Saturday, May 17, 2014

चासनी

घृणा और प्रेम दोनों ही मनुष्य की अपनी स्वभावगत अनुकूलता और प्रतिकूलता द्वारा बनाएं गए प्रतिमान है। जो हमारी मानसिक सुविधा अथवा अनुकूलता के हिसाब से फिट नही बैठता तो घृणा का पात्र बना देना और जो हमारी मानसिक सुविधा के अनुकूल है उसे प्रेम की चासनी में डूबो देना इंसानी फितरत का हिस्सा है।
मनुष्य बेहद चालाक प्राणी है युक्तियाँ गढना उसका पुराना शगल रहा है प्रेम हो कि घृणा अन्तोत्गत्वा यह एक नैसर्गिक मनुष्य की हत्या कर उसको मन का गुलाम बना देती है। बहुत व्यापक अर्थो में देखें तो प्रेम और घृणा दोनों की संज्ञानात्मक लोच में कोई बड़ा फर्क नजर नही आता हाँ प्रतिक्रिया जरुर भिन्न होती है। प्रेम में डूबा व्यक्ति जानते हुए भी दुनिया की कटुताएं नही देख पाता और घृणा में लिप्त मनुष्य दूनिया की ख़ूबसूरती नही देख पाता। निजि तौर मै लम्बे समय तक न किसी से प्रेम कर पाता हूँ और न ही घृणा ही एक समय बाद दोनों अप्रासंगिक लगने लगती है।
अलबत्ता कई दफे तो यह भी होता है कि मनुष्य किसी से प्रेम और घृणा दोनों एक साथ करता है आध्यात्मिक मूल्यों के हिसाब से यह सहअस्तित्व और बिना सम्पादन जीवन जीने की पहली सीढ़ी हो सकती है जहां से आगे बढ़ने पर मनुष्य को न प्रेम से व्यामोह उत्पन्न होता है और न घृणा से जुगुप्सा। जीवन में कुछ लोगो की घृणा का पात्र बनने के बाद मैंने महसूस किया कि यदि इसको ईगो के हर्ट होने से अलग करने की रेसिपी आपने विकसित कर ली तो यह घृणा भरें हृदय आपके व्यक्तित्व परिष्कार में सहायक हो सकते है प्रेम जहां आपको बावरा बनाता है वहीं घृणा आपको चैतन्य बनने की प्रेरणा देती है बशर्ते किआप इसे बर्दाश्त करने की हिम्मत रखते हो।

Saturday, May 10, 2014

मुक्ति

आज कई पूर्व मित्रों को ब्लॉक के फंदे से मुक्त किया कुछ को रिक्वेस्ट भी भेजी फिर से जुड़ने की एकाध लोगो ने स्वीकार भी की। कई दिनों से यह इनर कॉल आ रही थी कि उन मित्रों को ब्लॉक करना एक किस्म का पलायन है जिनसे मात्र कुछ निजि मतभेद/मनभेद हो गए थे। ब्लॉक किए कुछ मित्रों से मेरे आत्मीय रिश्तें भी रहे थे मगर कुछ वक्त और हालात ऐसे बने कि उनकी शक्ल देखने में भी बैचेनी होने लगी थी परन्तु वक्त के बीतने और मन के रीतने के बाद लगने लगा कि महज़ ईगो को खुराक देने के लिए किसी ब्लॉक करना उचित नही है मनुष्य की अपनी मानवीय कमजोरी होती है वह किस लम्हें में कमजोर पड़ जाए कुछ कहा नही जा सकता है मनुष्य होने के नाते मेरा फ़र्ज इंसानी कमजोरी को देखने सीखने और उससे गुजरने भर का अधिक है।
मुझे यह भी बोध है कि मेरा यह कदम उन मित्रों की नजर में मुझे कमजोर साबित कर सकता है उनका ईगो लहरा कर झूम सकता है कि बड़ा तुर्रम खां बनता था हमें तपाक से लगभग जलील करते हुए ब्लॉक कर दिया था हालांकि उस वक्त वह वक्त की क्रुर मांग थी मै किसी को ब्लॉक नही करना चाहता था।
परन्तु यह कार्य भी मेरी एक सहज इनर कॉल की अभिप्रेरणा से सम्पन्न हुआ है इसके परिणाम जो भी हो यह करके मुझे खुशी मिली मगर मै इस खुशी को एक नए इगो की खुराक नही बनने दूंगा कि देखो ! मै कितना महान हूँ क्योंकि मै लोगो को क्षमा करना और फिर झुकना जानता हूँ।
मुझे राहत इस बात की भी है कि मै मन में किसी पूर्व मित्र के प्रति मैल मालिन्य नही लेकर जा रहा हूँ यह न क्षमा करने का भाव है और न ही झुकने जैसा यह अपनी अपरिपक्वता पर हंसने और यात्रा को आगे जारी रखने का अवसर और प्रयास मात्र है इसके बाद भी जो लोग नही जुड़ पाते है उसका एक मात्र यही अर्थ निकाला जा सकता है कि वो आपके अस्तित्व का हिस्सा नही है। 

