Tuesday, November 19, 2013

तीन स्टेट्स

बुद्धिमान पत्नी
परिपक्व प्रेमिका
भावुक साथी
और सच्चे दोस्त

की तलाश में अपेक्षाओं के बीहड़ में भटकता जब रोज़ शाम अपनी कब्र में दाखिल होता है तब उसका एकांत उस पर हंसता है और वो नजर चुराकर बडबडाता है ये कमबख्त दूनिया मुझे गलत समझे जाने के लिए शापित है ।


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कविता की सम्वेदना पर तब्सरा करने से पहले खुद का व्यवहार देखिए कि आप रिक्शेवाले,फल-सब्जी की रेहडी लगाने वाले,बूट पोलिश करने वाले,दिहाड़ी मजदूर,समाज के फिफ्थ क्लास लोगो के साथ किस तरह से पेश आतें है आपकी बातचीत की टोन कैसी होती है।

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हर शख्स के अंदर एक साहित्यिक किरदार बसता है जिस पर कविता लिखी जा सकती है जो किसी भी उपन्यास का नायक हो सकता है।

Tuesday, November 12, 2013

मन

मन से मन का अतिक्रमण करने को सोचने मात्र से पूरा अस्तित्व विद्रोही हो जाने की धमकी देने लगता है. मन चंचल है यह तो शास्वत है लेकिन मन आदेश पालना के मामले में भी प्राय: एकाधिकारी होने की चेस्टा करता है.मन कॊई  इकाई नही है लेकिन मन के बिना कोई इकाई दहाई नही बन पाती है. मन की एक उड़ान है अपनी गति भी है लेकिन मन की  लय लोक से अभिप्रेरित प्रतीत होती है दिशाबोध के मामले में भी मन के कुछ अपने पूर्वानुमान हैं  जिनको वह अर्द्धचेतन में सुरक्षित रखता है और जब जब शाम गहराती है या धुंध के बादल छा जाते है तब मन उनसे पड़ताल करवाता है कि उसको किस दिशा में उड़ना है. एक अस्तित्व के अंदर कितने अस्तित्व और उन सभी अस्तित्व के भी  कितने स्तर गूथे हुए है इसको सुलझाने में वर्षो बीत सकते हैं. मन बावरा है मन  व्याकुल भी है मन निरुपाय भी है लेकिन ये मन ही तो है जो अचानक से हमे अंदर तक आनंद में तर कर देता है और अचानक से उदासी में लिपटी मुस्कान छोड़ जाता है. मन को समझाना व्यर्थ है हम मन को समझा नही सके है जब हम मन को समझा रहे होते है तब मन तो बंकिम हंसी से हमारी छटपटाहट पर मुस्कुरा होता है दरअसल हम मन के चक्कर में अपने इगो को समझा रहे होते है.मन इगो से परे है उसकी अपनी एक दुनिया है,इगो लोक का दास है तो मन अपने मन का मुरीद.यह दासता में जी ही  नही सकता है न यह किसी को अपना दास बनाना चाहता है हाँ ! ये उन्मुक्त खुला गगन चाहता है जहां लोक के अभिसारी बंधन न हो जहाँ अपेक्षाओ का बोझिल संसार न हो...मन को समझना दरअसल खुद को समझने जैसा है यह जितना प्रकट है उससे कंही अधिक गुह्य भी.मन को स्तरों पर न बांधो मन का विश्लेषण भी मत करो बस अपने मन कि सूक्ष्म उपस्थिति को अनुभूत करो इसके बाद मन के प्रश्न खुद जवाब में रूपांतरित हो जायेंगे फिर शायद आपको मन को जीतने की जरूरत भी न पढ़े क्योंकि तब तक आपका मन के साथ जीने का अभ्यास विकसित हो चूका होगा फिर गीता के उपदेश सुनने में आनंद ले सकोगे क्योंकि फिर ये उपदेश आपको अपराधबोध में नही ले जा सकेंगे बल्कि आप खुद योगिराज कृष्ण के वाक् चातुर्य और अर्जुन के अवसाद पुनर्वास का सच्चा आनंद ले सकेंगे जिससे आप अभी तक वंचित है. 

