Thursday, April 30, 2015

सफर और नोट्स

मुझे हासिल क्या किया तुमनें, तुम्हारें खुद के बनाए सारे पैमाने ही ध्वस्त हो गए। मेरा बिखरा हुआ वजूद दूर से जो कौतुहल पैदा करता था नजदीक से देखने पर तुम्हें फिक्रमंद करनें लगा है।तुम्हारी बैचेनियों की गिरह रोज खुलतें-बंधते हुए देखता हूं। तुम मुझसे जुडी स्मृतियों को एक सुखद ख्वाब समझ कर भूलना चाहती हो क्योंकि अब मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता नही है। एक लम्बें समय तक तुम अपने जीवन में मेरी भूमिका को लेकर उधेडबुन में रही अंत में खुद से लडते हुए तुमनें अपना तयशुदा बडप्पन ही चुना। दरअसल तुम्हारा जीवन बाहर से जितना बहुफलकीय और घटनाओं से भरा दिखता है अन्दर से वहां एकालाप का उतना ही एक गहरा सन्नाटा है यह बात तुम भी जानती है और संयोग से मै भी मगर तुम कभी इसे स्वीकार नही करोगी यह बात भी जानता हूं।
तुम्हारें व्यक्तित्व में जिज्ञासा का थोडा सतही रुपांतरण हुआ है शायद यही वजह है कि जिस प्रयोगधर्मिता को तुम अपना कौशल समझती है वह दरअसल तुम्हारें मन के अस्थिर आवेंगो का खुरदरा प्रतिबिम्ब भर है। यह बात कहनें में बडा ही विचित्र किस्म का दार्शनिक सुख देती है कि कोई भी चीज़ मुझे स्थाई आकर्षण में नही बांध पाती ! इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक सच पता है क्या है? तुम्हारे अंदर खुद के कमजोर पड जानें का डर इतना गहरा व्याप्त है कि तुम अनुराग को अपनी चौखट की बाहर से ही बुद्धि की युक्ति से विदा करती आई हो मेरे हिसाब यह तुम्हारी सबसे बडी ज्ञात निर्धनता है।
जितना तुम्हें समझने की कोशिश करता हूं उतना ही सुलझता जाता हूं क्योंकि तुम्हारी उलझन को मै देख सकता हूं यह बात मै तुमसे कभी कहना नही चाहता था मगर कभी कभी जब तुम जीवन को अनुभव के चश्में से देखती तो तुम्हें खुद की होशियारी पर बडा फख्र होता है कि कैसे तुमनें अपनी यात्रा की विविधता को बिना कहीं अटके जारी रखा है मै उस वक्त तुम्हारे चश्में के पीछे की आंखों को पढ रहा होता हूं जो तुम्हारें मन के मानचित्र के निर्जन टापू का मानचित्र लिए उदास बैठी होती है।
मन के खेल बडे विचित्र किस्म के होते है यह बुद्धि को भी सांत्वना के सूत्र बांट सकता है उसे आत्ममुग्धता के खेल में अभिभूत कर सकता है मगर मन की एक कमजोरी होती है ये बिना बताए एक जिद पाल लेता है और जहां भी उस जिद से मिलता जुलता सामान दिखता है यह हमारें कदम रोक देता है। मेरा अस्तित्व तुम्हारी किसी खोई हुई जिद के आसपास का कोई बिखरा हुआ टुकडा रहा होगा तभी तुमनें उसको उठाया और अपने फ्रेम की कोई एक तस्वीर पूरी कर ली। मै कोई अकेला या अनूठा किस्म का व्यक्ति नही रहा हूं जो मै इस गर्व से भरा रहूं कि तुमनें मुझे चुनकर मेरा मूल्य पहचाना है दरअसल मै तो एक बडी फोटो एल्बम का एक छोटा सा टुकडा भर हूं जिसकी भूमिका एक पेज़ तक ही सीमित है जिस दिन कोई नई स्मृति कैद होगी मेरा पेज़ वक्त स्वत: ही पलट देगा फिर कभी गाहे-बगाहे नई पुरानी स्मृतियों के मेलें में कुछ लम्हें के लिए जरुर तुम्हारी आंखों के सामनें से गुजर जाया करुंगा। इस पर तुम हंसोगी या उदास हो जाओगी यह अभी नही बता सकता हूं।
खैर...! जिन्दगी की खूबसूरती कुछ लोग इससे गुजर कर महसूस करतें है कुछ लोग ठहर कर इसलिए किसी के तरीके पर सवाल खडा करने का कोई मतलब नही बचता है। अपनें बारें इतना जरुर बता सकता हूं मै लम्बें समय से वक्त के किसी एक पहर में अटक गया हूं और उसी के लिहाज़ से कभी जिन्दगी के खूबसूरत होने की बात करता रहता तो कभी उदासी के मज़में लगा लेता हूं। तुम्हारा चयन यात्रा के नाम पर अनुभवों का चयन है इसलिए अनुभूति अक्सर निर्वासित हो जाती है जब तक तुम अनुभव के तल से मुक्त नही हो जाओगी तब तक शायद तुम्हें रास्तें के मील के पत्थरों से दोस्ती करनें की फुरसत नसीब नही होगी। फिलहाल तुम मार्ग और साधनों के विमर्श में व्यस्त इसलिए मेरा तुम्हें कितनी भी आत्मीयता से आवाज़ लगाना शायद अप्रिय लग सकता है या तुम मेरे बचपनें पर भी खीझ सकती हो इसलिए मैं मौन होकर केवल देख सकता हूं और उम्मीद कर सकता हूं जिन्दगी के किसी मोड पर तुम जरुर मिलोगी और पुरानी दोस्ती के हक की बिनाह पर यह कहोगी यार तुम ठीक कहते थे तब ! क्योंकि हर वक्त मै और मेरी बातें सही ही रहेंगी इसकी भी कोई तयशुदा गारंटी नही है।
फिलहाल देने के लिए शुष्क शुभकामनाएं ही है जानता हूं कम से कम तुम्हें इस वक्त इनकी बिलकुल भी जरुरत नही है। फिर भी दे रहा हूं ताकि वक्त बेवक्त पर तुम्हारे काम आ सके।

‘सफर के नोट्स

Monday, April 20, 2015

टेलर मास्टर

टेलर की दुकान पर पड़ी कत्तरें कितनी ही रंगीन क्यों न हो कतर ब्योंत उनके रंग को भी खा जाती है। अलग अलग आकार में कटी पड़ी कत्तरें अपने रंग को भूल सफेद रंग से थोड़ी शान्ति उधार मांगती है इस सफेद कत्तर अपना एक कोना चुपचाप हिला देती है। इन्चिंग टेप से मास्टर जी लोगो के कद औ हद नाप रहे है लोग सीना फुलाने के चक्कर में पेट अंदर नही करते है क्योंकि यहाँ का झूठ साल भर भारी पड़ सकता है उनके आग्रह बेस्ट फिटिंग की है और टेलर मास्टर किसी व्यस्त डॉ की तरह उनका आधा मर्ज़ ही सुनकर अपनी बिल बुक में संकेताक्षरों में उनकी पैमाइश दर्ज करता जाता है। मास्टर जी की दुकान के डिस्प्ले बोर्ड कुछ बूढ़े कोट लाइन से टंगे है उन्हें हैंगर पर टांग दिया गया है वो गर्व से भरे पुरुषों के कंधें को ढकनें की आस खो चुके है वो कोसते है मन ही मन कि क्यों उन्हें थान की विराट से निकाल कर यहां सजा दिया गया है उनकी जेब में हवा तक नही जाती वें उन पुरुषों को श्राप देतें है जिन्होंने उनको टेलर के यहां से ले जानें में महीनों या बरस भी लगा दिए है। वे एक दुसरे को सांत्वना देते है और खुद पर लगे कागज के टैग (जिस पर उस रसीद का नम्बर लिखा है जब उनके लिए नाप ली गई थी) के पीलेपन को देखकर मायूस हो जातें है। उनके सामनें गले का बटन बंद किए कुछ शर्ट भी टंगी है वो इस तरह पैबंद है जैसे अभी किसी बेहद जिम्मेदार शख्स के अभिमान को बचाने के लिए उन्हें ही आगे रहना होगा हालांकि देर से घर जानें पर उनमें भी खुसर फुसर होती रहती है। पेंट टेलर की दुकान में आश्वस्ति से टंगी है उन्हें लगता है कि अपनी नंगई छिपानें के लिए उनको मनुष्य जरूर सादर लेकर जाएगा। टेलर के गलें में पड़ा इन्चिंग टेप साक्षात् शिव के गले में पड़े नाग के समान है वो टेलर की निपुणता का प्रतीक है टेलर की कैंची अपने वजन के हिसाब से कपड़े की कई तहों को बड़ी सफाई से काटती उसकी स्वामी भक्ति असंदिग्ध है। टेबल पर पड़ा चाक टूटता है मगर निशान गहरें बनाता जाता है ताकि कारीगर उसके जरिए कटाई छंटाई करीने से कर सकें और मास्टर जी की लिहाज़ बची रहें।
मशीनों का पैडल की मदद से सुर में बचता संगीत मास्टर जी यह आश्वस्ति देता है कि काम ठीक चल रहा है। धागा और खाली रील के डब्बे उपेक्षित पड़े अपनें यौवन को याद कर सिसकतें है मगर उनकी आह कोई नही सुनता वो अपने सिएं हुए धागे को देखकर मजबूत बनें की दुआ फूंकते हुए दम तोड़ देते है।
टेलर की दुकान पर सभ्यता की दुनिया के फैशनेबल तरीकें सांस लेते है कपड़े आते है और परिधान बनकर जातें है किसी ग्राहक का कद कितना घटा या बढ़ा है इसके बारें में एक टेलर से बेहतर भला कौन बता सकता है।

टेलर मास्टर: एक संसार 

Tuesday, April 14, 2015

संवाद

शिव:

