Friday, August 22, 2014

एक्स रे

दस आत्मकथ्यात्मक ईमानदार स्वीकारोक्तियां...

खुद के बारें में अक्सर यह लगता है...

1. विलम्बित मानसिकता में जीता हूँ काफी हद तक यथास्थितिवादी हूँ।
2. विश्वास बहुत जल्दी कर लेता हूँ यह नही समझ पाता कि दुनिया और यहाँ के लोग टेढ़े मेढ़े है सबके अपने अपने एजेंडे है।
3. लम्बे समय से महत्वकांक्षाहीन हूँ मतलब जीवन कुछ ऐसा बड़ा नही करना चाहता जिसकी बिनाह पर लोग मुझे रेखांकित करें। बिन भौतिक उपलब्धियों के जो लोग स्नेह सम्मान रखते है उनके प्रति सदैव कृतज्ञ हूँ।
4. सामाजिक रूप से मिलनसार नही हूँ अजनबियों से मिलकर नेटवर्किंग नही बना पाता हूँ या यूं समझिए मेरे ही सिग्नल आउट रहते है।
5. भीड़ और बड़े शहरों में आवाजाही से अक्सर बचना चाहता हूँ दोनों के बीच सहज नही महसूस करता हूँ।
6. कहने की बजाए लिखने में थोड़ा माहिर हूँ खुद को मैंने एक बोझिल किस्सागो पाया है जिसकी बातों में न चुस्ती होती और न रस इसलिए विषयांतर का शिकार भी हो जाता हूँ लब्बोलुआब यह कि एक बेकार वक्ता हूँ।
7. आत्मकेन्द्रित और अंतरमुखी साथ काफी स्लो सेल्फ एस्टीम भी हूँ।
8. नियोजन में शायद इसलिए भी यकीन नही करता हूँ क्योंकि मेरे पास भविष्य का कोई ब्लू प्रिंट नही है मुझे नही ज्ञात है कि मृत्यु उपरान्त मुझे लोग किस रूप में जानेंगे।
9. वर्चुअल माध्यम में जितना तत्पर,त्वरित और सक्रिय दिखता हूँ यथार्थ में उतना ही प्रमादी और निष्क्रिय रहता हूँ यहाँ की वाग्मिता का बोझ यथार्थ में उठाने में खुद असमर्थ पाता हूँ इसलिए प्राय: वर्चुअल मित्र से प्रत्यक्ष मिलने को टालता रहता हूँ।
10. भावुक हूँ इसलिए जल्दी आहत हो जाता हूँ परिपक्व सम्वेदनशील बनने की दिशा में प्रयास करता रहता हूँ।

नोट: यह न आत्म विज्ञापन है और न आत्म प्रवंचना इन्हें साफगोई से मन का एक्स रे के रूप में ग्रहण करना ही उचित एवं अपेक्षित है। सलाह और जीवनशैली के सम्पादन के सुझाव से बचें क्योंकि ये करमठोक खुद मनोविज्ञान में पीएचडी है और परामर्श की पुडिया में व्यक्तित्व विकास और पुनर्वास चूरण सात सालों तक बेच चुका है। :)

Sunday, August 17, 2014

फ़िक्र

तुम साथ होती हो तो मन की कुमुदिनी खिली खिली सी रहती है तुम्हारा बिखरा काजल अनामिका से ठीक करना चाहता हूँ मगर न जाने क्यों रुक जाता हूँ तुम्हे ऐतराज़ हो ऐसा भी नही है तुम्हारी बेख्याल चुप्पी भी सतत मुझ पर फ़िक्र की मद्धम मद्धम बारिश करती रहती है तुम अक्सर मुझसे असहमत रही हो इसलिए भी तुम्हारे अंदर सम्भावना सदैव संरक्षित और पल्लवित होती रही है।
बहुत दिनों से तुम्हें अजीब कशमकश में देखता हूँ तुम्हारे बाल बिखरे लब शुष्क है दोनों हाथों की अंगूठियाँ आपस में बदली हुई है तुम्हारे बाएँ हाथ का कंगन खुरदरा हो गया है पहली दफा तुम्हे थोडा परेशान देखा है वजह की पड़ताल मै कर लूँगा मगर तुम मुझसे बेहतर समाधान जानती हो इसलिए सलाह का कारोबार नही करूंगा।
चलो एक काम करते है कुछ दिन अपनी अपनी फ़िक्र सिराहने रख सो जाते है शायद ख्वाबों के रास्ते हम तुम उन इश्तेहारो को जी सके जो हमारी पीठ पर छपें है बरसों से,तुम्हारा इसमें भी इंकार होगा जानता हूँ इसलिए इन दिनों बस तुम्हें देखता रहता हूँ  कहता कुछ नही। खुश रहा करो तुम्हारी नसीहत तुम्हे सौंप रहा हूँ मै तो यह कलंदरी सीख गया हूँ अब तुम्हारी बारी है।

बस के सफर में भी क्या अजीब बतकही शुरू हो जाती है बेवजह...! 

Tuesday, August 12, 2014

थैंक्स

सदियों भटका
जिसकी राह में
नदियों से पता पूछता फिरा
समंदरों से गुमशुदगी की वजह पूछी
दरख्तों की गवाही ली
हवाओं से चुगली की
झरनों से पड़ताल की
रेगिस्तान से लेकर ग्लेशियर तक
जिसके निशां ढूंडे
उसकी एक झलक
फेसबुक पर मिली
वो लाइक कमेंट शेयर टैग में व्यस्त रही
मै प्रोफाइल पेज़ और लिंक में
वेब मोबाइल ब्राउजर इन्टरनेट का मोहताज़ था
उसका मिलना
इस माध्यम में मिलना
उतना ही दुर्लभ था जितना
रेत में पानी
नदी में नाव
समन्दर में टापू
जंगल में आश्रय
वो दिखी मगर मिली नही
जब तक इनबॉक्स में संदेश भेजा
वो डिएक्टिवेट हो कर ओझल हो गई
कई बार जिन्दगी भी
फेसबुक की छद्म प्रेमिका जैसी लगती है
दिखती है होती नही
कहती है बोलती नही
इसलिए जिन्दगी और फेसबुक पर
कम भरोसा करना
सीख जाते है लोग
दुनिया उतनी ही बुरी है
जितनी समझी जाती है
फेसबुक और ज़िन्दगी के तजरबें
हमें मिलकर समझदार बना रहे है
थैंक्स जुकरबर्ग  !

