Sunday, October 26, 2014

हिसाब

फेसबुक ने इतना कुछ दिया:

ख्यात कवि/लेखक/पत्रकार पोस्ट पर आतें है इनबॉक्स में भी कई दफे शाबासी दे जातें हैं
वकील/जज़ लिखे हुए को वैध/प्रमाणिक मानते है और नियमित पढ़तें भी है।
गृहणी/कामकाजी महिला मित्रों को लिखें हुए में सम्वेदना तथा ईमानदारी प्रतीत होती है।
डॉक्टर/यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स अनुज मित्र समान स्नेह रखते हैं।
पुलिस अफसर मित्र कविता को समझने की कोशिस करने लगे है।
देश के लगभग आधे दर्जन शहरों में फ्री में चाय दाल रोटी का इंतजाम है।
एक मित्र कनाडा एक अमेरिका एक हांगकांग आने का न्यौता दे चुके है यानि तीन देशों में फ्री रहने खाने और 'पीने' का इंतजाम है।
देश में ही दो तीन मित्र केवल ऐसे है जो मुझे मदिरापान के सत्संग पर बुलाने को लेकर उत्साहित है।
फेसबुक ने सतत लिखने की वजह दी मेरे लिए यह सबसे बड़ी बात है।
फेसबुक ने अंदर के भावुक लिजलिजेपन को मिटाया दुनिया प्रैक्टिकल होकर कैसे सोचती और जीती है यह फेसबुक की बदौलत ही सीख/जान पाया हूँ।
देह और पृष्टभूमि के मनोविज्ञान के इतर फेसबुक ने मेरे यह कथित रूप से लिखने वाले पक्ष को प्रकाशित किया वरना बहुत लोग कुछ और ही समझते थे।

फेसबुक ने इतना कुछ लिया:

समय
फोन पर इन्टरनेट का खर्चा
हर वक्त ऑनलाइन दिखने का समाजिक कलंक
फोन पर चिपके रहने का सामाजिक व्यंग्य
आभासी संसार ।
टच स्क्रीन पर टाइप की वजह से दाएं हाथ के अंगूठे में दर्द ।
एक दो फेसबुकिया दोस्तों की दुश्मनी टाइप की नाराजगी।

सारांश:
जिन्दगी से उलझते हुए खुद को एकत्रित करने की जद्दोजहद में फेसबुक पर आता हूँ किसी का दिल न दुखे यही कोशिस रहती है बाकि तो एक यात्री हूँ जब तक सफर में हूँ जिन्दा नजर आता हूँ जिस दिन रुक गया उस दिन वहीं समाधि बन जाएगी।

'मेरा फेसबकिया हिसाब-किताब'

Saturday, October 25, 2014

इतवारी बात

मेरी दृष्टि और चित्त सदैव से ही अलोकप्रिय श्रेणी की तरफ ज्यादा आकर्षित होता रही है जो लोकप्रिय है अति स्वीकृत है उसे मै भीड़ के उपभोग के लिए छोड़ देता हूँ। ऐसा मै कब से हूँ मुझे खुद याद नही है मगर जो परित्यक्त है त्याज्य है या फिर लोक की दृष्टि में लगभग महत्वहीन है उन सबमें गहन दर्शन और कलात्मक मूल्यों की खोज करना मेरा प्रिय शगल रहा है। टेपरिकॉर्डर के जमाने में मुझे न जाने क्या सूझी मैंने हिन्दी फिल्मों के लोकप्रिय गीत के सेड वर्जन जो बहुत छोटे होते है ( एक मुखड़ा एक अन्तरा अधिकतम) उनको ऑडियो कैसेट मे रिकॉर्ड करवाया एक कैसेट में लगभग तीस वर्जन रिकॉर्ड हो गए थे मेरी इस सनक पर कैसेट रिकॉर्डर भी हैरान था उसने एक कैसेट रिकॉर्ड करने के तीन गुने पैसे लिए थे। उस कैसेट को सुनना बड़ा डिवाइन प्लीज़र देता था, एक-दो मिनट से बड़ा कोई ट्रैक नही था जिन गानों के रोमांटिक वर्जन का उपयोग प्रेम पत्र के विकल्प के रूप में कर रहे थे ( उस दौर में प्रेमी/प्रेमिका को कैसेट गिफ्ट करने का भी रिवाज़ था) उनके सेड वर्जन को मैंने अपने कलेक्शन में पनाह दी थी और यकीनन वो मेरा एक बेहतरीन कलेक्सन था।
जो उपेक्षित तन्हा और निर्वासन काट रहे थे उनसे मेरी गहरी मुलाकातें होने लगी थी मैंने लोकप्रिय आकर्षक और अलोकप्रिय उपेक्षित में ऐसा संतुलन साध लिया था कि मै उतनी ही घनीभूत संवेदना के स्तर से दोनों से जुड़ गया था।
झील की ख़ूबसूरती पर उसके धैर्य पर कितनी कविताएँ लिखी गई कुछ नें उन्हें बुद्ध सा धीरजधारी बताया तो कुछ ने उनके इन्तजार पर कसीदे पढ़े मगर मै उन सब से उकता कर पोखरों और गाँव के तालाब (जोहड़) की तरफ लौट आता वो इतने तन्हा थे कि कोई उनके किनारे उनकी पीड़ा पूछने नही आता था वो हद दर्जे के उपेक्षित थे उन्हें दुर्गन्ध का पर्याय समझा जाता मगर मेरे लिए वो सिद्ध कोटि की अमूर्त चेतनाएं थी जो किसी से कोई शिकायत नही करती जो तमाम बहकर आने वाली गन्दगी को अपने दिल में पनाह देती उनके पानी की सतह पर जब जब काई को बढ़ते देखता तो मेरा मन उनके प्रति कृतज्ञता से भरता चला जाता वो अपनी हदों की कैद में जीने वाले स्थिरमना साधक लगने लगते जो तमाम अवशिष्ट को अपने अंदर समा लेने के बाद भी और कवियों स्त्रियों बच्चों के द्वारा अघोर उपेक्षा झेलने के बाद भी भूमि में जल स्तर को उचित  बनाए रखने में अपना निर्लिप्त योगदान करते रहते इस दौर में वो कम ही बचें है मगर जो बचें है वो मेरे लिए झील की ख़ूबसूरती से कई गुना अधिक समादृत है।
सवाल तो यह भी उठना लाज़मी है कि उपेक्षित तन्हा अलोकप्रिय श्रेणी की चीज़ों में मेरी दिलचस्पी की वजह कहीं ये तो नही कि कहीं मै खुद भी उसी बिरादरी का तो नही हूँ तभी उनकी खोजखबर लेने की सामाजिकता निभाता जा रहा हूँ। हो सकता है इस अवधारणा में कुछ सच्चाई भी हो मगर लम्बे समय से ही मेरी रूचि हाशिए पर जीते लोगो,वनस्पतियों,कला,संगीत और प्रकृति के अन्य तत्वों में सतत किस्म की बनी हुई है। लोकप्रिय और स्वीकृत वस्तुओं में मेरा क्षणिक आकर्षण बचता है इसलिए दुःख झूठ अवसाद उपेक्षा तन्हाई के मुकदमें में फंसे लोगो की खोजखबर लेता मैं खुद बहुत दूर निकल आया हूँ इस अज्ञात दुनिया का दर्शन वास्तव में उस प्रचलित दर्शन से न केवल गहरा है बल्कि बहुत अर्थों में व्यापक भी है। जिसको जितना जानते है यह उतना ही विस्मय से भरता है इसलिए कहता हूँ दुनिया में कुछ भी निरूद्देश्य और निष्प्रयोज्य नही है बस खुद का चश्मा बदलना होता है दुनिया इस तरह से भी खूबसूरत दिख सकती है बस अपने दिल को बड़ा और नाक को छोटा करने की जरूरत है।