Sunday, April 27, 2014

राफ्ता

पिताजी के निधन के बाद जब से गाँव लौटा हूँ ज्यादा कुछ लिखने का मन नही होता है यहाँ तक कमेन्ट करने का भी नही। लेकिन हाँ पढ़ने का लोभ जरुर बना रहता है अपने दौर बेहतरीन लोगो से राफ्ता फेसबुक के जरिए भी बना है उनको पढ़कर अच्छा लगता है लेकिन फेसबुक का न्यूज़ फीड में पोस्ट दिखाने का तन्त्र बहुत मतलबी किस्म का है मसलन हम जिन मित्रों की पोस्ट पर कमेन्ट करना बंद कर देते है यह उनकी पोस्ट आपकी फीड में दिखाना बंद कर देता है यानि किसी का लिखा अगर केवल पढना भर भी है तो आपको लाइक या कमेंट की अनिवार्यता से गुजरना होगा वरना जुकरबर्ग के यांत्रिक चेले आपको उस मित्र के लिए और उस मित्र को आपके लिए स्वत: अप्रासंगिक मानकर दोनों की पारस्परिक लिखने पढ़ने की लाइन काट देंगे।
कई मित्रों की पोस्ट जब नदारद दिखने लगी तो पहले सोचा कि शायद वो व्यस्त है लिख नही रहे होंगे परन्तु जब उनकी प्रोफाइल देखी तो पाया कि वो नियमित रूप से लिख रहे है बस मुझे खबर नही वजह की पड़ताल करने पर पता चला कि उनकी पोस्ट्स पर मेरी हाजिरी नही लगी तो फेसबुक ने उनके लिए मुझे आउटडेटड समझ लिया।
हालांकि यह पूरी तरह से तकनीकी मसला है लेकिन यह मानवीय स्वभाव जैसा ही है। मुझे फिलहाल तो प्रो.वसीम बरेलवी का यह शे'र याद आ रहा है कोई इसे जुकरबर्ग के कान में भी फूँक दे तो कुछ भला हो--
मै उसके घर नही जाता वो मेरे घर नही आता
मगर इन एतिहातों से ताल्लुक मर नही जाता।

Saturday, April 26, 2014

कुछ दोस्त

कुछ दोस्त कोरा मतलब पड़ने पर ही शिद्दत से याद आते है मुसीबत के वक्त में जब गर्दन शिकंजे में फंसी हुई होती है तब ऐसे दोस्त खुदा की माफिक याद आते है निजि तौर पर दुनियादारी और सम्बंध बचाने के शिष्टाचार में भी उनको इतना अपना मान लिया जाता है कि यदा-कदा ही इनसे बात हो पाती है लेकिन ऐन वक्त पर ऐसे यारबाश दोस्त काम आ जाते है और हमें मुश्किल दौर से निकाल लेते है और निकाल भी न पाए तो भी न जाने किस लिहाज़ के चलते अपनी जान तो लड़ा ही देते है जबकि कुछ दोस्त जो रोजमर्रा की जिन्दगी में सम्वाद से लेकर वाद-विवाद तक में शामिल रहते है जिनसे अक्सर मुलाक़ात होती रहती है लेकिन वो केवल हमारी शिकंजे में फंसी गर्दन के दर्शक भर हो सकते है या हमारे पुरुषार्थी होने के व्याख्याता परन्तु वो मुश्किल दौर में मदद करने की काबलियत नही रखते है। हर इन्सान की जिन्दगी में ऐसे दोनों किस्म के दोस्त होते है ये दोनों किस्म के दोस्त कभी आपस में नही मिल पातें क्योंकि इनके बीच में हम पहाड़ की भांति खड़े रहते है इनमे से एक को पहाड़ की चोटी दिखाई देती है तो दूसरे को मात्र घाटी । दोनों किस्म के दोस्तों की जरूरत इंसान को रहती है एक यह जरूरत ही दोस्त की खोज़ और दोस्ती का व्याकरण तय करती है।

Saturday, April 19, 2014

युद्ध

हर इंसान भरा हुआ है वह कहने के लिए तत्पर और व्याकुल प्रतीत होता है उनकी अभिव्यक्तियाँ जहर-अमृत के घोल में डूबी हुई आहें और कराहें है। विचार सोच और सम्वेदनाओं के अपने अपने साम्राज्य है हम में से कुछ का दावा चक्रवर्ती राजा होने या बनने का है जबकि कुछ अभी छोटी रियासतों के माफिक सियासत कर रहें है उनकी बात अपने को सुरक्षित करने और बड़े राजा की स्तुतिगान करने की अधिक प्रतीत होतीहै। यहाँ युद्ध जैसा उन्माद हमारे जीने का हिस्सा है अभिव्यक्ति के रणक्षेत्र में षडयंत्र,संधि,अय्यारी सब कुछ समानान्तर  चल रहा है। सामंती व्यवस्था के विरोध में जिनके गले बुलंद है वो खुद चाहते है उनकी बात की गुणवत्ता पर सिप्पेसलाहरों की पूरी फौज तैयार हो और अपनी जान लड़ा दें ताकि वे इस अभिमान में जी सके कि उनकी वाग्मिता वंचितों के हित में थी। देशभक्ति और बगावत दोनों के पैमाने लिखने और कहने से तय हो रहे है श्रेष्ठ विचार गहरी सम्वेदना और समूह की पीड़ा रचने के योद्धा अपने बख्तरबंद को कसते है बार-बार क्योंकि यह उनकी निजि कमजोरी के चलते ढीला हो जाता है।
अमात्य बैचेन है वह संधि प्रस्ताव की भाषा से सन्तुष्ट नही है क्योंकि उसमें अहम के हनन का न्यायोचित संतुलन नही सध रहा है।
इस दौर में, जहां सारी ऊर्जा सारा तन्त्र और यहाँ तक आपकी विजय दूसरे को विचार,सोच,सम्वेदना के स्तर पर ठीक उतना लाचार देखना चाहती हो कि वह आपकी बात पर लगभग निहत्था होकर आत्म समर्पण कर दें और आप उसे जीवनदान न देकर उसे हीनता का श्राप देकर अगले राज्य की चढाई की तैयारी में लग जाएं मै अपनी पराजय स्वीकार करता हूँ क्योंकि उधार के हथियारों से मै उसके लिए लड़ रहा था जिसके लिए मेरी निष्ठा सदैव संदिग्ध रही है मैंने हथियार डर कर नही डाले बल्कि मैंने अभी कुछ मौन लोगो को हम वाक् विलासी लोगो को देखकर हंसते हुए देखा है उनकी हंसी हमारी हंसी से बिलकुल अलग थी उनके हंसने में एक महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगी कि वो केवल हंस रहे थे और हम अपने चेहरें की कसावट को हंसी समझ बैठे थे।
मेरे समय में कोई बुद्ध नही है और न मै अशोक जैसा वैचारिक क्रान्ता हूँ परन्तु मौन लोगो को देखकर  मेरी लिपि अस्त व्यस्त हो गई है मै शब्दों के विन्यास में चातुर्य भूल गया हूँ परन्तु मै अभी तक आत्म मुग्ध हूँ क्योंकि युद्धोन्माद में सबसे पहले मैंने उन्हें देखा जबकि ठीक उसी समय पर मेरी गर्दन पर एक तलवार थी परन्तु मै बच गया इसलिए यह लिख पाया।

