Monday, January 30, 2017

चाय की बातें

दृश्य एक:
सुबह की चाय पी रहा हूँ।चाय पीना एक सामान्य घटना है मगर चाय को महसूस करना एक विलक्षण अनुभव। चाय के ज्ञात अरोमा में बहुत सी गुमशुदा खुशबुएँ भी शामिल रहती है उन्हें महसूस करने के लिए बस नाक छोटी करनी पड़ती है यही कारण है मैं अपनी तमाम निपुणताओं के बावजूद तुम्हें खुद चाय बनाकर पिलाना चाहता हूँ। मुझे पता है मीठा तेज हो गया और अपनी अकुशलता छिपाने के लिए मैं दूध ज्यादा डाल दूंगा। मैं इतना बेख्याल और जल्दबाजी में रहूँगा कि अदरक अपना अर्क उबाल के बीच भी बचा कर ले जाएगा भले ही उसकी चाय की पत्तियों से कोई दोस्ती मरते दम तक न हो मगर वो मेरे हाथ की बनी चाय में अपना स्वाद नही छोड़ना चाहता है। क्यों? वो इसलिए क्योंकि उसे तुम्हारे कंगन और चूड़ियों की जुगलबंदी उसे उपजे संगीत की आदत जो लग गई है।
मुझे पता मेरे हाथ से बनी चाय औसत होगी मगर फिर भी तुम उसे बढ़िया घोषित कर दोगी और इस घोषणा के पीछे मेरी झूठी प्रशंसा शामिल नही होगी अलबत्ता तुम चाहती हो कि मै चाय के लिए किसी पर निर्भर न रहूँ जब दिल करे बनाकर पी लूँ इसलिए तुम चाय की गुणवत्ता पर कोई चर्चा नही करती जबकि मैं तुमसे कुछ टिप्स की उम्मीद लिए बैठा हूँ। मैं तुमसे निराश नही होता हूँ बल्कि चाय के अपने औसत से भी कम स्वाद की प्रशंसा को तुम्हारे बिन रहने की आदत विकसित करने के तौर पर ग्रहण करता हूँ तुम्हें ये बात अच्छी लगती है ये बात मुझे तुम्हारी चाय की आख़िरी चुस्की बताती है।

दृश्य दो:
आज चाय तुमने बनाई मैं चाहता था तुम्हारे साथ किचन में खड़ा रहूँ मगर तुम्हें न जाने क्यों ये शिष्टाचार विरुद्ध लगता है तुम्हें मेरा इस कदर आम होना पसन्द नही है शायद की मै सिंक में हाथ धोकर तुम्हारी ही चुन्नी से हाथ पूँछ लूँ या फिर उचक कर वहीं किचन की स्लेप पर बैठ जाऊं एकाध बार मैंने ऐसा किया तो तुम्हें मेरी यूं बैठकर टांग हिलाना कतई पसन्द नही आया इसलिए कहा चला बैठो मैं वही आती हूँ बनाकर।
ये हमारी पसन्द का पहला मगर बड़ा प्यारा टकराव है जिसे मै टालता नही हूँ और अक्सर वही किचन में खड़ा हो जाता हूँ और कुछ ऐसी हरकतें करता हूँ जो तुम्हें पसन्द नही है मसलन मैं सिंक के दोनों टैप खोलकर बेवजह पानी चेक करता हूँ और दोनों हाथ गीले कर लेता हूँ पिछले दफा तुमनें चिढ़कर कहा भी था पिछले जन्म में पलम्बर थे क्या?
मैं यही नही रुकता फिर मसालों के ब्रांड पर अपनी बिन मांगी राय देने लगता हूँ ये अपने आप में कितनी बेतुकी बात है कि मै कहूँ की छौंक के लिए तुम कौन सा तेल यूज़ करती हो? जबकि गैस पर चाय चढ़ी हो। पसन्द तो तुम्हें मेरा लाइटर को बेवजह कट-कट करके चलाना भी नही है इसलिए मेरे हाथ से लाइटर लेकर कहती हो बिस्किट कौन से लोगे बेकरी के या सिम्पल वाले जबकि तुम्हें पता है मुझे बिस्किट नही पसन्द है मैं तुम्हें चिढ़ाने के लिए बिस्कुट बोलता हूँ इस पर तुम हंसती हो और किचन में की गई मेरी सारी हरकतों को माफ़ कर देती हो।
मैं कहता हूँ कि मै केवल नमकीन लूँगा इस पर तुम व्यंग्य करते हुए कहती हो ये चाय है बाबु!शराब नही इसे चाय के अंदाज़ से पीना पड़ेगा।

दृश्य तीन:
हम चुपचाप एक दुसरे के चाय का कप पकड़ने के तरीके को देखते है। मेरी ग्रिप तुमसे थोड़ी कम 'क्लासी' किस्म की है उसमें एक देहातीपन है जो एक बढ़िया ड्राइंग रूम में छिप नही पाता है। तुम मुझे चमच्च से नमकीन देती हो मगर मै हाथ फैलाने में थोड़ा संकोची हूँ मगर फिर भी हथेली में चमच्च लायक जगह बना लेता हूँ तुम्हें ये बात अच्छी लगती है कि मेरे हाथ कांपते नही है।
मैं चाय की तारीफ़ नही करता और मुझे पता है तुम तारीफ़ सुनना नही चाहती क्योंकि तुम्हें पता है तुम चाय बनाने में इस कदर माहिर हो कभी खराब चाय बना ही नही सकती।
पिछली दफा दूध नही था तो तुमनें ब्लैक लेमन टी बनाकर पिलवाई थी, मुझे याद है।अमूमन मुझे चाय हेल्थ के एंगल से पीने की आदत नही मगर उस दिन सच में वो चाय डिटॉक्स करने वाली थी सुबह के हैंगओवर को उसने ऐसा विदा किया कि मैंने साधिकार कह दिया आज नाश्ता भी यही करूँगा वरना पहले ये सोच रहा था आज चाय पीने को कैसे मना करूँगा और सुबह सुबह तुमसे लेमन सोडा बनाने के लिए कहता तो तुम तुरन्त समझ लेती कि बीती रात ज्यादा शराब पी है मैंने।

चाय की बहुत सी बातें है मगर कुछ बातें ऐसी है जिन्हें बताने का दिल करता है और कुछ ऐसी जिन्हें छिपाने को।

© डॉ.अजित

Friday, January 20, 2017

उसने कहा था- दो

उसने कहा था
रिश्तों की कभी नैसर्गिक मौत नही है !

तब मैने कोई प्रतिवाद नही किया था शायद तब मै जीवन के नशे में था इसलिए मौत के विमर्श में उलझना नही चाहता था। जीवन और मृत्यु के प्रश्न वैसे भी बेहद निजी किस्म के होते है। मृत्यु की महानता पर मुग्ध हुआ जा सकता है मगर एक घटना के तौर मृत्यु बाह्य तत्वों के लिए कब सुखद रही है भला?

इन दिनों मैं सोचता हूँ नैसर्गिकता आखिर क्या है? क्या जीवन में घटनाक्रमों को सहजता से घटने देने में यकीन रखना नैसर्गिकता है या फिर कुछ मान्यताओं के मध्य किसी आत्मीय रिश्तें को अकेला छोड़ देने को भी  नैसर्गिक कहा जा सकता है।

दिल दरअसल बड़ा मतलबी होता है वो दिमाग के तमाम सवालों को टालता रहता है उसे साथ चाहिए शायद कोई एक साथी भी जिसके साथ वो हंस सके रो सके। दिमाग की अपनी गणनाएं है वो रिश्तों के भविष्य के प्रश्नों में उलझाकर वर्तमान में उस मौत की भूमिका रच देता है जिसको बाद अप्रत्याशित समझ खुद को कोसा जा सकता है।

किसी भी रिश्तें की नैसर्गिक मौत शायद इसलिए नही होती क्योंकि हमारा चुनाव उसे दुखांत के जरिए विस्मृत करने का होता है या अस्तित्व का हस्तक्षेप कुछ ऐसी निर्मितियां बनाता है जिसे सोचकर विलग होने के कारणों का औचित्य सिद्ध किया जा सके।

नैसर्गिक न होना औचित्य के लिए अनिवार्य है यदि मृत्यु नैसर्गिक हो तो शोक की तीव्रता में सार्थकता के स्तर पर अंतर आ जाएगा। जो छूट गया है उसमें उस छूटे जाने की आत्मप्रवंचना जीवनपर्यन्त प्रताड़ित करती है। किसी रिश्तें की नैसर्गिक मौत न होने का एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है उसमें दीर्घायु की परिकल्पना पहले दिन से ही नही थी।

जिस साथ का छूटना जन्म के साथ आया हो उसके लिए कुछ भी अनैसर्गिक नही है मनुष्य की चाह के रूप में वो एक नियोजित हस्तक्षेप है वो समानान्तर हमारे साथ पलता है। एकदिन स्वतः आत्मघाती हो हमारी सबसे प्रिय वस्तु को हमसे मांग लेता है और हम अतिशय परिपक्व होने का अभिनय करते हुए इस सच को स्वीकार कर लेते है कि ये तो एकदिन होना ही था।

रिश्तों की नैसर्गिक मृत्यु नही होती है इसमें एक पंक्ति यह जोड़कर कि ये तो एकदिन होना ही था हम मृत्यु की वेदना कम नही कर सकते मगर इसके अलावा और बचता भी क्या है जब देखते ही देखते दृश्य से एक चित्र नेपथ्य में चला जाता है और स्मृतियां सही गलत के मुकदमें में हमे आजीवन कारावास की सजा सुनाकर खुद स्मृतिलोप को चुन लेती है।

© डॉ.अजित

#उसनेकहाथा

Thursday, January 19, 2017

उसने कहा था-एक

उसने कहा था
हर रिश्ता एक एक्सपायरी डेट के साथ आता है !