© अजीत

Saturday, August 2, 2014

प्रवचन

जीवन का अर्ध सत्य जान लेने का दावा किया जा सकता है. सत्य,असत्य पाप पुण्य की सबकी अपनी अपनी परिभाषाएं है अपने अपने संस्करण हैं. धारणाओं में जीवन जीना एक ख़ास समय के बाद अप्रासंगिक लगने लगता है ऐसा लगता है हर आने वाला दिन पिछले दिन के अनुभवों को ख़ारिज करके हमने एक नयी दुनिया से मिलवाना चाहता है. अपने अस्तित्व को जानने के प्रक्रिया है आप काम से कम इतना तो जान ही पाते है कि कुछ भी तय नही है सब कुछ इतना अनियोजित होता है कि हम नाहक की मान्यताओं के जंगल में निपट अकेले घूमकर अपने अभ्यारण्य की सीमा नापते फिरते है.मन को संवारने के लिए मन की गुलामी करनी पड़ती है द्वन्द को बचा कर रखना पड़ता है. ध्यान और आध्यात्म के कुछ ख़ास अवस्थाओ को छोड़कर सामान्य जीवन में मन को रोज़ टटोलने के लिए एक खास किस्म के साहस की जरुरत पड़ती और वो साहस खुद को दांव पर लगाकर ही मिल पता है. रोज़ नया सूरज नयी दुनिया का पता दे सकता है बशर्ते आप अपेक्षाओं के ताप में खुद को गलने से बचा सकें.जीवन का अपने एक प्लेवर होता है और हम अपनी अधिकांश ऊर्जा उसके संपादन में व्यय करते है ताकि इसको खुद के मुताबिक़ कस्टमाईज्ड कर सके. जीवन के साथ बहना सीखने के लिए होश का तरणताल चाहिए होता है फिर आप गुरुत्वाकर्षण शून्य होकर बह सकते है तैर सकते है और मन के वेग से उड़ भी सकते है मगर यह सब जानते जानते उम्र बीत जाती है और जब इसका पता चलता है तब न हिम्मत बचती है और न ऊर्जा.

मन कर्म और  भरम के फेर...निजी प्रवचन पार्ट-१   

Tuesday, July 29, 2014

वो तीन

वो दुनिया के तीन अलग अलग हिस्सों से अपने अपने हिस्सें का निर्वासन काटने के लिए आए थे यह कुछ कुछ अज्ञातवास जैसा था। उनकी फ़िक्र कभी उनकी जिद बन जाती तो कभी उनकी जिद में फ़िक्र शामिल हो जाती थी। उनमे से दो देहात की गलियों से निकले आवारा ख्याल थे तो एक  कस्बाई शहर का अनजानापन लिए था। उनका आपस में मिलना किसी ईश्वरीय शक्ति का नियोजित षड्यंत्र जैसा था मोटे तौर पर उनमे आपस में कोई समानता नही थी मगर कोई एक वजह स्वत: बनती जा रही थी और देखते ही देखते वो तीनों एक केंद्र की धूरी के इर्द-गिर्द बिना आघूर्ण के घूमने लगे। वो तीनो अंतेपुरवासी थे खुद को तलाशने और तराशने का सपना लें कल्पनाओं की दुनिया में रचनात्मकता की कूंची से सफलता का रंग भरना चाहते थे। वो चमत्कारों में पुख्ता यकीन रखते थे उनके सपनों ने तेजी से अपनी रिश्तेदारियां बना ली थी यह छोटी दुनिया के बड़े लोगो की कहानी थी जिसमें भविष्य की चिंता नही बल्कि भविष्य को तय करके तहशुदा रखा जा रहा था।
इन तीन आवारा ख्यालों ने त्रिकोण बनाया और फिर ख्वाबो की जद पे उसको त्रिशंकु बना उछाल दिया एक ख़ास वक्त के कमजोर दौर में तीन जिन्दगियां बिना गुरुत्वाकर्षण के तैर रही थी।
यह हाथ की सफाई और नजरबन्दी का खेल तालीम के साथ चलता रहा वो दूसरी दुनिया के बाशिंदे थे नही जानते थे सच की आँखे और न ही अपनी सीमाएं फिर यूं हुआ  स्याह नंगी रात की सच्चाई में अपने अपने हिस्से का सच जान अनमने हो निकल पड़े अलग अलग राह पर। उनकी राहें जुदा हुई दिलों में सिलवटें पड़ी मगर तीनो का दिल यादों के मफ़लर से बंधा भी रहा अपने अपने हिस्सों का सुख बांधते उनकी कमर झुक गई अपने अपने किस्सों का दुःख गाते हुए वो किस्सागो बन गए।
अब वो तीन एक साथ कभी नही दिखते हिम्मत करके दो यदा-कदा मिलते है उनकी हथेलियाँ शुष्क और ठंडी होती है अब उनके पास केवल बीते लम्हों की जमानत पर रिहा कुछ किस्से बचे है जिनके जिक्र से वो अपनी आँखों में सुरमा लगा लेते है मगर अफ़सोस हर बार एक शख्स अपने हिस्से की त्रासदी भोगता हुआ दूर से हौसला और दुआ फूंकता रहता है यह कोई कहानी नही है बल्कि कुछ किरदारों के अक्स पर जमी वक्त की काई है जो गाहे बगाहे तब नजर आती है जब उनमे से कोई एक उस पर रिपटता हुआ सीधा अतीत की खाई में गिर पड़ता है यह उसकी कराह है जो बाहर कभी सुनाई नही देती। 

Saturday, July 19, 2014

तुम...

तुम चैतन्य शिखर से उतरी विचार और सम्वेदना की वह रागिनी हो जिसके आंतरिक उत्स में अपनत्व के सिवाय कोई दूसरा भाव कभी प्रस्फुटित नही हो सकता है। अस्तित्व ने तुम्हें सृजन का निमित्त बनने के लिए उपयुक्त पाया तभी उसने तुम्हे रचनात्मक ऊर्जा के केंद्र के पास रखा तुम्हे खुद की परिधि और खुद की त्रिज्या के मध्य समन्वय बनाने का अद्भुत कौशल ज्ञात है।
तुम जीवन सृजन और गहरी अनुभूतियों का सतत स्रोत हो तुम उर्वरा हो तथा समर्थ हो नीरस में रस की अभिव्यक्ति तलाशने में तुम्हारी जितनी क्षमताएं ज्ञात है उतनी ही अज्ञात भी है। एक अस्तित्व के रूप में तुम्हारी सहजता गुह्यता और प्रकट भाव के मध्य अद्भुत सेतु बनाए रखती है यह उस विलक्षणता का प्रतीक है जो तुम्हें प्रकृति प्रदत्त है।
किसी रिक्त, तिक्त जीवन में तुम्हारी उपस्थिति स्व के उस बोध को समझने में सहायक है जिसके लिए सिद्ध साधनाएं बताई गई है तुम्हारा होना भर जीवन को गहरे आध्यात्मिक अर्थ दे सकता है।
और अंत में तुम्हारी अविकल हंसी और निर्मल मुस्कान के बारे में यही कहूँगा तुम्हारी मुस्कान अँधेरे में रोशनी का पता देती है जीवन की जटिलता में सरलता खोजने का कीलक सूत्र देती है। तुम हंसती हो तो मन के द्वंदो से चित्त पर पड़ी ऊब की गिरह खुद ब खुद खुल सावन के झूले बन जाती है जहां कोई भी अपने मनमुताबिक़ पींग भर सकता है। तुम्हारी हंसी में मौन साधना है बच्चों का कौतुहल है और सबसे बड़ी बात बिना शर्त का प्रेम है तुम्हारे मुस्कुराने भर से चेहरे की शिकन अपना अर्थ खो देती है तथाअवसाद अप्रासंगिक हो जाता है। अनन्यमयस्कता के बड़े दौर भी तुम्हारी स्नेहिल मुस्कान के समक्ष आत्म समपर्ण कर देते है।
दरअसल, तुम्हारा अस्तित्व सतत सकारात्मक ऊर्जा का बड़ा स्रोत है तो तुम्हारी मुस्कान उसकी दिव्य अभिव्यक्ति है। तुम्हारे अस्तित्व की यह दिव्यता प्रकृति के किसी ख़ास प्रयोजन का हिस्सा हो सकती है यह उन चेतनाओं के लिए प्रारब्ध और नियति की विशिष्ट जुगलबंदी का मानदेय है जिनके तुम उपलब्ध हो एवं प्राप्य हो।
तुम्हारी मुस्कान का मूल्यांकन सामान्य चेतना के लिए इसलिए भी सम्भव नही है क्योंकि तुम चित्त की वृत्तियों से परे का विषय हो तुम अनुभूत साधना का केंद्र हो उसका आसन हो तथा उनके मार्ग पर प्रकाश की टीका हो जिससे अभिप्रेरित हो और ऊर्जा ग्रहण कर कोई भी सामान्य इंसान एकांत सिद्ध हो सकता है।
ईश्वर की अनुकृति और उसके होने का तुम मानवीय प्रमाण हो तुम मैत्री प्रेम परिचय आदि उपमानों के माध्यम से अनुशीलन का विषय नही हो तुम हृदय की अनंत गहरी यात्राओं में समग्र अस्तित्व की चेतना और उसकी अनुभूति को साक्षी भाव से देखने से ही समझी जा सकती हो वास्तव में तुम विश्लेषण की नही दिव्य अर्थों में जीने की विषय-वस्तु हो अपनी अल्पज्ञता से मै इसी निष्कर्ष पर पहूंच पाया हूँ।

