Saturday, October 26, 2013

दीवाली


अपनी शर्तो पर जीने की आजादी लेने के लिए  मुद्रा की क्रांति जरुरी होतीन है  क्या तो आप फ़कीर हो जाए या फिर इतने अमीर की लोग बाध्य हो जाए आपकी जैसी भी  जीवनशैली हो उसको  स्वीकार करने के लिए...बाकी बीच में बहुत से त्रिशंकु बने भी लटके रहते है मेरी तरह से. मैं यह कतई नहीं कह रहा हूँ की पैसा ही सबकुछ है ऐसा नही पैसा सबकुछ नहीं है फिर भी दोस्तों बहुत कुछ तो जरुर है. आप चेतनासंपन्न भी हो और आर्थिक रूप से संपन्न भी यह इस कलि काल का सबसे बड़ा दुर्लभ संयोग है. अमूमन पैसा आपको दम्भी और स्वेच्छाचारी बना देता है लेकिन यदि आप चेतना और संवेदना के स्तर पर विकसित है तो आप इसका उपयोग एक साधन के रूप में कर सकते है मेरे हिसाब से मुद्रा एक साधन है लेकिन अक्सर लोग इसे साध्य मान बैठते है.... 
(दीवाली के नजदीक आते आते ऐसे मुद्रा प्रधान विचार आने ही लगते है शायद लक्ष्मी के वाहन उल्लू का असर होता है जो मेरे दिमाग पर अकेला ही सवार हो जाता है और लक्ष्मी मैय्या पैदल ही आपके दर पर दस्तक देती रहती है) :)  

Sunday, October 20, 2013

वसीयत

वो खत आज पोस्ट कर दिए जिन पर पतें नही लिखे थे इससे पहले वो यादों की तरह बैरंग लौट आयें मुझे अपना पता बदलना होगा फिर उनके बोझ तले मुहल्लें का डाकिया अभिशप्त जिन्दगी का ईनाम माँगता अगली दीवाली तक मेरे नए पते लिए मुझे ढूंडता हुआ आ धमकेगा और मैं साफ़ मुकर जाऊंगा कि मैने होश में ऐसे कोई खत लिखे ही नही यही मेरी वसीयत है।

-अतीत का जिरॉक्स

सपनों की पीछे भागना और दूसरों के सपने जीने लगना मन की उतार-चढाव के बीच अपने वजूद को टटोलना खुद को एकत्रित करना और फिर चलने की तैयारी करना किसी बडे मैराथन से कम नही है। प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए जिस जुनून की जरुरत होती है वह हौसलों से उधार मांगना पडता है।
मेरे एक मित्र कहा करते थे कि कभी चूहों की खाल से नगाडे नही बना करते है डॉ.साहब...तब मै उनको खारिज़ करता हुआ आगे बढता था अब यह तय करना मुश्किल होता है कि मेरी गति मुझे आगे ले जा रही है या एक आवृत्ति के साथ वृत्त की कक्षा मे स्थापित करके मेरा आघूर्ण जांच रही है। संशय,अभिप्रेरणा,सकार-नकार से परे ब्रह्माडीय पिंड की भांति मै अपनी धूरी का चक्कर लगाता हांफता और बडबडाता यहाँ तक आ पहूंचा हूँ मेरी दूरी को नापने के लिए प्रकाश वर्ष की नही मन की कमजोरियों को नापने वाला पैमाना विकसित करना होगा जहाँ मुझ से मुझ तक की दूरी भी इतने अक्षाशों में बटी है कि एक शायद जीवन का ग्राफ भी उसके रेखांकन के लिए कम पड जाएगा।

-----अतीत का जिरॉक्स बारस्ता एचीवेमेंट मोटिवेशन

बैंड बाजा बारात......

बातें गाँव देहात की-----

बैंड बाजा बारात......

अब गाँव में भी बैंड की जगह डीजे ले रहे है वहां छोटे वाहनों पर डीजे का सिस्टम चलता है और युवा धड़कने उस पर झूमती है लेकिन एक दौर वह भी था जब बैंड का अपना एक अलग रूतबा होता था और कुछ खास बैंड आपकी हैसियत भी तय करते थे मसलन उनको एफोर्ड करना सबके बस की बात नही होती थी हमारे पड़ोस के गाँव गढ़ी अब्दुल्ला का बैंड भी जिले भर में मशहूर था उस दौर में भी उनके पास ठेली हुआ करती थी मुजफ्फरनगर में मीरापुर का भी बैंड बेहद मशहूर रहा है उनके पास कैसिओ का कीबोर्ड भी हुआ करता था..गाँव की बारात में एक जिम्मेदार शख्स की मौजूदगी अनिवार्य होती थी जो बारात के मस्ती में चूर युवाओ को धमका कर बारात को आगे ले जा सके क्योंकि युवाओं की जिद ज्यादा देर डांस करने की होती थी ऐसे में ठेली खींचने वाले शख्स की बड़ी मुसीबत होती थी वो आगे बढे और मय में डूबे दुल्हे के दोस्त ठेली को उतना ही पीछे धकेल देते थे ऐसे में उस जिम्मेदार शख्स का आदेश ही काम आता है उन दिनों रिश्तों की लिहाज़ भी होती थी अपने बाप से ज्यादा डर ताऊ से लगा करता था इसलिए कोई भी पीकर कम से कम अपने ताऊ के सामने नही पड़ता था...चाचा का रिश्ता दोस्तनुमा ही होता था.और पीने का काम भी बेहद गोपनीय होता था आज की तरह बियर की भी सामजिक स्वीकृति नही होती थी.
बारात में ऐसे ताऊ टाइप के लोग किसी खलनायक से कम नही होते थे लेकिन सब एक सिस्टम का हिस्सा होता था जहाँ नाचने वाले को भी पता होता था कि वो शादी ब्याह के नाम पर कितनी छुट ले सकता है. गाँव में बैंड के सामने नाचने वाले भी बहुत शरमा कर खुल पाते थे कुछ ही ऐसे होते जो शुरू से लेकर आखिर तक डांस में मस्त रहते थे और जो खुलकर नाच रहा होता था उसके बारे में सब की ये एक ही राय बनती थी कि इसने सोमरस का पान किया हुआ है. बारात में नाचने कि एक प्रेरणा और भी होती थी जिस गाँव बारात जाती थी उस गाँव में छतो पर बहुएं और लड़कियां बारात देखने आती थी वे भी नाचते हुए बांको को देखती और नाचने वाले बांके भी उन्हें देख कर खूब नाचते हालंकि उसमे कोई बेहूदगी की गूंजाइश बेहद कम कम ही होती थी सब सब गतिशील रहता दुल्हे का आगे नाचने वाले नाचते जाते और बारात आगे बढती जाती बस छतो पर चेहरे बदल जाते.
आज तो दूल्हा भी नाच लेता है और उसके दोस्त उसको नचा लेते है लेकिन गाँव में दुल्हे का नाचना ठीक नही माना जाता था उससे गंभीरता की ही अपेक्षा की जाती थी..इसलिए मेरे दौर के दोस्त अपने दुल्हे बने दोस्त को नाचने का आग्रह भी नहीं करते थे...बैंड में झूँन झूना बजाने वाले की भी बड़ी मुसीबत रहती थी कोई भी मस्ती में चूर नाचने वाला उसके हाथ से छीन कर खुद बजाने लगता ऐसे में बैंड कि रिदम भी बिगड़ जाती थी फिर बैंड मास्टर गाना बीच में रोक कर दूसरा गाना शुरू करता...ठेली पर चढ़े गायक की भी कम मुसीबत नही होती थी उसकी कुछ उपद्रवी किस्म के बाराती फरमाईश के नाम पर उसकी जान निकाल लेते थे कई बार उसको वो गाना गाने के लिए कहते जो उसको याद भी न हो ऐसे शराबी दोस्तों से बचना उसके लिए मुश्किल काम होता था.
और बैंड में शेष नाग के जैसे बड़े भोंपू कंधे पर लादे दो बुजुर्ग जरुर होते थे जो कभी कभार ही फूंक मारते थे और इसी में उनकी सांस फूल जाती थी फिर वो बीडी पीकर दम भरते थे...बारात में नाचने वाले हर शख्स का चरित्र सामंती होता था वो ईनाम में दस रुपए में बैंड मास्टर को तरसा तरसा कर देता था कई बार उस पर गर्दन मटकवाने के बाद ही उसके हाथ से दस का नोट छूटता था. बैंड मास्टर भी उनकी ये चाल और चेहरा अच्छी तरह से जानता था इसलिए वो भी इस दांव में रहता कि कैसे एक ही बार में ईनाम के दस रूपये झटक लूं.
एक और मजेदार बात होती थी लड़के की शादी में शादी के दिन से पहले चाचा ताऊ एक बार जरुर नाराज़ होते थे कि हमारी रिश्ते में पूछ प्रतीति नही हुई और उनको फूफा मना कर लाते थे इस बिनाह पर कि हम तो आपके भी मेहमान है और वो मान भी जाते थे उसके बाद उस शादी में लड़के का बाप आराम करता था और चाचा ताऊ जमकर मेजबानी करते लेकिन इस मान मुनव्वल की कीमत फूफा नाम का प्राणी भी खूब वसूलता था वो फिर पूरी शादी में वीवीआईपी किस्म का ट्रीटमेंट और प्रोटोकाल लेता था.
तो साहब ऐसी होती थी गाँव कि शादियाँ....अब धीरे धीरे वहां भी बदलाव कि बयार बह रही है...इससे पहले शादी नाम के इस आयोजन का नगरीकरण हो जाए क्या बुरा है जो मेरे जैसा निठल्ला आदमी उसकी किस्सागोई आपके साथ कर ले....
शेष फिर.....

यादों के सहारे बचत की बातें.....

यादों के सहारे बचत की बातें......

