Monday, March 30, 2015

सर्दी-गर्मी

कल मार्च भी खत्म हो रहा है। नए साल के नए तीन महीने और पुराने साल के आखिरी तीन महीने मिलाकर आधा साल मेरी जिन्दगी में कुछ इस तरह दर्ज हो गया है कि इसके एक-एक दिन पर मैं घंटो व्याख्यान दे सकता हूं। अब जब मौसम करवट ले रहा है मेरे मन का पतझड अपने यौवन पर है। तुम्हारी अनुपस्थिति में मन की नर्म जमीं पर ख्यालों के सूखे पत्तों की एक तह जमा हो गई है जिसकी वजह से मुझे सांस लेने में कभी-कभी तकलीफ होती है।

पिछले छ महीने का हिसाब-किताब करके तुम्हें ना भूलना चाहता हूं और ना याद ही रखना चाहता हूं। सर्दी की चाय की प्याली से बात शुरु होती है वो खत्म होने का नाम नही लेती है मेरे ज़बान पर कुछ जायके ऐसे चिपके है कि वो घुल नही पा रहें है। सर्दियों की धुंध और सर्दियों की बारिश में तुमसे जो मेरी बातचीत हुई उसको उलटा पढना शुरु करता हूं मेरी आखिरी बात का एक सिरा तुमसे हुई पहली बात से मिल जाता है फिर भी सारी बातें आपस मे दोस्त बन एक दूसरे की पीठ थपथपाने लग जाती है।

अब गर्मियां आने वाली है दिन अजीब से चिढचिढे हो गए है अब अगले चार महीनें मै तपता रहूंगा इस ताप से और मेरे जिस्म से बहता रहेगा तुम्हारा प्रेम इसकी ठंडक से ही मेरे शरीर का तापमान सामान्य रहेगा। चौबीस घंटे मे दोपहर और शाम का वक्त मुझ पर सबसे भारी गुजरता है दोपहर मेरे कान मे आकर कह देती है तुम मुझे भूलने ही वाली हो और शाम को जब मै सूरज से इस चुगली की सच्चाई जानना चाहता हूं वो चुपचाप आंख बचाकर निकल जाता है। अब इन चार महीनों में धूल-अंधड और बारिश के भरोसे ही रहूंगा ताकि मै कुछ भी स्थिर होकर सोच न सकूं।

तुम्हारा बारें में स्थिर होकर सोचना मुझे डराता भी और तपाता भी है फिर मै ताप के असर में मन ही मन न जाने क्या क्या बडबडाने लगता हूं। कहने को तो यह बसंत है मगर मेरा बसंत इस बार सर्दी की गोद में आकर चुपचाप चला भी गया है मेरा बसंत तब था जब सुबह सुबह उनींदी आंखों से बिस्तर पर तुम्हें याद कर मै मुस्कुरा देता था। तुम्हारे ताने सुनकर करवट बदलना भूल जाता था। इन सर्दियों में तुम्हारी वजह से मेरे संवेदनाएं इतनी जीवंत किस्म की थी कि मै बिस्तर तकिया गद्दा रजाई यहां तक दर ओ दीवार से भी बातें कर लेता था। और ये बातें कोई आम बातें नही थी बल्कि ये सब उतनी ही गहरी बातें थी जितनी कभी तुमसे आमने सामने हुई है। कल जब मै बिस्तर की सिलवट ठीक कर रहा था तब अचानक लगा किसी ने मेरा हाथ पकड लिया कुछ सिलवटों को शायद मेरी हस्तरेखाएं देखनी थी वो उनके जरिए तुम्हारे आने के महूर्त का पंचाग देखना चाहती होंगी शायद। आज सुबह तकिए को जब मोडना चाहना तो उसने इंनकार कर दिया पूछने पर कहने लगा थोडी देर आंखे बंद करके सीधे लेटे रहो मै तुम्हारी गर्दन पर फूंक मारना चाहता हूं मैने पूछा क्यों तो कहनें लगा मेरे ऐसा करनें से किसी के कान की बालियां होले-होले हिलेंगी और वो ऐसा करना चाहता है उसके पास ऐसा करने की सिफारिश है।

रोज सुबह मेरी चप्पल एक दूसरे के कान मे कुछ कहती हुई मिलती है उन्हें देख मुझे लगता है कि ये तो मेरी यात्रा का शकुन है मगर मुझे तुम्हारा पता नही मिलता है मै किताबों से लेकर कविताओं की तलाशी लेता हूं गुस्ताखियों की बंद दराज़ खोलता हूं जहां तुम्हारे खत तो मिलतें है मगर जहां पता लिखा होता है वहां की रोशनाई फैल गई है मै केवल उस पर स्पृश से तुम्हारी दिशा का अनुमान लगाता हूं और अपने जूतों पर पॉलिश करने लगता हूं।

गर्मी आ गई है। सर्दी चली गई है। मगर तुम ना कभी आई और ना कभी गई बस ये एक अच्छी बात है। यह अच्छी बात से बढकर एक भरोसा है कि कम से कम तुम आवागमन से मुक्त हो और कहीं एक दिशा में स्थिर हो। जब भी मुझे सही दिशाबोध हो जाएगा और मेरे जीवन का दिशाशूल निष्क्रिय हो जाएगा उस दिन मै भटकता हुआ तुम तक आ ही जाउंगा तब तक तुम इंतजार को मेरी तल्खियों से बीनती रहना और गुनगुनाती रहना कुछ ऐसा जिससे मै दूर से तुम्हारी आवाज़ पहचान लूं। आने वाली गर्मी में लू के बीच शीतल छाया की तरह तुम्हें अपने विकल जीवन में रखना चाहता हूं ताकि जब कहीं चैन न मिलें तो थोडी देर तुम्हारी छाया में चैन से बैठ सकूं पी सकूं तुम्हारे हाथ से दो घूंट पानी।

‘सर्दी से गर्मी तक’

Friday, March 27, 2015

इन्तजार

सुबह कहीं अटक गई है। सुबह कितने घंटे विलम्ब से चल रही है इसकी उद्घोषणा कोई नही करता है। रात अपने निर्धारित समय पर ही चली थी।याद करने की कोशिश करता हूँ तो मुझे शाम की एक चिट्ठी याद आती है जिसमें सूरज की तबीयत खराब होने का जिक्र हुआ था। अनुमान लगाता हूँ जहां अभी दिन निकला हुआ होगा वहां सूरज की बीमार रोशनी ही पहूंच रही होगी। मैं सुबह के इन्तजार में हूँ इसलिए मन्दिर की घंटियों,शंख और आरती की आवाज में मेरी कोई रूचि नही है। जो लोग मन्दिर के अंदर ये सब कर रहे है उन्हें सुबह का इन्तजार नही है बल्कि वो सुबह को विलम्बित होते देखना चाहते है ताकि उनकी उपयोगिता बची रहें।
काल का बोध एक चैतन्य घटना है परन्तु काल का चक्र एक भरम भी हो सकता है। दिन और रात की खगोलीय वजहों के अतिरिक्त कुछ दूसरी वजहें भी हो सकती है। कभी कभी दिन होता है और उसको रात समझनें को जी चाहता है ठीक ऐसे ही जब दुनिया थककर सो जाती है मैं रात को जागता हूँ और नींद से बात करने लगता हूँ पूछता हूँ क्या मेरी थकावट एकमात्र वजह है उसके आने की या फिर उसे मुझसे प्रेम है वो खुद थकी हुई आती है मेरे अंदर सोने के लिए। कल शाम जब सूरज डूब रहा था मैंने देखा धरती पर कुछ लोग खुश थे वो शायद रात के इन्तजार में रहें होंगे और रात का विलम्बित हो जाना शायद उन्ही की प्रार्थनाओं का परिणाम हो सकता है।
दोपहर अक्सर एक बात कहती है दिन आधा बचा है जबकि आधी रात अक्सर चुप रहती है वो न सोनें के लिए कुछ कहती है और न रोने के लिए। कुछ लोग निवृत्त हो सो जातें है और कुछ रोनें लगते हैं। रात दोनों के लिए आधी आधी बंट जाती है।
सुबह के इन्तजार में दो किस्म के लोग है एक मेरे जैसे जिन्हें सुबह से कुछ सवाल पूछनें है दुसरे जिन्हें सुबह को कुछ जवाब देनें हैं। आज सुबह तीसरें किस्म के लोगो के आग्रह से विलम्बित है ये वो लोग है जो रात की लम्बाई से संतुष्ट नही हैं इसलिए सुबह से एक टुकड़ा उधार मांगना चाहतें है और लगता है आज सुबह ने उनकी प्रार्थना सुन ली है।
मेरी प्रार्थना इतनी सी है कि सूरज की हरारत ठीक हो गई है क्योंकि यदि सूरज दिन में बीमारों वाली अंगड़ाई लेगा तो बादल इसका गलत अंदाजा लगा बरसनें के षड्यंत्र करनें लगेंगे फिलहाल न धरती चाहती और न मैं कि बारिश हो क्योंकि बारिश का मतलब है सुबह दोपहर शाम रात का फर्क का धुंधला जाना। यह फर्क दरअसल उस उम्मीद का प्रतीक है जो कहती है ना समय स्थिर है ना इसके प्रभाव इसलिए इसके हिसाब से अनुमान के छल से बचनें के साधन विकसित किये जाने चाहिए।
फिलहाल सुबह की आमद हो इसी के इन्तजार में हूँ क्योंकि वो एक चिट्ठी लेकर आनें वाली है जिस पर नाम किसी और का मगर पता मेरा लिखा है यदि वो मुझ तक सही सलामत पहूँच गई तो एक दिन उसकों जरूर उद्घोषणा के स्वर में बाचूंगा। आने वाली सुबह से इतना ही वादा है मेरा।

'सुबह का इन्तजार'