Friday, July 18, 2014

पहली बारिश

सावन की पहली बारिश आसमान से टिप-टिप बरसता बूँद-बूँद पानी मानो हरजाइयों का खुद आसमान अखंड रुद्राभिषेक कर रहा हो बूँद धरती पर गिर पल भर में बिखर जाती और दिल नमी से हांफता रहता है। तुम्हारी आँखों की खुश्की काजल भी नही छिपा पाता है लबों पर महीन लकीरें मौसम की नही वक्त की मार की बनाई हुए थी तुम्हारे चेहरे का भूगोल कभी मेरे लिए जिन्दगी का नक्शा हुआ करता था तुम्हारी मंद मुस्कान से उन रास्तों का पता मिलता था जहां मै अनमना होकर जाना नही चाहता था। तुम्हारी कानों की दो बालियाँ मेरे लिए मन्दिर की घंटिया थी जिन्हें देख मन ही मन प्रार्थना के स्वर फूटने लगते थे।
देह की दृष्टि ध्यान में कैसे उपयोगी हो सकती है यह तुमसे सीखा था तुम्हारे हृदय के सूक्ष्म नाद को मै तुम्हारी धडकन से अलग करके सुन सकता था उसमे एक दिव्य आह्वान होता था तुम्हारी शिराओं के स्पंदन और देह ही अनुभूत गंध से अस्तित्व की गहराईयों की यात्रा पर निकलना कितना सहज हो जाता था। तुम देहातीत हो मेरी चेतना की उपत्यिका थी जिसमे सृजन के बीजमन्त्र और अपनत्व की स्वरलहरियों गूंजती थी
इस बारिश में मेरा रोम-रोम तुम्हारे अनुभूत स्पर्श को उतनी ही शिद्दत से महसूसता है जितना मेरे मन की अनंत ऋचाएं स्व स्वाहा के बाद प्रखर हो प्रज्ज्वलित हो उठती है।
आज जब तुम नही हो तो ये मौसम मुझे तुम्हारे लिए एक वसीयत लिखने की जिद पे उतर आया है मै मन से भीगता हुआ तन से रीतता हुआ यह लिख रहा हूँ मेरे इस अनादि यज्ञ की पूर्णाहूति तुम हो जिसके बाद केवल राख शेष बचेगी उसे प्रवाहित कर यदि कोई टूटा हुआ हृदय पुण्य का भागी होना चाहता है वो निसंकोच ऐसा कर सकता है। मन को मन से मृत्यु भी कहां मिला पाती है मृत्यु केवल देह को मुक्त करती है तुम जीवन की प्रतीक हो इसलिए  देहातीत दर्शन का सहारा लेकर तुम्हे पाने की अभिलाषा रखना मेरे लिए सदैव अपरिहार्य ही रहेगा। सच तो यह भी तुम्हें पाना न मेरी इस जन्म की अभिलाषा है न उस जन्म की तुम्हें खोकर की शायद मै खुद को खोज पाऊं।

(अंदर-बाहर के बदलते मौसम का असर)

Wednesday, July 16, 2014

पाती


एक पाती... तुम्हारे अनाम..