तब ये बात बीमारी में कोई एक्सपायरी डेट की गोली खाने के बाद की दुश्चिन्ता जैसी लगी थी। मै रिश्तें के अवसान को लेकर इतना अधिक अति संवेदनशील हो गया था कि मैंने अपनी सारी क्षमता इस कथन को खारिज़ करने में लगा दी थी।

मैंने कहा रिश्तों की आयु निर्धारित करना संभावित पलायन की भूमिका है मैंने इसे एक बौद्धिक चालाकी करार दिया साथ डरे हुए बड़प्पन के साथ यह कहा रिश्तों के एक्सपायरी जैसे मुर्दा शब्द क्यों जोड़ना जिस दिन तुम्हें लगे रास्ते बदलने है मुझे साधिकार अन्यत्र दिशा में चला जाऊँगा।

साधिकार कहने की बुद्धिमानी एक कोरा गल्प थी क्योंकि जिसको इतना अधिकार दिया जाता है क्या उसका साथ छोड़ने की हिम्मत बच पाती है? शायद नही।

रिश्तों की एक्सपायरी डेट आखिर क्या हो सकती है?और क्या ये सच में होती है या होनी चाहिए और यदि इसका अस्तित्व है तो फिर रिश्तों के जरिए हम स्वपीड़न या परपीड़न का हिस्सा क्यों बनते है।

ये कई सवाल थे जिनके जवाब मैंने तलाशने की बहुत कोशिश की मगर दवाई के पत्ते की तरह जब तक मै आख़िरी मंजिल तक पहुंचा अस्तित्व के स्तर पर मैं उघड़ चुका था। मेरे बारे में कुछ अनुमान लगाए जा सकते थे मेरा पता गुमशुदा था और लिखवाट के जरिए मेरी उपयोगिता पर कुछ सांत्वना भरी बातें कही जा सकती थी।

रिश्तें जब एक्सपायर होते है तो उनको रिसाइकिल नही किया जा सकता है ये रिश्तों की सबसे खराब बात है वो जीवन में लटके रहते है बेताल से। मुझे पहले लगता था कि रिश्तें अस्तित्व के एक बड़े नियोजन का हिस्सा है मगर इस नियोजन में जब ये एक्सपायरी वाला हिस्सा शामिल हुआ तब मुझे ये एक बेहद लौकिक और मानवीय उपक्रम लगा।

अस्तित्व रिश्तें हमे सौंपता है और हम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं के चलते उनकी मौत का एक तयशुदा सीमांकन अवचेतन में पहले ही दिन कर देते है। इससे एक बात लगभग प्रमाणित होती है मनुष्य रिश्तें सम्भालने में कमजोर है। विचित्र बात यह कि इस कमजोरी को एक ताकत के रूप में देखने की आदत मनुष्य ने विकसित कर ली है।

चलो मान लेता हूँ कि हर रिश्ता एक एक्सपायरी डेट के साथ आता है मगर वो डेट जो भी तय करता है वो हमसे कभी मशविरा नही करता यदि करता भी है तो हम अनुरागवश उस बात को छिपाते चले जाते है।

हर रिश्ता प्रकट और अप्रकट के मध्य कुछ जोड़ तोड़ के साथ जीता है शायद यही से उस एक्सपायरी डेट का कैलेंडर निकलता है जिस पर मुक्ति की शक्ल में निर्वासन की तारीख छपी होती है।

#उसनेकहाथा

Sunday, January 15, 2017

इंतजार

दृश्य एक:
लैम्पपोस्ट के नजदीक एक युवा लड़की खड़ी है। वो आसमान की तरफ देखती है और कहती है इसकी क्या जरूरत है यहां।
इस बात के दो अर्थ निकाले जा सकते है क्या तो वो लैम्पपोस्ट की बात कर रही है या फिर आसमान की। आसमान की जरूरत पर वही सवाल खड़ा कर सकता है जिसके पैरो तले की ज़मीन तेजी से खिसक गई हो। लैम्पपोस्ट की जरूरत उसे नही हो सकती इस बात इस इनकार नही मगर जब उसने आसमान की तरफ देखा उसकी एक आंख आसमान पर थी और एक लैम्पपोस्ट पर।
जब मैंने उससे पूछा तुम किसकी जरूरत न होने की बात कर रही हो?
उसने कहा तुम्हारी।
मुझे लगा मैंने कोई अवांछित हस्तक्षेप किया है उससे सवाल पूछकर इसलिए मैंने दोबारा उससे बस इतना पूछा क्या सच में मेरी जरूरत आसमान या लैम्पपोस्ट जितनी नही है?
उसने कहा जरूरत में सच की शर्त या शपथ लगानी मैं गैर जरूरी समझती हूँ।
उसके बाद मैंने कोई सवाल नही किया क्योंकि अब सवाल करने का मतलब था मै जरूरत के बिंदु पर अटक गया हूँ।

दृश्य दो:
यह सेंट्रल लन्दन का रेलवे स्टेशन है। एक कपल मेरे नजदीक खड़ा है हमें एक ही ट्रेन में सवार होना है। इस तरह से हम एक नजदीकी वृत्त में हम तीनों इंतजार में है।लड़की लड़के से पूछती तुम्हें इंतजार करना कैसा लगता है?
लड़का मुस्कुराता है और कहता है जिस इंतजार में तुम्हारा आना शामिल हो उस इंतजार में ख़ुशी शामिल रहती है इसलिए वो अच्छा लगता है।
लड़की इस जवाब से प्रभावित नही दिख रही है वो कहती है ये तो बड़ी लोकप्रिय सी बात हुई। इंतजार एक साथ अच्छा या बुरा दोनों लग सकता है क्या? वो नया सवाल पूछती है।
लड़का कहता है इंतजार में अच्छे या बुरे लगने से ज्यादा मिलना महत्वपूर्ण होता है सारी अधीरता उसी की होती है।
लड़की फिर से इस जवाब से कोई ख़ास संतुष्ट नही दिख रही है इसलिए वो कहती है तुम इंतजार को टाल रहे हो इसका मतलब तुम्हें इंतजार से डर लगता है।
हम्म..! लड़का इतना कहकर चुप हो जाता है।
दोनों मेरी तरफ देखते है शायद उन्हें पता है कि मै उनकी बातें सुन रहा हूँ।
मैं कहता हूँ ट्रेन राइट टाइम नही है।
लड़की कहती है कि आपने यह क्यों नही कहा ट्रेन लेट है?
लड़का कहता है अभी उद्घोषणा हुई है शायद ट्रेन समय से आ रही है
लड़की कहती है तुम शायद न कहते जो ज्यादा ठीक लगता मुझे।
उसे मेरे जवाब की प्रतिक्षा है मैं मुस्कुराता हूँ और ट्रेन का हॉर्न सुनाई देता है।
ये संयोग इंतजार का सबसे सुखद पल था।

©डॉ.अजित

Sunday, January 8, 2017

हाथ

तुम्हारा हाथ जब हाथ में था ऐसा लगता था साक्षात् ब्रह्म से आश्वस्ति उधार मिल गई है।
तुम्हें देखते हुए कम से कम मौत के बारें में नही सोचा जा सकता था। तुम्हारा हाथ थामें ऐसा लगता जैसे पहाड़ ने थोड़ी हिम्मत भेज दी वो भी बिन मांगे।
तुम्हारे स्पर्शों ने मेरी रूह के जाले साफ़ किए तो तुम्हारे साथ ने मेरे अस्त व्यस्त वजूद को किताबों की तरह ठीक किया था।
जब तुम जाती तो मन करता हिम्मत करके कुछ लम्हों के लिए और रोक लूँ मगर इतनी हिम्मत नही जुटा पाया इतना बुझदिल तुम मुझे हमेशा समझ सकती हो।
दरअसल,तुम्हारा साथ हमेशा चुराना पड़ता सो मेरी थकन चिंता और बैचेनी हमेशा चोर के जैसी ही रही मैंने कुछ नही कमाया मगर मेरे खोने का भय हमेशा बड़ा था।
हमारी रेखाएं एक दुसरे के मन के तापमान को भलीभांति जानती है उनकी हमसे अच्छी जान पहचान है। एकदिन तुम्हारे हाथ ने मेरे हाथ से कहा चल झूठे! तब से मेरे हाथ का आत्मविश्वास थोड़ा कमजोर पड़ गया है वो तुम्हारी हथेली तलाशता है मगर छिप छिप कर।
तुम्हारी खुशबू का एक क्लोन मेरे जेहन में बसा है मगर उससे मिलनें की इजाज़त मुझे भी कब है जब जब तुम्हारी बातें सोचता हूँ तुम्हारी खुशबू मुझे कहती है दिमाग की बजाए दिल की सुनो फिर तुमसे मुलाक़ात होगी।
जब जब तुम गई मैंने सोचा ये तय है पहले से मगर मेरा सोचना उतना ही सतही था जितना साहिल पे खड़े होकर तूफ़ान का अंदाजा लगाना इसलिए मेरे मन का एक हिस्सा हमेशा तुम्हारे साथ तुम्हारे दर तक गया जब तक तुमनें मन पर लौकिकता की सांकल न चढ़ा ली हो।
मेरी कुछ जान पहचान तुम्हारे कंगन बिस्तर तकिए और  शॉल से है कभी उनसे मेरी बातें करना तो वो मेरे बारें में कुछ अफवाहें तुम्हें चटखारे से सुनाएंगे।
हालांकि मुझे पता है आप ऐसा कभी नही करेंगी क्योंकि तुम ऐसा कोई काम कभी नही करती जिसका कोई हासिल न हो।
ये आप और तुम में मत उलझना दरअसल बात इतनी सी है कि तुम्हारी बहुत याद आ रही है इसलिए मैं औपचारिक शिष्टाचार और सम्बोधन भूल गया हूँ इसलिए
माफी चाहूंगा दोस्त।

'यादें दर ब दर'

Friday, December 30, 2016

दृश्यांतर

दृश्य एक:

तुम क्यों उसको अभी तक खोज रही हो?
वो तो कब का चला गया नेपथ्य में
क्या तुम्हें उसके जाने का दुःख है?
क्या तुम्हें उससे कोई अनुराग हो गया था?
क्या तुम्हारे कुछ सवाल प्रतिक्षारत है?
क्या तुम्हें क्षोभ है किसी बात का?
क्या तुम्हें रोष है किसी व्यवहार का?