Friday, April 18, 2014

रिपोर्ट

इस वक्त अपनी खेत की मेढ़ पर बैठा अपने स्मार्ट फोन से यह बात लिख रहा हूँ लेकिन महज़ स्मार्टफोन होने भर से आप स्मार्ट नही हो जाते गाँव के जीवन में यह बात साफ़ पता चलती है अब से एक घंटे पहले टीवी देख रहा था और टीवी पर खबरें।
बचपन से भूगोल की किताबों और हिन्दी के निबन्धों में देश को कृषि प्रधान पढ़ते लिखते और रटते आयें है लेकिन अब मुझे नही लगता यह देश कृषि प्रधान है सीधे-सीधे यह देश एक पूंजीप्रधान देश है अफ़सोस इस बात का भी होता है कि देश की सभ्यता एवं संस्कृति की रक्षा प्रचार प्रसार और अधिकार का कॉपीराईट एक ख़ास विचारधारा के पास है जिनका बुनियादी सरोकार देश की न नब्ज़ को जानता समझता है और उसकी प्राथमिकता में वो लोग है जिसे सीधे तौर भारतीय रह गए है जिनका इंडियनकरण नही हुआ है।
बात फिर से खबरों की, लगभग सभी न्यूज़ चैनल पर खबर चल रही है कि दिल्ली में हुई बारिश मौसम हुआ सुहावना विजुअल्स में लोग खुश दिख रहे है मस्ती करते हुए भी दिख रहे है यह महानगरीय जीवन का सच या नजरिया कह सकते है मगर ठीक इसके उलट कृषि प्रधान देश का मेरे जैसा किसान और मेरे गाँव के दूसरे किसान पिछले दो दिन से इस सुहावने मौसम से आतंकित है गाँव के बुजुर्ग अपनी स्मृतियों के हवाले से बता रहें है ऐसा 'सम्बत्त' (साल) पहली बार देखा है हमारी पारस्परिक चर्चाएँ भी कुदरत के इस बदलते मिज़ाज को लेकर चिंता का ही विमर्श है परन्तु मेरे और मेरे आसपास के लोगो के पास कोई तन्त्र नही है कि वो किसी मौसम वैज्ञानिक से अपनी चिंताएं सांझा कर सके।
टीवी मौसम के सुहावने होने की ख़बर दिखाए इससे मुझे क्या ऐतराज़ होगा लेकिन कम से कम एक खबर मौसम के इस 'मारक' पक्ष भी तो बनती है पत्रकारिता के पाठ तो यही कहते है लेकिन यह पक्ष टीआरपी का नही है यह पक्ष व्यूवर चॉइस का नही है इसलिए हाशिए पर है खैर...!
गेंहू की कटाई का समय है फसल पकी खडी है कुछ ने कटाई भी की है लेकिन दो दिन की बारिश ने उसको खेत में ही तर कर दिया अब गेहूं का वजन भी कम होगा और गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। चीनी मिल बंद होने वाली है आपको शायद ही यकीन हो अभी तक किसानों को 15 जनवरी तक गन्ना भुगतान मिला है देश के गरीब किसान की लगभग चार महीने की बिना ब्याज की उधारी है चीनी मिल मालिको पर बकाया है जिनके सीइओ मर्सीडिज़ में चलते है और बच्चे विदेशों में पढ़ते है। किसान बचा हुआ गन्ना जल्दी मिल मालिक को देकर मुक्त होने की चाह में है ताकि गेहूं काट सके और मिल लगभग दुत्कारती हुई गन्ना लेती है आज की तारीख में जो गन्ना जा रहा है उसका भुगतान नवम्बर पहले किसी हालत में नही होगा जैसाकि गत पेराई सत्र का इतिहास कहता है। लगभग एक महीना गाँव में रहते हुए हो गया है अपने अनुभवों के आधार पर यही कह सकता हूँ कि किसान को कोई सम्मानजनक ढंग से ट्रीट नही करता है चाहे वह मिल हो, सहकारी समिति हो,तहसील हो या फिर बैंक हो। बैंक से याद आया कि गन्ना भुगतान देते समय बैंक मैनेजर ऐसे तानाशाह की माफिक बात करता है जैसे खुद की जेब से पैसा बाँट रहा हो कई कई दिन मिल से पैसा सहकारी गन्ना समिति में अटका रहता है फिर बैंक तीन चार दिन खातों को अपडेट करने के नाम पर लटकाता है कुल मिलाकर हालात काफी खराब है।
चारो तरफ ढोल बज रहे है चलो मै भी मान लेता हूँ कि अच्छे दिन आने वाले है ! गाँव देहात का आदमी आखिर मानकर ही जीवन बिता देता है यह आस ही उसे कभी निराश नही होने देती कि एक दिन उसका भी वक्त बदलेगा।

खेती बाड़ी देहात की रिपोर्ट...