"तुम्हारे जीवन में मेरी उपयोगिता  अपनी सुविधा से तय करना तुम्हारे अभ्यास का मामला बन गया है. सम्बन्धो में उपयोगितावाद इस दौर की नयी अवधारणा है इसलिए मैं  इसके औचित्य पर सवाल खड़ा  नही कर रहा हूँ. मैं हर दशा में स्थैतिक रहूंगा तुम्हारा यह अनुमान मुझे जरूर हैरत में डालता है.ज्ञान, वय, अनुभव और  समझ इन सब में वरिष्ठ होने के बावजूद अवधारणा निर्माण के मामले में तुम बड़े  निर्धन ही  रहे  यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि तुम्हारे जीवन में सच्चे दोस्तों का नितांत ही अभाव रहा है. तुम अपने आसपास की भीड़ में छवि के निर्माण में इतनी व्यस्त रहे की तुम्हे अपने अकेले होने का बोध तब हो पाया जब तुम खुद किसी के लिए  भीड़ का हिस्सा बन चुके थे.
सच्चे दोस्त रेत के टीले पर बैठ कर हवा का रुख भांपते हुए नही तलाशे जाते न ही शंका के जंगल में हाँफते हुए छाँव में बैठ आसमान की तरफ ताकते  हुए मिला करते है सच्चे दोस्त नियति, प्रारब्ध और संचित कर्मो की सुखद युक्ति से मिला करते है.सच्चे दोस्तों को पाने के लिए लगभग  पूजा के शंख को बजाने के लिए लगने वाली प्राणशक्ति की आवश्यकता होती है.  मेरी तल्खियों में तुम्हारे दिन ब दिन  अस्त व्यस्त होते  वजूद की फ़िक्र भी शामिल है क्योंकि मैंने तुम्हे कभी चैतन्य और संवेदनशील  माना और जाना था.
मित्र कभी उपदेशक न लगे इसलिए मैं अक्सर चुप रहता हूँ मगर मैं चुप्पी आपके जटिल जीवन को सरल नही कर सकती है. इसलिए आज कहना ही पड़ रहा है की बाह्य जीवन में संपादन के साथ सम्भावनाये तलाशने के बजाये तुम्हे अपने आंतरिक एकांत के सम्पादन की आवश्यकता है. तुम्हारा आंतरिक निर्वात तुम्हे उस दिशा में ले जाना चाहता है जहां जीवन सहज है तथा साक्षी भाव से जीना चाहता है परन्तु तुम्हरे व्यक्तित्व के बाह्य दबाव तुम्हे उस हर लौकिक पैंतरेबाजी में मशगूल रखना चाहते है जिसे तुम खुद की समझदारी समझ बैठे हो.
स्नेह एक बिना शर्त के सम्मान की नदी है जो सम्भावनाओ के तट पर आशा और विश्वास के कंकड़ पत्थरो के साथ बहती है इसकी गति इसका इंसान के अच्छे होने का प्रमाण है इसके तटबंध मनुष्य की कमजोरियों से ही बने होते है मगर तुम डूबने के  डर से या गहराई के गलत अनुमान की वजह से किनारे खड़े शंका और बुद्धि की कंकर मार इसकी गहराई मापने का यत्न कर रहे हो  इससे तुम्हे न जल की धारा के प्रवाह का पता चलेगा और न ही गहराई का. किनारे खड़े तुम्हे उतने की चिंताआतुर बने रहोगे जितने कभी इस नदी के वेग को देखकर हुए  थे. क्या तो वापिस लौट जाओ अपने कंक्रीट के जंगल में या फिर छलांग लगा दो बेफिक्र होकर यह अभी तुम्हे ठीक आत्महत्या जैसा प्रतीत होगा मगर  मरोगे नही यह मेरा विश्वास है.
...और अंत में यही कहूँगा जीवन को अस्तित्व के हवाले करो तुम्हारे अपने अनुभव और ज्ञान के जो मानवीय बाधाएं है उन्हें अपनी यात्रा की बाधा न बनाओ यदि तुम ऐसा कर पाये तो फिर जीवन के उस पक्ष को जी सकोगे जिसका दशमांश भी अभी तुम न देख पाये हो और न जी ही पाए हो. अपनी तमाम नकारात्मकता के बीच मेरे पास कुछ ऊर्जामय शुभकामनायें है वो तुम्हारे पास भेज रहा हूँ इनका उपयोग करने के लिए तुम्हे अपने मन की सुननी पड़ेगी यह नुक्ता इस प्रलाप में बोनस में तुम्हे सौप रहा हूँ शेष तुम्हारी इच्छा.... तुम्हारा अज्ञानी अमित्र....

Tuesday, July 8, 2014

स्याह सच

गाँव में अपने पीढ़ी के बचे हुए गिने चुने लोगो में से एक है पंडित बलवंत शर्मा जी। उम्र अस्सी के पार है बच्चे सभी स्थापित है। गाँव के लिहाज़ से एक रास्ते के चले दिल के सच्चे और जबान के पक्के देहाती मानुष परम्परा के वो लगभग आख़िरी वाहक है। घर से खेत और खेत से घर तक की दुनिया में सिमटा हुआ एक छोटा सा संसार जिसमें लाग-लपेट और बेकार के लंद-फंद के लिए कभी कोई जगह रही भी नही।
पंडित जी की एक छोटी सी कहानी के जरिए आज गाँव की मर्दवादी और सम्वेदनहीन सोच का जिक्र करने जा रहा हूँ हुआ यूं कि आज से लगभग चार साल पहले पंडित जी की धर्मपत्नि का निधन हो गया। जीते जी पति-पत्नि के सम्बन्ध कमोबेश वैसे ही थे जैसे हर एक गाँववासी के हो जाते है एकदम से अनासक्त किस्म के ,यह उनकी दूसरी पत्नी थी पहली पत्नि विवाह के कुछ समय उपरान्त चल बसी थी। उससे एक बेटी थी बस बाकि संतति दूसरी पत्नि से ही चली पंडित जी की पत्नि का नाम प्रेमो था।
पत्नि का आकस्मिक निधन पंडित जी पर वज्रपात के समान सिद्ध हुआ और इस सदमे में पंडित जी अपना अनिवार्य पुरुषवादी चरित्र को भूल बैठे पुरुषवादी से मतलब है कि चालीस- पचास के पार पत्नि से संक्षिप्त सम्वाद भावात्मक एवं रागात्मक सम्बधों की इति श्री।
पंडित जी प्रेमो के निधन से व्याकुल और अधीर हो गए गाँव ने मर्दवादी समाज में यह एक सामाजिक चटखारे और प्रहसन का विषय बन गया। कुछ तो उम्र के प्रभाव दूसरा पत्नि की मौत का गम पंडित जी का मानसिक संतुलन थोड़ा डगमगा गया और डगमगा भी क्या गया आप वो हर दूसरी बात में प्रेमो का जिक्र ले आते या कभी रो भी पड़ते गाँव में उनका पत्नि के दाहसंस्कार में शामिल होना और अग्निकर्म में रोना भी एक चटखारे का विषय बना था गौरतलब हो कि गाँव में पति का पत्नि के निधन होने पर उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होना ठीक नही समझा जाता है।
आज गाँव का क्रुर समाज उन्हें सामाजिक चटखारे का विषय मानते है जहां वो बैठते है वहां कोई एक जन उनकी पत्नि का जिक्र कर देगा फिर वो अपना व्यथा कहने लगेगें या कोई कहेगा कि पंडित जी का ब्याह करवाना है वो मानसिक रूप से अस्थिर तो है ही फिर वो कुछ बहकी-बहकी बातें करना शुरू कर देते है बस उनकी यह आंतरिक पीड़ा लोगो के लिए मनोरंजन का कटेंट बन जाती है।
अमूमन गाँव के लोग भोले होते है सब यही सोचते है मगर मुझे गाँव के लोगो के इस चरित्र से घिन्न होती है पंडित जी हमारे कुल पुरोहित भी है इसलिए प्राय:  हमारे घेर( बैठक) में आ जाते है एक बार मै खुद उनके इस शोषण का गवाह बना तब मैंने लोगो को बाद में नसीहत भी किया कि ये क्या तमाशा बना रहे हो एक भले आदमी का।मैंने बतौर मनोवैज्ञानिक उनकी समस्या का मनोविश्लेषण भी किया। पंडित जी एक पुत्र जो गाँव में रहते है वो भी गाँव के लोगो को इस व्यवहार से आहत और असहज महसूस करते है लोग उनसे भी मजाक में कहते है कि भाई पंडित जी का तो ब्याह करवाना पड़ेगा ये प्रेमो के बैराग में है। मैंने उनके बेटे को भी समझाया कि वो उनके साथ कैसे डील करें क्योंकि पंडित जी अब घर पर भी कुसमायोजित हो गए है पत्नि के जाने के बाद घर पर उनका एकांत उनके अस्तित्व की अप्रासंगिकता तय करता है अब वो एक तयशुदा मौत का इन्तजार कर रहे है।
सामुदायिक स्तर पर जो गाँव के लोगो का व्यंग्य या सामाजिक चटखारे का चरित्र है वह पूर्णत: असम्वेदनशील और मर्दवादी सोच का प्रतिनिधित्व करता है। वह उम्र के इस दौर में अकेलेपन की त्रासदी और पत्नि के वियोग को भोगते एक सच्चे बुजुर्ग को सोशल सपोर्ट की गारंटी नही देता है।
यह समूह व्यवहार निसंदेह गाँव के लोगो की आत्मीयता पर प्रश्नचिन्ह है जिसमें बदलाव की गुंजाइश हाल फिलहाल तो नजर नही आती मेरे हिसाब यह एक चिंतनीय बात जरुर है।