नही !

फिर?

क्या केवल तुम्हें दिख रहे है,मेरे अंदर एक बड़ा शून्य है. एक निर्वात की अनुगूंज अन्तस् में बह रही है।मेरे जीवन में क्या की उपयोगिता शेष नही बची है।

तुम्हें खेद है किसी बात का?

नही ! मेरे प्रश्नों पर पूर्ण विराम लग गया है अब कोई आंतरिक कोलाहल नही है।

तुम उसे खोज रही हो?

हो सके तो प्रश्नों की पुनरावृत्ति न करो !
यदि करना अनिवार्य लगे तो मेरे मौन को सही प्रश्न का जवाब समझना तुम्हारी जिम्मेदारी होगी।

उसे खोजा या पाया नही जा सकता है वो जीवन में घटित होता है अस्तित्व के एक हस्तक्षेप की शक्ल में और चला जाता है अपनी तय सीमा में हमें रूपांतरित करके।

तो क्या तुम अब मुक्त हो गई हो?

मैं मुक्त हो गई हूँ या नही ये अभी बता पाना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होगा क्योंकि फ़िलहाल मैं जरा से सम्मोहन में और जरा से विस्मय में हूँ।

तो मै चली जाऊं?

नही अभी थोड़ी देर बैठो शायद मै तुम्हारे आने को जाना और जाने को आना समझ कोई गीत गुनगुनाउँ या फिर तुम्हें जाते हुए एक कंकड़ दे दूं और कहूँ इसे आसमान की तरफ उछाल देना।

©डॉ.अजित

Sunday, December 25, 2016

ब्रेकअप नोट्स- चार

ब्रेकअप के बारे 'हुआ' शब्द कहा जाता जबकि ये 'किया' जाता है। दरअसल किसी का ब्रेकअप होता तो वो भूल जाता वाक्य में काल दोष वो समझ नही पाता कि ये हुआ है या किया गया है। उसकी गणनाएं बिगड़ जाती सब की सब। ब्रेकअप सिखाता कुछ ऐसे वाक्य में प्रयोग जिनको जिंदगी के व्याकरण में समझा जाता था बेहद निर्मम। ब्रेकअप के बाद आदमी सीख जाता किंतु परंतु के व्यवहारिक अर्थ जीवन में और पहली बार कल्पना भी सोचने लगती बेहद लौकिक बातें।
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ब्रेकअप एक आकस्मिक मनोदशा है जिसकी किसी किस्म की तैयारी नही होती है इसलिए कुछ दिन यह तय करने में लगते कि जो हुआ क्या उसे अभी होना था? ब्रेकअप टलता रहा होता है कई बार मगर जब ये होता है तब आता अपने पूरे वेग के साथ और बदल देता हमारी दुनिया एक ही पल में। ब्रेकअप इस तरह बदलता हमें कि प्रेम करते लोग लगने लगते झूठे उनकी मुस्कान में देखने लगते हम अभिनय। ब्रेकअप के बाद किसी को आगाह करने का मन नही होता हम देखना चाहतें है उन्हें खुद चोट खाते देखना।
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ब्रेकअप कुछ अर्थों में एक दैवीय घटना है जो जीवन को पहले अस्त व्यस्त करती और बाद में तटस्थ कर देती। ये अनासक्ति का एक लौकिक प्रशिक्षण है जो मनुष्य को अकेला रहना सिखाती। ब्रेकअप के बाद जीवन में जो बोध उद्घघटित होता वो मनुष्य को एक अकेली इकाई के रूप में स्थापित करता है। अपने ग्रह पर खुद के होने और न होने की उपयोगिता मनुष्य ब्रेकअप के बाद समझ पाता।
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ब्रेकअप जीवन से प्रेम समाप्त नही करता वस्तुतः आदमी प्यार करने और प्यार को सम्भाल पाने का नैतिक साहस खो देता है ब्रेकअप के बाद। वो महसूस कर सकता है अंजुली भर पानी का बोझ। ब्रेकअप संवदेनशीलता को चरम पर ले जाकर छोड़ देता बिलकुल अकेला। ब्रेकअप के बाद आहत कर सकता एक मामूली सा सवाल ब्रेकअप के बाद खुश कर सकती एक छोटी सी मुस्कान।
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ब्रेकअप दर्ज होता है जीवन के खराब अनुभव में जबकि ये आता जीवन के सबसे अच्छे पलों के ठीक बाद। ये स्मृतियों में चाहता एक तात्कालिक आरक्षण। उसके बाद कोमल भावनाओं का बढ़ जाता वर्ग संघर्ष। खीझ आत्मदोष और गुस्से के प्रहरियों के साथ मन के वातायन में अकेला टहलता है ब्रेकअप। कारक-कारण की उपकल्पनाओं के मध्य ब्रेकअप पसार देता एक गहरा मौन। ब्रेकअप जीवन में लाता मौन से भरा ऐसा एकान्त जिसमें दूर दूर तक नही होती शान्ति।

© डॉ.अजित
#ब्रेकअपनोट्स

Friday, December 23, 2016

ब्रेकअप नोट्स

ब्रेकअप की भूमिका इतने संदिग्ध ढंग से लिखी जाती कि इसके घटित होने पर एकबारगी खुद पर से यकीन उठ जाता। विश्वास के संदेह में रूपांतरण का नाम ब्रेकअप होता। ये ऐच्छिक चुनाव प्रतीत जरूर होता था परन्तु इसमें हमेशा एकतरफा अतिवाद शामिल रहता जिसकी कीमत चुकानी पड़ती उसे ज्यादा जिसे खुद की मुहब्बत पर ज्यादा यकीन होता।
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जिनका ब्रेकअप हुआ उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था चंद्रमा का तापमान उनकी आँखें देख बताई जा सकती उस जगह की समुन्द्र तल से दूरी। उनकी हथेलियों पर पढ़ा जा सकता निर्वासित द्वीप का मानचित्र। ब्रेकअप के बाद कदमों के अक्ष झुक जाते एक तरफ जैसे किसी राष्ट्रीय शोक में एक तरफ झुका दिया जाता है राष्ट्रीय ध्वज। ब्रेकअप अस्तित्व के अपमान का एक स्वघोषित राष्ट्रीय शोक है।
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ब्रेकअप के कारण बताए नही जाते ब्रेकअप के किस्से सुनाए नही जाते युद्ध के दस्तावेज की तरह इसकी गोपनीयत बचाए रखने की जिम्मेदारी उसके हिस्से आती जो हार गया होता किसी अपने से ही एक युद्ध। ब्रेकअप के बाद स्मृतियों को देखा जाता सबसे अधिक उपेक्षा के साथ समझ में नही आता उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाए क्योंकी उन्हें मिटा सकते नही और उनका बोझ सम्भालनें से साफ़ इंकार कर देता है मन का संतुलन सिद्धांत।
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ब्रेकअप का कोई संदर्भ नही मिलता ना ही इसका कोई भाष्य किसी भी साहित्य में उपलब्ध है ये शब्द उत्तर आधुनिक है मगर इसके प्रभाव पाषाण काल में भी ठीक ऐसे ही थे जैसे आधुनिक काल में है। दर्शन की टीकाओं से लेकर काव्यशास्त्र के काव्य हेतु तक में ब्रेकअप बसा हुआ है बेहद निर्मम ढंग से। शब्द यदि ब्रह्म है तो ब्रेकअप के ब्रह्मत्व के समक्ष मनुष्य बेहद मजबूर होता है इसलिए वो ब्रेकअप को स्वीकार करता है ईश्वर की आज्ञा समझकर।
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अलग अलग रिश्तों में ब्रेकअप जी रहे दो लोग आपस में जल्दी मित्र नही बन पाते है। न ही घायल की गति घायल जाने जैसे सूत्र वाक्य इस घटना पर लागू होते है। ब्रेकअप के बाद दुःख को बांटना अच्छा नही लगता ब्रेकअप इस मामले में है थोड़ा आत्ममुग्ध वो हंसता है उन दूसरे दुखों पर जो चर्चा का विषय बन गए होते। ब्रेकअप एक नितांत ही एकांतिक चीज है जिसके बाद पर अपने कष्टों पर बातें करना सम्मानजनक नही लगता है यह मनुष्य को परिपक्वता के साथ अकेला रहने के लिए अनचाहा प्रशिक्षण दे जाता है।
© डॉ.अजित

