मैंने जाना तुम किसी और दुनिया के हो।
खैर ! जिस भी दुनिया के हो ऐसे ही रहने मैं भले ही कल बदल जाऊं तुम मत बदलना।
इतना कहने का हक समझती हूँ तो कह रही हूँ।

Friday, January 8, 2016

इदम् न मम्

रोज़ सुबह जब सूरज निकलता है धरती से इजाज़त नही लेता वो जानता है उसका इन्तजार किया जा रहा है इसलिए आ जाता है बिन बुलाए मेहमान की तरह।
बादल कभी कभी सूरज को उसके कद का अहसास दिलाने के लिए ढक लेते है ताकि वो धरती को थोड़ा बैचेन देख सके।
चाँद छलिया है वो अलग अलग कोण से धरती को देखता है खासकर जब रात को कुछ दिनभर की सलवटों को समेटकर धरती सोने को होती है चाँद उसके कान प्रेम की स्मृतियों का मन्त्र फूंक देता है। चाँद धरती के मन को जानता है और सूरज धरती के तन धरती मगर चाँद सूरज दोनों से बेखबर है वो आधा अधूरा खुद को जानती है।
मन का खगोल शास्त्र कम ग्रहण से भरा हुआ नही है धरती की तरह किसी न किसी पल कोई ग्रहण मन की सतह पर रोज़ घटित होता रहता है। इसलिए अब ग्रहण के साथ जीने की आदत हो चली है कोई ख़ास फर्क नही पड़ता थोड़ी देर के लिए अगर अन्तस् में अंधेरा भी पसरता है तो।
सूरज चाँद धरती और ग्रहण इन्हें खगोलीय पिंड से हटकर गहरे प्रतीक के रूप में तुम्हारी वजह से देख पाया मुश्किल वक्त में इनसे थोड़ी हिम्मत मिलती है लगता है कोई बिछड़े दोस्त है जो अपनी बीते हुए कल की कहानी सुनाना चाहतें है।
इनकी कहानी सुनकर मेरे कान बड़े हो गए और नाक छोटी हो गई है एक छोटी नदी मेरे अंदर बहने लगी है वो किसी मुख्य स्रोत नही निकली बस एक जमें हुए अवसाद का सीना उसनें तोड़ दिया है वो भटक रही है अपना रास्ता बनाने के लिए मुझे उम्मीद है वो अपनी तलहटी विकसित कर लेगी एकदिन। मेरे छाती पर एक हरा भरा जंगल उग गया है जिसकी छाँव इतनी गहरी है कि सूरज की रोशनी तक अंदर नही आ पाती है वहां कुछ ऐसे दरख्त उगे है जिनको वानिकी विज्ञानियों ने लुप्तप्रायः मान लिया था यहां उनकी पैदाइश मन के विज्ञान से सम्भव हुई है।
बहुत विषयांतर नही करूँगा जैसा हो भी गया है बस इतना कहूँगा एक तुम्हारी वजह से मैंने रच ली है अपनी एक समानांतर सृष्टि जहां जंगल नदी झरने पहाड़ चाँद सूरज सब के सब मेरे अपने है।
हां धरती की तरह ये मेरा स्थाई दुःख है बस तुम मेरे न हो सके।
चलो कोई बात नही अपना पराया वैसे क्या होता है ये सब तो समय के सापेक्ष मनुष्य के भरम ही तो है।
आना कभी मिलनें एकांत के जंगल में शायद तुम्हारी हंसी से कुछ मन के उदास पंछियो को अच्छा लगे।

'इदम् न मम्'