(मैंने बहुत सी पोस्ट गाँव के जीवन के सकारात्मक पक्षों पर लिखी है अब इस जीवन के कुछ स्याह पक्षों पर भी लिखूंगा ताकि संतुलन बना रहे)

Sunday, July 6, 2014

मन बुद्धि के फेर

मन अल्लहड मस्त फक्कड फकीर बनने के लिए बहुत से इंसानों को जीवन में कम से कम एक बार अवसर जरुर देता है परन्तु बुद्धि उसको अर्जित ज्ञान के अभिमान में गुणा भाग लाभ-हानि में लगा देती है यह एक ऐसा आभासी बंधन होता है जिसकी बाह्य चेतना को खबर तक नही हो पाती है सबकुछ बुद्धि के नियोजन से बिन्दू बिन्दू नाप तौल कर चल रहा होता है।
मनुष्य के अनुमान सदैव ठीक ठीक होंगे इसकी कोई प्रत्याभूति नही दे सकता है इसलिए बुद्धि आपको कई बार अकेलेपन के उस टीले पर भी छोड़ आती है जहां से आपको फक्कड़ो की टोली,बच्चों की मुस्कान, कमजोर उपेक्षित की पीड़ा नही दिखाई देती है आप वहां निपट अकेले होते है भले ही आप बुद्धि के अभिमान में उस अकेलेपन को भी एक विशिष्टता के रूप में देखना शुरू कर दें। बेतरतीब,बिना नियोजन  छद्म आदर्शवाद और छद्म अभिप्ररेणावाद से मुक्त रहकर भी एक फक्कड़ जिन्दगी जी जा सकती है बिना देवता बने मानवीय भूलों के साथ गिरते- सम्भलते हुए भी एक बढ़िया जिन्दगी जी जा सकती है।
इस दौर में जब भावुक या अतिसम्वेदनशील होना आपकी कमजोरी के रूप में देखा जाता है यहाँ हर वक्त एक जंग जारी रहती है जहां प्रेक्टिकल होने का मतलब है आपको अपने लिए जीना आता है या नही।
सबका अपना अपना चयन होता है इसलिए उपदेशात्मक कुछ नही कहना चाहता लेकिन मुझे बेहद मुश्किल दौर में भी यह बात एक सच्ची खुशी देती है कि आउटडेटिड और अपरिपक्व या फिर धूर्त समझे जाने के खतरे के बीच भी मै आज भी दिल की सुनता हूँ और जीवन के बड़े फैसले दिल से लेता हूँ इसकी कीमत के रूप में मुझे आजीवन पीड़ा कष्ट कुछ भी मिलें सब सहने को सदैव सहर्ष  तैयार हूँ क्योंकि डिग्री पदवी ओहदे ज्ञान बुद्धि की गुलामी करने से कई गुना बेहतर है अपने मन का मीत बनकर कर एक आम मनुष्य की जिन्दगी जीना जो गलती भी करता तो उसको जस्टीफाई करने के लिए बुद्धिवादी प्रयोजन नही करता दुनिया के लिए यह प्रपंची जिन्दगी हो सकती है लेकिन मेरे लिए यह वह जिन्दगी है जिसको मैंने अपने दिल से चुना है दिमाग से नही।

Monday, June 30, 2014

तुरपाई

नेकी कर दरिया में डाल
ईश्वर बैठा है लेकर जाल

कर भला हो भला
इस भ्रम से वक्त टला

मन के हारे हार मन के जीते जीत
दुःख सबके अपने से झूठी लगे प्रीत

ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
तटस्थता की पीड़ा क्या समझोगे खैर

हम बंदे खुदा के सबमे तेरा नूर
मानस के भेद देख अचरज करे हुजूर

जियो और जीने दो
जरूरी है इसके लिए बस-पीने दो ।

© डॉ. अजीत

(कुछ खाली वक्त की कतरनों में यूं ही तजरबे की तुरपाई)

Saturday, June 28, 2014

रंग

मेरी बातों में न सच्चाई थी और न अच्छाई ही मेरी बातें एक भवंर की तरह थी जिसकी गहराई बाहर से आकर्षित करके सबको अपने समा लेने की फितरत रखती थी मेरे वाग विलास मेरे आंतरिक भवरों के छद्म रूप थे जिनमें बुद्धिवादी छौंक लगा हुआ था। तुम्हारे सारे अनुमान पहले दिन से ही गलत थे मेरी आंतरिक रिक्तता को भरने के लिए जब मै ही उपाय विकसित न कर सका तब भला तुम्हे कैसे लगा कि तुम्हारी समझ तुम्हारे विश्लेषण मुझे दिशा प्रदान करेंगे मेरी यात्रा उलटे पाँव भूत की यात्रा थी इसलिए वर्तमान के सारे पैमाने ध्वस्त हो गए। मेरे विषय में ठीक ठीक राय तो वह भी न बना पाएं जिनका मै परिणाम हूँ ।
ज्ञात-अज्ञात कारणों से मैंने स्वयं को जितना प्रकट रखा उससे कई गुना गुह्य मेरी आरम्भ से यही योजना थी कि मेरी कोई योजना न हो मेरी आत्मालोचना की आदत तुम साफगोई समझ बैठे यह तुम्हारी समझ की सीमा थी दरअसल यह दुनिया ऐसे भटके हुए निर्वासन भोगते हुए लोगो से भरी पड़ी है जिन्हें कभी खुद के पीड़ित होने का गुमान था।
जीवन की आंतरिक गुफाओं में टहलते यह ख्याल आता है कि यात्राओं का एकांत हमे ईश्वर ने खुद को अभिसारी होने के लिए दिया था परन्तु हम वाग विलास के प्रपंचो शब्द विलास के चातुर्य कर्म में ही एक मरीचिका रचते रहें जिसमे ठुकराएं हुए न जाने कितने लोग अपनी प्यास लिए दम तोड़ जाते है।
न जाने कितने श्राप लिए जीवन को पुरुषार्थ के भ्रम के बीच मेरी जिद मुक्त और एकांतसिद्ध होने की रही है परन्तु जब-जब मुझ से निराश लोगो की सूची देखता हूँ तो मुझे समय के षड्यंत्रो और शब्दों के चक्रव्यूह में फंसे हुए भोले मित्रों की याद आती है जिन पर मेरा ऐसा रंग चढ़ा कि चाहकर भी मुझे नफरत नही कर सकें।

