Thursday, March 16, 2017

नीलामी

लंदन की मशहूर ऑक्शन गैलरी क्रिस्टीज़ में एक युवा लड़का ऑफिस में पूछ्ताछ करने के उद्देश्य से दाखिल होता है.रिसेप्शन पर पूछ्ताछ करता है. रिसेप्शन पर अटेंडेंट उसकी क्वारी को समझ नही पा रही है. लड़का कहता है वो अपने जीवन के सबसे अमूल्य सपनें नीलाम करना चाहता है क्या उनका यहाँ कोई खरीदार मिल सकता है?

सपने कैसे नीलाम किए जा सकते है अटेंडेंट यह जानना चाहती है वो लड़के से पूछती है सपने कोई वस्तु है? जो उन्हें नीलाम किया जा सके !

लड़का कहता है नीलाम करने के लिए वस्तु होना एक छोटी चीज़ है उसे ऐसा ब्रोकर चाहिए जो उसके सपने नीलाम कर सके. लड़का कहता है उसके पास ऐसे सपने जिन्हें कोई भी खरीदकर दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन सकता है.

अटेंडेंट जानती है वह उसकी कोई मदद नही कर सकती है मगर फिर वो उस बहुमूल्य सपने के बारें में जानना चाहती है जिसे बेचकर लड़का पैसा हासिल करना चाहता है. वो पूछती है आपके सपनें की क्या कीमत है?

लड़का हंसता हुआ कहता है काश ! मैं खुद अपने सपने की कीमत जान पाता मुझे उसकी जो कीमत पता है वो उसकी असल में कीमत नही है वो दरअसल मेरी जरुरत की कीमत है. अटेंडेंट थोड़े कौतुहल से घिर जाती है और कहती है आप अपने सपने को नीलाम करके कैसा महसूस करेंगे?

लड़का कहता है सपना नीलाम करके कोई भी खुश तो नही हो सकता मगर मैं इतने भर से संतोष कर लूंगा कि किसी ने मेरे सपने की सही कीमत लगाई. बेचने वाला खुद को हमेशा एक आत्मसांत्वना देता है कि उसका न्यूनतम मूल्य अभी गिरा नही है, यही हाल मेरे सपने का है मैं इसी उम्मीद पर यहा हूँ कि मेरे सपने का मूल्य शायद यहाँ मिल जाए.

अटेंडेंट कहती है चलिए फर्ज कर लेते है मेरे पास एक पार्टी है जो आपका सपना खरीदने में दिलचस्पी रखती है तब आप अपने सपने की बोली कितने से स्टार्ट करना चाहेंगे?

लडका अब थोडा उदास हो जाता है आपने मुझे यकीन दिलाकर अच्छा नही किया मैं ये सोचकर आया था कि इंसान खुद के सपनों में इतना खोया है वो दूसरे के सपने में क्यों दिलचस्पी लेगा? यदि सपनों की नीलामी सच में हो सकती है तो फिर दुनिया भर में सपने देखने वाले लोग सबसे बड़े व्यापारी है.

माफ़ी चाहूंगा मैंने आपका कीमती वक्त लिया मैं सपने नीलाम तो करना चाहता हूँ मगर उनकी कीमत जानने के लिए मुझे कुछ सपने और देखने होंगे, तब तक यदि आपकी पार्टी रुक सके तो देखिएगा, लडका इतना कहकर वापिस मुड़ जाता है.

अटेंडेंट कहती जिस दिन ये नीलामी हुई उस दिन ये नीलामी घर की आखिरी नीलामी होगी क्योंकि सपनें जहां बिकने शुरू हो जातें है वहां दूसरी चीजें खुद मूल्यहीन हो जाती है.

लडका ये सुनकर मुस्कुराता है मगर अटेंडेंट उसका चेहरा नही देख पाती है.

‘ड्रीम्स अनलिमिटेड’

© डॉ. अजित

चर्च

दृश्य एक:
विलियम चर्च के गार्डन की देखभाल करता है। मैरी उसकी बेटी है दोनों पिता पुत्री ईश्वर को बहुत मानते है।
मैरी एकदिन विलियम से पूछती है क्या गिल्ट मनुष्य को ईश्वर द्वारा दिया जाने वाला दंड है? विलियम उसको चर्च के गार्डन सबसे नाजुक फूल दिखाता है और कहता है हवा और बर्फ से लड़ने की जिद देखो ये जिद ईश्वर की प्रतीक है। मैरी समझ नही पाती वो कहती है क्या जिद को गिल्ट का एक कारण माना जा सकता है? विलियम उसके हाथ में टूटी हुई पत्तियां देता है और कहता मनुष्य की गिल्ट उसका टूटा हुआ अतीत है। जब मनुष्य अपने सन्दर्भ से कटा महसूस करता है तभी उसे गिल्ट होती है।
मैरी एक फूल को तोड़ना चाहती है मगर विलियम उसे मना करता है वो कहता है इसके तुम्हें फूल से आज्ञा लेनी होगी। मैरी पूछती है फूल से आज्ञा लेने का क्या तरीका है? विलियम कहता है किसी को तोड़ने के लिए उसकी देखभाल जरूरी होती है ताकि उसके मन ने जो सन्ताप बचे उसे घृणा शामिल न हो।
इसके बाद मैरी फूल को पानी देती है कोई गीत गुनगुनाने लगती है।

दृश्य दो:
फादर डिफोर्ड के पास एक कपल बैठा है। कपल फादर से पूछता जीसस के पास जिन प्रॉब्लम्स का कोई सॉल्यूशन नही होता है जीसस उनका क्या करते है फादर?
फादर के लिए ये सवाल अनापेक्षित है वो कहते है जीसस के पास किसी प्रॉब्लम्स का सॉल्यूशन नही होता है समाधान बताना उनका काम नही है!
फिर लोग उनसे अपनी प्रॉब्लम्स क्यों शेयर करते है? कपल पूछता है
लोग जीसस से नही खुद से अपनी प्रॉब्लम शेयर करते है जीसस केवल देखतें है जीसस के लिए यह देखना ईश्वर के द्वारा तय किया गया सबसे पवित्र काम है।
तो जीसस क्या केवल साक्षी है? वो हस्तक्षेप नही कर सकते? कपल थोड़े असंतुष्ट होकर सवाल करते है
बिलकुल मनुष्य की प्रॉब्लम को देखना जीसस का काम है प्रॉब्लम क्रिएट करना और उनके समाधान तलाशना मनुष्य का।
दरअसल इस धरती से लेकर उस लोक तक मनुष्य और ईश्वर अपने अपने काम में व्यस्त है दोनों की एक दुसरे में लगभग न के बराबर रुचि है, फादर इतना कहकर अपनी स्टडी रूम में चले जाते है।
कपल जीसस को देखते है और मुस्कुराते है जीसस यथास्थित में सलीब पर टँगे है उन्होंने क्या देखा ये केवल वही बता सकते है।

 © डॉ.अजित

Wednesday, March 8, 2017

सोफी

समन्दर किनारे सोफी अकेली बैठी है। वो रेत पर खुद का नाम लिख कर उसे एक गोल घेरे में कैद कर देती है फिर उसके नीचे एक कोने में स्माइल बनाकर केवल एस लिख देती है।
मुस्कान उसका स्थाई भाव है जो उसके चेहरे पर उदासी पढ़ने का अवसर नही देता है यहां तक खुद उसको भी।
***
सोफी कहती है समन्दर एक बहलावा है मै उससे पूछता हूँ फिर नदी क्या है? नदी एक यात्रा है जिसके सहारे हम किनारों का दुःख पढ़ सकते है।
दुःख क्या केवल लिखे जा सकते है मैंने दुःख पढ़ने पर उसकी प्रतिक्रिया चाहता हूँ इस पर सोफी कहती है दुःख केवल अपने अंदर बसाए जा सकते है वो निकले या न निकले ये उनकी मर्जी।
***
क्या तुम्हें खुद के स्त्री होने पर खेद है? मैंने यूं ही पूछ लिया उस दिन जबकि उस दिन समन्दर किनारे इस बात को पूछने का माहौल नही था।
खेद दरअसल एक सुविधा है मगर खेद कोई मुक्ति नही इसलिए मेरी खेद में रूचि नही है मैं उत्सव और खेद से दोनों से मुक्त रहना चाहता हूँ स्त्री होना मेरे लिए मात्र एक अवस्था नही बल्कि एक अवसर है मै दुःखों को प्राश्रय दे सकती हूँ।
क्या अभी तुम्हारे गले लग सकता हूँ? मैने संकोच से पूछा
गले लगने का कोई समय नही होता है तुम जब चाहों लग सकते हो बशर्ते तुम्हें राहत नसीब हो।
सोफी इतना कहकर मुस्कुरा पड़ती है फिर गले लगने का ख्याल लहर के साथ समन्दर की तरफ लौट जाता है।
***