Thursday, January 7, 2016

सफर के नोट्स

अनामिका से उम्मीद की आँखों में काजल लगाता हूँ मैं
मेरा हाथ जरा सा कांपने लगता है।
इस दृश्य में तुम भी अप्रत्यक्ष: शामिल होती हो। बादलों के पीछे एक डाकघर है जहां बैरंग और गलत पते के खत रखे जातें है। डाकिया हम दोनों का पता याद नही कर पाता है हाँ वो लिखावट से बता सकता है कौन सा खत किसका है।
कई दिनों से समन्दर मुझे बुलाता है उसके बुलावे देख तुम्हें याद करता हूँ मगर समन्दर की जिद है कि मुझसे मिलनें अकेले ही आना, तुम्हारे बिना कहीं जाने में एक खतरा यह भी है कि मैं फिर उतना नही लौट पाऊंगा जितना कभी गया था।
तुमनें एक दिन पूछा था मैं कितना लम्बा जीने की इच्छा रखता हूँ तब मैंने कोई प्रभावित करने वाला जवाब दिया था क्योंकि जहां तक मुझे याद है मैंने कुछ साल बताए दरअसल इतने साल जीना चाहता हूँ ये कहना एक किस्म का तात्कालिक छुटकारा था जब मैंने इस सवाल पर गौर किया तो मेरे जीने की चाह साल महीनें या दिन में नही आई मैं जीना चाहता हूँ कुछ किलोमीटर कुछ बसन्त और कुछ पतझड़ थोड़ी सी सुनसान बारिशें रात और दिन के सन्धिकाल पर उदासी के पल गिनते हुए हिसाब लगाना चाहता हूँ वक्त का।
इसलिए अपना पहला वक्तव्य वापिस लेता हूँ वो तुम्हारे किसी काम का नही है।
धरती पर कान लगाता हूँ वो मेरे वजन का हिसाब मेरे कान में बताती है साथ ही वो यह भी कहती है मेरे वजन का बोझ किसी और की ज़िन्दगी में भी शामिल है जब मैं उससे मानचित्र मांगता हूँ तब वो मेरा कान खींचकर कहती है इतने भी मतलबी मत बनों।
फिर मैं चल पड़ता हूँ अनन्त की ओर अज्ञात की ओर।
जो मुझे बाहर से देख रहा है वो बता सकता है मेरी दिशा और भटकाव का मानचित्र।
मेरे पदचिन्हों से जिस दिन लिपि विकसित की जाएगी उस दिन हमारा तुम्हारा सम्वाद सार्वजनिक होगा।

'सफर के नोट्स'

Tuesday, January 5, 2016

मिलना

तुम मुझे तब मिले जब मिलना कोई घटना नही थी मेरे जीवन में।
इसलिए तुम्हारा मिलना किस रूप में मैं स्मृतियों में संरक्षित करूँ यह तय नही कर पाया आजतक।
एक बेहद जीवन्त बातचीत में तुमने एक जम्हाई ली और अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को देखा मैंने इस बात को तुम्हारी अरुचि नही समझा बल्कि तुम उस वक्त ये बताना चाह रही थी कि मुझे बातों को उनके सही वक्त पर करने का पता होना चाहिए।
एक दुसरे की कमजोरियों पर अक्सर हमनें खूब बातें की यह खुद को अधिक परिपक्व और पारदर्शी जताने का एक उपक्रम था वैसे खूबियों पर भी क्या बात करनी थी खूबियां समय सापेक्ष होती है अदलती बदलती रहती है आज जो मेरे ऐब है कल वो मेरी खूबी हुआ करती थी।
तुमने एक दिन पूछा चाय में चीनी कितनी लोगे एक चमच्च? मैंने कहा अपनी चाह का अनुमान मुझे लगाना नही आता इसलिए खुद के अनुमान पर भरोसा नही है फिर मैंने देखा तुमनें आधी चमच्च चीनी डाली इसका अर्थ मैंने यह विकसित किया कि तुम भी मेरे बारें में किसी अनुमान को बचती थी।
कुछ बेहद छोटी और मामूली सी बातें है जो विषय के वर्गीकरण के अभाव में भटक रही है मसलन अक्सर यह हमनें एक दूसरे से यह पूछा कैसे है? मेरी समझ में शिष्टाचार की शक्ल में इससे बेवकूफाना सवाल और कोई हो नही सकता है कोई कैसा है यह बात वो ठीक ठीक बता पाएं यह बेहद मुश्किल है एक ही पल के अलग अलग छोर पर मनुष्य बेहद जीवन्त या अनमना हो सकता है।
तुमसे मिलना समय का एक युक्तियुक्त हस्तक्षेप था या फिर एक बेहद अवैज्ञानिक किस्म का मानवीय षड्यंत्र इन दोनों बातों के अलावा मैं तीसरी बात सोचता हूँ यदि तुम न मिली होती तो क्या मैं इस तरह असंगत बातों को एक शृंखला में कह पाता? शायद नही।
तुम्हारा मिलना असंगतता को अर्थ दे गया यह कम बड़ी बात नही है इसे जीने के बहाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
वही मैं कर रहा हूँ।