12 वी दर्जे में अर्थशास्त्र की किताब में पढ़ा था की ब्याज बचत का पुरस्कार है उस वक़्त केवल परीक्षा के लिहाज़ से केवल परिभाषा याद कर ली थी उस वक़्त इस परिभाषा में छिपी नसीहत को नही समझ पाया था और आज भी बचत के मामले में एकदम से निबट बुद्धू इंसान हूँ कहने को तो दो बैंक अकाउंट है लेकिन दोनों में जिस दिन मुद्रा आती है बेचारी उसके एकाध घंटे बाद ही एटीएम के हलक से मैं निगलवा लेता हूँ हाँ बस काम चल रहा है जैसे तैसे इसलिए सोचता नहीं हूँ सच तो यह भी है कि अभी आमदनी इतनी है भी नहीं कि बचत के रूप में इन्वेस्ट कर सकूँ अभी तो गाँव की एक कहावत के हिसाब से 'गेल गल्ला गेल पल्ला' (तुरंत आमंदनी और तुरंत खर्च ) करके जिंदगी चल रही है कभी कभी कुछ भाई-बंधू और दोस्त सलाह देते है कि कम से कम एक मेडिक्लैम पालिसी तो ले ही लो क्योंकि बुरा वक़्त बता कर नहीं आता है उस वक्त उनकी बात ठीक लगती है लेकिन बाद में सायास भूल जाता हूँ. आज बचत पुराण बांचने की एक वजह और भी है आज मुझे अपने माँ (दादी जी ) की एक आदत याद आ रही थी वैसे तो हम गाँव के बड़े जमीदार रहे है लेकिन कभी उस किस्म साहूकार कभी नहीं रहे कि हमारा पैसा गाँव में ब्याज पर चलता हो बस अपना काम चलता रहा है वजह एक यह भी थी कि मेरे पिताजी हद दर्जे के खर्चीले इंसान रहे है उनकी इस आदत से बहुत से लोगो को प्रश्रय मिलता रहा है....मेरी माँ (दादी जी ) को हमने बचपन से छोटी छोटी बचत करते देखा है उनके पास अनुभव था एक प्रतिबद्धता थी कि हमे आत्मनिर्भर बनाना है और हमे इस भाव से बड़ा करना है कि कभी अपनी पैतृक संपत्ति पर अभिमान नही करना है उन्होंने हमने यह सिखाया कि खुद के श्रम से अर्जित मुद्रा पर ही हमारा अधिकार होता है हम उसे अपने मन के मुताबिक़ खर्च कर सके उनकी मान्यता रही है कि पैतृक संपत्ति को लेकर हमारी दो ही जिम्मेदारियां है एक तो वह सुरक्षित रहे दूसरा उसको हम अपनी अगली पीढ़ी को यथारूप में स्थानांतरित कर सके.
मैं जब शायद पांचवी पढता था तब उन्होंने मेरे नाम से 25 रूपये महीने की गाँव के डाकघर में आरडी शुरू करवाई थी मेरी ही नहीं मेरे बाकि भाई बहनों के नाम से भी ही उन्होंने यही खाता खुलवाया था...वो हर महीने जमा करती रहती है और हमे याद भी नहीं था कि हमारे नाम से ऐसे कोई खाते भी है. वो साल दर साल जमा करती रही और जब वो राशि दो हजार हो गयी फिर उन्होंने उसके हमारे नाम से किसान विकास पत्र खरीद लिए बाद में हर पांच साल में वो रकम दुगनी होने पर उसको बदलवा देती थी...उन्होंने हमे भी नहीं बताया था कि ऐसी कोई बचत हमारे नाम से हो रही है...फिर एक दिन उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा कि ये मैंने तुम सब के नाम थोड़ी सी बचत की है अब ये कागज़ तुम सब अपने अपने पास रखो...और जब जीवन में ऐसी भीड़ आ पड़े कि कंही से पैसे न मिल रहे हो और बेहद वाजिब ढंग से तुम्हे पैसो कि सख्त जरुरत हो तब इनको तुडवा कर अपना काम चला लेना ये पैसा तुम्हारे तब काम आएगा....उनके ये वचन किसी आशीर्वाद की तरह से एकदम से सही सच हुए आप यकीन नहीं करेंगे की एक वक्त मुझ पर ऐसा ही आन पड़ा था की कही से भी पैसा नहीं मिल पा रहा था और मुझे पैसो की सख्त जरुरत थी तब मुझे अपनी माँ के दिए किसान विकास पत्र की याद आयी और वो 25 रूपए महीने की मासिक बचत से बने किसान विकास पत्र ने मेरी पूरे 15000 की मदद की....और मेरे बड़े छोटे भाई-बहन के भी ऐसे ही वक्त में वो पैसा काम आया....तब मुझे एहसास हुआ की घर के बड़े बुजुर्ग वास्तव में कितने दूरदर्शी होते हैं और वो धन की उपयोगिता हम से बेहतर समझते थे क्योंकि उन्होंने अभाव देखा होता था... आज जब हम बचत के नाम पर सोचते है कि क्यों अपनी जरूरतों का गला घोंटा जाए ऐसे में उस दौर के लोग याद आते है जो अपने वर्तमान को संघर्ष की चक्की में पीस कर हमारा भविष्य सुरक्षित कर रहे थे.

मनुष्य बनाम देवता


मुझे मनुष्य मानवीय कमजोरियों के साथ ही प्रिय है यदि कोई इंसान देवत्व को प्राप्त हो जाता है फिर वह प्रेम करने के काबिल नही बचता है फिर तो उसकी उपासना ही की जा सकती है जैसे निर्जीव पत्थरों की मन्दिरों में की जाती है उस देवत्व के साथ मनुष्य कितना मजबूर होगा जहाँ वह हमेशा एक स्थिति में बना रहें इसलिए मुझे वक्त और हालात से मजबूर इंसान उतना मजबूर नही लगता है जितने देवत्व प्राप्त करने में दिन-भर लंद-फंद करने वाला शातिर मनुष्य लगता है।
मनुष्य अपने सच-झूठ,अहंकार,विकार,अपेक्षा,सुख-दुख के साथ ही मनुष्य है इससे इतर का दावा करना फिर देवता बनने जैसा है देवता बनने मे कोई बुराई नही है लेकिन फिर आप यह दावा नही कर सकते है कि मै सबके दुख मे दुखी हो जाता हूँ फिर आपके लिए अपने होने का सुख इतना बडा और व्यापक होता है कि उसके बाद आपको सभी लोग जंतु दिखने लगते है।
सकार-नकार पर भाषण झाडने वाले भी कम खतरनाक जीव नही है मेरी समझ से सकार और नकार कुछ नही है केवल दो किस्म की मनस्थितियां है या यूँ कहूँ कि दो किस्म के इमोशनल बफर है जिसमे आदमी बौराया फिरता है यहाँ मै कहता हूँ कि सकार और नकार दोनो को छोडो केवल स्वीकार भाव में जीने का अभ्यास विकसित करो।
मनुष्य तभी तक मनुष्य है जब वह गलती करता है घबराता है फिर गलती करता है टूटता है फिर संभलता है...सच-झूठ पाप-पुण्य से सबके अपने अपने खांचे है जिसमे हम दूसरों को फिट करने की जिद पाल लेते है और फिर निराश घूमते है।
इसलिए कहता हूँ हे ! दूनिया के महान असफल लोगो....सच-झूठ,पाप-पुण्य के मुकदमें में फंसे हुए लोगो....निराश-अवसाद मे डूबे हुए लोगो मेरे लिए आप सम्मानीय है प्रिय है क्योंकि आपने जीवन का हिस्सा जिया है जो देवता बनने के चक्कर में मेरे काबिल दोस्त नही जी पायें है। 

मुसाफिर और अमीर कनबतियां...


मुसाफिर और अमीर कनबतियां....

दो दिन पहले अचानक गाजियाबाद जाना पडा छोटे भाई को डेंगू का डंक लगा है मै घर से निकला और सिंहद्वार (जहाँ से दिल्ली-गाजियाबाद की बस मिलती है) पर बस की प्रतिक्षा करने लगा एकाध बस आयी भी लेकिन उनकी हालत देखकर बैठने की हिम्मत न हुई है मेरे दो मन हो रहे थे कि क्या तो वापिस घर चला जाऊँ और ट्रेन मे रिजर्वेशन होने पर जाने पर विचार करुँ या फिर किसी कार मे लिफ्ट मिल जाएं इस उधेडबुन में मन ही मन संकल्प करने लगा कि कार मे ही जाना है....इसी क्रम मे एक इनोवा कार आती दिखी तो मैने संकोच के साथ हाथ दे दिया उसने थोडी दूर जाकर गाडी रोक दी सामने की सीट पर एक सफारी सूट पहने लाला टाईप का इंसान बैठा था रुकते ही बोला कहाँ जाना है मैने कहा दिल्ली फिर उसने पूछा कि भाडा कितना दोगे मैने कहा 240 हालांकि बाद वापसी मे पता चला कि गाजियाबाद-हरिद्वार का बस का किराया 176 रुपये है...खैर नई इनोवा कार मे एसी में यात्रा करने की एवज़ मे मुझे 240 भी ज्यादा नही लगे।
कार मे बैठने के बाद मेरे अनुमान तंत्र ने काम करना शुरु कर दिया पहले मुझे लगा कि आगे की सीट पर बैठा शख्स गुजराती है शायद वाणिक बुद्धि के चलते लालच में मुझे बैठा भी लिया जब तक हमारे बीच मे मौन रहा तब तक रहस्य बना रहा उन्होने एक बार पूछा कि आप हरिद्वार मे क्या करते है मैने बता दिया कि एक विवि मे मास्टरी करता हूँ...गाजियाबाद तक मै प्राय:चुप रहा या एकाध अपने फोन रिसीव किए लेकिन आगे की सीट पर बैठे शख्स और ड्राईवर में यदा-कदा बात होती रही उनकी बातों मे मैने पहले तो कोई रुचि प्रदर्शित नही की लेकिन बाद मे मै खुद ब खुद उनकी बातचीत मे दिलचस्पी लेने लगा वजह साफ थी उनकी बातों में एक खास किस्म की दूनिया का जिक्र हो रहा था जो मेरे लिए अपरिहार्य किस्म की थी या यूँ कहिए कि अभिजात्य किस्म के लोगो की बतकही में मध्यमवर्गीय मन की रुचि पैदा हो जाना स्वाभाविक ही थी।
पहली बात तो मै यहाँ गलत हुआ कि आगे की सीट पर बैठा गुजराती व्यापारी है वह उस कार का मालिक नही था बल्कि वह कार के मालिक का वफादार सेवक (पीए टाईप ) था उस इनोवा कार का मालिक कोई मिलेनियर/बिलेनियर किस्म उद्योगपति था जो देहरादून में अपने बिजनेस के सिलसिले में आता-जाता रहता था वह भी प्लाईट से  कार तो उसके सेवक ही ले जाते है दिल्ली से देहरादून ताकि उसका जरुरी सामान ले जाया सके।
आगे की सीट पर बैठे पीए टाईप के शख्स और कार ड्राईवर की बातों से अमीर लोगो की दूनिया की कुछ रोचक बातें सुनने को मिली उसका सारांश इस प्रकार है---
1.      वो दोनो लोग किसी मिलेनियर/बिलेनियर किस्म के उद्योगपति के माहताहत काम करेंगे वाले कारिन्दे थे...उनके मालिक का बिजनेस आस्ट्रेलिया से लेकर स्पेन तक फैला हुआ है स्पेन की महारानी के साथ उनके व्यापारिक सम्बंध है वो अक्सर देश से बाहर ही रहते है। साहब अक्सर विदेश मे रहते है।
2.      उस बिजनेसमैने के बेटे ने सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी क्योंकि उसकी पत्नि उसकी जासूसी करती है उसे सन्देह था कि उसके किसी अन्य महिला से सम्बंध है वो उसके दोस्तों से पूछताछ करती थी कि यह ऑफिस न जाकर कहाँ घूमता है यह बात उसको नागवार गुजरी और उसने आत्महत्या कर ली...हालांकि उसके किसी हिमाचल की महिला से विवाहेत्तर सम्बंध थे यह बात पीए साहब ने बताई।
3.      बिजनेसमैने की पत्नि भी तुनकमिज़ाज़ ‘बुढिया’ है यह बात ड्राईवर ने बताई उसने बताया कि मैडम के ड्राईवर ने उसको बताया कि एक बार वह घर से नाराज़ होकर आधी रात को एयरपोर्ट चली गई थी।
4.      उनके साहब के पास प्राडो,ओडी,बीएमडब्ल्य़ू और मर्सडिज़ कारें है साहब को स्पीड से प्यार है यमुना एक्सप्रेस हाईवे पर प्राडो कार 240 किमी/घंटा ही दौड पायी इसलिए इससे नाखुश होकर साहब ने उसी दिन उसको बेचने का ऐलान कर दिया था फिर 1 करोड 56 लाख की ओडी विदेश से मंगवाई।
5.      बिहार मे किसी कार्यक्रम में वहाँ के एक मंत्री के साथ उनके साहब गए थे और मंत्री ने साहब की प्राडो कार मे ही बैठने की इच्छा व्यक्त की इसके बाद मंत्री और साहब को मिली पुलिस एस्कोर्ट पीछे छूट गई क्योंकि उनके पास केवल महिन्दा की जीप था और साहब अपनी प्राडो को दौडा रहे थे।
6.      साहब के यहाँ मंत्री/संत्री का आना जाना लगा रहता है साहब के रिश्तेदार भी रसूखदार लोग कोई सुप्रीमकोर्ट का सीनियर वकील है तो कोई किसी राज्य का एडवोकेट जनरल।
7.      साहब का देहरादून/मसूरी में कोई अभिजात्य किस्म का स्कूल भी है या फिर उनका कोई बच्चा पढता है (जैसा बातों से अनुमान लगा )
8.      साहब दरियादिल भी है अपनी किसी परिचित महिला के बेटो की शादी मे उन्होने उनकी बारात अपनी मर्सडिज़ गाडी मे निकलवाई थी।

