Tuesday, December 29, 2015

उसकी आँखें

' उन आँखों में एक कातरता थी। करुणा और अवसाद का सम्मिश्रण बन आँखों सी तलहटी से बह रहा था। आँखों के कोण  उन अक्षांशों पर स्थापित हो गए थे जहां निकटता और दूरी को एक साथ देखा जा सकता था।
आँखों के जरिए एक जीना ठीक उसके दिल में उतरता था मगर दिल के दरवाजे पर सांकल चढ़ी थी। वो जब देखती तो कोई प्रश्न शेष न बचते उसकी आँखों का भूगोल निर्जनता के कई खोए मानचित्र लिए थे जिनकी शिनाख्त करने की हिम्मत बड़ी मुश्किल से जुटा पाता था।
वो नदी की तरह विकल थी मगर उसने अपने किनारों को तन्हा नही छोड़ा था उसके पास कुछ वजीफे थे जो उसनें स्पर्श की शक्ल में किनारों को दिए थे। उसकी आँखों में नदी के जलस्तर को नापने का पैमाना था वहां वेग की उथल पुथल उतनी साफ़ नही पढ़ी जा सकती थी मगर उसकी आँखों के जरिए कुछ अनुमान और गणनाएं अवश्य की जा सकती थी मसलन आंसूओं की आद्रता का स्तर क्या है वो सूखकर ग्लेशियर बनेंगे या फिर बहकर समाप्त हो जाएंगे हमेशा के लिए।
वो प्रकृति का अनहद नाद थी जिसकी ध्वनि आँखों के रास्ते सुनी जाती थी उसका काजल आवारा बदरी की टुकड़ियों का एक समूह था जो वक्त बेवक्त बरस जाया करता था इसी के जरिए आँखों की नमी चमक में तब्दील होती थी।
वो जब देखती तो शब्द दुबक जाते वाणी और स्वर अर्थ खो देते और आँखें भाषा का अधिकार पा लेती उसकी आँखों के महाकाव्य पढ़ने के लिए गर्दन नीची नही करनी पड़ती। उसे पढ़ते हुए जाना जाता शब्द का ब्रह्म हो जाना उसकी आँखों का अपना एक स्वतन्त्र शब्दकोश था जिसके पन्ने स्वतः पलक झपकनें के अंतराल पर पलटते जाते।
वो एक नदी थी वो एक महाकाव्य थी वो एक जीवन्त आख्यान थी और उसकी आँखें इल्म और अदब की दरगाह थी जहां कलन्दरो को पनाह मिलती थी उसकी निगाह में आतें ही खाकसार मुरीद और मुर्शिद एक साथ हो जाते थे।

Thursday, December 17, 2015

छायायुग

वहां हर स्त्री पर एक पुरुष की छाया थी और हर पुरुष पर एक स्त्री की छाया की तलाश में गुम था।
एक बात जो तय थी वहां शायद हमेशा धूप रहती थी दिन निकलनें और साँझ होने जैसे सुंदर कल्पनाएं वहां मिथ्या थी।
आकृतियों के मध्य जीवन था और जीवन के ठीक बीच में कुछ रिश्तें आड़े तिरछे फंसे हुए थे वहां बाहर की दुनिया में एक व्यवस्थित कोलाहल था मगर अंदर की दुनिया में एक ख़ास किस्म की नीरवता पसरी हुई थी।
अधिकार वहां सबसे अधिक करुणा का पात्र था क्योंकि ये दिन में इतनी दफा जगह बदलता था कि ये समझना मुश्किल था कि सुबह का निकला रात तक कहाँ पहुँचेगा।
वहां की दुनिया थोड़ी तिलिस्मी थी वो दावों की दुनिया था जिसमें दिन भर कोई न कोई किसी का खण्डन करके अपने जगह सुरक्षित करने की जुगत में था।
छायाओं के मध्य वास्तविक आकार थोड़े धूमिल हो गए थे इसलिए वहां पुरुष और स्त्री के लिंग पर प्रायः सन्देह किया जाता वो अनुमानों और सम्भावनाओं की उजड़ी हुई मगर हरी भरी दुनिया थी।
उस दुनिया को देखनें के लिए रोशनी नही सघन अंधेरा चाहिए था तभी दीवारों पर हाथ लगाते हुए अनुमान के भरोसे मंजिल की तरफ रोज़ कुछ लोग निकल पड़ते थे।
वो दुनिया था या एक छाया थी इसका भेद अज्ञात रहा मगर उस दुनिया का आंतरिक सच रहस्यमयी ढंग से बिखरा हुआ था जिसे देखनें के लिए कभी कभी ऊकडू बैठना पड़ता या फिर किसी से महज बस इतना पूछ लेना होता है कोई है क्या वहां?

'छायायुग'

Wednesday, December 16, 2015

सम्बोधि

तुम मेरे जीवन का एक मात्र असंपादित अंश थी
अंश इसलिए कहा क्योंकि तुम्हें सम्पूर्णता में पाने की मेरी पात्रता थोड़ी कमजोर थी।
तुमनें एकदिन महर्षि रमण का एक किस्सा सुनाया उनके एक जिज्ञासु शिष्य ने कहा गुरुदेव क्या आप मुझे शक्तिपात से सम्बोधि की अवस्था में पहूंचा सकते हो? महर्षि रमण बोलें हाँ ! मगर क्या तुम इस अवस्था में हो कि तुम शक्तिपात को ग्रहण कर सको?
इस किस्से के जरिए तुम मुझे मेरी अपात्रता नही बता रही थी बल्कि तुम कहना चाह रही थी कि देने वाला कई बार देने की इच्छा होने के बावजूद भी नही दे पाता है। तुमनें एक प्रसंग का सहारा लिया और प्रेम की दुनिया में मेरी उपस्थिति का भौतिक आंकलन कर लिया।
फिर मैंने विषय बदलते हुए कहा क्या तुम मुझे सम्पादित करना चाहती है तुमनें तुरन्त इनकार किया नही मैं इसके लिए पात्र नही हूँ।
दरअसल पात्रता और अपात्रता के मानकों की दुनिया के जरिए तुम प्रेम की इस सम्बोधि में मुझे देखना चाहती थी जहां मैं केवल रहूँ और अनुराग की दासता में कोई ऐसा हस्तक्षेप न करूं जिससे हमारी अपनी स्थापित दुनिया थोड़ी भी अस्त व्यस्त हो।
अचानक तुमनें एकदिन पूछा समय क्या हुआ है मैंने घड़ी देखनी चाहिए तो तुमनें मेरी कलाई को अपनी हथेली से बन्द कर दिया और कहा अनुमान से बताओं
मैंने कहा मेरे अनुमान अक्सर सही नही निकलतें है मैं अंदाजन चूक जाता हूँ फिर भी मैंने कहा एक बजा है शायद।
तुमनें उसके बाद घड़ी नही देखी और न मेरे अनुमान की सत्यता की जांच की तुम्हारी इस बेफिक्री ने सच कहूँ मुझे समय से बहुत दूर कर दिया।
इस घटना के बाद हमारा दोनों का अपना एक मौलिक समय तय हुआ जो अधिक प्रमाणिक लगा मुझे।
बोध जब गहराता गया तब ये तय करना मुश्किल हो गया कि तुम निकट हो या दूर जब मैंने इसके बारें में तुमसे सवाल किया तब तुमनें सिर्फ इतना कहा निकटता और दूरी मेरी दिलचस्पी का विषय नही है तब शायद तुम यह कहना चाह रही थी कि हमें नदी पुल के जरिए नही झूला डालकर पार करनी चाहिए।

'बोध-सम्बोधि'