'मॉर्निंग रागा'

Wednesday, December 30, 2015

आँखें -2

एक वर्जन यह भी:

छल और प्रेम में विश्वास और सन्देह में तुम्हारी आँखों के फेरे बंधे थे। सप्तपदी की तरह इन आँखों के अपने कुछ वचन थे जिन्हें दोहराना नही पड़ता था। तुम पलकें झपकती तो कुछ वादे आईस पाईस खेलनें लगतें। इन खंजन नयनों में आग्रह आमन्त्रण या सपनों का बासीपन नही था बल्कि इनमे खुली आँखों से देखे कुछ अलहदा ख़्वाबो के जोखिम की बन्दनवार टँगी थी।
इन दो आँखों की कैफियत समन्दर किनारे अधलेटे दो आवारा परिंदों के माफिक थी जो साँझ ढलनें के बाद कहीं लौटना नही चाहते थी वो बाहों के घेरों में कुछ कुछ अंतराल में चारों युगों को पहरेदार बना इश्क में अय्यारी करने का हुनर सीखना चाहते थे।
अपनी अनामिका से तुमनें काजल एक टीका मेरी मुस्कान पर लगा दिया मुझे अचानक देख जो एक बूँद आँख से छलक आई थी उससे तुमनें मेरी पीठ पर एक वृत्त बनाया और उसके ठीक मध्य कामनाओं का एक अमूर्त चित्र खींच दिया।
दरअसल ये महज दो आँखें नही थी बल्कि ये दो खिड़कियां थी जिन पर कांधा टिकाए हम दोनों एक दुसरे के मन की गिरह खोलनें के लिए अपने अपने उदास गीत गुनगुना रहे थे। तुमनें एक अंगड़ाई ली और कुछ देर के लिए तुम्हारी पलकें सुस्तानें नीचे उतर आई उसी दौरान में मैंने एक गुजारिश का छींटा तुम्हारी आँखों पर मार दिया तुमनें आँखे खोली मेरे हिस्से में कुछ गुमशुदा शाम आई।
इन्ही आँखों के सहारे मैंने ख्वाहिशो की कतरनें तुम्हारे मन के पते पर पोस्ट की और तुमनें उनकी सिलवट को सीधा करते हुए अपने लबो पर ज़बां फेरी यकीं करना इन लम्हों में मेरा वजूद इस कदर बह गया कि आज तलक मैं गुजिश्ता लम्हों से गुजारिश करता हूँ कि तुम्हारी आँखों के जरिए मुझे मेरा गुमशुदा पता चल जाए ताकि मेरी गुमराही खत्म हो और इन्तजार की शक्ल मुझे तुम हासिल हो फिलहाल तुम मुस्कुरा सकती  हो मगर हंसना मत क्योंकि तुम्हारी पलकों के छज्जे पर कुछ मेरी ख्वाहिशें बैठ डूबता सूरज देख रही है।