Sunday, November 10, 2013

हरजाई

मेरे जैसे गैर पेशेवर शख्स के जीवन में  यंत्रो की  भूमिका पर कई बार गहराई से सोचता हूँ यहाँ गैर पेशेवर से आशय कंप्यूटर की तकनीकी दुनिया से ताल्लुक न रखने से है.पिछले दो महीने से घर पर लैपटॉप पर नेट का कनेक्शन नही चल रहा है वजह दो है एक तो हर महीने हजार रुपये का टाटा फोटोन प्लस का रिचार्ज जेब पर भारी लग रहा था दूसरा यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट में ब्रॉडबैंड सुविधायुक्त एक पीसी मेरे कब्जे में आ गया है जहाँ से मैं देश दुनिया से जुड़ा रहता हूँ बस इसी सुविधा के चलते घर पर फोटोन प्लस की कुप्पी गोदरेज के अलमारी पर पड़ी धूल फांक रही है. मेरी इस मनमानी और बेरुखी का सबसे बड़ा भुक्तभोगी मेरा 4 साल पुराना लैपटॉप बना हुआ है आज मैंने उसको देखा तो मुझे अपने मतलबी होने का बड़ा अफ़सोस हुआ क्योंकि बिना इंटरनेट के उसको खुले भी कई कई दिन हो जाते है वो भी उसी गोदरेज के अलमारी कि छत पर धुल की खुराक ले रहा है. फोटोन प्लस की कुप्पी और लैपटॉप फिलहाल मेरे जीवन की सबसे उपेक्षित वस्तु बनी हुई है  . कभी कभी सोचता हूँ कि जो लैपटॉप मेरे  सुख दुःख का इतना बड़ा भागीदार रहा है जिसके कीपैड ने मेरे हताशा और नाराज़गी के पलों में अपनी छाती पिटने के लिए  मेरे निर्मम हाथो के हवाले कर दी हो और हमेशा मेरे मन के द्वन्द को शब्दो का आकार दिया हो वो इनदिनों कितना तन्हा महसूस करता होगा उसे तो ये भी नही पता होगा कि मैंने एक नया यार यूनिवर्सिटी में बना लिया है  अगर उस यंत्र का अपना कोई सोचने का तंत्र होता तो मनुष्य के रूप में उसके लिए सबसे घ्रणा का पात्र मै ही होता.लैपटॉप की मेमोरी  में बेतरतीब पड़ी फाइल्स भी मुझे लानत भेजती होगी जिनको खोले भी मुझे एक पखवाड़ा  हो गया है. कुल मिलकर मेरा लैपटॉप तभी तक गुलज़ार था जब तक उसमे इंटरनेट की प्राणऊर्जा बह रही थी जैसी ही इंटरनेट बंद हुआ लैपटॉप कि ड्राइव में पड़ी फाइल्स भी अपने अपने फोल्डर में कैद हो गयी है वो मुझ हरजाई की एक क्लिक के इन्तजार में बावरी हो रही होगी ये सोच कर मेरा जी भर आता है. लैपटॉप के यूएसबी हलक में लैला मजनूँ सी फंसी रहने वाली टाटा फोटोन प्लस की कुप्पी भी कितनी बेबस हो गयी है क्योंकि उसके पास नेटवर्क का सिग्नल तो है लेकिन मुद्रा की खुराक नहीं जिसके चलते टाटा कंपनी ने उसका दाना पानी बंद कर दिया है अब घर के एकांत में मेरा लैपटॉप और फोटोन प्लस की कुप्पी अपने अपने दुःख के संगी साथी बन थोडा मुझे कोस रहे होंगे और थोडा उसका कथित भगवान् को जो हर महीने मेरा हाथ तंग ही करता जा रहा है. फोटोन प्लस की कुप्पी की चिंता और भी बड़ी होगी क्योंकि अगर एक महीने मै अगर ऐसे ही सरकारी पीसी के इश्क़ में पड़ा रहा तो फिर टाटा कंपनी उसको हमेशा के लिए खामोश कर देगी.मनुष्य के तौर पर मैं केवल साक्षी भाव से अपने बुरे दिनों के अच्छे साथी रहे इन दोनो  साथी की पीड़ा देखकर बैचैन जरुर हूँ लेकिन फिलहाल अपनी जेब को देख कर चुप हो जाता हूँ बस आज सांत्वना के लिए मैंने इतना किया कि उन पर वक्त की मार ने जो गर्द चढ़ा थी उसको मैंने साफ़ किया और मै कर भी क्या सकता हूँ....:( 

Saturday, November 9, 2013

अथ फोन कथा

बहुत दिनों से स्पाईस का 2700 रुपये का खरीदा हुआ फोन प्रयोग कर रहा था अभी एक हफ्ते पहले फ्लिपकार्ट पर किताब तलाश रहा था तभी मेरी नजर इस फोन पर पडी और मेरी जी ललचा गया जब जेब टटोली तो वो फटेहाल थी फिर देखा कि इस फोन को खरीदने के लिए ईएमआई की सुविधा उपलब्ध है यह देखकर थोडा जी राजी हुआ लेकिन जब हमने आप्शन देखे तो वहाँ एचडीएफसी,आईसीआईसीआई जैसे बडे बैंकों के क्रेडिट कार्ड होल्डरस के लिए उक्त सुविधा थी फिर मन मसोस कर रह गया तभी छोटा भाई ऑनलाईन था उसको सारा मसला बताया वो नोएडा की एक साफ्टेवेअर कम्पनी मे कार्यरत है हालांकि तनख्वाह उसकी भी कमोबेश मेरे जितनी ही है लेकिन उसके पास एचडीएफसी का ऑफर देकर दिए जाने वाला क्रेडिट कार्ड है उससे बडे भाई की मन मसोस कर रह जाने हालत देखी नही गई और उसने तभी अपने क्रेडिट कार्ड से यह फोन जिसकी कीमत 17400/- (ईएमआई मोड पर) तुरंत आर्डर कर दिया अब मै हर महीने इसकी किस्त जमा कर दिया करुंगा 6 महीने की ईएमआई के बाद यह फोन पूर्णॅकालिक अपना हो जायेगा...सौभाग्य से अपना स्पाईस वाला फोन भी ठीक ठाक कीमत पर बिक गया है और उसमे कुछ पैसे डालकर इस फोन की पहली ईएमआई मैने जमा भी कर दी है...अगले महीने की तब की तब देखेंगे...फिलहाल तो 2-3 घंटे से इसके फंक्शन देख रहा था एंड्रायड फोन है सो नेट अच्छा चलता है...बस यही छोटी सी कहानी है अपनी भाई भाई के काम आ गया इससे यह खुशी फोन लेने की खुशी से कई गुना बडी है....
(हम ठहरे थे पीएनबी के बचत खाते वाले करमठोक इंसान जिनकी पे स्लिप देखकर खुद का बैंक भी मदद करने साफ मना कर देता है और हर महीने सेलरी आते है सबसे उत्साह से एक ही काम होता है वह होता है खाते को जीरो बैलेंस कर देना...ऐसे में पूर्णकालिक वेतनभोगी भाईयों का ही सहारा शेष बचता है..)