Saturday, November 21, 2015

अंतिम आश्रय

तुम्हारे पास मेरा अंतिम अरण्य था।
मेरे भटकाव का एक अंतिम पड़ाव था जहां से मुझे मंजिल नजर आ रही थी मैंने दूर से मंजिल को देखा और केवल एक बार मुस्कुराया। तुमनें उस क्षण मुझे देखा और बातचीत का विषयांतर कर दिया मैंने इसे हस्तक्षेप की तरह नही लिया बल्कि मुझे अच्छा लगा तुमनें मेरे सम्मोहन को तोड़ दिया।
तुम्हारी यात्रा मुझसे अलग थी इसलिए हमारी थकन और अनुभव दोनों भिन्न थे मगर आत्ममोह की अवस्था में भी कोई एक दुसरे को कमतर नही समझता था। हमारी रूचि के केंद्र अब विमर्श नही थे शायद हमारी अनुभूतियां आपस में ठीक ठीक बात कर लेती थी। जैसे मैंने एकदिन कहा कि मेरा अप्रासंगिकताबोध कहीं अधिक गहरा है तुमनें मुझे करेक्ट तो नही किया मगर कहा तुम असावधानी में जीवन जीने के आदी हो गए हो। तुम्हारी उपस्थिति का एक अमूर्त मूल्य था मेरे लिए इसलिए सारे संयोगो में से एक संयोग ऐसा बन जाता था जब तुम्हारे आसपास मेरी ध्वनियाँ आश्रय पा जाती थी।
समय के आर पार लौटते हुए मैंने एक बार हाथ हिलाया तो तुम्हें लगा कि मैं विदा चाह रहा हूँ तुमनें मेरे चेहरे पर अरुचि नही पढ़ी थी इसलिए तुमनें कहा आगे देखो कही चोट न लग जाए उस समय मैं समझ पाया तुम आगे देखने की बात के जरिए मुझे सचेत करना चाह रही थी क्योंकि तुम्हारे अर्थो में सबसे गहरी चोट चैतन्यता से अस्त व्यस्त हो जाने की थी।
हमनें एक दुसरे को देखा और बस इतना कहा चलो चलतें है उस वक्त चलना एक क्रिया थी मुझे लगा ये हम दोनों के अस्तित्व का विशेषण है।

'अंतिम आश्रय'

Friday, November 20, 2015

एक पाती

तुम थोड़े अलग थे। अलग इसलिए कि तुम एक ही मनोभाव की मनमुताबिक़ दस किस्म की व्याख्या कर सकते थे और अच्छी बात ये भी थी कि ऐसा तुम किसी को खुश या प्रभावित करने के लिए नही करते थे।
तुम्हें मैंने तटस्थता से महीनों केवल देखा और सुना था तुम्हें देख मैं निष्कर्षों की जल्दी में नही थी बल्कि अक्सर ये सोचती थी कि तुम अपने बारें में तय की गई हर राय को एकदिन गलत साबित कर दोगे।और एक दिन तुमनें वही किया भी।
तुम्हारे तर्क इतने मौलिक किस्म के थे कि उन्हें किसी अवधारणा के संदर्भ लेने की आवश्यकता नही थी। अलबत्ता तो तुम बहस से बचते थे मगर यदि कहीं कहना जरूरी हुआ तो तुम्हारी समझ और विनम्रता बहस की सबसे चमकीली वस्तु हुआ करती थी।
मुझे लगा था कि तुम एक मुक्त चेतना है फ्री फ्लो में बहते एक पानी के स्रोत की तरह तुम्हें न कहीं पहुँचनें की जल्दी थी और न एकदिन समाप्त होने का भय तुम क्षणिकता में जीवन को जीने के आदी थे।
मेरा तुमसे भले ही कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष किस्म का कोई रिश्ता नही रहा था मगर फिर भी मैं खुद को तुम्हारे करीब पाती थी। तुम्हें अवसाद में देख मैं फ़िक्र और खुशी दोनों एक साथ महसूस करती फ़िक्र इस बात कि तुम्हारी लड़ाई खुद से कितनी बढ़ गई है और खुशी इस  बात कि तुम चरम् अवसाद के पलों में भी अपनी रचनात्मकता को बुझनें नही देते बल्कि मैं मतलबी होकर कहूँ तो तुमनें अवसाद के दौर में अपने जीवन का सर्वश्रेष्ट रचा हैं।
अचानक मैंने पाया तुम्हारे जीवन के केंद्र बदल गए है मैं ये नही कहूँगी कि तुम रूपांतरित हो गए बल्कि बड़ी निर्ममता से कहना पड़ रहा है कि तुम बदल गए थे।ये बदलाव अनापेक्षित था क्योंकि मैं तुम्हारे रूपांतरण को लेकर सोच रही थी बदलाव को नही। एकदिन तुमनें बातचीत में कहा था जो मुझे प्रिय है मैं आगे चलकर उससे एक सुरक्षित दूरी बना लेता हूँ। तुम्हारा ये बदलाव हमारे मध्य यही दूरी लेकर आया था मैं तुम्हें प्रिय थी ये अर्थ निकालना अब जरा मुश्किल था मेरे लिए क्योंकि तुम जिस तरह से दिखने और पेश आने लगे थे उसे देख मैंने तय कर लिया था अब तुम्हारा साथ अपने अंतिम पड़ाव पर था।
मैंने तुम्हें हंसते हुए अलविदा कहा मगर कुछ सवाल आज भी दिल में है तुम से जुड़े सवाल कम से कम मैं जेहन में नही रख पाती हूँ आज भी। ये सवाल मुझे कभी परेशान नही करते है बल्कि अक्सर मुझे रास्ता ही दिखाते है जब जब मैं तुम्हारी याद में भटक जाती हूँ।
तुम अब कभी मिलोगे इसकी उम्मीद नही है मगर तुम खो गए इसका कुछ दशमलव दुःख मुझे हमेशा रहेगा।

'एक पाती'

Monday, October 12, 2015

नवरात्रि

सतत् ऊर्जा के संचयन, संलयन और रूपांतरण के लिए शक्ति के साथ एक बेहतर संयोग और समन्वय आवश्यक है। पुरुष और प्रकृति के तादात्म्य से पूर्णता जन्म लेती है दोनों एक दूसरे के पूरक है। ऊर्जा के एक स्थाई स्रोत के रूप में शक्ति की उपस्थिति को अनुभूत करनें के लिए खुद के शिव तत्व को परिमार्जित करना पड़ता है तभी इसका सहज साक्षात्कार सम्भव है। चैतन्य यात्रा में शिव-शक्ति,पुरुष-प्रकृति ये सब उस आदि ब्रह्म के प्रतीक है जिनका अंश लेकर हम इस ग्रह पर विचरण कर रहें हैं।
मन के तुमुल अन्धकार के समस्त प्रयास शक्ति से सम्बंधता बाधित करने के रहते है वो हमें दीन असहाय भरम में पड़े देखना चाहता है उसकी चाह में कुछ अंश प्रारब्ध का है तो कुछ हमारे कथित अर्जित ज्ञान का।
शक्ति स्वरूपा नाद को अनुभूत करने के लिए कामना रहित समर्पण चाहिए होता है अस्तित्व को मूल ऊर्जा स्रोत से जोड़ने की अपेक्षित तैयारी भी अनिवार्य होती है। 'स्व' को व्यापक दृष्टि में पूर्ण करने के लिए शिव और शक्ति से सम्मलित ऊर्जा आहरित करनी होती है।
आप्त पुरुष अहंकार को तज शक्ति की सत्ता को स्मरण करते है उसकी उपस्थिति में याचक नही अधिकारपूर्वक ढंग से खुद को समर्पित कर पूर्णता की प्रक्रिया का हिस्सा बनतें हैं।
पौराणिक गल्प से इतर पुरुष प्रकृति के सांख्य योग के बीज सूत्र सदैव से अखिल ब्रह्माण्ड में उपस्थित रहते है। अपनी तत्व दृष्टि और पुनीत अभिलाषा से उनसे केंद्रीय संयोजन और सम्वाद की आवश्यकता होती है।
शिव तत्व को शक्ति के समक्ष समर्पित करके खुद की लघुता का बोध प्रकट होता है और यही लघुता अस्तित्व की ऊंची यात्राओं का निमित्त बनती है कण कण में चेतना और संवदेना को अनुभूत करनें के लिए खुद को देह लिंग और ज्ञान के आवरण से मुक्त कर सच्चे अर्थों में मुक्तकामी और पूर्णतावादी बनना पड़ता है।
रात्रि अन्धकार का प्रतीक लौकिक दृष्टि में मानी गई है परंतु रात्रि वस्तुतः अन्धकार की नही अपने अस्तित्व की अपूर्णता का प्रतीक है दिन के प्रकाश में अन्तस् के उन गहरे वलयों को हम देख नही पाते है जिन पर अहंकार की परत जमी होती है रात्रि का अन्धकार अन्तस् में प्रकाश आलोकित करने का अवसर प्रदान करता है जिसके माध्यम से हम अपने अन्तस् में फैले अन्धकार को देख सकते है और बाहर से अन्धकार से उसकी भिन्नता को अनुभूत कर सकते है।
शक्ति की उपादेयता हमें आलोकित और ऊर्जित करने की है पुरूष और प्रकृति का समन्वय ब्रह्माण्ड के वृहत नियोजन का हिस्सा है जो जीवात्माएं इस नियोजन में खुद की भूमिका को पहचान लेती है वें सच में अस्तित्व की समग्रता को भी जान लेती है। शिव शक्ति के तादात्म्य के अनुकूल अवसर के रूप में संख्याबद्ध दिन या रात का निर्धारण एक पंचागीय सुविधा भर है इस उत्सव में खुद को समर्पित और सहज भाव से शामिल करके खुद को परिष्कृत किया जा सकता है और उस अनन्त की यात्रा की तैयारी के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचयन भी किया जा सकता है जिसके बल पर हमें पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण तोड़कर एक दिन उसी शून्य में विलीन हो जाना है जहां से एकदिन सायास हम यहां आए थे।