..तो साहब इन सब बतकही के बीच मै गाजियाबाद पहूंच गया है बाहर से चमकीली दिखने वाली अमीरों की दूनिया मे भी काफी झोल होते है मुझे तब बशीर बद्र साहब का एक शे’र याद आ रहा था...
कुछ बडे लोगो की मरहूमियाँ न पूछ के बस
गरीब होने का अहसास अब नही होता....
हाँ एक बात मानवीय स्वभाव की जरुर लगी कि अमीर लोगो के सेवक भी भले ही हाई प्रोफाईल दिखते हो लेकिन उनके मन का लालच उन्हे हमेशा प्रभावित कर ही देता है तभी तो मेरे जैसे मुसाफिर को बडे लोगो की कार मे लिफ्ट मिल जाती है और आप सभी को सुनने को ऐसे अंजान किस्म की बतकही...। 

कभी आस्तिक कभी नास्तिक


कभी आस्तिक कभी नास्तिक

बचपन में जीवन की समस्याओं से लडने के लिए भगवान से बडा कोई सहारा नही होता है यह सिखाया गया था मेरी दादी जी खुद नित्यकर्म पूजा प्रकाश मे जीने वाली महिला रही है आज भी है प्रतिदिन घर के मन्दिर के मौजुद सभी देवी-देवताओं के दुध,गंगाजल,दही,शहद पंचामृत आदि से स्नान के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ और उसके उपरांत हवन करना उनकी पिछले पचास सालों की जीवनशैली का हिस्सा बना हुआ है। हमने जैसे होश सम्भाला उन्होने धार्मिक संस्कार के रुप में मेरे हाथ मे तुलसी की माला और दुर्गा सप्तशती की पुस्तक थमा दी थी वैसे तो अमूमन में किसान परिवारों में घर पर पुरुष लोग धार्मिक क्रियाकलापों से विलग ही रहते है लेकिन मेरी दादी जी 28 वर्ष की उम्र से वैधव्य भोगा है इसलिए उनके लिए सबसे बडा हारे का सहारा भगवान ही था उन्होने आजीवन संघर्ष किया आज भी कर रही है उन पर अलग से लिखूंगा किसी दिन। मेरे लिए सुबह स्नान के बाद ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाए विच्चै नम: इस बीज मंत्र की एक माला जपनी और उसके बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ करना अनिवार्य था इसके बाद ही मै नाश्ता करता था आप शायद यकीन नही करेंगे मै बीए तक ऐसे ही धार्मिक और वेदपाठी बना रहा हर महीने पूर्णिमा का व्रत भी रखता था मेरे इस पांडित्य टाईप के जीवन के बारे में मेरे मित्र खुब मजाक किया करते थे लेकिन मै कोई प्रतिक्रिया न करते हुए इस भाव मे बना रहता है कि हे ! ईश्वर ये अज्ञानी है इनकी अपराध क्षमा करों ...मुझे बचपन का एक किस्सा याद है एक बार भैय्या दूज़ पर मै अपनी बुआ के यहाँ सहारनपुर गया वहाँ मैने सुबह उठते ही पूजा की इच्छा व्यक्त की उस वक्त मे 5 वी कक्षा मे पढता था मेरे इस कथन ने उनके पूरे परिवार मे कौतुहल और एक खास किस्म का मजाक का विषय बना दिया मै फिर भी डटा रहा और सबके बीच मे बैठकर पूजा की....।  
हमारे घर पर कर्मकांडी पंडितो द्वारा नियमित रुप पाठ वगैरह होते रहते थे उसमे भी संकल्प लेने वाला और प्रतिदिन पूजा अर्चना करने वाले घर के सदस्य के रुप में मै ही नामित रहा हूँ 10-12 दिन पाठ के बाद यज्ञ के बाद मुझे मुक्ति मिलती थी...वर्ष मे दोनों नवरात्री में मै व्रत रखता था...
और अब मै ना कोई पूजा करता हूँ ना कोई व्रत रखता हूँ ना कभी मन्दिर जाता हूँ इतवार और अन्य छूट्टी के दिन तो सुबह ही बिना कुल्ला-मंजन किए ही भोग लगा लेता हूँ धार्मिक कर्म सब काम पत्नि करती है। मेरे दादी जी के लिए भी मेरा यह परिमार्जित रुप कम आश्चर्य का विषय नही कई बार उन्होने मुझे नसीहत किया अब वो कुछ नही कहती है उन्हे लगता है कि शायद मै जो संघर्ष कर रहा हूँ उसकी एक वजह मेरा अधार्मिक होना भी है (वो मुझे नास्तिक नही मानती है) इसलिए रोजाना अपनी पूजा मे एक सुबह और एक शाम अतिरिक्त माला मेरे नाम से भी जपती है कि इस प्रार्थना के साथ हे ! प्रभु इस बच्चे के अपराध क्षमा करना यह अभी अज्ञानी है।
मै धार्मिक से लगभग नास्तिक कैसा बना इसका जिक्र किसी दूसरी पोस्ट में करुंगा....:)
ईश्वर मेरी मदद करें J