Tuesday, December 29, 2015

उसकी आँखें

' उन आँखों में एक कातरता थी। करुणा और अवसाद का सम्मिश्रण बन आँखों सी तलहटी से बह रहा था। आँखों के कोण  उन अक्षांशों पर स्थापित हो गए थे जहां निकटता और दूरी को एक साथ देखा जा सकता था।
आँखों के जरिए एक जीना ठीक उसके दिल में उतरता था मगर दिल के दरवाजे पर सांकल चढ़ी थी। वो जब देखती तो कोई प्रश्न शेष न बचते उसकी आँखों का भूगोल निर्जनता के कई खोए मानचित्र लिए थे जिनकी शिनाख्त करने की हिम्मत बड़ी मुश्किल से जुटा पाता था।
वो नदी की तरह विकल थी मगर उसने अपने किनारों को तन्हा नही छोड़ा था उसके पास कुछ वजीफे थे जो उसनें स्पर्श की शक्ल में किनारों को दिए थे। उसकी आँखों में नदी के जलस्तर को नापने का पैमाना था वहां वेग की उथल पुथल उतनी साफ़ नही पढ़ी जा सकती थी मगर उसकी आँखों के जरिए कुछ अनुमान और गणनाएं अवश्य की जा सकती थी मसलन आंसूओं की आद्रता का स्तर क्या है वो सूखकर ग्लेशियर बनेंगे या फिर बहकर समाप्त हो जाएंगे हमेशा के लिए।
वो प्रकृति का अनहद नाद थी जिसकी ध्वनि आँखों के रास्ते सुनी जाती थी उसका काजल आवारा बदरी की टुकड़ियों का एक समूह था जो वक्त बेवक्त बरस जाया करता था इसी के जरिए आँखों की नमी चमक में तब्दील होती थी।
वो जब देखती तो शब्द दुबक जाते वाणी और स्वर अर्थ खो देते और आँखें भाषा का अधिकार पा लेती उसकी आँखों के महाकाव्य पढ़ने के लिए गर्दन नीची नही करनी पड़ती। उसे पढ़ते हुए जाना जाता शब्द का ब्रह्म हो जाना उसकी आँखों का अपना एक स्वतन्त्र शब्दकोश था जिसके पन्ने स्वतः पलक झपकनें के अंतराल पर पलटते जाते।
वो एक नदी थी वो एक महाकाव्य थी वो एक जीवन्त आख्यान थी और उसकी आँखें इल्म और अदब की दरगाह थी जहां कलन्दरो को पनाह मिलती थी उसकी निगाह में आतें ही खाकसार मुरीद और मुर्शिद एक साथ हो जाते थे।

Thursday, December 17, 2015

छायायुग

वहां हर स्त्री पर एक पुरुष की छाया थी और हर पुरुष पर एक स्त्री की छाया की तलाश में गुम था।
एक बात जो तय थी वहां शायद हमेशा धूप रहती थी दिन निकलनें और साँझ होने जैसे सुंदर कल्पनाएं वहां मिथ्या थी।
आकृतियों के मध्य जीवन था और जीवन के ठीक बीच में कुछ रिश्तें आड़े तिरछे फंसे हुए थे वहां बाहर की दुनिया में एक व्यवस्थित कोलाहल था मगर अंदर की दुनिया में एक ख़ास किस्म की नीरवता पसरी हुई थी।
अधिकार वहां सबसे अधिक करुणा का पात्र था क्योंकि ये दिन में इतनी दफा जगह बदलता था कि ये समझना मुश्किल था कि सुबह का निकला रात तक कहाँ पहुँचेगा।
वहां की दुनिया थोड़ी तिलिस्मी थी वो दावों की दुनिया था जिसमें दिन भर कोई न कोई किसी का खण्डन करके अपने जगह सुरक्षित करने की जुगत में था।
छायाओं के मध्य वास्तविक आकार थोड़े धूमिल हो गए थे इसलिए वहां पुरुष और स्त्री के लिंग पर प्रायः सन्देह किया जाता वो अनुमानों और सम्भावनाओं की उजड़ी हुई मगर हरी भरी दुनिया थी।
उस दुनिया को देखनें के लिए रोशनी नही सघन अंधेरा चाहिए था तभी दीवारों पर हाथ लगाते हुए अनुमान के भरोसे मंजिल की तरफ रोज़ कुछ लोग निकल पड़ते थे।
वो दुनिया था या एक छाया थी इसका भेद अज्ञात रहा मगर उस दुनिया का आंतरिक सच रहस्यमयी ढंग से बिखरा हुआ था जिसे देखनें के लिए कभी कभी ऊकडू बैठना पड़ता या फिर किसी से महज बस इतना पूछ लेना होता है कोई है क्या वहां?