Monday, October 28, 2013

होली

होली हुडदंग है न कि शास्त्रीय मस्ती का उत्सव। गांव के बच्चें फिर् भी शालीन रहते है लेकिन शहर मे अभी से देख रहा हूँ बसों में तथा दो पहिया चालकों की कनपटिया गुब्बारों से पिट रही है शहरी हुडदंगी बच्चे इतने निरकुंश हो कर गुब्बारे मार रहे है कि वह किसी को किस स्तर का नुकसान पहूंचा सकता है इसकी कोई न उन्हे कोई फिक्र है और न तमीज़..। माफ कीजिए बच्चों को शरारत और मस्ती के नाम पर मै ऐसी छूट देने के पक्ष में कतई नही हूँ जिससे बस के यात्री शहर में आने से पहले ही बेचारे आतंकित हो जाएं कि कब कहाँ कैसे गुब्बारा उनकी कनपटी लाल कर देगा।
अब गांव का किस्सा, गांव में मजाक का सात्विक स्वरुप लगभग दो पीढी पहले ही बात है जब लोग दिल के सच्चे और जबान के पक्के हुआ करते थे वर्तमान में होली गांव के ऐसे निठल्ले अधेड युवाओं के लिए दारुबाजी और फिर अपनी स्त्री देह को स्पृश करने आदिम इच्छा तथा यौन कुंठाओं को आरोपित का त्यौहार है जिसमें वें इस मस्ती के नाम पर मुहल्ले भर की भाभीयों को न केवल तंग करते है बल्कि बलात रंग से गाल लाल करके अपने पुरुषवादी चेहरे को पुरस्कृत करते हैं।
मथुरा,वंदावन की फूलो की होली या लठ्ठमार होली से भी कोई उदाहरण तय नही किया जा सकता है क्योंकि वह केवल वही तक सीमित है। सच तो यह है कि पुरुषों के निरंकुश और अराजक होने आदिम प्रवृत्ति को अप्रत्यक्ष रुप से पोषित करता है यह होली का त्यौहार जिसको जब भी ,जैसे भी, अवसर मिलें वह अपने प्रभुत्व और कुंठाओं को आप पर आरोपित करके मानसिक सुख लेना चाहता है और नाम दे देता है त्यौहारी मस्ती का।
रहा होगा कभी सौम्य,सात्विक स्वरुप जिसमें हास-परिहास हुआ करता होगा एक गरिमा हुआ करती होगी लेकिन इस दौर की होली देखकर तो यही जी करता है अब बुरा ही मानकर काम चलेगा वो जुमला अब अप्रासंगिक हो गया है बुरा न मानो होली है !
(होली के दिन गांवों में पार्टीबाजी के चलते कितनी ह्त्याएं होती है पुलिस कैसे अतिसम्वेदनशील गांव को लेकर चौकन्नी रहती है उसका जिक्र नही कर रहा हूँ वरना आपकी होली का मजा खराब हो जायेगा लेकिन वो भी एक बडा कडवा सच है)

रेडिकल चेंज

विश्वविद्यालय की तदर्थ मास्टरी छोडने की सोच रहा हूँ बहुत हो गया रोजाना कि वही रुटीन लाईफ क्लॉस रुम लेक्चर,शोध पत्र,सेमीनार,एपीआई और विभागीय तिकडमबजियाँ..। मनुष्य का जीवन एक ही बार ही मिलता है और ऐसे बंधे-बंधायें जीने में क्या खाक मजा है। उच्च शिक्षा में आयें तो 01 पी.-एच.डी. 3 पीजी और 2 विषयों में यूजीसी नेट कर डाला पिछले 6 साल से विश्वविद्यालय में अस्थाई ही सही लेकिन यू.जी./पीजी. का अध्यापन किया एक निजि विश्वविद्यालय में 3 लोगों के एम.फिल.डिजर्टेशन में गाईड बना। कुल मिला कर जो भी किया उसका संतोष है लेकिन अब इनर कॉल कुछ इस तरह की आ रही है कि अब एक रेडिकल चेंज की जरुरत हैं।
आप सभी मुझे काफी दिनों से समझ और जान रहें है मेरी तमाम बदतमीजियों और उदासियों के किस्सों के चश्मदीद गवाह है इसलिए आप ही से पूछ रहा हूँ अध्यापन के अलावा मै क्या कर सकता हूँ ? मुझे क्या करना चाहिए यह बहस का मुद्दा नही है सो प्लीज़ मेरा भला-बुरा किसमें है ,मनोविश्लेषण आदि करनें से बचिएगा। यहाँ मै आपकी सलाह नही ले रहा हूँ केवल मेरी जीवनशैली और व्यक्तित्व के अनुसार मेरा पेशा और क्या हो सकता है? उस पर आपका मत चाह रहा हूँ।
आभार एवं नमन..