'नवरात्रि और सवेरा'

Thursday, October 8, 2015

औसत

मनुष्य के पैमाने सर्वोत्तम की तरफ आकर्षित होते है निम्न या औसत के प्रति वो उपेक्षाभाव अपना लेता है। यह मूल्यांकन की सदियों पुरानी परम्परा की कन्डीशनिंग है।इससे मुक्ति दुलर्भ है। बिना किसी महानता के विज्ञापन या धारण स्थापन के बताता हूँ मुझे औसत, औसत से नीचे की या फिर हाशिए की चीजें सर्वाधिक आकर्षित करती है। उपेक्षा में जीते जीते औसत दर्जे के लोगो का सौंदर्य बहुत प्रिजर्व किस्म का हो जाता है। ऐसे ही सौंदर्य को देख मैं अभिभूत और चमत्कृत होता हूँ।
मसलन मुझे बहुत गोरा रंग कभी आकर्षित नही करता है जिनका रंग सांवला है या गेहुँआ है मुझे उनके तेज में एक ख़ास किस्म की अलौकिकता नजर आती है यहां तक अफ्रीकन कॉन्टेन्ट की स्त्रियों में भी मैं गहरे सौंदर्य मूल्य पाता हूँ। गोरी देह या गोरा दिखनें की चाह शायद हमारे मन की ग्रंथियों का परिणाम होती है। ऐसा नही कि मुझे गोरे लोग अप्रिय है मगर मुझे स्वाभाविक रूप से सांवला,गेहुँआ या डार्क कॉम्प्लेक्शन ही आकर्षित करता है। पुरुषों के मामलें में कद भारतीय समाज का एक बड़ा मानक है मगर मुझे कद कभी एक मानक नजर नही आया न ही मैं शरीर सौष्ठव से किसी पुरुष का मूल्यांकन करता हूँ मुझे औसत लम्बाई और सामान्य कद काठी के लोग पसन्द है। देह को कसनें के लिए ज़िम में पसीना बहाते हुए युवाओं की अपेक्षा मुझे वो युवा ज्यादा प्रभावित करता है जो साईकिल पर गेहूं रख चक्की पर आटा पिसवाने जा रहा हो या मेडिकल स्टोर से दवा घर के बुजुर्ग के लिए दवा खरीद रहो हो।
समाज के स्थापित पैमानों और मानकों पर परखे जाते हुए स्त्री पुरुष अपनी सहजता खोते हुए एक बाह्य दुनिया को इमिटेट करना शुरू कर देते है।रंग,कद और देह के इतने दबाव होते है कि बाजार इसका खूब फायदा उठाता है।
...इसलिए कहता हूँ अपनी सहजता में जियो आप जैसे भी है परफेक्ट है किसी के लिए खुद बदलनें की जरूरत नही ग्रूमिंग की अवधारणा आपको उनके हिसाब से देखनें की है जिनका आपके सुख दुःख से कोई सरोकार नही है इसलिए यदि आप औसत या औसत से नीचे के किसी पायदान पर समाज ने बैठा दिए है वो उसके अवसाद में मत रहो खुद को सम्पूर्णता में स्वीकार करो और अपने मन की मौज़ में जीने की आदत विकसित करो बाह्य दबाव का कोई बदलाव आपके अंतर्मन को सच्ची खुशी नही दे सकता है।
दुनिया की परवाह न करों इसी जालिम दुनिया में मेरे जैसे आपके कद्रदान भी बसते हैं।

Wednesday, October 7, 2015

बज़्म

चराग मद्धम है लौ भभक रही है शायद बज़्म के हिस्से में अंधेरा सौंप कर इन्हें बुझ जाने की जल्दी है। हवा रोशनदानों मे झांक कर उलटे पांव बादलों के घर लौट रही है उनके पास महफिल की बेरुखी के किस्से है इस साल अफवाह की फसल से ही बारिश होगी हवा ने यह मानकर उस घर की चौखट को छोड दिया है।
सांझ के पास चंद उलहानें है इसलिए वो चुपचाप आकर उस कमरें में पसर गई है जिसकी खिडकियों में शिकायत के जालें लगें है।
कुछ खत कुछ खताओं को वक्त का डाकिया तामील करा कर दोपहर में ही चला गया था जैसे ही उसनें खत और खताओं का मनीआर्डर थमाया उसकी साईकिल की चैन उतर गई उसने ऊकडू बैठ घर की दहलीज़ को देखा और फिर बिना मुडकर पीछे देखे वो चला गया।
शाम से बज़्म मे तन्हाई और खामोशी है चराग कहकहों से उकता गए है मगर जलना उनका नसीब है इसलिए वो जल कर बुझ रहें है और बुझ कर जल रहें हैं। ख्यालों की चादर पर सिलवटें पड गई है अब उन्हें सीधा करने के लिए जितना झुकना जरुरी है उतना झुकने के लिए एक खास का हौसला चाहिए। सबसे गहरे दोस्त नें हौसला उधार देने से मना कर दिया तो ऐसे ही बेतरतीब ज़मीं पर पसर गया फिर उसने छत की तरफ देखा और मन ही मन कहा आखिर शाम हो ही गई अब रात हो जाए तो बेहतर हो।
रात बीत जाएगी कल नई सुबह आएगी मगर वक्त के कुछ लम्हों के अटके अहसासों की सुबह का आना थोडा मुश्किल लग रहा है वो रात के बाद सीधे रात में उतरती है उन्होनें बेरुखी की सीढी मन के दालान मे लगा ली है।
कुछ बीत जाएगा कुछ रीत जाएगा और कुछ रह जाएगा बेआसरा रात का यही स्याह पक्ष है जिसकी गवाही में कोई चराग कभी बोलने को तैयार नही होगा। दुआ करता हूं कोई हवा का झोंका इन्हें जल्द बुझा जाए ताकि कुछ खुशफहमियां और डेढ दिन की उधारी जिन्दगी जी सके।

‘बज़्म और खामोशी’