'छायायुग'

Wednesday, December 16, 2015

सम्बोधि

तुम मेरे जीवन का एक मात्र असंपादित अंश थी
अंश इसलिए कहा क्योंकि तुम्हें सम्पूर्णता में पाने की मेरी पात्रता थोड़ी कमजोर थी।
तुमनें एकदिन महर्षि रमण का एक किस्सा सुनाया उनके एक जिज्ञासु शिष्य ने कहा गुरुदेव क्या आप मुझे शक्तिपात से सम्बोधि की अवस्था में पहूंचा सकते हो? महर्षि रमण बोलें हाँ ! मगर क्या तुम इस अवस्था में हो कि तुम शक्तिपात को ग्रहण कर सको?
इस किस्से के जरिए तुम मुझे मेरी अपात्रता नही बता रही थी बल्कि तुम कहना चाह रही थी कि देने वाला कई बार देने की इच्छा होने के बावजूद भी नही दे पाता है। तुमनें एक प्रसंग का सहारा लिया और प्रेम की दुनिया में मेरी उपस्थिति का भौतिक आंकलन कर लिया।
फिर मैंने विषय बदलते हुए कहा क्या तुम मुझे सम्पादित करना चाहती है तुमनें तुरन्त इनकार किया नही मैं इसके लिए पात्र नही हूँ।
दरअसल पात्रता और अपात्रता के मानकों की दुनिया के जरिए तुम प्रेम की इस सम्बोधि में मुझे देखना चाहती थी जहां मैं केवल रहूँ और अनुराग की दासता में कोई ऐसा हस्तक्षेप न करूं जिससे हमारी अपनी स्थापित दुनिया थोड़ी भी अस्त व्यस्त हो।
अचानक तुमनें एकदिन पूछा समय क्या हुआ है मैंने घड़ी देखनी चाहिए तो तुमनें मेरी कलाई को अपनी हथेली से बन्द कर दिया और कहा अनुमान से बताओं
मैंने कहा मेरे अनुमान अक्सर सही नही निकलतें है मैं अंदाजन चूक जाता हूँ फिर भी मैंने कहा एक बजा है शायद।
तुमनें उसके बाद घड़ी नही देखी और न मेरे अनुमान की सत्यता की जांच की तुम्हारी इस बेफिक्री ने सच कहूँ मुझे समय से बहुत दूर कर दिया।
इस घटना के बाद हमारा दोनों का अपना एक मौलिक समय तय हुआ जो अधिक प्रमाणिक लगा मुझे।
बोध जब गहराता गया तब ये तय करना मुश्किल हो गया कि तुम निकट हो या दूर जब मैंने इसके बारें में तुमसे सवाल किया तब तुमनें सिर्फ इतना कहा निकटता और दूरी मेरी दिलचस्पी का विषय नही है तब शायद तुम यह कहना चाह रही थी कि हमें नदी पुल के जरिए नही झूला डालकर पार करनी चाहिए।

'बोध-सम्बोधि'

Saturday, November 21, 2015

अंतिम आश्रय

तुम्हारे पास मेरा अंतिम अरण्य था।
मेरे भटकाव का एक अंतिम पड़ाव था जहां से मुझे मंजिल नजर आ रही थी मैंने दूर से मंजिल को देखा और केवल एक बार मुस्कुराया। तुमनें उस क्षण मुझे देखा और बातचीत का विषयांतर कर दिया मैंने इसे हस्तक्षेप की तरह नही लिया बल्कि मुझे अच्छा लगा तुमनें मेरे सम्मोहन को तोड़ दिया।
तुम्हारी यात्रा मुझसे अलग थी इसलिए हमारी थकन और अनुभव दोनों भिन्न थे मगर आत्ममोह की अवस्था में भी कोई एक दुसरे को कमतर नही समझता था। हमारी रूचि के केंद्र अब विमर्श नही थे शायद हमारी अनुभूतियां आपस में ठीक ठीक बात कर लेती थी। जैसे मैंने एकदिन कहा कि मेरा अप्रासंगिकताबोध कहीं अधिक गहरा है तुमनें मुझे करेक्ट तो नही किया मगर कहा तुम असावधानी में जीवन जीने के आदी हो गए हो। तुम्हारी उपस्थिति का एक अमूर्त मूल्य था मेरे लिए इसलिए सारे संयोगो में से एक संयोग ऐसा बन जाता था जब तुम्हारे आसपास मेरी ध्वनियाँ आश्रय पा जाती थी।
समय के आर पार लौटते हुए मैंने एक बार हाथ हिलाया तो तुम्हें लगा कि मैं विदा चाह रहा हूँ तुमनें मेरे चेहरे पर अरुचि नही पढ़ी थी इसलिए तुमनें कहा आगे देखो कही चोट न लग जाए उस समय मैं समझ पाया तुम आगे देखने की बात के जरिए मुझे सचेत करना चाह रही थी क्योंकि तुम्हारे अर्थो में सबसे गहरी चोट चैतन्यता से अस्त व्यस्त हो जाने की थी।
हमनें एक दुसरे को देखा और बस इतना कहा चलो चलतें है उस वक्त चलना एक क्रिया थी मुझे लगा ये हम दोनों के अस्तित्व का विशेषण है।