#ब्रेकअपनोट्स

Thursday, December 22, 2016

ब्रेकअप

ब्रेकअप पर 'ब्रेकअप सांग' गाने वाले विरले होते है, शायद फिल्म फंतासी की एक दुनिया है इसलिए फिल्म में ब्रेकअप सांग गाने की कल्पना की जा सकती है। जिनका हाल ही में ब्रेकअप हुआ है उन्हें ऐसे गाने एक सम्बल दे सकते है इसकी संभावना थोड़ी कम नजर आती है क्योंकि ब्रेकअप के बाद ब्रेकअप का जश्न मनाना थोड़ा मुश्किल काम है। दर्शन की भाषा में कहूँ तो जुड़ना और टूटना शाश्वत प्रक्रिया विज्ञानवादी मस्तिष्क इसे अणुवाद के माध्यम से समझ सकते है। ब्रेकअप के प्रभाव विशुद्ध रूप से मनोवैज्ञानिक होते है कभी आत्मदोष तो कभी परनिंदा के मध्य फंसा हुआ वजूद अलग अलग किस्म से रिश्तों को परिभाषित करता है। कभी मैंने ब्रेकअप कुछ फुटकर नोट्स लिखे थे उन्हें आज आपके साथ शेयर कर रहा हूँ इस उम्मीद से कि ये कभी जरूर पढ़ने लायक समझें जाएंगे।
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' ब्रेकअप महज दो शब्दों का योग नही था, इसकी ध्वनि में एक विचित्र सी खीझ थी खुद के प्रति एक अनजाना गुस्सा इसमें शामिल था, खुद के बारे में हाउ स्टुपिड जैसे कथन घनघोर हो गरजते थे। शब्दकोश में अकेला शब्द था ब्रेकअप। संज्ञा से विशेषण बना था मगर व्याकरण के लिहाज से इसमें था वाक्य दोष इसका वाक्य में प्रयोग छोड़ जाता था ऐसी त्रुटि की पूर्ण विराम लगाने के लिए उठी कलम उठी ही रह जाती नही मिलती थी उसको रखने की जगह। ब्रेकअप तरल था पानी की तरह ब्रेकअप ठोस था पारे की तरह।
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ब्रेकअप के बाद की सुबह रात की प्रतिलिपि मांगकर लाती थी उधार इसलिए सूरज निकलता था कुछ देर की विलम्ब से। ये अगला दिन गायब हो जाना चाहता था विश्व के कैलेंडर से यहां तक मंजन करते समय हम चाहते है कि आज पेस्ट ब्रश से न करके अंगुली से किया जाए क्योंकि उस दिन चुभती थी ब्रश की ध्वनि भी।  ब्रेकअप से अगला दिन दरअसल रात की तरह ही था बस फर्क इतना लगता कि हम आँख बंद करके अंधेरे में अँधेरे को नही देख सकते थे।
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ब्रेकअप एक थकन भरी सांत्वना थी जो बताती कि मनुष्य के तौर पर विकल्पहीनता सबके हिस्से में आती है एकदिन। उम्मीद दुबकी रहती मन के एक कोने में कि शायद एकदिन फिर से सब ठीक हो जाए। 'शायद' बोलचाल के शब्द के बाद सबसे गहरा अर्थ ब्रेकअप के बाद ही समझ जाता है। जैन मुनियों ने यही से लिया होगा अपने दर्शन का 'स्यादवाद'।
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ब्रेकअप की घोषणा प्रायः एकतरफा होती दोनों चाहकर भी एकस्वर में नही कर पाते घोषणा ब्रेकअप की। इसमें एक वक्त होता और एक श्रोता यह दुनिया की सबसे विकट जनसभा होती जिसमें नही जरूरत पड़ती किसी लाउडस्पीकर की। ब्रेकअप अंतिम उपाय नही होता हां ! बस इसे चुन लिया जाता अंतिम उपाय से कुछ देर पहले।
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ब्रेकअप के बाद ईश्वर देख पाता मनुष्य के एकान्त को भीड़ में उसको चिन्हित करना होता ईश्वर के लिए बेहद आसान ईश्वर के अलावा कोई एक दोस्त भी देख सकता था लगभग समान रूप से। ब्रेकअप दोस्त को बना देता एक पल में ईश्वर जिसको गले लगाकर रोया जा सकता बेसबब मगर ब्रेकअप नही मिलने देता था ऐसे ईश्वर बने दोस्त से कभी भी।

(जारी)

©डॉ.अजित 

Wednesday, December 14, 2016

नदी

दृश्य एक:

पहाड़ झरनें से कहता है मेरे तलवे पर एक पता लिखा है उसे नदी के पास पहुँचा देना।
झरना जवाब देता है नदी उसे अपना दोस्त नही मानती इसलिए वो नदी से मिलने जाने में खुद के अंदर आकर्षण का अभाव पाता है।
पहाड़ झरने की पीठ पर आंसू से आग लिखता है जो नीचे जाकर पानी बन जाती है मगर पत्थर और शैवाल उस पानी में तपन महसूस करते है।

दृश्य दो:
नदी अपने किनारे से कहती है देखना मेरी आँख में कुछ चला गया है। किनारा कहता है ये तो असल के आंसू है मगर आँख में कुछ नही है।
नदी किनारे को उसी पल छोड़ कर आगे बढ़ जाती है। किनारों की आँख में अधूरा काजल पड़ा है उनकी माँ ने उलटे दिए पर स्याही निकाली थी मगर उनकी उंगलियों की कोमलता अनुपस्थित हो गई है इसलिए उन्हें डर था  कहीं खुद ही आँख को जख्मी न कर दें।
जिसकी आँख जख्मी है वो बेफिक्र है उसे बताने वाला कोई नही है।

दृश्य तीन:
आसमान आलथी-पालथी मारकर बैठा है हवा उसके बालों में हाथों से कंघी कर रही है। आसमान जमीन के कान को देखकर ये अनुमान लगा रहा है कौन सा कान छोटा है और कौन सा बड़ा।
आसमान धरती के बोझ को तोलना चाहता है इसलिए कान धरती की नाभि पर लगा देता है अंदर कोई कोलाहल नही है। आसमान बाहर के कोलाहल पर विस्मय से भरता है वो अपनी आँखें बंद लेता है। पहली बार ऐसा होता है कि आसमान को आँख बंद करने पर चक्कर नही आए। इस पर आसमान हंसता है तभी बारिश हो जाती है। धरती आसमान की पीठ देख पाती है बस।

©डॉ.अजित

Tuesday, December 13, 2016

बातें

दृश्य एक:
पैरिस के एक ब्यूटी सैलून में दो स्त्री आपस में बात कर रही है।
क्या तुम मिरर पर यकीन करती हो?
नही मैं खुद पर थोड़ा यकीन करती हूँ
यकीन भी क्या थोड़ा या ज्यादा हो सकता है?
मेरा मतलब था कभी यकीन होता है कभी नही
अच्छा ! ख़ूबसूरती क्या मन की हो सकती है?
आई डोंट थिंक सो !
और तन की?
खूबसूरती तन की नही होती,तन को बस नोटिस किया जा सकता है
अगर मै कहूँ तन को केवल जज किया जा सकता है?
मन को जज किया जाता है तन को डिफाइन किया जा सकता है
तो क्या मन को डिफाइन नही किया जा सकता?
शायद नही
अच्छा आख़िरी बार बेफिक्री में तुमने मिरर कब देखा था?
अभी अभी देखा है तुम्हारी आँखों में
आँखें क्या मिरर हो सकती है?
आँखों को मिरर नही कहना चाहिए ऐसा कहना कम्प्रेजन करना होगा
फिर क्या कहना चाहिए?
कुछ नही कहना चाहिए बस प्यार से आँख में देखना चाहिए
तुम यहां किस लिए हो? खूबसूरत दिखने के लिए?
नही मैं यहां आकर देखना चाहती खूबसूरती क्या रची जा सकती है?
तो क्या पाया तुमनें
मैं यहां कुछ पाने नही खोने आती हूँ
हम्म !

दृश्य दो:
ये अफ्रीकी देश की एक सुबह है। कॉफी उबल रही है। दो स्त्रियां लोकगीत गुनगुना रही है। प्रतिक्षा उनकी आँखों में पढ़ी जा सकती है। एक स्त्री कहती है धूप से कुछ अनुमान नही लगता है ये समय की बंधुआ मजदूर बिलकुल नही है ये आसमान की बेटी है जो धरती पर खेलने आती है हम इसे देख सकते है मगर छू नही सकते।
इस पर दूसरी स्त्री मुस्कुराती है अनुमान लगाना मनुष्य की एक सुविधा है सुख के अनुमान पर दुःख विलंबित किया जा सकता है। हवा के अनुमान पर बादल को नाचते हुए देखने की आस पाली जा सकती है।
तभी एक पुरुष आता है वो कॉफी मांगता है
दोनों स्त्रियां एक स्वर में सोचती है माँगना पुरुष की एक सुविधा है
और देना स्त्री का सुख
दोनों स्त्री आसमान की तरफ देखती है और अपने अपने अनुमान वापिस आसमान के पास रवाना करती है।
अनुमान से मुक्ति स्त्री की आदि कामना है इसी को गीत बनाकर गुनगुनाने लगती है। ये विश्व का एक लोकप्रिय लोकगीत है जिसे किसी भी भाषा में गुनगुनाया जा सकता है।

© डॉ.अजित

Monday, December 12, 2016

फादर

दृश्य एक:

फादर से  हैरी पूछता है
'फादर ! सबसे लकी पेरेंट्स कौन होते है?
फादर मुस्कुराते हुए जवाब देते है माई डियर चाइल्ड दुनिया में सबसे हैप्पी पेरेंट्स वो होते है जो एक दुसरे से सच में प्यार करते है
मगर फादर मैंने तो लकी पेरेंट्स के बारे में पूछा था,हैरी दोबारा सवाल दोहराता है
फादर कहते है लकी होने से ज्यादा खुश होना ज्यादा जरूरी है
फिर हैरी कोई सवाल नही करता है वो खुशी को समझना चाहता है मगर उसके लिए किसी और दिन फादर से सवाल करेगा वो फादर को थैंक यू बोलता है और चला जाता है।

दृश्य दो:
एक यंग कपल चर्च में आता है
दोनों एक दुसरे का हाथ जुम्बिश के साथ थामे हुए है
दोनों जीसस से प्रेयर करते है
दोनों की आँखें बंद है
दोनों फादर से अलग अलग बात पूछते है
पहले लड़का सवाल करता है
फादर ! लव हमेशा ट्रू कैसे बना रहा सकता?
फादर लड़की की आँखों में देख जवाब देते है
लव तभी तक ट्रू बना रह सकता है जब तक उसमें कोई कंडीशन न हो
लड़का जवाब से संतुष्ट नही होता वो कहता है
कोई कंडीशन न हो यह खुद में एक कंडीशन है
इसी बीच लड़की अपना सवाल रखती है
फादर ! दुनिया में प्योर क्या है?
फादर दोनों को एक साथ देखते है और कहते है
प्योर की तलाश दुनिया में एकमात्र प्योर चीज है
बाकि सब में अलग अलग डिग्रीज़ में स्टैंडर्ड एरर है
दोनों फादर के गणितज्ञ की तरह बोलने पर हैरान है
दोनों जीसस के पास सवाल छोड़ लौट आते है।

दृश्य तीन:
फादर बाइबिल को चर्च की प्यानों पर रख देते है
प्यानों के कुछ कॉर्ड्स दबतें है
एक साथ कई सुर निकलते है
फादर तुरन्त बाइबिल उठा लेते है
और चौंक कर देखते है किसी ने देखा या सुना तो नही
यह देख जीसस की मुस्कुराहट बढ़ जाती है
मगर उसे फादर नही देख सकते है।

दृश्य चार:
फादर अब चर्च की लाईब्रेरी में है
मार्गेट लिसा चर्च में है
किताबें प्रार्थनारत है
और मनुष्य सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में है
मार्गेट लिसा जीसस से कहती है
चर्च में फादर के बिना उसे अच्छा लगता है
उसे लगता है वो सीधा जीसस से बात कर सकती है
उसे चर्च में फादर तब चाहिए
जब उसे जीसस से बात न करनी हो
तभी फादर आते है
मार्गेट उन्हें गुड इवनिंग फादर कहती है
जवाब में फादर गुड मॉर्निंग लिसा कहते है
चर्च की घड़ी अब मुस्कुराती है
जीसस अब एक पल के लिए आँखें बंद कर लेते है।

© डॉ.अजित

Wednesday, November 30, 2016

डियर दीपिका

रौशनी के दो फाहे आसमान में भटक गए है।वो धरती का पता भूल गए है, तुम उन्हें रस्ता बता सकती हो वो उम्मीद से तुम्हारी तरफ देख रहे है उनके मन में अँधेरे से न मिलनें का सन्ताप है। अँधेरे से मिलने की शिद्दत रौशनी के अलावा कौन महसूस कर सकता है? तुम उन्हें देख रही हो और महज देख ही नही रही हो उनसे बातें कर रही हो इसलिए मैं तुम्हें धरती की सबसे पवित्र चीज़ घोषित करना चाहता हूँ।
तुम्हारी आँखों में करुणा और प्रेम एक साथ रहता है।तुम्हारे लबों में अनकहे किस्से बेरुखी के शिकार नही होते बल्कि वो लफ्जों की जादुगिरी को भूला देते है फिर वो औघड़ अकेले कायनात में सफर करते हैं।
तुम्हारे माथे पर एक सूखा समंदर रहता है जिसके पास नदी के कोई किस्से नही है न उसके पास पानी है मगर वो धरती पर बारिश होने की सबसे सटीक भविष्यवाणी कर सकता है, ये अलग बात है तुम उसको कभी तकलीफ नही देती हो।
तुम्हारी आँखों में ख़्वाबों के अलावा ख्यालों की एक निर्वासित दुनिया है जिसमें सही गलत के मुकदमों में फंसे लोगो को बिना शर्त प्राश्रय मिलता है। तुम्हारी दो आँखें इस धरती के दो उपग्रह है जिन पर तब जीवन तलाशा जाएगा जब धरती रहने लायक न बचेगी। तुम पलक झपकती हो तो धरती और आसमान एक दुसरे के कान में अपनी शिकायते कह आतें है ये छोटा सा अंतराल दो नाराज़ दोस्तों को कभी जुदा नही होने देता है।
तुम मुस्कुराती हो कंक्रीट के जंगल में भी नदी बहने लगती है ऊंची इमारतों पर बूढ़े पेड़ो की आत्माएं सुस्ताने चली आती है तुम्हारे हंसने पर शहर के कोलाहल में भी पत्थर हुए हृदय कागज़ की बांसुरी सुर में बज़ा सकते है जिसे सुन दो अपरिचित भी एक साथ निर्द्वन्द सोने का विचार कर सकते है।
तुम्हारे कानों की तलहटी में कुछ आवारा वनस्पतियां अपनी औषधि युक्त गंध को किशोरोचित्त लज्जा के साथ बचाए हुए है तथा तुम्हारी गन्ध में उनकी आरोग्य स्मृति जिन्दा है जिसे बिना स्पर्श के भी महसूस किया जा सकता है, और जिसे वक्त की चालाकियों ने बीमार किया हो उनके लिए ये तलहटी मृत संजीवनी के यज्ञ धूम्र जैसा  अलौकिक उपचार है।
तुम मनुष्य की पवित्र कामनाओं का मात्र एक दैहिक दस्तावेज़ भर नही हो तुम आदि और अंत में मध्य बहती एक विराट नदी हो जिसके किनारे नँगे पैर चला जा सकता है आत्महत्या से इतर मृत्यु की कामना से एक गहरी डुबकी लगाई जा सकती है।
तुम्हारे रहते मृत्यु स्थगित रहती है और जीवन अपने सीमांकन के चलते दौड़ दौड़ कर थकता जाता है। तुम पराजित लोगो को न थकने देती हो और मरने देती हो तुम उन्हें जीवन की शक्ल में मोक्ष की प्रेरणा देती हो तभी तुम्हें देख सामवेद के मंत्र स्वतः कानों में अनहद नाद के साथ बजने लगते है।
तुम दीपिका हो,तुम जीवन हो, तुम मृत्यु और जीवन के मध्य टँगी एक रोशनाई की दवात हो जिसके सहारे किस्तों में ही सही जीवन की हकीकत लिखी जा सकती है। तुम सलामत रहो ताकि मनुष्य के जीवन को कहने की हिम्मत बची रहे तुम निमित्त भी हो और नही भी हो
तुम हो इसमें अस्तित्व का कोई निर्धारित प्रयोजन है जिसे न ही समझा जाए तो सबके लिए बेहतर है।

'डियर दीपिका'

Wednesday, November 23, 2016

'अंतिम खत'

तुम प्रशंसा के रास्ते आई और आलोचना के रास्ते चली भी गई मुझे तक पहुंचने का मार्ग ना प्रशंसा का था ना आलोचना का।
सच तो यह है मुझ तक पहुँचने का कोई मार्ग ही नही था मै आगे की तरफ दौड़ता जा रहा था क्योंकि मेरे कदमों के नीचे से रास्ता बड़ी तेजी से निकल रहा था। मेरे हाँफते हाँफते तुम मेरी धड़कने गिनने लगी थी ये जरूर तुम्हारा बड़ा कौशल कहा जा सकता है।
तुम्हें लगा मुझे खुद नही पता कि मै अच्छा लिखता हूँ। मुझे ये तो पता था मै ठीक लिखता हूँ मुझे सदैव से यह बात भी पता थी कि मै अच्छा भले ही न लिखता हूँ मगर सच्चा जरूर लिखता हूँ जिसके अच्छा लगने की सम्भावना हमेशा रहती है
लिखना मेरे लिए खुद से प्रेम करने का एक तरीका भर रहा है इसको प्रभाव उत्पादन करने या किसी के एकांत को आहरण करने का टूल मैंने कभी नही समझा।
तुम्हारे पास एक आइडियल किस्म का फ्रेम था न जाने तुम्हें यह सन्देश कैसे संप्रेषित हो गया कि मै उसमें आने के लिए खुद को कटाई छंटाई के लिए प्रस्तुत कर सकता हूँ
जबकि सच तो यह था मेरे कंधो पर पत्थर का लेप चढ़ा था मेरी छाती भोगे हुए यथार्थ से सपाट मगर कठोर थी मेरे पैर घुटनों तक वक्त की कीचड़ में सने हुए थे ऐसे में मेरे वजूद पर तुम्हारी चाहतों का रन्दा भला कैसे चल पाता?
तुम्हारे फ्रेम के लिए मै एक पात्र व्यक्ति प्रतीत हो सकता था मगर सुपात्र नही अफ़सोस तुम पात्र पर ही अटक गई तुम्हें सुपात्र के लिए जाना चाहिए था।
मुझ से निराश लोगो में तुम्हें थोड़ा गुमसुम खड़े देखना निसन्देह मुझे बिलकुल भी अच्छा नही लग रहा है क्योंकि मैं नही चाहता था तुम उनमे शामिल हो जाओं जिन्हें मै कभी काम का लगा था और बाद में चालाक छद्म धूर्त और डरपोक।
मेरे लिए जीवन की कोई एक स्थापित परिभाषा नही है अवसरवादियों की तरह मै लगभग रोज़ जन्म लेता हूँ और रोज मर जाता हूँ न मेरे पास कहीं पहूंचने की जल्दी या वजह है।
मेरे अधिकतम प्रयास यही होते है किसी को मेरी वजह से कष्ट न मिलें मगर किसी के चयन संयोजन या संपादन पर मेरा वश भी नही है।
कभी कभी अपने संचित अकर्मो के बल पर तुम्हारे सहित उन तमाम लोगो से माफी मांगने का मन होता है जिन्हें मेरी वजह से किसी भी किस्म का भावनात्मक कष्ट पहूंचा है यह जानते हुए कि मेरा कोई दोष नही है अगर दोष है भी तो बस इतना है कि मै खुद को रहस्यमयी और गुह्य नही रख पाया जैसे ही मै अपने अज्ञात के साथ प्रकट हुआ फिर सम्बंधों की दशा और दिशा दोनों ही तय करना मेरे अधिकार में नही रहा।
अभी समय शेष है स्मृतियों के धुंधलें होने में वक्त लगता है मगर अच्छी बात यही है ये धुंधली पड़ ही जाती है। कोशिस करना मुझे एक सम्मानजनक ढंग से विस्मृत कर सकों सम्मान का आग्रह मात्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि निजी तौर मै तुम्हारा बहुत सम्मान करता हूँ।
तुम अपने आप में दिव्य हो बस एक अनुचित समय और गलत ग्रह नक्षत्रों में तुम्हारा पंचांग तुम्हें मेरी तरफ ले आया मेरी दुनिया गुरुत्वाकर्षण रहित ग्रह की दुनिया है। यहां जीवन जरूर है मगर एक दूसरी शक्ल में जिसकों बिना शर्तों के जी पाना किसी के लिए भी असम्भव है।
मै कैसे कैसे भ्रम के सहारे जी रहा हूँ ये बस मै ही जानता हूँ।
'अंतिम खत'