हे शिवप्रिया! तुम नित्य और अनित्य के मध्य सुरभित चैतन्य रागिनी हो। तुम्हारी शिराओं के स्पंदन से नाद प्रस्फुटित होता है। तुम्हारी चेतना के स्रोतों से बहनें वाली ऊर्जा देह और मन का शंकुल बनाती है। तुम विपर्य को भी जीवंत सिद्ध करने मे समर्थ हो। अनंत के विस्तार का केन्द्र तुम हो और सृजन के समस्त शिखर तुम्हारे गुरुत्वाकर्षण सें संतुलन साधे हुए है। तुम्हारी व्याप्ति प्रति प्रश्नों के संभावित उत्तर को गुह्य अवश्य रखती है परंतु अखिल ब्रहामांड की बिखरी चेतनाएं इसी गुह्यता से अभिप्रेरित हो प्रकृति के विषयों से आरम्भ में चमत्कृत होती है फिर तत्व का अंवेषण करती हुई आत्म के सच का साक्षात्कार करती है। तुम दृष्ट भाव में रहकर चेतनाओं की यात्राओं का मात्र अवलोकन ही नही करती हो बल्कि उनके अंदर एक सिद्ध सम्भावना का बीज भी कीलित करती हो। प्राय: लोकचेतनाओं में तुम्हारी अंशधारित उपस्थिति तटस्थ नजर आती हैं मगर तुम तभी तक तटस्थ रहती है जब तक कोई विस्मय और चमत्कार के ऐन्द्रजालिक अनुभवों से मुक्त नही हो जाता है। चेतनाओं के इस मुक्ति के बाद तुम उन्हें वह मार्ग दिखाती हो जो देवत्व से परें ब्रहमांड को अनुभूत करने का अनिवार्य मार्ग है। कोई भी यात्री तुम्हारी सहायता के बिना स्व से आत्म की यात्रा को नही कर सकता है इसलिए तुम सदैव अनिवार्य और अपरिहार्य हो।

शक्ति:

हे महादेव ! आप साक्षात पुरुष प्रकृति के समंवय के सूत्रधार हो। आपकी भूमिका पर इसलिए भी टीका असम्भव है क्योंकि आप कोई एकल चेतना नही हो। आप मुक्त और सिद्ध चेतनाओं का एक समूह हो जो शून्य और अनंत के मध्य बिखरें अस्तित्व के गूढ रहस्य को जानते है। प्राय: आपको मौन या तटस्थ इसलिए देखा जा सकता है क्योंकि आप हस्तक्षेप से मुक्त हो। आपके विस्मय मे भी एक छिपा हुआ विस्मय होता है इसलिए प्राय: मै कोई प्रश्न नही करती क्योंकि प्रश्न स्वयं मे उत्तर लिए होता है। मेरी भूमिका आपका विस्तार नही है और ना ही मै समानांतर ही हूं। दरअसल जहां आप आरम्भ होते है वहां मै संतृप्त होती हो और जहां से मै दृश्य मे सम्मिलित होती हूं वहां मुझे खुद मेरी भी छाया नही दिखाई देती है इसलिए मेरी एक स्वतंत्र यात्रा है परंतु इस स्वतंत्रता में भी आपके अंशों की रेखाएं मुझसे मेरा क्षेम पूछती है और यही बोध मुझे योगमाया से मुक्त भी करता है। आप दिगम्बर और चैतन्य है इसलिए काल गणना और देह तत्व से मुक्त है आपके स्पर्शों में तत्व और मीमांसा के सूत्र है जिनका पाठ आभासी मुक्ति से वास्तविक मुक्ति की यात्रा में लोकचेतनाओं के अत्यंत आवश्यक है। ब्रहम के अंश और भ्रम के दंश को समझनें के लिए आपका उदबोधन अनिवार्य है। मै आपके आत्मिक सम्बोधन की ऋचाओं में अव्यक्त सूक्त तलाशती हूं ताकि समंवय के समय चेतनाओं को और अधिक परिष्कृत कर सकूं। आप अपनें सरलतम रुप में इसलिए उपलब्ध है ताकि चेतनाओं के वर्गीकरण में मुझे कोई असुविधा न हो इसलिए आप मेरे लिए भी अनिवार्य अपरिहार्य ही है।

‘शिव-शक्ति संवाद: माध्यम शायद मैं’

Saturday, April 4, 2015

नाई

नाई की दुकान धैर्य की परीक्षणशाला है अपनी बारी का इन्तजार करना सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है। भले नाई से डेढ़ दशक पुराना रिश्ता हो मगर वहां नम्बर आने पर ही उसकी कुर्सी पर बैठने की इजाजत मिलती है। जल्दी होने की बात पर और दुकान में घुसने से पहलें यह पूछना कितना टाइम लगेगा भैय्या? नाई को चिढ़ा देता है वो चाहता है आप चुपचाप आए और अपनी क्यू में बैठ पंजाब केसरी अखबार पढ़ना शुरू कर दें।नाई से ज्यादा सिद्धांतवादी कोई नजर नही आता है उसके लिए व्यवस्था सर्वोपरी है सम्बन्ध द्वितीय।
कंची की तुनकती आवाजें और टी वी पर चलता चित्रहार नाई की ऊर्जा के स्थाई स्रोत हैं। जिस गति से कंची चलती है वो नाई की निपुणता को भी बताती है बीच में वो कंघे की पीठ ठोकती है और कहती है थोडा रास्ता आसान करों कतर ब्योंत का।कंघा दो तरफा घिरा है मगर वो सहज है।
जमीन पर बूढ़े बच्चें अधेड़ युवाओं के बिखरे बाल आपस में एक दुसरे की उम्र पूछते है और उदास हो जाते है।
नाई का सबसे निर्मम हथियार उस्तरा है इतने अत्याचार तो पुरुषो की गाल पर उनकी पत्नि,प्रेमिका और माता-पिता ने भी नही किए होंगे जितनें जख्म ये उस्तरा दे जाता है गाल के निचले हिस्सें पर नाईयों द्वारा उस्तरे को उलटा खींचना भले ही एकबारगी गाल को रोमविहीन प्रतीत करवा देता हो मगर आफ्टर सेव लोशन की जलन साफ़ तौर पर त्वचा के साथ हुए जुल्म का इश्तेहार सुना कर उड़ जाती हैं। कटिंग सेविंग कलर मालिश यह पैकेज़ ग्राहक एक साथ लें यह नाई की आदि अभिलाषा होती है। जिस नाई ने हमारें बाल काटे होते है वो हमारे बच्चों के बाल काटते समय एक बेहद नैसर्गिक खुशी से भरे होतें है बच्चों को बेटा कहते समय उन्हें लगता है कि उनकी यात्रा बाप से बेटे तक आ पहूंची है। वो हमारे बच्चों में हमसे ज्यादा दिलचस्पी लेते है नाईयों का यह एक बेहद संवेदनशील पक्ष है।
मनुष्य के आदिम से सभ्य बननें की प्रक्रिया में मनुष्य एक नस्ल को नाई बनना पड़ा है अमूमन नाई हाजिरजवाब होतें है उनकी बतकही ग्राहकों को भले ही रूचिपूर्ण न लगें मगर सामाजिक चटखारें के तमाम विषय नाई के पास होतें हैं।
जब आप एक अंतराल के बाद नाई की दुकान पर पहूंचते तो वो ठीक दोस्तों की तरह पूछता है कहां थे इतने दिन बहुत दिन बाद चक्कर लगा कई दिन से सोच रहा था आप आए नही ये सवाल एक सांस में नाई पूछता है फिर इसके बाद दुसरा काम नाई का यह होता है कटिंग और सेविंग देखकर पूछना कि कहां कटवाए थे बाल फेस पर दानें हो रखें है कलम छोटी बड़ी छोड़ रखी है तब आप उसकी प्रशंसा में दो शब्द कहें और दुसरे नाई को कोसे बस नाई इतना ही सुनकर आपके उसके पक्के ग्राहक होने की पुष्टि कर लेता है।
सामाजिक जीवन में नाई हमारे जीवन से कुछ इस तरह से जुड़ा है कि आप हफ्ते दस में उससे मिलकर अपना कुछ बोझ हलका कर लेतें है और एक बार आपको लत लग जाए तो आप चाहकर भी अपना नाई और टेलर बदल नही पातें हैं और मेरे ख्याल से बदलना भी नही चाहिए।

चलिए मेरा नंबर आ गया है...शेष फिर !

'नाई की दुकान और मैं'

Wednesday, April 1, 2015

सज़ा

दुनिया में हर चीज़ के होने की एक पुख़्ता वजह होती है। बेवजह जो भी होता क्या तो वो जुनून होता है या फिर पागलपन। आसपास और नजदीक होने के महीन भरम होते हैं। मुक्ति दरअसल बड़ी विचित्र चीज़ है ये जब हमें मिलती है तो इसकी जेब में अतीत का एक अधूरा पता भी होता है। कभी उदास शामों में तो कभी लम्बी होती रातों में उसको पढ़ना चाहतें है तो अक्सर रोशनी साथ नही देती है।
खुद के लिए सबसे बेहतर विकल्प क्या है यह सोचने का सर्वथा मौलिक अधिकार शायद हमारे ही पास होना चाहिए कैसा अजीब महसूस होता है एक तो आप अपने एकांत से ऊबे है बैठे हो ऊपर से आपकी दृष्टि और विकल्पों पर टीकाएं की जाएं। दो चेतनाओं के मध्य सुरक्षित दूरी विकसित होने में समय के सारे समीकरण निष्प्रोज्य होते है क्योंकि इसके सूत्र न सबंधो के बीजगणित में मिलतें है और न अनुमानों के खगोल विज्ञान में।
समय का सहारा लेकर खुद को छलना मनुष्य की आदि परम्परा है। समय भले ही खोया-पाया के भाव से मुक्ति दे सकता है मगर कुछ अनुत्तरित प्रश्नों के जवाब समय के पास भी नही होतें है। जैसे दो जमा दो का जोड़ हमेशा चार ही नही होता है।
खुद की अप्रासंगिकता के चालानों के बीच एक अर्जी वादामाफ़ गवाह बननें की लगाई जाती है जिस पर खुशियों की कीमत मय सूद जमा करनी पड़ती है। अचानक से जब वक्त हाकिम बनता है तब रिहाई जिसे मुक्ति भी कहा जाता है उसके लिए सर झुकाएं चुपचाप खुद के घुटनों के बीच फंसे यादों के भँवर को देख यही कह सकते है गलती हुई साहब !
आसपास की रंगीनियत तब ना खुशी देती है और ना बैचेन करती है एक अजीब सी नीरवता को अपने चित्त में लिए हम दोनों हाथ जोड़ते है मुस्कुरातें है और हाकिम से कहतें है जलावतनी क़ुबूल है जनाब।
ख्वाबों के इश्तेहारों की दुनिया ऐसी ही होती है यहां कब आँख खुलती है और कब बंद होती है किसी को पता नही लगता है। नींद में हंसते हुए कुछ लोग सुंदर लगते है और आँख खुलनें पर उनकी जेब से वो अधूरा पता झांकता है जो उनके मुक्त चेतना होने का एकमात्र ज्ञात दस्तावेज़ भी कहा जा सकता है।
इस पारपत्र के सहारे वो लांघ जाते है ख़्वाबों और पागलपन की एक गुमनाम दुनिया चुपचाप बिना किसी को बताएं अजनबी होना उनकी जमानत की एक शर्त होती है जो आधी उनकी पीठ पर छपी होती है आधी माथें पर।