आना-जाना

फेसबुकिया दूनिया में मेरा आना जाना लगा रहता है यह ठीक उस नामुकम्मल कोशिस की तरह है जो अपने होने की जद्दोजहद मे रोज़ नए मिराज़ पैदा करती है और रोज़ उन्हे अपनी हकीकत की किस्सागोई के साथ दफन भी कर आती है। इतने परेशान मत हो मेरे दोस्तों ! आपकी मुहब्बतों का तलबगार हूँ अभी तो खाकसार कहने के भी काबिल नही बना हूँ उधार के अल्फाज़ और अपने कुछ तल्ख कुछ मासूम अहसासों कों कभी शायरी के बहानें तो कभी यूँ ही बेवजह की किस्सागोई के बहानें ब्याँ करने की कोशिस करता रहता हूँ। अपने कुछ खास किस्म के कद्रदानों,मेहरबानों की उम्मीदों पर खरा उतरनें का दबाव बना रहता है जो मै महसूस करता हूँ इसलिए अलबत्ता तो मेरी कोशिस यही रहती है कि पाक अहसासों और उम्मीद की रोशनी से मेरी तरफ देखने वालें दोस्त मेरी हाथ की सफाई और नजरबंदी के खेल की हकीकत हो पहले ठीक से समझ लें,जान लें बावजूद इसके भी कुछ लोगो की इज्जतअफजाई और मुहब्बतों की तकरीरे मेरे नाजिरखाने में किसी बैनामे के दाखिलखारिज़ की माफिक दर्ज़ हो जाती है क्योंकि उन्हे लगता है कि मै काम का आदमी हूँ फिर भी मुझे यही लगता है कि किसी का दिल न टूट जाएं इसलिए सभी को बार बार यही कहता हूँ " मेरे बारें में कोई राय कायम मत करना,वक्त बदलेगा और तुम्हारी राय बदल जायेगी.."
जिन्दगी को देखने-समझने के लिए सबके पास अपना-अपना तजरबे का चश्मा होता है मेरे पास भी है और अपने उस चश्में से जिन्दगी को देखने की कोशिस नें मुझे कभी आदत से जज्बाती बनाया तो कभी अदब से कमजोर इसलिए थोडा सलाहियतों पर ईमान लानें के मामलें कमअक्ला किस्म का इंसान हूँ अभी तलक तो जिन्दगी को अपनी शर्तो पर जीने की कोशिस की है कल का भरोसा नही इसलिए जब तक यहाँ इस मंच पर हूँ जैसा हूँ स्वस्थ हूँ,बीमार हूँ,छद्म हूँ,पारदर्शी हूँ,मौलिक हूँ या आयतित हूँ,बौद्धिक हूँ,दोगला हूँ ,हैरान हूँ,परेशान हूँ मुझे इसी रुप मे स्वीकार कीजिए बडी विनम्रता के साथ यही कहना चाहूंगा कि मै अपना वजूद खुद गढ रहा हूँ इसलिए किसी के भी सम्पादन की गुंजाईश नही है अच्छा,बुरा जैसा भी है सब मेरा ही है आपके पास चयन का विकल्प है इसलिए एक अस्तित्व को समग्रता के साथ स्वीकार करनें वाले साथी अपने साथ दूर तलक जायेंगे वरना न जानें कितने लोग रोज़ फेसबुक पर एड होते है और लिस्ट में क्या तो बेजान पडे रहते हैं या किसी दिन डिलिट की क्लिक के शिकार होतें है।
इस उम्मीद के साथ यह लिख रहा हूँ कि उपरोक्त कथन को मेरा अहंकार न समझा जाएं शेष आपकी इच्छा।
(मेरे फेसबुक पर आने और अचानक वितंडा फैला कर भागने के उपक्रम से आजिज़ आ चुके फेसबुकिया मित्रों के लिए मेरा फेसबुकिया हलफनामा ताकि जिरह से बचा जा सकें)

ब्रांडिंग

मुझे अपनी ब्रांडिंग करनी आज तक नही आई मैं इसको इसको किसी कमी या खूबी के संदर्भ में नही कह रहा हूँ लेकिन फेसबुक पर देखता हूँ की लोग बाग़ येन केन प्रकारेण अपनी ब्रांडिंग में लगे रहते है अपनी फितरत तो यही रही की जो अपनी जेब में है उसको भी खोटा ही बताया जाएँ क्योंकि अभी बहुत कुछ सीखना और जानना बाकी है पिछले ६ साल से दो ब्लॉग लगभग नियमित रूप से लिख रहा हूँ जिसमे एक कविताओं का हैं और एक ऑनलाइन डायरी टाइप का है लेकिन मुश्किल से ही कभी कभार अपने ब्लॉग के लिंक यहाँ फेसबुक पर शेयर किये होंगे जो लोग मेरा लिखा नियमित पढ़ते हैं उनकी भी यही शिकायत हैं की मै अपने लिखे हुए का ठीक से प्रचार नहीं कर पा रहा हूँ एकाध मित्रों की सलाह थी की मुझे पत्रिकाओं में भी छपना चाहिए तभी दायरा बढेगा और पहचान भी बढ़ेगी लेकिन मेरे दिल में कभी किसी पत्रिका में कवितायेँ भेजने का ख्याल ही नहीं आता है कभी. फेसबुक की मायावी दुनिया कभी कभी उकसाती भी है लेकिन फिर सोचता हूँ अभी ऐसा लिखा ही क्या है जो उसकी डुग डुगी बजायी जाये फिर खुद को उस कहावत के जरिये बहला लेता हूँ की सूरज जब निकलता है तब सबको दिखाई देता है उसको बताना थोड़े ही पड़ता है की मैं उग आया हूँ...

आडवाणी

सभी लोग आडवाणी की नारजगी को प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम न घोषित करने से जोड़ कर देख रहे है हो सकता है की यह भी एक वजह हो लेकिन मुझे लगता है आडवाणी जी जैसा वरिष्ट नेता महज़ ऐसे भावावेश में ऐसा कोई बड़ा निर्णय नही ले सकता है. आडवाणी भाजपा के उन नेताओं में शुमार हैं जिन्होंने इस पार्टी को खड़ा किया था ऐसे में पार्टी से इस्तीफ़ा देना कोई आसान काम नहीं रहा होगा. मुझे लगता है की उनकी मोदी से सैद्धांतिक दूरी और धीरे धीरे हाशिये पर खिसकते उनके वजूद भी एक वजह रही है यह वर्तमान राजनीति की बदलती दिशा का एक प्रभाव कहिये या वक्त के मजबूरी कि मोदी अब भाजपा की मजबूरी बन गए है और ऐसे में उन्हें अपने किसी बड़े नेता को खोने का गम भी ज्यादा दिन नही रहने वाला है यह भी तय है, दरअसल वर्तमान में सैद्धांतिंक रूप से राजनीति करने वालो का समय अब ज्यादा रहा भी नहीं है क्योंकि अब जनता किसी चमत्कारिक व्यक्तित्व की आस में हैं जो कांग्रेस के राज़ से मुक्ति दिला सके अब विचारो और सिद्धांतो की राजनीति गौण हो गयी है एक भारतीय नागरिक होने के नाते मैं इसको कोई शुभ संकेत के रुप में नहीं देख रहा हूँ...आप भले ही उत्सव मनाएं..मैं किसी को रोक भी नहीं रहा हूँ.