बातें दूरदर्शन की


बातें दूरदर्शन की----

ये उन दिनों की बात है जब इतवार की सुबह सात बजें रंगोली का बेसब्री से इंतजार रहता था पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने गांव जहाँ बिजली यदा-कदा ही आती थी ऐसे में इतवार की सुबह अगर बल्ब जलता अगर दिख जाए तो सुबह इतने उत्साह से शुरु होती थी कि पूछिए मत..सुबह-सुबह बिना नहाए और कुल्ला किए हम भाई-बहन अपने लकडी की बॉडी वाले टैक्सला के ब्लैक एंड व्हाईट टीवी के सामने जम जाते थे। रंगोली को देखने का गजब का उत्साह हुआ करता था। इतवार में सुबह 8.30 पर बागवानी पर केन्द्रित कार्यक्रम अंकुर को अनिच्छापूर्वक देखना क्योंकि 9 बजे मुख्य धारावाहिक आने का समय होता था। पहले रामायण देखी फिर महाभारत फिर चन्द्रकांता और राल्को का भक्ति अभिनन्दन श्री कृष्णा। महाभारत देखने के बाद सम्बोधन में श्री लगाने की आदत सीखी जैसे भ्राता श्री..:) जैसे ही महाभारत टीवी पर समाप्त होता था हम सीधे गलियों से निकल कर अपने घेर मे आ जाते और वहाँ शुरु होता था हम बच्चो का युद्ध और कौरव-पांडव की सेना मे ललकार गुंजती आक्रमण.....मुझे ध्यान है मैने और मेरे मित्र ने बडे जतन से अपना-अपना गांडीव धनुष बनाया था जिससे हम तीरबाजी करके युद्ध मे अर्जुन के माफिक लडा करते थे। 
मैन उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब बुधवार को शाम 8 बजे चित्रहार देखने के लिए जल्दी खाना खाकर अपने अपने बिस्तर पर जम लिया जाता था और टीवी के नजदीक चारपाई रखने की जिद हुआ करती थी। शुक्रवार को हिन्दी फीचर फिल्म देखने के चक्कर में अपनी माताजी (दादीजी) से गालियां सुनने को मिलती थी उन दिनों फिल्मों के बीच में विज्ञापन नही आया करते थे बस आधे घंटे का एक ब्रेक हुआ करता था उसी बीच में हम जल्दी से खाना पीना निबटा लेते थे और फिर से फिल्म देखने में लग जाते थे।
मै उन दिनों को याद कर रहा हूँ जब डीडी मेट्रो पर इतिहास सीरियल देखना अच्छा लगता था..वक्त की रफ्तार के डीएम (दिव्य मोहन बने रज़ा मुराद साहब) को देखने का एक अलग ही चस्का था फिर 3.30 पर श्रीप्रदा अभिनीत अपराजिता भी देखना लगभग तयशुदा हुआ करता था।  डी डी पर ‘स्कूल डेज़’ ‘सी हॉक ’ ‘युग’ ‘बुनियाद’ ‘हम लोग’ व्योमकेश बक्शी और शक्तिमान देखने का एक अजीब ही दौर रहा है अपना भी। डी डी की साप्ताहिकी देखना भी इसलिए रुचिपूर्ण लगता था क्योंकि उसमें उस सप्ताह दिखाई जाने वाली फीचर फिल्मों का नाम पता चल जाता था।
रामायण,महाभारत,चन्द्रकांता और श्री कृष्णा ये ऐसे धारावाहिक रहे है जो दूसरों के घर जाकर भी देखें जैसा मै पहले लिख चुका हूँ कि हमारे गांव मे लाईट का आना एक विरल संयोग का मामला होता था और हमारी टीवी बडा था वह बैट्री पर चल नही सकता था ऐसे में हम दूसरे लोगो के घर बैट्री के पोर्टेबल टीवी पर ये सीरिलय देखा करते थे और इन लोगो का घर इतवार के दिन हाऊसफुल रहता था गर्मी और उमस के बीच हम सभी टीवी देखते थे एक जमीदार परिवार से ताल्लुक रखने की वजह से हमे तो फिर भी बैठने के लिए चारपाई/कुर्सी आदि मिल जाती थी लेकिन बाकि बच्चें तो जमीन पर ही बैठते थे और घर का मालिक अपने कमरे को हाउसफुल देखकर घर का मुख्य गेट बंद कर देता था और बाकि बच्चे बाहर खडे गेट पीटते रहते थे वो दिन गज़ब के थे जब इतवार से पहले ही इन बैट्री चलित टीवी के मालिको को ताकीद करनी शुरु हो जाती थी कि भाई इतवार में बैट्री का इंतजाम रखना और बैट्री भी पडौस के गांव से रिचार्ज़ करवा कर लायी जाती थी।
डी डी के समाचार प्रस्तुत करने वाले एंकर अभी याद स्मृति में बसे है वेदप्रकाश,शमी नारंग,मंजरी जोशी.....और अंग्रेजी वाले सुमित टंडन भी।
टीवी देखने और फिल्मों की परम्परा में एक और रोमांचक चीज़ होती थी वह थी वीसीआर का गांव मे आना अलबत्ता तो गांव के जमीदार टाईप के लोग वीसीआर किराये पर ला पाते थे लेकिन उनके लिए भी वीसीआर लाने के बाद उसकी गोपनीयता बनाए रखने का बडा संकट होता था पता नही कैसे बात लीक हो जाती थी और फिर आग की तरह गांव के बच्चों में यह बात फैल जाती थी कि फलाँ शख्स के यहाँ वीसीआर आया हुआ है बस उसके बाद तो उसके घर पर जो धावा बोला जाता था पूछिए मत....घर का एक बंदा बच्चों को भागने के लिए खडा रहता था।
....तो साहब ऐसी थी अपने गांव की दूनिया जहाँ मनोरंजन के नाम पर ब्लैक एंड व्हाईट टीवी और चैनल के नाम पर डीडी वन और डी डी मैट्रो हुआ करता लेकिन कुछ भी मजा खुब आता था आज जब हम डीटीएच युग मे जी रहे है तब भी टीवी देखने का वो मजा नही मिलता जो हमने बचपन मे लूटा था।
सामजिक होना अपने आप मे एक बडा कौशल है। कुछ अपने दोस्तों को देखता हूँ तो वे इतने मिलनसार और सामाजिक किस्म के जीव है कि उन्हें सामाजिक रुप से मेल मिलाप मे रत्ती भर भी संकोच नही होता है दोस्तों के यहाँ चाय से लेकर खाने तक की तारीफ करने में उनकी हाजिर जवाबी का जवाब नही होता है ऐसे हंसमुख दोस्तों की वजह से हमारे जैसे मूक लोगो की पत्नियों को भी आत्मगौरव को महसूस करने का अवसर मिलता है। एक हम है निपट एकांतप्रिय और दोस्तों की बच्चों और पत्नियों से गप्पे मारने के मामलें में नितांत संकोची मेरे सामने कई बार धर्म संकट तब होता है जब अच्छे खाने की तारीफ करने का अवसर आता है ऐसा नही है कि मेरे पास शब्दाभाव होता है लेकिन स्वाभाविक रुप से मूंह से वो बोल नही फूटते है जिससे सामने वाले को खुशी मिले....हाँ अब तो हालत यह है कि दोस्तों के सामने भी चुस्त जुमलेबाजी से परहेज करने लगा हूँ क्योंकि मेरी बातों से व्यंग्य का जायका आता है ऐसे बहुत से दोस्तों को शिकायत होने लगी थी।
खैर..सारांश यही है कि आदमी को सामाजिक,व्यवहार कुशल,हंसमुख और मिलनसार होना न कि मेरे जैसा जो संकोचं

त्यौहारी सीज़न


त्यौहारी सीज़न

मन बैचेन....बडा विकल

मनोविज्ञान के व्याधि वर्गीकरण के लिहाज़ से यह सीधे तौर पर ‘क्रोनिक डिप्रेशन’ का मसला है लेकिन अवसाद की एक नियत मात्रा हर संवेदनशील जीव की नियति मे ही लिखी होती है इसलिए इस पर मै चिंतित होने की बजाय चर्चा कर रहा हूँ और मै अकेला इस से पीडित नही हूँ मेरे इर्द-गिर्द और भी ऐसे लोग है जो ठीक ऐसा ही महसूस करते है जब-जब कोई त्यौहार नजदीक आता है और बात केवल त्यौहार तक ही नही सीमित है हर कोई उत्सव या सामाजिक भागीदारी का आयोजन अपने साथ एक खास किस्म की बैचेनी लेकर आता है यह किसी के विरोध में भी नही है और न ही किसी की उत्सवधर्मिता को खारिज़ करने की प्रवृत्ति है लेकिन न जाने क्यों उत्सव के नजदीक आते ही एक अजीब सा सहम चढने लगता है बस मन मे कोई आशा होती है तो उसके जल्दी गुजर जाने की शहर की औपचारिकता से हमेशा ही चिढ रही है लेकिन उससे बचकर गांव जाने के उपक्रम में भी अब पहले वाली खुशी गायब होती जा रही है पहले कम से कम यह संतोष होता था कि दीपावली पर गांव मे जाकर पुराने दोस्तों से मिलना हो जाएगा लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो अब उसका भी चाव जैसा कुछ नही है बस एक परिपाटी के तहत जाना-आना होता है।
करवा चौथ से शुरु हुआ त्यौहारी आतंक भैय्या दूज़ पर समाप्त होता है मेरी पत्नी के लिए मेरे ऐसा व्यवहार निश्चित रुप अप्रिय किस्म का रहता है उसे मेरे इस तरह से सामाजिक दुर्भीति (फोबिया) से पीडित होने पर बडे अजीब से दौर से गुजरना पडता है। करवा चौथ से तो खैर मेरी सैद्धांतिक भी दूरी रही है यह तो स्टार प्लस के टीवी सीरियलों ने ग्लैमराईज्ड किया है बाकि बाजार की अपनी ताकत है जो सबको बाध्य कर देती है अन्यथा किसान परिवारों में करवा चौथ की व्रत नही रखा जाता था।
मन से उत्सवधर्मिता का विलोपन अपने आप इतना अजीब किस्म का होता है कि आप केवल होली दीवाली पर ही नही उदास होते है बल्कि अपने जन्मदिन, विवाह की सालगिरह और यहाँ तक बच्चों के जन्मदिन में भी कोई खास रुचि प्रदर्शित नही करते है कुछ दोस्तों की नसीहतों के चलते पिछले दो साल से दोनो बच्चों का जन्मदिन मनाया जाता है बाकि मैने खुद का जन्मदिन कभी नही मनाया पहले तो जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर फोन ऑफ कर लेता था क्योंकि उस दिन शुभकामनाएं देने वालो की अचानक से भरमार हो जाती थी भले ही साल भर उनसे इतनी बात न होती हो लेकिन इन दो अवसरों पर फोन आकर मुझे शुभकामनाओं से आप्लावित कर देते थे फिर पत्नी की ये भी ताकीद रहती थी कि मुझे भी सबको फोन करना है वो सबकी डेट्स याद रखती और मुझे बताती फिर मै पूरे बेमन उनकी शुभकामनाएं लौटाने का उपक्रम करता था।
शुभकामनाओं का मसला एसएमएस तक ही सीमित रहे तब भी पाचन योग्य हो सकता है लेकिन फोन पर अपने जन्मदिन की विश सुनकर फिर मै बडा असहज़ हो जाता हूँ बडी मुश्किल से थैंक यू शब्द निकलता है पहले तो यही लगता कि जैसे हलक मे अटक गया हो ठीक यही स्थिति अपनी शादी की सालगिरह पर महसूस करता रहा हूँ।
यह सब पढने के बाद हो सकता है आपको इस बात पर भी सन्देह हो कि मै मनोविज्ञान मे स्नातकोत्तर एवं पीएचडी हूँ तथा पिछले 6 साल से एक विश्वविद्यालय में यही विषय पढा भी रहा हूँ लेकिन त्यौहार को लेकर मेरे मन में जो ज्वार-भाटा चलता है वह आपसे ब्याँ कर दिया है यह क्यों होता है उसकी अपनी वजह है जो मै जानता भी हूँ शायद एक बडी वजह तो यही है कि मै बदलते वक्त के साथ खुद को बदल नही पाया हूँ आज भी अतीत व्यवसनी हूँ इसलिए हमेशा अतीत का ही महिमामंडन करता रहता हूँ पुरानी यादें..पुराने लोग मुझे आज भी बांधे हुए है नए जमाने की नई चाल से शायद मै कदमताल नही मिला पाया इसलिए वर्तमान के अति उत्साही रफ्तार पसन्द समाज़ मे खुद को अप्रासंगिक पाता हूँ दूसरी एक वजह यह भी है कि मै जीवन को सहज रखना चाहता हूँ मेरी अधिकतम कोशिस यही रहती है कि बिना किसी भी औपचारिकता के जिया जा सके और शायद त्यौहारी मस्ती आपके मूल स्वभाव को उपेक्षित कर आपको हद दर्जे का हंसमुख और औपचारिक व्यवहार करने के लिए बाध्य करती है। 
यह मनस्थिति उदासी जैसी भी नही है बल्कि यह एक खास किस्म की निरपेक्षता का भाव है अनासक्ति जैसा जहाँ किसी खास दिन के आने का इंतजार या उत्साह मन में नही रहता है आध्यात्म और ध्यान के लिहाज़ से यह प्रखर स्थिति है लेकिन मै न तो आध्यात्मिक हूँ और न ही ध्यान मार्ग का पथिक इसलिए इस मनस्थिति का युक्तिकरण नही कर पा रहा हूँ यह बस अपने अस्तित्व का हिस्सा भर लगती है जो एक लम्बे समय से बनी हुई है या यूँ कहूँ जब मुझे संज्ञान है तभी से बनी हुई है। अब जो है सो है।