Thursday, March 13, 2014

उपक्रम

मेरी कला के सारे उपक्रम तुम्हे पाने के साधन बनने ही वाले थे कि अस्तित्व ने अपना खेल रच दिया उसकी हितकामना मेरे सृजन के उचित प्रयोग के लिए थी यह एक स्तुति और उपमा करने वाले भाट बनने से रोकने का एक समयोचित हस्तक्षेप भी कहा या समझा जा सकता है। कला और काव्य की मेधा जनपीड़ा की अभिव्यक्ति का जरिया बनें यही प्रकृति भी चाहती है लेकिन तुमने उसको अपना मानवीय कमजोरियों की हितपूर्ति का साधन बनाया मुझे अफ़सोस इस बात का कि तुम्हारी कमजोरी स्नेह की अभिलाषा मात्र थी तुम यह भूल गए कि रिक्त तिक्त और साफ़ मन के उपजे निर्वात को भरने के लिए इस मायावी दुनिया में किसी के पास समय नही होता और सबसे बड़ी बात पल पल ठगी हुई दुनिया में विश्वास नही होता है। यही विश्वास की कमी तुम्हे हर बार छलती रहेगी तुम शापित हो छले जाने के लिए। दुनिया में जीने का सीधा मतलब होता है इतना धूर्त होना कि तुम्हारी सच्चाई कोई न सूंघ सके तुम्हारी अभिव्यक्ति में इतना शातिरपना होना चाहिए कि उसमे कोई अपनी उपयोगिता या अपने मतलब की चीजें सतत ढूंढ सके।
तुमने सच कहा और पकड़े गए संदेह की कसौटी पर न जाने कितनी बार कसने के बाद भी तुम कृपांक से उत्तीर्ण हो पाए मेरी नजरों में तुम सीधे तौर पर फेल हुए हो इंसानों को समझने की कक्षा में।
हे ! पराजित और ढपोरशंखी इंसान यदि जरा व्यवहारिकता और अपने फन का सम्मान तुम्हारे अंदर जिन्दा है तो उठाओ अपना झोला इस स्कूल से और अपने हिस्से की जुगुप्सा और वितृष्णा को भोगकर बुद्ध बन जाओ तभी इस मतलबी दुनिया में कुछ दिन जिन्दा रह सकोगे अन्यथा दूसरो के अनुभव की परिणिति बन भोगते रहो न समझे जाने जाने का दंश दोनों ही हालात में चयन तुम्हारा होगा सोच लो अगर दुनियादारी के हादसों के बाद तुम्हारे अंदर सोचने की हिम्मत बची है।

Wednesday, February 26, 2014

चाहतों मे कंफ्यूजन का होना....




इंसान की फितरत में सीधी जिन्दगी जीने की चाह भी शामिल है कंफ्यूजन कोई नही चाहता है लेकिन वक्त और हालात आदमी को किस कदर कंफ्यूज्ड कर सकते है उसका भी ठीक-ठीक अन्दाजा लगा पाना बेहद मुश्किल काम है। कंफ्यूजन दरअसल एक खास किस्म की प्रतिभा से भी पैदा होता है और वह प्रतिभा है एक अस्तित्व में कई अस्तित्व की परत-दर-परत का जमा होना मनुष्य का जीवन खुद मे इतना बहुफलकीय किस्म का होता है उसमे किस्म-किस्म की संभावना सदैव बची रहती है। कंफ्यूजन की जड में गतिशीलता और चैतन्यता भी शामिल है मसलन जो व्यक्ति चैतन्य है वह संतुष्टि की लोक प्रचलित परिभाषा का सदैव ही अतिक्रमण करता पाया जाता है यहाँ तक लोक की भौतिक उपलब्धियां भी उसे एक खास सीमा तक ही तुष्ट कर पाती है। इसी वजह से मन में स्थिर प्रज्ञता के भाव भी जन्म नही ले पाते है व्यक्ति भौतिक चीजो की तरफ आकर्षित होता है उन्हे पाना चाहता है अपने पुरुषार्थ से उसे प्राप्त भी करता है लेकिन समानांतर उसके मन में असंतुष्टि की बेल उपलब्धियों की दीवार पर चढती रहती है फिर इसी बेल का मानसिक फल होता है कंफ्यूजन।
यदि जीवन में संतुष्टि का भाव पा लिया तो फिर तो आप आध्यात्म की भाषा सिद्ध या वीतरागी होने के श्रेणी में है असंतुष्टि का होना भर ही इस बात का प्रतीक है अभी आप मार्ग पर है मंजिल पर नही पहूंचे और शायद मंजिल जैसी कोई चीज़ होती भी नही है यदि आप किसी मंजिल पर रुक कर जडता को प्राप्त कर जाते है तो फिर वो मंजिल आपके लिए बाधा है इसलिए खुद की अपेक्षाओं, उपलब्धियों पर एक प्रश्नचिंह लगाकर आगे बढना एक ठीक मार्ग हो सकता है जहाँ आप मार्ग की यात्रा का आनंद ले सके जहाँ आपको कही पहूंचना न हो साथ ही कोई मंजिल आपको तुष्टि न दे  एक कंफ्यूज़न सदैव आपको बना रहा हालांकि यहाँ कंफ्यूज़न आपको गलत मार्ग या दिशा मे भी ले जा सकता है इसलिए सबसे पहले खुद के कंफ्यूजन को साधना पडेगा ताकि आप उसके मूल्य को ग्रहण कर सके आप उसकी उपस्थिति में दुविधा की बजाए नए विकल्पों पर विचार करते पाए जायें ऐसे में कंफ्यूजन का होना आपके लिए एक साध्य बन सकता है।
कंफ्यूजन आपको आत्ममुग्धता से बचा सकता है यह आपको प्रेरित कर सकता है अपने अस्तित्व के अमूर्त केन्द्रों को विकसित करने तथा उनका प्रयोग करने के लिए साथ ही कंफ्यूजन के फ्यूजन से आप आंतरिक अस्तित्व की ऊर्जा का मंथन कर चमत्कारिक विस्फोट कर सकते है अपने व्यक्तित्व को नई विमाएं प्रदान कर सकते है। सामान्यत: एक असामान्य और नकारात्मक पद प्रतीत होने वाला कंफ्यूजन आपके अन्दर सुषुप्त पडी असंख्य संभावनाओं की पौध तैयार कर सकता है जिसकी मदद से आप अपने सपनों की कलम अपने हिसाब से कैसी भी परिस्थिति में चढा सकते है और प्रकृति मनुष्य के इस पुरुषार्थ को देखकर कितनी आनंदित महसूस करेगी उसकी कल्पना आपको जीवन के नए अर्थ दे सकती है यदि आप चेतना और संवेदना सम्पन्न है तो अपने कंफ्यूज्ड होने पर मुस्कुरा जरुर सकते है ईश्वर को धन्यवाद दे सकते है कि आपको उसने बहुसंभावनाओं से युक्त समझा यह किसी दिव्य आशीर्वाद से कम नही है जैसे इस समय मै मुस्कुरा रहा हूं और ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित कर रहा हूं।