'इतवारी बात'

विचार

अतीत के हिस्से में तमाम झंझावतों के बावजूद एक इंच मुस्कान होती है वर्तमान स्थूलता ढ़ोने के लिए शापित होता है और भविष्य की इमारत में शंका/सन्देह की बुनियाद शामिल रहती है। अतीत वर्तमान भविष्य तीन काल नही तीन जीवन होतें है जिन्हें एक ही जीवन में जीना हमारे लिए अनिवार्य रूप से बाध्यकारी होता है।

'एक नितांत ही व्यक्तिगत विचार'

Thursday, October 23, 2014

आँखों देखी जंग

कुछ इल्म से अदावत हुई कुछ अदब से मुहब्बत हुई फिर एक दिन ख्वाब से जागा तो तुम्हें अपने सिराहाने पाया तुम्हारी आंखो मे झांकने की कई दफे नामुकम्मल कोशिसें की मगर तुम्हारी झुकी पलकों में महज़ हया नही थी उसमें एक ऐसा इनकार भी शामिल था जो हर बार तुम्हारी पडताल करने पहले मेरी आंखो पर अपना हाथ रख देता था।
तुम आंखो मे काजल लगाना भूल सकती थी मगर ये इनकार पलकों पर ऐसा टंगा था कि इससे तुम्हारी खूबसूरती मे दिन ब दिन इजाफा ही होता था आंखों का रास्ता दुनिया के लिए फिसलन भरा था मगर मेरे लिए यह तरल था क्योंकि मै चल नही बह रहा था और बहते पत्थर के बहने के लिए तुम्हारी आंखो से ज्यादा मुफीद जगह कोई नही थी।
तुम्हारी आधी सोई आधी जागी आंखों में समन्दर सी खामोशी थी मगर उनमें दरिया का शोर भी था जिसको मै केवल सोते हुई ही सुन पाता था। तुम खुद से जितनी बातें करती थी उन सबकी चुगली तुम्हारी आंखे मुझे कर देती फिर मेरे पास कहने के लिए कुछ न बचता मै केवल देख सकता था सन्देह की नदी, भय के जंगल और असुरक्षा की झाडी जो उग आती थी तुम्हारी आंखों में लगभग रोज़।
बंद पलकों का एक पुल रोज़ देखता था जिसके सहारे झूलते हुए जाना जा सकता था मन की करवटों का हिसाब जो तह दर तह काई की तरह दिल के जज्बाती पत्थरों पर जमती जा रही थी। देर रात नींद के दबाव और भोर में उठने के आलस के बीच तुम्हारी आंखों का एक अपना भूगोल होता था जिसमें समानांतर जिन्दगी कें अक्षांसों की दूरी नापने के लिए शिकायतों का फीता होना जरुरी था जब तुमसे मेरा कोई राफ्ता ही नही था तब कैसे शिकवें –शिकायतों की लम्बाई का फीता तैयार करता तुमसे ज्यादा तुम्हारी आंखो से मेरी जान पहचान थी और उनका भाष्य लिखने के लिए मुझे किसी सन्दर्भ की जरुरत नही पडती थी बल्कि मेरे लिखे एक एक हरफ से दुआ का काम लिया जा सकता था ऐसा कुछ मौलवियों नें अपनी अन्दरुनी तकरीर मे कहा था कभी।
तुम्हारी दोनो आंखों के बीच समतल दिखने वाली जगह यथार्थ का फर्श लगा हुआ था जिस पर नंगे पैर चलने की इजाजत थी वैसे तुमसे बिन इजाजत लिए मैने तुम्हारी एक आंख को बागी बना दिया था एक आंख में कुछ देर मै आराम फरमा सकता था और दूसरी आंख में तुम अपने सपने देख सकती थी फिर एक दिन ये राज़ जाहिर हो गया तब दिमाग ने अपना खेल कर दिया उसके बाद मेरी आमद तुम्हारी आंखों मे चुभने लगी ये बात मुझे तुम्हारे एक भांप की तरह उडे आंसू ने बताई वो अपनी हकअदायगी की आखिरी कीमत चुकाने मुझे केवल यह बताने आया था कि मै तुम्हारे चश्में-तर का मुस्तकबिल नही रहा हूं जज्बातों ने बगावत कर दी है सही-गलत पाप-पुण्य की एक जंग रोज़ बाबस्ता तुम्हारी आंखो में चलती है।
जिन आंखों की खूबसूरती पर कायनात को भूला जा सकता था वहाँ के अन्दरुनी हालात इतने खराब थे कि मेरा जिक्र तो छोडिए सोचने भर से आंसूओं को अपनी जगह छोडनी पड जाती थी अपनी ज्यादती और तुम्हारी कैफियत का ख्याल करते हुए मै बहुत दूर निकल आया हूं अब तुम्हें देख नही सकता और कभी देख सकूंगा इसकी उम्मीद बेहद कम है मगर तुम्हारी जरीन आंखों की पैमाईश मेरी आंखों में कैद है जिनकी किस्सागोई अब कभी कभी मेरी भी आंखे नम कर देती है ये ईलाज़ के माफिक है और मेरी आंखो की रोशनी तुम्हारे नाम के आंसूओं से रोज़ बढ जाती है यह पढकर तुम मुझे मतलबी समझ सकती हो वो भी मतलबी कहीं का।

'आँखों देखी जंग'

Monday, October 20, 2014

बड़ा मूर्ख

अतीत और वर्तमान में बीच फंसा मन जब खुद की परछाई की पड़ताल करता हुआ खुद पर एक जजमेंट चस्पा करता है How stupid i was ! मै भी कितना बड़ा मूर्ख था !
कभी इमोशनल फूल तो कभी वन वे ट्रेवेलर जैसे वर्जन सामने आ खड़े हो लगभग धिक्कारते हुए खिल्ली उड़ाते है।
एक ही गलती को बार बार करने के अपने सुख अपने दुःख है जिन्हें प्रारब्ध की पीठ पर लादकर हम नियति का एक तयशुदा चक्र पूरा करते है।
समझदार दुनिया में नादानी के स्थाई दूत बनना एक किस्म की ज्यादती है मगर इस ज्यादती के साथ जीते-जीते हमारी समझदार बनने की अंतिम इच्छाशक्ति भी खिड़की से कूद आत्महत्या कर लेती है।
दुनिया के पाठ और मन की ठाठ में अक्ल पिसती है उसे कोफ़्त होती है कि कैसे तजरबें भी इस वाहियात शख्स को अपने आसपास के सच से नही मिलवा पातें है।

'तजरबा,अक्ल और गुस्ताख दिल'