Wednesday, March 25, 2015

दोपहरी नोट्स

एक दिन आप तय कर लेते है अपनी जीने की एबीसीडी,फिर गढ़ना पड़ता है अपना खुद का व्याकरण। अकेला पड़ने के जोखिम तो होते ही है क्योंकि लोग आपको पढ़ते कुछ दूर साथ चलतें है फिर उन्हें समझ नही आपकी लिपि। ऐसे में सर्दी में भी बहकर सूख जाती पारस्परिक अभिरुचियों की छोटी सी नदी।
कोई दूर जाता तभी तक नजर आता है जब तक निगाह में रहता है फिर दृश्य से वो ऐसे हो जाता है ओझल जैसे अनजान शहर के रास्ते छूटते चले जातें हैं। मन का किसी के मन में  ठहरना एक घटना है बल्कि यूं समझिए एकतरफा घटना है आप जिस वक्त सोच रहे होते है अपनी भाषा में तब उसका अनुवाद करने वाली आँखें देख रही होती एक अलहदा ख़्वाब।
मन की सराय में सुस्ताते वक्त आप भूल जाते है अपना यात्री होने का चरित्र तब याद रहती एक ठंडी छाँव जिसमें बैठ आप जम्हाई ले रहे होते है तभी आँख से ढलक पड़ता है एक छोटा आंसू तब आप उसकी वजह भी नही जान पाते और वो एक छोटी समानांतर लकीर के रूप में समा जाता है चेहरे की खुश्क गलियों में।
आपका तय करना बहुत कुछ तय कर देता है अपने साथ फिर आप शिकायत नही कर सकतें क्योंकि शिकायत करने का अधिकार आपको कमाना पड़ता है और ये आप तभी कमा पातें है जब अपनें व्याकरण को प्रकाशित करके आप कम से कम अपना एक सहपाठी तैयार कर सकें। ध्यान रहें आपको एक सहपाठी चाहिए होता ना कि शिष्य या कोई गुरु।

'दोपहरी के नोट्स'

Friday, March 20, 2015

सनातन यात्रा

अब थक रहा हूं मैं।
एक ही बात कितनी ढंग से बताने की मेरी तमाम कोशिसें नाकाम रही है। शायद तुम्हारे पास वो चैनल ही नही जहां से तुम जज्बात की इन माईक्रो वेव्ज़ को रिसीव कर सको। मेरी सम्भावना तलाशने और तराशने की सभी युक्ति अब मेरे साथ ही थकने लगी है। मैं तुम्हें जो बताना दिखाना और जताना चाहता था उसके लिए दुनिया से अलग होने की जरुरत नही थी बस उसके लिए तुम्हें खुद को खुद से अलग करके देखने की आदत विकसित करनी थी जो तुम शायद नही कर पायी।
हर हाल मे खुद को सही साबित करके मै मानवीय सम्बंधो में अराजकतावादी नही होना चाहता हूं इसलिए अब खुद की अवधारणाओं की चादर समेट रहा हूं मेरी अनंत की यात्रा में उसकी भी अपनी उपयोगिता है। आज भी आपकी निजता और आपकी मानयताएं मेरे लिए उतनी ही समादृत है क्योंकि मै आपका मित्र रहा हूं कोई आपके जीवन दर्शन का सम्पादक नही था मैं।
मुझे अब तुमसे कोई शिकायत नही है दरअसल हम मनुष्य अपनें अनुभवों से अर्जित मान्यताओं में जीने के आदी है। यह हमें यह आश्वस्ति देता है कि हम कुछ गलत नही कर रहे है हर अनजानी डगर हमें डराती है उसके जोखिम हमें सिमटने पर मजबूर करते है। मनुष्य को समझ के साथ असंतुष्टि प्रारब्ध से ही मिली है वह प्राप्य से ऊब कर अप्राप्य की खोज मे लगा रहता है और इसी उपक्रम में उसे कथित रुप से आनंद भी मिलता है उसे लगता है उसके पास अंवेषणा है जिसके जरिए वो प्रयोग कर मानवीय सम्बन्ध की लोच को समझ सकता है। मिलना बिछडना इसी उपक्रम की अवैध संतानें होती है।
संवाद मे सम्प्रेषणशीलता का संकट सबसे बडा संकट होता है तब आप इतने संकोच से भर जाते है कि आपकी एक छोटी सी सामान्य बात भी अन्यथा लिए जाने की भूमिका लगने लगती है। मेरी चाह थोडी अजैविक किस्म की रही है मै मानव रचित मनोविज्ञान और समाजशास्त्र का अतिक्रमण कर सम्बंधों की नींव रखना चाहता रहा हूं इतना ही नही मेरे पास प्रकृति को भी मौसम विज्ञानियों, वनस्पतिविज्ञानियों, जीववैज्ञानिकों और पर्यावरण विदो से अलग देखने का चश्मा है।
मै नदी को दोस्त कहने लगता हूं उनके हवाले अपने गमों के बैरंग खत कर देता हूं कहता हूं दे देना मेरे उस नामुराद सागर दोस्त को। पहाड से सलाह मांगने उसकी चोटी पर अकेला चढ जाता हूं उसके कान में फूंकता हूं अग्निहोत्र मंत्र, झरनों से मेरी अजब सी दोस्ती है मै उनकी पीठ पर हाथ फेरता हूं और उनके बोझ के बारे मे पूछताछ करता हूं। बादलों से मै अफवाह शेयर करता हूं बारिश मे अपने आंसू मिला देता हूं ताकि वो थोडी खारी भी हो जाए। रास्तें की झाडियों और खरपतवार मुझसे से मेरे जूतों के फीते के मांग लेते है और मै उन्हें खुशी से दे कर आगे बढ जाता हूं। रोज मुंह धोने के बावजूद भी मेरी पलकों पर रास्तों की थोडी गर्द जमी ही रह जाती है और यकीन मानना इससे मेरी रोशनी बढती है मेरी आंखों मे बस यही तजरबे का सुरमा लगा होता है जिसके वजह से कभी तुम्हें ये आंखे बडी नशीली लगा करती थी।
मै अपने समय मे हमेशा अन्यथा लिए जाने के लिए शापित हूं एक दौर बीत जाने के बाद मै समझ आता हूं तब तक मै वहां नही मिलता हूं जहां से विदा हुआ था बस यही एक खेद जनक बात है। सनातन रुप से मेरी यात्रा अनावृत रुप से जारी है चेहरे बदलते है किरदार नही। अनुभव हमेशा मुझे नही सिखा पाता इसलिए अनुभव मुझसे नाराज़ रहता है। मुझसे नाराज़ लोगो की लंबी फेहरिस्त है मगर मुझे यकीन है जब मै उनके आसपास नही रहूंगा उनकी नाराज़गी भी ऐसे ही घुल जाएगी जैसे बरसात में पतनालें मे जमीं धूल घुल कर बह जाती है।

‘सनातन यात्रा

Sunday, March 15, 2015

दो बात

वर्तमान समय का सबसे बड़ा छल है जो भविष्य की गोद से निकल कब अतीत का हिस्सा बन जाता है पता नही चलता है। हम कौतुहल से भविष्य की तरफ देखतें है तो अतीत को दो हिस्सों में बाँट देते है। अतीत के एक हिस्से पर हम अपनी मूर्खताओं पर हंस सकते है फख्र कर सकतें है वही दुसरे हिस्से में अपराधबोध और भावुक मूर्खताओं के कैलेंडर टंगे होते है जिनके साल कभी नही बदलतें हैं।
वर्तमान के विषय में सबसे खतरनाक चीज़ एक यह भी होती है कि यदि जीवन में भौतिक उपलब्धियों की आमद नही है तो आपका वर्तमान भूत और भविष्य दोनों से ज्यादा क्रूर हो जाता है।
कुछ करने के भरम और कुछ भी न करने के करम के बीच फंसा होता है एक यथास्थितिवादी मन जो कभी बाह्य दुनिया के तमाशे देख ठहाका मार हंसता है तो कभी आत्मदोष का शिकार हो खुद से ही सवाल करता है कि इस व्यवहारिक और बुद्धिमान लोगो की दुनिया में आखिर मै कर क्या रहा हूँ क्या सहमति,समीक्षा और सांत्वना ही उसके जीवन की उपयोगिता के अधिकतम सूत्र है जिसका सर्वाधिक अभाव होते हुए भी उसे वही सबसे ज्यादा बांटनी पड़ती है ताकि वह काल के इस बोध में प्रासंगिक बना रहे।
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सबसे गहरी चोटें छिपाकर रखने के लिए शापित होती हैं। सबसे गहरे मलाल उन्हीं से जुड़ें होतें है जो दिल के बेहद करीब होते है। सबसे ज्यादा आहत वही बातें करती हैं जो कडवेंपन और स्पष्ट होनें में फर्क नही कर पाती। सबसे असुविधाजनक होता है किसी के जीवन में अपनी भूमिकाओं को बदलते हुए देखना। सबसे बड़ा भय किसी को खोने का होता है जिसके वजूद का हम खुद का हिस्सा मान जीने लगते हैं।
और सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है किसी के जीवन में अपरिहार्य न होना।
...इतनी बड़ी बड़ी बातों के बीच एक छोटा आदमी कैसे मुस्कुराने की सोच सकता था खुश रहनें की जरा सी आदत क्या हुई खुद को खुद की ही नजर लग गई।

Monday, March 2, 2015

अथ मुखपोथी कथा:

...फिर श्री माधव ने देवऋषि नारद जी से कौतुहल- कातर दृष्टि से पूछा
हे ! देवऋषि नारद आप इतने दिन कहां थे देवलोक में हम सूचना शून्य हो गए है यहां सबकुछ इतना व्यवस्थित है कि दिव्यता में भी रस नही आ रहा है। आप सम्भवतः मृत्युलोक की यात्रा से लौटें है कृपा करके वहां के मानवों का वृत्तांत कहो उसे सुनने की मेरी बड़ी अभिलाषा है।
देवऋषि नारद बोलें:
भगवन आपका अनुमान सही है मैं अभी सीधा मृत्युलोक से ही आ रहा हूँ अब वहां आपकी माया से प्रेरित होकर अज्ञानता का अभिनय नही होता है। मनुष्य उत्तरोत्तर चालाक होता जा रहा है वर्तमान में वहां के समस्त प्राणी समयरेखा के खेल में उलझे हुए है और कभी खुद को आनन्दित तो कभी अवसादित बताते हैं।
श्रीमाधव ने उत्सुकता से पूछा देवऋषि ये समयरेखा क्या है? क्या मनुष्य ने पृथ्वी ग्रह का विभाजन इस रेखा के माध्यम से किया है?
नारद जी बोले नही भगवन् यह कोई आकृति वाली रेखा नही है यह आभासी दुनिया की एक समयरेखा है। आंग्ल देश के एक उत्साही युवा जिसका नाम जुकरबर्ग बताते है उसनें एक ऐसा आभासी मंच तैयार किया है जिस पर संगणक अंतरजाल और चलदूरवाणी के माध्यम से मनुष्य अपने जैसे लोग तलाशता फिर रहा है देश काल धर्म भाषा लिंग से इतर मनुष्य ने अपने एकांत को समाप्त करने की एक युक्ति विकसित कर ली है। आर्यवर्त भारत में तो इस मुखपोथी की लोकप्रियता वर्तमान में शिखर पर है प्रभु। विद्यार्थी से लेकर उद्यमी तक शासकीय सेवा से लेकर निजी क्षेत्र तक,गृहणी,रोजगार और बेरोजगार श्रेणी के सभी मनुष्य इस मंच पर सक्रिय है। मृत्युलोक पर मनुष्य की शायद ही कोई ऐसी कोटि बची हो जो इस मुखपोथी और समयरेखा के फेर में न उलझा हो। मनुष्य की तकनीकी दासता की हालत यह है प्रभु कि अब मनुष्य के हाथ में चलदूरवाणी नामक यंत्र हमेशा रहता है और वो मार्ग पर चलता चलता भी उसमें खोया रहता है वो कभी मुस्कुराता है तो कभी अचानक से खामोश हो जाता है। मनुष्य अपनी निजता प्रकाशित करके लोकप्रियता हासिल कर रहा है। आपको समयरेखा पर खाने पीने रोने धोने,यात्रा, जीने मरने,सुख दुःख, लड़ने और पलायन तक सबकी सूचनाओं का आदान प्रदान मनुष्य को करते देख सकते है। वर्तमान में राजनीति का भी यह बड़ा साधन बना हुआ है।
मुखपोथी पर सुबह मनुष्य एक तस्वीर लगाता है फिर उसके अन्य मित्र उसकी प्रशंसा करते है शाम तक वो उसी प्रशंसा से ऊब कर नई तस्वीर लगा देता है फिर प्रशंसा का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। मनुष्य क्षणिक रूप से खुश होता है फिर गहरे अवसाद में चला जाता है।
प्रभु ! मै पिछले एक महीने से इंद्रप्रस्थ में था वहां पुस्तकों का एक बहुत बड़ा मेला लगा हुआ था। अब पुस्तकों की बिक्री भी अंतरजाल के माध्यम से होने लगी है वहां लेखकों/कवियों/साहित्यकारों ने मेले में घूमकर अपने पाठकों के साथ बहुत से चित्र खिंचवाएं। पाठक बहुत प्रसन्न थे और बिना विलम्ब किए मेले से सजीव चित्रों का प्रकाशन मुखपोथी पर कर रहे थे।
अब लोकप्रिय लेखक वही है जो मुखपोथी पर अपनें पाठक तैयार करता है ऐसे लेखकों को हिन्द का एक प्रकाशन बहुत आदर देता है। कुछ बड़े लेखक मुझे जरूर अनमने नजर आए अब उन्हें भी लेखक कोनें में बैठ प्रवचन देना पड़ा वें अपनी दुलर्भ रहस्यता को लेकर चिंतित दिखे।
भगवन् इस मुखपोथी और समयरेखा ने आर्यवर्त में कवित्व को बड़ा मंच दे दिया है जो लम्बे समय से भरे हुए घूम रहे थे वे अब खुलकर काव्य लिख रहे है और तेजी से लोकप्रिय हो रहे है उत्तर आधुनिक काल की इस नई कविता ने स्थापित कवियों को चिंता में डाल दिया है वें मुखपोथी की कविता की दबे स्वरों में आलोचना करते है मगर अब वें खुद की अज्ञात कविताएँ भी इस मुखपोथी पर प्रकाशित करके यह बताते है कि देखों एक मुखपोथी के कवि और प्रकाशित किताबों वालें कवि के कवित्व में गुणात्मक अंतर होता है।
मैंने कुछ बड़े कवियों को उनकी बैठकों में सोमरस और धूम्रदण्डिका के साथ मुखपोथी की कविता और कवियों की अभद्र आलोचना करते भी देखा और सुना है।वो अप्रसन्न है भयभीत है असुरक्षित है यह मैं बताने में असमर्थ हूँ। ये स्थापित कवि केवल एक बात से अवश्य प्रसन्न है कि इनकी सजिल्द कविताओं की पुस्तकों के स्थाई ग्राहक ये मुखपोथी के ही कवि है बाकि सारी किताबें तो युक्तियों से शासकीय पुस्तकालयों में सुशोभित होती है।
हे ! भगवन मुखपोथी की दुनिया विचित्र रहस्यों से भरी पड़ी है सम्भवः है अब मनुष्य के व्यवहार के अध्ययन के लिए एक मुखपोथी अध्ययन शाखा विकसित की जाए और इस पर स्वतन्त्र शोध हो।
देवनारायण विस्मय से शून्य में देखते हुए बोले यह तो चमत्कार जैसा है देवऋषि ! परन्तु हमें यह अंतरदृष्टि से भी दिखाई नही दे रहा है लगता है देवलोक के संचार अभियंता को बुलाना पड़ेगा तब तक आप मृत्युलोक से यंत्रो का प्रबंध करों मैं यहां अंतरजाल खुलवाता हूँ।
मनुष्य की यह लीला देखनी ही पड़ेगी।
जो आज्ञा प्रभु !कहकर देवऋषि नारद अंतर्ध्यान हो गए।

Wednesday, February 25, 2015

बारिश

रात के बारह बजे के बाद से बारिश है।सुबह जगा तो लगा आज की सुबह कुछ जानी पहचानी सी है। जिनकी रुह पर छाले और पलकों पर जाले लगे होते है उनको बारिश महज़ मौसम का बदलना नही लगता।बल्कि इसकी महीन बूंदो के जरिए वो खुद को रफू करना चाहते है। बारिशों के लगाये पैबन्द अगली बारिश तक रुह से चिपके रहेंगे इसकी भले ही कोई गारंटी न हो मगर खुद की बैचेनियों की आग से झुलसते मन को बेशक ये बूंदे थोडा सुकून तो देती ही है।

एक बारिश खुद के अंदर रोज़ होती है मगर उसका गीलापन दिखता नही है क्योंकि दिल की धरती बेरुखी की गर्मी से इतनी तपती है कि आंसू भांप बन उड जाते है। बातचीत में मेरी पलकों पर जो नमी दिखाई देती है वो दरअसल इसी भांप की नमी है।

सुबह से कुछ किताबें तलाश रहा हूं जो पढी जा चुकी है। जब-जब बारिश होती है मुझे पुरानी किताबें याद आने लगती है और उनको दोबारा पलटना शुरु कर देता हूं। उसमें कुछ अंडरलाईन की गई ख्वाहिशें होती है जिन्हें वक्त के दबाव के चलते तब बचा लेता हूं ऐसी बारिशों के लिए। क्योंकि बारिश मे अक्सर यह महसूस कर पाता हूं कि किसी कहानी कविता या उपन्यास का लेखक कितना मेरे जैसा है और किताब में तुम कहां कहां बैठी हो। आज सुबह से कविता की वह किताब नही मिली जिसकी हर कविता में तुम्हें पाया था जैसे अक्षरों पर तुम्हारी मुस्कान सजी हो व्याकरण में तुम्हारा जीवन हो और पूर्ण विराम में तुम्हारी आश्वस्ति सांस लेती हो।

किताब न मिलनें पर थोडी देर अनमना रहा है आंखे बंद किए बूंदों की आहूतियां सुनता रहा धरती की दरारों में उनका समाना खुद से खुद का मिलने जैसा है। बूंदों के संगीत को सुनने के लिए चेहरे पर टंगे कान किसी काम नही आते इसके लिए दिल से दरख्वास्त करता हूं कि वो थोडी देर के लिए उसके साथ हुई ज्यादतियों को भूल जाए और दिल मान भी जाता है। तुम्हारें कंगन के बीच फंसी चार चूडियों की खनखन से पहला सुर उभरता है और मंद मंद धडकनों में छिपे छंद को आरोह अवरोह के जरिए ताल से साधता हूं फिर बूंदो का एक समूह ताल की थाप बन जाता है बीच बीच में तुम्हारी नई जूतियों का कोरस सुनाई देता है और पायल फिलर की तरह बूंदो के इस नाद में शामिल हो जाती है। ये संगीत दरअसल मन के अधूरे रागों का संगीत है इसलिए मेरी अधूरी जिन्दगी में बारिशों के जरिए बार बार मन को गीला करता है।

आंखे बंद किए मै बूंदों की चुगलियां सुनता हूं जो वें आपस में मेरे बारें मे करती है। बादलों की दुनिया में मेरी आवारागर्दी के किस्से अफवाहों की शक्ल में घूमते है। कुछ बदमाश बादल मेरी बर्बाद किस्म की जिन्दगी को देखने के लिए अपना भार भूल धरती के बेहद नजदीक चले आते है उसके बाद बरसना उनकी मजबूरी होती है। बारिश होने की साजिश में मौसम के अलावा मेरी भी इतनी भूमिका है यह बात कभी कोई मौसमविज्ञानी नही बताएगा।

पिछले एक घंटे से ‘दिल तो पागल है’ और ‘सर’ फिल्म के गाने रिपीट करके सुन रहा हूं ये एक अजीब सा पागलपन है जो बारिश होने पर मुझ पर हावी होता चला जाता है। खिडकी ठीक मेरे बिस्तर के पास है बारिशों में अपना वजूद खो बैठी ठंडी हवा मेरी गाल को छूकर कहती है नही सर्द गर्म तो नही है। मै मुस्कुराता हूं और बारिश को देखता हूं कुछ बूंदे मुझे यूं देखकर शरमा भी जाती है फिर खिडकी से बमुश्किल अपना हाथ बाहर करता हूं मेरी हथेलियों पर दरअसल मेरी गुस्ताखियों के किस्से सीमेंट की तरह पुते है बारिश की नन्ही बूंदे अपनी मद्धम चोट से मेरा हाथ धोना चाहती है मै हथेली नीचे कर देता हूं मेरे हाथ से रिसती बूंदे शायद मेरी इस चालाकी पर हंसती है क्योंकि जमीन पर गिरते वक्त उनकी आंखे चमकती देखता हूं।