'आख़िरी इश्तेहार'

Monday, March 30, 2015

सर्दी-गर्मी

कल मार्च भी खत्म हो रहा है। नए साल के नए तीन महीने और पुराने साल के आखिरी तीन महीने मिलाकर आधा साल मेरी जिन्दगी में कुछ इस तरह दर्ज हो गया है कि इसके एक-एक दिन पर मैं घंटो व्याख्यान दे सकता हूं। अब जब मौसम करवट ले रहा है मेरे मन का पतझड अपने यौवन पर है। तुम्हारी अनुपस्थिति में मन की नर्म जमीं पर ख्यालों के सूखे पत्तों की एक तह जमा हो गई है जिसकी वजह से मुझे सांस लेने में कभी-कभी तकलीफ होती है।

पिछले छ महीने का हिसाब-किताब करके तुम्हें ना भूलना चाहता हूं और ना याद ही रखना चाहता हूं। सर्दी की चाय की प्याली से बात शुरु होती है वो खत्म होने का नाम नही लेती है मेरे ज़बान पर कुछ जायके ऐसे चिपके है कि वो घुल नही पा रहें है। सर्दियों की धुंध और सर्दियों की बारिश में तुमसे जो मेरी बातचीत हुई उसको उलटा पढना शुरु करता हूं मेरी आखिरी बात का एक सिरा तुमसे हुई पहली बात से मिल जाता है फिर भी सारी बातें आपस मे दोस्त बन एक दूसरे की पीठ थपथपाने लग जाती है।

अब गर्मियां आने वाली है दिन अजीब से चिढचिढे हो गए है अब अगले चार महीनें मै तपता रहूंगा इस ताप से और मेरे जिस्म से बहता रहेगा तुम्हारा प्रेम इसकी ठंडक से ही मेरे शरीर का तापमान सामान्य रहेगा। चौबीस घंटे मे दोपहर और शाम का वक्त मुझ पर सबसे भारी गुजरता है दोपहर मेरे कान मे आकर कह देती है तुम मुझे भूलने ही वाली हो और शाम को जब मै सूरज से इस चुगली की सच्चाई जानना चाहता हूं वो चुपचाप आंख बचाकर निकल जाता है। अब इन चार महीनों में धूल-अंधड और बारिश के भरोसे ही रहूंगा ताकि मै कुछ भी स्थिर होकर सोच न सकूं।

तुम्हारा बारें में स्थिर होकर सोचना मुझे डराता भी और तपाता भी है फिर मै ताप के असर में मन ही मन न जाने क्या क्या बडबडाने लगता हूं। कहने को तो यह बसंत है मगर मेरा बसंत इस बार सर्दी की गोद में आकर चुपचाप चला भी गया है मेरा बसंत तब था जब सुबह सुबह उनींदी आंखों से बिस्तर पर तुम्हें याद कर मै मुस्कुरा देता था। तुम्हारे ताने सुनकर करवट बदलना भूल जाता था। इन सर्दियों में तुम्हारी वजह से मेरे संवेदनाएं इतनी जीवंत किस्म की थी कि मै बिस्तर तकिया गद्दा रजाई यहां तक दर ओ दीवार से भी बातें कर लेता था। और ये बातें कोई आम बातें नही थी बल्कि ये सब उतनी ही गहरी बातें थी जितनी कभी तुमसे आमने सामने हुई है। कल जब मै बिस्तर की सिलवट ठीक कर रहा था तब अचानक लगा किसी ने मेरा हाथ पकड लिया कुछ सिलवटों को शायद मेरी हस्तरेखाएं देखनी थी वो उनके जरिए तुम्हारे आने के महूर्त का पंचाग देखना चाहती होंगी शायद। आज सुबह तकिए को जब मोडना चाहना तो उसने इंनकार कर दिया पूछने पर कहने लगा थोडी देर आंखे बंद करके सीधे लेटे रहो मै तुम्हारी गर्दन पर फूंक मारना चाहता हूं मैने पूछा क्यों तो कहनें लगा मेरे ऐसा करनें से किसी के कान की बालियां होले-होले हिलेंगी और वो ऐसा करना चाहता है उसके पास ऐसा करने की सिफारिश है।

रोज सुबह मेरी चप्पल एक दूसरे के कान मे कुछ कहती हुई मिलती है उन्हें देख मुझे लगता है कि ये तो मेरी यात्रा का शकुन है मगर मुझे तुम्हारा पता नही मिलता है मै किताबों से लेकर कविताओं की तलाशी लेता हूं गुस्ताखियों की बंद दराज़ खोलता हूं जहां तुम्हारे खत तो मिलतें है मगर जहां पता लिखा होता है वहां की रोशनाई फैल गई है मै केवल उस पर स्पृश से तुम्हारी दिशा का अनुमान लगाता हूं और अपने जूतों पर पॉलिश करने लगता हूं।

गर्मी आ गई है। सर्दी चली गई है। मगर तुम ना कभी आई और ना कभी गई बस ये एक अच्छी बात है। यह अच्छी बात से बढकर एक भरोसा है कि कम से कम तुम आवागमन से मुक्त हो और कहीं एक दिशा में स्थिर हो। जब भी मुझे सही दिशाबोध हो जाएगा और मेरे जीवन का दिशाशूल निष्क्रिय हो जाएगा उस दिन मै भटकता हुआ तुम तक आ ही जाउंगा तब तक तुम इंतजार को मेरी तल्खियों से बीनती रहना और गुनगुनाती रहना कुछ ऐसा जिससे मै दूर से तुम्हारी आवाज़ पहचान लूं। आने वाली गर्मी में लू के बीच शीतल छाया की तरह तुम्हें अपने विकल जीवन में रखना चाहता हूं ताकि जब कहीं चैन न मिलें तो थोडी देर तुम्हारी छाया में चैन से बैठ सकूं पी सकूं तुम्हारे हाथ से दो घूंट पानी।

‘सर्दी से गर्मी तक’

Friday, March 27, 2015

इन्तजार

सुबह कहीं अटक गई है। सुबह कितने घंटे विलम्ब से चल रही है इसकी उद्घोषणा कोई नही करता है। रात अपने निर्धारित समय पर ही चली थी।याद करने की कोशिश करता हूँ तो मुझे शाम की एक चिट्ठी याद आती है जिसमें सूरज की तबीयत खराब होने का जिक्र हुआ था। अनुमान लगाता हूँ जहां अभी दिन निकला हुआ होगा वहां सूरज की बीमार रोशनी ही पहूंच रही होगी। मैं सुबह के इन्तजार में हूँ इसलिए मन्दिर की घंटियों,शंख और आरती की आवाज में मेरी कोई रूचि नही है। जो लोग मन्दिर के अंदर ये सब कर रहे है उन्हें सुबह का इन्तजार नही है बल्कि वो सुबह को विलम्बित होते देखना चाहते है ताकि उनकी उपयोगिता बची रहें।
काल का बोध एक चैतन्य घटना है परन्तु काल का चक्र एक भरम भी हो सकता है। दिन और रात की खगोलीय वजहों के अतिरिक्त कुछ दूसरी वजहें भी हो सकती है। कभी कभी दिन होता है और उसको रात समझनें को जी चाहता है ठीक ऐसे ही जब दुनिया थककर सो जाती है मैं रात को जागता हूँ और नींद से बात करने लगता हूँ पूछता हूँ क्या मेरी थकावट एकमात्र वजह है उसके आने की या फिर उसे मुझसे प्रेम है वो खुद थकी हुई आती है मेरे अंदर सोने के लिए। कल शाम जब सूरज डूब रहा था मैंने देखा धरती पर कुछ लोग खुश थे वो शायद रात के इन्तजार में रहें होंगे और रात का विलम्बित हो जाना शायद उन्ही की प्रार्थनाओं का परिणाम हो सकता है।
दोपहर अक्सर एक बात कहती है दिन आधा बचा है जबकि आधी रात अक्सर चुप रहती है वो न सोनें के लिए कुछ कहती है और न रोने के लिए। कुछ लोग निवृत्त हो सो जातें है और कुछ रोनें लगते हैं। रात दोनों के लिए आधी आधी बंट जाती है।
सुबह के इन्तजार में दो किस्म के लोग है एक मेरे जैसे जिन्हें सुबह से कुछ सवाल पूछनें है दुसरे जिन्हें सुबह को कुछ जवाब देनें हैं। आज सुबह तीसरें किस्म के लोगो के आग्रह से विलम्बित है ये वो लोग है जो रात की लम्बाई से संतुष्ट नही हैं इसलिए सुबह से एक टुकड़ा उधार मांगना चाहतें है और लगता है आज सुबह ने उनकी प्रार्थना सुन ली है।
मेरी प्रार्थना इतनी सी है कि सूरज की हरारत ठीक हो गई है क्योंकि यदि सूरज दिन में बीमारों वाली अंगड़ाई लेगा तो बादल इसका गलत अंदाजा लगा बरसनें के षड्यंत्र करनें लगेंगे फिलहाल न धरती चाहती और न मैं कि बारिश हो क्योंकि बारिश का मतलब है सुबह दोपहर शाम रात का फर्क का धुंधला जाना। यह फर्क दरअसल उस उम्मीद का प्रतीक है जो कहती है ना समय स्थिर है ना इसके प्रभाव इसलिए इसके हिसाब से अनुमान के छल से बचनें के साधन विकसित किये जाने चाहिए।
फिलहाल सुबह की आमद हो इसी के इन्तजार में हूँ क्योंकि वो एक चिट्ठी लेकर आनें वाली है जिस पर नाम किसी और का मगर पता मेरा लिखा है यदि वो मुझ तक सही सलामत पहूँच गई तो एक दिन उसकों जरूर उद्घोषणा के स्वर में बाचूंगा। आने वाली सुबह से इतना ही वादा है मेरा।

'सुबह का इन्तजार'