मोटिवेशन

ज़िन्दगी की रुमानियत पर तब्सरा करने वालो को मेरा सलाम सच! जिन्दगी जिन्दादिली और जिन्दगी को हौसले के साथ जीने का ही नाम है। ज़िन्दगी कभी इतनी हसीन होती है कि कायनात की भी शरमा जाए और कभी इतनी बोझिल की एक पल जीना भी दुश्वारी लगे कभी यह खुले आसमान में जीने की चाहत पाल बैठती है तो कभी बंद कमरा भी सिमटने के लिए कम पड जाए...इसके इतने रंग है इतने कोलाज़ है और इतने कैनवस है कि कहना,लिखना,सुनना और यहाँ तक जीना भी कम पड जाए।
निजि तौर पर खुश रहना या खुश रहने की कोशिस करना या फिर खुशी तलाशना सबका हक है और हमे इसके लिए कोशिसे भी करनी चाहिए मरते दम तक। अपने निराशा या उदासी के पलों या किस्सागोई को अपने एकांत तक ही सिमट कर रखने की फनकारी भी आनी चाहिए वरना आपकी उदासी के किस्से किसी के दिल की गहराई मे छिपे गम को खुराक देने लगते है आपकी निराशा दूसरे शख्स की निराश बढा देती है जब हम किसी को खुशी नही दे सकते है तो फिर गम की फसल के लिए खाद बांटना भी ठीक नही है। भगवान बुद्ध ने दुख को सबसे बडा यथार्थ कहा है और यह सच भी है दुख की कोई भाषा नही होती है लेकिन इसमे सम्प्रेषणशीलता गजब की होती है अपने जैसे लोगो को ये झट से तलाश लेता है और फिर उम्मीदों का बेरहम कारोबार भी करने लगता है इसलिए कोशिस कीजिए कि खुश और सकारात्मक ऊर्जा वाले लोगों से संवाद स्थापित हो जिनके पास हौसला हो और न केवल हौसला हो बल्कि उसको जीने का सलीका भी हो। दिन भर अपनी असफलताओं से ऊपजे एकालापी ज्ञान और बोरडम और निराशा के पर्चे बांटने वालो से बच कर रहना ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक जान पडता है। जिन्दगी सितम ढाती है और आगे भी ढाती रहेगी लेकिन अपनी उदासियों,नाकामियों की किस्सागोई से दूसरों को असहज़ करने का व्यापार मैने भी खुब किया है और शायद आगे भी करता रहूंगा क्योंकि मै तो कह कर मुक्त होने जुगत मे लग जाता हूँ लेकिन फिर भी मेरी ईमानदार सलाह यही है कि बचो ! ऐसे लोगो से जो शब्दों की तथाकथित जादूगरी से अपना दर्द को भी दवा बना कर बेच रहें है।
ऊर्जावान,सकारात्कम,मोटिवेटेड और जिन्दगी में हौसलों की इबारत लिखने वालों की सोहबत न आपको केवल जीने का हौसला देती है बल्कि आप खुद पर भरोसा करना भी सीख जाते है। उदासियों,नाकामियों के किस्से सुनने के लिए ये जिन्दगी भी कम पड जाती है इसलिए दोस्तो ! जी भर जियो ! ताकि कल कुछ न मलाल न रहें।

दुविधा

जिस विश्वविद्यालय में मैं पिछले छह सालों से बतौर एडहोक़ मास्टर पढ़ा रहा हूँ वहां इन दिनों एडमिशन चल रहे होते हैं साइंस फैकल्टी में एडमिशन की ज्यादा मारामारी रहती है इसलिए मेरे गाँव और रिश्तेदारी निकाल कर आए लोगो के लिए मै बड़ा सहारा नजर आता हूँ वो चाहते हैं कि मै कुलपति की माफिक उनकी मदद करु भले ही उनका बच्चा मेरिट में भी ना आया हो लेकिन एडमिशन करवा दूं मै उनकी दिल से मदद करना भी चाहता हूँ लेकिन उनको यह समझाना बेहद मुश्किल काम है कि अलबत्ता तो मेरे जैसे कृपापात्री अस्थाई मास्टर की विश्वविद्यालय में कोई निजि हैसियत नही होती है फिर मामला साइंस फैकल्टी से जुड़ा होता है वहां के तो बाबू भी इतने रूखे किस्म के होते है कि पूछिए मत जब आप अपने परिचित का फोर्म हाथ में लेकर उनके कान में बुदबुदाते हैं कि मै फलाँ विभाग में एड्होक हूँ तो वो ऐसी हिकारत से देखते है कि साथ खड़े परिचित के सामने ही इज्जत का फालूदा बन जाता है बड़ी असहज स्थिति होती हैं साहब उसके बाद जो सिफारिश के लिए हमें तलाश कर आया होता है उसके असहज होने का नम्बर आता है वो खिसिया कर अजीब अजीब बातें बोलता हैं फिर उसकी गलतफहमी दूर होती हैं कि सहाब प्रोफेसर नही है एक टम्प्रेरी मास्टर हैं जो अपना टाईम पास कर रहा है बेचारा जबकि गाँव में घरवाले बड़े फख्र से बताते है कि हमारा लडका यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। इस परीक्षा काल में विवि के कुछेक चपराशि जरुर काम आते हैं जो अपने संपर्को का प्रयोग एडमिशन में मदद के लिए करते हैं उनका भाईचारा हमेशा काम आता है।