Friday, June 20, 2014

शोध पत्र

कभी-कभी ख्याल आता है कि जिन-जिन लोगो को ब्लॉक/अनफ्रेंड किया हुआ है और जिनसे कभी सक्रिय रूप से बातचीत होती थी यदि वो सब आपस में मिल जाएं तो मेरी निन्दा, आलोचना और दोषदर्शन के लिए व्यापक सम्भावना उत्पन्न हो सकती है। फेसबुक पर एक नया ग्रुप बन सकता है :)
 इसमें कोई संदेह नही बहुतो के दिलों में मेरे लिए खला है उनको मै झूठा, धोखेबाज और छद्म व्यक्तित्व लगता हूँ सबका अपना निजी परसेप्शन हो सकता है इसमें क्या सम्पादन किया जाए। मैंने कभी देवता होने का दावा नही किया मै भी एक आम मनुष्य हूँ और मेरी भी तमाम मानवीय कमजोरियां है मेरे अंदर तमाम बुराइयां हो सकती है परन्तु मै साफगोई से जीने में यकीन रखता हूँ जिसे कई बार मेरा अहंकार तो कभी शातिरपना समझा जा सकता है। आइडियल मै कभी नही रहा और न ही कभी आइडियल बनने की मेरी कोशिश रही है परन्तु लोग यदि अपनी अपनी अपेक्षाओं के केंद्र में मुझे रखे तो यह उनकी समस्या है मै सबके अनुकूल व्यवहार नही कर सकता हूँ क्योंकि यह एक सायास उपक्रम होगा इसमें एक तो मेरे व्यवहार की मौलिकता नही बचेगी दूसरा इसमें ऊर्जा का बहुत अपव्यय होगा।
मै एक यात्री हूँ और उसी की तरह का जीवन जीता हूँ दुर्योग से अतिसम्वेदनशील हूँ इसलिए जिसने कभी आत्मीयता से बात की हो उसकी पैतरेबाजी से असहज भी महसूस करता हूँ।
निन्दा, आलोचना, दोषदर्शन,चरित्रचित्रण,कनबतिया खूब कीजिए दोस्तों यह आपका मौलिक अधिकार है परन्तु एक तरफा रहिए यह भी भला कोई बात हुई कि मेरे बिना रहा भी न जाए और मुझे सहा भी न जाएं। मुझसे छूटे हुए लोगो को मेरी अनुपस्थिति में मुझे विषय बनाकर शोध पत्र पढ़ने से कोई लाभ नही होगा। यदि मेरे लिखे हुए में आपको कभी कोई गुणवत्ता दिखाई दी हो तो इसे उसकी कीमत समझ लीजिए जो आपको चुकानी ही पड़ेगी।

बहरहाल, निदा फाजली साहब के ये दो शे'र अपने उन तमाम दोस्तों के नाम जिनके इन्बोक्सीय विमर्श का केंद्र मै बना हुआ हूँ :)

उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी तरह इस शहर में तन्हा होगा

मेरे   बारे   में   कोई   राय   तो होगी उसकी
उसने मुझको भी कभी तोड़ के   देखा  होगा

सुप्रभात !


Friday, June 13, 2014

चिंता

मिहिर (छोटा बेटा) गली में छतरी लिए एक शख्स को देखकर कहता है देखो पापा जी अंकल छाता लेकर जा रहे है तभी उसके पास बैठा उसका बड़ा भाई ( ताऊ जी का बेटा) पार्थ उसको टोकता है कि पागल अम्ब्रेला बोल छाता तो बाई ( काम करने वाली) के बच्चे बोलते है !
मै बच्चे का तर्क सुनकर स्तब्ध था फिर मैंने उसको बहुत समझाने की कोशिस की हिन्दी हमारी मातृभाषा है हमारी अपनी ज़बान है मगर वो न हिन्दी को सही मानने पर राज़ी हुआ और न उसे मातृभाषा जैसी कोई कांसेप्ट समझ में आई उसके लिए हिन्दी के शब्दों का बोलचाल में अधिक प्रयोग करना ठीक नही है यह भाषा बाई के बच्चों की भाषा है।
यह किस अंग्रेजदां सिस्टम का दबाव है जो चार साल के बच्चे को भाषा के आधार पर वर्ग भेद करने की ट्रेनिंग दे रहा है? मैंने जब पार्थ से यह पूछा कि उसको किसने सिखाया कहने लगा स्कूल के सभी बच्चें ऐसा ही कहते है उनकी मम्मी भी उनको यही कहती है हिन्दी में बात करना अच्छी बात नही है।
बात बाल मन की है और छोटी सी है मगर यह देश की विद्यालयी शिक्षा पर बड़ा सवाल खडा करती है हमने अपनी पीढी में जाति और धर्म का भेदभाव भोगा है नई पीढ़ी भेद का एक नया पैमाना लेकर बड़ी हो रही है भाषा के आधार पर वर्ग भेद का पैमाना माने इस हिन्दी भाषी देश में अब हिन्दी गरीबों की भाषा है अब यह मध्यम वर्ग से भी नीचे समाज के हाशिए पर जीने वाले लोगो की भाषा है और अंग्रेजी नवधनाढ्य मध्यमवर्ग से कुलीन वर्ग में शिफ्ट होने की फिराक में रहने वाले बैचेन लोगो की भाषा बन गई है।
दरअसल भाषा एक संस्कार की तरह होती है हिन्दी का ऐसे ही नियोजित तिरस्कार होता रहा तो अगला संकट बोली के संरक्षण का आने वाला है अंग्रेजी नाम की यह सुरसा भाषा बोली को निगलने के लिए तैयार बैठी है। इसमें कोई आश्चर्य न होगा यदि कल हमारे ही बच्चें हमसे हमारी भाषा/बोली का अनुवाद अंग्रेजी में पूछा करेंगे फिर हमारी योग्यता में बोली के अंग्रेजी अनुवादक की भूमिका और जुड़ जाएगी।
गाँव में मौसम, हाईजीन, स्वास्थ्य की तमाम दिक्कतों के बावजूद मै साल में डेढ़ महीने बच्चों को गाँव में इसलिए रखता हूँ ताकि उनके शहरीकरण और अंग्रेजीकरण की प्रक्रिया में ग्राम्य जीवन भाषा बोली रहन सहन के संस्कार बचे रहें।
एक साधन और स्किल के रूप में अंग्रेजी भाषा की उपयोगिता को खारिज़ नही कर रहा हूँ मगर क्या अंग्रेजी का उत्थान हिन्दी के अवनयन से ही आरम्भ होता है क्या कोई ऐसा तन्त्र नही  विकसित किया जाना चाहिए जहां भाषा केवल एक साधन हो साध्य नही?
बहरहाल, आज सुबह की इस घटना के बाद और अंग्रेजी प्रेम के अघोर संक्रमण काल में मै तो अपनी भाषा और बोली के लिए सरंक्षण और और अधिक चिंतातुर हो गया हूँ आपका पता नही।