Thursday, October 16, 2014

दुआ में वक्त

जिन्दगी ग्यारह के पहाड़े जैसी आसान कब थी ये तो हमें सत्तरह की पहाड़े को रटाने की जिद पे अड़ी थी।
इसकी जिद के सदके उठाते उठाते हमारी पीठ झुक गई और दुनिया को लगा कि हम सजदे में थे।
जिन्दगी के आर-पार झाँकने के लिए खुद को ही जमा नफ़ी किया और हासिल सिफ़र पाया। जिन्दगी की जिद और हमारी गुस्ताख अक्ल में कभी यारी न हो सकी इन दोनों के बीच तन्हा दिल सिसकता रहा वक्त बेवक्त।
हमारे रतजगों के किस्से सुनने को ये उम्र कम पड़ेगी वो महज़ किस्से नही चरागों के सफर की दास्ताँ है रोशनी की चालाकियों की नजीरें है और अंधेरों के खूबसूरत मिराज़ हैं।
जरूरत पड़ने पर उन खतों को जलाकर रोशनी पैदा की जा सकती है जो अभी हाशिए पर लिखे पड़े है मन की स्लेट को साफ़ करने के लिए तुम्हारे दुपट्टे का एक कतरा उधार मांगा जा सकता है।
नाखून कुतरते या अलसाईं अंगडाईयों के निगेटिव अभी तक मन की अंधेरी लैब में टंगे है उनका कोई मुक्कमल अक्स नही बनता है सब के सब धुंधले है।
कुछ वाजिब वजह है तो कुछ गैर वाजिब मगर हमारे दरम्यां कुछ वजह जरुर खड़ी है उनको दरकिनार करने के लिए झरनों नदियों के पानी से कुछ नही होगा आंसूओं का सैलाब भी इनकी बुनियाद को हिला नही सका इन वजहों को काटने के लिए वक्त ही बेरहम आरी ही कुछ काम आ सकती है।
फिलहाल, वक्त के बदलने की फितरत सबसे बड़ा सहारा है बस दुआ यह करों कि वक्त मौसम सा बदल जाए आजतक तो यह कमबख्त हमारी मुट्ठियों से रेत सा फिसलता रहा है।

'दुआ में वक्त'

बातें है बातों का क्या

अगर तुमसे सम्पर्कशून्य होने के लिए महज़ यह साधना होता कि एक अदद आई डी डिएक्टिवेट कर दूं और फोन के दोनों सिम बदल लूं तो यह एक बेहद सहज़ और सस्ता साधन होता मगर तुम्हारी घुसपैठ जज्बातों से लेकर तसव्वुर में है जेहन में तुम्हारी यादों के जाले लगे है एक तुम्हारी दीद की उम्मीद सब उम्मीदों को अपने कब्ज़े किए हुए है। गैर दानिश्ता या दानिश्ता तुम्हारे अलफ़ाज़ मेरी याददाश्त के बालों में कंघी करते रहते है। तुम्हारी हंसी के बदले मै रोज़ मन की गिरह तौलने बैठ जाता हूँ तुम्हारी उदासी के राग रोज़ मेरे कान में महामृत्युंजय मंत्र फूंक जाते है। तुम्हें बिन बताएं हर शाम मै अपने चश्में को देखता हूँ उसकी एक लेंस में तुम्हारा अधूरा अक्स उभरता है। सर्दी की आमद पर तुम्हारा शाल मेरी नाक को बहुत याद आता है इस सर्दी में नाक और कान ने लाल होने से इनकार कर दिया है दोनों ने सर्द हवाओं के झोंको से दुश्मनी कर ली है।
तुम्हारे कंगनों के बीच में जो दो तन्हा चूड़ी है उनसे गवाही ली जाए तब शायद कुछ तुम्हारी भी कशमकश के राज़ जाहिर हो मगर उनके भी कोने टूटने शुरू हो गए है एक दिन वो भी तुम्हारी बेवजह की नाराज़गी से उकता कर तिड़क कर टूट जाएँगी उसको मनहूसियत की निशानी समझ कर तुम भले ही दफ्न कर दोगी मगर वो टूटे टुकड़े मरते दम तक सरकारी गवाह के माफिक मेरे ही तरफदार  रहेंगे।
भूलने को बड़ी नेमत समझता हूँ बदलनें को इंसानी फितरत मगर ये दोनों मुकदमें तुम्हारी अदालत में हार चुका हूँ फिलहाल बादलों के मार्फत चाँद के यहाँ अर्जी दाखिल की है कि रात को वक्त पर निकल जाया करें ताकि उसे देख तुम्हारा हाल जान सकूं मगर इन मतलबी बादलों ने बदलती रुत से मिलकर मेरी शिकस्त का पुख्ता इंतजाम किया हुआ है यह खबर आज ही मुझे एक टूटते तारें ने दी। तुम्हारी तमाम शोहरतों के आलम की बीच कुछ बर्बाद किस्म के मेरे भी खबरी है जिनकी अय्यारी की मदद से मै हर्फ़ हर्फ़ तुम्हारी खबर रखता हूँ।
तुम्हें भूलने के लिए जेहन में तल्खियों का होना बेहद जरूरी है मगर तुम्हारी तमाम तल्ख़ बातों के माने निकालने बैठता हूँ तो मुझे वो रूहानी नुक्तें लगने लगते है जो किसी मुसाफिर को सफर पर निकलनें से पहले कबीले का बुजुर्ग बयाँ किया करता था उसमें इल्म की खुशबू होती थी और तजरबें कैफियत।
अफ़साना या हादसा पता नही क्या थे तुम मगर जो भी थे उस पर तबसरा नामुमिकन है अब तुम्हारे ऐब की तनकीद करते हुए मै तुम्हें खारिज करता हूँ मगर यह भी उतना ही सच है कि तुम्हारा अदब इल्म और हुनर तुम्हारे वजूद से बहुत बड़ा है तुम्हारे मैयार को नाप पाऊँ इतनी मेरी न कैफियत है और हैसियत गोया तुम कोई करीबी दोस्त न होकर जीते जागते खुदा थे मेरे लिए।
तुम्हें खुदा कह कर खुद को हलका कर रहा हूँ क्योंकि मै भर गया हूँ अंदर से बेहद वरना मुझे खुद नही पता तुम मेरे लिए क्या थे कुछ थे भी या नही।

'बातें है बातों का क्या'

Wednesday, October 15, 2014

तिलिस्म

फिर उसने एक दिन खुश्क लबों से मन ही मन बुदबुदाते हुए कहा क्यों मिलें तुम मुझे ! ना ही मिलते तो अच्छा था कम से कम मै अपनी सिमटी दुनिया में खुश तो थी मेरे गम मुझे ताकत देते थे अब तुम मेरी कमजोरी बनते जा रहे हो खुद को इतना कमजोर कभी नही पाया। जानते हुए कि तुमसे मेरा कोई रिश्ता नही है न ही मेरे जीवन में कोई अभाव या रिक्तता है फिर ऐसा क्या था तुम्हारी बातों में कि तुम असर करते जा रहे थे तुम्हें जानने की मेरी इच्छा बढ़ती ही जा रही थी। भले ही तुमसे बात न होती हो मगर तुम्हारा सामने दिखना भर एक अलग किस्म की आश्वस्ति से भरता था।
मन के खेल थोड़े अजीब किस्म के होते है ये सरे राह चलता चलता खुद ही अटक जाता है बिन पूछे बिन बताए।
फिर उसने खुद को इकट्ठा किया और तय किया अब निकलना ही होगा इस वाग विलास से गर कुछ दिन और वह उसके साथ रुकती तो फिर वापसी के रास्ते बिखर जाते खुद ब खुद।
उसने लिखे कुछ अधूरे खत मगर उन्हें पते तक पहुँचाने की न उसमें हिम्मत बची थी न इच्छा  उन पर रसीदी टिकट लगा वसीयत के माफिक रोज़ तकिए के नीचे रख सो जाती थी उसके ख्वाब अचानक से अनमने हुए मन की कतरन थे जो उससे कभी कभार गुफ्तगु करने आते थे।
आहिस्ता आहिस्ता किसी को भूलना किस्तों में खुदकुशी करने जैसा था बतौर इंसान शायद यह अधूरापन ही हमें जिन्दा रखने की वजह भी बनता है और हम जीते चले जाते है एक बेमकसद जिन्दगी।
वो उसे देर से मिला था मगर मिलने के बाद उसकी तलाश का हिस्सा बन गया मगर उसके खुद के डर ने उसको रोज़ कहा इसकी बातें तिलिस्मी है इनके इंद्रजाल से निकलना मुश्किल हो जाएगा।
उसकी बुदबुदाहट आज मेरे पास पहूंची और मै देर तक हंसता रहा खुद की ज्यादती पर फिर शाम तक उदास बैठा उसके बाद कुछ कहने के लिए नही बचा था।