अब जब बारिश थम गई है मेरे कानों में अभी भी बूंदों की आवाज़ गूंज रही है ये ठीक तुम्हारी मुस्कान और हंसी के बीच के जैसी है जिसके लिए मेरे पास शब्द नही है। अक्सर बारिश को सुनते हुए तुम्हें याद करता हूं मेरे शब्द खो गये है कहीं इसलिए फिलहाल बूंदों के संगीत से नई वर्णमाला सीख रहा हूं एक दिन इसके नोट्स भेजूंगा तुम्हें फिर तुम भी अपने हिस्से की बारिश को सुन सकोगी ठीक मेरी तरह।


‘बारिश का कोरस’

Friday, February 20, 2015

शाम

जाना तो तुम्हारा पहले दिन से ही तय था। यकायक चली जाती तो इतना कष्ट इतना संताप न होता। तुम इतनी आहिस्ता आहिस्ता नजरों से ओझल हुई कि उन लम्हों को सोचकर अक्सर शाम को जी बहुत बोझिल हो जाता है। तुम्हारा मिलना और मिलकर बिछड़ना महज एक किस्सा नही है जिसे किसी गहरे दोस्त के साथ शेयर करके जी को हलका किया जा सकें। ये एक मुसलसल हादसा है जिसकी टीस शायद कुछ छटांक भर बोझ दिल की नाजुक दीवारों पर ताउम्र चढ़ाती जाएगी।
कितना ही मतलबी होकर क्यों न सोच लूं मेरी सोच की धमनियों में तुम्हारी धड़कन का कम्पन स्पंदित होता ही रहता है। अफ़सोस यह भी है तुम्हारे मन को पढ़ पाने और उसमें मेरे लिए असमान वृत्तियों को देख पाने के बाद भी मै खुद के अनुराग की गति को नियंत्रित न कर सका। तुम्हें किस्तों में खोता गया और खुद को ये सांत्वना देता रहा शायद पहला रास्ता अंतिम रास्ते से मिल जाएगा और तुम लौट कर वहीं आओगी जहां कभी एक कौतुहल की कातर दृष्टि से मुझसे मिली थी।
अज्ञात और अप्राप्यता के बन्धन अपेक्षाकृत ज्यादा गहरे रहें होंगे जो तुम्हें मुझ तक लाए थे परन्तु जिस प्रकार से तुम्हारी चेतना और सम्वेदना में मेरे अक्स का अधोपतन हुआ वह मेरे लिए भी कई अर्थों में अनापेक्षित है।
कुछ अनकहे किस्सों की दास्तान को चुपचाप शून्य में पढ़ता हूँ तब तुम्हारी गति को नाप पाता हूँ एकांत की एकलव्य साधना के बीच भी मेरी निष्ठा उतना असर नही बना पाई कि तुम्हारी सिद्ध मान्यताओं में दशमलव में भी हस्तक्षेप कर सकूं।
फिलहाल तो बेवजह के तर्क मेरे म्यान में पड़े है उनकी व्याखाएं अब दर्शन और मनोविज्ञान दोनों से परित्यक्त है उन्हें नितांत ही मेरी कमजोरी समझा जा सकता है। सोच और अर्जित अनुभव के बीच जब अपवाद की स्याही सूख जाती है तब उस कलम को तोड़ देना ही श्रेयस्कर होता है और तुम्हारे लिए क्या श्रेयस्कर है यह निर्धारित करने का मुझे कोई अधिकार भी नही है।
लोक कयासों में तुम्हारी उपस्थिति शनैः शनै: विस्मृत हो जाएगी शायद सन्दर्भों के अंतिम पृष्ट पर भी मेरा कोई धूमिल जिक्र न हो परन्तु मेरे लिए तुम्हें ज्ञात अज्ञात के मध्य एक सुखद स्मृति के रूप में खुद को संपादित करने के गाहे बगाहे प्रयास हुआ करेंगे और इन्ही प्रयासों की छाँव में जब मै सुस्ताने के लिए बैठूंगा तब मन के वातायन में तुम्हारे कद की धूप जरूर में हृदय की विकल घाटियो में उतरा करेगी। यह मन की एक ऐसी प्राकृतिक घटना है जिस पर मेरा बस शायद कभी नही चलेगा।
कमजोर और मजबूर इंसान न तुम्हें तब पसन्द थे और न अब होंगे तुम्हारी यह सूक्ति वर्तमान में मेरे लिए सबसे बड़ी युक्ति है जिसके सहारे साँझ होने से पहले अपना सामान इकट्ठा कर रहा हूँ ताकि उस दिशा में निकला जा सके जहां सूरज देर से उगता है।


'शाम के काम'

Thursday, February 19, 2015

पर्स पुराण

अमूमन पर्स शब्द महिलाओं से जुड़ा शब्द है। पुरुषों में हम देहातीजन इसे बटुआ कहते है और अभिजात्य वर्ग के लोगो को वैलेट भी कहते सुना है। बहरहाल, मुझे खुद के बटुए को पर्स कहने की ही आदत है और कहने की नही अपने स्कूल के दिनों से ही पर्स रखने की आदत है। पर्स दरअसल एक किस्म की आश्वस्ति का प्रतीक भी है कि आपके पास मुद्राराक्षक को कैद करने का एक चमड़े का लिफाफा है। मेरे पर्स में सिक्कों को रखने की एक छोटी सी जगह है उसमें वैष्णों देवी से प्रसाद के साथ मिला एक मूर्ति वाला छोटा सिक्का है जिसे इस उम्मीद पर रखा गया है कि बुरी से बुरी हालत में भी वो अपनी तरफ कम से कम सिक्को को तो खींचता ही रहेगा और इस टोटके में इतनी सच्चाई है भी मेरा पर्स भले ही नोटविहीन हो गया हूँ लेकिन कभी सिक्काविहीन नही हुआ है। पिछले दो साल से मेरे पास एक ही पर्स है मेरे वजन के दबाव में उसके प्योर लेदर की बाह्य त्वचा बदरंग हो गई है। धन के मामलें में मेरे झूठ सच के वाग विलास का जितना बड़ा साक्षी मेरा फोन रहा है ठीक उतना ही बड़ा मेरे अच्छे बुरे दिनों का साथी यह मेरा पर्स भी है। कभी कभी सोचता हूँ तो पर्स एक नश्वर काया लगने लगती है जो मेरे साथ जीती है और जब उसकी आयु पूर्ण होती है अपने हिस्से की जमापूंजी आगे हस्तांतरित कर देह से मुक्ति पा लेती है। इसलिए पर्स की देह बदलती है आत्मा नही। मेरे दो एटीएम कार्ड और एक एक्सपायर्ड आई डी कार्ड इस पर्स की स्थाई धरोहर है। एक मेरा अतीत बताता है और दूसरें में मेरा भविष्य छिपा है। पर्स की अलग अलग जेब में कुछ न कुछ मैंने भरा हुआ है हर छटे छमाही जब मै कुछ अनमना होता हूँ और पर्स भारी लगने लगता है तब मैं इसकी सफाई करता हूँ। वैसे तो अपरिग्रही हूँ मगर तब पता लगता है कि क्या क्या चीजें मै बेवजह ढोता रहता हूँ अक्सर मुझे एटीएम के मिनी स्टेटमेंट, किरयाने का बिल, बच्चों के फीस की रसीद और अलग अलग जगह पैसे जमा करने की रसीदें पर्स में पड़ी मिलती है मतलब धन देकर भी धन की असुरक्षा से मुक्ति का कोई रास्ता नही मिलता है।
कुछ अनजान लोगो के विजिटिंग कार्ड भी लगभग साल भर तक मेरे पर्स में यूं ही बेवजह यात्रा करते है न मै उन्हें देख कभी उनसे बात करता हूँ न कहीं किसी से मिलनें जाता हूँ एक दिन उनको फाड़कर कूड़ा जरूर बना देता हूँ।
जितना बड़ा मेरे पर्स का पेट है उसको अपेक्षाकृत उससे कम ही मुद्रा के ग्रहण करने का अभ्यास है इसलिए अब वो मेरी तरह संतोषी हो गया है। इस उम्र में पर्स को डिमांडिंग होना चाहिए जबकि वो एकदम विरक्त भाव से मेरी जेब में पड़ा रहना चाहता है शायद उसे भी मेरी आदत हो गई है। आज जब मैंने अपने पर्स की पड़ताल की तो उसमें रसीदी टिकिट टेलर का कपड़े की कत्तर लगा एक बिल, एक अखबार के क्लासीफाइड की कतरन और मेरे और बच्चों के कुछ फोटो भी मिलें पर्स की एक जेब में एचडीएफसी बैंक में जमा की गई ईएमआई की 9 स्लिप भी मिली जबकि ये कर्जा कब का उतर गया मै अब भी प्रमाण लिए घूम रहा था मैंने उनके उतने टुकड़े किए जितने कर सकता था और यकीनन ऐसा करना मुझे सुखप्रद लगा।
ऐसा कई दफा हुआ मेरे साथ यह पर्स बारिश में भीगा मगर इसनें अपनी वफादारी की हद तक मेरी जमापूंजी की रक्षा की इसी वजह से इसकी अंदर से चर्म काया अब काली और बदरंग हो गई है मगर मुझे यह खूबसूरत दिखती है इससे वफ़ादारी की खुशबू आती है। मेरा पर्स मेरी आर्थिकी का सच्चा गवाह है और सबसे बड़ी बात साक्षी भाव में रहता है कभी किसी से कोई चुगली नही करता है ना शिकायत करता है। हाँ जब मैं इसको एक पखवाड़े तक खोलता नही हूँ और ऐसे ही बेतरतीब अलमारी में पटक देता हूँ तब इसे जरूर हीनता का बोध होता है इस निर्जीव की प्रार्थना की शक्ति से मुझे शायद धन मिलता है और मै उसे पर्स को सौंप कर फिर इसे जेब में डाल लेता हूँ।
इस पर्स को मेरी दिलदारी पर फख्र है तो मेरे अनियोजन से ये चिंतातुर भी रहता है ऐसा कभी कभी मुझे महसूस होता है ये कभी कभी जीरो बैलेंस के एटीएम को दुत्कारता होगा कि कमबख़्तो क्यों बोझ बढ़ा रहे हो मेरा जब तुम अयोजविहीन हो गए हो ! वो बेचारे मेरी काहिली का किस्सा सुनाकर पर्स में आश्रय पातें है इसका मुझे बोध है।
बहरहाल आज पर्स का अनावश्यक बोझ हलका किया तो इसी बहाने पर्स से बातचीत भी हो गई अब इसमें एक गांधी जी का चित्र कुछ सिक्के, जिन दवाईयों से मुझे एलर्जी है उनकी लिस्ट,कुछ शेर, इमरजेंसी कांटेक्ट की डिटेल्स और एक लिस्ट उन मित्रों की जिनसे मैंने उधार लिया हुआ है धनराशि के उल्लेख के साथ रख छोड़ी है ताकि सनद रहे और वक्त बेवक्त पर काम आ सके।