एक किरदार ऐसा भी- 3


बातें गांव की----

एक किरदार ऐसा भी- 3

गांव के कुछ आम दिखने वाले किरदारों का जिक्र जब चल ही निकला है तब मेरे जेहन मे एक के बाद एक ऐसे किरदार सामने आ रहे है जो गांव की जीवनशैली और वहाँ के सामाजिक परिवेश के लिहाज़ से कोई खास नही रहे है लेकिन उनकी विशिष्टता उनके होने मे रही है वैसे तो हर शख्स के अन्दर कोई न कोई काबलियत होती ही है लेकिन अपने फन को अपने जीने की वजह बना लेने वाले शख्स विरले ही होते है आज एक ऐसे ही शख्स से आपका परिचय करवा रहा हूँ जो हमारे गांव का अजीब ही फनकार था।
वो शख्स जन्मांध था नाम था रमेश गांव के दलित परिवार मे उसका जन्म हुआ और गांव के लोग उसे रमेश अन्धा कहते थे हालांकि नाम के साथ अन्धा सम्बोधन कतिपय व्यंग्य के रुप मे नही था लेकिन गांव मे नाम के साथ बौंग (उपनाम) जोडने की आदत रहती है इसलिए उसके अन्धेपन की वजह से लोग उसको रमेश अन्धा कहते थे वो जन्मांध था लेकिन प्रकृति अपनी विकृति के साथ भी न्याय का नुक्ता लगा कर भेजती है यही नुक्ता दूनिया को फन नजर आने लगता है रमेश की कहानी भी ठीक ऐसी है जहाँ वह एक तरफ निपट अन्धता से पीडित था वही उसका सवेंदी तंत्र (सेंसेरी सिस्टम) सामान्य इंसान से कही गुना अधिक विकसित था उसकी कहानी आज के वक्त में डिस्कवरी जैसे चैनल के लिए डाक्यूमेंटरी फिल्म का विषय बन सकती थी। रमेश के पास परिवार के नाम पर केवल उसकी मां थी वो भी जल्दी ही उसका साथ छोड गई उसके बाद वह नितांत ही अकेला हो गया था गांव का ही एक दलित परिवार में उसके लिए दो वक्त की रोटी का प्रबंध करता था लेकिन रमेश कभी उस परिवार पर उस रुप मे निर्भर नही रहा कि वह अपनी विकलांगता के साथ निठल्ला पडा खाता रहे...रमेश एक प्रतिभाशाली इंसान था और उसने अपने विकसित संवेदी तंत्र को ही अपना फन बना लिया और इसी से उसकी रोजी,रोटी,बीडी और दारु आदि का प्रबंध हो जाया करता था। मुझे याद है वो गले में एक बस कडैंक्टर वाला काला बैग और कांधे पर एक प्लास्टिक की फोल्डिंग कुर्सी लटका कर सुबह सुबह गांव के बस स्टैंड पर आ जाता था मैने जब से होश सम्भाला उसको गांव के बस स्टैंड पर ही प्राईवेट बस के एजेंट के रुप मे काम करते पाया। गांव के बस स्टैंड पर वह प्राईवेट बस का एजेंट था वहाँ एजेंट का  मतलब प्राईवेट बस आपरेटर्स का एक प्रतिनिधि जो यांत्रियों को बस के समय से आने की/विलम्ब से आने या आखिरी गाडी की सूचना देता था वो गांव के बस स्टैंड का पूछताछ ब्यूरों था गांव मे आने वाले हर बस उसको रुपया दो रुपया देती थी वह गांव मे आने वाली बसों के कंडक्टर के लिए राह आसान करता था मसलन कंडक्टर को यात्रियों को इकट्टा नही करना पडता था एक जन्मांध इंसान के लिए देखने मे यह काम बेहद जटिल प्रतीत होता है लेकिन रमेश के लिए यह उतना ही सहज़ था जितना एक सामान्य इंसान के लिए यही उसकी प्रतिभा थी वह अंधा भले ही था लेकिन उसका फन देखिए कि वो दूर से आती गाडी का हार्न सुनकर बता देता था कि फलां नम्बर की बस आ रही है यही नही वह अनपढ होते हुए भी बस के पीछे नम्बर प्लेट पर हाथ फिरा कर बता देता था कि इस गाडी का नम्बर यह है...रमेश रुपये के नोट पर हाथ फिरा कर बता देता था कि यह इतने रुपये का  नोट है यह सब तो उसके विकसित संवेदी तंत्र का कमाल था जो उसकी अन्धेपन की वजह से विकसित हो गया था इसके अलावा जब कभी बस समय से पहले आ जाती थी तब वह बस मे अन्दर बैठ जाता  और बस की लोहे की बॉडी को पर अपने हाथ चलाता तथा उस निर्जीव टीन को गजब की ढोलक बना देता था फिर वो अपनी मस्ती में गाता उसके पास एक और कला थी वह मूंह से ब्रास बैंड की आवाज़ निकाल लेता था फिर ढोलक और ब्रास बैंड की जुगलबंदी मे गाकर शमां बांध देता था लेकिन स्वाभिमानी इतना था कि उसने कभी गाकर भीख नही मांगी....वह स्वांत सुखाए भाव से गाता था यात्रियों का मनोरंजन करता था उसके गाने के बाद कभी लोग खुश होकर दो चार रुपये दे देते थे और कभी नही भी देते थे लेकिन वह अपनी धुन मे मस्त गाता रहता था....गांव के बस स्टैंड पर जैसे ही बस आती वह एक सचेत उद्घोषक की भांति अपने बैग से निकाल कर सीटी बजाता और फिर एक खास शैली में लोगो को सूचित करता कि फलां-फलां जगह जाने वाले यात्री बस में बैठ जाएं....।
रमेश इसके अलावा मिमिक्री आर्टिस्ट भी था वह फिल्म अभिनेताओं से लेकर जंगली जानवरों तक की आवाज़ बखूबी निकाल लेता था उसका अपना एक अलग ही अन्दाज़-ए-ब्याँ हुआ करता था यह भी उसकी शख्सियत और फनकारी का बडा रोचक पहलू था। गांव के एक दलित परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद भी वह गांव के सभी वर्गो के लोगो के लिए स्नेह का पात्र था लोग-बाग उसके फन की कद्र करते थे।
गांव के बस स्टैंड की किस्सागोई और चहलपहल का एक बडा हिस्सा रमेशा हुआ करता था वो कई बार लोगो की फरमाईश पर भी गाना सुना देता था लेकिन ये सब उसके मूड पर निर्भर होता था अगर उसका मूड नही है तो वह साफ मना कर देता था उसकी साफगोई गजब की होती थी मुझे याद उस दौरान मेरे पिताजी गांव के प्रधान थे और उसने उन्हे ही वोट दी थी लेकिन मेरे पिताजी की कार्यशैली से रमेश थोडा नाखुश था शायद सुनी-सुनाई बातों सें उसे लगता था कि गांव के दलितों का जो भला पिताजी कर सकते थे वो नही कर रहे है एक बार मै बस स्टैंड पर खडा उससे बात करने लगा उसने साफ-साफ मुझे कह दिया उसने कितनी उम्मीद से मेरे पिताजी को वोट दी थी लेकिन अंतत: मेरे पिताजी भी दूसरों ग्राम प्रधानों की तरह ही निकले.....ऐसी थी रमेश की साफगोई...।
एकाध बार वो हमारी बैठक पर भी आया और मेरी फरमाईश पर भी उसने कुछ गाने सुनाएं उसकी मूंह से बैंड की आवाज़ निकालना और कुर्सी के हत्थे को ढोलक बना देने की कला गजब की थी। बस स्टैंड पर शाम तक उसके पास उसकी दिहाडी लायक पैसे जमा हो जाते थे फिर वह अपनी फोल्डिंग कुर्सी को फोल्ड कर अपने कंधे पर टांग अपने घर चला आता था...। जीवन के उत्तार्द्ध में शाम को प्राय: पव्वा पीने की लत ने उसको कमजोर कर दिया था वह एक समय ही खाना खाता था बस यही शराब रमेश की मौत की वजह बनी और सबका मनोरंजन करने वाला रमेश एक दिन चिरनिन्द्रा मे विलीन हो गया।
हमारे गांव का रमेश अंधा एक बहुमुखी प्रतिभा का धनी इंसान था जो जब तक जिया आत्मनिर्भर होकर और स्वाभिमान के साथ जिया वो फक्कड था मस्त था और अपनी ही धुन मे जीने वाला इंसान था वो जब तक जिया अपनी शर्तो के साथ जिया उसने कभी अपने शारीरिक दोष को कमजोरी के रुप में नही प्रस्तुत किया बल्कि वह अपने फन से वह सम्मान से जीने की कला जानता था यही वजह है कि आज भी गांव का बस स्टैंड रमेश की विसिल को बहुत शिद्दत से याद करता था खासकर मै....।

गांव और मनोरंजन.....


गांव और मनोरंजन.....