#सम्वाद 

Tuesday, February 14, 2017

अधूरे खत

कभी कभी लगता है तुम दूर जा रहे हो। इतने दूर कि दोनों आँखों से तुम्हें ठीक से देख नही पाती हूँ। एक आंख बंद करके तुम्हें देखने की कोशिश करती हूँ और ये कोशिश भी तब करती हूँ जब तुम सामने नही होते। तुम्हारी तस्वीर को एक आँख बंद करके देखती हूँ ठीक वैसे ही जैसे किसी को अच्छा खासा नशा हो गया हो।

कभी कभी किसी शायर की शेर की शक्ल में दी गई नसीहत याद आती है कि तुम्हें नजर के ज्यादा करीब ले आई मैं एक हद होती है दिखाई देने की। खाली वक्त में कभी कभी अपनी उंगलिया चटकाते हुए ऐसा लगता है जैसे कुछ हसीन लम्हो को चटकाकर तोड़ रही हूँ मुझे खुद की क्रूरता पर आश्चर्य होता है मै खुद के प्रति इतना निर्मम कब से हुई मुझे खुद ही पता न चला।

आज सुबह मैंने अपने नाखुनों को गौर से देखा उनकी नेलपॉलिश जगह जगह से उतर गई है,नेलपॉलिश उतरना कोई अनूठी बात नही है ये अक्सर होता है मगर मैंने इस बार महसूस किया बची हुई नेलपॉलिश ने नाखुनों पर कुछ अजीब से नक़्शे खींच दिए मुझे कभी वो अधूरे अक्षर लगने लगते है तो कभी कोई समंदरी टापू।

उन्हें देख मुझे खुद पर संदेह होने लगता है कभी इन्ही नाखुनों की कलात्मक बुनावट की मदद से मैंने तुम्हारी हाथ की रेखाएं ठीक वैसे पढ़ी थी जैसे कोई दाल से कंकर बीनता है। अब मुझे खुद के नाखून निर्वासन के पते दिखने लगे है उन पर अलग अलग द्वीपों के मानचित्र और पते रोज़ बन बिगड़ रहे है इन्हें पढ़ने के लिए मुझे तुम्हारी उस गुप्त विद्या की जरूरत है जिसमें तुम उदासी में नाराजगी और और मुस्कान में छिपा दुःख पढ़कर बता दिया करते थे।

क्या तुम सच में बहुत दूर निकल गए हो? या यह मेरा महज एक वहम है! मेरा दिल इसे वहम ही करार देता है मगर दिमाग कहता है कि जो आदमी सामने खड़ा होने के बावजूद धुंधला दिखाई दे रहा है उसका वजूद अब शायद जगह बदल चुका है।
मैं तुम्हें परछाईयों में नही तलाशना चाहती ना तुम्हारी छाया की पीछा करना चाहती हूँ, हो सके तो मुझसे किसी दिन अँधेरे में मिलो मैं तुम्हारी उपस्थिति महसूसना चाहती हूँ इसके लिए मुझे रोशनी की जरूरत नही है क्योंकि रोशनी में केवल तुम्हारी छाया दिखाई देती है तुम नही।

मैं चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष से कृष्ण पक्ष में जाने तक प्रतिक्षा करूंगी मैं तुम्हें अँधेरे में खुली आँखों से देखना चाहती हूँ ये चाह थोड़ी अजीब जरूर है मगर मुझे रोशनी में तुम्हें एक आँख से देखने में अब अच्छा नही लगता यदि तुम सोच रहे हो कि मै कहूंगी कि मुझे ऐसा करके डर लगता है तो ये सच नही है तुम्हारे साथ मुझे इतनी आश्वस्ति है अब मुझे डर किसी बात का नही लगता।

फ़िलहाल जगजीत की एक गजल बज रही है अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना...मैं ऐसी मासूम तमन्ना पर हंस पड़ी हूँ मुझे पता है तुम जाने के लिए ही आओगे मगर मैं पूरे दिल से चाहती हूँ तुम एक और जरूर आओ।

'अधूरे खत'

Saturday, February 11, 2017

सजदा

पीर की मज़ार है। लोबान जल रहा है। सुना है पीर बड़े जलाली थे मगर रहमतों के सदके भी दिल खोल कर बरसाते थे। खादिम जो गद्दानशीं है उसने फ़िरोज़ा पत्थर की कई अंगूठियां पहनी हुई है।

पीर कलन्दर सो रहे है उन्हें जगाने के लिए कव्वाल जूनून के साथ कव्वालियां गा रहें है। पीर एक जरिया है खुदा तलक पहुँचने का खुदा आजकल बैचेन है इसलिए उसने कुछ ताकतें पीर को ही अता कर दी है वो नही चाहता कि इंसान कोई इल्तज़ा करें।

दो आशिक अलग अलग इस मज़ार पर आते है दोनों के मसले और मुकाम जरा अलहदा है। दोनों यहां आकर थोड़े जज़्बाती हो जाते है वो सजदे में झुकते है मगर खुद को भूल जाते है उनकी फ़िक्र में एक दुसरे की फ़िक्र शामिल है।

आदतन वो मन्नतों का कारोबार करते है। गलतफहमियों को भूलने की दरकार करते है। कव्वाली की आवाज़ आ रही है जो कह रही है 'तस्कीन ओ' कल्बे हैदर मेरा सलाम ले जा'
दोनों किसी मुफकिर के कौल से मुतमईन है उन्हें लगता है कि उनकी हाजिरी उनकी जुदाई को हसीं कर देगी। इश्क मजाज़ी में दिल की हरारत जब हसरत बन जाती है तब आशिक का एक किरदार दरवेश से मिलता जुलता हो जाता है।

रूहानी मौसिकी है मगर रूह को यहां भी करार कहाँ है दिल जंगली कबूतर की माफिक न जाने किसका सन्देशा लेकर उड़ गया है उसे न मंजिल का पता है न रहबर का।
मज़ार की तन्हाई जरूर रूह को सुकूँ अता करती है ये तन्हाई मुरीद और मुर्शिद के दरम्यां हसीं गुफ्तगु को देखती है फिर दोनों को इश्क की कलंदरी सिखने के लिए सब्र का वजीफा दे जाती है।

अच्छी बात है दोनों आशिक एक साथ मज़ार पर नही जाते गर ऐसा होता तो दोनों साथ जाते जरूर मगर साथ लौट न पातें। अब अकेले जाते है मगर लौटते है अपने अपने माशूक को साथ लेकर उनके पल्ले एक गिरह मजार बाँध देती है जिस पर हकीकत के सुरमें से लिखा होता है मिलना है तो बिछड़ने का हुनर सीख।

© डॉ. अजित

Wednesday, February 8, 2017

कौतुहल

दृश्य एक:

जंगल में बच्चा अपनी दादी से पूछता है कि पेड़ बड़े है या आदमी?
रास्ते खत्म क्यों होते है?
टूटकर कर पत्ता अकेला क्यों पड़ जाता है?
धूल की एक दिशा क्यों नही होती?
सवाल बड़े वाले है मगर बच्चे के मुंह से सुनकर दादी को अचरज नही होता है वो मुस्कुराती है और कहती है
मेरे बच्चे ! ना पेड़ बड़ा है ना आदमी। दोनों लम्बे छोटे जरूर हो सकते है बड़ा वही है जो शिकायत नही करता है इस लिहाज से पेड़ आदमी से बड़ा हुआ।
रास्ते इसलिए खत्म नही क्योंकि उन्हें मंजिल ने अकेला छोड़ा है जिन्हें मंजिल अकेला छोड़ देती है वो खतम होने की जद से बाहर चले जाते है।
टूटकर पता इसलिए अकेला पड़ जाता है क्योंकि वो मुक्ति का सुख भोग चुका होता है और प्रकृति हर सुख का प्रतिदान लेती है उसका अकेला पड़ जाना उसी प्रतिदान का हिस्सा है।
और धूल की एक दिशा इसलिए नही होती क्योंकि धूल खुद के बस में नही होती वो वेग के लिए हवा और तापमान आदि पर आश्रित है इस जग में जो भी किसी पर आश्रित है उसकी एक दिशा सम्भव नही है।
बच्चा अब कोई सवाल नही करता है वो दादी की पीठ को छूता है और कहता है आपकी पीठ क्यों झुकी है?
दादी उसे हंसते हुए गोद में उठा लेती है और कहती है इसलिए कि तुम्हें आसानी से उठा सकूं।
झुकना हमेशा गिरना नही होता है कभी कभी ये उठाने के लिए भी होता है।

दृश्य दो:

समंदर किनारे दो प्रेमी बैठे है।
प्रेमिका पूछती है
लहर जब लौटकर जाती है तब वो समंदर को क्या बताती है?
प्रेमी जवाब देता है वो किनारे की उदासी समंदर को बताती होगी।
नही तुम श्योर नही हो इसलिए अनुमान व्यक्त किया
थोड़ा सटीक उत्तर दो। सोचो जरा दोबारा सोचो।
लहर बताती होगी किनारे पर कितने उलझे हुए लोग रहते है।
मगर हर वक्त तो किनारे पर लोग नही रहते फिर ऐसा क्यों कहेंगी भला?
लोग चले जातें है मगर उलझन यही छोड़ जाते है प्रेमी ने अपनी बात इस तर्क से पुष्ट की।
तो क्या लहर छूटी हुए बातें गिनने आती है किनारे तक?प्रेमिका कौतुहल से पूछती है।
लहर समंदर की खबरी है ये बात मानने को दिल नही करता मगर तुमने पूछा है इसलिए बता रहा हूँ
लहर समंदर को ये बताती है किनारों के आगे एक समंदर और है।
समंदर का धैर्य अपने बिछड़े भाई से मिलने का धैर्य है।
प्रेमिका अब अपने प्रेमी से कोई सवाल नही करती वो बस अनमनी होकर ज़मीन पर एक दिल बनाती है और उसके नीचे दस्तखत की तरह लिख देती है
ज़िन्दगी !