'मै और मेरा पर्स'

Tuesday, February 17, 2015

शिव पार्वती सम्वाद

शिव:
पार्वती ! तुम अनन्य होकर भी चैतन्य हो तुम्हारे राग मन के नही है तुम्हारे प्रश्न चेतना के प्रश्न है जिनके सम्भावित उत्तर तुम जानती हो परन्तु मेरे मत से उनकी पुष्टि करवा कर तुम मुझे आदर देती हो साथ ही समानांतर मेरी परीक्षा भी लेती रहती हो। तुम्हारा बोध कतिपय मुझसे गहरा है इसलिए तुम प्रश्नों से उत्तर और उत्तरों से प्रश्न विकसित कर लेती हो। तुम अस्तित्व की वह रागिनी हो जो मेरे अवधूत नाद की तलहटी में बसती है।तुम्हारे बिना मेरे कथन उतने ही अधूरे है जितनी बिना देह के आत्मा। तुम प्रज्ञा के साथ चित्त की दशा को क्षणिक रूप से विभक्त करके मन को सांत्वना नही देती बल्कि मन को स्थिर प्रज्ञ होने का अभ्यास कराना तुम्हारी सिद्ध साधना में शामिल है। अनन्त तक मेरा विस्तार तुम्हारी ही यात्रा का विस्तार है तुम प्रकृति स्वरूपा सृष्टि के आधार पर निवास करने वाला मेरा ही प्रतिबिम्ब हो। जिसे समझ पाना ज्ञानी और अज्ञानी दोनों के लिए दुर्लभ है।

पार्वती:
हे ! अवधूत आप रहस्य रचतें है मैं रहस्य देखती और समझती हूँ आपसे माया को कीलित करना मैनें गुप्त रूप से सीख लिया है। आप जितने भोले दिखते है वास्तव उतने ही आप गहरें है। आपकी देह से निष्पादित ऊर्जा भी मेरे लिए अंधकार में प्रकाश का कार्य करती है। देवत्व से परे मेरे लिए आप गूढ़ दर्शन की टीकाएं है जिन्हें मै समझती हूँ और आप पर सन्देह करती हूँ। मेरा सन्देह ज्ञान का केंद्र है और अपने अस्तित्व को स्वयं के बल से परिष्कृत करने का एक आधार भी। जब आप कारक, कर्ता और कर्म से मुक्त हो मुझे निर्मुक्त चेतना के रूप में स्वीकार करते है तब मेरा चित्त अहंकार से नही बल्कि उस गरिमा से भरता है जो आपके सानिध्य से शनै: शनैः मुझे हासिल हुई है।
दो देह एक चित्त दो चेतनाओं के समन्वय के लिए शक्ति शिव से जुड़ती है मगर देवत्व और पुरूषत्व से इतर जब आप अनादि रूप में होते है तब मेरे लिए सर्वाधिक प्रिय ग्राह्य और समादृत होते है। मेरा आह्लाद नदी की कलकल में,भोर के अनहद नाद में शामिल है  जिसे मन के एकांत में सुना जा सकता है। आपकी व्याप्ति अनंत तक है मै आपकी यात्रा एक अंग अवश्य हूँ परन्तु मेरी अपनी एक गति लय और यात्रा है शायद इसी वजह से आपसे प्रत्यक्ष भेंट यदाकदा हो पाती है। आपका एक विस्तार मै हूँ और मेरा विस्तार आपने अपने रहस्य से अनन्त तक कर दिया है।


शिवरात्रि पर शिव-पार्वती संवाद
माध्यम: मैं (जो है भी और नही भी)

Monday, February 16, 2015

कॉमन कोल्ड

गलें में खराश है और आंखें तरी से बोझल। तबीयत नासाज़ जब होती है तो इतने चुपके से होती है कि जिस्म कब हथियार डाल देता है पता ही नही चलता है। खुद की गर्म सांसे डाकिए की तरह रूह के खत मुझ तक पहूंचा कर जल्दी में आगे बढ़ जाती हैं। उन्हें बांचता हूँ इन खतों की स्याही धीरे धीरे रंग छोड़ती है और लफ्ज़ लफ्ज़ घुल कर बह जातें है शायद मेरी आँखों की नमी भांप बन उड़ इनकी लिखावट को जल्दी से मिटा देना चाहती हैं। थोड़ी देर के लिए आँखें बंद करता हूँ और पलकों को गले मिलता देखता हूँ पलकों के छज्जे पर तुम्हारी यादें पैर लटकाएं बैठी है जैसे ही आँखें बंद होती है वो आँखों के समन्दर में डूब खुदकुशी करना चाहती है तभी ताप की बैचेनियों में मै बड़बड़ा कर आँखें खोल देता हूँ फिर एक कतरा आंसू ढलक कर कान तक जाता है उसकी आहट की महीन ध्वनि कान सुन लेता है और दिमाग को दिल की गुस्ताखियों के किस्से अपने कूट संकेत में भेज कर संतुलन साधने की अपनी वफादारी जताता है इससे पहले दिमाग तुम्हें मतलबी बताए  मैं करवट बदल लेता हूँ।
मेरा बार बार करवट बदलना ये कमरा बड़ी देर से देख रहा है उसकी चारों दीवार आपस में कयासों की चुगली कर रही है बस छत, खिड़की और दरवाज़ा मुझसे कोई सवाल नही करना चाहता कंक्रीट के इस षडयंत्रीय माहौल में ये तीनों मेरे सच्चे पैरोकार है।
धीरे-धीरे खांसता हूँ गला कराहता जिस्म सिकुड़ता है फिलहाल इतना भी बीमार नही हूँ जितना लग रहा हूँ ये जाती हुई सर्दी की एक बेवजह की शरारत है कल उसे लगा कि भरी सर्दी में तुम्हारी यादों और ख्यालों ने मुझे
इतना गर्म रखा कि मुझे एक छींक तक नही आई। इसलिए कल जब मै थोड़ी देर के लिए तुमसे विलग हुआ ईश्वर को याद कर रहा था तब इस सर्दी ने एक छोटा हमला मुझ पर कर दिया रात भर ख़्वाबों में तुमसे गुफ़्तगु के बाद सुबह मुझे इसकी खबर मिली। ईश्वर मुझे इसलिए भी कमजोर लगता है ये मुझे कमजोर देखना चाहता है अक्सर जब जब उसको याद करता हूँ एक नई चुनौति मुझे थमा देता है हालांकि मुझे जब तुमसे ही अब कोई शिकायत नही तो भला ईश्वर से क्या शिकायत होगी।
तुम अक्सर कहती हो तुम्हारे अंदर ईगो बहुत है तुम्हारी नाक बड़ी है मगर दिल छोटा है।दरअसल शायद तुम ठीक ही कहती हो मेरा दिल सच में इतना छोटा है कि तुम्हारे आने के बाद वहां मेरे जाने की भी गुंजाईश नही बचती है मेरी नाक जरूर बड़ी है मगर वो अपने हिस्से का एकांत को ढ़ो कर बड़ी हुई है इसलिए वो कभी किसी से टकरायेगी इसका न डर है और न कोई खतरा। फिलहाल नाक सुबह से रगड़ रहा हूँ इसलिए लाल जरूर हो गई है इसकी लाली ठीक वैसी ही है जैसे अभी तेज धूप में बैठकर तुम्हारे कान लाल हो जाते है।
अगर तबीयत नासाज़ न होती तो आज तुम्हें इतनी शिद्दत से याद न कर पाता इसलिए कभी कभी बीमार होना भी अच्छा लगता है ऐसी बीमारी तब और भी अच्छी लगती यदि तुम पहले हालचाल पूछती और फिर चिढ़ कर कहती जुकाम ही तो हुआ है क्यों ड्रामा कर रहे हो चलों गर्म पानी पियों तब तक अदरख तुलसी की चाय मै बनाकर लाती हूँ। चाय पीकर सो जाना ठीक उठोगे जब आँख खुलेगी।
छोटी मोटी बीमारी में तुम्हारी आश्वस्ति और झिड़की दोनों  बेहद याद आती है क्यों आती है पता नही।

'कॉमन कॉल्ड: अनटोल्ड'

Saturday, February 14, 2015

वजीफा

कुछ लापता गुजारिशें तुम्हारी दराज़ में खोजना चाहता हूँ मगर ये वक्त की दफ्तरी मेज तुम्हारे मेरे बीच आ जाती है। कुछ लम्हें तुम्हारे कंगन के जोड़ पर अटके है एक टांका मेरे अबोले मन का उन पर लगा है जिसे देखने के नजरों को बेहद महीन करना पड़ता है। तुम्हारे स्पर्शों को पलकों पर सम्भालें किसी तिजोरी के गुप्त ताले की तरह तुम्हारे कंगन को घुमाता हूँ मगर मेरी याददाश्त मेरा साथ नही देती है और बहुत कुछ कहता कहता भूल जाता हूँ इस उम्मीद पर शायद तुम मेरे बैचेनियों के वजीफे खाली वक्त में देखा करोगी।
मेरी अनगिनत करवटों की परछाई आज भी तुम्हारा पीछा करती तुम्हारी रोशनी में जाकर खुदकुशी करती है। जरूरत समझों तो अपने काजल की गवाही ले सकती हो वो तुम्हारी आँखों में मेरे रतजगों का सच्चा गवाह है ख़्वाबों की रोशनी में उसी के चाक से तुम मेरा वजूद बनाती मिटाती रहती हो। मेरी रूह पर अरसे से छाले पड़े हुए है तुम्हारा अहसास उनकी गहराई को नापता है और उनकी मरहम पट्टी करता है।
दरअसल तुम्हारे बारें में सोचता नही हूँ मगर कुछ ऐसे पवित्र अहसास है जो मेरा हाथ थामें मुझे उन निर्जन गलियों में ले जाते है जहां तुम्हारे कदमों के निशां वक्त ने आधे अधूरे छोड़े है। मेरा जज्बाती मन उसी की मदद से वो नक्शा तैयार करता है जिसके एक कोने में तुम्हारा शहर रहता है।
मिलनें की उम्मीद दिल अब नही पालता है दिल बस अब जीता चला जाता है खुद के सवालों और और खुद के जवाबों में मसलन कल तुम्हें भूलनें ही वाला था कि तुम्हारा मासूम गुस्सा मुझें याद आ गया फिर उसके बाद तुम्हारी यादों की कैद से मेरी रिहाई न हुई। रात भर ख़्वाब में तुमसे गुफ्तगु के बाद अब मेरी आँख खुली है मगर एक गहरी नींद से ज्यादा ताजगी मेरे जेहन ओ' दिल में है। तुम्हारी एवज़ में नींद की ही नही मै हर किस्म की शिकायत करना भूल गया हूँ।
तुम्हें रोज़ शिकायतों की नही सौगात की शक्ल में हासिल करता हूँ मीलों दूर भी की एक अंगड़ाई यहाँ मुझे यह बता देती है दिन में कम से कम एक बार मुझे याद कर तुम मुस्कुरा देती हो।
फिलहाल मेरे लिए इतना ही काफी है।