Wednesday, March 25, 2015

दोपहरी नोट्स

एक दिन आप तय कर लेते है अपनी जीने की एबीसीडी,फिर गढ़ना पड़ता है अपना खुद का व्याकरण। अकेला पड़ने के जोखिम तो होते ही है क्योंकि लोग आपको पढ़ते कुछ दूर साथ चलतें है फिर उन्हें समझ नही आपकी लिपि। ऐसे में सर्दी में भी बहकर सूख जाती पारस्परिक अभिरुचियों की छोटी सी नदी।
कोई दूर जाता तभी तक नजर आता है जब तक निगाह में रहता है फिर दृश्य से वो ऐसे हो जाता है ओझल जैसे अनजान शहर के रास्ते छूटते चले जातें हैं। मन का किसी के मन में  ठहरना एक घटना है बल्कि यूं समझिए एकतरफा घटना है आप जिस वक्त सोच रहे होते है अपनी भाषा में तब उसका अनुवाद करने वाली आँखें देख रही होती एक अलहदा ख़्वाब।
मन की सराय में सुस्ताते वक्त आप भूल जाते है अपना यात्री होने का चरित्र तब याद रहती एक ठंडी छाँव जिसमें बैठ आप जम्हाई ले रहे होते है तभी आँख से ढलक पड़ता है एक छोटा आंसू तब आप उसकी वजह भी नही जान पाते और वो एक छोटी समानांतर लकीर के रूप में समा जाता है चेहरे की खुश्क गलियों में।
आपका तय करना बहुत कुछ तय कर देता है अपने साथ फिर आप शिकायत नही कर सकतें क्योंकि शिकायत करने का अधिकार आपको कमाना पड़ता है और ये आप तभी कमा पातें है जब अपनें व्याकरण को प्रकाशित करके आप कम से कम अपना एक सहपाठी तैयार कर सकें। ध्यान रहें आपको एक सहपाठी चाहिए होता ना कि शिष्य या कोई गुरु।

'दोपहरी के नोट्स'

Friday, March 20, 2015

सनातन यात्रा

अब थक रहा हूं मैं।
एक ही बात कितनी ढंग से बताने की मेरी तमाम कोशिसें नाकाम रही है। शायद तुम्हारे पास वो चैनल ही नही जहां से तुम जज्बात की इन माईक्रो वेव्ज़ को रिसीव कर सको। मेरी सम्भावना तलाशने और तराशने की सभी युक्ति अब मेरे साथ ही थकने लगी है। मैं तुम्हें जो बताना दिखाना और जताना चाहता था उसके लिए दुनिया से अलग होने की जरुरत नही थी बस उसके लिए तुम्हें खुद को खुद से अलग करके देखने की आदत विकसित करनी थी जो तुम शायद नही कर पायी।
हर हाल मे खुद को सही साबित करके मै मानवीय सम्बंधो में अराजकतावादी नही होना चाहता हूं इसलिए अब खुद की अवधारणाओं की चादर समेट रहा हूं मेरी अनंत की यात्रा में उसकी भी अपनी उपयोगिता है। आज भी आपकी निजता और आपकी मानयताएं मेरे लिए उतनी ही समादृत है क्योंकि मै आपका मित्र रहा हूं कोई आपके जीवन दर्शन का सम्पादक नही था मैं।
मुझे अब तुमसे कोई शिकायत नही है दरअसल हम मनुष्य अपनें अनुभवों से अर्जित मान्यताओं में जीने के आदी है। यह हमें यह आश्वस्ति देता है कि हम कुछ गलत नही कर रहे है हर अनजानी डगर हमें डराती है उसके जोखिम हमें सिमटने पर मजबूर करते है। मनुष्य को समझ के साथ असंतुष्टि प्रारब्ध से ही मिली है वह प्राप्य से ऊब कर अप्राप्य की खोज मे लगा रहता है और इसी उपक्रम में उसे कथित रुप से आनंद भी मिलता है उसे लगता है उसके पास अंवेषणा है जिसके जरिए वो प्रयोग कर मानवीय सम्बन्ध की लोच को समझ सकता है। मिलना बिछडना इसी उपक्रम की अवैध संतानें होती है।
संवाद मे सम्प्रेषणशीलता का संकट सबसे बडा संकट होता है तब आप इतने संकोच से भर जाते है कि आपकी एक छोटी सी सामान्य बात भी अन्यथा लिए जाने की भूमिका लगने लगती है। मेरी चाह थोडी अजैविक किस्म की रही है मै मानव रचित मनोविज्ञान और समाजशास्त्र का अतिक्रमण कर सम्बंधों की नींव रखना चाहता रहा हूं इतना ही नही मेरे पास प्रकृति को भी मौसम विज्ञानियों, वनस्पतिविज्ञानियों, जीववैज्ञानिकों और पर्यावरण विदो से अलग देखने का चश्मा है।
मै नदी को दोस्त कहने लगता हूं उनके हवाले अपने गमों के बैरंग खत कर देता हूं कहता हूं दे देना मेरे उस नामुराद सागर दोस्त को। पहाड से सलाह मांगने उसकी चोटी पर अकेला चढ जाता हूं उसके कान में फूंकता हूं अग्निहोत्र मंत्र, झरनों से मेरी अजब सी दोस्ती है मै उनकी पीठ पर हाथ फेरता हूं और उनके बोझ के बारे मे पूछताछ करता हूं। बादलों से मै अफवाह शेयर करता हूं बारिश मे अपने आंसू मिला देता हूं ताकि वो थोडी खारी भी हो जाए। रास्तें की झाडियों और खरपतवार मुझसे से मेरे जूतों के फीते के मांग लेते है और मै उन्हें खुशी से दे कर आगे बढ जाता हूं। रोज मुंह धोने के बावजूद भी मेरी पलकों पर रास्तों की थोडी गर्द जमी ही रह जाती है और यकीन मानना इससे मेरी रोशनी बढती है मेरी आंखों मे बस यही तजरबे का सुरमा लगा होता है जिसके वजह से कभी तुम्हें ये आंखे बडी नशीली लगा करती थी।
मै अपने समय मे हमेशा अन्यथा लिए जाने के लिए शापित हूं एक दौर बीत जाने के बाद मै समझ आता हूं तब तक मै वहां नही मिलता हूं जहां से विदा हुआ था बस यही एक खेद जनक बात है। सनातन रुप से मेरी यात्रा अनावृत रुप से जारी है चेहरे बदलते है किरदार नही। अनुभव हमेशा मुझे नही सिखा पाता इसलिए अनुभव मुझसे नाराज़ रहता है। मुझसे नाराज़ लोगो की लंबी फेहरिस्त है मगर मुझे यकीन है जब मै उनके आसपास नही रहूंगा उनकी नाराज़गी भी ऐसे ही घुल जाएगी जैसे बरसात में पतनालें मे जमीं धूल घुल कर बह जाती है।

‘सनातन यात्रा

Sunday, March 15, 2015

दो बात

वर्तमान समय का सबसे बड़ा छल है जो भविष्य की गोद से निकल कब अतीत का हिस्सा बन जाता है पता नही चलता है। हम कौतुहल से भविष्य की तरफ देखतें है तो अतीत को दो हिस्सों में बाँट देते है। अतीत के एक हिस्से पर हम अपनी मूर्खताओं पर हंस सकते है फख्र कर सकतें है वही दुसरे हिस्से में अपराधबोध और भावुक मूर्खताओं के कैलेंडर टंगे होते है जिनके साल कभी नही बदलतें हैं।
वर्तमान के विषय में सबसे खतरनाक चीज़ एक यह भी होती है कि यदि जीवन में भौतिक उपलब्धियों की आमद नही है तो आपका वर्तमान भूत और भविष्य दोनों से ज्यादा क्रूर हो जाता है।
कुछ करने के भरम और कुछ भी न करने के करम के बीच फंसा होता है एक यथास्थितिवादी मन जो कभी बाह्य दुनिया के तमाशे देख ठहाका मार हंसता है तो कभी आत्मदोष का शिकार हो खुद से ही सवाल करता है कि इस व्यवहारिक और बुद्धिमान लोगो की दुनिया में आखिर मै कर क्या रहा हूँ क्या सहमति,समीक्षा और सांत्वना ही उसके जीवन की उपयोगिता के अधिकतम सूत्र है जिसका सर्वाधिक अभाव होते हुए भी उसे वही सबसे ज्यादा बांटनी पड़ती है ताकि वह काल के इस बोध में प्रासंगिक बना रहे।
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सबसे गहरी चोटें छिपाकर रखने के लिए शापित होती हैं। सबसे गहरे मलाल उन्हीं से जुड़ें होतें है जो दिल के बेहद करीब होते है। सबसे ज्यादा आहत वही बातें करती हैं जो कडवेंपन और स्पष्ट होनें में फर्क नही कर पाती। सबसे असुविधाजनक होता है किसी के जीवन में अपनी भूमिकाओं को बदलते हुए देखना। सबसे बड़ा भय किसी को खोने का होता है जिसके वजूद का हम खुद का हिस्सा मान जीने लगते हैं।
और सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है किसी के जीवन में अपरिहार्य न होना।
...इतनी बड़ी बड़ी बातों के बीच एक छोटा आदमी कैसे मुस्कुराने की सोच सकता था खुश रहनें की जरा सी आदत क्या हुई खुद को खुद की ही नजर लग गई।

Monday, March 2, 2015

अथ मुखपोथी कथा:

...फिर श्री माधव ने देवऋषि नारद जी से कौतुहल- कातर दृष्टि से पूछा
हे ! देवऋषि नारद आप इतने दिन कहां थे देवलोक में हम सूचना शून्य हो गए है यहां सबकुछ इतना व्यवस्थित है कि दिव्यता में भी रस नही आ रहा है। आप सम्भवतः मृत्युलोक की यात्रा से लौटें है कृपा करके वहां के मानवों का वृत्तांत कहो उसे सुनने की मेरी बड़ी अभिलाषा है।
देवऋषि नारद बोलें:
भगवन आपका अनुमान सही है मैं अभी सीधा मृत्युलोक से ही आ रहा हूँ अब वहां आपकी माया से प्रेरित होकर अज्ञानता का अभिनय नही होता है। मनुष्य उत्तरोत्तर चालाक होता जा रहा है वर्तमान में वहां के समस्त प्राणी समयरेखा के खेल में उलझे हुए है और कभी खुद को आनन्दित तो कभी अवसादित बताते हैं।
श्रीमाधव ने उत्सुकता से पूछा देवऋषि ये समयरेखा क्या है? क्या मनुष्य ने पृथ्वी ग्रह का विभाजन इस रेखा के माध्यम से किया है?
नारद जी बोले नही भगवन् यह कोई आकृति वाली रेखा नही है यह आभासी दुनिया की एक समयरेखा है। आंग्ल देश के एक उत्साही युवा जिसका नाम जुकरबर्ग बताते है उसनें एक ऐसा आभासी मंच तैयार किया है जिस पर संगणक अंतरजाल और चलदूरवाणी के माध्यम से मनुष्य अपने जैसे लोग तलाशता फिर रहा है देश काल धर्म भाषा लिंग से इतर मनुष्य ने अपने एकांत को समाप्त करने की एक युक्ति विकसित कर ली है। आर्यवर्त भारत में तो इस मुखपोथी की लोकप्रियता वर्तमान में शिखर पर है प्रभु। विद्यार्थी से लेकर उद्यमी तक शासकीय सेवा से लेकर निजी क्षेत्र तक,गृहणी,रोजगार और बेरोजगार श्रेणी के सभी मनुष्य इस मंच पर सक्रिय है। मृत्युलोक पर मनुष्य की शायद ही कोई ऐसी कोटि बची हो जो इस मुखपोथी और समयरेखा के फेर में न उलझा हो। मनुष्य की तकनीकी दासता की हालत यह है प्रभु कि अब मनुष्य के हाथ में चलदूरवाणी नामक यंत्र हमेशा रहता है और वो मार्ग पर चलता चलता भी उसमें खोया रहता है वो कभी मुस्कुराता है तो कभी अचानक से खामोश हो जाता है। मनुष्य अपनी निजता प्रकाशित करके लोकप्रियता हासिल कर रहा है। आपको समयरेखा पर खाने पीने रोने धोने,यात्रा, जीने मरने,सुख दुःख, लड़ने और पलायन तक सबकी सूचनाओं का आदान प्रदान मनुष्य को करते देख सकते है। वर्तमान में राजनीति का भी यह बड़ा साधन बना हुआ है।
मुखपोथी पर सुबह मनुष्य एक तस्वीर लगाता है फिर उसके अन्य मित्र उसकी प्रशंसा करते है शाम तक वो उसी प्रशंसा से ऊब कर नई तस्वीर लगा देता है फिर प्रशंसा का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। मनुष्य क्षणिक रूप से खुश होता है फिर गहरे अवसाद में चला जाता है।
प्रभु ! मै पिछले एक महीने से इंद्रप्रस्थ में था वहां पुस्तकों का एक बहुत बड़ा मेला लगा हुआ था। अब पुस्तकों की बिक्री भी अंतरजाल के माध्यम से होने लगी है वहां लेखकों/कवियों/साहित्यकारों ने मेले में घूमकर अपने पाठकों के साथ बहुत से चित्र खिंचवाएं। पाठक बहुत प्रसन्न थे और बिना विलम्ब किए मेले से सजीव चित्रों का प्रकाशन मुखपोथी पर कर रहे थे।
अब लोकप्रिय लेखक वही है जो मुखपोथी पर अपनें पाठक तैयार करता है ऐसे लेखकों को हिन्द का एक प्रकाशन बहुत आदर देता है। कुछ बड़े लेखक मुझे जरूर अनमने नजर आए अब उन्हें भी लेखक कोनें में बैठ प्रवचन देना पड़ा वें अपनी दुलर्भ रहस्यता को लेकर चिंतित दिखे।
भगवन् इस मुखपोथी और समयरेखा ने आर्यवर्त में कवित्व को बड़ा मंच दे दिया है जो लम्बे समय से भरे हुए घूम रहे थे वे अब खुलकर काव्य लिख रहे है और तेजी से लोकप्रिय हो रहे है उत्तर आधुनिक काल की इस नई कविता ने स्थापित कवियों को चिंता में डाल दिया है वें मुखपोथी की कविता की दबे स्वरों में आलोचना करते है मगर अब वें खुद की अज्ञात कविताएँ भी इस मुखपोथी पर प्रकाशित करके यह बताते है कि देखों एक मुखपोथी के कवि और प्रकाशित किताबों वालें कवि के कवित्व में गुणात्मक अंतर होता है।
मैंने कुछ बड़े कवियों को उनकी बैठकों में सोमरस और धूम्रदण्डिका के साथ मुखपोथी की कविता और कवियों की अभद्र आलोचना करते भी देखा और सुना है।वो अप्रसन्न है भयभीत है असुरक्षित है यह मैं बताने में असमर्थ हूँ। ये स्थापित कवि केवल एक बात से अवश्य प्रसन्न है कि इनकी सजिल्द कविताओं की पुस्तकों के स्थाई ग्राहक ये मुखपोथी के ही कवि है बाकि सारी किताबें तो युक्तियों से शासकीय पुस्तकालयों में सुशोभित होती है।
हे ! भगवन मुखपोथी की दुनिया विचित्र रहस्यों से भरी पड़ी है सम्भवः है अब मनुष्य के व्यवहार के अध्ययन के लिए एक मुखपोथी अध्ययन शाखा विकसित की जाए और इस पर स्वतन्त्र शोध हो।
देवनारायण विस्मय से शून्य में देखते हुए बोले यह तो चमत्कार जैसा है देवऋषि ! परन्तु हमें यह अंतरदृष्टि से भी दिखाई नही दे रहा है लगता है देवलोक के संचार अभियंता को बुलाना पड़ेगा तब तक आप मृत्युलोक से यंत्रो का प्रबंध करों मैं यहां अंतरजाल खुलवाता हूँ।
मनुष्य की यह लीला देखनी ही पड़ेगी।
जो आज्ञा प्रभु !कहकर देवऋषि नारद अंतर्ध्यान हो गए।

Wednesday, February 25, 2015

बारिश

रात के बारह बजे के बाद से बारिश है।सुबह जगा तो लगा आज की सुबह कुछ जानी पहचानी सी है। जिनकी रुह पर छाले और पलकों पर जाले लगे होते है उनको बारिश महज़ मौसम का बदलना नही लगता।बल्कि इसकी महीन बूंदो के जरिए वो खुद को रफू करना चाहते है। बारिशों के लगाये पैबन्द अगली बारिश तक रुह से चिपके रहेंगे इसकी भले ही कोई गारंटी न हो मगर खुद की बैचेनियों की आग से झुलसते मन को बेशक ये बूंदे थोडा सुकून तो देती ही है।

एक बारिश खुद के अंदर रोज़ होती है मगर उसका गीलापन दिखता नही है क्योंकि दिल की धरती बेरुखी की गर्मी से इतनी तपती है कि आंसू भांप बन उड जाते है। बातचीत में मेरी पलकों पर जो नमी दिखाई देती है वो दरअसल इसी भांप की नमी है।

सुबह से कुछ किताबें तलाश रहा हूं जो पढी जा चुकी है। जब-जब बारिश होती है मुझे पुरानी किताबें याद आने लगती है और उनको दोबारा पलटना शुरु कर देता हूं। उसमें कुछ अंडरलाईन की गई ख्वाहिशें होती है जिन्हें वक्त के दबाव के चलते तब बचा लेता हूं ऐसी बारिशों के लिए। क्योंकि बारिश मे अक्सर यह महसूस कर पाता हूं कि किसी कहानी कविता या उपन्यास का लेखक कितना मेरे जैसा है और किताब में तुम कहां कहां बैठी हो। आज सुबह से कविता की वह किताब नही मिली जिसकी हर कविता में तुम्हें पाया था जैसे अक्षरों पर तुम्हारी मुस्कान सजी हो व्याकरण में तुम्हारा जीवन हो और पूर्ण विराम में तुम्हारी आश्वस्ति सांस लेती हो।

किताब न मिलनें पर थोडी देर अनमना रहा है आंखे बंद किए बूंदों की आहूतियां सुनता रहा धरती की दरारों में उनका समाना खुद से खुद का मिलने जैसा है। बूंदों के संगीत को सुनने के लिए चेहरे पर टंगे कान किसी काम नही आते इसके लिए दिल से दरख्वास्त करता हूं कि वो थोडी देर के लिए उसके साथ हुई ज्यादतियों को भूल जाए और दिल मान भी जाता है। तुम्हारें कंगन के बीच फंसी चार चूडियों की खनखन से पहला सुर उभरता है और मंद मंद धडकनों में छिपे छंद को आरोह अवरोह के जरिए ताल से साधता हूं फिर बूंदो का एक समूह ताल की थाप बन जाता है बीच बीच में तुम्हारी नई जूतियों का कोरस सुनाई देता है और पायल फिलर की तरह बूंदो के इस नाद में शामिल हो जाती है। ये संगीत दरअसल मन के अधूरे रागों का संगीत है इसलिए मेरी अधूरी जिन्दगी में बारिशों के जरिए बार बार मन को गीला करता है।

आंखे बंद किए मै बूंदों की चुगलियां सुनता हूं जो वें आपस में मेरे बारें मे करती है। बादलों की दुनिया में मेरी आवारागर्दी के किस्से अफवाहों की शक्ल में घूमते है। कुछ बदमाश बादल मेरी बर्बाद किस्म की जिन्दगी को देखने के लिए अपना भार भूल धरती के बेहद नजदीक चले आते है उसके बाद बरसना उनकी मजबूरी होती है। बारिश होने की साजिश में मौसम के अलावा मेरी भी इतनी भूमिका है यह बात कभी कोई मौसमविज्ञानी नही बताएगा।

पिछले एक घंटे से ‘दिल तो पागल है’ और ‘सर’ फिल्म के गाने रिपीट करके सुन रहा हूं ये एक अजीब सा पागलपन है जो बारिश होने पर मुझ पर हावी होता चला जाता है। खिडकी ठीक मेरे बिस्तर के पास है बारिशों में अपना वजूद खो बैठी ठंडी हवा मेरी गाल को छूकर कहती है नही सर्द गर्म तो नही है। मै मुस्कुराता हूं और बारिश को देखता हूं कुछ बूंदे मुझे यूं देखकर शरमा भी जाती है फिर खिडकी से बमुश्किल अपना हाथ बाहर करता हूं मेरी हथेलियों पर दरअसल मेरी गुस्ताखियों के किस्से सीमेंट की तरह पुते है बारिश की नन्ही बूंदे अपनी मद्धम चोट से मेरा हाथ धोना चाहती है मै हथेली नीचे कर देता हूं मेरे हाथ से रिसती बूंदे शायद मेरी इस चालाकी पर हंसती है क्योंकि जमीन पर गिरते वक्त उनकी आंखे चमकती देखता हूं।

अब जब बारिश थम गई है मेरे कानों में अभी भी बूंदों की आवाज़ गूंज रही है ये ठीक तुम्हारी मुस्कान और हंसी के बीच के जैसी है जिसके लिए मेरे पास शब्द नही है। अक्सर बारिश को सुनते हुए तुम्हें याद करता हूं मेरे शब्द खो गये है कहीं इसलिए फिलहाल बूंदों के संगीत से नई वर्णमाला सीख रहा हूं एक दिन इसके नोट्स भेजूंगा तुम्हें फिर तुम भी अपने हिस्से की बारिश को सुन सकोगी ठीक मेरी तरह।


‘बारिश का कोरस’