© डॉ.अजित

Saturday, February 4, 2017

कॉफी

दृश्य एक:

आयरलैंड का कोस्टा कॉफी हाऊस। कॉफ़ी हॉउस का मालिक मैथ्यू अख़बार पढ़ रहा है।
एक कपल कोने में बैठा है उनमें किसी बात को लेकर बहस हो रही है। मैथ्यू के कान उस बहस में पड़ना नही चाहते है वो सेंसेक्स पढ़ रहा है मगर एक बात उसका ध्यान खींच रही है।
लड़की कह रही है तुम झूठे हो लड़का स्वीकार कर रहा है हां मैं झूठा हूँ मगर फिर लड़की कहती है तुम झूठ को ग्लोरिफाइड करने का कौशल जानते हो। लड़का कहता है तुम्हारे अंदर इस कौशल को पहचानने का कौशल है इसलिए उसकी तारीफ करता हूँ।

दृश्य दो:

मैथ्यू उनसे कहता है कि वो उन्हें फ्री में कॉफी ऑफर करना चाहता है दोनों विनम्रता से इस ऑफर को इनकार कर देते है। मैथ्यू दोबारा आग्रह नही करता है वो खुद के आग्रह की वजह नही समझ पाता है ,वो खुद को अन्य काम में बिजी कर लेता है। मगर उनकी बहस से खुद को मुक्त नही कर पा रहा है अब लड़का कह रहा है तुम्हारा प्लान क्या है? क्या तुम ब्रेकअप चाहती हो? लड़की इस पर कहती है ब्रेकअप प्लानिंग से नही लिया जाता है कितनी स्टुपिड बातें करने लगे हो तुम अब।
अब का क्या मतलब है? मेरे सवाल तो हमेशा से ही स्टुपिड रहे है ये अलग बात है तब तुम्हें वो क्यूट लगते थे ये कहकर लड़का हंसने का अभिनय करता है।

दृश्य तीन:

माहौल में अजीब सी शुष्कता पसरी हुई है। कॉफी के झाग पर बना दिल अब अपना आकार बदल रहा है वो सिकुड़ रहा है यही हाल कमोबेश दोनों के दिल का भी है। अचानक से लड़की कहती है 'यू नो सच बात तो ये है तुम अब मुझसे ऊब चुके हो' लड़का इस बात से पूरी तरह सहमत नही है मगर फिर भी वो कहता है मै तुमसे नही खुद से ऊब रहा हूँ दरअसल।
कोई नई बात कहो ये बड़ी पॉपुलर बात है लड़की झिड़कते हुए कहती है।

दृश्य चार:

मैथ्यू एक स्टाफ बॉय से कहता है। तुम कल और आज में क्या फर्क करते हो? स्टाफ बॉय सोच रहा है बात उसकी सेवा की गुणवत्ता से सम्बंधित है इसलिए वो कहता है मै कल की अपेक्षा आज अधिक तत्पर हूँ।
मैथ्यू हंसता है और कहता है डरा हुआ आदमी आकर्षक आधा सच बोलता है। स्टाफ बॉय इसका अर्थ नही समझ पाता वो सहमति में केवल मुस्कुराता है। ज़ाहिर तौर पर यह एक झूठी मुस्कान है।

दृश्य पांच:

बिल कपल की टेबल पर है लड़के ने बिल मंगाया है मगर लड़की चाहती है कि बिल वो भरे इसलिए वो एक कॉफी और ऑर्डर कर देती है। लड़का अब मैथ्यू के ऑफर का जिक्र करता है इस पर लड़की कहती है दुनिया में कुछ भी फ्री नही मिलता है। हर चीज की एक कीमत चुकानी पड़ती है। मुफ़्त शब्द एक यूटोपिया है इसलिए इस पर कम ही भरोसा करना।
इस बात पर दोनों सहमत है। मैथ्यू को ये बात थोड़ी खराब लगी मगर उसे ये बात सच लगी इसलिए उसने खुद को अब जाकर पूरी बातचीत से अलग किया।

पुनश्च:

दोनों ने समय को विमर्शो और तर्कों के जरिए समझने की कोशिश की मगर नाकाम रहे अंत में एक दुसरे के गले लगकर उसी बात को प्यार के जरिए समझना चाहा इस बार वो कामयाब हुए ऐसा नही कहा जा सकता मगर इस बार बातें अपनी सम्पूर्णता में संप्रेषित हुई।
दोनों ने तय किया अगली मुलाकात क्या तो नदी किनारे होगी या फिर किसी चर्च में।

©डॉ.अजित

पूरणमासी

पूर्व पाठ:

कुछ लम्हें हमने चुराए है। ये चोरी वक्त के खिलाफ है इसकी ध्वनि एक सात्विक षड्यंत्र से मिलती है। इस चोरी के लिए बोला गया झूठ कभी ग्लानि या अपराधबोध नही पैदा करता।
इन लम्हों को जीते हुए समय ठहर जाता है इसलिए ब्रह्माण्ड की काल गणना में इनका कोई दस्तावेजी प्रमाण नही मिलेगा। इन लम्हों को चुराने पर अस्तित्व मुग्ध रहता है और ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करता है।

दृश्य एक:

अंग्रेजी में कहा जाए तो ये फुल मून की शाम है मगर यहां मै भारतीय पंचांग की भाषा में कहूँगा आज पूर्णिमा है। दो आवारागर्द वजूद की जुम्बिश में बंधे अपने अपने ठिकाने की तरफ लौट रहे है। दिन भर वो साथ या यूं कहूँ उनके साथ आज दिन था तो ज्यादा ठीक रहेगा। आज मन थोड़ा कुलीन थोड़ा भदेस हुआ जाता है इसलिए वो कहता है आज पूरणमासी है। फुल मून,पूर्णिमा और अब पूरणमासी इन तीन नामकरण में एक बात का साम्य है तीनो पूर्णता का बोध कराते है। सच में आज का दिन एक पूर्ण दिन है सुबह से लेकर शाम तक पल पल को जीने के बाद इस दिन का हिसाब किसी को दिया नही जा सकता है मगर इस दिन को याद करके मुद्दत तक बेवजह जरूर जीया जा सकता है।

दृश्य दो:

चाँद ठीक आसमान के कदमों में आकर बैठ गया है उसे देख चाँद और सूरज में फर्क करना मुश्किल है मगर उसकी सौम्यता को देख ये अनुमान लगाया जा सकता है कि ये धरती से मिलने अपनी पूर्णता के साथ आया है। हो सकता है उसके पास आसमान का कोई पैगाम हो मगर फिलहाल ऐसा लग रहा है ये उन दोनों का निगेहबान है उनके साथ साथ चल रहा है।
रास्तों के हिस्से उसके सवाल आए है मगर रास्ते जिस तेजी से छूट रहे है उन सवालों का जवाब देना सम्भव नही है। फ़िलहाल सवाल सब नेपथ्य में चले गए है आसमान साफ है तो चाँद के दाग भी साफ़ दिख रहे है मगर इस दागों का भी अपना एक सौंदर्य है ऐसा लगता है चाँद पर दो प्रेमी एक दुसरे से रूठे हुए बैठे हो और चाँद उन्हें धरती के नजदीक ले आया हो ताकि वो धरती पर प्रेम की नाराज़गियां देखकर खुद का गुस्सा भूल जाए और सुलह कर लें।

दृश्य तीन:

दिल आज रूमानी होना चाहता है। चाँद की मौजूदगी ने बिखरे एहसासों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। गति के बावजूद चाँद एक पल के लिए आँखों से ओझल नही होता है। उनकी आँखों की चमक बताती है कि ये खुली आँख सपनें देखने की जुर्रत का लम्हा है हाथों में फंसे हाथ अपनी पकड़ मजबूत करते है फ़िलहाल एक आत्मीय मौन पसर गया है दोनों के मध्य। ये सम्मोहन का समय है।
नेपथ्य में मद्धम आवाज़ में कोई गाना बज रहा है मगर फिलहाल उसके संगीत के अलावा किसी और की जरूरत नही है इसलिए गाने के बोल आवारा भटक रहे है।