Sunday, October 4, 2015

अधार्मिक के नोट्स

मेरा मन मन्दिर के अंदर जाते है स्वार्थी हो जाता है फिर वो करबद्ध होकर तमाम अतृप्त कामनाएं ईश्वर के हवाले करता है और चमत्कार की आश्वस्ति लेकर धीमें धीमें उलटे पाँव मन्दिर के चौखट से बाहर निकलता। घण्टे घड़ियालों शंख की आवाज़ मन्दिर की अंतिम सीढ़ी तक साथ देती है और हंसते हुए कहती है ईश्वर ने तेरी बात सुन ली है आगे क्या होना है क्या नही होना है ये बात कोई नही जानता है शायद ईश्वर भी नही।
जब मैं चर्च में जाता हूँ तो मुझे पुराने चर्च सबसे ज्यादा आकर्षित करते है पहाड़ पर बने चर्च का वास्तु मुझे सबसे ज्यादा बांधता है। चर्च के अंदर जाकर मैं कुछ भी मांगता नही हूँ बल्कि डार्क ब्राउन रंग की लकड़ी की बेंच पर हाथ फेरता हूँ और चर्च की छत को देखता हूँ सामने रखी प्यानों के बटन दबाने की जरूर इच्छा होती है फिर इसके बाद मैं अपने तमाम पापों का कन्फेशन करता हूँ और जीसस से कहता हूँ कि वो मुझे माफ़ करें यहां मैं कुछ चमत्कारिक कामना नही रखता हूँ चर्च में केवल मैं अपने मन का बोझ हलका पाता हूँ कन्फेशन के दौरान ही मुझे अनुभूति होने लगती है कि ईश्वर ने मुझे माफ़ कर दिया है इस तरह से मन के अंदर कुछ और दुनियावी पाप का स्पेस बनाकर लौट आता हूँ। जीसस से मिलकर मेरी करुणा का स्तर निसन्देह बढ़ जाता है।
मेरे घर से कुछ दूर मस्जिद है रोज़ मैं उसकी अजान सुनता हूँ हालांकि वो अरबी भाषा में है इसलिए उसके मानें मुझे समझ में नही आते है मगर मुल्ला जी जिस तरन्नुम में अजान देते है वो मुझे हमेशा बढ़िया लगती है सब कुछ बेहद सधा हुआ लगता है। मैं मौलवी साहब से मिलनें कई बार मस्जिद में भी गया हूँ वहां उनकी तस्बीह सुरमा और इत्र मुझे अच्छा लगता है मैं उनसे पूछता हूँ अल्लाह दयालु है तो फिर हम इतने क्रूर क्यों हो गए है मौलवी साहब कुरआन की एक आयत पढ़कर  सुनाते है तब मैं जान पाता हूँ कि इस्लाम जो हमें बताया जा रहा है वो असली इस्लाम नही है। मैं नमाज़ पढ़ते हजरात को देखता हूँ उनका अनुशासन मुझे प्रभावित करता है मगर मैं अल्लाह से कुछ मांगता नही हूँ बस मौलवी साहब से कहता हूँ कि वो अमन के लिए दुआ किया करें। इल्म से ज्यादा अमन इस वक्त की जरूरत मुझे लगता है।
एक सिख परिवार में मेरे पिताजी की गहरी दोस्ती थी पिताजी के मित्र को मैं चाचा कहता हूँ कभी कभी उनसे मिलनें जाता हूँ उनसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगता है क्योंकि जितनी पंजाबी मुझे आती है उन्हें उतनी ही हिंदी आती है हम आपस में उधार की भाषा में बात करतें है। सहमति के लिए 'आहो' कहना मैंने उनसे ही सीखा है छोटे से भाषा ज्ञान के बावजूद हम खूब बातें करते है हमें भाषा कभी बाधा नही लगती है। उनके घर के पास ही गुरुद्वारा है एकाध बार मैं वहां भी गया हूँ वहां ज्ञानी जी सबद कीर्तन करते रहतें है हारमोनियम और तबले की संगत से गुरबाणी सुनने में अजीब सा दिव्य सुख मिलता है। मन क्यूँ बैरां करें...! ये सबद मुझे विशेष प्रिय है। मैं गुरुद्वारे में लंगर खाता हूँ वहां की दाल मुझे बहुत बढ़िया लगती है हाथ में मांग कर रोटी खाना मुझे अन्न का सम्मान करना सिखाता है। गुरुद्वारे में जाकर मेरी रूह को संगीत और संगत की खुराक मिलती है वहां मैं मन्नत जैसी चीज़ें भूल जाता हूँ वहां तन्मयता से बर्तन मांझती सिख महिलाओं के देख बस मैं मन ही मन इतना कहता हूँ रब राखां।

'अधार्मिक के नोट्स'

Friday, October 2, 2015

रसोई

रसोई के बारें में सोचता हूँ तो लगने लगता है घर के अंदर यह वो कोना है जहां रोज़ यज्ञ होता है मगर एकल आहूतियां केवल ऋषि पुत्रियां देती है। गर्मी और बरसात के दिनों में जब हम कूलर पंखे और एसी में भी असहज महसूस करते है तब स्त्रियां रसाई में भोजन की समिधा लगाती हैं। जिस जगह से सबका पेट पलता है वातानुकूलन की दृष्टी से वो जगह बिलकुल भी सुविधाजनक नही है। प्रायः हम तो इसी सवाल से खीझ जातें हैं कि आज क्या बनाया जाए मगर जो रोज़ नित्यकर्म से बनाने की प्रक्रिया से गुजरती है नीरसता का अंदाज़ा लगाना भूल जाते है।
एग्जॉस्ट फैन की सीमाओं के मध्य चरम् गर्मी में गैस की आंच में खड़े रहना छौंक के धुंए को लगभग रोज़ झेलना और इसके बावजूद बिना किसी शिकायत के नियमतः रोज़ यथासमय खाना तैयार करना कम चुनौतिपूर्ण काम नही है।हम तो दुसरे कमरें में छौंक के धुएं से छींक आने भर से परेशान हो जाते है मगर जिसकी दुनिया इसी धुंए में रंगी होती है उसकी तकलीफ का अंदाज़ा लगाना अक्सर भूल जाते है।
रसोई अपने आप में किसी को स्त्री को सिद्ध करने की प्रयोगशाला है जिसमें दायित्वों की सदियों पुरानी कंडीशनिंग से स्त्रियां अपने वजूद को सिद्ध करती रहती है ये उनके मन की उधेड़ बुन की सबसे सच्ची गवाह है। रसोई उस उदास गीत को सुन सुन कर बूढ़ी होती है जिसे स्त्री अपने सबसे तन्मय पलों में गाती है। व्यापक संदर्भो में देखा जाए तो रसोई का हर कोना एक भरा पूरा आख्यान है। एग्जॉस्ट फैन की सीमाबद्ध जिजीविषा स्त्री मन के द्वन्दों को धुएँ की भाँति घर की चारदीवारी से बाहर छोड़ आती है ताकि वो एक राहत भरी सांस ले सके। सिंक में अटे पड़े बर्तन रोजमर्रा के छोटे छोटे शिकवों के प्रतीक लगने लगते है जिन्हें इच्छा अनिच्छा के बावजूद रोज़ स्त्री मांझ कर साफ़ करती है ताकि बची रहे शुद्धता।
रसोई के अंदर स्त्री की दुनिया बड़े वैचित्र्य से भरी होती है वो वहां जीवन में घुले दुखों को सब्जी की तरह कांटती छांटती है दाल से कंकड़ की तरह बुनती है और फिर उम्मीद की थाली में अपने अधिकतम् प्रयास से रोज़ सुख परोस देती है। पसन्द नापसन्द के पैमानें पर उसकी खुद की पसन्द सबसे निम्नतम स्तर पर होती है वो ख्याल रखती है बच्चें वयस्क और प्रौढ़ों का। कितने।लोग यह सच जान पातें होंगे कि बेहद स्वादिष्ट खाने बनाने की प्रक्रिया में खुद स्त्री का स्वादबोध इतना पीछे चला जाता है जब आप उसके बनाएं खाने से तृप्त हो रहे होते है सच तो ये है उस वक्त उसकी भूख मर चुकी होती है वो खा लेती है बेमन से सब बचा कुचा।
स्त्री को अपने मन की तरह रोज़ साफ़ करनी होती है रसोई।वो नियत करती है दाल मसालें और बर्तनों का स्थान ताकि चरम् दबाव में भी वो अस्त व्यस्त न हो। रसोई में बचता अन्न और उसे निष्प्रयोज्य समझ जब फैंकना होता है तब किसी किस्म के अपराधबोध से एक रोज स्त्री गुजरती है उसका आप अंदाज़ा नही लगा सकते है अन्न को फैंकना उसे लगता है उसके अनुमान के कौशल का असफल हो जाना।
स्त्री के जिन झक सफेद हाथो की सुंदरता पर आप होते है मोहित उन पर चढी होती है एक अंश आटे की सफेदी और बार बार डिटर्जेंट से हाथ धोने की आदत का रंग। रसोई में बहे पसीनें का मूल्य इसलिए नही समझ आता सबको क्योंकि वो रसोई से खाने की टेबिल तक आते आते निष्ठा और प्रेम की आंच में सूख जाता है और स्त्री उसी की ठंडक में रोज़ परोसती है गर्मागरम भोजन।
एक स्त्री के जीवन में रसोई जितनी जीवन्त है पुरुष के जीवन में वो इतना ही तटस्थ स्थान रखती है पुरुष के पास अर्थ है जहां से रसोई के साधन निकलतें है और वह इसे अपना अधिकतम योगदान समझ मुक्त हो जाता है मगर स्त्री के मनोरथ है जहां से रसोई के नए अर्थ विकसित होते है जीवन आगे बढ़ता है।
रसोई की साधना निसन्देह अधिक व्यापक और गहरी है स्त्री मन के विस्तार की सबसे निर्जीव किस्म की साक्षी है रसोई मगर एक छोटे स्थान पर स्त्री को स्वयं की मुक्त सत्ता का बोध इतना गहरा होता है कि वहां अधिकार से सब अपने मन मुताबिक़ नियोजित करती है ऐसे में रसोई के भूगोल में बड़ी गहराई से सांस लेता है स्त्री के स्वतन्त्रताबोध का गहरा मनोविज्ञान।
रसोई के सहारे स्त्री की यात्रा को देखा जा सकता है और इस यात्रा के मूल्य को समझने के लिए कम से कम एक दिन बिताना पड़ता है रसोई में वो भी बिना किसी खीझ के जोकि तमाम पुरुषों के लिए एक बेहद मुश्किल काम है इसलिए पुरुषो की उपस्थिति को रसोई खुद करती है अस्वीकार और प्रायः बड़बड़ाते हुए पुरुष बाहर निकल आतें है यह कहते हुए हमारे बसका नही ये तामझाम।