'टूटा तिलिस्म: छूटे हाथ'

Tuesday, October 14, 2014

निठल्ला दर्शन

समय का आभास बड़ा विचित्र धोखा है। सम्भावना का डीएनए क्यों नही परिवर्तित होता है हर बार किसी को एक यह लगता है कि मेरे द्वारा बहुत किया जा सकता है सिवाय मुझें छोड़कर। कुछ करना या कुछ भी न करना दोनों के अंतिम अर्थ पुरुषार्थ से जोड़ देना समाज की वृहत परम्परा का हिस्सा है। कर्म करना गतिशीलता और जीवित होने का सार्थक प्रमाण माना जाता है  मगर यह करना बाह्य अधिक है आंतरिक कम इसलिए कुछ भी न करना महज़ यथास्थिति बनाए रखने की युक्ति नही है दरअसल सक्रियता का अर्थ सामाजिक उपलब्धियों से जोड़कर देखा जाता है मगर निष्क्रियता में भी एक अंतक्रिया निहित होती है निष्क्रिय बाह्य दर्शन है आंतरिक रूप से उसमें इतने स्तर गूंथे हुए है कि हर स्तर की अपनी क्रियाएं है और अपने कर्म। समय के सापेक्ष दौड़ जीवनपर्यन्त चलती रहती है समय हमारी ऊर्जा का सुचालक है परन्तु समय क्या है क्या वक्त का बीतना समय है? या वक्त के सामने से हमारा गुजरना समय का एक संवेदी अहसास भर है। लोक के दबाव सतत रूप से क्रियाशील या कर्मशील होने की प्ररेणा जरुर देते है परन्तु यदि मन की यात्रा चेतना की गति का सहारा लेने की अभ्यस्त हो जाए तो फिर वहां अन्तस् के स्तर पर इस दबाव के प्रति एक विद्रोह भी उपजता है वह जीना चाहती है अपनी स्वाभाविक लय में जो निश्चित रूप से स्थैतिक भी हो सकती है। कुछ न करना जड़ता नही है बल्कि व्यापक अर्थों में उसकी गतिशीलता करने से कई गुना अधिक है क्योंकि कुछ भी करने की प्राय: वजह बाह्य होती है और कुछ न करने की आंतरिक। ज्ञात और अज्ञात के मध्य रेंगता यह दर्शन बाहर से जितना बौद्धिक किस्म का प्रतीत होता है अंदर से यह उतना ही विचित्र है। खुद को ठीक ठीक जान लेना और फिर खुद को स्वीकार भाव से अस्तित्व के हवाले कर देना निसंदेह दुर्लभ और साहस का विषय है परन्तु बाह्य दबावों के चलते खुद को एक सम्पादित यंत्र की  तरह देखना या निर्देशित करना बेहद मुश्किल काम है। मौटे तौर पर दुनिया में दो नस्लें है एक एचीवर्स की दूसरी लूजर्स की यह कोरा उपलब्धि का मनोविज्ञान है इसमें अस्तित्व की मौलिक प्रवृत्ति का प्राय: हनन होता है यहाँ दोनों ही दबाव की सूली पर टंगी मानव चेतनाएं है परन्तु हमें सहजता और उदाहरण तलाशने की आदत है इसलिए हमारी पीठ लूजर्स की तरफ होती है और अंगुली एचीवर्स की तरफ मगर मै एक साम्य बिन्दु पर दोनों को समान पाता हूँ बल्कि लूजर्स को एक पायदान अधिक दुस्साहसी। अलबत्ता तो शब्दकोष के इस शब्द पर ही मुझे सख्त ऐतराज़ है क्योंकि खोने की श्रृन्खला आंतरिक संदर्भो में कुछ पाने की कड़ियाँ भी हो सकती है मगर श्रेष्टता के बोध में उनकी पड़ताल करने कोई नही जाता है।
जो सतत अपनी सामाजिक प्रस्थितियां खोते चले गए या खोते जा रहें है जरूरी नहीं वें पलायनवादी हो उनकी आंतरिक लोच का विस्तार किसी भी कथित रूप से सफल या स्थापित से अधिक हो सकता है सम्भव है वो सिद्ध परम्परा के अज्ञात वाहक हो। चैतन्यता के स्वाभाविक नियोजन में घटना एक मूल्यवान अवधारणा है यह स्वत: घटित होती है या इसको घटित करने के नियोजन का सहारा लिया जाता है यह साधनों का विमर्श हो सकता है परन्तु कर्म जड़ता सक्रियता और निष्क्रियता के बीच बिन नियोजन के मौन बैठे हर मनुष्य में अपार सम्भावना है मगर वह सम्भावना बाह्य कारणों से नही आंतरिक प्रभावों से संचालित होती है वो समय की मांग करती है और धैर्य की भी जिसके लिए शायद यह उम्र भी कम पड़ सकती है।

'निठल्ला दर्शन'