'यादों के वजीफे'

Monday, February 9, 2015

अभिलाषा

फरवरी एक तिहाई बीत चुकी है। कुछ अधूरे टेक्स्ट मन की गलियों से बह रहें हैं।एक लंबी यात्रा के बाद वें समन्दर का खारापन थोड़ा कम करेंगे। हमनें कभी साथ चलना शुरू किया था मगर आज मैंने देखा कि हम दोनों अलग अलग अक्षांश पर है हमारे देशान्तरों में सार्थक स्तर का अंतर आ गया है। यथार्थ की तमाम सच्चाई के बोध के बाद भी मन से तुम्हारे अनुराग का इंद्रधनुष नही मिटता है। अपनी वाग्मिता के तमाम ज्ञात कौशल के बावजूद भी पहली बार तुम्हें यह ठीक ठीक बतानें में असमर्थ हूँ कि तुम मेरे क्या हो! एक बड़ा ही विचित्र सा अहसास है शायद यह कोई नए किस्म का ज़ज्बात जन्म ले रहा है मेरे अंदर। तुमसे मेल मिलाप की आयु देखता हूँ तो असंख्य ज्वार भाटे नजर आते है हम एक दुसरे को पसन्द से लेकर नापसन्दगी की हद तक का अनुभव अपनें कंधे पर ढो कर यहां तक पहूँचे है। अच्छी बात है यह रही है कि हमने कभी एक दुसरे से घृणा नही की शायद इसी वजह से हमारे सिरे एक दुसरे से जुड़े हुए है आज।
ये महीना प्यार मुहब्बत का महीना है इजहार इनकार मनुहार सबके लिया मुफीद है मगर कम से कम तुम्हारे सन्दर्भ में मै किसी दिन महीने का मोहताज़ नही रहा हूँ। बारह मास तुम मन के केंद्र का एक हिस्सा रही हो।
एक ही बात को अलग अलग भाव शब्दों और वाचिक चालाकी से कहने की बजाये यह बात ईमानदारी से कहनें में मुझे कोई दिक्कत नही है कि हाल फिलहाल तुम मेरे खुद से ज्यादा नजदीक हो। कभी कभी तुम्हें एक कुशल शिल्पी की तरह मेरी संवेदनाओं को आकार देता हुआ देखता हूँ मै इस यात्रा में तुम्हारे कितने नजदीक आ गया हूँ ये तुम ठीक ठीक समझती हो परन्तु बहुत सी सांसारिक बातों के सहारे तुम मुझे उस टापू के का पता देती हो जहां मेरे हम उम्र लोगो का मेला लगा हुआ है वो अपनी अपनी सफलताओं और रिक्तताओं के आयोजन में व्यस्त है।
मेरी उनमें और उनकी बातों में कोई दिलचस्पी नही है ये तुम्हें पता है मगर कभी कभी तुम मुझे संपादित करने की जिद पर उतर आती हो उस समय तुम मैत्री की सीढ़ी के एक पायदान ऊपर पहूँच मुझे सम्बोधित करती हो मगर तुम्हें नही पता होता तुम फिलहाल जहां हो वहीं से तुम्हारी आवाज़ मुझ तक आ सकती है। जैसे ही तुम स्थान बदलती हो मेरे कान स्वत: बंद हो जाते है। मै नही चाहता तुम्हारी ऊर्जा मुझे लोक रीति के उपदेश देनें में अपव्यय हो क्योंकि उस मामलें में मै पर्याप्त ज्ञानी हूँ।
एकदिन मेरे अनुराग के व्याख्यान पर तुमनें सतही टिप्पणी करते हुए कहा था कि मेरे अनुराग का विस्तार मनोवैज्ञानिक अर्थों में कतिपय रूप से असामान्य है। जिसके पुर्नवास के लिए मुझे अपने हमउम्र लोगों में मैत्री,प्रेम,अनुराग की संभावना के कोरे निमन्त्रण सदैव अपनी ऊपर की जेब में रखने चाहिए। ज्ञान अनुभव से आता है इससे इंकार नही है मगर अर्जित ज्ञान की भी एक सीमा होती है। प्रत्येक समान परिस्थिति में वो सभी पर समान रूप से लागू होगा यह कहना मुश्किल होगा। मै अपवाद की तरह तुम्हारे जीवन में बचा रहना चाहता हूँ क्योंकि वक्त के साथ बेहद तेज़ गति से खर्च हो रहा हूँ मैं।
बहरहाल,बहुत स्पष्टीकरण और विस्तृत व्याख्यान से सम्बन्ध शुष्क हो जाते है उनकी तरलता जम जाती है मै जल की तरह तरलता से तुम्हारे जीवन में बहना चाहता हूँ रोज़ दुनियावी सूरज की गर्मी मेरा एक अंश सोख लेती है इससे पहले मेरे अन्तस् के पत्थर तुम्हें नजर आने लगे मै चाहता हूँ मेरे अस्तित्व की पहली बूँद तुम हृदय के अंतिम कोने पर जाकर अपनी यात्रा की पूर्णता को प्राप्त करें। यही मेरी अंतिम अभिलाषा है।

'अंतिम अभिलाषा'

Sunday, February 8, 2015

ग़ालिब

ये इश्क नही आसां बस इतना समझ लीजै
फेसबुक की दुनिया से व्हाट्स एप्प तक जाना है
कभी अपडेट के तंज सहने है
कभी लास्ट सीन का धोखा खाना है
दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है
म्यूच्यूअल फ्रेंड्स तक जानते है हाल ए दिल
एक तुम हो जो पूछते तुम्हें हुआ क्या है
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकलें
वर्चुअल दिखती थी ये दुनिया तुम तो एकदम रियल निकलें
आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक कौन जीता है तेरे जुल्फ के सर होने तक
चैट पर कुछ इस अंदाज से  गुफ़्तगु हो तुमसे
ग्रीन लाइट बंद कर दो सबके लिए कल होने तक।
ना था कुछ तो  खुदा था ना होता तो खुदा होता
डुबोया फेसबुक ने मुझको बेवजह
व्हाट्स एप्प पर होता तो
दोस्तों के शक से बचा होता
हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया वरना आज फेसबुक पर वो भी रात दिन लगा होता।

'चचा ग़ालिब से मुआफ़ी सहित'

Wednesday, January 28, 2015

उसकी बातें

उन दोनों की उम्र में सीधे सीधे दस साल का ज्ञात फांसला था।उम्र का ये फांसला एक को नजदीक लाता तो दुसरे को दूर करता। सनातन यात्री के रूप में एक का विलम्ब से आना और दुसरे का पहले आना नितांत ही संयोग का मामला है ऐसा होने में न किसी की कोई ज्ञात त्रुटि थी और न कोई विशिष्ट उपलब्धि। उम्र एक भौतिक इकाई है शरीर की कोशिकाओं की आयु को उम्र मानना विज्ञानसम्मत है परन्तु मन का भी एक अपना विज्ञान है और मन की आयु नापने के लिए विज्ञान से ज्यादा सम्वेदना के पैमाने की आवश्यकता होती है। यह भी एक बड़ा विचित्र संयोग था कि सांसारिक से लेकर गैरसांसारिक किस्म के उसके सारे दोस्त उससे लगभग दस साल बड़े ही थे और कभी ऐसा महसूस नही हुआ कि उनकी एक असंगत मित्रता है।
दरअसल उम्र को कभी मानक माना ही नही था उसनें। स्वयं को एक यात्री समझा जिसे वक्त ने वक्त से पहले परिपक्वता का लिबास पहना मंजिल की तरफ रवाना कर दिया और उसकी यात्रा सदैव कालगणना की सीमाओं में अतिक्रमण करते हुए आगे बढ़ी है। यदि अंकपत्रों के मुद्रित जन्मतिथि का एक प्रमाण न हो तो मन वचन कर्म से एक भी संकेत ऐसा नही बचता है जो उसकी वास्तविक आयु का आंकलन कर सकें।
अजीब बात यह भी रही कि सदैव से अपने वय के लोगो से न उसका तादात्म्य स्थापित हो सका और न समायोजन।उनकी रूचि के विषय उसकी रूचि के विषयों से एकदम भिन्न थें। जब वे करियरवादी थे तब वो दर्शन के जरिए कविताओं की उपयोगिता तलाश रहा था जब उनकी रूचि लौकिक कौतुहल में थी तब वो किसी पहाड़ की घाटी में बैठा प्रकृति के सौंदर्य को निहार रहा था।
उम्र का यह खेल उसकी समझ से हमेशा बाहर रहा है इसलिए शरीर की उम्र की बजाय वो चेतना और सम्वेदना की आयु को सम्बोधित करते हुए खत लिखता और वें सही पतें पर पहुँच भी जाते थे। मूलत: उसकी यात्रा मुक्त होने की यात्रा थी इसलिए जाति धर्म वर्ण क्षेत्र आयु ये सब लौकिक प्रतिमान कभी उसके अस्तित्व का हिस्सा बन भी न पायें। अपनी भौतिक उम्र से दस साल आगे की जिंदगी जीने को उसनें उत्सव के रूप में ग्रहण किया हालांकि इसके अपने जोखिम भी है मगर उसनें उनकी कब परवाह की है।
उम्र की ये लौकिक अवधारणा सम्भवतः एक वरिष्ठता और कनिष्ठता की ज्ञात और लोकप्रिय ग्रंथि हो सकती है या फिर ऐसा भी सम्भव है कि ईगो दुसरे की ऊंचाई को लेकर सवाल भी खड़ा करता हो परन्तु यह उसका खुद के बारें में एक अर्जित आत्मविश्वास रहा था कि अतीत या भविष्य में उसे लोग उससे बड़े या छोटे जरूर मिल सकते है मगर शायद उसके कद का एक भी शख्स उसे न मिलें। उसके लिए यह कोई आत्मप्रशंसा या आत्मविज्ञापन जैसी बात नही थी बस यह खुद की यात्रा के बारें में एक ज्ञात तथ्य की अभिव्यक्ति भर थी।
सारांश: किसी अन्यत्र के जीवन दर्शन अथवा मान्याताओं को संपादित करने की उसकी कोई अभिलाषा नही थी वो मानता था कि सबकी अपने चिंतन की मौलिकता एवं तयशुदा वजह होती है परन्तु फिर भी वह चाहता था कि वो इस उम्र की ग्रन्थि के बोझ से बाहर निकल आये क्योंकि इसके बाद ही वो देख सकेगी खुले आसमान की गहराई,समझ का विस्तार और चेतनाओं की दिव्य जुगलबंदी के अलौकिक आलाप जो सीधे दिल पर दस्तक देते है।
इस दौर में जब सब कुछ इतना गतिशील है कि जो लम्हा हम खो देते है उसे फिर कल्पना के जरिए भी हासिल नही कर पाते है ऐसे में चाहत थी  कि उसकी ऊर्जा का अपव्यय आयु के विमर्श में जाया न हो। निर्द्वन्द और निर्बाध हो वो चेतना और सम्वेदना के उस उत्सव में शामिल हो सको जहां उसके लिए एक स्थान उसनें अधिकारबोध से आरक्षित किया हुआ है। उसका यही भय था कि कहीं बड़प्पन के बोझ में वो उस अवसर या अनुभव को न खो दो जो आपके लिए अविस्मरणीय हो सकता है।