Monday, February 24, 2014

खुला खत बंद लिफाफे में....


 
इंटरनेट,ई-मेल,इनबॉक्स,फेसबुक की दुनिया भी उस खत की जरुरत को कम न कर सकी जो खत दिल में लिखा गया और दिल के डाकखाने में  बिना पोस्ट किए ही उसको जला दिया गया जिसकी आंच में कतरा-कतरा दिल पिघलता रहा दिल का आकार अब रेखीय हो चला है कुछ-कुछ हमारी तुम्हारी जिन्दगी सा। दो समानांतर रेखाओं के बीच उगे हमारे रिश्तें देखने में जितने हरे भरे है दरअसल वो  अन्दर से उतने ही खरपतवार से उलझे हुए भी है दिल और दिमाग की लडाई सदियों पुरानी लडाई है इश्क और जंग मे जायज़ या नाजायज़ होने की बात भी मै अब नही कहूंगा क्योंकि हमारा ताल्लुक इश्क नही है और न ही हमारा कोई याराना है लेकिन एक दूसरे की फिक्र मे शामिल हमारी फिक्र डूबते सूरज़ की तरह उदास दिख जरुर रही है मगर उनमे सुबह के जैसी ताजगी और सच्चाई है यह रिश्ता कोई कारोबारी दोपहर के जैसा कभी नही रहा इसलिए रात भर यादों की परछाई हमारा पीछा करती है। बातचीत में बहुवचन का प्रयोग करना तुम्हारी वजह से मै सीख पाया हूं मेरा झूठ पकडे जाने का डर  इतना बडा कभी नही रहा खासकर स्कूल के दिनों में भी नही जब मै अपनी पॉकेटमनी के लिए जेबकतरा  हुआ करता था आज तक मेरी कोई चोरी नही पकडी गई लेकिन तुमसे कही कोई बात झूठ न निकल जाए इसकी फिक्र मुझे न जाने क्यों अपराधबोध से घेरे रखती है। वैसे तो कहे नही लेकिन जो भी युक्तियुक्त झूठ मैने कहे उसमे चालाकी नही तुम्हे खोने की फिक्र ज्यादा थी इसलिए खुद को खुद ही माफ करता रहा हूं।
एक सर्द शाम में तुमको सोचते हुए मै हांफ रहा हूं शायद मेरी गति तुमसे कई गुना अधिक है इससे पहले तुम मुझे किसी इमेज़ मे कैद कर पाओं मै अपना स्थान बदल देता हूं इस तरह से मै तुम्हे कौतुहल में डालकर खुद को मौजूं रखने की जद्दोजहद में भी हूं। तुम्हारे माथे पर जो फिक्र की चंद रेखाएं खींच आयी है मै उनकी वजह ठीक ठीक समझता हूं मेरा ऐसा होना तुम्हे चंद लम्हों की खुशी के साथ अन्दर से डरा भी देता है तुम्हे खुद के कमजोर पडने का डर लगने लगता है डरो मत ! मेरी उपयोगिता तुम्हारे जीवन में ताकत के रुप में बनी रहे कमजोरी कभी न बनें इसका इंतजाम है मेरे पास।
फिलहाल, दिल से सारे सन्देह निकाल कर उन हंसी लम्हों की जमानत लो और जीयों अपने हिस्से का सुख जिसमें मेरे अवसाद का नेपथ्य राग भी शामिल है लेकिन तुम्हारी संगत से वह भी लय में बज रहा है आरोह-अवरोह और बंद सब के सब सुर में है यहाँ सांसों की सरगम मुझे मेरी देह से बाहर खींच लाती  है और मै उन स्वर लहरियों पर सवार हो अनंत ब्रह्मांड की यात्रा पर निकल पडता हूं तभी नीचे देखता हूं तो तुम बेख्याली में बिरहन सी मुझे दुनिया में तलाशती फिर रही हो एक यही तुम्हारी व्याकुलता ही मुझे फिर से अपने देह में खींच लाती है अन्यथा तुम्हारे सत्संग ने मुझे लगभग सिद्ध बना दिया है।  
इसके बाद और कुछ लिखने को बचता है क्या अब अंतरदेशीय नीली चिट्ठी में लिख जाने वाले पुराने जुमले का प्रयोग करुंगा और विदा चाहूंगा....
थोडे लिखे को ज्यादा समझना...:)

( कहानी लिखने की असफल कोशिस से निकला एक यादगार खत)