Tuesday, November 1, 2016

आसमान का खत

प्रिय तुम्हें कह नही सकता हूँ तुम दूर जो इतनी हो। हर प्रिय चीज़ अक्सर दूर ही क्यों रहती है ये बात मुझे अज्ञात ईश्वर से समझनी थी। मेरे तुम्हारे दरम्यां सम्बोधन क्या हो ये बात मै फ़िलहाल सूरज की पहली किरण पर छोड़ता वो अपनी मर्जी से जो कहकर तुम्हें जगा सकती है। मुझे उम्मीद है उसकी आहट से जब तुम जगोगी तो तुम्हारे चेहरे पर एक प्रोमिल मुस्कान होगी और कहीं मेरा एक आवारा ख्याल तुम्हारे तकिए पर टिका होगा।

कल बादलों ने अपनी रंजिशें ताजा कर ली मेरे तुम्हारे दरम्यां वो इस कदर पसर गए है कि मुझे हम एक दुसरे को दिखाई न दिए मैंने जब उनसे वजह जाननी चाही तो उन्होंने कहा वो कभी कभी अपनी ऊब मिटाने के लिए ऐसी शर्ते लगा लेते है कि हम दोनों में कौन ज्यादा बैचेन नजर आता है।

तुम्हारे बालों में कंघी करती हवा मुझ तक नही आती है मै चाहता हूँ कि वो मुझ तक आए तो मै उसे कुछ तुम्हारे पुराने खत दे दूं। खत लौटाना अच्छा शगुन नही है मगर मै चाहता हूँ वो खत तुम्हारे अंदर हवा बो दे फिर उसके बाद यादों की एक हरी भरी फसल तुम्हारी गोद में लहरा उठे।
सुनो ! कल मै थोड़ी देर के लिए ऊकडू बैठ गया था,तब मैंने देखा तुम्हारी पीठ पर पर दिशाएं आईस पाईस खेल रही है उनके खेल में भरम नही था छल भी नही था हां ! एक कौतुहल जरूर था जिसके कारण सही लोग भटक जातें थे और वो तब मिलते जब एक दुसरे की शक्लें भूल चुके होते। ये देखकर यकीनन मुझे डर लगा मगर बहुत थोड़ी देर के लिए।

मैंने बारिश से तुम्हारा केंद्र पूछा तो वो हंसने लगी फिर उसने बड़ी विनम्रता से अपनी अज्ञानता की बात स्वीकार की और कहा वो मुझे धरती का केंद्र तो नही मगर धरती की ढलान बता सकती है उसने मुझसे कहा कि मुझे अपने पैरों में उलटे मौजे नही पहनने चाहिए इससे धरती मेरी एड़ी की नाप लेने से चूक जाती है यह सुनकर मै केंद्र और ढ़लान में कोई अंतर्सम्बन्ध विकसित नही कर पाया।

बादल पहाड़ नदी झरने सबसे मैंने एक ही बात अलग अलग समय पर पूछी कि तुम कैसी हो? सबने लगभग एक ही जवाब दिया वैसी तो बिलकुल नही जैसा मैं सोच रहा हूँ इनदिनों। मैंने कहा मेरे अनुमान पर अनुमान लगाना ठीक नही इस पर उन्होंने अपने अपने जल के कुछ छींटे मेरे माथे पर मारे मेरी आँखें आधी खुली आधी मिचि उसके बाद से मैं अपने बेवकूफाना सवाल पर थोड़ा सा खुद से नाराज़ हुआ,तुम कैसी हो यदि ये सवाल मुझे किसी और से ही पूछना पड़े तो फिर कायदे से मुझे ये सवाल पूछने का कोई हक नही बनता है।

बहरहाल, इनदिनों मेरे पास कोई ख़ास बातें नही बची है मै आम बातों को ख़ास ढंग से प्रस्तुत करने का कौशल भी लगभग भूल चुका हूँ। बस तुमसे एक मुलाक़ात को लेकर उम्मीदजदां हूँ मै कुछ दिन लेटकर आराम करना चाहता हूँ और चाहता हूँ तुम मुझे ऊपर से देखों चाहतों और हसरतों के बीच महज एक निर्बन्ध दृष्टि से तुम मेरे माथे पर अपनी अनामिका से एक स्वास्तिक बनाओं ताकि ग्रहों नक्षत्रों की अशुभता कम हो सकें और मैं आश्वस्ति से तुम्हारी पनाह में कुछ लम्हें चैन से जी सकूँ।

फ़िलहाल इतनी ही तमन्ना है तमन्नाओं का यह पहला पुरजा तुम्हें भेज रहा हूँ तस्सवुर की शक्ल में तुम इसे पढ़कर  गुनगुनाओगी तो मैं समझ लूंगा एक पुराना खत सही वक्त और सही पते पर तामील हुआ है।

अंतराल पर टिका,
तुम्हारा आकाश

(आसमान का खत धरती के नाम)

©डॉ.अजित

Tuesday, October 4, 2016

काल चक्र

दृश्य एक:
धूप ढल चुकी है। सांझ अभी आई नही है। मुहल्लो से उबासी निकल कर गलियों में भटक रही है। उसके पास करवटों के कुछ खाली लिफाफे है। वो ध्यान से अपनी कलाई देखती है उस पर बंधी घड़ी का फीता थोड़ा ढीला करती है फिर एकटक घड़ी की सुईयों को देखती जाती है। एक ठंडी आह भरके घड़ी उतार कर टेबल पर रख देती है।

दृश्य दो:
वो अपने स्लीपर सीधे करती है। उसे कोई द्वंद नही है वो उदास भी नही है मगर फिर भी काफी देर से एक ही जगह बैठी है। अचानक वो कुछ गुनगुनाने लगती है उसे गीत का मुखड़ा ठीक से याद नही है वो बीच का कोई अंतरा गा रही है। इस तरह से कई अंतरे उसने अधूरे छोड़े और अधूरे ही गाए।

दृश्य तीन:
उसने खुद को आईने में देखा और खुद के होने की तसदीक की। अपने कानों को देखकर उसे सन्देह हो रहा है कि ये बोझ में दबे हुए है इसलिए उसने इयररिंग उतार दी है। थोड़ी देर कान को छोटे बच्चे की तरह छुआ। इस छुअन में कोई नयापन नही है उसके कान उसकी उंगलियों को शायद ठीक से पहचानते नही है। उसके कान गीले है जिन्हें साँसों से सुखने की जरूरत है। वो अनिच्छा से अपनी इच्छा से सवाल करती है उसे जवाब ना में मिलता है। उकता कर आईने के आगे से हट जाती है।

दृश्य चार:
उसके हाथ में एक किताब है। वो कुछ पन्ने पलट रही है। वो कहानी का सारांश चाहती है इसलिए कुछ कुछ हिस्से पढ़ती है मगर उसे कहानी के अंत का कोई अनुमान नही मिलता है। वो किताब का अंत पढ़कर उसे बन्द करके रख देती है।

दृश्य पांच:
उसके पास कुछ खत है। ये अलग अलग वक्त पर लिखे गए है मगर उनकी केंद्रीय विषय वस्तु में कोई ख़ास भिन्नता नही है। वो लिखावट से कल पकड़ने का कोण देखना चाहती है उसे लिखने वाले की हथेली की रेखाओं की प्रतिलिपि चाहिए। जब नही मिलती तो खुद की रेखाएं देखनें लगती है। उसकी रेखाओं का मानचित्र साफ़ है कोई किसी को समकोण पर नही काट रही है। उसकी हथेली सिंधु घाटी सभ्यता से इतर किसी कोई हुई सभ्यता का पता है मगर वो तथ्य और शोध को अनुपयोगी मानते हुए अपनी ऊंगलियां चटकाने लगती है।