Tuesday, June 3, 2014

रिचार्ज

आज लेपटॉप को रिचार्ज किया जबसे गाँव आया खुद ब खुद डिस्चार्ज हो कर लगभग ऊर्जा के अंतिम छोर पर सुस्त बैठा मेरी बेरुखी की इन्तहा देख रहा था। आधे दशक के करीब से लेनेवो पुत्र मेरा लेपटॉप एक निर्विकार साथी रहा है उसकी छाती को अपने शब्द बाणों से पीटते हुए मैंने साल दर साल कहने के अभिमान में गुजारें है।
आज पहले अपना पासवर्ड भूल गया और विंडो की घेराबंदी के बीच अपनी याददाश्त टटोलता रहा कई गलत विकल्पों के बीच ठीक जीवन की तरह एक रास्ता दिखा और उसी के सहारे लेपटॉप की लगभग ढाई महीने की नीरस दुनिया में दाखिल हुआ।
तकनीकी की स्मृति मस्तिष्क की सक्रियता/तत्परता या जुड़ाव का हिस्सा हो सकती है परन्तु आज खुद के लिखे कई बेनामी दस्तावेज़ तलाशने के लिए सर्च का विकल्प प्रयोग करना पड़ा निसंदेह यह विचित्र अनुभव था लैपटॉप के भिन्न भिन्न हिस्सों में सुरक्षित मेरी निठल्ली खुराफातें आज काफी तलाशने पर मिली यह किसी पुरानी प्रेमिका के पुराने पत्र पढने जैसा अनुभव कहा जा सकता है।
कभी  सिद्ध समाधि की अवस्था में मेरी छाती पर अखंड शिवलिंग की भाँति प्राण प्रतिष्ठिता को जीने वाली मेरी यह ई पेटी आज चार्जिंग की औपचारिकता भर के लिए खुली दोनों के लिए इसे कोई बढिया अनुभव नही कहा जा सकता है क्योंकि अब हम दोनों ही नही जानते कि कब दोबारा उसमे प्राण फूंके जाएंगे शायद किसी दिन दुनियादारी की परवाह से बेपरवाह होकर उसको फिर गुलज़ार करूं मगर ये दिन निसंदेह फिर उसके ऊर्जाविहीन होने पर ही आएगा अपने बुरे दिनों के अच्छे साथी रहे इस लैपटॉप की इस दुर्गति पर मै शर्मिंदा हूँ माफी इसलिए यहाँ मांग रहा हूँ क्योंकि तुम सुन नही सकते और मै कह नही सकता।

Saturday, May 17, 2014

चासनी

घृणा और प्रेम दोनों ही मनुष्य की अपनी स्वभावगत अनुकूलता और प्रतिकूलता द्वारा बनाएं गए प्रतिमान है। जो हमारी मानसिक सुविधा अथवा अनुकूलता के हिसाब से फिट नही बैठता तो घृणा का पात्र बना देना और जो हमारी मानसिक सुविधा के अनुकूल है उसे प्रेम की चासनी में डूबो देना इंसानी फितरत का हिस्सा है।
मनुष्य बेहद चालाक प्राणी है युक्तियाँ गढना उसका पुराना शगल रहा है प्रेम हो कि घृणा अन्तोत्गत्वा यह एक नैसर्गिक मनुष्य की हत्या कर उसको मन का गुलाम बना देती है। बहुत व्यापक अर्थो में देखें तो प्रेम और घृणा दोनों की संज्ञानात्मक लोच में कोई बड़ा फर्क नजर नही आता हाँ प्रतिक्रिया जरुर भिन्न होती है। प्रेम में डूबा व्यक्ति जानते हुए भी दुनिया की कटुताएं नही देख पाता और घृणा में लिप्त मनुष्य दूनिया की ख़ूबसूरती नही देख पाता। निजि तौर मै लम्बे समय तक न किसी से प्रेम कर पाता हूँ और न ही घृणा ही एक समय बाद दोनों अप्रासंगिक लगने लगती है।
अलबत्ता कई दफे तो यह भी होता है कि मनुष्य किसी से प्रेम और घृणा दोनों एक साथ करता है आध्यात्मिक मूल्यों के हिसाब से यह सहअस्तित्व और बिना सम्पादन जीवन जीने की पहली सीढ़ी हो सकती है जहां से आगे बढ़ने पर मनुष्य को न प्रेम से व्यामोह उत्पन्न होता है और न घृणा से जुगुप्सा। जीवन में कुछ लोगो की घृणा का पात्र बनने के बाद मैंने महसूस किया कि यदि इसको ईगो के हर्ट होने से अलग करने की रेसिपी आपने विकसित कर ली तो यह घृणा भरें हृदय आपके व्यक्तित्व परिष्कार में सहायक हो सकते है प्रेम जहां आपको बावरा बनाता है वहीं घृणा आपको चैतन्य बनने की प्रेरणा देती है बशर्ते किआप इसे बर्दाश्त करने की हिम्मत रखते हो।

Saturday, May 10, 2014

मुक्ति

आज कई पूर्व मित्रों को ब्लॉक के फंदे से मुक्त किया कुछ को रिक्वेस्ट भी भेजी फिर से जुड़ने की एकाध लोगो ने स्वीकार भी की। कई दिनों से यह इनर कॉल आ रही थी कि उन मित्रों को ब्लॉक करना एक किस्म का पलायन है जिनसे मात्र कुछ निजि मतभेद/मनभेद हो गए थे। ब्लॉक किए कुछ मित्रों से मेरे आत्मीय रिश्तें भी रहे थे मगर कुछ वक्त और हालात ऐसे बने कि उनकी शक्ल देखने में भी बैचेनी होने लगी थी परन्तु वक्त के बीतने और मन के रीतने के बाद लगने लगा कि महज़ ईगो को खुराक देने के लिए किसी ब्लॉक करना उचित नही है मनुष्य की अपनी मानवीय कमजोरी होती है वह किस लम्हें में कमजोर पड़ जाए कुछ कहा नही जा सकता है मनुष्य होने के नाते मेरा फ़र्ज इंसानी कमजोरी को देखने सीखने और उससे गुजरने भर का अधिक है।
मुझे यह भी बोध है कि मेरा यह कदम उन मित्रों की नजर में मुझे कमजोर साबित कर सकता है उनका ईगो लहरा कर झूम सकता है कि बड़ा तुर्रम खां बनता था हमें तपाक से लगभग जलील करते हुए ब्लॉक कर दिया था हालांकि उस वक्त वह वक्त की क्रुर मांग थी मै किसी को ब्लॉक नही करना चाहता था।
परन्तु यह कार्य भी मेरी एक सहज इनर कॉल की अभिप्रेरणा से सम्पन्न हुआ है इसके परिणाम जो भी हो यह करके मुझे खुशी मिली मगर मै इस खुशी को एक नए इगो की खुराक नही बनने दूंगा कि देखो ! मै कितना महान हूँ क्योंकि मै लोगो को क्षमा करना और फिर झुकना जानता हूँ।
मुझे राहत इस बात की भी है कि मै मन में किसी पूर्व मित्र के प्रति मैल मालिन्य नही लेकर जा रहा हूँ यह न क्षमा करने का भाव है और न ही झुकने जैसा यह अपनी अपरिपक्वता पर हंसने और यात्रा को आगे जारी रखने का अवसर और प्रयास मात्र है इसके बाद भी जो लोग नही जुड़ पाते है उसका एक मात्र यही अर्थ निकाला जा सकता है कि वो आपके अस्तित्व का हिस्सा नही है। 