मन की गांठे....( कोरा मनोविज्ञान)



जज़्बात इंसान के इंसान होने की सनद है एक वक्त था जब जज्बाती होना मुनासिब समझा जाता था आज के दौर में जज्बाती होना मुश्किल का सबब होना समझा जा सकता है फर्क जीवन की लय और गति का भी आ गया है आज इंसान के पास उतना वक्त नही है जिसमें वह किसी दूसरे के हिस्से के दुख और सुख को अपने जीवन मे शामिल कर सकें। रिश्तों के चयन में हमारे पास जीवन भर में ढेरो विकल्प दिखते और मिलते है उनमे से कुछ हमें करीब कुछ बेहद करीब तो कुछ महज़ औपचारिक रुप से परिचित ही बने रहे जाते है। रिश्तों की तासीर ही उनका भविष्य तय कर देती है मन हमेशा बावरा ही रहता है हम कई बार समझ नही पाते तो कई बार समझ कर अनजान बने रहना अच्छा लगता है मनुष्य की अपेक्षाओं का कारोबार और उसके मन के आंतरिक विराट खालीपन में बाह्य चीज़े उस समय तक आकर्षित करती रहती है जब तक क्या तो आप आंतरिक यात्रा पर न निकल गए आए हो या फिर संसार के इन बंधनों से मुक्त हो अपनी नई दिशा और दशा के को निर्धारित करने की जुगत मे न लगे हुए हो।
कई बार जिन्दगी मे किसी से महज़ मिलना एक संयोग होता है लेकिन उससे मिलकर जुडना आपकी नियति या प्रारब्ध कुछ भी समझा जा सकता है मनुष्य का जीवन इतना जटिल और सम्भावनाशील है कि कब कहाँ कैसे किससे क्या राग पैदा हो जाए या ठीक इसके उलट कब नजदीकियों मे दबे पांव दूरियां दस्तक दे दें कुछ भी कहा नही जा सकता है।
प्रेम,स्त्री और जीवन तीनो को समझने के सबके अपने-अपने पैमाने हो सकते है लेकिन दर्शन कहता है कि तीनो ही जीवंत ऊर्जा के केन्द्र है अत: इनके विश्लेषण मे अपनी ऊर्जा का अपव्यय मत करों यदि आपके पास इतना समय, साहस और सच्चे लोग है तो फिर आपको इन तीनो को जी भर कर जीना चाहिए। जीवन का कोई भी भाव स्थाई हो ही नही सकता है इसलिए सकार और नकार की संभावनाएं सदैव ही बनी रहती है कई बार जीवन मे अंजान लोग सच्ची खुशी देकर चले जाते तो कई बार अपने अजीज़ भी ऐसा तल्ख तजरबा दे जाते है कि उसकी टीस रह रह ताउम्र सालती रहती है।
मन का अपना अलग मनोविज्ञान है यह तर्क से परे और अपनेपन की संवेदना की चासनी में डूबा रहता है भले ही अन्दर से कडवी परत-दर-परत जमा हो लेकिन बाह्य स्नेह,अनुराग इसको निसन्देह ऊर्जा तो देता है यह वह पल होता है जब दुनियादारी के झंझावतों से जूझता मानव का मन एक पल के ईश्वर को धन्यवाद देना चाहता है कि वह अपने दौर के सबसे बेहतरीन लोगो के बीच है लेकिन अपेक्षाओं के शुष्क जंगल मे खोए जाने का भय भी उतना ही शाश्वत है क्योंकि मनुष्य का स्वभाव लोचयुक्त होता है वह कब कहाँ कैसे अर्द्धचेत,अवचेतन से प्रेरित हो पलायन या उपेक्षा के भाव से भर जाए कहा नही जा सकता है लोक मे ऐसे द्वन्द से रुबरु होना हर सम्वेदनशील जीव की नियति होती है और शायद प्रारब्ध भी।
रिश्ते बनाना उन्हे जीना और फिर उन्हे संभाले रखना निसन्देह दुनिया का सबसे दुर्लभ गुण है और कुछ ही लोग इसमे कामिल होते है मै तो कम से कम नही हूं अनुभव यह भी कहते है कि लोग जितनी गति से नजदीक आते है वो एक खास सीमा के बाद अपने नजरो के नजदीक हमे दिखाई भी देने बंद हो जाते है फिर भी मनुष्य के रुप यह सबसे रोचक प्रयोग करने का अवसर हमे मिलता है कि हम अपने चयन से किसी को दोस्त तो किसी को दुश्मन और किसी को इन दोनो रिश्तों से ऊपर समझकर जीने लगते है यह एक दिलचस्प खतरा भी है क्योंकि जरुरी नही कि आप जो समझ रहे है सामने वाला भी ठीक उसी चैनल पर आपके चित्त के राग को रिसीव भी कर रहा हो लेकिन जीवन में ऐसे खतरे उठाकर ही हम नफरत और प्यार में बुनियादी भेद करना सीख पाते है...शायद। 

Sunday, February 23, 2014

हाईवे....