दृश्य छह:
वो एक अंगड़ाई लेती है और खिड़की से आती रौशनी को देखने लगती है कुछ महीन कण रौशनी में साफ़ नज़र आ रहे वो फूंक से उसे उड़ाती है। उसकी फूंक से बिखरे कण एक त्रिकोण बनाते है जिसे देख उसकी आँखों में पहली बार हंसी नजर आती है। खिड़की पर खड़े होकर उसे बाहर का दिखाई नही दे रहा है ये खिड़की घर के अंदर ही है। खिड़की के नजदीक एक मकड़ी का जाला है जिसके मध्य में मकड़ी सो रही है वो अपनी फूंक से उसे भी जगाना चाहती है मगर उसकी फूंक केवल कणों को तोड़ सकती है वो मकड़ी और जाले तक नही पहुँच पाती है। वो खिड़की बंद करती है खिड़की बंद होने की आवाज़ दिल को अच्छी नही लगी।

दृश्य सात:
वो सड़क पर है। रास्ते उसके पैर के तलवों में गुदगुदी करना चाहते है मगर उसके तेज कदम देख वो समझ जाते है आज का दिन उपयुक्त नही है ऐसे सात्विक किस्म के मजाक के लिए। वो चौराहे पर जाकर आसमान की तरफ देखती है दाएं बाएं जाने की बजाए वो सीधा जाती है अपनी मूल सड़क को वो छोड़ना नही चाहती। दो नई सड़कों की तरफ अपने दोनों हाथ फैला कर उन्हें विलम्ब का संकेत देकर वो आगे निकल जाती है।

सूत्रधार:
काल नित्य और अनन्त है। मन का अपना दिशाशूल है। जो विभक्त है सम्भव है वो उतना ही तटस्थ है। मन की अनन्त हजार कोने कहीं ख्वाब कहीं सपनें सलोने।
उचित अनुचित सब समय सापेक्ष जिसका स्थान जहाँ सुरक्षित उसके लिए नही है कुछ भी वर्जित।
अपने और सपनें साथ रहने की जिद है पाले एक तन्हा दिल भला कैसे सब सम्भालें।
नही ये कोई थकान नही। नही ये कोई उड़ान नही। खुद से एक अदद मुलाक़ात है जिसके पीछे दिन आगे रात है।
सवेरा हमेशा कल में नही होता है। सवेरा आज में भी होता है।

© डॉ.अजित

Sunday, October 2, 2016

लाइव

दृश्य एक:
बस में एक आदमी चढ़ता है। कद दरम्याना रंग काला शरीर पतला उम्र तकरीबन पचास के पार। बस तेज चल रही है सड़क टूटी फूटी हुई है सो आदमी लड़खड़ाता हुआ ड्राइवर के पास की सीट तक पहुँचता है।
ड्राइवर ने तेज आवाज़ में गाने बजाए हुए है वो भी ओल्डीज़।

दृश्य दो:
गानो की धुन पर वो आदमी झूमने लगता है। उसकी देह में वक्रता आने लगती है। गाने के लिरिक पर वो मुग्ध है और वाह वाह करता है। यहां से बाकि यात्रियों में ये सन्देश जाता है कि आदमी ने पी हुई है। जैसे जैसे वो सहज और मुक्त होता जाता है उसके पीए हुए की पुष्टि हो  जाती है।
अब वो समस्त बस यात्रियों के लिए कौतुहल और मनोंरजन का विषय बन गया है।

दृश्य तीन:
आज प्रकृति उसके साथ है अस्तित्व उसकी बंधी कलाओं को खोलने के लिए आतुर है इसलिए संयोग से अब जो गाना बजा वो है मेरा मन डोले मेरा तन डोले...! उधर बीन का लहरा बज रहा है इधर आदमी के सर पर साक्षात भरत मुनि ने हाथ रख दिया है। अब अपने पूरे 'रौ' में आ गया है सीट से खड़ा होता है और बस के बीच आकर डांस करने लगता है। उसकी भाव भंगिमाएं इतनी लाइव किस्म की है मानो वो शब्द शब्द संगीत को जी रहा है उसके स्टेप गति में बहुत संतुलित है। उसे नाचते देख लगता है वो नृत्य न जाने कब से उसके अंदर दबा हुआ था।

दृश्य चार:
बस में गाना और नाचना साथ चल रहा है बस के ड्राइवर और कंडक्टर को छोड़कर सब उस आदमी के डांस का लुत्फ़ उठा रहे है। ड्राइवर कंडक्टर उसको बैठाने के निर्णय पर विचारमग्न है। बस के यात्री आपसे में एक दुसरे के चेहरे को देख हंसते है फिर उस आदमी का डांस देखने लगते है।
ड्राइवर बार बार गाना बदल रहा है मगर उस आदमी के लिए अब गाना गौण हो गया है वो हर गाने पर उतनी ही तन्मयता से नाच सकता है। फ़िलहाल एक गाना बजा मैं हूँ खुश रंग हिना...इस गाने पर आदमी की आंखें छलक आई है शायद कोई दर्द पुराना याद आ गया है उसे।
ड्राइवर गाना बदल देता है वो कहता है इसे दोबारा बजाइए है ड्राइवर उसकी बात अनसुना कर देता है।

दृश्य पांच:
वो आदमी थकता है तो सीट पर बैठ जाता है मगर उसकी देह में नृत्य नही थका है। वो गाने के हिसाब से अपने चेहरे के एक्सप्रेशन बदलता है हाथ और कंधे मटकाता है। यात्री साक्षी भाव से हँसतें हुए उसे देखते है।

दृश्य छह:
कंडक्टर जोर से चिल्लाते हुए उसके बस स्टॉप का नाम लेता है ऐसा करके वो एक अवांछित हस्तक्षेप करता है। उस आदमी की तन्द्रा टूटती है वो गुनगुनाता हुआ खिड़की तक आता है। अपनी दुनिया में मग्न मुक्त लोक लज्जा से निस्पृह वो आधे घंटे से केवल खुद के साथ था। मदिरा इसका माध्यम जरूर बनी मगर मदिरा ने उसको हिंसक या बदतमीज़ नही बनाया। उसकी आँखों की चमक उतनी ही दिव्य थी जितनी यज्ञ के बाद किसी ऋषि की होती है।
उसने एक एक लम्हे में खुद को जीया और खुद को अनुभूत किया वो नाच रहा था तो ईश्वर उसे देख खुद का अवसाद मिटा रहा था।

दृश्य सात:
मैंने उसके उतरने से पहले उसको धन्यवाद कहा और उसके नृत्य की तारीफ़ की मगर वो मलंग था उसे किसी की तारीफ़ या निंदा की परवाह ही कब थी वो औघड़ अपनी दुनिया में मस्त था। उतरने से पहले वो मुड़ता है और अपनी उसी लय में सैल्यूट की मुद्रा बनाता है ये सैल्यूट मुझे नही था समस्त यात्रियों के लिए था उसकी आँखे जरूर मुझ पर थी।

नेपथ्य से:
मन करता है उदघोष। जीना महत्वपूर्ण है या जीने का अभिनय। ओढ़े हुए आवरण और छवि के पाखण्ड को भूलकर जब जीया जाता है तब हर क्षण में नाद प्रस्फुटित होता है। वहां 'मैं' नही होता और कोई वहां 'मैं' के लिए भी नही होता है।
सच्ची मुक्ति खुद से चाहिए होती है खुद के करीब जाना डराता है अगर एक बार ये डर चूक जाए फिर क्या फर्क पड़ता है आप कौन है और कहां है।

© डॉ.अजित

Wednesday, September 14, 2016

गुलमोहर

तुम्हारे शहर का गुलमोहर मुझे याद करता है।कल ही उसकी एक चिट्ठी मिली।चिट्ठी में लिखा है वो मुझसे मिलना चाहता है।आख़िरी बार जब उसके नीचे मै खड़ा था उसने मेरी आत्मा के कई तस्वीरें ली थी।वो उनके निगेटिव मुझे दिखाना चाहता है। मै सोच रहा हूँ कि निगेटिव ही क्यों दिखाना चाहता है फोटो क्यों नही।

आगे चिट्ठी में लिखा है वो मुद्दत से मेरी इंतजार में था। जिस दिन नगर निगम ने उसे पौधे के रूप में लगाया था, उसी दिन से उसे पता था मै एकदिन जरूर आऊंगा। वो एक बोझिल शहर में खड़े खड़े थक गया था। मगर जिस दिन मै उसकी छाँव में खड़ा था उसने हवाओं की मदद से एक स्वागत गान गाया और अपनी बारीक पत्तियों से फूलों का काम लिया इस तरह से उसने मेरा स्वागत किया।
जब मै अपने बालों में फंसी उसकी पत्तियां हटा रहा था तब वो जोर से हंसा था जोकि उसकी आख़िरी हंसी थी।ये बात भी उसने अपनी चिट्ठी में लिखी है।

आगे गुलमोहर लिखता है कि जब भी तुम फर्र से उसके सामने से गुजर जाती हो वो पूछना चाहता है तुमसे कि मै कब आऊंगा?मगर तुम्हारी गति और व्यस्तता देखकर वो अपना सवाल और आत्मविश्वास दोनों खो बैठता है।