Thursday, October 9, 2014

यादों के जंगल

कुंवारी सर्दी की एक अघोषित दोपहर है तीन नम्बर पर पंखा सेवक की भांति चक्कर काटता हुआ चलने का आभास दे रहा है खिड़कियो से आती रोशनी आँखों में चुभती है मगर उन पर परदें खींचने की हिम्मत नही है। एक पुरानी कॉटन पॉलीस्टर मिक्स की चादर छाती तक ओढ़कर हाथ का तकिया बनाए एक करवट लेटे हुए तुम्हारे बारें में सोचता हूँ और सोचता ही चला जाता हूँ।
कमरे की नमी,आधे अँधेरे की ठंडक और पंखे की हवा ने इतना मजबूर किया कि चादर में पूरे पैर नही पसार पाया।दोनों पैर दो के अक्षर की तरह जुड़कर मुझे गर्माहट देने का जतन करते है साथ ही दोनों पैर एक दुसरे से गणितीय समीकरण की तरह जुड़ने की युक्ति बनाते है।
याद नही कब से इसी करवट पड़ा हूँ मेरे कान का आकार मेरी बांह पर छप गया इससे एक तरफा दबाब का तुम अंदाज़ा लगा सकती हो कायदे से यह वक्त सोने के लिए मुफीद हो सकता है मगर तुम्हें सोचते हुए कब नींद आ पाती है। मेरे वजूद के बोझ से बिस्तर भी हैरान और परेशान है तकिया उलटा पड़ा हरजाई की तरह शिकायत कर रहा है मानों उसे मेरी बांह से रश्क हो रहा है। इस बेडशीट के अपने शिकवें है मेरी अवसाद की गर्द से इसको बैचेनी होंने लगी है ये इस बात पर भी थोड़ी हैरान है कि एक मुद्दत से इस पर मेरा एक भी आंसू नही टपका है।
इन सब अमूर्त आकृतियों के बीच मुझे देख ये कमरा भी उकता गया है दीवारों ने मेरी तरफ पीठ कर ली है बस एक अदद छत है जो ऊपर से सीधे मेरे दिल और दिमाग में एक साथ झांकती है उसे थोड़ी बहुत मेरी दिक्कतों का अंदाज़ा है।
इस कमरें की साँसे मुझे यूं बेतरतीब पड़ा देख घुटती है उन्हें नए एहसास की ताजी हवा और रोशनी चाहिए तुम्हें याद करते करते तुम्हारी बातें याद करने लगता हूँ तुम्हारी चुप्पी इस कमरें के रोशनदान में अभी तक टंगी हुई है तुम्हारे कहकहें अब पंखे की पंखडियों की सवारी करते करते बेहोश हो जाते है। इस बॉम्बे डाईंग की बेडशीट पर तुम्हारा लॉ ऑरेल में रंगा एक बाल अक्सर पड़ा मिलता है जबकि तुम यहाँ कभी नही आई शायद ये खुद तुमसे बगावत करके यहाँ तक पहूंचा है होते हुए दर बदर ।ये खुद ही उलझता रहता है और खुद सुलझ जाता है तुम्हारी यादों के अलावा बस एक यही तुम्हारी निशानी मेरे पास बची है तुमने तो कुछ भी देने से इनकार कर दिया था ये सब आ गई मुझ तक खुद ब खुद।
मै ऊब कर अंगड़ाई लेता हूँ जिसमे आधी ऊबासी भी शामिल है मेरी पलकों के छज्जे से तुम कूदकर आँख में आइस-पाइस खेलने लगती हो तुम मुझे दिखती भी हो और नही भी मेरे अक्स की पड़ताल लेने पर पता चल सकता है उसमे तुम्हारा कितना वजन शामिल है।
ख्यालों की तुरपाई करते समय एक टुकड़ा सुख तुमसे उधार लेता हूँ रोज़। दरअसल यह सुख की शक्ल में दुःख है जिसको जोड़ने के बाद उसकी सही तासीर का पता चलता है।
शाम होने को है अपनी उलटी चप्पलों को सीधा करते हुए मै निकल जाता हूँ नगें पांव उस जंगल की तरफ जहां कभी तुम्हें देखा था पहली बार वहां एक नदी कहती है अपने किस्से एक बरगद देता है दिलासा और कुछ कांटे बताते है यथार्थ देर रात इसी बिस्तर पर मै लहुलुहान लेटा मिलूंगा मगर तुम इस बात पर हैरत मत करना कि बिस्तर पर एक भी धब्बा नही है हो सके तो बस यकीन करना जो करना बेहद मुश्किल है।

'यादों के जंगल: डायरी नोट्स'

हिचकी

कुछ हिचकियाँ बेनामी होती है शापित होती है बदहवास दर ब दर भटकनें को दिल और दिमाग मिलकर भी इनके वास्तविक स्रोत को नही तलाश पाती है वो आती है अचानक और कह जाती है
याद करना और याद न आना सबके बस की बात नही होती। कभी कभी याद आती है उन अक्सों की जो वक्त की गर्दिशों में उलटे कदमों आँखों से ओझल होते चले जाते है बिन बताएं।

"हिचकी है कि याद तुम्हारी
समझ नही पाया
मगर कुछ न कुछ अंदर टूटा जरुर है
कतरा कतरा लहू रिसता है
मुस्कानों के रास्तें
कोई टोटका आज तक
न तुम्हारा पता ला पाया
न हिचकी रोक पाया
एक लम्हें के इस कम्पन में
छिटक कर गिर पड़ता हूँ
यादों के तहखाने में
जहां अब तुम्हारी दुआ की
रोशनी नही पहूँचती है।"

© डॉ.अजीत

Wednesday, October 8, 2014

दोस्ती

उसकी सबसे घनिष्ठ दोस्त ने उसको लगभग डराते हुए कहा था तुम भोली हो भावुक हो यहाँ के लोगो की चालाकियां नही समझ पाओगी यहाँ बने रहने का एक ही सूत्र है लोगो पर संदेह करों उन्हें इतनी जल्दी अपना मत मानों मत बनाओं उन्हें अपनी जिन्दगी में लत के जैसा। उसकी दोस्त समझदार थी जिसकी हंसी में निजता की दीवार थी वो यहाँ अपने मन की कहने आती दूसरों को तटस्थता से पढ़ने आती दोस्ती के रिश्तें कमाने के लिए यह जुआघर उसके लिए किसी काम का नही था। दोस्त ने दोस्त की फ़िक्र में उसे खूब समझाया था मगर मन के राग कब किसकी फ़िक्र करते है वो जुड़ते है तो जुड़ते ही चले जाते है उसे कभी कभी उसकी बातों पर पल भर के लिए संदेह होता था मगर उसका दिल कहता सारी दुनिया एक जैसी थोड़े ही होती है सब ठग नही होते है। उसने दोस्त की सलाह को दरकिनार कर गुफ़्तगू का सिलसिला जारी रखा।
अभी तक वो आश्वस्त नही है कि वो गलत है या सही एक पल उसे लगता कि उसका कोई प्रयोग नही कर सकता है वहीं दुसरे ही पल अपने दोस्त की सलाह याद आनें लगती कहीं बाद में तन्हाई में दुःख का सबब न बनें ये एक दुसरे की जिंदगियों में यूं इस तरह से शामिल होना।
इसी फ़िक्र और ख़्वाब के बीच वो जीती जा रही थी एक अजीब सी दुनिया जहां रोज़ सुबह के किस्से शाम तक दम तोड़ देते थे जहां रोज नई वजह जन्म लेती थी और मै इन दो दोस्तों के बीच अटके उस खरपतवार सरीखे शख्स को याद करता हुआ कभी हंसता तो कभी उदास हो जाता है। रोजमर्रा के विचित्र संयोगों में एक यह भी संयोग शामिल था जिसको देखते देखते सुबह शाम अपनी गति से धीमी हो चली थी रात और दिन की लम्बाई घटती बढ़ती जा रही थी। इस ज्वार भाटें का ताल्लुक यकीनन आसमान पर टंगे चाँद से नही था।

'दो दोस्त एक परिचित और मै'

Saturday, October 4, 2014

मिलना बिछड़ना

कुछ लोग रास्ते में छूट जाते है कुछ का छूटना पहले ही दिन से तय होता है कुछ हाथ छुड़ा कर छिटक जाते है यह मेल-मिलाप और बिछडन एक शास्वत प्रक्रिया है और स्वाभाविक भी विज्ञान की कसौटी पर भी यह सिद्धांत: खरी उतरती है अत: किसी राग के चलते अवसाद में रहना या आत्मदोष में जीना किसी भी दृष्टि से औचित्यपूर्ण नही है। जो आपके अस्तित्व का हिस्सा है वह हर हाल में आप तक लौटकर आएगा और जो नही है उसे आपके आग्रह या संताप भी वापिस नही ला सकते है इसलिए नेह के बंधन इतने मत कसो जो बाद में तकलीफ हो सम्भावना हमेशा सांस लेती है मिलकर बिछड़ने की और बिछड़कर मिलने की बस समस्या तब होती है जब हम एकाधिकार चाहते है एकाधिकार एक किस्म का अतिवादी घुन है जो रिश्तों को धीरे धीरे चाटकर उन्हें अंदर से खोखला बना देता है इसलिए आग्रह अपेक्षा बंधन से मुक्त सांस लेते रिश्तें समाधिस्थ सन्यासी के समान जीवंत दिखते है और राग की चासनी में लिपटे रिश्तें अपनी लघुता के भंवरजाल में फंसकर हमारे मन की शान्ति का अपहरण कर लेते है।
इसलिए कहता हूँ जो जा रहा है उसको सम्मानपूर्वक जाने दो यदि आपकी चेतना सम्वेदना प्रज्ञा से उसका तत्व चिन्तन जुड़ा होगा तो अवश्य वह लौट कर आएगा दुनिया गोल है इसका एक मानवीय प्रमाण है यह मनुष्य की प्रवृत्ति भी है उसको राग स्नेह की दुहाई देकर मत रोको क्योंकि अलबत्ता तो वह रुकेगा नही और अगर रुक भी गया तो फिर उसका मन वह मन नही बचेगा जिसमे आपकी आसक्ति बची हुई है।
स्वीकार भाव में सम्पादन रहित जीवन जीने का कौशल सीखना आवश्यक है अन्यथा जीवनपर्यन्त दुःख द्विगुणित हो आपका दुखद मनोभंजन करते ही रहेंगे।
हे ! चराचर जगत की अपेक्षाओं के टूटने से आहत चेतनाओं अपने होने का उत्सव मनाओं ये मिल गया ये खो गया ये सब मन के भ्रम है न कभी कोई मिलता है न कभी खोता है हम खुद को किसी से जोड़कर खुद की यात्रा आसान समझने की भूल करते है जबकि सच तो यह है कि जीवन की चैतन्यता की यात्रा हमें नितांत ही अकेले पूर्ण करनी होती है इसे मंद मुस्कान के साथ पूरा करना है या शिकायत अफ़सोस करते हुए यह नितांत ही आपका चयन है।