दृश्य चार:

पुरकशिश लम्हों की चादर ओढ़ ली गई आँखों में थोड़ी बेचैनी थोड़ी उदासी और ढेर सी आश्वस्ति एक साथ बैठी है। पलकों पर विस्मय का बोझ है मगर लबों पे तबस्सुम है। ये तबस्सुम हरकत का मोहताज नही है मगर इसकी अपनी हरारत है। चाँद के पैगाम सीधे दिलों में दस्तक दे रहे गोया उनसे दिल अपने सारे राज बयाँ करना चाहता हो मगर फ़िलहाल वो चुप है उसको चाँद के शिकवे सुनने है। चाँद जब पेड़ो की ओट में छिप जाता है तब दिल एक छोटे बच्चे की तरह मायूस होकर उसे तलाशता है। चाँद दोनों को देख रहा है और अपनी डायरी में उनकी आवारागर्दी के किस्से दर्ज कर रहा है। हो सकता है उसे ये कहानी उन्हें सुनानी हो जिन्हें यकीन करना मुश्किल होता है कि दो लोग बेवजह भी साथ हो सकते है।

सूत्रधार:

चाँद तुम एक धोखा नही हो तुम एक सच हो ठीक वैसे जैसा हमारा सच हमारे मध्य बैठा है। तुम आज बेहद नजदीक हो कल ठीक उतने दूर चले जाओगे मगर उम्मीद है कि गति और प्रेम के सम्मोहन में तुम एक लंबी यात्रा तय करके फिर एकदिन धरती से मिलने आओगे। धरती तुम्हारी प्रेमिका नही है उस पर शायद आसमान का हक ज्यादा है क्योंकि वो उस पर छाया हुआ है।मगर तुम धरती के सच्चे दोस्त हो तुम्हें देख वो उदासी में भी मुस्कुरा सकती है। आज जब तुम इतने नजदीक हो वो तुम्हारे कान के पीछे एक काला टीका लगाना चाहती है उसने अपनी आँख से काजल चुराना चाहा मगर उस वक्त आँख की कोर गिली हो गई इसलिए उसने अपनी तर्जनी से तुम्हारी पीठ पर स्वास्तिक बना दिया है। इसे शुभता का प्रतीक समझना तुम्हारा होना भर धरती के लिए पर्याप्त है वो तुम्हें हासिल नही करना चाहती वो बस तुम्हें यूं ही देखना चाहती है तुम्हें यूं देखकर वो अपने आज को बीते और आने वाले कल से मुक्त कर लेती है।
तुम चाँद हो इसलिए सब समझते हो ज्यादा कहने की जरूरत नही बस आते रहा करो यूं ही कभी मिलने तो कभी किसी को मिलानें।

©डॉ.अजित 

Monday, January 30, 2017

चाय की बातें

दृश्य एक:
सुबह की चाय पी रहा हूँ।चाय पीना एक सामान्य घटना है मगर चाय को महसूस करना एक विलक्षण अनुभव। चाय के ज्ञात अरोमा में बहुत सी गुमशुदा खुशबुएँ भी शामिल रहती है उन्हें महसूस करने के लिए बस नाक छोटी करनी पड़ती है यही कारण है मैं अपनी तमाम निपुणताओं के बावजूद तुम्हें खुद चाय बनाकर पिलाना चाहता हूँ। मुझे पता है मीठा तेज हो गया और अपनी अकुशलता छिपाने के लिए मैं दूध ज्यादा डाल दूंगा। मैं इतना बेख्याल और जल्दबाजी में रहूँगा कि अदरक अपना अर्क उबाल के बीच भी बचा कर ले जाएगा भले ही उसकी चाय की पत्तियों से कोई दोस्ती मरते दम तक न हो मगर वो मेरे हाथ की बनी चाय में अपना स्वाद नही छोड़ना चाहता है। क्यों? वो इसलिए क्योंकि उसे तुम्हारे कंगन और चूड़ियों की जुगलबंदी उसे उपजे संगीत की आदत जो लग गई है।
मुझे पता मेरे हाथ से बनी चाय औसत होगी मगर फिर भी तुम उसे बढ़िया घोषित कर दोगी और इस घोषणा के पीछे मेरी झूठी प्रशंसा शामिल नही होगी अलबत्ता तुम चाहती हो कि मै चाय के लिए किसी पर निर्भर न रहूँ जब दिल करे बनाकर पी लूँ इसलिए तुम चाय की गुणवत्ता पर कोई चर्चा नही करती जबकि मैं तुमसे कुछ टिप्स की उम्मीद लिए बैठा हूँ। मैं तुमसे निराश नही होता हूँ बल्कि चाय के अपने औसत से भी कम स्वाद की प्रशंसा को तुम्हारे बिन रहने की आदत विकसित करने के तौर पर ग्रहण करता हूँ तुम्हें ये बात अच्छी लगती है ये बात मुझे तुम्हारी चाय की आख़िरी चुस्की बताती है।

दृश्य दो:
आज चाय तुमने बनाई मैं चाहता था तुम्हारे साथ किचन में खड़ा रहूँ मगर तुम्हें न जाने क्यों ये शिष्टाचार विरुद्ध लगता है तुम्हें मेरा इस कदर आम होना पसन्द नही है शायद की मै सिंक में हाथ धोकर तुम्हारी ही चुन्नी से हाथ पूँछ लूँ या फिर उचक कर वहीं किचन की स्लेप पर बैठ जाऊं एकाध बार मैंने ऐसा किया तो तुम्हें मेरी यूं बैठकर टांग हिलाना कतई पसन्द नही आया इसलिए कहा चला बैठो मैं वही आती हूँ बनाकर।
ये हमारी पसन्द का पहला मगर बड़ा प्यारा टकराव है जिसे मै टालता नही हूँ और अक्सर वही किचन में खड़ा हो जाता हूँ और कुछ ऐसी हरकतें करता हूँ जो तुम्हें पसन्द नही है मसलन मैं सिंक के दोनों टैप खोलकर बेवजह पानी चेक करता हूँ और दोनों हाथ गीले कर लेता हूँ पिछले दफा तुमनें चिढ़कर कहा भी था पिछले जन्म में पलम्बर थे क्या?
मैं यही नही रुकता फिर मसालों के ब्रांड पर अपनी बिन मांगी राय देने लगता हूँ ये अपने आप में कितनी बेतुकी बात है कि मै कहूँ की छौंक के लिए तुम कौन सा तेल यूज़ करती हो? जबकि गैस पर चाय चढ़ी हो। पसन्द तो तुम्हें मेरा लाइटर को बेवजह कट-कट करके चलाना भी नही है इसलिए मेरे हाथ से लाइटर लेकर कहती हो बिस्किट कौन से लोगे बेकरी के या सिम्पल वाले जबकि तुम्हें पता है मुझे बिस्किट नही पसन्द है मैं तुम्हें चिढ़ाने के लिए बिस्कुट बोलता हूँ इस पर तुम हंसती हो और किचन में की गई मेरी सारी हरकतों को माफ़ कर देती हो।
मैं कहता हूँ कि मै केवल नमकीन लूँगा इस पर तुम व्यंग्य करते हुए कहती हो ये चाय है बाबु!शराब नही इसे चाय के अंदाज़ से पीना पड़ेगा।

दृश्य तीन:
हम चुपचाप एक दुसरे के चाय का कप पकड़ने के तरीके को देखते है। मेरी ग्रिप तुमसे थोड़ी कम 'क्लासी' किस्म की है उसमें एक देहातीपन है जो एक बढ़िया ड्राइंग रूम में छिप नही पाता है। तुम मुझे चमच्च से नमकीन देती हो मगर मै हाथ फैलाने में थोड़ा संकोची हूँ मगर फिर भी हथेली में चमच्च लायक जगह बना लेता हूँ तुम्हें ये बात अच्छी लगती है कि मेरे हाथ कांपते नही है।
मैं चाय की तारीफ़ नही करता और मुझे पता है तुम तारीफ़ सुनना नही चाहती क्योंकि तुम्हें पता है तुम चाय बनाने में इस कदर माहिर हो कभी खराब चाय बना ही नही सकती।
पिछली दफा दूध नही था तो तुमनें ब्लैक लेमन टी बनाकर पिलवाई थी, मुझे याद है।अमूमन मुझे चाय हेल्थ के एंगल से पीने की आदत नही मगर उस दिन सच में वो चाय डिटॉक्स करने वाली थी सुबह के हैंगओवर को उसने ऐसा विदा किया कि मैंने साधिकार कह दिया आज नाश्ता भी यही करूँगा वरना पहले ये सोच रहा था आज चाय पीने को कैसे मना करूँगा और सुबह सुबह तुमसे लेमन सोडा बनाने के लिए कहता तो तुम तुरन्त समझ लेती कि बीती रात ज्यादा शराब पी है मैंने।

चाय की बहुत सी बातें है मगर कुछ बातें ऐसी है जिन्हें बताने का दिल करता है और कुछ ऐसी जिन्हें छिपाने को।

© डॉ.अजित

Friday, January 20, 2017

उसने कहा था- दो

उसने कहा था
रिश्तों की कभी नैसर्गिक मौत नही है !