एकांतवास

कल पत्रकार मित्र का एसएमएस मिला "जिन्दगी का मैने बस ये हिसाब देखा कि चलती नही कभी मेरे हिसाब से..." मुझे लगा कि पवन भाई ने क्या मौजूँ शे'र भेजा है...अभी 3 जुलाई को मै यहाँ घोषणा करके गया था कि मित्र धीरेश सैनी से उधार मांग कर लाई किताबों का स्वाध्याय करुंगा और खुद भी यह सोचा था कि 10 दिन एकांतवास मे रहूंगा ना फोन ना इंटरनेट केवल अल्पाहार और अध्ययन करुंगा और लगभग दो दिन वो क्रम चला बेहद व्यवस्थित ढंग से....लेकिन अपने संकल्प इतनी आसानी से थोडे ही पूर्ण हो पाते है कोई न कोई बाधा तो आनी अवश्यंभावी थी इस बार भी आई और ऐसी आई कि पिछले 6 दिनो से प्राणहंता पीडा से गुजर रहा हूँ आज थोडा आराम मिला है पहले पेट मे इंफेक्शन हुआ फिर वो इंफेक्शन एनल इंफेक्सन मे बदल गया उसके बाद क्या क्या नही हुआ आप खुद समझ सकते है कि क्या स्थिति रही होगी..न शौच से पूर्व आराम और न निवृत्ति के बाद हालात इतनी तेजी से बिगडी कि देखते ही देखते ऐसी स्थिति मे आ गया कि केवल लेट सकता था न बैठ सकता था और न चल सकता था (दोनो ही स्थिति मे असहनीय पीडा) साथ मे पिछले तीन दिन से बुखार.....इस व्याधि के जांचने के डाक्टरी परीक्षण बडे अमानवीय किस्म के सो उसके बारे मे सोचकर भयाक्रांत होता रहा बडे भाई एम.एस.(सर्जन) है उनसे सारी स्थिति बताई उनके हिसाब से गंभीर दिक्कत होने की सम्भावना थी यहाँ तक कि शायद आपरेशन करवाना पडे....चिट्ठी की भाषा मे कहूँ कि थोडे लिखे को ज्यादा समझना वाली बात रही है मतबल बहुत दिक्कत मे रहा।
भला हो महात्मा हैनीमेन का जो उन्होने होम्योपैथी जैसी चिकित्साविधि विकसित की अपने एक मित्र होम्योपैथ की शरण मे गया था परसो उनको सारी हालत बताई उन्होने मीठी गोली थी कल रात तक उनकी औषधी से कोई आराम नही था लेकिन आज सुबह दस बजे ऐसा लगा कि दवा काम कर रही है और मुझे राहत महसूस हुई हालांकि पूरी तरह से आराम नही है लेकिन ऐसा लग रहा है कि रिकवर हो रहा हूँ।
अभी एक सप्ताह का बैड रेस्ट बताया है डॉ ने और साथ मे उबला हुआ भोजना खाना है जीवन एक मुश्किल दौर से गुजरते हुए प्रार्थना के पलो को जीता हुआ आरोग्य की तरफ आशा भरी निगाह से देख रहा हूँ ताकि मै जल्दी स्वस्थ होकर अपनी बेवजह की मगज़मारी के जरिये आप सभी से जुडा रहूँ।
(जिन मित्रों के पास मोबाईल नम्बर है वो हाल जानने के लिए चिंतातुर होकर फोन करने से बचे क्योंकि मै फिलहाल इस व्याधि से लडता हुआ ऐसी स्थिति मे नही हूँ कि फोन पर आपसे बात कर सकूँ या मिल सकूँ उम्मीद करता हूम कि मेरे इस आग्रह को एक बीमार मित्र की प्रार्थना समझा जाएगा न कि हमेशा की तरह अहंकार)

राजनीति

कांग्रेस की लचर सरकार से उपजी राजनीतिक नेतृत्व की हताशा से परेशान अपने देश का आम आदमी कभी बाबा रामदेव तो कभी अन्ना,कभी केजरीवाल की तरफ एक आशा भरी निगाह से देखता है समर्थन देता है फिर अंत में उसी शून्य का हिस्सा बन जाता है जिसका अभी कोई विकल्प नजर नही आता है। आम आदमी का मखौल उडाने या उसकी बेचारगी पर तबसरा करने की न तो मेरी निजि हैसियत है और न ही ऐसी कोई इच्छा....इसी क्रम में अब विकास पुरुष मोदी को इसे देश की समस्त समस्याओं का एक चुटकी भर में खत्म करने वाले चमत्कारिक युग पुरुष के रुप में एक बडी भीड देख रही है जिसकी बानगी फेसबुक पर भी देखने को मिलती रहती है हालांकि मुझे न सियासत की समझ है और न मेरे तरकश मे तर्को के बाण है लेकिन फिर भी जनता को जैसे भाजपा के रामजन्म भूमि मुद्दे से मुकरने,बाबा रामदेव के भाजपाकरण और अन्ना केजरीवाल के मतभेद से बिखरे एक व्यापक जनान्दोलन से निराशा हुई थी ठीक ऐसे ही यदि बहुत अतिश्योक्तिवादी होकर यह सोच भी लिया जाए कि मोदी पीएम बन जाएंगे तो फिर से उसी निराशा के दौर से गुजरना पडेगा ऐसी मेरी मोटी अक्ल कहती है कोई जरुरी नही है कि मेरी बात सही साबित हो लेकिन मेरे देश की भोली जनता जब तक तक खुद चोट नही खा लेती है वो किसी की तकरीरे कहाँ सुनती है इसलिए मेरी दिली इच्छा है कि एक बार मोदी जरुर पीएम बनें ताकि लोग इस मृगमरीचिका से खुद ही निकल सके फिलहाल तो वक्त ऐसा चल रहा है कि आपने मोदी से असहमति जाहिर की और मोदी के चेलों ने आपके पिछवाडे पर राष्ट्रद्रोही होनी मोहर जडी...।