'अंतिम आश्रय'

Friday, November 20, 2015

एक पाती

तुम थोड़े अलग थे। अलग इसलिए कि तुम एक ही मनोभाव की मनमुताबिक़ दस किस्म की व्याख्या कर सकते थे और अच्छी बात ये भी थी कि ऐसा तुम किसी को खुश या प्रभावित करने के लिए नही करते थे।
तुम्हें मैंने तटस्थता से महीनों केवल देखा और सुना था तुम्हें देख मैं निष्कर्षों की जल्दी में नही थी बल्कि अक्सर ये सोचती थी कि तुम अपने बारें में तय की गई हर राय को एकदिन गलत साबित कर दोगे।और एक दिन तुमनें वही किया भी।
तुम्हारे तर्क इतने मौलिक किस्म के थे कि उन्हें किसी अवधारणा के संदर्भ लेने की आवश्यकता नही थी। अलबत्ता तो तुम बहस से बचते थे मगर यदि कहीं कहना जरूरी हुआ तो तुम्हारी समझ और विनम्रता बहस की सबसे चमकीली वस्तु हुआ करती थी।
मुझे लगा था कि तुम एक मुक्त चेतना है फ्री फ्लो में बहते एक पानी के स्रोत की तरह तुम्हें न कहीं पहुँचनें की जल्दी थी और न एकदिन समाप्त होने का भय तुम क्षणिकता में जीवन को जीने के आदी थे।
मेरा तुमसे भले ही कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष किस्म का कोई रिश्ता नही रहा था मगर फिर भी मैं खुद को तुम्हारे करीब पाती थी। तुम्हें अवसाद में देख मैं फ़िक्र और खुशी दोनों एक साथ महसूस करती फ़िक्र इस बात कि तुम्हारी लड़ाई खुद से कितनी बढ़ गई है और खुशी इस  बात कि तुम चरम् अवसाद के पलों में भी अपनी रचनात्मकता को बुझनें नही देते बल्कि मैं मतलबी होकर कहूँ तो तुमनें अवसाद के दौर में अपने जीवन का सर्वश्रेष्ट रचा हैं।
अचानक मैंने पाया तुम्हारे जीवन के केंद्र बदल गए है मैं ये नही कहूँगी कि तुम रूपांतरित हो गए बल्कि बड़ी निर्ममता से कहना पड़ रहा है कि तुम बदल गए थे।ये बदलाव अनापेक्षित था क्योंकि मैं तुम्हारे रूपांतरण को लेकर सोच रही थी बदलाव को नही। एकदिन तुमनें बातचीत में कहा था जो मुझे प्रिय है मैं आगे चलकर उससे एक सुरक्षित दूरी बना लेता हूँ। तुम्हारा ये बदलाव हमारे मध्य यही दूरी लेकर आया था मैं तुम्हें प्रिय थी ये अर्थ निकालना अब जरा मुश्किल था मेरे लिए क्योंकि तुम जिस तरह से दिखने और पेश आने लगे थे उसे देख मैंने तय कर लिया था अब तुम्हारा साथ अपने अंतिम पड़ाव पर था।
मैंने तुम्हें हंसते हुए अलविदा कहा मगर कुछ सवाल आज भी दिल में है तुम से जुड़े सवाल कम से कम मैं जेहन में नही रख पाती हूँ आज भी। ये सवाल मुझे कभी परेशान नही करते है बल्कि अक्सर मुझे रास्ता ही दिखाते है जब जब मैं तुम्हारी याद में भटक जाती हूँ।
तुम अब कभी मिलोगे इसकी उम्मीद नही है मगर तुम खो गए इसका कुछ दशमलव दुःख मुझे हमेशा रहेगा।