'उसकी बातें'

Tuesday, January 27, 2015

आधी बात

रात के दस बजने को है। जिस जगह फिलहाल हूँ वहां दस बजने का अर्थ लगभग वही है जो तुम्हारे शहर में आधी रात का है। यह आधी रात मुझे दो हिस्सों में बांट रही है। एक हिस्सा तमाम दुनियावी तनावों और चिंताओं को बारी बारी मेरे सामने पेश करता है। कुछ कड़वे यथार्थ से मुझे डराता भी है। डर के साथ वो मेरे कान में चेतावनी भरा सन्देश फूंकता है कि तुम्हारे पास वक्त बेहद कम बचा है सम्भल सकते हो तो सम्भल जाओ। जबकि एक हिस्सा मुझे थोड़ी शाबासी थोड़ी हिम्मत देता है। मेरी बेवजह की मुस्कान से उसे खुशी मिलती है यहां तक वो मेरी बैचेनियों पर भी हंस सकता है।
यूं हिस्सों में बंटा तुम्हारे बारें में सोचता हूँ और फिर सोचता ही चला जाता हूँ। किसी के बारें में सतत सोचना एक सामान्य बात हो सकती है परन्तु कोई जब जिंदगी में आदत की तरह शामिल हो जाता है तब थोड़ी फ़िक्र थोड़ी गुदगुदी का होना लाज़िमी है। रात के सन्नाटे ने मौन का इतना सिद्ध किस्म का माहौल बना दिया है कि अपने एक हाथ से मै धड़कनों के बालों में कंघी कर रहा हूँ। मेरी पलकें तुम्हारी स्मृति में अपनी गति में विलम्बित होती जाती है उन पर तुम्हारे अंतिम स्पर्श का बोझ आईस पाईस खेलता है। इस खेल में जब तुम जीत जाती हो मेरी आँखें थोड़ी नम होकर तुम्हारी खुशी में शामिल हो जाती है।
मैंने रच लिया है अपना एक एकांत और रात के दस बजे उस एकांत में केवल तुमको ही प्रवचन की भाषा में बात करने की इजाजत है। जब भी तुम्हारे अनुराग की चाशनी में डूबी मेरी ज़बान तुम देखती हो देखता हूँ तुम थोड़ा डर जाती हो तुम्हें मेरी फ़िक्र होने लगती है। हर हाल में तुम मुझे विजेता ही देखना चाहती हो और विजेता बनने के लिए कहीं रुकना अटकना बाधा बन सकती है। न जाने तुमनें यह अनुमान कैसे लगा लिया कि तुम मेरी कमजोरी बन सकती हो।जबकि सच तो यह है हाल फिलहाल तुम मेरी सबसे बड़ी ताकत हो।
सर्दी की इस रात में सोने से पूर्व तुम्हारी बातें याद करकें मै नींद को थोडा विलम्बित कर देना चाहता हूँ क्योंकि नींद की यात्रा चैतन्यता की नही है। नींद और ख़्वाब मन की अतृप्त कामनाओं के जंगल है और मेरे जीवन में तुम इतनी पवित्र किस्म की हो कि तुम्हें किसी वर्जित या अतृप्त कामना के हवाले से मै ख़्वाब में नही मिलना चाहता हूँ। स्वप्न मुक्त नींद के लिए सिद्ध साधना की आवश्यकता है और इस साधना के लिए तुम्हारी। बिना तुम्हारे मै मन की आसक्तियों से मुक्त नही हो सकता हूँ इसलिए मान लो थोड़ा सा मतलबी हो गया हूँ मैं।
कई सौ मील की भौगोलिक दुरी के बावजूद भी मेरी धड़कनें निकल पड़ती है तुम्हारी धड़कनों की टोह लेने। वो मेरे से इजाजत नही लेती है उन्होंने तुम्हारी धड़कनों से अपना एक आत्मीय रिश्ता विकसित कर लिया है। जब तुम थककर गहरी नींद में सो जाती हो मेरी धड़कनें तुम्हारी धड़कनों के कान में चुपचाप कुछ मेरे दिल का हाल कहती है फिर तुम्हारी धड़कनों की गति कभी उल्लास तो कभी डर से बढ़ जाती है। उस वक्त तुम सो रही होती हो शायद तुम्हें इस मेल मिलाप का पता नही चलता हो या फिर पता भी चलता हो मगर तुम मुझे बताती नही हो ताकि मै तुमसे थोड़ा तटस्थ थोड़ा विरक्त बना रहूँ।
पिछले एक घंटे से एक ही करवट पड़ा हूँ मेरा बिस्तर थोड़ा बैचेन हो गया है उसे भय है कहीं तुम्हारी यादों के सहारे मै समाधिस्थ न हो जाऊं फिर वो रात भर मेरे एकतरफा बोझ से दबा रहें। अभी अभी मेरी गर्दन पर तकिए ने तुम्हारा नाम की एक हल्की फूंक मारी तो मैंने करवट ली उसके बाद बिस्तर की सिलवटों को ठीक कर मैंने बिस्तर की आश्वस्ति भरी पीठ थपथपाई कि डरो मत ! मै हूँ ना।
दस बजकर दस मिनट हो गए है पिछले दस मिनट मेरी उम्र के अतिरिक्त दस मिनट है ये न उम्र में जुड़े है न घटे है मै इन दस मिनट का विस्तार तुम्हारे अंदर तलाश रहा हूँ ताकि हिस्सों में बंटी जिंदगी को जोड़कर कुछ देर जी सकूँ एक टुकड़ा जिंदगी तुम्हारे साथ। इसके बदलें तुम मुझे कमजोर,कमतर,मतलबी,पागल या दीवाना कुछ भी समझों तुम्हारी मर्जी।तुम्हारे बारें में कुछ चीजें ऐसी है मुझे उनके होने या न होने से कोई ख़ास फर्क नही पड़ता है। हो सके तो कुछ समझना नही बस जीना ये बेतरतीब पल यूं ही बेवजह।

'आधी रात-आधी बात'