मनोरंजन भी इंसान की बुनियादी जरुरतों मे से एक है शहर मे जहाँ मनोरंजन के पर्याप्त साधन मौजूद है और ये पहले से ही रहे है वहीं गांव में मनोरंजन के बेहद सीमित विकल्प मौजूद थे टीवी तो नाम मात्र का साधन था क्योंकि गांव मे बिजली ना के ही बराबर आती थी मेरी पीढी के लोगो को याद नही होगा कि उन्होने कभी शाम को गांव मे बिजली की रोशनी में खाना खाया हो हमारी शाम स्थाई रुप डीजल की डिब्बी (डिबरी) और लैम्प,लालटेन से ही रोशन रहती थी।
बात स्कूल से शुरु करता हूँ हम जिस चौपाल के स्कूल में पढते थे वहाँ कभी कभी साईकिल पर पोटली बांधे जादूगर आता था जैसे ही उसकी साईकिल स्कूल के बाहर रुकती हम बच्चों के चेहरों पर खुशी की लहर दौड जाती थी वह जादूगर स्कूल में हेडमास्टर साहब से अपना खेल दिखाने का निवेदन करता प्राय: मास्टर जी रेसिस के बाद  खेल दिखाने पर रजामंद हो जाते थे उस जादूगर के तमाशे के बाद स्कूल की छुट्टी हो जाती थी इस तरह से जादूगर आने का मतलब होता था कि आज स्कूल का हाफ डे होगा....यहाँ मै आपको बताता चलूँ कि गांव मे यह खेल तमाशा दिखाने वाला जादूगर शहर के “सरकार’’ टाईप का जादूगर नही होता था बल्कि वह वेशभूषा से वह हमारे ही बीच का भदेस खेतीहर मजदूर टाईप का शख्स होता था वो प्राय: तहमंद (लुंगी) पहनता था मुझे आज तक नही पता चला कि वो किस जगह के रहने वाले होते थे हालांकि उस समय उनके करतब देखकर मेरे जैसे हर बच्चे की तमन्ना उनका शागिर्द बनने की जरुर होती थी क्योंकि बंद मुठ्ठी से सिक्का गायब कर देना और एक से दो सिक्के बना देना उस वक्त बडा करतब लगता था शहर के बच्चें कभी उस तरह के जादूगर की कल्पना भी नही कर सकते है बल्कि उनके लिए यह यकीन करना भी मुश्किल होगा कि गांव में स्कूल मे ऐसे जादू का तमाशा दिखाया जाता था। उस जादूगर के पास के एक छोटी से लकडी की मूठ होती थी जिससे वह चमत्कार दिखाया करता था और एक कपडे का सांप होता था जिसको वह ‘ठेकेदार’ कहता था यानि बाहर से जादू के माध्यम से जो भी सामान आयेगा उसकी व्यवस्था ‘ठेकेदार’ करता था....जादूगर हम बच्चों के बीच से एक बच्चें को बुलाता था जो उसके तमाशे का हिस्सा बनता था वो इस खेल मे जादूगर का जमुरा बनता था जादूगर के सामने बैठने वाला बच्चा कुछ खास ही ढीट किस्म का होता था मतलब खिलदंडी स्वभाव का होता था कई बार बाहर के दर्शको मे से भी कोई जादूगर के सामने बैठ जाता था....मेरी तरह से बहुत से बच्चों की मां घर से मना करके भेजती थी कि जादूगर के सामने नही बैठना है कई बार हेडमास्टर साहब ही किसी मूंहफट किस्म के बच्चे को बैठने का आदेश दे देते थे ताकि खेल मे रोचकता बनी रहे उसके बाद खेल तमाशा शुरु होता था हालांकि बाद मे हमें पता चला कि उस बच्चे के कान में जादूगर पहले ही निवेदन फूंक देता था कि यह उसकी रोजी का सवाल है इसलिए जैसा वह कहे वैसे ही करता रहे....वो गांव की चौपाल में गजब का तमाशा होता था उसमे जादूगर के चुस्त जुमले चलते और हम सभी बच्चे उस खेल मे ऐसे बंध जाते थे कि पूछिए मत....मै अब एक जुमले का खुब प्रयोग करता हूँ जो मैने जादूगर से ही सीखा है जादूगर कहता था कि उसके पास हाथ की सफाई और नजरबंदी का खेल है.....मै भी कई बार कह देता हूँ कि मै कुछ नही करता केवल हाथ की सफाई और नजरबंदी का खेल करता हूँ।
गांव के लोगो की यह स्थाई मान्यता थी कि जादूगर के पास नजरबंदी की सिद्धि होती है मतलब वो दर्शको की नजर बांध देता है फिर वो जो चाहे दिखाना चाहे दर्शक वही देखते है ( विज्ञान के हिसाब से हिप्नोटिज्म)
तमाशा दिखाने वाले जादूगर के कुछ शाबर किस्म के मंत्र भी होते थे जो मुझे आधे अधूरे याद है जैसे वो अपना सिर हिलाता डुगडुगी बजाता और फिर जो से बोलता..”.गड-गड की खोपडी गड-गड मसान जहाँ सोती है खोपडी वही सोता है मसान”  इस औघड मंत्र का बडा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पडता था हमे वो जादूगर सच मे कोई सिद्ध व्यक्ति लगने लगता जो अलौकिक शक्तियों का स्वामी है...वो कई तरह के खेल दिखाता मसलन जमूरे के पिछवाडे को हिलाकर डब्बे मे सिक्को की झडी लगाना,जमुरे के कान से पैसे तोड कर दिखाना.... कई बार जमुरे का लिंग परिवर्तन करना ( राम जाने सच मे क्या होता होगा) जमूरे की हवा जरुर संट हो जाती थी जब वो अपनी जनेन्द्रियाँ चैक करता था....इसके अलावा टैपरिकार्ड मंगाना बिना बैटरी और बिजली के पांच गाने सुनवाना वो भी उसके मौखिक आदेश पर जब वह कहता गाना बजता और जब  वह कहता कि रुक जा गाना रुक जाता था हम सब बच्चे यह देखकर रोमांचित हो जाते थे इसके अलावा जमुरे की शादी के लिए कपडे मंगवाना कभी कभी रसगुल्ले भी खिलवा देता था...अक्सर सभी जादूगरों के पास यही करतब होते थे कुछेक ऐसे भी होते थे जो छूरे से अपने बच्चे की गर्दन कलम करने का करतब दिखाते थे परदे के नीचे बच्चे को लिटाकर उसकी गर्दन गेंद की तरह लुडका कर दिखाते और दर्शकों पर मानसिक दबाव बनाने के लिए कहते कि अगर आप चाहे तो खून भी निकाल कर दिखा सकता हूँ उस समय सभी दर्शक डरे सहमे होते थे और वो एकस्वर में मना कर देते कि नही नही भाई ऐसा मत करो.... इस खेल को दिखाने से पहले वह सभी दर्शको को पॉज़ भी कर देता था वह कहता था कि कोई भी अपने पैर की मिट्टी नही छोडेगा अगर किसी ने ऐसा किया तो उसका खेल बिगड जाएगा और उसके बच्चे की जान को खतरा हो जाएगा यह उसके तमाशे का आखिरी आईटम होता था उसे यह भय रहता था कि लोग चुपचाप खिसकना न शुरु कर दे इसलिए वह लोगो को रोके रखने के लिए यह सब कहता था खेल दिखाने के बाद   जादूगर कहता कि अब सब बच्चा लोग अपने घर जाओं और अनाज़,आटा,गुड,पैसा जो भी मिले लेकर आओं तभी वह अपने बच्चे को जिन्दा करेगा यह इस तमाशे का सबसे भावुक पल होता था इसके अलावा वह यह भी कहता था कि जो बच्चा ये सामान नही लायेगा उसको रात में भूत परेशान करेंगे और इस डर के मारे बच्चे अपने अपने घरो की तरफ सरपट दौड लगाते और अपनी सामर्थ्यानुसार आटा,गुड,आनाज़ लाकर जादूगर को देते थे....।
इसके बाद जादूगर हेडमास्टर साहब से अपनी डायरी में अपने खेल के बारे में अनुशंसा/प्रतिक्रिया लिखवाता था उसके बाद वह अपनी साईकिल उठाकर निकल लेता था और मेरे जैसे स्कूल के बच्चे उसे अपलक देखते रहते थे...जैसे मानो हमारे बीच से कोई सिद्ध पुरुष जा रहा हो।

मेरे दोस्त....


मेरे दोस्त....

लोग बुरे है कि आप खुद इतनी बुराई से लबरेज़ है कि आपको अच्छाई दिखाई नही देती है या फिर आप स्याह पक्ष देखने के आदी है। आपको अपनी गति भी जांचनी चाहिए कि आप वक्त से पीछे है या वक्त से आगे ऐसा भी हो सकता है कि वक्त के समानांतर होते हुए भी आप पिछडने का स्वांग रच रहे हो आपका नितांत ही निजी सच क्या है ये आपसे बेहतर कौन जान सकता है वैसे आपका सच भी रोज़ बदलता रहता है जो कभी आपको दिव्य होकर लोक की मृगमरीचिकाओं से मुक्त होने का बोध करा देता है तो कभी आपकी भावुकता आपको  लौकिक अपेक्षाओं का इस कदर दास बना देती है कि आप स्वयं के लिए सांत्वनाएं तलाशने और अपनी छ्द्म बौद्धिकता को लोक पर आरोपित करने मे ही अपनी सारी ऊर्जा लगा देते है।
दिन भर के छ्द्म बौद्धिक उपक्रमों का ईमानदारी से विश्लेषण करें तो आप पायेंगे कि आपके सारे प्रयास अपने अर्जित ज्ञान को विशेषीकृत ढंग से प्रस्तुत करने के होते है जिससे आप खुद को भीड से अलग घोषित कर सके आपको लगता है कि आपने जो जाना समझा और सीखा है  वह किन्ही अर्थों मे यूनिक है इसलिए आप जिद पर उतर आते है अपनी बात को स्वीकार कराने के लिए यह एक प्रकार की मनोदशा या इसे मनोविकार भी कहा जा सकता है जिसमें आप अपने होने की वजह अपने आस-पास की बौद्धिक स्वीकृति में तलाशते है।
सच तो यह भी है कि आप अन्दर से एक पराजित चेतना है हालांकि पराजित शब्द उसके लिए उपयुक्त लगता है जो कम से कम युद्ध मे तो उतरा हो आपने तो युद्ध न करने के लिए जो अपनी युक्ति विकसित की है उसे देखकर तो मुझे आपको पराजित कहना भी ठीक नही लग रहा है आपको बोध है कि आपके लिए युद्ध अनिवार्य है आप अपने लडने के क्रम को स्थगित कर सकते है लेकिन उसको समाप्त नही कर सकते इसलिए कायर न होने का दम्भ आपको युद्ध भूमि के इर्द-गिर्द घूमने के लिए बाध्य करता है लेकिन विशुद्ध रुप से आप अपने आत्म के साथ एक पलायनवादी चेतना है जो बुद्धि के कौशल से अपनी अकर्मण्यता और भीरुता को भी युक्तियों के माध्यम इस तरह प्रस्तुत करते है कि सुनने पढने वाले को आपसे रश्क हो जाता है उसे आप संघर्षरत योद्धा लगने लगते है आप अवचेतन में अपने इस प्रतीत करवाने की प्रवृत्ति से रोज लडते है बस यही आपका मानस युद्ध है जो खुद से रोज़ चलता है।
शब्द विलास मे माहिर होने की वजह से आपके आसपास एक ऐसा माहौल पैदा हो गया है जहाँ आप नायक है और कई लोगो के लिए प्रेरणा के केन्द्र भी लेकिन इन अपेक्षाओं के बोझ तले आपको अपने अस्तित्व को टटोलने वाले सवाल जब भी परेशान करते है तब आप नीरस,शुष्क और प्राय: कठोर हो जाते हो आत्म आलोचक बन जाते हो अपनी तरफ तेजी से करीब आती दूनिया के लिए एक झट से दीवार खडी कर देते हो क्योंकि तुम्हे पता है निकटता से तुम्हारे असामान्य जीवन की सच्चाई ज्यादा दिन छिप न सकेगी इसलिए भीड से दूर एकांत मे भागते हो लेकिन एकांत का भी अभ्यास नही है क्योंकि तुम ध्यानी नही हो इसलिए वहाँ का अकेलापन सताता है फिर अपने आसपास एक ऐसा वर्ग खडा करते हो जो तुम्हारी उलझी हुई जिन्दगी मे दिलचस्पी रखता है जिसके लिए तुम्हारे लिखे शब्द कई बार अभिप्रेरणा या दर्शन का बोध कराते है।
लक्ष्य,फोकस,संसाधन भविष्य का संभावित खतरा कुछ भी स्पष्ट रुप से समझ मे नही आता है या तुम समझना नही चाहते हो इसलिए इन सबको साधिकार विस्मृत करके आप अतीत उन किस्सों मे खो जाते है जहाँ से आपको अपने विशिष्ठ होने का बल मिलता है या फिर कलयुग मे चमत्कार की उम्मीद में आत्मसांत्वना देने लगते हो लेकिन मेरे दोस्त विशिष्ठ होने के लिए महज़ दर्शन की चासनी में लिपटी बौद्धिक जुगाली या अभिव्यक्ति की चालाकी से काम नही चलता है विशिष्ठ होने के लिए खुद को स्वाहा करना पडता है उसके बाद आपका व्यक्तित्व खुद प्रवाचक बन जाता है और आप मौन हो जाते है जब तक आप इसके उलट जीवन जी रहे हो समझ लो तब तक आप अपने मार्ग से विलग हो और ऐसी मृगमरीचिका के व्यामोह में पडे हो जो निश्चित रुप से तुम्हे बर्बाद करके ही दम लेगी अभी भी वक्त है संभल सकते हो तो संभल जाओ मेरे दोस्त....!