तुम्हारे शहर का गुलमोहर रास्तों से मेरे बारें में पूछता है मिट्टी उसकी व्याकुलता पर हंसती है।धूल उसकी चोटी पर जाकर बैठ जाती है और बहुत कम आवाज़ में मेरे बारे में खुसर फुसर करने लगती है। उसे उसकी आवाज़ सुनाई नही देती है वो कहता है जोर से बोलो मगर तब तक हवा उसे अपने साथ उड़ा ले जाती है। हवा के पास मेरे पसीने का डीएनए है धूल और हवा मिलकर तय करती है कि उन्हें ये पता लगाना होगा मै मूलतः हूँ किसका।

गुलमोहर ये सब देखकर उदास हो जाता है तुम्हारे शहर की हवा मिट्टी धूल रास्ते चौराहें सब मिलकर मेरी पड़ताल में लगे है मगर मै कैसा हूँ कहाँ हूँ इसकी कोई खोज खबर नही ले रहा है।

चिट्ठी के मध्य में गुलमोहर कहता है कि उसने कल सूरज से बात की और कहा कि आज वो एक दिन के लिए उपवास पर रह लेगा इसके बदले वो चाहता है कि सूरज की किरणें रोशनदान या खिड़की से तुम्हारे कमरें में दाखिल हो और तुम्हारी पलकों में सोए हुए ख्वाब से बातचीत करें और इस बातचीत में इस बात का सुराग लगा लें कि मै कब आ रहा हूँ। या ये ही पता चल जाए कहीं हमारे बीच अबोला तो नही चल रहा है।

सूरज ने उसकी बातें मान ली है मगर किरणों ने सूरज को मना कर दिया है उनका तर्क है पहले तो  ये दो लोगो की निजता में दखल है दूसरा तुम उस वक्त तक नही सोती जब किरणें तुम्हारे आंगन में दाखिल होती है इसलिए वो बस इतना बता सकती है कि तुम उदास हो या खुश हो।

सूरज खेद सहित गुलमोहर से कहता है कि वो इतनी ही जानकारी लाने में समर्थ है। इस पर गुलमोहर कहता है ये जानकारी उसके किसी काम की नही है क्योंकि तुम उदासी में खुश और खुशी में उदास दिख सकती हो इससे उसे कोई अनुमान न मिलेगा।

सूरज खुद के ओजविहीन होने पर थोड़ा निराश होकर बादलों के पीछे छिप गया है उसकी ग्लानि को गुलमोहर समझता है इसलिए वो दो दिन उपवास करता है सूरज के जाने पर बादलों की एक टोली मसखरी करती है क्योंकि उनके पास मेरी कल की एक खबर है जब मै अचानक से आई बारिश में भीग गया था। बादल अपने संचार तंत्र पर मोहित है वो अपनी बूंदों के हाथों के ये खबर गुलमोहर तक पहुँचाते है मगर इसके बदले वो चाहते है उसके नीचे की धरती जल से आप्लावित हो जाए।

गुलमोहर बताता है कि बादलों की सद्कामना के साथ छिपे हुए स्वार्थ को वो स्वीकार कर लेता है क्योंकि मै बारिश में भीग रहा हूँ इस बात से मोटे तौर पर एक बात तो पता चलती है कि मै स्वस्थ हूँ।
बूंदे बरसती है बादलों के खत पढ़कर गुलमोहर उसे धरती के हवाले कर देता है।

एकदिन जब तुम उसके सामने से गुजर रही थी तो अचानक से फोन आने पर तुमनें अपनी गाड़ी गुलमोहर के पास रोक दी ये देखकर गुलमोहर को खुशी हुई उसने उल्लास में कुछ पत्तियां तुम्हारी शक्ल देखनें के लिए भेजी मगर वो तुम्हारी कार के वाइपर पर अटक कर रह गई। तुम आगे बढ़ गई और गुलमोहर पीछे रह गया।

अंत में गुलमोहर मुझसे कहता है मै थक गया हूँ हवा बादल सूरज से अनुनय विनय करते हुए कोई भी मेरे बारे में प्रमाणिक सूचना देने में असमर्थ है वो नाराज़गी की लहजे में कहता है मैने खुद को इतना बंद क्यों बनाया हुआ है कि किसी कोई अनुमान नही मिल पाता है मै कहाँ हूँ और कैसा हूँ।

गुलमोहर कहता है चिट्ठी मिलते ही आने के बारे में सोचना और सोचना नही आना ही पड़ेगा इससे पहले वो अनमना होकर शहर की तरफ से आँख मूँद ले वो मुझे एक बार देखना चाहता है मिलना चाहता है। क्यों मिलना चाहता है इस बात का जवाब वो इस बार मिलकर ही देगा ये लिखकर गुलमोहर ने चिट्ठी को खत्म किया और कलम कागज़ पर ही तोड़ दी है।

मैं पहले चिट्ठी पढ़कर खुश हुआ बाद में उदास हो गया हूँ। अब मुझे जाना ही होगा भले ही मेरे इर्द गिर्द कितनी हो भौतिक मानसिक बाधाएं हो गुलमोहर के लिए कम से कम एक बार उस शहर में जरूर जाऊँगा भले ही ये हमारी आख़िरी मुलाकात क्यों न हो।

'एक खत गुलमोहर का'

Thursday, August 25, 2016

कुछ लोग

कुछ लोग सम्भवानाओं की खोज के राजदूत थे। वो बड़ी जल्दी में भी थे। दरवाजा नॉक किया बैल बजाई जब तक विलंबित अस्तित्व उठकर आया उनका धैर्य जवाब दे गया वो आगे बढ़ गए। किसी को तलाशना उनकी जिद थी और इसके लिए छोड़ना उनके लिए कोई बड़ी बात नही थी।
फिर भी वो पूर्णतः अतीत से मुक्त नही थे सम्भावनाओं के निष्क्रिय बीज वाले वृक्ष की खोजखबर वो यदाकदा जरूर लेते रहते थे उनके पास नियमित मुस्कान थी कुछ मशविरे थे बस उनके पास शून्य और धैर्य नही था वो हड़बड़ी में थे कभी कभी अपना वक्त मिलाने वो उन पुराने घण्टा घरों की घड़ियों की तरफ विश्वास से देखते थे।
उनका विश्वास इतना अस्थाई था वो सबके मित्र थे मगर वो किसी के मित्र नही थी। उनके पास वक्रोक्ति थी सवाल थे और किसी के जैसा बनने की एक विचित्र सी अपरिभाषित चाह भी उनके साथ छाया की तरह हमेशा चिपकी हुई रहती थी वो जब भीड़ में थे तभी धूप में थे तभी वो सबसे ज्यादा अकेले थे।

'सम वेस्ट नोट्स'

Wednesday, August 3, 2016

आईना

वो एक लम्हा था
भीगा हुआ दरकता हुआ। नदी के नजदीक उसके गीत सुनता दरख़्त अचानक से उसी के वेग में जड़ से उखड़ गया था। ये वक्त सियासत थी या किस्मत की बगावत तय करना थोड़ा मुश्किल था।
आसमान के कुछ कोण उड़न झूले में सवार हो गए थे जहां से अपना ग्रह नही दिख रहा था इसलिए ये तय करना मुश्किल था कहाँ डर कर इसे रुकवाना है या फिर चलते हुए से कूद पड़ना है चिल्लाते हुए।ये बात कुछ कुछ आत्महत्या जैसी लग सकती थी।
उम्मीद के दायरों में उसके लिए रोना मना था इसलिए वो इकट्ठा करता गया दर्द के छोटे छोटे कर्जे।उसकी आँखों में कुछ कबीले बगावत पर उतर गए थे ऐसे में बड़ा मुश्किल था ये पता करना कि दुश्मन अंदर का था या बाहर का।
दिल एक फकीर है और मुहब्बत के पास मांगने के अलावा कोई दूसरा काम नही है वो जिद पे आकर मांगती है उसनें एकदिन जान के साथ जीने का गुरुर ही मांग लिया उसके बाद दिल के तमाशे में जेहन सबसे बड़ा किरदार बनकर उभरा।
माथे की लकीरों में शिकन नही थी बस कुछ शिकवे रफू हो गए थे उसके बाद जख्मों की तासीर जुदा हो गई वो दिखते बेहद शुष्क थे मगर वो अंदर से हरे थे उन पर वफ़ा के पट्टी भी शिफ़ा अता करने की कुव्वत नही रखती थी।
आंसूओं को बेरंग कहे जाने की रवायत रही है मगर उन आंसूओं का जो रंग था उससे कोई इंद्रधनुष नही बन सकता था इसलिए उसे आवारा कह कर छोड़ दिया गया। हां वो आवारा आंसू थे मगर कलेजा चाक करके जिसकी याद में निकलें थे उसके पास वफ़ा की एक फेहरिस्त थी कच्ची पैंसिल से लिखे कुछ जवाब थे इसलिए उन्हें पढ़कर सबसे पहले अपनी कलम याद आई।
उसकी कलम ही उसके कत्ल का हथियार थी जिसे मौक़ा ए वारदात से बरामद किया गया था।
इस तरह एक खूबसूरत ख्वाब ख्याल अपनी मासूमियत के साथ तन्हा बर्बाद हुआ तमाम ऐतिहातन हिफाजतों के बाद।
इश्क़ के बिछोड़े आंसूओं का सफर तय करके आए थे इसलिए उन पर वक्त और खुशफ़हमियों की गर्द चढ़ी थी
आईना उस देश में केवल महबूब के पास था इसलिए वो सबसे पहले खुद की ही शक्ल भूल गया।

'भूली बिसरी बातें'