'इतवारी प्रवचन'

Friday, October 3, 2014

क्लिनिक प्लस

आंवला रीठा शिकाकाई दही तेल मट्ठा और अन्य घरेलू बाल धोने की परम्पराओं के बीच 'क्लिनिक प्लस' शैम्पू का आना एक बड़ी क्रांति थी आज भी मेरे जेहन में क्लिनिक प्लस की खुशबू इस तरह बसी हुई है कि उसका स्थान कोई अन्य शैम्पू की खुशबू नही ले सकी। शैम्पू के अरोमा विज्ञान ने लाख तरक्की कर ली हो मगर आज भी क्लिनिक प्लस की खुशबू सबसे यूनिक और क्लासिक किस्म की बनी हुई है। कवि हृदय से कहूँ तो दूर छत पर किसी अनामिका के क्लिनिक प्लस से धुए बाल आज भी प्रेम कविता रचने की प्रेरणा बनने की क्षमता रखते है।
खुशबू का बड़ा विचित्र मनोविज्ञान होता है यह मन के तप्त तल पर शीतल छाया जैसी होती है यह हमें खुद के अच्छाईबोध से सेकण्ड्स के लिए कनेक्ट कर देती है मदहोशी में ही सही हम एक छोटी उड़ान भर अपने मन की मुंडेर का चक्कर लगा बिना थके लौट आते है।
हवा के रुख के बिना पानी की तरलता पर सवार होकर क्लीनिक प्लस की खुशबू जब भी मेरे दर तक आती मुझे हाथ में क्लीनिक प्लस का दो रूपए वाला सैचेट दबाए तुम नजर आती इस रसायन से बालों की ख़ूबसूरती बढती तो है ही साथ कुछ गंध प्रेमियों के दिमाग का डैनड्रफ भी साफ़ हो जाता है।

'क्लिनिक प्लस और मै'

छोटी खुशी

कई बार छोटी छोटी खुश होने की वजह हमारे आसपास ही होती है हम देख नही पाते है बस। कल से घर पर मै और राहुल (बड़ा बेटा) दोनों घर पर अकेले है उसकी खाने पीने और देखभाल की जिम्मेदारी मेरी है। कल उसे फिल्म दिखाई शाम को खुद पकाकर खाना खिलाया बोर्नविटा युक्त दूध बनाकर दिया दो तीन दफे।रात उसको अपने पास सुलाया दोनों एक ही चादर में सोएं रात में उसकी फ़िक्र रही कहीं पंखे में ठंड न लग रही हो आज सुबह उसको दूध और रोटी-नमक का नाश्ता कराया अभी उसको नहला कर आ रहा हूँ बाथरूम में उसके बालों में शैम्पू करते समय उसका हंसना या फिर उसकी ऐडी के आस पास का मैल उतारते समय उसका गुदगुदाना अंडरवियर पहनाते हुए उसका व्यस्कों की भांति शर्माना सच में गजब का स्प्रिचुअल प्लीज़र मिला है। हर घंटे बाद यह पूछना कि राहुल भूख तो नही लगी है अपनी जिम्मेदारी का बड़ा अहसास भर है। अभी जब उसके बाल बनाए तो मुझे खुद का बचपन याद आ गया हमारा नहाना बड़ा रोतडू किस्म का हुआ करता था आजकल के बच्चे समझदार है।
बहरहाल पिछले चौबीस घंटे बेहद जीवंत गुजरे है कभी कभी ऐसी जिन्दगी जीकर हम सच में सच्ची खुशी पातें है। राहुल की केयर में हर बात की राहुल से यह पुष्टि करवाना कि मम्मी भी ऐसे ही करती है क्या दरअसल उसकी मम्मी के कामों को कृतज्ञता से याद करने का तरीका भी रहा है जो होते हुए भी प्राय:नजर नही आता है।

Sunday, September 28, 2014

अबाउट मी

इस तरह की आत्मविज्ञापनी पोस्ट बिलकुल नही लिखना चाहता न ही कभी एक्स्ट्रा इमेज कन्शिएस रहा हूँ मगर फिर कई दफा अपने बारें में कुछ बातें बतानी जरूरी हो जाती है कतिपय संदर्भो में इसे मेरा अहंकार समझा जा सकता है मगर यह मेरे जीवन जीने की शैली है मेरी मौलिकता है जिसमें मै ढलकर यहाँ तक पहूंचा हूँ।

ताकि सनद रहें...