Friday, February 20, 2015

शाम

जाना तो तुम्हारा पहले दिन से ही तय था। यकायक चली जाती तो इतना कष्ट इतना संताप न होता। तुम इतनी आहिस्ता आहिस्ता नजरों से ओझल हुई कि उन लम्हों को सोचकर अक्सर शाम को जी बहुत बोझिल हो जाता है। तुम्हारा मिलना और मिलकर बिछड़ना महज एक किस्सा नही है जिसे किसी गहरे दोस्त के साथ शेयर करके जी को हलका किया जा सकें। ये एक मुसलसल हादसा है जिसकी टीस शायद कुछ छटांक भर बोझ दिल की नाजुक दीवारों पर ताउम्र चढ़ाती जाएगी।
कितना ही मतलबी होकर क्यों न सोच लूं मेरी सोच की धमनियों में तुम्हारी धड़कन का कम्पन स्पंदित होता ही रहता है। अफ़सोस यह भी है तुम्हारे मन को पढ़ पाने और उसमें मेरे लिए असमान वृत्तियों को देख पाने के बाद भी मै खुद के अनुराग की गति को नियंत्रित न कर सका। तुम्हें किस्तों में खोता गया और खुद को ये सांत्वना देता रहा शायद पहला रास्ता अंतिम रास्ते से मिल जाएगा और तुम लौट कर वहीं आओगी जहां कभी एक कौतुहल की कातर दृष्टि से मुझसे मिली थी।
अज्ञात और अप्राप्यता के बन्धन अपेक्षाकृत ज्यादा गहरे रहें होंगे जो तुम्हें मुझ तक लाए थे परन्तु जिस प्रकार से तुम्हारी चेतना और सम्वेदना में मेरे अक्स का अधोपतन हुआ वह मेरे लिए भी कई अर्थों में अनापेक्षित है।
कुछ अनकहे किस्सों की दास्तान को चुपचाप शून्य में पढ़ता हूँ तब तुम्हारी गति को नाप पाता हूँ एकांत की एकलव्य साधना के बीच भी मेरी निष्ठा उतना असर नही बना पाई कि तुम्हारी सिद्ध मान्यताओं में दशमलव में भी हस्तक्षेप कर सकूं।
फिलहाल तो बेवजह के तर्क मेरे म्यान में पड़े है उनकी व्याखाएं अब दर्शन और मनोविज्ञान दोनों से परित्यक्त है उन्हें नितांत ही मेरी कमजोरी समझा जा सकता है। सोच और अर्जित अनुभव के बीच जब अपवाद की स्याही सूख जाती है तब उस कलम को तोड़ देना ही श्रेयस्कर होता है और तुम्हारे लिए क्या श्रेयस्कर है यह निर्धारित करने का मुझे कोई अधिकार भी नही है।
लोक कयासों में तुम्हारी उपस्थिति शनैः शनै: विस्मृत हो जाएगी शायद सन्दर्भों के अंतिम पृष्ट पर भी मेरा कोई धूमिल जिक्र न हो परन्तु मेरे लिए तुम्हें ज्ञात अज्ञात के मध्य एक सुखद स्मृति के रूप में खुद को संपादित करने के गाहे बगाहे प्रयास हुआ करेंगे और इन्ही प्रयासों की छाँव में जब मै सुस्ताने के लिए बैठूंगा तब मन के वातायन में तुम्हारे कद की धूप जरूर में हृदय की विकल घाटियो में उतरा करेगी। यह मन की एक ऐसी प्राकृतिक घटना है जिस पर मेरा बस शायद कभी नही चलेगा।
कमजोर और मजबूर इंसान न तुम्हें तब पसन्द थे और न अब होंगे तुम्हारी यह सूक्ति वर्तमान में मेरे लिए सबसे बड़ी युक्ति है जिसके सहारे साँझ होने से पहले अपना सामान इकट्ठा कर रहा हूँ ताकि उस दिशा में निकला जा सके जहां सूरज देर से उगता है।


'शाम के काम'

Thursday, February 19, 2015

पर्स पुराण

अमूमन पर्स शब्द महिलाओं से जुड़ा शब्द है। पुरुषों में हम देहातीजन इसे बटुआ कहते है और अभिजात्य वर्ग के लोगो को वैलेट भी कहते सुना है। बहरहाल, मुझे खुद के बटुए को पर्स कहने की ही आदत है और कहने की नही अपने स्कूल के दिनों से ही पर्स रखने की आदत है। पर्स दरअसल एक किस्म की आश्वस्ति का प्रतीक भी है कि आपके पास मुद्राराक्षक को कैद करने का एक चमड़े का लिफाफा है। मेरे पर्स में सिक्कों को रखने की एक छोटी सी जगह है उसमें वैष्णों देवी से प्रसाद के साथ मिला एक मूर्ति वाला छोटा सिक्का है जिसे इस उम्मीद पर रखा गया है कि बुरी से बुरी हालत में भी वो अपनी तरफ कम से कम सिक्को को तो खींचता ही रहेगा और इस टोटके में इतनी सच्चाई है भी मेरा पर्स भले ही नोटविहीन हो गया हूँ लेकिन कभी सिक्काविहीन नही हुआ है। पिछले दो साल से मेरे पास एक ही पर्स है मेरे वजन के दबाव में उसके प्योर लेदर की बाह्य त्वचा बदरंग हो गई है। धन के मामलें में मेरे झूठ सच के वाग विलास का जितना बड़ा साक्षी मेरा फोन रहा है ठीक उतना ही बड़ा मेरे अच्छे बुरे दिनों का साथी यह मेरा पर्स भी है। कभी कभी सोचता हूँ तो पर्स एक नश्वर काया लगने लगती है जो मेरे साथ जीती है और जब उसकी आयु पूर्ण होती है अपने हिस्से की जमापूंजी आगे हस्तांतरित कर देह से मुक्ति पा लेती है। इसलिए पर्स की देह बदलती है आत्मा नही। मेरे दो एटीएम कार्ड और एक एक्सपायर्ड आई डी कार्ड इस पर्स की स्थाई धरोहर है। एक मेरा अतीत बताता है और दूसरें में मेरा भविष्य छिपा है। पर्स की अलग अलग जेब में कुछ न कुछ मैंने भरा हुआ है हर छटे छमाही जब मै कुछ अनमना होता हूँ और पर्स भारी लगने लगता है तब मैं इसकी सफाई करता हूँ। वैसे तो अपरिग्रही हूँ मगर तब पता लगता है कि क्या क्या चीजें मै बेवजह ढोता रहता हूँ अक्सर मुझे एटीएम के मिनी स्टेटमेंट, किरयाने का बिल, बच्चों के फीस की रसीद और अलग अलग जगह पैसे जमा करने की रसीदें पर्स में पड़ी मिलती है मतलब धन देकर भी धन की असुरक्षा से मुक्ति का कोई रास्ता नही मिलता है।
कुछ अनजान लोगो के विजिटिंग कार्ड भी लगभग साल भर तक मेरे पर्स में यूं ही बेवजह यात्रा करते है न मै उन्हें देख कभी उनसे बात करता हूँ न कहीं किसी से मिलनें जाता हूँ एक दिन उनको फाड़कर कूड़ा जरूर बना देता हूँ।
जितना बड़ा मेरे पर्स का पेट है उसको अपेक्षाकृत उससे कम ही मुद्रा के ग्रहण करने का अभ्यास है इसलिए अब वो मेरी तरह संतोषी हो गया है। इस उम्र में पर्स को डिमांडिंग होना चाहिए जबकि वो एकदम विरक्त भाव से मेरी जेब में पड़ा रहना चाहता है शायद उसे भी मेरी आदत हो गई है। आज जब मैंने अपने पर्स की पड़ताल की तो उसमें रसीदी टिकिट टेलर का कपड़े की कत्तर लगा एक बिल, एक अखबार के क्लासीफाइड की कतरन और मेरे और बच्चों के कुछ फोटो भी मिलें पर्स की एक जेब में एचडीएफसी बैंक में जमा की गई ईएमआई की 9 स्लिप भी मिली जबकि ये कर्जा कब का उतर गया मै अब भी प्रमाण लिए घूम रहा था मैंने उनके उतने टुकड़े किए जितने कर सकता था और यकीनन ऐसा करना मुझे सुखप्रद लगा।
ऐसा कई दफा हुआ मेरे साथ यह पर्स बारिश में भीगा मगर इसनें अपनी वफादारी की हद तक मेरी जमापूंजी की रक्षा की इसी वजह से इसकी अंदर से चर्म काया अब काली और बदरंग हो गई है मगर मुझे यह खूबसूरत दिखती है इससे वफ़ादारी की खुशबू आती है। मेरा पर्स मेरी आर्थिकी का सच्चा गवाह है और सबसे बड़ी बात साक्षी भाव में रहता है कभी किसी से कोई चुगली नही करता है ना शिकायत करता है। हाँ जब मैं इसको एक पखवाड़े तक खोलता नही हूँ और ऐसे ही बेतरतीब अलमारी में पटक देता हूँ तब इसे जरूर हीनता का बोध होता है इस निर्जीव की प्रार्थना की शक्ति से मुझे शायद धन मिलता है और मै उसे पर्स को सौंप कर फिर इसे जेब में डाल लेता हूँ।
इस पर्स को मेरी दिलदारी पर फख्र है तो मेरे अनियोजन से ये चिंतातुर भी रहता है ऐसा कभी कभी मुझे महसूस होता है ये कभी कभी जीरो बैलेंस के एटीएम को दुत्कारता होगा कि कमबख़्तो क्यों बोझ बढ़ा रहे हो मेरा जब तुम अयोजविहीन हो गए हो ! वो बेचारे मेरी काहिली का किस्सा सुनाकर पर्स में आश्रय पातें है इसका मुझे बोध है।
बहरहाल आज पर्स का अनावश्यक बोझ हलका किया तो इसी बहाने पर्स से बातचीत भी हो गई अब इसमें एक गांधी जी का चित्र कुछ सिक्के, जिन दवाईयों से मुझे एलर्जी है उनकी लिस्ट,कुछ शेर, इमरजेंसी कांटेक्ट की डिटेल्स और एक लिस्ट उन मित्रों की जिनसे मैंने उधार लिया हुआ है धनराशि के उल्लेख के साथ रख छोड़ी है ताकि सनद रहे और वक्त बेवक्त पर काम आ सके।

'मै और मेरा पर्स'

Tuesday, February 17, 2015

शिव पार्वती सम्वाद

शिव:
पार्वती ! तुम अनन्य होकर भी चैतन्य हो तुम्हारे राग मन के नही है तुम्हारे प्रश्न चेतना के प्रश्न है जिनके सम्भावित उत्तर तुम जानती हो परन्तु मेरे मत से उनकी पुष्टि करवा कर तुम मुझे आदर देती हो साथ ही समानांतर मेरी परीक्षा भी लेती रहती हो। तुम्हारा बोध कतिपय मुझसे गहरा है इसलिए तुम प्रश्नों से उत्तर और उत्तरों से प्रश्न विकसित कर लेती हो। तुम अस्तित्व की वह रागिनी हो जो मेरे अवधूत नाद की तलहटी में बसती है।तुम्हारे बिना मेरे कथन उतने ही अधूरे है जितनी बिना देह के आत्मा। तुम प्रज्ञा के साथ चित्त की दशा को क्षणिक रूप से विभक्त करके मन को सांत्वना नही देती बल्कि मन को स्थिर प्रज्ञ होने का अभ्यास कराना तुम्हारी सिद्ध साधना में शामिल है। अनन्त तक मेरा विस्तार तुम्हारी ही यात्रा का विस्तार है तुम प्रकृति स्वरूपा सृष्टि के आधार पर निवास करने वाला मेरा ही प्रतिबिम्ब हो। जिसे समझ पाना ज्ञानी और अज्ञानी दोनों के लिए दुर्लभ है।