संडे मे दोपहर तक एक अकादमिक काम किया उसके बाद फिर अचानक से फिल्म देखने का मूड बन गया समानांतर रुप से दो मित्रो को साथ चलने का निमंत्रण एसएमएस से भेजा लेकिन संयोग से दोनों की ही अपनी-अपनी वाजिब मजबूरी थी उसके बाद अपने एक और दूसरे मित्र डॉ अनिल सैनी को उनके घर के बाहर पहूंच कर सूचना दी कि फिल्म देखने चलना है ताकि वहाँ ना की गुंजाईश न बचे वो बेचारे दोपहर की खाने के बाद की नींद के आगोश में थे लेकिन मै साधिकार आग्रह को ठुकरा न सके उन्होने पन्द्रह मिनट का समय लिया और तैयार होकर मेरे साथ हो लिए हरिद्वार में अधिकांश फिल्में हम साथ ही देखते है।
बहरहाल, ‘हाईवे’ दो भिन्न परिस्थितियों से निकल कर जाए लोगो का एक दिलचस्प सफर की कहानी है उनमे से एक पेशेवर अपराधी है और दूसरी अमीर बाप की बेटी। दो अलग-अलग पृष्टभूमि के लोगो का क्या बेहतरीन रिश्ता विकसित हो जाता है यही फिल्म का मूल कथानक है यह परिस्थिति से सफर पर निकले दो लोगो की कहानी है जिनका जितना सफर उनके साथ चलता है उतना ही उनके अतीत का सफर वो करके आए होते है फिल्म के नायक रणदीप हुड्डा( महावीर भाटी) एनसीआर के आसपास के गांव के एक गुर्जर युवा है जो अपराधी है और फिल्म की नायिका आलिया भट्ट (वीरा त्रिपाठी) एक अमीर बाप की बेटी है जिसका अपहरण महावीर भाटी कर लेता है फिर शुरु होता है उनके साथ का सफर और यह सफर निसन्देह मुझे तो बेहद रोचक लगा।
एक अमीरियत तो दूसरा गरीबी की जद में अपना अपना भोगा हुआ यथार्थ इतनी खुबसूरती से परदे पर जीवंत कर देते है कि मन द्रवित हुए बिना नही रह पाता है फिल्म में बाल यौन शोषण जैसे गंभीर और सम्वेदनशील विषयों को छुआ है इसके लिए इम्तियाज़ अली बधाई के पात्र है। विभिन्न संचार माध्यमों में फिल्म की समीक्षा तो कोई खास अच्छी नही थी लेकिन फिर भी मै इम्तियाज़ अली की वजह से ही फिल्म देखने गया कई बार आपका विश्वास किसी दूसरे के मत से बडा हो जाता है और मुझे खुशी है कि मै निराश नही हुआ।
अभिनय के लिहाज़ से रणदीप हुड्डा ने क्लासिक अभिनय किया एनसीआर मे गुर्जरों की बोली में डॉयलाग बेहद स्वाभाविक और जानदार लगे है वो महावीर भाटी के किरदार मे घुस गए है ठीक इसी तरह वीरा के किरदार मे आलिया भट्ट ने गजब का अभिनय किया है आलिया की यूएसपी उनकी मासूमियत है वो पूरी फिल्म में बेहद मासूम नजर आयी आलिया नें रोने और चीखने के कई दृश्यों में चमत्कारिक परफ़ॉरमेंस दी है निजि तौर पर थियेटर मे मै एक बात को लेकर असहज़ रहा है आलिया भट्ट कें रोने के इंटेस सीन में उनके नाक के दोनो नथुने तेजी से सिकुड और फैल रहे थे जिनका वास्तविक प्रभाव बेहद गजब का था लेकिन कुछ शहरी लोग उसमे भी हास्य निकाल कर फूहडता से हंस रहे थे एक बार मन हुआ कि उन्हे टोक दूं लेकिन थियेटर में एक दर्जन भर लोग होंगे ऐसे मे किस-किस से भिडता लेकिन समूह का ऐसा व्यवहार यह बताता है कि हम कितने संवेदनहीन हो गए है एक घनीभूत पीडा और रोने के दृश्य में लोग उस भाव को ग्रहण करने की बजाए नाक के नथुनों के खुलने-बंद होने पर ठहाके मार कर हंस रहे थे। आलिया के रोने के सीन वास्तव में बेहद मार्मिक है लेकिन शायद लोग सिनेमा हॉल में अपना भावनात्मक विरेचन करने की बजाए पैसा वसूलने की वजह से अधिक जाते है इसलिए उनका कुछ भी करना जायज़ है यह अपनी अपनी संवेदना का मसला है।
कुल मिलाकर हाईवे एक मध्यम गति की फिल्म है जिन्हे जल्दबाजी नही है और जो अच्छी लोकेशनस देखकर आंखो से लेकर दिल तक अच्छा महसूस करते है जो इमोशन को समझना और जीना  चाहते है उनके लिए यह फिल्म देखने लायक है फिल्म की स्टोरी दो अलग-अलग पृष्टभूमि के लोगो के साथ सफर पर निकलने,दिल मिलनें और बिछडने की कहानी है फिल्म का अंत थोडा असहज़ करने वाला है लेकिन इसके अलावा और अंत भी क्या हो सकता था। हाईवे में सहायक कलाकारों का भी अच्छा अभिनय है नाम याद नही आ रहा है लेकिन महावीर के हेल्पर बने ‘आडू’ नें फिल्म में अच्छा काम किया है खासकर उसका आलिया भट्ट के साथ अंग्रेजी गाने पर ठुमके लगाने का सीन अच्छा बन पडा है।
हाईवे आपको तभी पसन्द आएगी यदि आप खुद से लडते हुए किसी अंजान सफर पर कभी निकले है या निकलना चाहते है सफर आपकी आंतरिक जडता को तोडता है साथ ही यह आपकी निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत करता है जिसमे ह्र्दय परिवर्तन से लेकर जिन्दगी जीने का मकसद सब शामिल है। फिल्म का संगीत ठीक है ए आर रहमान का एक ही गीत जबान पर चढने वाला है बोल फिलहाल याद नही आ रहे है।  


(पिछले कुछ दिन से फेसबुक से बाहर हूं लेकिन हाईवे देखने के बाद इस पर संस्मरण लिखने से खुद को रोक न सका इसलिए यह पोस्ट चस्पा करके फिर से निकल रहा हूं। कब,क्यों,कैसे आदि कोई सवाल फिलहाल नही जब भी जरुरी लगेगा मै यहाँ अपनी बात कहूंगा और पूरे रस के साथ कहूंगा...शुक्रिया ! )     