Sunday, April 27, 2014

राफ्ता

पिताजी के निधन के बाद जब से गाँव लौटा हूँ ज्यादा कुछ लिखने का मन नही होता है यहाँ तक कमेन्ट करने का भी नही। लेकिन हाँ पढ़ने का लोभ जरुर बना रहता है अपने दौर बेहतरीन लोगो से राफ्ता फेसबुक के जरिए भी बना है उनको पढ़कर अच्छा लगता है लेकिन फेसबुक का न्यूज़ फीड में पोस्ट दिखाने का तन्त्र बहुत मतलबी किस्म का है मसलन हम जिन मित्रों की पोस्ट पर कमेन्ट करना बंद कर देते है यह उनकी पोस्ट आपकी फीड में दिखाना बंद कर देता है यानि किसी का लिखा अगर केवल पढना भर भी है तो आपको लाइक या कमेंट की अनिवार्यता से गुजरना होगा वरना जुकरबर्ग के यांत्रिक चेले आपको उस मित्र के लिए और उस मित्र को आपके लिए स्वत: अप्रासंगिक मानकर दोनों की पारस्परिक लिखने पढ़ने की लाइन काट देंगे।
कई मित्रों की पोस्ट जब नदारद दिखने लगी तो पहले सोचा कि शायद वो व्यस्त है लिख नही रहे होंगे परन्तु जब उनकी प्रोफाइल देखी तो पाया कि वो नियमित रूप से लिख रहे है बस मुझे खबर नही वजह की पड़ताल करने पर पता चला कि उनकी पोस्ट्स पर मेरी हाजिरी नही लगी तो फेसबुक ने उनके लिए मुझे आउटडेटड समझ लिया।
हालांकि यह पूरी तरह से तकनीकी मसला है लेकिन यह मानवीय स्वभाव जैसा ही है। मुझे फिलहाल तो प्रो.वसीम बरेलवी का यह शे'र याद आ रहा है कोई इसे जुकरबर्ग के कान में भी फूँक दे तो कुछ भला हो--
मै उसके घर नही जाता वो मेरे घर नही आता
मगर इन एतिहातों से ताल्लुक मर नही जाता।

Saturday, April 26, 2014

कुछ दोस्त

कुछ दोस्त कोरा मतलब पड़ने पर ही शिद्दत से याद आते है मुसीबत के वक्त में जब गर्दन शिकंजे में फंसी हुई होती है तब ऐसे दोस्त खुदा की माफिक याद आते है निजि तौर पर दुनियादारी और सम्बंध बचाने के शिष्टाचार में भी उनको इतना अपना मान लिया जाता है कि यदा-कदा ही इनसे बात हो पाती है लेकिन ऐन वक्त पर ऐसे यारबाश दोस्त काम आ जाते है और हमें मुश्किल दौर से निकाल लेते है और निकाल भी न पाए तो भी न जाने किस लिहाज़ के चलते अपनी जान तो लड़ा ही देते है जबकि कुछ दोस्त जो रोजमर्रा की जिन्दगी में सम्वाद से लेकर वाद-विवाद तक में शामिल रहते है जिनसे अक्सर मुलाक़ात होती रहती है लेकिन वो केवल हमारी शिकंजे में फंसी गर्दन के दर्शक भर हो सकते है या हमारे पुरुषार्थी होने के व्याख्याता परन्तु वो मुश्किल दौर में मदद करने की काबलियत नही रखते है। हर इन्सान की जिन्दगी में ऐसे दोनों किस्म के दोस्त होते है ये दोनों किस्म के दोस्त कभी आपस में नही मिल पातें क्योंकि इनके बीच में हम पहाड़ की भांति खड़े रहते है इनमे से एक को पहाड़ की चोटी दिखाई देती है तो दूसरे को मात्र घाटी । दोनों किस्म के दोस्तों की जरूरत इंसान को रहती है एक यह जरूरत ही दोस्त की खोज़ और दोस्ती का व्याकरण तय करती है।

Saturday, April 19, 2014

युद्ध

हर इंसान भरा हुआ है वह कहने के लिए तत्पर और व्याकुल प्रतीत होता है उनकी अभिव्यक्तियाँ जहर-अमृत के घोल में डूबी हुई आहें और कराहें है। विचार सोच और सम्वेदनाओं के अपने अपने साम्राज्य है हम में से कुछ का दावा चक्रवर्ती राजा होने या बनने का है जबकि कुछ अभी छोटी रियासतों के माफिक सियासत कर रहें है उनकी बात अपने को सुरक्षित करने और बड़े राजा की स्तुतिगान करने की अधिक प्रतीत होतीहै। यहाँ युद्ध जैसा उन्माद हमारे जीने का हिस्सा है अभिव्यक्ति के रणक्षेत्र में षडयंत्र,संधि,अय्यारी सब कुछ समानान्तर  चल रहा है। सामंती व्यवस्था के विरोध में जिनके गले बुलंद है वो खुद चाहते है उनकी बात की गुणवत्ता पर सिप्पेसलाहरों की पूरी फौज तैयार हो और अपनी जान लड़ा दें ताकि वे इस अभिमान में जी सके कि उनकी वाग्मिता वंचितों के हित में थी। देशभक्ति और बगावत दोनों के पैमाने लिखने और कहने से तय हो रहे है श्रेष्ठ विचार गहरी सम्वेदना और समूह की पीड़ा रचने के योद्धा अपने बख्तरबंद को कसते है बार-बार क्योंकि यह उनकी निजि कमजोरी के चलते ढीला हो जाता है।
अमात्य बैचेन है वह संधि प्रस्ताव की भाषा से सन्तुष्ट नही है क्योंकि उसमें अहम के हनन का न्यायोचित संतुलन नही सध रहा है।
इस दौर में, जहां सारी ऊर्जा सारा तन्त्र और यहाँ तक आपकी विजय दूसरे को विचार,सोच,सम्वेदना के स्तर पर ठीक उतना लाचार देखना चाहती हो कि वह आपकी बात पर लगभग निहत्था होकर आत्म समर्पण कर दें और आप उसे जीवनदान न देकर उसे हीनता का श्राप देकर अगले राज्य की चढाई की तैयारी में लग जाएं मै अपनी पराजय स्वीकार करता हूँ क्योंकि उधार के हथियारों से मै उसके लिए लड़ रहा था जिसके लिए मेरी निष्ठा सदैव संदिग्ध रही है मैंने हथियार डर कर नही डाले बल्कि मैंने अभी कुछ मौन लोगो को हम वाक् विलासी लोगो को देखकर हंसते हुए देखा है उनकी हंसी हमारी हंसी से बिलकुल अलग थी उनके हंसने में एक महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगी कि वो केवल हंस रहे थे और हम अपने चेहरें की कसावट को हंसी समझ बैठे थे।
मेरे समय में कोई बुद्ध नही है और न मै अशोक जैसा वैचारिक क्रान्ता हूँ परन्तु मौन लोगो को देखकर  मेरी लिपि अस्त व्यस्त हो गई है मै शब्दों के विन्यास में चातुर्य भूल गया हूँ परन्तु मै अभी तक आत्म मुग्ध हूँ क्योंकि युद्धोन्माद में सबसे पहले मैंने उन्हें देखा जबकि ठीक उसी समय पर मेरी गर्दन पर एक तलवार थी परन्तु मै बच गया इसलिए यह लिख पाया।