'रसोई का मनोविज्ञान'

वजीफे यादों के

मैं तुम्हें कभी याद नही करता। याद करना एक सायास उपक्रम है तुमसे मेरे हर बंधन अनायास किस्म के है ऐसे में तुम जब याद आती हो बस आ ही जाती हो। निसन्देह तुम्हारे साथ मेरी जीवन की कुछ बेहद सुखद स्मृतियाँ जुड़ी हुई है एकाध तकरार को छोड़कर। तुम्हारें बारें में सोचने भर से मेरी पलकों के झपकनें का अंतराल थोड़ा विलम्बित हो जाता है। आँखों के अंदरुनी हिस्सों में मुस्कान करवट लेने लगती है और बोझिल चेहरे पर भी एक इंच मुस्कान तैर जाती है।
तुम्हारे स्पर्श मेरे जीवन की अविस्मरणीय पूंजी है उन्हें मैं रोज़ सम्भाल कर रखता हूँ तुम्हारी धड़कनों के बंद मेरी धड़कनों की गिरह को रोज़ दूर से रफू कर जाते है। तुम्हारी खुशबू के अनुलोम विलोम से मेरे मन का बासीपन दूर हो जाता है।
रात में सोने से ठीक पहले मेरा तकिया मेरी गर्दन पर तुम्हारा नाम लिखता है और मैं थोड़े से तुम्हारे उन्माद में करवट लेता हूँ फिर बरबस ही मैं बेवजह मुस्कुरा उठता हूँ और नींद में तुमसे मिलनें की गुजारिश अपने अवचेतन के बड़े बाबू के यहां आमद कराता हूँ मगर अफ़सोस तुम ख़्वाब में नही मिलती हो।
तुम ख़्वाब में कैसे मिलोगी तुम मेरे मन की ध्वनि की कोई वर्जना नही हो जो तुम्हें अवचेतन में धकेल दिया गया हो तुम तो मेरी साक्षात अनुभूतियों का केंद्र हो इसलिए तुम्हें रोज़ मैं यादों के सहारे इकट्ठा करता जाता हूँ।
तुम्हें याद कर मैं मुस्कुरा सकता हूँ ये क्या कम बड़ी उपलब्धि है एक अलसाई करवट में तुम्हारी याद का वजीफा मुझे मिलता है और मैं रूह की खुराक से आश्वस्त हो जाता हूँ।
छोटे छोटे ख्यालों और अहसासों में तुम्हारी यादों को डुबोता हूँ और फिर उन्हें मन के छज्जे पर टांग देता हूँ उनसे टपकता अहसास मुझे पहाड़ की बारिश जैसा अहसास देता है अपनेपन की उसी ऊंचाई से मैं तुमसें तुम्हारी गहराई से मिलनें आता हूँ।
बहरहाल, कुछ दिनों से तुम्हारी यादों की नौकरी पर हूँ इसलिए लगता नही है कि तुमसे दूर हूँ। मेरे न लगने से तुम नजदीक नही हो जाती हैं यह बात जानता हूँ फिलहाल तुम्हें याद करके बस इस दूरी के भरम को मिटा रहा हूँ और ऐसा लग रहा है जैसे नींद में मुस्कुरा रहा हूँ।
अभी अभी ख्याल आया पता नही इस वक्त तुम क्या कर रही होगी कुछ भी कर रही होंगी मगर ये तय है कम से कम मेरी तरह से किसी को याद नही कर रही होंगी।

'यादों के वजीफें'

Wednesday, September 30, 2015

मेरे प्रिय

जो मुझे प्रिय है वो सदा के लिए प्रिय हैं। उसको खोने को लेकर मेरी लौकिक चिंताएं लगभग शून्य है। मुझे लगता है एक बार वो मेरे पते से भटक भी गया तब भी एक न एक दिन मुझ तक पहुँच ही जाएगा। मेरा चित्त जिसकी निकटता से आह्लाद महसूसता है उसको मुक्त रखना मेरे लिए अनिवार्य है तभी वह नैसर्गिक रूप से मुझसे जुड़ा रह सकता है। डर दुश्चिंता और अपेक्षाओं के बोझ से मैं अपने मन के प्रिय को निस्तेज या निष्प्रभ नही करना चाहता हूँ।
सम्भव है मुझे उससे सांसारिक शिकायतें भी हो मगर वो शिकायतें मेरे मन में उसका स्थान इंच भर भी इधर उधर नही कर पाती है इन शिकायतों का निस्तारण मैं बहुधा समय के ऊपर छोड़ देता हूँ।
जो मेरा प्रिय है वो किसी और प्रिय शायद ही बन पाता है यह एक मेरे अस्तित्व की कमजोरी कह लीजिए या खासियत मैं इसे स्व के गौरव के रूप में देखता हूँ।
मेरे लिए निकटता या दूरी से अधिक महत्वपूर्ण है सम्वेदना के कोमल तंतुओं को नर्म स्पर्शों से निहारते रहना उनमें गांठ न लगने देना इसके बाद मैं एक ऐसी गहरी आश्वस्ति से भर जाता हूँ कि मुझे यह भय नही रहता कि मेरे प्रिय को कोई अपने किसी भी साधन से मुझसे विलग कर सकता है।
क्षण भर के लिए यदि ऐसा आभास भी आता है तो मैं उस पर मुस्कुरा भर देता हूँ फिर वो शंका कपूर की डली की तरह उड़ जाती है मेरे लिए प्रिय होने का अर्थ है किसी का समग्रता के साथ प्रिय होना न कि कुछ कुछ बिन्दुओं के साथ किसी को प्रिय समझना।
मैं का अतिशय प्रयोग कतिपय मेरा अभिमान न लगें इसलिए बताना जरूरी समझता हूँ यहां मैं में भी हम समाहित है मतलब मैं जिन्हें प्रिय हूँ और जो मुझे प्रिय है यह सम्वाद दोनों के चित्त की यात्रा का एक संक्षिप्त आख्यान भर है।

'मेरे प्रिय'