1. मेरी बातें जरुर डिप्रेसिव साउंड करती है मगर मै मर्ज़ की सीमा तक डिप्रेशन में नही हूँ एक नियत अवसाद की मात्रा हर लिखने पढ़ने सोचने वाले के अंदर पायी जाती है इसी के जरिए वह समष्टि की वेदना को खुद के अंदर अनुभूत कर पाता है सो इतना अवसाद मेरे लिए एक जरुर टूल है।
2.अध्ययन और अध्यापन जोड़कर लगभग एक दशक मनोविज्ञान से एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से जुड़ा रहा हूँ क्लीनिकल साइकोलॉजी में विशेषज्ञता रही है बतौर मनोविश्लेषक विभिन्न मीडिया माध्यमों में एक्सपर्ट नामित रहा हूँ ठीक ठाक किस्म का अकादमिक सीवी रहा है जिसमें जर्मनी से थीसिस छपना और तीन छात्रों का एमफिल गाइड बनना शामिल है। व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक परीक्षण ड्रा ए पर्सन पर कई साल जुनून की हद तक काम करके उसको सिद्ध किया गया था हालांकि अब ये सब कोई ख़ास मूल्य नही रखता है।
यह महज़ एक दुनियावी पक्ष है इसको मै हर वक्त अपने कंधो पर नही ढो सकता हूँ इसलिए कई बार विदूषक की तरह अपने मन की मौज में जीता हूँ खुद का मनोविज्ञान ठीक से जानता हूँ न ही खुद के बारें में किसी गलतफहमी में जीता हूँ।
3. जैसा हूँ जैसा जीता हूँ वैसा ही खुद को प्रस्तुत भी करता हूँ न मुझे सेल्फ ब्रांडिंग आती है और न मेरी सेल्फ ग्रूमिंग की कोई अभिलाषा भर है। दिल और चेतना के स्तर पर समन्वय बनाकर जीने का प्रयास करता हूँ। न मेरे अंदर उद्यमशीलता है और मै बहुत नियोजित हो कर कभी जीवन जी पाया हूँ यदि इतनी नियोजनशीलता मेरे अंदर होती तो सात साल की यूनिवर्सिटी की मास्टरी छोड़कर खेती किसानी का विकल्प न चुनता सारांश यही है जो दिल कहता है वही करता हूँ।
3. अपेक्षाओं पर तो खुद के माता-पिता की खरी नही उतर पाया और किसी की क्या उतरूंगा इसलिए तटस्थ रहता हूँ इल्म की कमजोरी है आदत से जज्बाती हूँ इसलिए किसी को नजदीक लानें से डरता हूँ क्योंकि जिस तरह की मेरी यात्रा है वहां समान गति से मेरे साथ चलना किसी के लिए भी दुर्लभ है। अब दिल जुड़ने-टूटने से बचता हूँ।
4. कुछ मित्रों को मेरे स्त्री प्रेमी होने का संदेह है उनको यही कहूँगा कि हाँ मै स्त्री को एक उदात्त चेतना मानता हूँ उनकी संवेदना का स्तर मुझे मेरे कम्फर्ट जोन में यात्रा करने में मदद करता है न मै कोई आखेटक हूँ और न मेरे लिखे हो पसंद करने वाली महिलाएं मूर्ख और न मै रिश्तों में बेईमान हूँ और न ही लम्पट। सखा भाव से अनौपचारिक शैली में बात करना मेरा सलीका भर है इसके पीछे मेरा कोई हिडन एजेंडा नही है।
5.लम्बे समय से एक ख़ास किस्म की जीवनशैली जीने में मै टाइप्ड हूँ उसमे न बदलाव की गुंजाइश है और न मेरी कोई अभिलाषा। अपने 'ऐसा होने में' मै बेहद खुश और संतुष्ट हूँ।
7. जो लोग मुझे जानने और समझने का दावा करते है वो जानते है कि मेरी यात्रा किस किस्म की रही है देहात से निकल अपना मार्ग चुनने और पृष्टभूमि के दबाव के बीच मैंने यह मार्ग चुना है और कई स्तरों पर संघर्ष किया है मेरा जितना ज्ञात पक्ष है उतना ही अज्ञात भी है हालांकि निजी तौर पर संघर्ष को न कभी प्रचार का विषय बनाया और न ही तुलना की विषयवस्तु समझा सब अपने अपने हिस्से का दुःख भोगते ही है मै कोई अनूठा नही हूँ।
8. धारणा बनाने वाले धारणाओं में जीने वाले मित्रों की यात्रा बेहद अल्पकालीन होती है बिना सम्पादन और समग्रता से जीवन को स्वीकार करनें वाले मित्रों का सदैव स्वागत है। महान/आदर्श न कभी रहा हूँ न होने की सम्भावना है सभी की तरह मेरे पास भावनात्मक मूर्खताएं है अपराधबोध है दिल का जुड़ना-टूटना सब शामिल है इसे मै मानव होने की निशानी के तौर पर देखता हूँ।
9. दोस्ती को लेकर मेरे थोड़े खट्टे मिट्ठे किस्म के अनुभव रहें है मेरे लिखे हुए में दोस्तों का गाहे बगाहे जिक्र आता है जिससे गैर आभासी दुनिया के दोस्तों को तकलीफ होती है उन्हें लगता है मै खुद को पीड़ित उनको शोषक सिद्ध करता हूँ ऐसा कतई नही है मेरी कुछ रचनाएं विशुद्ध लिट्रेरी कंटेंट लिए होती है उनमे अपने निजी सन्दर्भ तलाशकर आप अपनी ऊर्जा और मन की शान्ति को जाया न करें।
10. अंत में मेरी वजह से हैरान परेशान दोस्तों के लिए एक बात कहूँगा माफी चाहूंगा दोस्तों ! क्या करूं ऐसा ही हूँ मै...!!!

आपका
डॉ.अजीत

Thursday, September 25, 2014

राग

किसी शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में मुख्य वादक और उसके साथी साजिंदो के बीच कार्यक्रम शुरू होने से पहले सुर मिलाने के आँखों के इशारों सा और फिर कार्यक्रम के उरूज़ पर बढ़िया संगत की खुशी को आपस में आँखों ही आँखों में इशारों में बांटना ऐसा ही कुछ तुम्हारे साथ बांटना और साधना मैंने भी चाहा था मगर अफ़सोस तुम न मेरी आँखों की खुशी पढ़ पाए और न रिश्तों के सुर साधने के गुप्त इशारे ही पकड़ पाए।
आज सुर लय ताल बगावत पर है और मेरे आलाप में सिलवटें आ गई है कभी हम बढ़िया संगतकार थे अब बढ़िया कलाकार है सोच रहा हूँ इस बात पर तुम्हें बधाई दूं या न दूं...
चलो ! कह ही देता हूँ  बधाई हो ! सम्बन्धों के शास्त्रीय कार्यक्रम में काफी भीड़ जुटा ली है तुमनें ।कभी फुरसत मिलें तो कुछ रिकॉर्ड मुझे भी भेजना तुम्हें लाइव सुनने का साहस तो मै कब का खो चुका हूँ।

'राग बेदम ए इलाही'
© डॉ. अजीत 

Wednesday, September 24, 2014

अलविदा

उदासी के अड्डे गली के नुक्कड पर नही लगते बल्कि मन के उस निर्जन टापू पर साल में एक बार कुछ परछाईयां अपने हाथ मे बुझी मशाल लेकर आती है जिन्हें पहले चिराग समझा जाता था फिर उनकी गंध में सिद्धो की चिलम सी खुशबू आती और आंखो की पुतली पर तुम फैल जाती। यादों के खत बैरंग लौटने ही थे क्योंकि उन्हें शहर के भीडभाड वाले पोस्ट आफिस से पोस्ट किया गया था उन पर खताओं की मुहर लगी थी उन्हें बिना टिकिट पोस्ट करना एक किस्म का अपराधबोध से बचने का उपक्रम था । मेरे पास एक अदद अपनी उम्मीदों का बिछौना था जिसे क्या तो बिछाया जा सकता था या फिर ओढा जा सकता था मैने कभी लेटने का नाटक किया तो कभी सोने का। हर बार मेरी निगाह आसमान मे न जाने कितने क्षितिजों के मध्य फंसी तुम्हें तलाशती रहती मगर तुम बादल चांद या तारा नही थी तुम हवा थी और हवा केवल एक बार महसूस की जा सकती है उसे कौन आंखो में बांध पाया है भला। तुम जब अपनी दुनिया बेहद मशगूल थी तब मै दिल को जला कर तुम्हारी रोशनी के लिए काजल बना रहा था जो तुम्हें मिल सकता है मेरे सिरहाने एक वफा की छोटी डिब्बी में। तुम्हारे ख्यालों तक से निकलना एक किस्म का निर्वासन था जिसकी तैयारी का आभास बहुत दिनों से तुम्हारी दुनियादारी की बातों से होना शुरु हो गया था।
मेरी तुम्हारी यात्रा का एक यह महत्वपूर्ण पडाव है यहां से रास्ते जुदा होते है और मंजिल अतीत मे दिखाई देनी शुरु होती है मगर मुझे दौडना होगा उल्टे पांव भविष्य में। तुम्हारे पास मन की क्षणिक रिक्तता को भरने के अनेक विकल्प है इसलिए तुम अपनी ऐच्छिक सवारी से मंजिल की तरफ रवाना होगी फिलहाल मैने अपने मन की जेब मे देखा तो पाया कि एक सिक्का तुम्हारी हंसी का अभी भी पडा है अकेला। एक बार दिल ने कहा तुम्हे लौटा दूं मगर तमाम हसीन यादों और तल्खियों के बीच मैने रख लिया है तुम्हारा यह सिक्का। यह अब खनकेगा नही मगर मन के किसी होने मे इसके वजन से मेरा मन हमेशा भारी रहेगा बस यही मेरा निजी स्वार्थ है।
मेरी गति अधिक थी इसलिए थक गया अभी सोच रहा हूं कि थोडा सुस्ताने के लिए फिर से एक कामकाज़ी दोपहर मे शहर चला जाऊं यहां का एकांत हर बात में हर जगह पर तुम्हारी तस्वीर बना देता है फिर मेरी बतकही शुरु हो जाती है इस तरह से मै उलझ जाता हूं बेवजह।
अच्छा ! कहा-सुना माफ करना....इस चौराहे से छोडकर अगले दोराहे से मुझे अपना रास्ता बदलना है फिलहाल सबक का बैग मैने अपने कांधे पर लाद लिया है मै पहले धीरे धीरे चलूंगा और फिर थोडा तेज़ यह तुम्हें शायद यह रेंगने जैसा लगें और लगने मे कोई बुराई भी नही है कभी कभी बिना रीढ के शख्स को तंग रास्तें से गुजरने के लिए ऐसे ही प्रपंच करने पडते है मै चाहता हूं तुम थोडी देर के लिए मेरे तरफ पीठ कर लो कम से कम तुम्हारी आंखो में देखता हुआ मै एक कदम भी वापिस न हट सकूंगा बस यही एक आखिरी निवेदन है मेरा अगर मान सको तो...।