एक किरदार ऐसा भी- 2


बातें गांव की----

एक किरदार ऐसा भी- 2

अपने गांव की जब भी पडताल करता हूँ तो कुछ चेहरे कुछ चरित्र ऐसे सामने आते है जिनका होना अपने वक्त में भले ही एक आम बात रही हो लेकिन उन किरदारों को महीन ढंग से देखने पर कुछ ऐसे अक्स उभरते कि मुझे लगता है ऐसे लोग पीढियों के लिए किसी नजीर से कम नही है और गांव के सामाजिक भूगोल में उनकी उपयोगिता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कभी उनके दौर मे हुआ करती थी। देखने सुनने में ये लोग बेहद आम नजर आते है लेकिन इनके जीने का ढंग और समग्र व्यक्तित्व बहुत से अर्थो में अनूठा रहा है।
एक ऐसा ही किरदार मेरा गांव से ताल्लुक रखता है जिसका नाम था रोढा माली। रोढा माली वैसे तो कोई खास पढा नही लिखा था लेकिन गांव के सामाजिक तंत्र में उसकी उपस्थिति बहुफलकीय किस्म की थी वह गांव के सामाजिक जीवन में सार्वजनिक आयोजनों और निजी आयोजनों की एक महत्वपूर्ण कडी थी। गांव में हर साल आयोजित होने वाली रामलीला में रोढा माली विदूषक/नकलिया/ मसखरे की भूमिका निभाया करता था उसके अभिनय में इतनी नैसर्गिकता थी कि वह गांव देहात के आम दर्शकों को हंसा-हंसा कर लोट-पोट कर देता था...रामलीला में कई रोल रोढा माली निभाता था वह एक एक्स्ट्रा आर्डनरी एक्टर था  जब भी कोई रोल करने से कोई अभिनेता मना कर देता तब वह रोल रोढा माली को दिया जाता था....गांव में बिना किसी प्रशिक्षण के उसका अभिनय इतना गजब का होता था कि गांव की रामलीला मे चार चांद लग जाते थे।
रोढा माली की पत्नि का निधन युवावस्था में ही हो गया था उसने खुद अपने दो बेटों को पाला और शायद अकेले होने की मजबूरी ने ही रोढा माली के अन्दर की पाक कला को पनपने का मौका दिया मजबूरी जब शौक बन जाती है तब उसका भी निखार अलग ही होता है रोढा माली को खुद रोटी बनाते मैने देखा है। गांव के छिटपुट आयोजन मसलन कथा,भंडारा,जन्मदिन,कन्दूरी आदि में हलवा और पूरी बनाने का काम रोढा माली ही कर लेता था इसके लिए गांव मे बाहर से हलवाई मंगाने की जरुरत नही होती थी ऐसा भी नही है कि वह पेशे से हलवाई था वह तो बस आपसी भाईचारे में लोगो के सुख-दुख में चूल्हा संभाल लेता था न ही उसका कोई फिक्स रेट था कि वो तय करके किसी के यहाँ पूरी हलवा सब्जी बनाने जाता हो जिसने अपनी खुशी से जो उसे दे दिया उसने ले लिए कई बार तो वह सारा दिन भट्टी पर बैठा रहता और शाम को अपने और बच्चों के लिए केवल भोजन लेकर घर वापिस आ जाता है यह उसकी जीवनशैली का हिस्सा था ऐसा नही था कि वह बेगार करके असंतोषी जीवन जी रहा था। गांव के लोग भी उसका खुब ख्याल रखते थे वो हमारे गांव का एक कौशलयुक्त कारीगर था जो अमीर-गरीब का भेद किए बिना सबके लिए उपलब्ध रहता था। गांव में लडकी की शादी में जब बाहर से हलवाई आते तब भी रोढा माली घर वालों की तरफ से एक एक्सपर्ट के रुप में जरुर रहता था खासकर हलवे के मामलें में उसका अन्दाज़ा और अनुमान बेहद सटीक किस्म का होता था वह विजिलेंसी करता था ताकि बाहर से आयें हलवाईयों  कोई भी सामान बर्बाद न कर सके।
रोढा माली का सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब का था वो जब कढाई भट्टी पर चढा देता था उसके बाद उसकी किस्सागोई चलती उसके कुछ साथी भी आ जाते थे और फिर एक खुशनुमा माहौल मे बतकही के बीच खाना-पकाना चलता था।
एक औसत किस्म की जिन्दगी जीते हुए भी मैने कभी रोढा माली को अवसाद या शिकायत करते नही देखा था शायद वो संतुष्टि का जीवन जीना जानता था वो लोकप्रिय और सबके लिए सहज रुप से उपलब्ध था।
गांव के पुरुष सत्तात्मक समाज़ मे रोढा माली एक सेतु के रुप में उपयोगी था मसलन मुहल्ले की महिलाओं में उसकी बहुत अधिक विश्वसनीयता थी किसी महिला को चुपचाप (पति से छिपकर) यदि घी वगैरह बेचना होता था तो वो रोढा माली की मदद लेती थी और महज़ घी ही नही बेचना बल्कि अपनी बेटी के पास कुछ सामान भिजवाना हो तो भी वह रोढा माली की ही मदद लेती थी इसलिए गांव मे ही गांव की रिश्तेदारियों में भी रोढा माली की आवाजाही और सम्मान बना रहता था।
रोढा माली युवा ही विधुर हो गया था लेकिन उसका सम्पूर्ण जीवन निष्कलंक किस्म का रहा मजाल कि कभी किसी ने उसके चरित्र के बारें में कोई उलजलूल किस्म की बात सुनी हो जबकि उसकी उठ-बैठ गांव की महिलाओं में भी खुब होती रहती थी। गांव की ही भाषा मे कहूँ तो वह लंगोट का पक्का आदमी था। 
कुल मिलाकर रोढा माली एक जिन्दादिल इंसान और ऊंच-नीच अमीर-गरीब से परे सबकी जरुरत मे काम आने वाला हमारे गांव का एक कुशल पाक शास्त्री था जिसने एक तरफ तो अपनी कला से लोगो को स्वादिष्ट भोजन खिलाया वहीं अपने अदभुत अभिनय से लोगो को खूब हंसाया भी...।
आज की आपाधापी भरी जिन्दगी में जब कोई बिना स्वार्थ के किसी से बात तक नही करता है ऐसे मे रोढा माली जैसे इंसान का अपने गांव में होना भर गर्व से भर देता है आज मै जब भी गांव के किसी छोटे-मोटे आयोजन में बाहर से आये हलवाई को आते देखता हूँ तब मुझे अपने गांव का रोढा माली बेहद याद आता है। मै फिर से यही कहूंगा अब ऐसे इंसान पैदा होने बंद हो गए है।

एक किरदार ऐसा भी......



बातें अपने गांव की------

एक किरदार ऐसा भी.......