जुगलबंदी

जीवन को निश्चितंता और नियोजन की परिधि से निकाल कर अस्तित्व के भरोसे छोड देना बहुत बडी कलाकारी है। सलाह,नसीहतें समय के सापेक्ष काम करती है ऐसा लगता है कि आप कुछ चाहते है और दूसरी शक्तियां आपके चाहतो के विरुद्ध षडयंत्र मे लगी रहती है यह खेल जीत-हार का भी नही है यह खेल है अचानक से आए बदलावों की आहट को समझ पाने का,खुद को टटोलने का और चुनौतियों के खेल में खुद की शर्तों को क्षणिक रुप से भूलनें का ताकि सन्देश यह चला जाए आप स्वीकार भाव में है। स्वीकार भाव सकार और नकार दोनो से परे होता है जहाँ जीवन की उस लय मे खुद को बहने के लिए छोडना पडता है जहाँ बहुत सी चीजें आपकी पसंद और प्रकृति के ठीक विपरीत होती है ध्यान और आध्यात्म की भाषा मे यह अपने आप में साधना है जहाँ साधनों की जुगलबंदी में आपको वह राग आलापना पडता है जिसका रियाज़ आपने कभी नही किया होता है। है न ! जिन्दगी का अजीब खेल तमाशा.....

एक इंच मुस्कान

संघर्ष को मैने सदैव से निजता से जोडकर देखने कोशिस की है कुछ साथी संघर्षो की तुलना भी करते है लेकिन दो व्यक्तियों के संघर्ष कभी तुलनीय नही हो सकते है सबके अपने अपने मार्ग,तरीके,यात्रा और मंजिल हो सकती है। संघर्ष शाश्वत प्रक्रिया है यह अस्तित्व के साथ जुडी है प्रकृति प्रदत्त चुनौति है जहाँ आपको अपनी योग्यता सिद्ध करनी होती तभी आप मुख्यधारा में बने रह सकते है। मै कोई नई बात नही कह रहा हूँ सभी इस सिद्धांत से परिचित है लेकिन कुछ लोगो के जीवन संघर्ष देखकर कभी-कभी लगता है जैसे किसी ने इनके लिए चुनौतियों की एक फेहरिस्त तैयार रखी हो एक खतम तो दूसरी शुरु दम भरने तक की फुरसत नही मिल पाती है...इनके चेहरे पर शिकन जब भी आती है तो पसीने की बूंद खुद शरमा कर फना हो जाती है इनके चेहरे की एक मुस्कान देखने का पुण्य साल भर शिवालय जाने से कम नही होता है ऐसे संघर्षरत लोगो को देखकर लगता है कि जीवन दुरुह जरुर है लेकिन असम्भव नही..।

कबूलतनामा


अपने समकालीन कवि मित्रों की कविताएँ पढने के बाद अपनी कविताओं के ब्लॉग को देखता हूँ तो लगता है कि कवि होना बहुत बड़ी बात अपनी श्रेष्ट कविता भी एक भावुक नोट लगने लगती है सूक्ष्म संवेदनाओं के पारखी कवियों को पढकर अपनी तथाकथित कविताओं का शिल्प और सम्वेदना दोनों ही कमजोर लगने लगती है मै कतई हीनभावना का शिकार नही हूँ लेकिन कविता के मामले में अभी खुद प्रशिक्षु कहने की हालत में नही हूँ जबकि ब्लॉग पर छोटा ही सही मेरा भी एक पाठकवर्ग है। नीरज की एक उक्ति याद आती है मनुष्य होना भाग्य है और कवि होना सौभाग्य। ये ब्लॉग का लिंक हैं
www.shesh-fir.blogspot.in
आप यहाँ मेरी कथित कविताई का के दस्तावेज देख सकते हैं।
नोट:यह एक ईमानदार सी स्वीकारोक्ति है इसमें मेरी निराशा और अवसाद के दर्शन न तलाशें बड़ी मेहरबानी होगी।

यात्रा

चलो बहुत हुआ मेल-मिलाप,शेर औ' शायरी,राजनीति,आपबीती,जगबीती,गालबजाई अब उठाते है झोला और निकलते है किसी और दर पर अलख जगाने.... !
अलख निरंजन...!!!
माया मोह ठगनी बडी रे....यहाँ कौन अपना है और पराया भी कौन है सब अपने अधूरेपन को पूरा करने की तलाश में है लेकिन जिसको किसी शायर ने कहा है अधूरेपन का मसला जिन्दगी भर हल नही होता,कहीं आंखे नही होती कहीं काजल नही होता...!
दिल का ऊब जाना बेवक्त शाम को घर से निकल जाना और हंसते-हंसते आंखो से पानी छलक जाने का कारण शायद ही कभी बताया जा सकता हो...। निशब्द...यात्रा जारी है..।

संघर्ष

आप माने या ना माने मै अपवादों की बात नही कर रहा हूँ लेकिन सांसारिकता में एक पीढी हमेशा संघर्ष के बुरे दौर से गुजरती है मसलन यदि आपके पिताजी ने संघर्ष किया है तो आपके लिए जीवन की राह थोडी आसान जरुरी रहेगी लेकिन यदि आपके पिताजी ने मौज-मस्ती (अन्यथा अर्थ न लें) की है तो आपको हाड तोड संघर्ष करना पडेगा आपके बच्चे भले ही मौज करें मेरे हिसाब से यही दूनियादारी का नियम है।