Monday, February 17, 2014

नजर



यह पोस्ट किसी एक समुदाय के खिलाफ नही है और न ही यह श्रम विभाजन के एकाधिकार के किसी सिद्धांत को खंडित-मंडित करने के उद्देश्य से लिखी जा रही है यह पोस्ट बाजार में एक जाति विशेष के एकाधिकार में वक्त और हालात लडते एक वर्ग की परिस्थितिजन्य घुसपैठ से सम्बंधित है। इसमे कोई सन्देह नही है बाजार या व्यापार को हम बनियों का कर्मक्षेत्र या यूं कहूं एकाधिकार क्षेत्र समझते,जानते,देखते, सुनते और मानते हुए आयें है लेकिन देश विभाजन की त्रासदी की वजह से पाकिस्तान से आए रिफ्यूजी पंजाबी समुदाय ने इस क्षेत्र मे बनियों के वर्चस्व को ऐसी जबरदस्त चुनौति दी कि उनकी जीवटता और व्यवहारिकता नें बनियों के बाजार पर एकाधिकार की चूलें हिला कर रख दी।
विकासशील भारत की  मध्यमवर्गीय चेतना त्रासदी और दुख को स्थाई भाव मे जीने की आदत रखती है पाकिस्तान से भाग कर आए रिफ्यूजियों के लिए यहाँ आकर बसना और जमना दोनो ही मुश्किल काम था लेकिन शायद इस त्रासदी ने उन्हे अन्दर तक मांझ कर रख दिया इसलिए उनके लिए यहाँ शरणार्थी कैम्पों से निकलकर खुद का आसमां बनाने तक का सफर निसन्देह बेहद रोचक किस्म का है आज भले ही समाज़ का गालबजाई करने वाला तबका पाकिस्तान से रिफ्यूजी के रुप में आएं पंजाबियों को बेशर्म प्रचारित करता रहा हो लेकिन वो सच्चे अर्थो में जीवट लोग थे ऐसा मै मानता हूं उन्होने अपनी सरज़मी छोडी और यहाँ पनाह पाने के साथ शून्य से अपने जीवन को फिर से शुरु किया और न केवल शुरु किया बल्कि बुलंदी तक पहूंचाया आज उत्तर भारत के नगरों मे बाजार और व्यापार में इन पंजाबियों का खासा दबदबा है और इनके इसी विस्तार ने व्यापार से बनियों के एकाधिकार को भी समाप्त करके रख दिया।
बनिए सूदखोर थे लेकिन उनकी अपनी एक सीमाएं थी लेकिन पंजाबियों नें अपने लिए कोई सीमा ही तय नही की स्त्री-पुरुष दोनों ने मिलकर अपनी दुनिया खुद बनाई घर पर महिलाओं ने बूटीक, ब्यूटी पार्लर और खाने की होम डिलीवरी जैसे काम शुरु किए तो बाहर पुरुषों ने ऐसा कोई व्यापार का क्षेत्र नही छोडा जिसमे उन्होने हाथ न आजमाया हो आज भी लोग यह खिसिया कर कहते है कि इन पंजाबियों मे शर्म नही होती लेकिन मै कहता हूं वो मध्यमवर्गीय चेतना के उस आडम्बर से मुक्त है जिसे समाज़ का बडा तबका ढो रहा होता है उन्होने अपने काम को ही अपनी पूजा माना शहरी क्षेत्र में आज भी पंजाबियों का खाना-पीना और रहना सहना देखने काबिल होता है अपनी जडो को छोडकर लोग आज समाज़ के उस तबके मे शामिल है जो खुशी के बहाने पर खुश होना जानते है जो साई संध्या, मां का जागरण से लेकर भंगडा गिद्दा पाने का कोई मौका छोडना नही जानते है आज भी पंजाबी रसाई का स्वाद सबसे गज़ब का है।
मेरे हिसाब से पंजाबियों के खिलाफ तमाम प्रकार के दुष्प्रचार उनकी तरक्की के बढते ग्राफ से ज्यादा निकले है उनमे सच्चाई कम है और गल्प अधिक है। पंजाबण महिलाओं पर फब्तियां कसने वाले उनकी जीवटता को भूल जाते है कि कैसे उन्होने घर-घर काम पकड कर अपना आशियाना बनाया होता है कैसे ‘जगत भाभी’ बनकर घर-घर टिफिन पहूंचाया है, उनके संघर्ष पर कभी बात नही होती हाँ अपने अपने हिसाब से हम चरित्र चित्रण की कोई कसर बाकी नही छोडते है।
शहरी पंजाबी आज भी उत्सवधर्मी समाज़ है वह मस्त जीना जानता है वह खर्च करना जानता है और वह भी समाज़ की तथाकथित वर्जनाओं के परवाह किए बिना और दिन ब दिन जटिल होती जिन्दगी मे यह कोई कम बडी बात नही है। हमे इस जीवनशैली इसलिए दिक्कत है क्योंकि हम भी अन्दर से ऐसा ही जीना चाहते है लेकिन आदर्शवाद के झूठे आडम्बर के बोझ तले दबे होने की वजह से जी नही पाते है पंजाबी लोग सहज़ है मुक्त है इसलिए वो जीवन के उस रस का आनंद ले पाते है। बाजार की अपनी ताकतें और वर्चस्व की लडाईयां समाज़ के समाजशास्त्रिय ढांचे को कैसे प्रभावित करती है इस पर यदि कोई शोध करना चाहे तो बनिये बनाम पंजाबी और उनका सामाजिक-आर्थिक तंत्र यह एक रोचक शोध का विषय हो सकता है।