मै जिस शख्स की शख्सियत पर तब्सरा करने जा रहा हूँ उस शख्स के नाम मुझे अक्षर ज्ञान कराने का ओहदा शुमार है यानि मेरी याददाश्त के लिहाज़ से वे मेरे पहले अध्यापक/गुरु थें। सरकारी स्कूल की लचर पढाई के बीच गांव में मॉटेसरी स्कूल खोलने वालें मेरे जीवन के पहले गुरु मास्टर प्रताप सिंह। आज वो इस दूनिया में नही है लेकिन उनकी शख्सियत की विविधता आज भी मेरे जेहन मे बसी हुई है। एक औसत किसान परिवार में जन्म लेने वाले मा.प्रताप सिंह खुद भी ज्यादा शिक्षित नही थे बल्कि जब उन्होने स्कूल खोला तो उन पर गांव के लोगो ने खुब तंज कसे थे कि खुद आठवी पास है यह क्या बच्चों को पढायेगा लेकिन उन्होने वह बात झूठी सिद्ध करके दिखाई वो गजब के मास्टर थे गणित में उनकी विशेष पकड थी और उनका सुलेख मुझे आज भी याद है। चौपाल में उन्होने स्कूल खोला था जिसमे मैने पढना शुरु किया उन्होने हमें अनुशासन और नैतिकता का पाठ पढाया वो खुद भी एक फनकार थे इसलिए अपने रचनात्मक कौशल से उन्होने न जाने कितने पत्थरों को भी तराशा।  मै समझ नही पा रहा हूँ कि उनकी शख्सियत को कहाँ से ब्याँ करना शुरु करूँ वो एक गायक थे,रंगमंच के मंझे हुए कलाकार थे, हारमोनियम से लेकर बैंजो तक गजब की बजाया करते थे।
सुबह गांव के मन्दिर मे 4 बजे जाकर जागरण का शंख बजाना उनकी नियमित दिनचर्या थी उन्होने खुद की कीर्तन/जागरण पार्टी बनाई हुई थी जो न केवल गांव मे बल्कि आसपास के जिलों में भी जगराते वगैरह के लिए जाया करती थी।
मा.प्रताप सिंह मूलत: तो एक रचनाधर्मी व्यक्ति थे और उनकी प्रयोगधर्मिता उनको विशिष्ट बनाती थी अन्यथा एक खुद आंठवी पास व्यक्ति ( बाद मे हाईस्कूल किया था) का गांव मे मॉटेसरी स्कूल खोलना और उसको शिखर तक ले जाना अपने आप मे एक विस्मित करने वाली बाती है तमाम आलोचनाओं के बीच उनका अपने काम और लक्ष्य के प्रति अनुराग निसन्देह गजब का था उन्होने ने जो भी काम किया डूब कर किया और अंत मे एक त्रासद कथा के अंत की तरह इस दूनिया को अलविदा कह गए। मा.प्रताप सिंह ने अपनी उद्यमशीलता की वजह से अपने औसत से नीचे और गरीबी मे जीवन जीने वाले परिवार को एक सम्मानजनक और आर्थिक रुप से सम्पन्न स्थिति तक पहूंचाया उन्होने केवल अपने ही बारें मे नही सोचा बल्कि अपने भाईयों और उनके बच्चों को समान रुप से आगे बढने के अवसर उपलब्ध करायें। अपने अकेले दम पर गांव और आसपास के क्षेत्र का सबसे सफल स्कूल चलाकर दिखाया। गांव की रामलीला में उनके द्वारा अभिनीत रावण का किरदार आज भी कालजयी है उनसे बढिया रावण का किरदार आज तक गांव मे कोई नही निभा पाया है और रामलीला ही नही नाटक कसम में उनके द्वारा निभाया गया  डाकू का किरदार भी हमारे क्षेत्र में उनके अभिनय की व्यापक रेंज का जीवंत उदाहरण बना रहा है।
एक अभिनेता,गायक,अध्यापक,वादक ये कई किरदार है जो मा.प्रताप सिंह मे समायें हुए थे उनकी आवाज़ का कडकपन हम जैसे छात्रों को अनुशासित रखने के लिए पर्याप्त होता था गांव के प्राईमरी स्कूल के छात्रों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना उनकी जिजिविषा और रचनाधर्मिता का उदाहरण था।
अब अंत में उनकी त्रासदी का जिक्र कर रहा हूँ आप यकीन नही करेंगे कि जिन्दगी कैसी यूटर्न ले लेती है कैसे एक धार्मिक व्यक्ति टुकडा-टुकडा बिखरता है... अभी तक जिन-जिन विविधताओं का जिक्र मैने अपने अध्यापक मा.प्रताप सिंह के बारें किया उनके ठीक उलट एक ऐसा हिस्सा मास्टरी जी की जिन्दगी के साथ जुड गया जिसको सुनकर और सोचकर मुझे आजतक भी बडा खेद होता है कई साल स्कूल चलाने के बाद उन्होने स्कूल बंद कर दिया उसके बाद अपनी खेती-बाडी मे लग गए धीरे-धीरे उनकी फनकारी भी हाशिए पर चली गई भजन कीर्तन मंडली चलाने वाला मास्टर चौबीस घंटे शराब के नशे मे धुत्त रहने लगा वजह क्या रही है इसकी मुझे भी ज्यादा जानकारी नही है लेकिन जिस शख्स से हमने नैतिकता और अच्छी-बुरी चीज़ की परख सीखी वह खुद शराब के नशे में बर्बाद हो रहा था और सबसे त्रासद बात उनकी मौत से जुडी हुई है एक दिन शराब के नशे में पडौस के गांव में वो अपने मित्र के पास गए हुए थे वहाँ जमकर शराब पी और रात में छत पर सोने चले गए रात में संभवत: उन्हे प्यास लगी और पानी पीने के लिए अंधेरे में ही छत पर चल दिए और सीधे छत से नीचे सडक पर गिर पडे बस....वही गिरकर उनकी मौत हो गई।
मेरे गांव का एक फनकार,कलाकार और मेरा पहला गुरु ऐसी गुममान और अजीब मौत पर सवार हो इस मतलबी दूनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गया। उस शख्स नें अपने परिवार को बनाया हमारे जैसे बहुत से बच्चों को इस काबिल बनाया कि हम कुछ बन सके गांव में सांस्कृतिक रुप से सीमित संसाधनों के बीच अपनी रचनाधर्मिता को पनपने के लिए अथाह प्रयास किये और उसमें भी सफल हो कर दिखाया और अंत में एक दुखद त्रासद कथा के अंत की तरह मेरे जैसे पूर्व छात्र  के दिल औ दिमाग में यह सवाल सवाल छोड गया कि आखिर ऐसी क्या वजह थी कि जो शख्स शिखर से शून्य की तरफ इतनी गति से बढा जिसकी किसी को उम्मीद नही थी....शायद जिन्दगी कोई इसलिए ही बेवफा कहा गया है ऐसे लोग आने वाली पीढी को नही मिलेंगे शायद अब ऐसे लोग पैदा ही नही होते है अपने समय के एक ऐसे बहुआयामी गुरु से मै दीक्षित हुआ यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।

बातें देहाती मन की----




मैने उन लोगो की बात कर रहा हूँ जो मेरी पीढी के है और गांव से शहर में पहले पढाई और बाद में कामकाज़ के सिलसिले में बस गए है आज भी शहर मे रहने के बावजूद अपनी जीवन शैली मे देहात का दखल इतना बना हुआ है कि हम खुद को शहर की जीवन शैली के अनुकूल नही ढाल पाए हैं यह कोई गर्व या आत्मप्रशंसा की भी बात नही है प्रत्येक जीवनशैली और रहन-सहन की अपनी एक मौलिकता होती है इसलिए मेरा मंतव्य किसी को बेहतर या किसी को कमतर आंकना नही है लेकिन जो कशमकश से मेरा जैसा जीव रोज़ रुबरु होता है (हो सकता है एकाध और भी निकल जाए) वो अपने आप में अजीब ही है। मसलन आज भी मेरी जीवनशैली में खान-पान के रुप में फल स्थान नही बना पायें हैं आज भी फल खरीदने के लिए आंतरिक प्रेरणा का नितांत ही अभाव पाता हूँ ऐसा नही है कोई आर्थिक अचडने हो लेकिन रोजाना घर लौटते समय फलों की ठेलियों के पास से अजीब से अन्यमयस्क मन:स्थिति से गुजर जाता हूँ कई बार ऐसा भी हुआ कि मैने बाईक के ब्रेक मारे और ठेली वाले ने आशा भरी निगाह से मेरी तरफ देखा भी लेकिन फिर इरादा बदल गया और मै चल दिया....आज भी घर मे रोजाना फल खरीदना या घर मे हमेशा फल रखे रहना अपनी आदत मे शामिल नही हो पाया है जबकि अपने कुछ दोस्तों के यहाँ देखता हूँ कि बारह मास उनके यहाँ फल मिलेगा फल के प्रति आकर्षण न होने वजह की पडताल करने के लिए मै देहात के बचपन मे लौटने की कोशिस करता हूँ तब वहाँ पाता हूँ कि वहाँ भी हमारे बाप-परदादा बाजार से शायद ही कभी फल खरीद कर लाते हो सब्जियाँ भी अक्सर खुद के ही खेत में या गांव मे उपलब्ध हो जाती थी...घर पर एकमात्र लोक स्वीकृति प्राप्त और प्राप्य फल था केला...गांव के जीवन में केला एक ऐसा फल है जो मामाओं और फूफाओं के पल्ले ऐसे बंधे था जैसे चोली-दामन का साथ  हो...उनका गांव मे जब भी आना होता था तब उनके हाथ में स्थाई रुप से काली पॉलीथीन में दर्जन भर केले होना अनिवार्य होता था अन्यथा उनकी मेहमान के रुप में बच्चो के द्वारा स्वीकृति संदिग्ध हुआ करती थी...उस दौर मे शायद केले के विक्रेताओं नें भी काली पॉलीथीन उन केला-पिपासु बच्चों के भय से चुनी होगी ताकि उनका खरीददार सुरक्षित रुप से अपने फल रिश्तेंदारों के घर पहूंचा सकें...कई बार तो मुहल्ले के बच्चे बाहर से हे मामा जी.....फूफाजी कहकर आगुंतक मेहमान कर चिपट जाते थे और गर्दन हिलाकर नमस्तें ठोकनें के बाद सीधे नजर केलो की पन्नी पर पडती और बाहर से केलों का भोग लगना शुरु हो जाता गांव में कुछ ऐसे भी किस्से मशहूर रहें है कि मेहमान किसी और का और केलों की पन्नी पडौसी के बच्चें ले उडें.....खैर....इसलिए केला ही एक मात्र एक फल ऐसा है जो हमने बचपन मे खाया वह भी खरीदकर नही इसलिए केला खरीदना हमने सीखा ही नही बल्कि फ्री का केला खाना आज भी पसन्द है यदि घर पर मिल जाएं बस खरीदकर लाना न पडे... आज भी मुझे वह दिन याद है जब हम पूजा में रखे केले चुपचाप उठाकर निकल लेते थे और भगवान बिना भोग के रहते थे।
इसलिए आज भी फल खरीदने का अभ्यास विकसित नही हो पाया है हाँ कभी-कभी अपनी इस कमी के प्रतिपूर्ति के हम जिद में इतने भी फल खरीद लाते है कि वो खाने से पहले सड जाते है या फिर गैर मौसमी फल खरीदकर अपनी इस आदत को सांत्वना देने की कोशिस करते है....खैर कुल मिलाकर बच्चों को फल जरुर खिलाने चाहिए अन्यथा वो कल हमारी तरह से फलों के बारे असामान्य दृष्टिकोण लेकर बडे होंगे.... !
फल के अलावा यही स्थिति जूस पीने की भी है मै अपने अधिकांश दोस्तों को देखता हूँ वो जूस भी अनिवार्य रुप से पीते है जबकि मेरा हलक जूस पीने के मामलें भी सूख जाता है इसकी बनस्पित मुझे लस्सी पीना ज्यादा पसन्द है साथ ही कोल्ड ड्रिंक भी पी लेता हूँ क्योंकि बचपन में दो रुपये की सोडा वाटर (कंचे वाली) अपने लिए बडे आकर्षण की चीज़ थी उसमे भी मसाला (काला नमक) का बफर बनाकर पिया करते थे हालांकि घर वालो की तरफ से उसकी भी मनाही थी लेकिन फिर हम पैसे जोड कर बनिए के यहाँ पहूंच जाते थे और वह बोरी मे बर्फ के बीच से सोडा वाटर की बोतल देता था और वो नमक डालने के बाद जो उबलती थी फिर उसकी एक बून्द भी बर्बाद न होने देने की चुनौति गजब के तनाव से भर देती थी....और यदा-कदा सोडे का उफान नाक से भी निकलता था....क्या दिन थे वो भी...।
इसलिए आज भी आकर्षण के रुप में सोडा युक्त पेय मन और शरीर को स्वीकार्य है लेकिन जूस नही जबकि यह भी जानता हूँ कि जूस फायदेमंद है और फल खरीदने के लिए जन्मजात और पैतृक रुप से अभिप्रेरणा का स्थाई अभाव अक्सर महसूस करता हूँ ऐसा भी नही है मेरे घर पर फल नही खरीदे जाते है मै भी फल खरीदता हूँ लेकिन तब जब मुझ पर मेरा देहाती मन हावी न हो और मै तब बच्चो के पोषण या पत्नि के व्रत की फिकर में फलों को खरीद कर घर लाता हूँ...।
है न बडी अजीब,असामान्य और थोडी रोचक दास्तान...


डिसक्लेमर: यह पोस्ट नितांत ही मेरे व्यक्तिगत मत/जीवनशैली का समर्थन करती है इसका सर्वमान्य होना संदिग्ध है और न ही ऐसा करना लेखक का उद्देश्य है।