इंटरनेट

देश मे इंटरनेट सेवाओं के नाम पर छोटे और मझोले श्रेणी के शहर के मेरे जैसे नेटाश्रित परजीवीयों को कितने बडे शोषण का सामना करना पडता है उसको ब्याँ करना मुश्किल है घरेलू बजट की तमाम चुनौतियों के बावजूद मै पिछले एक साल से टाटा फोटान प्लस यूज़ कर रहा हूँ इसके हलक में हर महीने एक हजार का रिचार्ज़ रुपी चारा डालना पडता है तब यह मुझे आप सब से जोडे रखता है। टाटा कम्पनी का दावा है कि 1000 रुपये में वो 6 जीबी डाटा एक्सेस देती है वो भी 3जी ब्राडबैंड स्पीड के साथ और ये दावा कितना हवाई है इसका चश्मदीद गवाह मै हूँ जिस दिन मै अपनी इंटरनेट की कुप्पी (यूएसबी मॉडम) रिचार्ज़ करवाता हूँ उस दिन और लगभग एक हफ्ते तो नेट फर्राटा स्पीड से चलता है लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता जाता है स्पीड कम होती जाती है हालत यह होती है कि 15 दिन बीतने पर यह डिवाईस 2जी (टाटा फोटोन विज़) के सिग्नल दिखाने लगती है और स्पीड एकदम से रुलाने वाली....मै कई बार कस्टमरकेयर पर कॉल कर चुका हूँ उनका एक ही रटा-रटाया जवाब होता है सर आपका 6 जीबी डाटा समाप्त हो चुका है जबकि हकीकत यह है कि इस 6 जीबी डाटा खत्म होने की चिंता में मै यूटयूब पर वीडियों चलाने से पहले हजार दफा सोचता हूँ एक महीने में मुश्किल 2-3 तीन वीडियों देखता हूँ बाकि फेसबुक या ईमेल/नेट सर्फिंग ही करता हूँ। इन जालिम मोबाईल नेटवर्क कम्पनियों को छोटे शहर की नब्ज पता है और यहाँ इंटरनेट के अन्य विकल्प भी ज्यादा मौजूद नही है ऐसे मे मनमाफिक तरीके से उपभोक्ताओं का शोषण करती है। कई दफा बीएसएनएल का लैंडलाईन ब्राडबैंड के विकल्प पर भी सोचा लेकिन उनकी प्रक्रिया लम्बी और सेवा घटिया किस्म की है फिर इस शहर मे अपना ठिकाना भी अस्थाई किस्म का है इसलिए अंत में टाटा जैसी कम्पनियों पर ही आश्रित रहना पडता है....बडी जलन होती है जब मेट्रो शहर मे बैठे मित्र अनलिमिटेड इंटरनेट सेवा का मजा लेते है और वो भी इससे आधे दामों पर....तकनीकी भी कई बार हमे जीवन की परिस्थितियों की तरह समझौतावादी बनने के लिए बाध्य करती है....! हे ! रत्नलाल टाटा जी ऐसा जुल्म न करो कुछ तो रहम करों हमने किताबों में आपके बारे में पढा है कि भारत के नवनिमार्ण में आपकी महती भूमिका रही है फिर इंटरनेट की सेवाओं के नाम पर यह शोषण क्यों....?

दिनचर्या

सुबह नौ बजे सो कर उठना दैनिक कर्म में केवल निवृत्ति को चुनना क्योंकि उसका कोई और समाधान नही है फिर दस बजे दीवार से दो तकिए महंतो की माफिक सटाकर अधलेटी मुद्रा में पेट पर लेपटॉप का आसन जमा देना दिन भर ऐसे ही बेरतरीब पडे रहना चाय,नाश्ता और लंच ऐसे ही बैड पर करना हाथ धोने और कुल्ला करने तक के लिए वाश बेसिन तक न जाना...बीच-बीच में लेपटॉप को उकताकर बंद कर देना पास पडी कुछ किताबों के पन्ने उलटना कभी ऊबना कभी ऊंघना बीच में मौका निकालकर एक नींद की झपकी ले लेना...दिन मे कई बार पत्नि से बहस करना कभी उसकी सलाह लेना कभी उसको सलाह देना शाम को जैसे ही सूर्य अस्त होने की तरफ बढे उस वक्त चैतन्य होना और मंजन-स्नान करना उसके बाद चाय पीकर अपनी दुपहिया पर नगर भ्रमण के लिए निकल जाना जेब मे खत्म होते पैसो की फिक्र मे थोडी देर चिंतित होकर गंगा किनारे बैठना फिर नहर किनारे वॉकिंग मैडिटेशन करना दूनिया को गरियाना दोस्तों को फोन पर लम्बी-लम्बी बातें करना यह जानते हुए कि अब कुछ लोग आपको 'एवाईड' भी करने लगे है....फिर शहर की रंगीनयत के बीच को खुद को सम्भालते रास्ते की परचून की दुकान से कुछ रसोई का सामान और मेडिकल स्टोर से बिना वजह की थोडी दवाई खरीदते हुए धीरे से अपनी काहिली के साथ घर मे घुस जाना...थोडी देर बच्चों से बतियाना और एक बार फिर लेपटॉप का आसन लगा लेना...इसी बीच डीनर को निबटा देना...बेशर्मी की हद तक कमरे मे लेपटॉप ऑन करे रहना यहाँ तक बच्चे लाईट ऑफ भी कर दें...फिर धीरे से उठना और इस्सबगोल की भूसी और दूध का कटोरा डकार कर चुपचाप लेट जाना...सोने से पहले उधडे ख्वाबों को फिर से बुनना और उसी उधेडबुन में पैर पीटते नींद के आगोश मे चले जाना...नींद में अतृप्त कामनाओं और असंगत किस्म के सपनों मे खुद से लडते रहना....और नींद में जागते रहना..।
(पिछले 3 महीने से इस किस्म की अवधूत जिन्दगी जी रहा हूँ)