'एक पाती'

Monday, October 12, 2015

नवरात्रि

सतत् ऊर्जा के संचयन, संलयन और रूपांतरण के लिए शक्ति के साथ एक बेहतर संयोग और समन्वय आवश्यक है। पुरुष और प्रकृति के तादात्म्य से पूर्णता जन्म लेती है दोनों एक दूसरे के पूरक है। ऊर्जा के एक स्थाई स्रोत के रूप में शक्ति की उपस्थिति को अनुभूत करनें के लिए खुद के शिव तत्व को परिमार्जित करना पड़ता है तभी इसका सहज साक्षात्कार सम्भव है। चैतन्य यात्रा में शिव-शक्ति,पुरुष-प्रकृति ये सब उस आदि ब्रह्म के प्रतीक है जिनका अंश लेकर हम इस ग्रह पर विचरण कर रहें हैं।
मन के तुमुल अन्धकार के समस्त प्रयास शक्ति से सम्बंधता बाधित करने के रहते है वो हमें दीन असहाय भरम में पड़े देखना चाहता है उसकी चाह में कुछ अंश प्रारब्ध का है तो कुछ हमारे कथित अर्जित ज्ञान का।
शक्ति स्वरूपा नाद को अनुभूत करने के लिए कामना रहित समर्पण चाहिए होता है अस्तित्व को मूल ऊर्जा स्रोत से जोड़ने की अपेक्षित तैयारी भी अनिवार्य होती है। 'स्व' को व्यापक दृष्टि में पूर्ण करने के लिए शिव और शक्ति से सम्मलित ऊर्जा आहरित करनी होती है।
आप्त पुरुष अहंकार को तज शक्ति की सत्ता को स्मरण करते है उसकी उपस्थिति में याचक नही अधिकारपूर्वक ढंग से खुद को समर्पित कर पूर्णता की प्रक्रिया का हिस्सा बनतें हैं।
पौराणिक गल्प से इतर पुरुष प्रकृति के सांख्य योग के बीज सूत्र सदैव से अखिल ब्रह्माण्ड में उपस्थित रहते है। अपनी तत्व दृष्टि और पुनीत अभिलाषा से उनसे केंद्रीय संयोजन और सम्वाद की आवश्यकता होती है।
शिव तत्व को शक्ति के समक्ष समर्पित करके खुद की लघुता का बोध प्रकट होता है और यही लघुता अस्तित्व की ऊंची यात्राओं का निमित्त बनती है कण कण में चेतना और संवदेना को अनुभूत करनें के लिए खुद को देह लिंग और ज्ञान के आवरण से मुक्त कर सच्चे अर्थों में मुक्तकामी और पूर्णतावादी बनना पड़ता है।
रात्रि अन्धकार का प्रतीक लौकिक दृष्टि में मानी गई है परंतु रात्रि वस्तुतः अन्धकार की नही अपने अस्तित्व की अपूर्णता का प्रतीक है दिन के प्रकाश में अन्तस् के उन गहरे वलयों को हम देख नही पाते है जिन पर अहंकार की परत जमी होती है रात्रि का अन्धकार अन्तस् में प्रकाश आलोकित करने का अवसर प्रदान करता है जिसके माध्यम से हम अपने अन्तस् में फैले अन्धकार को देख सकते है और बाहर से अन्धकार से उसकी भिन्नता को अनुभूत कर सकते है।
शक्ति की उपादेयता हमें आलोकित और ऊर्जित करने की है पुरूष और प्रकृति का समन्वय ब्रह्माण्ड के वृहत नियोजन का हिस्सा है जो जीवात्माएं इस नियोजन में खुद की भूमिका को पहचान लेती है वें सच में अस्तित्व की समग्रता को भी जान लेती है। शिव शक्ति के तादात्म्य के अनुकूल अवसर के रूप में संख्याबद्ध दिन या रात का निर्धारण एक पंचागीय सुविधा भर है इस उत्सव में खुद को समर्पित और सहज भाव से शामिल करके खुद को परिष्कृत किया जा सकता है और उस अनन्त की यात्रा की तैयारी के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचयन भी किया जा सकता है जिसके बल पर हमें पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण तोड़कर एक दिन उसी शून्य में विलीन हो जाना है जहां से एकदिन सायास हम यहां आए थे।