Sunday, September 27, 2015

इतवारी खत

अकेला होना मेरे लिए इसलिए भी कोई त्रासदी नही है क्योंकि इसमें कुछ अंशों में तुम्हारी भी महती भूमिका है। जिस स्थिति में तुम परोक्ष रूप से शामिल हो वो मेरे लिए कभी त्रासद नही हो सकता है बल्कि मैं उसमें उत्सव तलाश लेता हूँ।
तुम्हारे अपने स्थापित मानकों में हिसाब से मेरा कद छोटा है वय की लकीर हमारें मध्य तुम सम्पूर्ण उत्साह के साथ खींच देती हो। प्रेम तो खैर बड़ी गहरी और व्यापक जिम्मेदारी है तुम सामान्य मैत्री की अर्हता में भी मुझे अनुत्तरीण पाती हो। बिना किसी प्रेम या मैत्री के तुम मुझ पर एक अधिकार समझती हो यह मेरे लिए थोड़ी द्वंदात्मक और थोड़ी विचित्र स्थिति है। तुम्हारी बातों से सीधे सीधे यह लगता है तुमनें मेरे बारें में कुछ अमूर्त किस्म का फ्रेंम तय किया हुआ है और उसमें मेरे वजूद को मनोकूलता से फिट करने का प्रयास करती रहती हो।
यदि मैं मुक्त यात्री की भाँति अपने अनुभव तुम से साँझा करूं तो तुम्हे यह मेरे अस्तित्व का सामान्य होना लगने जैसा प्रतीत होता है फिर तुम अपने चयन पर खीझती हुई एक हद तक उपदेशात्मक हो जाती है तुम्हारी खीझ में मुझे खारिज़ कर मेरा अन्य की भाँति सामान्य होना की धारणा को स्थापित करने का साफ़ दिखता भी है।
दरअसल, तुम अभी तय नही कर पाई हो कि मैं तुम्हारा क्या हूँ? यह अनिर्णय की अवस्था तुम्हें मेरी कक्षा के क्या तो बेहद नजदीक ले आता है या फिर बेहद दूर।
जानता हूँ तुम्हारा स्पष्ट बोलना निसन्देह कड़वा बोलना नही है मगर जितनी साफगोई से तुम सीधा मुझे कह देती हो कि मैं न तुम्हारा मित्र हूँ न प्रेमी और न परिचित उसे सुनकर एकबारगी मेरे कदम जमीन से लड़खड़ा जाते है मैं अपने गुरुत्वाकर्षण का केंद्र भूल जाता हूँ। इन शब्दों की ध्वनि मुझे पल भर के लिए दुनिया का सबसे निर्धन जीव बना देती है।
यथार्थ के धरातल मैं फिर भी खुद को समेटता हुआ तुम्हारे समानांतर चलता चला जाता हूँ यह ठीक वैसी बात है आप नदी के किनारे चलते चलते एकदिन इंसानी बस्ती तक पहुँचने की उपकल्पना अपने मन में बना लें खासकर तब जब आप जंगल में रास्ता भटक गए हो।
आत्मीयता के प्रकाशन में कतिपय तुम्हें मैं अपने अस्तित्व के संपादक के रूप में पाता हूँ गोया तुमनें मेरे जीवन के लिए कुछ असाईनमेंट तय किए हो और मुझे अपने तमाम कौशल से उन्हें पूरा करके आपकी नजरों में अपनी उपयोगिता और सतत् प्रासंगिकता सिद्ध करनी हो।
मैं किसी भी किस्म की बैचेनी का शिकार नही हूँ बल्कि तुम्हारी बातें बड़े ध्यान से सुनता हूँ और प्रकृति के खेल पर विस्मय से भरता हूँ। तुम्हारें मानक और मार्ग से चलता हुआ भले ही मैं तुमसे कितना दूर चला जाऊं तुम्हें इस बात की कोई पीड़ा नही है मगर यदि मैं अपनी अनियोजित यात्रा के अनुभव तुम्हारे साथ बांटना चाहूँ तो तुम्हें एक तो उनकी सत्यता पर सन्देह होता है दूसरा तुम्हे लगने लगता है मैं वाग् विलास के चलते भटक रहा हूँ।
मुझे अपने अकेलेपन से कोई असुविधा नही है जीवन को किसी किस्म की शिकायत या रंज के सहारे मैंने कभी ढोया भी नही है मगर तुम्हारे साथ न जाने क्यों मेरे कुछ आत्मीय अनुबन्ध के फंदे अटक गए है जानते हुए कि तुम स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए किसी भी सीमा तक निष्ठुर या क्रूर हो सकती हो।
खैर...! जब ये सब इतना एकतरफा है तो इसे मैं अपना ही पागलपन कहूँगा लेकिन फिलहाल इतना ही निवेदन कर सकता हूँ कि कम से कम मुझे अपनी धारणाओं से जंगल से मुक्त रखिए मैं स्वतः एक दिन खुद ब खुद उलट पाँव से तुम्हारी दुनिया से ओझल हो जाऊँगा जानता हूँ इससे तुम्हें कोई ख़ास फर्क नही पड़ेगा मेरे हिस्से में एक उदास शाम भी न आएगी मगर मेरी समग्रता और मौलिकता का मूल्य तुम्हें शायद तब थोड़ा बहुत समझ आएगा क्योंकि मेरे न होने पर तुम्हें और कोई फर्क पड़े न पड़े मगर इतना अहसास जरूर होगा कि आदमी दिल का साफ़ था।

'इतवारी खत'

Thursday, September 17, 2015

खता और खत

तुमसे बिछड़कर ऐसा कतई नही है कि मैं तुम्हें शिद्दत से याद करती हूँ। ना ही तुम्हारी अनुपस्थिति में मैं किसी किस्म का खालीपन महसूसती हूँ। बल्कि दिल की चश्मदीद गवाह हर मुलाकात के बाद हर बार ऐसा होता है कि मैं तुम्हारी शक्ल भी न देखना चाहती हूँ। कुछ दिन के लिए मैं हो जाती हूँ बिलकुल बंद तुम्हारी कोई बात तुम्हारा कोई ख्याल अंदर-बाहर नही आने देना चाहती। अक्सर ऐसा हुआ है कि तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारा ख्याल आया और मैंने उसे हिकारत से विदा कर दिया। हर समय तुम्हारे बारें में नही सोचती मैं और ना ही मुझे ऐसा लगा कि तुमसे मिलकर मुझे कोई बहुमूल्य चीज़ हासिल कर ली हो। तुम में यदि मैं नकार गिनने बैठ जाऊं तो मुलाक़ात तो क्या तुम्हारे बारें में कभी बात भी न करूँ। ना तुम अतीत हो ना ही भविष्य ना तुम्हें देखकर किसी किस्म की पूर्णता का बोध होता है मेरी प्यास को लेकर तुम्हारे पास किसी किस्म की आश्वस्ति भी नही है।
कई बार मुझे तुम्हारा मेरे जीवन में होनें पर भी संदेह होने लगता है क्योंकि यहां पर तुम्हारे होने के कोई निशाँ आगे या पीछे नजर नही आते है। तुम में मेरी दिलचस्पी अपने अंतिम द्वार पर खड़ी सिसकती है यह ठीक वैसा है किसी ऊंचे पहाड़ से आत्महत्या की सोचना और फिर वहां की गहराई और ठंडी हवाओं में खोकर सम्मोहन में खो जाना।
अपने एक सफल सुखी जीवन में तुम्हारे लिए कोई स्थान मैं कभी नही पाती हूँ तुम एक क्षण की तरह आकर किसी पल में अटक गए हो मैं उसी पल में तुम्हें देखती हो और देखते हुए हमेशा खुद को दो हिस्सों में बटा पाती हूँ।
सच बात तो ये है तुम से न मेरी मैत्री है और न प्रेम ना तुम मेरे जीवन के किसी रिक्त स्थान को भरने वाले शब्द हो।
तुम्हारे बार इतना क्रूर स्पष्ट और व्यवहारिक सोचने के बाद आज एक आत्म स्वीकृति जरूर करना चाहती हूँ।
ना मैं तुम्हें विस्मृत कर पाती हूँ और न घृणा तपती दुपहर में पुरवा की एक ठंडी बयार की तरह तुम्हारा इन्तजार मुझे रहता है।
हर बार अंतिम मुलाक़ात के मानस के बावजूद कुछ न कुछ छूट जाता है हमारे मध्य जिसे रोज़ तुम्हारे खिलाफ बातें सोचकर मिटाने की असफल कोशिश करती हूँ।
न तुम मिटते हो न घटते हो किसी मिट्टी के बनें हो तुम।
हर बार की तरह आज फिर बड़बड़ाकर यही कहती हूँ मुझे खत्म करना है ये सब मुझे बर्दाश्त नही होता तुम्हारी छाया का बोझ।

'खता और खत'