तब मैने कोई प्रतिवाद नही किया था शायद तब मै जीवन के नशे में था इसलिए मौत के विमर्श में उलझना नही चाहता था। जीवन और मृत्यु के प्रश्न वैसे भी बेहद निजी किस्म के होते है। मृत्यु की महानता पर मुग्ध हुआ जा सकता है मगर एक घटना के तौर मृत्यु बाह्य तत्वों के लिए कब सुखद रही है भला?

इन दिनों मैं सोचता हूँ नैसर्गिकता आखिर क्या है? क्या जीवन में घटनाक्रमों को सहजता से घटने देने में यकीन रखना नैसर्गिकता है या फिर कुछ मान्यताओं के मध्य किसी आत्मीय रिश्तें को अकेला छोड़ देने को भी  नैसर्गिक कहा जा सकता है।

दिल दरअसल बड़ा मतलबी होता है वो दिमाग के तमाम सवालों को टालता रहता है उसे साथ चाहिए शायद कोई एक साथी भी जिसके साथ वो हंस सके रो सके। दिमाग की अपनी गणनाएं है वो रिश्तों के भविष्य के प्रश्नों में उलझाकर वर्तमान में उस मौत की भूमिका रच देता है जिसको बाद अप्रत्याशित समझ खुद को कोसा जा सकता है।

किसी भी रिश्तें की नैसर्गिक मौत शायद इसलिए नही होती क्योंकि हमारा चुनाव उसे दुखांत के जरिए विस्मृत करने का होता है या अस्तित्व का हस्तक्षेप कुछ ऐसी निर्मितियां बनाता है जिसे सोचकर विलग होने के कारणों का औचित्य सिद्ध किया जा सके।

नैसर्गिक न होना औचित्य के लिए अनिवार्य है यदि मृत्यु नैसर्गिक हो तो शोक की तीव्रता में सार्थकता के स्तर पर अंतर आ जाएगा। जो छूट गया है उसमें उस छूटे जाने की आत्मप्रवंचना जीवनपर्यन्त प्रताड़ित करती है। किसी रिश्तें की नैसर्गिक मौत न होने का एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है उसमें दीर्घायु की परिकल्पना पहले दिन से ही नही थी।

जिस साथ का छूटना जन्म के साथ आया हो उसके लिए कुछ भी अनैसर्गिक नही है मनुष्य की चाह के रूप में वो एक नियोजित हस्तक्षेप है वो समानान्तर हमारे साथ पलता है। एकदिन स्वतः आत्मघाती हो हमारी सबसे प्रिय वस्तु को हमसे मांग लेता है और हम अतिशय परिपक्व होने का अभिनय करते हुए इस सच को स्वीकार कर लेते है कि ये तो एकदिन होना ही था।

रिश्तों की नैसर्गिक मृत्यु नही होती है इसमें एक पंक्ति यह जोड़कर कि ये तो एकदिन होना ही था हम मृत्यु की वेदना कम नही कर सकते मगर इसके अलावा और बचता भी क्या है जब देखते ही देखते दृश्य से एक चित्र नेपथ्य में चला जाता है और स्मृतियां सही गलत के मुकदमें में हमे आजीवन कारावास की सजा सुनाकर खुद स्मृतिलोप को चुन लेती है।

© डॉ.अजित

#उसनेकहाथा

Thursday, January 19, 2017

उसने कहा था-एक

उसने कहा था
हर रिश्ता एक एक्सपायरी डेट के साथ आता है !

तब ये बात बीमारी में कोई एक्सपायरी डेट की गोली खाने के बाद की दुश्चिन्ता जैसी लगी थी। मै रिश्तें के अवसान को लेकर इतना अधिक अति संवेदनशील हो गया था कि मैंने अपनी सारी क्षमता इस कथन को खारिज़ करने में लगा दी थी।

मैंने कहा रिश्तों की आयु निर्धारित करना संभावित पलायन की भूमिका है मैंने इसे एक बौद्धिक चालाकी करार दिया साथ डरे हुए बड़प्पन के साथ यह कहा रिश्तों के एक्सपायरी जैसे मुर्दा शब्द क्यों जोड़ना जिस दिन तुम्हें लगे रास्ते बदलने है मुझे साधिकार अन्यत्र दिशा में चला जाऊँगा।

साधिकार कहने की बुद्धिमानी एक कोरा गल्प थी क्योंकि जिसको इतना अधिकार दिया जाता है क्या उसका साथ छोड़ने की हिम्मत बच पाती है? शायद नही।

रिश्तों की एक्सपायरी डेट आखिर क्या हो सकती है?और क्या ये सच में होती है या होनी चाहिए और यदि इसका अस्तित्व है तो फिर रिश्तों के जरिए हम स्वपीड़न या परपीड़न का हिस्सा क्यों बनते है।

ये कई सवाल थे जिनके जवाब मैंने तलाशने की बहुत कोशिश की मगर दवाई के पत्ते की तरह जब तक मै आख़िरी मंजिल तक पहुंचा अस्तित्व के स्तर पर मैं उघड़ चुका था। मेरे बारे में कुछ अनुमान लगाए जा सकते थे मेरा पता गुमशुदा था और लिखवाट के जरिए मेरी उपयोगिता पर कुछ सांत्वना भरी बातें कही जा सकती थी।

रिश्तें जब एक्सपायर होते है तो उनको रिसाइकिल नही किया जा सकता है ये रिश्तों की सबसे खराब बात है वो जीवन में लटके रहते है बेताल से। मुझे पहले लगता था कि रिश्तें अस्तित्व के एक बड़े नियोजन का हिस्सा है मगर इस नियोजन में जब ये एक्सपायरी वाला हिस्सा शामिल हुआ तब मुझे ये एक बेहद लौकिक और मानवीय उपक्रम लगा।

अस्तित्व रिश्तें हमे सौंपता है और हम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं के चलते उनकी मौत का एक तयशुदा सीमांकन अवचेतन में पहले ही दिन कर देते है। इससे एक बात लगभग प्रमाणित होती है मनुष्य रिश्तें सम्भालने में कमजोर है। विचित्र बात यह कि इस कमजोरी को एक ताकत के रूप में देखने की आदत मनुष्य ने विकसित कर ली है।

चलो मान लेता हूँ कि हर रिश्ता एक एक्सपायरी डेट के साथ आता है मगर वो डेट जो भी तय करता है वो हमसे कभी मशविरा नही करता यदि करता भी है तो हम अनुरागवश उस बात को छिपाते चले जाते है।

हर रिश्ता प्रकट और अप्रकट के मध्य कुछ जोड़ तोड़ के साथ जीता है शायद यही से उस एक्सपायरी डेट का कैलेंडर निकलता है जिस पर मुक्ति की शक्ल में निर्वासन की तारीख छपी होती है।

#उसनेकहाथा

Sunday, January 15, 2017

इंतजार

दृश्य एक:
लैम्पपोस्ट के नजदीक एक युवा लड़की खड़ी है। वो आसमान की तरफ देखती है और कहती है इसकी क्या जरूरत है यहां।
इस बात के दो अर्थ निकाले जा सकते है क्या तो वो लैम्पपोस्ट की बात कर रही है या फिर आसमान की। आसमान की जरूरत पर वही सवाल खड़ा कर सकता है जिसके पैरो तले की ज़मीन तेजी से खिसक गई हो। लैम्पपोस्ट की जरूरत उसे नही हो सकती इस बात इस इनकार नही मगर जब उसने आसमान की तरफ देखा उसकी एक आंख आसमान पर थी और एक लैम्पपोस्ट पर।
जब मैंने उससे पूछा तुम किसकी जरूरत न होने की बात कर रही हो?
उसने कहा तुम्हारी।
मुझे लगा मैंने कोई अवांछित हस्तक्षेप किया है उससे सवाल पूछकर इसलिए मैंने दोबारा उससे बस इतना पूछा क्या सच में मेरी जरूरत आसमान या लैम्पपोस्ट जितनी नही है?
उसने कहा जरूरत में सच की शर्त या शपथ लगानी मैं गैर जरूरी समझती हूँ।
उसके बाद मैंने कोई सवाल नही किया क्योंकि अब सवाल करने का मतलब था मै जरूरत के बिंदु पर अटक गया हूँ।