Sunday, January 25, 2015

आख़िरी डाक

आख़िरी बात के बाद जब सुबह हुई तो कुछ भी नही बदला था बस सूरज ने करवट बदल ली थी अब हर चीज अंधेरे की शक्ल में दिखाई दे रही थी। थोड़े विस्मय थोड़े कौतुहल से वो यह तय करने में लगा था कि क्या सच में एक नया दिन निकल आया है। आख़िरी बात के विषय इतने उलझे हुए थे कि उनके निष्कर्ष दिल और दिमाग दोनों अलग अलग निकाल रहे थे। दिल बगावत पर उतर आया था तो दिमाग ने दिल का साथ न देने का निर्णय ले लिया था। वादों,ख़्वाबों और चाहतों की दुनिया दिल के सबसे निर्जन स्थान पर आश्रय तलाश रही थी। आख़िरी बात में सलाह,नसीहत,प्राथमिकता, सबके लिए दो दो वाक्य थे जिनके जरिए यह बताया गया था दरअसल तुम ही गलत सोच बैठे इस यात्रा में ऐसा कुछ भी नही था जिसके अर्थ विकसित किए जा सके। यह यात्रा दो चेतनाओं के स्व परीक्षण की साक्षी भर थी इसमें अटक जाना उसके व्यक्तित्व की कमजोरी के प्रतीक के रूप में उबर कर सामनें आ रही थी।
इस सुबह जब चिड़ियाँ उसके आँगन आई तो उनके पास उदासी के गीत थे मन्दिरों में बजते शंखनाद की ध्वनि भी ध्यान को भंग करती थी। वो अपने कमरे में भोर से जगा एक ही करवट पड़ा सिलवटों को गिन रहा था जो आधी उसके जेहन में पड़ी थी आधी दिल पर और आधी बिस्तर पर।
आख़िरी बात की तमाम खराबियों के बावजूद उसमें एक अच्छी बात भी थी वो उम्मीद से बाँझ नही थी। एक भरोसा उसमें बचा हुआ था हो सकता है यह भरोसा दिल ने अपनी संभावित हार के भय से यथार्थ की बंजर जमीन पर बो दिया था।
उस दिन दिन जरूर निकला मगर सवेरा नही हुआ वो धूप में बैठ खुद के साए कि लम्बाई नापता रहा। मन बेतरतीब दौड़ता तो दिमाग उसी को बंदी बना खुद की अदालत में पेश कर देता वो दिन खुद से मुकरने के दिन के रूप में भी याद किया जा सकता है।
रास्तों ने सवालों की ऐसी जिरह छेड़ी कि उसके पास अपने सफाई में कहने के लिए एक उलझे हुए दिल के अलावा कुछ न था। वो आख़िरी बात की ध्वनि से दूर भागने के लिए जितनी गति से दौड़ना चाहता उतने ही सुस्त कदम उसके निशक्त होने का संकेत देते जाते।
अजीब से विरोधाभास के बीच उसनें तय किया चलना और वो खुद को कभी खारिज करता तो कभी सम्भालता उसनें रास्तों के कान में कहा ख़्वाबों को जीना उसे आता है फिर कुछ सवाल चुप हो गए।
पलकों में नमी धड़कनों में बैचेनियां लेकर वो निकल गया उस अज्ञात की ओर जहां के रास्ते उसी की तरह हिस्सों और किस्सों में बटे थे। आधी रात के स्वप्न में उसे आख़िरी बात के सवाल जवाब सांत्वनाएं अलग अलग शक्ल में दिखती थी ये कुछ ऐसे ख़्वाब थे जो खुली आँखों ही आते थे। नींद में अवचेतन में अटका प्रेम हमेशा जख्मों की मरहम पट्टी कर जाता इसलिए अच्छे ख़्वाब कभी सुबह तक याद नही रह पाते थे।
अब जब वो कहीं नही थी उसकें कदमों के निशाँ मन के गलियारें में धंसे हुए थे उसके स्पर्श इतने सजीव थे कि खुद को छूकर उसको महूसस किया जा सकता था। जज़्बात के  रंगरेज़ ने  उसकी रूह का रंग रूह पर ऐसा चढ़ा दिया था कि वो रुबरु ही बनी हुई थी। ये सब उस आख़िरी बात के बाद था जिसमें यह बताया गया था कि यह इस यात्रा का पूर्ण विराम है अब आगे की तरफ देखिए।
दरअसल, आख़िरी बात शायद ही कभी आख़िरी हो सकती है और जहां तक आगे देखने का सवाल था जब पलकों के छज्जे पर वो पैर लटकाए उसकी बैचेनियों पर हंस रही थी ऐसे में आगे देखनें की बजाय उसके धवल पैर ही नजर आते थे जो कभी उसनें अपनी गोद में रखे थे।
बहरहाल बहुत कुछ तय होने के बाद भी बहुत कुछ अनाथ भटक रहा था और इसी अनाथ के सहारे उसनें खुद को उस भीड़ का हिस्सा पाया जहां अमूर्त और अधूरे रिश्तों का एक पूरा संसार भटकता है। अधूरेपन के पुनर्वास शिविर में अपना नाम दर्ज कराने के बाद वो वापिस न लौटने के लिए अकेला बहुत दूर निकल गया उसकी वापसी की एक ही शर्त रूपी सम्भावना बची थी कि आख़िरी बात गलकर बह जाए तब शायद उसको देखा जा सकता था किसी सार्वजनिक स्थान या पारिवारिक उत्सव में। फ़िलहाल उसनें खुद को स्थगित कर दिया था अग्रिम आदेशों तक।

'आख़िरी बात: आख़िरी डाक'

Wednesday, January 21, 2015

याद शहर

तुम चली गई मगर तुम्हारा शहर वहीं खड़ा रहा मेरे पास। ये शहर कब से हमारी बतकही और आवारागर्दी को देख रहा था। उसे हमारा ऐसा होना अच्छा लग रहा था तभी तो वो रोज़ सुबह थोड़ी जल्दी जग जाता था रोज़ शाम को मद्धम रोशनी फैला देता था। तुम्हारे जाने के बाद उसने मेरे कंधे को दो बार थपथपाया पहली थपकी शाबासी की थी और दूसरी दिलासा की।
मेरी धड़कन को देख उसने कहा लो  एक मुट्ठी हवा अपने अन्दर रख लो इसमें वहीं बासीपन है जो तुम जीना चाहते हो।
मै शहर के चौराहों से चिढ़ा बैठा हूँ सब रास्ते समकोण पर एक दुसरे को क्यों काट देते है रिश्तों की तरह। कुछ गलियों में मेरे कदमों के निशाँ गर्द के साथ छोटी छोटी उड़ान भरते है और फिर बिखर कर दम तोड़ देते है।
तुमसे दूर होते ही मेरे जूते के दोनों फीते खुल गए उन्हें बाँधने के लिए जैसे ही झुका मन के बंधन कसते गए कुछ अंदर कसकर बंधने लगा था। जूतों पर गर्द और आँखों में अमूर्त सपनें लिए मुझे आगे बढ़ना था मगर मै दो कदम आगे चलता तो चार कदम पीछे हट जाता तुम्हारा शहर मेरी इस बेबसी पर हैरान नही था शायद उसे पता था तुम्हारे जाने के बाद शहर में रुकना उतना ही मुश्किल था जितना तुम्हारे शहर में होते हुए भी तुमसे न मिलना।
बढ़ते बढ़ते बहुत दूर निकल आता हूँ। शहर पीछे छूट जाता है तुम आगे बढ़ जाती हो और मै शायद किसी एक पल में ठहर गया हूँ। यह ठहराव इतना स्थिर किस्म का है कि धीरे धीरे समय का बोध मिटता जाता है। दिन इतना लम्बा हो गया है कि रात होने का नाम नही ले रही है रात के होने का मुझे इंतजार भी है क्योंकि रात उस स्याह सच को समझने में मदद करेगी कि तुम और तुम्हारा शहर मीलों पीछे छूट गए है अब कल जो सवेरा होगा वो उस दुनिया का सवेरा है जो हकीकत में जीती है।
तुम और तुम्हारा शहर एक ख़्वाब की तरह मुझमें जिन्दा है शायद भोर का एक अधूरा ख़्वाब जिसे देखते देखतें आँख बीच में खुल गई है। मै सोना चाहता हूँ शायद थोड़ा रोना भी मगर तुम्हारे शहर की गोद में। तुम्हारी गोद अब शायद नसीब न हो।
फिलहाल कोई दुःख या अफ़सोस नही है बस जी थोडा बैचेन है। यह ठीक वैसी मनस्थिति है कि कोई ये न बता सके कि वो सुखी है दुखी या फिर दोनों।
सफर पर रहते हुए इन हादसों की जद में जब भी आता हूँ तब तुम,तुम्हारा शहर बड़ी शिद्दत याद आता है। सफर यादों को पैदा करता है और खुद दफन भी कर देता है। मुश्किल होता है यादों के सफर के साथ ट्रेन/बस में सफर करना क्योंकि आपके गुरुत्वाकर्षण का केंद्र आपकी परिधि छोड़ किसी अन्यत्र की छाया में दुबका रहता है और आप बस गिरने उड़ने बहने गलने की कुछ हलके झटके महसूस कर सकते है ठीक भूकम्प की तरह।मगर इन्हें समझने के लिए रिएक्टर स्केल खुद का बनाना पड़ता है आप बना पायें तो मन के वैज्ञानिक ना बना पायें तो इडियट इमोशनल फूल।

'सफर के अधूरे नोट्स'

Tuesday, January 20, 2015

नोट्स

बेख्याली के पलों में कुछ लम्हें दस्तक देते है। सफर जिनका नसीब है उनके लिए यादें एक मुफीद जरिया है खुद की तलाशी लेनें का।
ये कमबख्त यादें ही तो है जो न जीने देती है न मरनें !
दिन ब दिन मशरूफ होती दुनिया में इनके सहारे क़िस्तों में जिंदगी का कर्ज अदा किया जा सकता है।
यादें खुद ब खुद सीढियां बना दिल में दाखिल होती है वहां से बिना पता लिखे खत उठाती है और उन्हें गैर के डाकखाने में पोस्ट कर देती है।
अक्सर शाम ऐसे बैरंग खतों की आमद से रोशनी से रोशन होती है खुद की लिखावट पर यकीन करना मुश्किल होता है मगर हर्फ़ हर्फ़ आधे सच आधे झूठ की रोशनाई में नहाए हुए जब नजर आते है तब यकीन होता है कि इनका यतीम बाप मै ही हूँ।

सफर के नोट्स 

Sunday, January 18, 2015

पनाह

प्रायः यात्राओं में जहां जहां से गुजरता हूँ वहां कुछ न कुछ छूट ही जाता है। रुमाल,इयरफोन,चार्जर,कैप,टूथब्रश,किताब ये तो भौतिक चीजें है जो ट्रेन,बस,होटल,गेस्ट हॉउस में छूट गई है अक्सर।
इनके अलावा न जाने यात्राओं में कितनी यादें भी छूटी पड़ी है। रुहदार की तरह मेरी रूह भटकती है। आवारागर्दी के उन ठिकानों पर जहां कोई अजनबी पहली ही मुलाकात के बाद अपना सा लगने लगा था।
मेरी लापरवाह जिंदगी के किस्से यात्राओं में बिखरें पड़े है कही कुछ मुझमें छूट जाता है और कही पर मै छूट जाता हूँ।
दिलचस्प बात यह भी है कि ऐसे छूटकर भी कुछ नही छूट पाता है। यादों की हथकड़ी हमें बाँध बार बार लम्हों की अदालत में पेश करती है जहां से हमें वादामाफ गवाह की गवाही के बिनाह पर हाकिम कभी सजा सुनाता है तो कभी जमानत पर रिहा कर देता है।
खुश होने की कम और ज्यादा वजह यह भी है कि मै कुछ बेख्याली के गुनाह पर जमानत पर रिहा हूँ और जहां भर में पनाह मांगता हूँ। मेरी यात्राएं उसी गुजारिश का एक हिस्सा भर है जिनमें निर्वासन के नोटिस मेरी पीठ पर चस्पा है।

'गुनाह-पनाह'