Wednesday, September 2, 2015

सर्दी और स्वेटर

ये सर्दी का पहला हफ्ता अपने आने के इन्तजार में है धूप ने नमी को सोखने के जतन सूरज से गुरुमंत्र के रूप सीख लिए है। तेरी गली के नन्हे कुकरमत्तो ने सूरज की तरफ करवट ली और तुमने छत पर पहली दफा सूरज से आँख मिलाई तो मन पर बरसात ने जो काई जमाई थी वो सूख कर उखड़ने लगी मन की सख्त दीवारों पर इस धूप के स्पर्श ने उनका रेत झाड़ दिया।
अभी तुम छत से नीचे उतरी भी न थी कि सीढ़ियों पर ख्याल आया उस अधूरे स्वेटर का जो बिन नाप लिए किसी एक सर्दी में तुमने बुनना शुरू किया था उसके फंदे तुम भूल गई हो और शायद अब उस नम्बर की सलाई भी न मिल पाएं मगर उस अधूरे स्वेटर को इस सर्दी की धूप में पूरा करके कम से कम तुम उस अधूरी मानसिकता से निकल सकती हो जिसमें रंगो डिजाइन की उलझन नही बल्कि स्मृति के विषम फंदे उलझे पड़े जिसमें आस्तीन  छोटी पड गई है तुमने अपनेपन की कुछ बटन इस अधूरे स्वेटर के लिए चुने थे अब उनके भी कोने टूटने शुरू हो गए है।
यह गुनगुनी धूप तुम्हारे मन की शिकायतों को सेंक कर शायद पका दें फिर ये तुम्हें तकलीफदेह नही लगेंगी फिर तुम अपनी जीवन के विषम रंगों में रंगी अपनी उँगलियों को मन के ठहरे हुए पानी में साफ़ करके फिर से उन सलाइयों में फंदे पिरोओगी जिनकी लड़ाई से एक अधूरा स्वेटर बनना है।
इस जाड़े की इस पहली धूप में दोपहर बाद यादों के सन्दूक से निकालना होगा वो दो रंगी ऊन का गोला जिस पर नमी चढ़ आई है फिर बुनने होंगे कुछ बेवजह के फंदे, सलाइयों के नम्बर के साथ भी समझौता करना पड़ सकता है मगर तुम्हारा मन जब गुनगुनाता हुआ बुनेगा यह स्वेटर तो इस उधड़े हुए रिश्तें की तुरपाई भी होगी इस स्वेटर के बहाने यह बात मुझे आश्वस्त करती है और इसी बिनाह पर अगली सर्दी तक मै खुद आऊंगा चाय के बहाने यह स्वेटर लेने जो तुम बुन रही हो कई सालो से यह कोई वादा नही बस अधूरेपन से ऊबे एक अधूरे मन की अभिलाषा है।

'सर्दी स्वेटर और अधूरा मन'

© अजीत

Thursday, August 6, 2015

सराय

दिल की बस्ती में अधूरेपन कुछ मुहल्ले हैं. कुछ तंग गलिया अंत पर जाकर आपस में मिल जाती हैं.दीवार दिखती जरूर है मगर उसके सहारे खड़ा नही हुआ जा सकता है.स्मृतियों के जंगल से कभी कभी ठंडी हवा आती है अफ़सोस ये हवा भी इस दीवार को लांघ नही पाती.हम जब खुद को  कुछ आवारा टीलो के ओट लेने के आदी बना चुके होते  हैं तब इन गलियों में आकर सच में हमारा दिशाबोध समाप्त हो जाता है.खुद के सबसे सुखद पल को इसी दीवार सहारे उकडू बैठ कर सोचने लगते है.दरअसल वक्त के बीतने के बावजूद भी बहुत कुछ हमारे अंदर ऐसा बच जाता है जो न बीत पाता है और न रीत ही पाता है. समय का एक छिपा हुआ सच हमें चौकाने का भी है. अंतर्मन हमेशा अनापेक्षित को सोचने से इंकार करता है मगर जब वो घटित हो जाता है तब दिल में अफ़सोस के बादल जरूर आकर बेमौसमी बारिश कर जाते हैं.
जीवन को एक यात्रा भी मान लिया जाए तब भी हमारी मंजिल के अदलते बदलते पतों की वजह से यह तय करना जरा मुश्किल होता है कि किसका साथ और किसका हाथ कब कहाँ छूटने वाला है.जीवन में सबसे उपेक्षित पड़े पल दुःख की घडी के सच्चे साथी सिद्ध होते हैं.एक वक्त पर जो लोग जीवन में अपरिहार्य रूप से शामिल थे वे कब किस असावधानी की वजह से हाथ छोड़ देते हैं पता ही नही चलता है. कुछ ऐसे लोग जिन पर हमारी 'एक्सक्लूसिव खोज' का दावा रहा होता है वो कब बेहद मामूली चीज़ों के लिए अपना चयन अलग दिशा में सिद्ध करने में लग जातें हैं.
दरअसल किसी का मिलना और मिलकर बिछड़ना एकबारगी फिर भी स्वीकार किया जा सकता है मगर समय की अवांछित षडयंत्रो और समय के एक खास दबाव से उपजे विकल्प को देखते हुए अपनी स्मृतियों के सबसे निर्वासित कोने में छोड़ कर आने में जो थकान होती है उसकी टीस गाहे बगाहे दिलों में बेचैनियों के लिफ़ाफ़े खुले छोड़ देती है उनसे रिसते लम्हों की नमी से दिल ओ जेहन की आद्रता हमेशा बढ़ाती रहती है.यह एक जानलेवा बात जरूर है. 
धीरे धीरे सब कुछ व्यवथित दिखता है क्योंकि समय इस नियति की चक्र पर हंसकर आगे बढ़ जाता है और हम पीछे मुड़कर देखते हुए अपनी आस्तीन अक्सर शाम को गीली करते रहते है.शाम और रात आवारा किस्सों और खयालो की सराय हैं जहाँ के नीम अँधेरे में हम चुपचाप सिसकते है और अपनी रौशनी पैदा कर लेते हैं. ये हंसी ये मुस्कुराहट इसी रौशनी की पैदाइश है जिस पर दुनिया फ़िदा होती है.

'मन की सराय'

Monday, August 3, 2015

सावन

सावन का महीना आधा साल बीतने पर हर साल आता है। जब आधा बीत चुका होता है तब यह हरजाईयों के दिल को तसल्ली देने के लिए अपने साथ बारिश बूंदो की झड़ी भी लाता है। न जाने क्यों सावन इस बात से अनजाना रहता है कि आधा साल बीतते बीतते मन की अंधेरी गलियों में रोज़ होती बारिश ने अंदर लगभग बाढ़ जैसी स्थिति बना दी होती है अब बचे हुए पांच चार महीनों में कुछ लोग उसकी की सीलन में दिल को जलाकर रोशनी की नाकाम सी कोशिस करने वाले होतें हैं। सावन का महीना मुझे कोई ईश्वरीय षड्यंत्र का हिस्सा लगने लगता है मानों बाहर की बारिश अंदर की बारिश से कोई बदला लेना चाहती हो। दिल के गलियारों से गुजरते हुए हम मन के उस निर्जन टापू पर बैठ अंखड रुद्राभिषेक को देख सकते है जो मन की छोटी छोटी कामनाओं की पूर्ति ना होने पर भी चेतना के शिव तत्व पर रोज़ नियमित रूप से करता जाता है। किसी की स्मृतियों के स्तम्भन में मन वचन कर्म की त्रियुक्ति से हरी भरी बेल पत्र का अर्घ्य देते हुए उसे शीत आंसूओं के भाप से धोते है हमारी अनामिका के निशान उन पर स्थाई रूप से छपे होते है।
दरअसल सावन का महीना उपासना और मन के अनुराग के बिना शर्त अपर्ण का महीना समझा जाता है मगर सही गलत की भौगोलिक सीमा रेखाओं में फंसे दिलों के लिए यह मन के रास्ते कुछ कोमल अहसासों के तर्पण का महीना बन जाता है। कुछ ऐसे विरक्त साधकों की पड़ताल करते हुए अपने चित्त में अवस्थित शिव शक्ति की अनुमति अनिवार्य होती है तभी अनहद के नाद में मध्य सूक्ष्म आहों की शंख ध्वनि हमारी प्रखर चैतन्यता को जाग्रत करती है और हम टिप टिप पड़ती बूंदों के मध्य प्रेम के पंचामृत का आचमन कर पातें हैं।
सावन का महीना मुक्ति के पांचजन्य शंख में ध्वनि फूंकता है तभी तो इस ध्वनि से जहां अंदर कुछ टूटता है हम  अतीत के आरोग्य के लिए महा मृत्युंजय मंत्र का जाप मन ही मन करने लगते है।मन का पंचाग उसी क्षण सावन की घोषणा कर देता है बाकि काल गणना के लिहाज़ से साल में एक बार सावन आता है जबकि काल से होड़ में लगे कुछ निर्वासित लोगो के बारह महीने के सावन में ही जीतें है।

'सावन में मन'