पार्वती:
हे ! अवधूत आप रहस्य रचतें है मैं रहस्य देखती और समझती हूँ आपसे माया को कीलित करना मैनें गुप्त रूप से सीख लिया है। आप जितने भोले दिखते है वास्तव उतने ही आप गहरें है। आपकी देह से निष्पादित ऊर्जा भी मेरे लिए अंधकार में प्रकाश का कार्य करती है। देवत्व से परे मेरे लिए आप गूढ़ दर्शन की टीकाएं है जिन्हें मै समझती हूँ और आप पर सन्देह करती हूँ। मेरा सन्देह ज्ञान का केंद्र है और अपने अस्तित्व को स्वयं के बल से परिष्कृत करने का एक आधार भी। जब आप कारक, कर्ता और कर्म से मुक्त हो मुझे निर्मुक्त चेतना के रूप में स्वीकार करते है तब मेरा चित्त अहंकार से नही बल्कि उस गरिमा से भरता है जो आपके सानिध्य से शनै: शनैः मुझे हासिल हुई है।
दो देह एक चित्त दो चेतनाओं के समन्वय के लिए शक्ति शिव से जुड़ती है मगर देवत्व और पुरूषत्व से इतर जब आप अनादि रूप में होते है तब मेरे लिए सर्वाधिक प्रिय ग्राह्य और समादृत होते है। मेरा आह्लाद नदी की कलकल में,भोर के अनहद नाद में शामिल है  जिसे मन के एकांत में सुना जा सकता है। आपकी व्याप्ति अनंत तक है मै आपकी यात्रा एक अंग अवश्य हूँ परन्तु मेरी अपनी एक गति लय और यात्रा है शायद इसी वजह से आपसे प्रत्यक्ष भेंट यदाकदा हो पाती है। आपका एक विस्तार मै हूँ और मेरा विस्तार आपने अपने रहस्य से अनन्त तक कर दिया है।


शिवरात्रि पर शिव-पार्वती संवाद
माध्यम: मैं (जो है भी और नही भी)

Monday, February 16, 2015

कॉमन कोल्ड

गलें में खराश है और आंखें तरी से बोझल। तबीयत नासाज़ जब होती है तो इतने चुपके से होती है कि जिस्म कब हथियार डाल देता है पता ही नही चलता है। खुद की गर्म सांसे डाकिए की तरह रूह के खत मुझ तक पहूंचा कर जल्दी में आगे बढ़ जाती हैं। उन्हें बांचता हूँ इन खतों की स्याही धीरे धीरे रंग छोड़ती है और लफ्ज़ लफ्ज़ घुल कर बह जातें है शायद मेरी आँखों की नमी भांप बन उड़ इनकी लिखावट को जल्दी से मिटा देना चाहती हैं। थोड़ी देर के लिए आँखें बंद करता हूँ और पलकों को गले मिलता देखता हूँ पलकों के छज्जे पर तुम्हारी यादें पैर लटकाएं बैठी है जैसे ही आँखें बंद होती है वो आँखों के समन्दर में डूब खुदकुशी करना चाहती है तभी ताप की बैचेनियों में मै बड़बड़ा कर आँखें खोल देता हूँ फिर एक कतरा आंसू ढलक कर कान तक जाता है उसकी आहट की महीन ध्वनि कान सुन लेता है और दिमाग को दिल की गुस्ताखियों के किस्से अपने कूट संकेत में भेज कर संतुलन साधने की अपनी वफादारी जताता है इससे पहले दिमाग तुम्हें मतलबी बताए  मैं करवट बदल लेता हूँ।
मेरा बार बार करवट बदलना ये कमरा बड़ी देर से देख रहा है उसकी चारों दीवार आपस में कयासों की चुगली कर रही है बस छत, खिड़की और दरवाज़ा मुझसे कोई सवाल नही करना चाहता कंक्रीट के इस षडयंत्रीय माहौल में ये तीनों मेरे सच्चे पैरोकार है।
धीरे-धीरे खांसता हूँ गला कराहता जिस्म सिकुड़ता है फिलहाल इतना भी बीमार नही हूँ जितना लग रहा हूँ ये जाती हुई सर्दी की एक बेवजह की शरारत है कल उसे लगा कि भरी सर्दी में तुम्हारी यादों और ख्यालों ने मुझे
इतना गर्म रखा कि मुझे एक छींक तक नही आई। इसलिए कल जब मै थोड़ी देर के लिए तुमसे विलग हुआ ईश्वर को याद कर रहा था तब इस सर्दी ने एक छोटा हमला मुझ पर कर दिया रात भर ख़्वाबों में तुमसे गुफ़्तगु के बाद सुबह मुझे इसकी खबर मिली। ईश्वर मुझे इसलिए भी कमजोर लगता है ये मुझे कमजोर देखना चाहता है अक्सर जब जब उसको याद करता हूँ एक नई चुनौति मुझे थमा देता है हालांकि मुझे जब तुमसे ही अब कोई शिकायत नही तो भला ईश्वर से क्या शिकायत होगी।
तुम अक्सर कहती हो तुम्हारे अंदर ईगो बहुत है तुम्हारी नाक बड़ी है मगर दिल छोटा है।दरअसल शायद तुम ठीक ही कहती हो मेरा दिल सच में इतना छोटा है कि तुम्हारे आने के बाद वहां मेरे जाने की भी गुंजाईश नही बचती है मेरी नाक जरूर बड़ी है मगर वो अपने हिस्से का एकांत को ढ़ो कर बड़ी हुई है इसलिए वो कभी किसी से टकरायेगी इसका न डर है और न कोई खतरा। फिलहाल नाक सुबह से रगड़ रहा हूँ इसलिए लाल जरूर हो गई है इसकी लाली ठीक वैसी ही है जैसे अभी तेज धूप में बैठकर तुम्हारे कान लाल हो जाते है।
अगर तबीयत नासाज़ न होती तो आज तुम्हें इतनी शिद्दत से याद न कर पाता इसलिए कभी कभी बीमार होना भी अच्छा लगता है ऐसी बीमारी तब और भी अच्छी लगती यदि तुम पहले हालचाल पूछती और फिर चिढ़ कर कहती जुकाम ही तो हुआ है क्यों ड्रामा कर रहे हो चलों गर्म पानी पियों तब तक अदरख तुलसी की चाय मै बनाकर लाती हूँ। चाय पीकर सो जाना ठीक उठोगे जब आँख खुलेगी।
छोटी मोटी बीमारी में तुम्हारी आश्वस्ति और झिड़की दोनों  बेहद याद आती है क्यों आती है पता नही।

'कॉमन कॉल्ड: अनटोल्ड'

Saturday, February 14, 2015

वजीफा

कुछ लापता गुजारिशें तुम्हारी दराज़ में खोजना चाहता हूँ मगर ये वक्त की दफ्तरी मेज तुम्हारे मेरे बीच आ जाती है। कुछ लम्हें तुम्हारे कंगन के जोड़ पर अटके है एक टांका मेरे अबोले मन का उन पर लगा है जिसे देखने के नजरों को बेहद महीन करना पड़ता है। तुम्हारे स्पर्शों को पलकों पर सम्भालें किसी तिजोरी के गुप्त ताले की तरह तुम्हारे कंगन को घुमाता हूँ मगर मेरी याददाश्त मेरा साथ नही देती है और बहुत कुछ कहता कहता भूल जाता हूँ इस उम्मीद पर शायद तुम मेरे बैचेनियों के वजीफे खाली वक्त में देखा करोगी।
मेरी अनगिनत करवटों की परछाई आज भी तुम्हारा पीछा करती तुम्हारी रोशनी में जाकर खुदकुशी करती है। जरूरत समझों तो अपने काजल की गवाही ले सकती हो वो तुम्हारी आँखों में मेरे रतजगों का सच्चा गवाह है ख़्वाबों की रोशनी में उसी के चाक से तुम मेरा वजूद बनाती मिटाती रहती हो। मेरी रूह पर अरसे से छाले पड़े हुए है तुम्हारा अहसास उनकी गहराई को नापता है और उनकी मरहम पट्टी करता है।
दरअसल तुम्हारे बारें में सोचता नही हूँ मगर कुछ ऐसे पवित्र अहसास है जो मेरा हाथ थामें मुझे उन निर्जन गलियों में ले जाते है जहां तुम्हारे कदमों के निशां वक्त ने आधे अधूरे छोड़े है। मेरा जज्बाती मन उसी की मदद से वो नक्शा तैयार करता है जिसके एक कोने में तुम्हारा शहर रहता है।
मिलनें की उम्मीद दिल अब नही पालता है दिल बस अब जीता चला जाता है खुद के सवालों और और खुद के जवाबों में मसलन कल तुम्हें भूलनें ही वाला था कि तुम्हारा मासूम गुस्सा मुझें याद आ गया फिर उसके बाद तुम्हारी यादों की कैद से मेरी रिहाई न हुई। रात भर ख़्वाब में तुमसे गुफ्तगु के बाद अब मेरी आँख खुली है मगर एक गहरी नींद से ज्यादा ताजगी मेरे जेहन ओ' दिल में है। तुम्हारी एवज़ में नींद की ही नही मै हर किस्म की शिकायत करना भूल गया हूँ।
तुम्हें रोज़ शिकायतों की नही सौगात की शक्ल में हासिल करता हूँ मीलों दूर भी की एक अंगड़ाई यहाँ मुझे यह बता देती है दिन में कम से कम एक बार मुझे याद कर तुम मुस्कुरा देती हो।
फिलहाल मेरे लिए इतना ही काफी है।

'यादों के वजीफे'