'नवरात्रि और सवेरा'

Thursday, October 8, 2015

औसत

मनुष्य के पैमाने सर्वोत्तम की तरफ आकर्षित होते है निम्न या औसत के प्रति वो उपेक्षाभाव अपना लेता है। यह मूल्यांकन की सदियों पुरानी परम्परा की कन्डीशनिंग है।इससे मुक्ति दुलर्भ है। बिना किसी महानता के विज्ञापन या धारण स्थापन के बताता हूँ मुझे औसत, औसत से नीचे की या फिर हाशिए की चीजें सर्वाधिक आकर्षित करती है। उपेक्षा में जीते जीते औसत दर्जे के लोगो का सौंदर्य बहुत प्रिजर्व किस्म का हो जाता है। ऐसे ही सौंदर्य को देख मैं अभिभूत और चमत्कृत होता हूँ।
मसलन मुझे बहुत गोरा रंग कभी आकर्षित नही करता है जिनका रंग सांवला है या गेहुँआ है मुझे उनके तेज में एक ख़ास किस्म की अलौकिकता नजर आती है यहां तक अफ्रीकन कॉन्टेन्ट की स्त्रियों में भी मैं गहरे सौंदर्य मूल्य पाता हूँ। गोरी देह या गोरा दिखनें की चाह शायद हमारे मन की ग्रंथियों का परिणाम होती है। ऐसा नही कि मुझे गोरे लोग अप्रिय है मगर मुझे स्वाभाविक रूप से सांवला,गेहुँआ या डार्क कॉम्प्लेक्शन ही आकर्षित करता है। पुरुषों के मामलें में कद भारतीय समाज का एक बड़ा मानक है मगर मुझे कद कभी एक मानक नजर नही आया न ही मैं शरीर सौष्ठव से किसी पुरुष का मूल्यांकन करता हूँ मुझे औसत लम्बाई और सामान्य कद काठी के लोग पसन्द है। देह को कसनें के लिए ज़िम में पसीना बहाते हुए युवाओं की अपेक्षा मुझे वो युवा ज्यादा प्रभावित करता है जो साईकिल पर गेहूं रख चक्की पर आटा पिसवाने जा रहा हो या मेडिकल स्टोर से दवा घर के बुजुर्ग के लिए दवा खरीद रहो हो।
समाज के स्थापित पैमानों और मानकों पर परखे जाते हुए स्त्री पुरुष अपनी सहजता खोते हुए एक बाह्य दुनिया को इमिटेट करना शुरू कर देते है।रंग,कद और देह के इतने दबाव होते है कि बाजार इसका खूब फायदा उठाता है।
...इसलिए कहता हूँ अपनी सहजता में जियो आप जैसे भी है परफेक्ट है किसी के लिए खुद बदलनें की जरूरत नही ग्रूमिंग की अवधारणा आपको उनके हिसाब से देखनें की है जिनका आपके सुख दुःख से कोई सरोकार नही है इसलिए यदि आप औसत या औसत से नीचे के किसी पायदान पर समाज ने बैठा दिए है वो उसके अवसाद में मत रहो खुद को सम्पूर्णता में स्वीकार करो और अपने मन की मौज़ में जीने की आदत विकसित करो बाह्य दबाव का कोई बदलाव आपके अंतर्मन को सच्ची खुशी नही दे सकता है।
दुनिया की परवाह न करों इसी जालिम दुनिया में मेरे जैसे आपके कद्रदान भी बसते हैं।