दृश्य दो:
यह सेंट्रल लन्दन का रेलवे स्टेशन है। एक कपल मेरे नजदीक खड़ा है हमें एक ही ट्रेन में सवार होना है। इस तरह से हम एक नजदीकी वृत्त में हम तीनों इंतजार में है।लड़की लड़के से पूछती तुम्हें इंतजार करना कैसा लगता है?
लड़का मुस्कुराता है और कहता है जिस इंतजार में तुम्हारा आना शामिल हो उस इंतजार में ख़ुशी शामिल रहती है इसलिए वो अच्छा लगता है।
लड़की इस जवाब से प्रभावित नही दिख रही है वो कहती है ये तो बड़ी लोकप्रिय सी बात हुई। इंतजार एक साथ अच्छा या बुरा दोनों लग सकता है क्या? वो नया सवाल पूछती है।
लड़का कहता है इंतजार में अच्छे या बुरे लगने से ज्यादा मिलना महत्वपूर्ण होता है सारी अधीरता उसी की होती है।
लड़की फिर से इस जवाब से कोई ख़ास संतुष्ट नही दिख रही है इसलिए वो कहती है तुम इंतजार को टाल रहे हो इसका मतलब तुम्हें इंतजार से डर लगता है।
हम्म..! लड़का इतना कहकर चुप हो जाता है।
दोनों मेरी तरफ देखते है शायद उन्हें पता है कि मै उनकी बातें सुन रहा हूँ।
मैं कहता हूँ ट्रेन राइट टाइम नही है।
लड़की कहती है कि आपने यह क्यों नही कहा ट्रेन लेट है?
लड़का कहता है अभी उद्घोषणा हुई है शायद ट्रेन समय से आ रही है
लड़की कहती है तुम शायद न कहते जो ज्यादा ठीक लगता मुझे।
उसे मेरे जवाब की प्रतिक्षा है मैं मुस्कुराता हूँ और ट्रेन का हॉर्न सुनाई देता है।
ये संयोग इंतजार का सबसे सुखद पल था।

©डॉ.अजित

Sunday, January 8, 2017

हाथ

तुम्हारा हाथ जब हाथ में था ऐसा लगता था साक्षात् ब्रह्म से आश्वस्ति उधार मिल गई है।
तुम्हें देखते हुए कम से कम मौत के बारें में नही सोचा जा सकता था। तुम्हारा हाथ थामें ऐसा लगता जैसे पहाड़ ने थोड़ी हिम्मत भेज दी वो भी बिन मांगे।
तुम्हारे स्पर्शों ने मेरी रूह के जाले साफ़ किए तो तुम्हारे साथ ने मेरे अस्त व्यस्त वजूद को किताबों की तरह ठीक किया था।
जब तुम जाती तो मन करता हिम्मत करके कुछ लम्हों के लिए और रोक लूँ मगर इतनी हिम्मत नही जुटा पाया इतना बुझदिल तुम मुझे हमेशा समझ सकती हो।
दरअसल,तुम्हारा साथ हमेशा चुराना पड़ता सो मेरी थकन चिंता और बैचेनी हमेशा चोर के जैसी ही रही मैंने कुछ नही कमाया मगर मेरे खोने का भय हमेशा बड़ा था।
हमारी रेखाएं एक दुसरे के मन के तापमान को भलीभांति जानती है उनकी हमसे अच्छी जान पहचान है। एकदिन तुम्हारे हाथ ने मेरे हाथ से कहा चल झूठे! तब से मेरे हाथ का आत्मविश्वास थोड़ा कमजोर पड़ गया है वो तुम्हारी हथेली तलाशता है मगर छिप छिप कर।
तुम्हारी खुशबू का एक क्लोन मेरे जेहन में बसा है मगर उससे मिलनें की इजाज़त मुझे भी कब है जब जब तुम्हारी बातें सोचता हूँ तुम्हारी खुशबू मुझे कहती है दिमाग की बजाए दिल की सुनो फिर तुमसे मुलाक़ात होगी।
जब जब तुम गई मैंने सोचा ये तय है पहले से मगर मेरा सोचना उतना ही सतही था जितना साहिल पे खड़े होकर तूफ़ान का अंदाजा लगाना इसलिए मेरे मन का एक हिस्सा हमेशा तुम्हारे साथ तुम्हारे दर तक गया जब तक तुमनें मन पर लौकिकता की सांकल न चढ़ा ली हो।
मेरी कुछ जान पहचान तुम्हारे कंगन बिस्तर तकिए और  शॉल से है कभी उनसे मेरी बातें करना तो वो मेरे बारें में कुछ अफवाहें तुम्हें चटखारे से सुनाएंगे।
हालांकि मुझे पता है आप ऐसा कभी नही करेंगी क्योंकि तुम ऐसा कोई काम कभी नही करती जिसका कोई हासिल न हो।
ये आप और तुम में मत उलझना दरअसल बात इतनी सी है कि तुम्हारी बहुत याद आ रही है इसलिए मैं औपचारिक शिष्टाचार और सम्बोधन भूल गया हूँ इसलिए
माफी चाहूंगा दोस्त।

'यादें दर ब दर'

Friday, December 30, 2016

दृश्यांतर

दृश्य एक:

तुम क्यों उसको अभी तक खोज रही हो?
वो तो कब का चला गया नेपथ्य में
क्या तुम्हें उसके जाने का दुःख है?
क्या तुम्हें उससे कोई अनुराग हो गया था?
क्या तुम्हारे कुछ सवाल प्रतिक्षारत है?
क्या तुम्हें क्षोभ है किसी बात का?
क्या तुम्हें रोष है किसी व्यवहार का?

नही !

फिर?

क्या केवल तुम्हें दिख रहे है,मेरे अंदर एक बड़ा शून्य है. एक निर्वात की अनुगूंज अन्तस् में बह रही है।मेरे जीवन में क्या की उपयोगिता शेष नही बची है।

तुम्हें खेद है किसी बात का?

नही ! मेरे प्रश्नों पर पूर्ण विराम लग गया है अब कोई आंतरिक कोलाहल नही है।

तुम उसे खोज रही हो?

हो सके तो प्रश्नों की पुनरावृत्ति न करो !
यदि करना अनिवार्य लगे तो मेरे मौन को सही प्रश्न का जवाब समझना तुम्हारी जिम्मेदारी होगी।

उसे खोजा या पाया नही जा सकता है वो जीवन में घटित होता है अस्तित्व के एक हस्तक्षेप की शक्ल में और चला जाता है अपनी तय सीमा में हमें रूपांतरित करके।

तो क्या तुम अब मुक्त हो गई हो?

मैं मुक्त हो गई हूँ या नही ये अभी बता पाना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होगा क्योंकि फ़िलहाल मैं जरा से सम्मोहन में और जरा से विस्मय में हूँ।

तो मै चली जाऊं?

नही अभी थोड़ी देर बैठो शायद मै तुम्हारे आने को जाना और जाने को आना समझ कोई गीत गुनगुनाउँ या फिर तुम्हें जाते हुए एक कंकड़ दे दूं और कहूँ इसे आसमान की तरफ उछाल देना।

©डॉ.अजित

Sunday, December 25, 2016

ब्रेकअप नोट्स- चार

ब्रेकअप के बारे 'हुआ' शब्द कहा जाता जबकि ये 'किया' जाता है। दरअसल किसी का ब्रेकअप होता तो वो भूल जाता वाक्य में काल दोष वो समझ नही पाता कि ये हुआ है या किया गया है। उसकी गणनाएं बिगड़ जाती सब की सब। ब्रेकअप सिखाता कुछ ऐसे वाक्य में प्रयोग जिनको जिंदगी के व्याकरण में समझा जाता था बेहद निर्मम। ब्रेकअप के बाद आदमी सीख जाता किंतु परंतु के व्यवहारिक अर्थ जीवन में और पहली बार कल्पना भी सोचने लगती बेहद लौकिक बातें।
****
ब्रेकअप एक आकस्मिक मनोदशा है जिसकी किसी किस्म की तैयारी नही होती है इसलिए कुछ दिन यह तय करने में लगते कि जो हुआ क्या उसे अभी होना था? ब्रेकअप टलता रहा होता है कई बार मगर जब ये होता है तब आता अपने पूरे वेग के साथ और बदल देता हमारी दुनिया एक ही पल में। ब्रेकअप इस तरह बदलता हमें कि प्रेम करते लोग लगने लगते झूठे उनकी मुस्कान में देखने लगते हम अभिनय। ब्रेकअप के बाद किसी को आगाह करने का मन नही होता हम देखना चाहतें है उन्हें खुद चोट खाते देखना।
***
ब्रेकअप कुछ अर्थों में एक दैवीय घटना है जो जीवन को पहले अस्त व्यस्त करती और बाद में तटस्थ कर देती। ये अनासक्ति का एक लौकिक प्रशिक्षण है जो मनुष्य को अकेला रहना सिखाती। ब्रेकअप के बाद जीवन में जो बोध उद्घघटित होता वो मनुष्य को एक अकेली इकाई के रूप में स्थापित करता है। अपने ग्रह पर खुद के होने और न होने की उपयोगिता मनुष्य ब्रेकअप के बाद समझ पाता।
****
ब्रेकअप जीवन से प्रेम समाप्त नही करता वस्तुतः आदमी प्यार करने और प्यार को सम्भाल पाने का नैतिक साहस खो देता है ब्रेकअप के बाद। वो महसूस कर सकता है अंजुली भर पानी का बोझ। ब्रेकअप संवदेनशीलता को चरम पर ले जाकर छोड़ देता बिलकुल अकेला। ब्रेकअप के बाद आहत कर सकता एक मामूली सा सवाल ब्रेकअप के बाद खुश कर सकती एक छोटी सी मुस्कान।
****
ब्रेकअप दर्ज होता है जीवन के खराब अनुभव में जबकि ये आता जीवन के सबसे अच्छे पलों के ठीक बाद। ये स्मृतियों में चाहता एक तात्कालिक आरक्षण। उसके बाद कोमल भावनाओं का बढ़ जाता वर्ग संघर्ष। खीझ आत्मदोष और गुस्से के प्रहरियों के साथ मन के वातायन में अकेला टहलता है ब्रेकअप। कारक-कारण की उपकल्पनाओं के मध्य ब्रेकअप पसार देता एक गहरा मौन। ब्रेकअप जीवन में लाता मौन से भरा ऐसा एकान्त जिसमें दूर दूर तक नही होती शान्ति।