Saturday, August 1, 2015

चाँद

आसमां के रास्तें एक चांद रोज़ जमीं पर उतरता है। जिसे मै देखता हूं और नरगिस के फूलों की मानिंद उसे छूकर खुशबू को रुह का पता देना चाहता हूं मगर वो बेफिक्र मेरी बेकली देख सिर्फ मुस्कुरा भर देता है। उसकी अधखिली हंसी के नूर से मेरे जिस्म की महीन परत बिखर जाती है उसकी रोशनी में मै खुद को पहले से ज्यादा साफ पाता हूं। दिल के गलियारों में सूफियों की टोली बसती है जो मुझे कलन्दर होने का इल्म अता करना चाहती है मगर उसे अभी मेरे गाफिल होने को लेकर शक ओ सुबहा है।
कभी कभी कायनात भी सब्र का इम्तेहान लेने लगती है चांद के पास तारों की गवाही है इसलिए वो खुद को सिर्फ मेरा होने का समन तामील नही होने देता उसके पास बारिश की बूदों के छोटे छोटे वजीफे है जो उसने बादलों से उधार लिए थे मुझ से रोज़ चांद चंद आवारा मसीहाओं के पते पूछता है और रोज़ अपनी याददाश्त का हवाला देकर बच जाता हूं। मेरे अपने वजूद के डर मुझ पर इस कदर तारी है कि मै ख्यालों की कतरन से किस्सागोई की पंतग उडाता हूं मगर उसकी डोर मेरे हाथ में नही है उसे वफा के कारोबारियों ने मुझसे छीन लिया है। मरासिम के खलीफाओं की बसती का मै अकेला गैर इल्मदार फकीर हूं।
चांद से मै इल्तज़ा की शक्ल में गुजारिश सौपता हूं खुद को खारिज़ करके अपने इश्क और जुनून की गवाही देता हूं मगर वो मेरा हाकिम बनने से मुकर जाता है जबकि उसने तन्हाई की सिसकियों में मेरी माथे पर भरोसे और उम्मीद का बोसा रफू किया था। पता नही मुझमें और चांद में कौन किसका मुरीद है कौन किसका मुर्शिद है। चांद को मुझसे इश्क है यह नही जानता मगर रात के तीसरे पहरें मे जब चांद सबसे अकेला होता है तब उसे मेरी तलब जरुर लगती है तभी तो वो खिडकी से रोशनी की शक्ल में मेरे सिराहने दाखिल होता है उसे पता है उस वक्त मै ख्वाबों में उसी को तलाश रहा हूं।
तमाम इल्म और अदब की पैबन्द के बावजूद मेरे अक्स में रोशनी आरपार दाखिल होती है मेरा वजूद वक्त की नमी से पसरी सीलन की वजह से इतना चुपचाप करवट बदलता है कि खुद मुझे खबर नही होती है। चांद मेरी बर्बादियों का चुस्त तमाशबीन है वो रुह की हरारत की वजह जानता हुआ इल्म के दवाखाने से मेरे लिए शिफा का शरबत नही लाता उसकी ठंडी आहों में तपन है जिसमें मै रोज जलता हूं एकदिन ऐसे ही जलता हुआ चांदनी के बीच कोयले से राख में तब्दील हो जाउंगा।

...अब मैने गुनगुनाना बंद कर दिया है चंदा रे चंदा कभी तो ज़मी पर आ बैठेंगे बातें करेंगे !

©डॉ.अजित

अफ़सोस

अफ़सोस की शक्ल बदरंग होती है। ये न आता हुआ अच्छा लगता है न जाता हुआ। दिल जब धड़कते हुए इतनी आवाज़ करने लगता है कि आपके कान चाहकर भी अनसुना न कर सके तब पता चलता है दिल की बस्ती का आख़िरी पैरोकार भी इलज़ाम की तसदीक करके कहीं आगे निकल गया है। ज़ज्बात गैर जरूरी जाया न हो इस बात का इल्म रखते हुए भी अक्सर गलतफहमियों के शिकारे अपनेपन की झील में डूब जातें हैं। इंसानी वकार का ये कैसा दयार बनता जाता है जहां यकीं रोज़ नई शक्ल इख़्तियार कर लेता है।
ज़बां  नादाँ है ये जेहन की बारिकियों से वाकिफ नही होती है कभी दिल्लगी तो कभी दिल की लगी में ये उन वाकयो का जिक्र करते हुए फिसल जाती है जो जिक्र कभी अफ़साने में भी नही थे।
मुसलल रूप से किसी की निगाहों में अपने भरोसे का मुस्तकबिल तलाशना बेहद थकावट भरा काम है। बेसाख्ता ख्यालों की तुरपाई करते समय महज़ ऊँगली ही नही दिल के नरम गलियारें भी जख्मी हो जातें हैं। लफ्ज़ दर लफ्ज़ मरासिम के रेगिस्तान में तन्हा भटकतें दिल जेहन और जज्बात का कोरस न जाने कौन सी मौसकी छेड़ देता है और फिर कुछ भी सुनना मुनासिब नही लगता है।
दरअसल तुम्हारी निगाह में सिफर हो जाना सदी का सबसे बड़ा हादसा है यह महज एक हादसा ही नही रह जाता है ये खुद के रूह को जिल्लत के हवाले करने जैसा तजरबा देकर जाता है। दानिस्ता या गैर दानिस्ता कुछ लम्हें इस तरह हमारे दरम्यां दीवार की माफिक आकर खड़े हो जाते है कि उनके आरपार न मेरी आवाज़ जा सकती है न मेरी रूह की पाक गुहार तुम तलक पहूँचती है। वक्त कुछ इस तरह की लिखावट में मेरे माथे पर न जी गई तफ़रीह की तकरीरे लिखता है कि तुम्हें मेरा वजूद ही नाकाबिल ए बर्दाश्त हो जाता है।
बहरहाल ताल्लुकात में बहुत ज्यादा तकरीरे लफ्ज़ का वजन कम करती है इसलिए खुद की सफाई में कुछ कहने का वकार मेरे पास नही है। तुम जिस मेयार से मेरे बारें में राय कायम करती चली जाती हो उसकी बुनियाद बहुत गहरी नही है इसलिए मेरी तकलीफ बस इतनी सी है एक मुतमईन से सफर में तुम्हारी किस्सागोई में मेरा वजूद हाशिए पर बचा हुआ है,कहीं ऐसा न हो तल्खियों की आंधी में मेरे वजूद की पाकीजगी तौहीन का सबब बन तेरे दर से हवा हो जाएं इसलिए अपनी तमाम काहिली जाहिली के बावजूद मैं दुआं फूंकता हूँ कि रब तुम्हें इल्म की रोशनी और अदब का काजल अता फरमाए ताकि तुम सही गलत में फर्क कर सको मेरी रिहाई का मुस्तकबिल तुम्हारी मुंसफी में नही तुम्हारी रूहानी मौजूदगी में मुकर्रर हो बस मेरी इतनी सी ही आख़िरी ख्वाहिश है।

© डॉ.अजित

Monday, July 20, 2015

यात्रा

दो लम्हों में बीच सिसकती छोटी सी दूरी अचानक से कई सौ किलोमीटर में तब्दील हो जाती है। यादों के बीहड़ में भटकतें दिल एक बार बागी हो जाए तो फिर उसका विश्वास हर किस्म के तंत्र से स्वत: उठ जाता है अतीत की कोई वाचिक सांत्वना उसे आत्म समपर्ण के लिए प्रेरित नही कर पाती है।
यूं ही अकेलेपन की दहलीज़ पर बैठ बुदबुदाते ख्याल आता है कि दो विपरीत दिशा में खड़ी छाया की प्रतिलिपियां संरक्षित रखना कितना मुश्किल काम हैं। गाहे बगाहे दिन में एक बार कम से कम एकबार मन दूरियों की पैमाईश फांसलों के पैमाने से करने बैठ जाता है।
रात में ठीक सोने से पहले एक ख्याल की गंध बरबस चेहरे पर मुस्कान लाती है तो हम सिकुड़ कर खुद को उस क्षण के हवाले करतें है तभी वक्त की सिलवट हमें करवट बदलनें का हुक्म देती है और हम तकिए से खिसक कर उस दुनिया की गोद में सिर टिका देते है जहां नींद तो आती है मगर न सुकून मिलता है और न मनमुताबिक़ ख्वाब।
कभी कभी याद यूं भी आती है और हमें अकेला छोड़ जाती है दुनियादारी के गणित के बीच जोड़ घटा गुणा भाग और हासिल के बीच हम भूल जातें जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा और उसका एक छोटा सा किस्सा।