Monday, February 9, 2015

अभिलाषा

फरवरी एक तिहाई बीत चुकी है। कुछ अधूरे टेक्स्ट मन की गलियों से बह रहें हैं।एक लंबी यात्रा के बाद वें समन्दर का खारापन थोड़ा कम करेंगे। हमनें कभी साथ चलना शुरू किया था मगर आज मैंने देखा कि हम दोनों अलग अलग अक्षांश पर है हमारे देशान्तरों में सार्थक स्तर का अंतर आ गया है। यथार्थ की तमाम सच्चाई के बोध के बाद भी मन से तुम्हारे अनुराग का इंद्रधनुष नही मिटता है। अपनी वाग्मिता के तमाम ज्ञात कौशल के बावजूद भी पहली बार तुम्हें यह ठीक ठीक बतानें में असमर्थ हूँ कि तुम मेरे क्या हो! एक बड़ा ही विचित्र सा अहसास है शायद यह कोई नए किस्म का ज़ज्बात जन्म ले रहा है मेरे अंदर। तुमसे मेल मिलाप की आयु देखता हूँ तो असंख्य ज्वार भाटे नजर आते है हम एक दुसरे को पसन्द से लेकर नापसन्दगी की हद तक का अनुभव अपनें कंधे पर ढो कर यहां तक पहूँचे है। अच्छी बात है यह रही है कि हमने कभी एक दुसरे से घृणा नही की शायद इसी वजह से हमारे सिरे एक दुसरे से जुड़े हुए है आज।
ये महीना प्यार मुहब्बत का महीना है इजहार इनकार मनुहार सबके लिया मुफीद है मगर कम से कम तुम्हारे सन्दर्भ में मै किसी दिन महीने का मोहताज़ नही रहा हूँ। बारह मास तुम मन के केंद्र का एक हिस्सा रही हो।
एक ही बात को अलग अलग भाव शब्दों और वाचिक चालाकी से कहने की बजाये यह बात ईमानदारी से कहनें में मुझे कोई दिक्कत नही है कि हाल फिलहाल तुम मेरे खुद से ज्यादा नजदीक हो। कभी कभी तुम्हें एक कुशल शिल्पी की तरह मेरी संवेदनाओं को आकार देता हुआ देखता हूँ मै इस यात्रा में तुम्हारे कितने नजदीक आ गया हूँ ये तुम ठीक ठीक समझती हो परन्तु बहुत सी सांसारिक बातों के सहारे तुम मुझे उस टापू के का पता देती हो जहां मेरे हम उम्र लोगो का मेला लगा हुआ है वो अपनी अपनी सफलताओं और रिक्तताओं के आयोजन में व्यस्त है।
मेरी उनमें और उनकी बातों में कोई दिलचस्पी नही है ये तुम्हें पता है मगर कभी कभी तुम मुझे संपादित करने की जिद पर उतर आती हो उस समय तुम मैत्री की सीढ़ी के एक पायदान ऊपर पहूँच मुझे सम्बोधित करती हो मगर तुम्हें नही पता होता तुम फिलहाल जहां हो वहीं से तुम्हारी आवाज़ मुझ तक आ सकती है। जैसे ही तुम स्थान बदलती हो मेरे कान स्वत: बंद हो जाते है। मै नही चाहता तुम्हारी ऊर्जा मुझे लोक रीति के उपदेश देनें में अपव्यय हो क्योंकि उस मामलें में मै पर्याप्त ज्ञानी हूँ।
एकदिन मेरे अनुराग के व्याख्यान पर तुमनें सतही टिप्पणी करते हुए कहा था कि मेरे अनुराग का विस्तार मनोवैज्ञानिक अर्थों में कतिपय रूप से असामान्य है। जिसके पुर्नवास के लिए मुझे अपने हमउम्र लोगों में मैत्री,प्रेम,अनुराग की संभावना के कोरे निमन्त्रण सदैव अपनी ऊपर की जेब में रखने चाहिए। ज्ञान अनुभव से आता है इससे इंकार नही है मगर अर्जित ज्ञान की भी एक सीमा होती है। प्रत्येक समान परिस्थिति में वो सभी पर समान रूप से लागू होगा यह कहना मुश्किल होगा। मै अपवाद की तरह तुम्हारे जीवन में बचा रहना चाहता हूँ क्योंकि वक्त के साथ बेहद तेज़ गति से खर्च हो रहा हूँ मैं।
बहरहाल,बहुत स्पष्टीकरण और विस्तृत व्याख्यान से सम्बन्ध शुष्क हो जाते है उनकी तरलता जम जाती है मै जल की तरह तरलता से तुम्हारे जीवन में बहना चाहता हूँ रोज़ दुनियावी सूरज की गर्मी मेरा एक अंश सोख लेती है इससे पहले मेरे अन्तस् के पत्थर तुम्हें नजर आने लगे मै चाहता हूँ मेरे अस्तित्व की पहली बूँद तुम हृदय के अंतिम कोने पर जाकर अपनी यात्रा की पूर्णता को प्राप्त करें। यही मेरी अंतिम अभिलाषा है।

'अंतिम अभिलाषा'

Sunday, February 8, 2015

ग़ालिब

ये इश्क नही आसां बस इतना समझ लीजै
फेसबुक की दुनिया से व्हाट्स एप्प तक जाना है
कभी अपडेट के तंज सहने है
कभी लास्ट सीन का धोखा खाना है
दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है
म्यूच्यूअल फ्रेंड्स तक जानते है हाल ए दिल
एक तुम हो जो पूछते तुम्हें हुआ क्या है
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकलें
वर्चुअल दिखती थी ये दुनिया तुम तो एकदम रियल निकलें
आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक कौन जीता है तेरे जुल्फ के सर होने तक
चैट पर कुछ इस अंदाज से  गुफ़्तगु हो तुमसे
ग्रीन लाइट बंद कर दो सबके लिए कल होने तक।
ना था कुछ तो  खुदा था ना होता तो खुदा होता
डुबोया फेसबुक ने मुझको बेवजह
व्हाट्स एप्प पर होता तो
दोस्तों के शक से बचा होता
हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया वरना आज फेसबुक पर वो भी रात दिन लगा होता।

'चचा ग़ालिब से मुआफ़ी सहित'

Wednesday, January 28, 2015

उसकी बातें

उन दोनों की उम्र में सीधे सीधे दस साल का ज्ञात फांसला था।उम्र का ये फांसला एक को नजदीक लाता तो दुसरे को दूर करता। सनातन यात्री के रूप में एक का विलम्ब से आना और दुसरे का पहले आना नितांत ही संयोग का मामला है ऐसा होने में न किसी की कोई ज्ञात त्रुटि थी और न कोई विशिष्ट उपलब्धि। उम्र एक भौतिक इकाई है शरीर की कोशिकाओं की आयु को उम्र मानना विज्ञानसम्मत है परन्तु मन का भी एक अपना विज्ञान है और मन की आयु नापने के लिए विज्ञान से ज्यादा सम्वेदना के पैमाने की आवश्यकता होती है। यह भी एक बड़ा विचित्र संयोग था कि सांसारिक से लेकर गैरसांसारिक किस्म के उसके सारे दोस्त उससे लगभग दस साल बड़े ही थे और कभी ऐसा महसूस नही हुआ कि उनकी एक असंगत मित्रता है।
दरअसल उम्र को कभी मानक माना ही नही था उसनें। स्वयं को एक यात्री समझा जिसे वक्त ने वक्त से पहले परिपक्वता का लिबास पहना मंजिल की तरफ रवाना कर दिया और उसकी यात्रा सदैव कालगणना की सीमाओं में अतिक्रमण करते हुए आगे बढ़ी है। यदि अंकपत्रों के मुद्रित जन्मतिथि का एक प्रमाण न हो तो मन वचन कर्म से एक भी संकेत ऐसा नही बचता है जो उसकी वास्तविक आयु का आंकलन कर सकें।
अजीब बात यह भी रही कि सदैव से अपने वय के लोगो से न उसका तादात्म्य स्थापित हो सका और न समायोजन।उनकी रूचि के विषय उसकी रूचि के विषयों से एकदम भिन्न थें। जब वे करियरवादी थे तब वो दर्शन के जरिए कविताओं की उपयोगिता तलाश रहा था जब उनकी रूचि लौकिक कौतुहल में थी तब वो किसी पहाड़ की घाटी में बैठा प्रकृति के सौंदर्य को निहार रहा था।
उम्र का यह खेल उसकी समझ से हमेशा बाहर रहा है इसलिए शरीर की उम्र की बजाय वो चेतना और सम्वेदना की आयु को सम्बोधित करते हुए खत लिखता और वें सही पतें पर पहुँच भी जाते थे। मूलत: उसकी यात्रा मुक्त होने की यात्रा थी इसलिए जाति धर्म वर्ण क्षेत्र आयु ये सब लौकिक प्रतिमान कभी उसके अस्तित्व का हिस्सा बन भी न पायें। अपनी भौतिक उम्र से दस साल आगे की जिंदगी जीने को उसनें उत्सव के रूप में ग्रहण किया हालांकि इसके अपने जोखिम भी है मगर उसनें उनकी कब परवाह की है।
उम्र की ये लौकिक अवधारणा सम्भवतः एक वरिष्ठता और कनिष्ठता की ज्ञात और लोकप्रिय ग्रंथि हो सकती है या फिर ऐसा भी सम्भव है कि ईगो दुसरे की ऊंचाई को लेकर सवाल भी खड़ा करता हो परन्तु यह उसका खुद के बारें में एक अर्जित आत्मविश्वास रहा था कि अतीत या भविष्य में उसे लोग उससे बड़े या छोटे जरूर मिल सकते है मगर शायद उसके कद का एक भी शख्स उसे न मिलें। उसके लिए यह कोई आत्मप्रशंसा या आत्मविज्ञापन जैसी बात नही थी बस यह खुद की यात्रा के बारें में एक ज्ञात तथ्य की अभिव्यक्ति भर थी।
सारांश: किसी अन्यत्र के जीवन दर्शन अथवा मान्याताओं को संपादित करने की उसकी कोई अभिलाषा नही थी वो मानता था कि सबकी अपने चिंतन की मौलिकता एवं तयशुदा वजह होती है परन्तु फिर भी वह चाहता था कि वो इस उम्र की ग्रन्थि के बोझ से बाहर निकल आये क्योंकि इसके बाद ही वो देख सकेगी खुले आसमान की गहराई,समझ का विस्तार और चेतनाओं की दिव्य जुगलबंदी के अलौकिक आलाप जो सीधे दिल पर दस्तक देते है।
इस दौर में जब सब कुछ इतना गतिशील है कि जो लम्हा हम खो देते है उसे फिर कल्पना के जरिए भी हासिल नही कर पाते है ऐसे में चाहत थी  कि उसकी ऊर्जा का अपव्यय आयु के विमर्श में जाया न हो। निर्द्वन्द और निर्बाध हो वो चेतना और सम्वेदना के उस उत्सव में शामिल हो सको जहां उसके लिए एक स्थान उसनें अधिकारबोध से आरक्षित किया हुआ है। उसका यही भय था कि कहीं बड़प्पन के बोझ में वो उस अवसर या अनुभव को न खो दो जो आपके लिए अविस्मरणीय हो सकता है।

'उसकी बातें'