© डॉ.अजित
#ब्रेकअपनोट्स

Friday, December 23, 2016

ब्रेकअप नोट्स

ब्रेकअप की भूमिका इतने संदिग्ध ढंग से लिखी जाती कि इसके घटित होने पर एकबारगी खुद पर से यकीन उठ जाता। विश्वास के संदेह में रूपांतरण का नाम ब्रेकअप होता। ये ऐच्छिक चुनाव प्रतीत जरूर होता था परन्तु इसमें हमेशा एकतरफा अतिवाद शामिल रहता जिसकी कीमत चुकानी पड़ती उसे ज्यादा जिसे खुद की मुहब्बत पर ज्यादा यकीन होता।
****
जिनका ब्रेकअप हुआ उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था चंद्रमा का तापमान उनकी आँखें देख बताई जा सकती उस जगह की समुन्द्र तल से दूरी। उनकी हथेलियों पर पढ़ा जा सकता निर्वासित द्वीप का मानचित्र। ब्रेकअप के बाद कदमों के अक्ष झुक जाते एक तरफ जैसे किसी राष्ट्रीय शोक में एक तरफ झुका दिया जाता है राष्ट्रीय ध्वज। ब्रेकअप अस्तित्व के अपमान का एक स्वघोषित राष्ट्रीय शोक है।
****
ब्रेकअप के कारण बताए नही जाते ब्रेकअप के किस्से सुनाए नही जाते युद्ध के दस्तावेज की तरह इसकी गोपनीयत बचाए रखने की जिम्मेदारी उसके हिस्से आती जो हार गया होता किसी अपने से ही एक युद्ध। ब्रेकअप के बाद स्मृतियों को देखा जाता सबसे अधिक उपेक्षा के साथ समझ में नही आता उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाए क्योंकी उन्हें मिटा सकते नही और उनका बोझ सम्भालनें से साफ़ इंकार कर देता है मन का संतुलन सिद्धांत।
****
ब्रेकअप का कोई संदर्भ नही मिलता ना ही इसका कोई भाष्य किसी भी साहित्य में उपलब्ध है ये शब्द उत्तर आधुनिक है मगर इसके प्रभाव पाषाण काल में भी ठीक ऐसे ही थे जैसे आधुनिक काल में है। दर्शन की टीकाओं से लेकर काव्यशास्त्र के काव्य हेतु तक में ब्रेकअप बसा हुआ है बेहद निर्मम ढंग से। शब्द यदि ब्रह्म है तो ब्रेकअप के ब्रह्मत्व के समक्ष मनुष्य बेहद मजबूर होता है इसलिए वो ब्रेकअप को स्वीकार करता है ईश्वर की आज्ञा समझकर।
****
अलग अलग रिश्तों में ब्रेकअप जी रहे दो लोग आपस में जल्दी मित्र नही बन पाते है। न ही घायल की गति घायल जाने जैसे सूत्र वाक्य इस घटना पर लागू होते है। ब्रेकअप के बाद दुःख को बांटना अच्छा नही लगता ब्रेकअप इस मामले में है थोड़ा आत्ममुग्ध वो हंसता है उन दूसरे दुखों पर जो चर्चा का विषय बन गए होते। ब्रेकअप एक नितांत ही एकांतिक चीज है जिसके बाद पर अपने कष्टों पर बातें करना सम्मानजनक नही लगता है यह मनुष्य को परिपक्वता के साथ अकेला रहने के लिए अनचाहा प्रशिक्षण दे जाता है।
© डॉ.अजित

#ब्रेकअपनोट्स

Thursday, December 22, 2016

ब्रेकअप

ब्रेकअप पर 'ब्रेकअप सांग' गाने वाले विरले होते है, शायद फिल्म फंतासी की एक दुनिया है इसलिए फिल्म में ब्रेकअप सांग गाने की कल्पना की जा सकती है। जिनका हाल ही में ब्रेकअप हुआ है उन्हें ऐसे गाने एक सम्बल दे सकते है इसकी संभावना थोड़ी कम नजर आती है क्योंकि ब्रेकअप के बाद ब्रेकअप का जश्न मनाना थोड़ा मुश्किल काम है। दर्शन की भाषा में कहूँ तो जुड़ना और टूटना शाश्वत प्रक्रिया विज्ञानवादी मस्तिष्क इसे अणुवाद के माध्यम से समझ सकते है। ब्रेकअप के प्रभाव विशुद्ध रूप से मनोवैज्ञानिक होते है कभी आत्मदोष तो कभी परनिंदा के मध्य फंसा हुआ वजूद अलग अलग किस्म से रिश्तों को परिभाषित करता है। कभी मैंने ब्रेकअप कुछ फुटकर नोट्स लिखे थे उन्हें आज आपके साथ शेयर कर रहा हूँ इस उम्मीद से कि ये कभी जरूर पढ़ने लायक समझें जाएंगे।
___________________________________
' ब्रेकअप महज दो शब्दों का योग नही था, इसकी ध्वनि में एक विचित्र सी खीझ थी खुद के प्रति एक अनजाना गुस्सा इसमें शामिल था, खुद के बारे में हाउ स्टुपिड जैसे कथन घनघोर हो गरजते थे। शब्दकोश में अकेला शब्द था ब्रेकअप। संज्ञा से विशेषण बना था मगर व्याकरण के लिहाज से इसमें था वाक्य दोष इसका वाक्य में प्रयोग छोड़ जाता था ऐसी त्रुटि की पूर्ण विराम लगाने के लिए उठी कलम उठी ही रह जाती नही मिलती थी उसको रखने की जगह। ब्रेकअप तरल था पानी की तरह ब्रेकअप ठोस था पारे की तरह।
******
ब्रेकअप के बाद की सुबह रात की प्रतिलिपि मांगकर लाती थी उधार इसलिए सूरज निकलता था कुछ देर की विलम्ब से। ये अगला दिन गायब हो जाना चाहता था विश्व के कैलेंडर से यहां तक मंजन करते समय हम चाहते है कि आज पेस्ट ब्रश से न करके अंगुली से किया जाए क्योंकि उस दिन चुभती थी ब्रश की ध्वनि भी।  ब्रेकअप से अगला दिन दरअसल रात की तरह ही था बस फर्क इतना लगता कि हम आँख बंद करके अंधेरे में अँधेरे को नही देख सकते थे।
****
ब्रेकअप एक थकन भरी सांत्वना थी जो बताती कि मनुष्य के तौर पर विकल्पहीनता सबके हिस्से में आती है एकदिन। उम्मीद दुबकी रहती मन के एक कोने में कि शायद एकदिन फिर से सब ठीक हो जाए। 'शायद' बोलचाल के शब्द के बाद सबसे गहरा अर्थ ब्रेकअप के बाद ही समझ जाता है। जैन मुनियों ने यही से लिया होगा अपने दर्शन का 'स्यादवाद'।
****
ब्रेकअप की घोषणा प्रायः एकतरफा होती दोनों चाहकर भी एकस्वर में नही कर पाते घोषणा ब्रेकअप की। इसमें एक वक्त होता और एक श्रोता यह दुनिया की सबसे विकट जनसभा होती जिसमें नही जरूरत पड़ती किसी लाउडस्पीकर की। ब्रेकअप अंतिम उपाय नही होता हां ! बस इसे चुन लिया जाता अंतिम उपाय से कुछ देर पहले।
****
ब्रेकअप के बाद ईश्वर देख पाता मनुष्य के एकान्त को भीड़ में उसको चिन्हित करना होता ईश्वर के लिए बेहद आसान ईश्वर के अलावा कोई एक दोस्त भी देख सकता था लगभग समान रूप से। ब्रेकअप दोस्त को बना देता एक पल में ईश्वर जिसको गले लगाकर रोया जा सकता बेसबब मगर ब्रेकअप नही मिलने देता था ऐसे ईश्वर बने दोस्त से कभी भी।