‘फिदा-विदा-अलविदा

© डॉ.अजीत

Sunday, September 21, 2014

नाराजगी

उनके बीच की दूरिया छोटे बच्चों की कच्ची पेंसिल की चोरी की लड़ाईयों और नाराज़गी जैसी दिखती थी। उनके बीच कुछ भी न था न प्रेम न मैत्री दोनों की जिन्दगी दो विपरीत छोर पर चिपकी हुई थी दोनों छत की मुंडेर पर जमी काई जैसा खुद को खुरचते हुए मिले थे। उनकी कामनाओं का संसार देह के सोंदर्यशास्त्र से अलहदा था दोनों की त्वचाएं सम्वेदना को गलाती हुई परिपक्व हुई थी। उन दोनों की अपनी अपनी दुनिया में समानांतर जीवन विकसित हो रहें थे कभी मन कंक्रीट के जंगलों से निकल भाग पड़ता बेहताशा वो अक्सर पहाड़ नदी झरने जंगल की बातें करते जो टिका हुआ था उनके मन के समशीतोष्ण मौसम में।
उन दोनों की बातें प्राय: असंगत होती विषयांतर तो इतना अधिक हो जाता कि कोई एक अपनी मर्जी से किसी भी बात से आहत हो सकता था उसे अन्यथा ले सकता था। उन दोनों में बस इन्तजार का साम्य था न जाने क्यों वो दोनों एक दुसरे का इन्तजार करते दिख जाते थे बिना एक दुसरे को बताएं उनके पास इतने सवाल होते कि कोई भी एक दुसरे को संतुष्ट नही कर पाता था।
उस दिन वो दोनों इस बात को लेकर मौन बैठे रहे कि ताउम्र एक याद के सहारे कैसे जिया जा सकता है फिर उसने कहा सुनो ! याद को गेंद बना कुछ देर चाँद पर खेलते है ! इसके बाद दोनों कुछ दूर हाथ थामें चलें मगर इस बार हथेलियों ने गुदगुदी करना बंद कर दिया था शायद मन और दिमाग ने स्पर्शो को बैगाना होने का आदेश दिया था एक अजब सी नमी जरुर थी मगर उस नमी में हाथ फिसल रहें थे यह फिसलन उन दोनों के लिए अभ्यास थी जिससें उनके रास्तें आसानी से अलग हो सकें।
आज भी उन दोनों ने उस नमी को आँखों में जिन्दा रखा है दोनों एक दुसरे से न खफा है और खुश हाँ कभी-कभी दोनों बच्चों को डांटते दिख जाते है दोनों का एक अपना दायरा है मगर फिर उन दोनों को कभी लड़ते बिगड़ते नही देखा दोनों जीते है अपने अपने हिस्से का निर्वासन मन के निर्वात के बीच।

'वो दों: एक बात'
© डॉ. अजीत 

Thursday, September 18, 2014

कयास

थोड़े से मुश्किल वक्त में वो इतनी जटिल हो जाती कि उससे बात करना तो दूर उसे सोचने से पहले दस दफे सोचना पड़ता। वो जितना हंसती उतना मन ही मन डर लगता क्योंकि ये तय था इसके बदलें उसका मन जब रोएगा तो फिर नदी की तरह सम्बन्धों का तटबंध चंद मिनटों में ध्वस्त हो जाएगा।
ऐसा नही था कि उसे बुरे दौर का अभ्यास नही था हकीकत में वो जिस दौर में जी रही थी वो बाहर से एक स्थापित जीवन दिखता था मगर अंदरखाने वो कितना उथल पुथल भरा था यह ठीक ठीक वो ही जानती थी।
उसके पास हवा की चुगलियाँ होती पहाड़ो के उलाहने होते नदियों की उदासी होती झरनों की शिकायते होती मगर वो हमेशा कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती उसका गुनगुनाना दरअसल खुद से बात करने का तरीका भर था उसकी आँखों की चमक और लबों पर फ़ैली हलकी मुस्कान उन चंद लम्हों की जमानत होती जिनके सहारे दिन भर में वो शिद्दत से जीने का जतन कर लेती थी।
उसकी हंसी और उदासी दोनों मन की बगिया में झूला झूलती रहती थी वो खुद को समेटने का हुनर जानती थी कभी कभी देखता उसकी फ़िक्र में इतनी मामूली चीज़े शामिल होती जिन्हें पर खुद ईश्वर भी कभी गौर नही करता होगा इसलिए मुझे कभी कभी वो भगवान से बढ़कर लगती क्योंकि उसे फ़िक्र के साथ जीना आता था वो कभी उस सूरज की तरह लगती जिसे बोझिल होने की इजाजत नही होती है जिसके होने भर से रोशनी का पता चलता है तो कभी वो कृष्ण पक्ष का चाँद सी दिखती जो बादलों से घिर जाता है अक्सर रात दस बजे के बाद।
वो धरती की तरह व्याप्त थी मन का धरातल उसकी गर्द से अटा रहता था सुबह औ'शाम। वो मामूली दिखने वाली दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी जिसे रोज क़िस्त दर किस्त टुकड़ो में जीना पड़ता था वो भी बिना उसे बताए क्योंकि जिस दिन उसे यह सब पता चलता उस दिन वो फिर वो न रहती उसके बाद उसका निर्मल चित्त शायद पल भर के लिए अनमना हो सकता था दुनिया के तमाम पाप श्राप भोगता इस अनमने मन के संताप को झेल न पाता फिर कहने के लिए कुछ न बचता वैसे भी कहा सुना उसके लिए कभी महत्वपूर्ण नही रहा था वो अपनी शर्तो पर जीती थी एक उलझी-सुलझी जिन्दगी...।

'वो कौन: कुछ आस कुछ कयास'

© डॉ. अजीत