(जारी)

©डॉ.अजित 

Wednesday, December 14, 2016

नदी

दृश्य एक:

पहाड़ झरनें से कहता है मेरे तलवे पर एक पता लिखा है उसे नदी के पास पहुँचा देना।
झरना जवाब देता है नदी उसे अपना दोस्त नही मानती इसलिए वो नदी से मिलने जाने में खुद के अंदर आकर्षण का अभाव पाता है।
पहाड़ झरने की पीठ पर आंसू से आग लिखता है जो नीचे जाकर पानी बन जाती है मगर पत्थर और शैवाल उस पानी में तपन महसूस करते है।

दृश्य दो:
नदी अपने किनारे से कहती है देखना मेरी आँख में कुछ चला गया है। किनारा कहता है ये तो असल के आंसू है मगर आँख में कुछ नही है।
नदी किनारे को उसी पल छोड़ कर आगे बढ़ जाती है। किनारों की आँख में अधूरा काजल पड़ा है उनकी माँ ने उलटे दिए पर स्याही निकाली थी मगर उनकी उंगलियों की कोमलता अनुपस्थित हो गई है इसलिए उन्हें डर था  कहीं खुद ही आँख को जख्मी न कर दें।
जिसकी आँख जख्मी है वो बेफिक्र है उसे बताने वाला कोई नही है।

दृश्य तीन:
आसमान आलथी-पालथी मारकर बैठा है हवा उसके बालों में हाथों से कंघी कर रही है। आसमान जमीन के कान को देखकर ये अनुमान लगा रहा है कौन सा कान छोटा है और कौन सा बड़ा।
आसमान धरती के बोझ को तोलना चाहता है इसलिए कान धरती की नाभि पर लगा देता है अंदर कोई कोलाहल नही है। आसमान बाहर के कोलाहल पर विस्मय से भरता है वो अपनी आँखें बंद लेता है। पहली बार ऐसा होता है कि आसमान को आँख बंद करने पर चक्कर नही आए। इस पर आसमान हंसता है तभी बारिश हो जाती है। धरती आसमान की पीठ देख पाती है बस।

©डॉ.अजित

Tuesday, December 13, 2016

बातें

दृश्य एक:
पैरिस के एक ब्यूटी सैलून में दो स्त्री आपस में बात कर रही है।
क्या तुम मिरर पर यकीन करती हो?
नही मैं खुद पर थोड़ा यकीन करती हूँ
यकीन भी क्या थोड़ा या ज्यादा हो सकता है?
मेरा मतलब था कभी यकीन होता है कभी नही
अच्छा ! ख़ूबसूरती क्या मन की हो सकती है?
आई डोंट थिंक सो !
और तन की?
खूबसूरती तन की नही होती,तन को बस नोटिस किया जा सकता है
अगर मै कहूँ तन को केवल जज किया जा सकता है?
मन को जज किया जाता है तन को डिफाइन किया जा सकता है
तो क्या मन को डिफाइन नही किया जा सकता?
शायद नही
अच्छा आख़िरी बार बेफिक्री में तुमने मिरर कब देखा था?
अभी अभी देखा है तुम्हारी आँखों में
आँखें क्या मिरर हो सकती है?
आँखों को मिरर नही कहना चाहिए ऐसा कहना कम्प्रेजन करना होगा
फिर क्या कहना चाहिए?
कुछ नही कहना चाहिए बस प्यार से आँख में देखना चाहिए
तुम यहां किस लिए हो? खूबसूरत दिखने के लिए?
नही मैं यहां आकर देखना चाहती खूबसूरती क्या रची जा सकती है?
तो क्या पाया तुमनें
मैं यहां कुछ पाने नही खोने आती हूँ
हम्म !

दृश्य दो:
ये अफ्रीकी देश की एक सुबह है। कॉफी उबल रही है। दो स्त्रियां लोकगीत गुनगुना रही है। प्रतिक्षा उनकी आँखों में पढ़ी जा सकती है। एक स्त्री कहती है धूप से कुछ अनुमान नही लगता है ये समय की बंधुआ मजदूर बिलकुल नही है ये आसमान की बेटी है जो धरती पर खेलने आती है हम इसे देख सकते है मगर छू नही सकते।
इस पर दूसरी स्त्री मुस्कुराती है अनुमान लगाना मनुष्य की एक सुविधा है सुख के अनुमान पर दुःख विलंबित किया जा सकता है। हवा के अनुमान पर बादल को नाचते हुए देखने की आस पाली जा सकती है।
तभी एक पुरुष आता है वो कॉफी मांगता है
दोनों स्त्रियां एक स्वर में सोचती है माँगना पुरुष की एक सुविधा है
और देना स्त्री का सुख
दोनों स्त्री आसमान की तरफ देखती है और अपने अपने अनुमान वापिस आसमान के पास रवाना करती है।
अनुमान से मुक्ति स्त्री की आदि कामना है इसी को गीत बनाकर गुनगुनाने लगती है। ये विश्व का एक लोकप्रिय लोकगीत है जिसे किसी भी भाषा में गुनगुनाया जा सकता है।

© डॉ.अजित

Monday, December 12, 2016

फादर

दृश्य एक:

फादर से  हैरी पूछता है
'फादर ! सबसे लकी पेरेंट्स कौन होते है?
फादर मुस्कुराते हुए जवाब देते है माई डियर चाइल्ड दुनिया में सबसे हैप्पी पेरेंट्स वो होते है जो एक दुसरे से सच में प्यार करते है
मगर फादर मैंने तो लकी पेरेंट्स के बारे में पूछा था,हैरी दोबारा सवाल दोहराता है
फादर कहते है लकी होने से ज्यादा खुश होना ज्यादा जरूरी है
फिर हैरी कोई सवाल नही करता है वो खुशी को समझना चाहता है मगर उसके लिए किसी और दिन फादर से सवाल करेगा वो फादर को थैंक यू बोलता है और चला जाता है।

दृश्य दो:
एक यंग कपल चर्च में आता है
दोनों एक दुसरे का हाथ जुम्बिश के साथ थामे हुए है
दोनों जीसस से प्रेयर करते है
दोनों की आँखें बंद है
दोनों फादर से अलग अलग बात पूछते है
पहले लड़का सवाल करता है
फादर ! लव हमेशा ट्रू कैसे बना रहा सकता?
फादर लड़की की आँखों में देख जवाब देते है
लव तभी तक ट्रू बना रह सकता है जब तक उसमें कोई कंडीशन न हो
लड़का जवाब से संतुष्ट नही होता वो कहता है
कोई कंडीशन न हो यह खुद में एक कंडीशन है
इसी बीच लड़की अपना सवाल रखती है
फादर ! दुनिया में प्योर क्या है?
फादर दोनों को एक साथ देखते है और कहते है
प्योर की तलाश दुनिया में एकमात्र प्योर चीज है
बाकि सब में अलग अलग डिग्रीज़ में स्टैंडर्ड एरर है
दोनों फादर के गणितज्ञ की तरह बोलने पर हैरान है
दोनों जीसस के पास सवाल छोड़ लौट आते है।

दृश्य तीन:
फादर बाइबिल को चर्च की प्यानों पर रख देते है
प्यानों के कुछ कॉर्ड्स दबतें है
एक साथ कई सुर निकलते है
फादर तुरन्त बाइबिल उठा लेते है
और चौंक कर देखते है किसी ने देखा या सुना तो नही
यह देख जीसस की मुस्कुराहट बढ़ जाती है
मगर उसे फादर नही देख सकते है।

दृश्य चार:
फादर अब चर्च की लाईब्रेरी में है
मार्गेट लिसा चर्च में है
किताबें प्रार्थनारत है
और मनुष्य सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में है
मार्गेट लिसा जीसस से कहती है
चर्च में फादर के बिना उसे अच्छा लगता है
उसे लगता है वो सीधा जीसस से बात कर सकती है
उसे चर्च में फादर तब चाहिए
जब उसे जीसस से बात न करनी हो
तभी फादर आते है
मार्गेट उन्हें गुड इवनिंग फादर कहती है
जवाब में फादर गुड मॉर्निंग लिसा कहते है
चर्च की घड़ी अब मुस्कुराती है
जीसस अब एक पल के लिए आँखें बंद कर लेते है।

© डॉ.अजित