Friday, October 2, 2015

रसोई

रसोई के बारें में सोचता हूँ तो लगने लगता है घर के अंदर यह वो कोना है जहां रोज़ यज्ञ होता है मगर एकल आहूतियां केवल ऋषि पुत्रियां देती है। गर्मी और बरसात के दिनों में जब हम कूलर पंखे और एसी में भी असहज महसूस करते है तब स्त्रियां रसाई में भोजन की समिधा लगाती हैं। जिस जगह से सबका पेट पलता है वातानुकूलन की दृष्टी से वो जगह बिलकुल भी सुविधाजनक नही है। प्रायः हम तो इसी सवाल से खीझ जातें हैं कि आज क्या बनाया जाए मगर जो रोज़ नित्यकर्म से बनाने की प्रक्रिया से गुजरती है नीरसता का अंदाज़ा लगाना भूल जाते है।
एग्जॉस्ट फैन की सीमाओं के मध्य चरम् गर्मी में गैस की आंच में खड़े रहना छौंक के धुंए को लगभग रोज़ झेलना और इसके बावजूद बिना किसी शिकायत के नियमतः रोज़ यथासमय खाना तैयार करना कम चुनौतिपूर्ण काम नही है।हम तो दुसरे कमरें में छौंक के धुएं से छींक आने भर से परेशान हो जाते है मगर जिसकी दुनिया इसी धुंए में रंगी होती है उसकी तकलीफ का अंदाज़ा लगाना अक्सर भूल जाते है।
रसोई अपने आप में किसी को स्त्री को सिद्ध करने की प्रयोगशाला है जिसमें दायित्वों की सदियों पुरानी कंडीशनिंग से स्त्रियां अपने वजूद को सिद्ध करती रहती है ये उनके मन की उधेड़ बुन की सबसे सच्ची गवाह है। रसोई उस उदास गीत को सुन सुन कर बूढ़ी होती है जिसे स्त्री अपने सबसे तन्मय पलों में गाती है। व्यापक संदर्भो में देखा जाए तो रसोई का हर कोना एक भरा पूरा आख्यान है। एग्जॉस्ट फैन की सीमाबद्ध जिजीविषा स्त्री मन के द्वन्दों को धुएँ की भाँति घर की चारदीवारी से बाहर छोड़ आती है ताकि वो एक राहत भरी सांस ले सके। सिंक में अटे पड़े बर्तन रोजमर्रा के छोटे छोटे शिकवों के प्रतीक लगने लगते है जिन्हें इच्छा अनिच्छा के बावजूद रोज़ स्त्री मांझ कर साफ़ करती है ताकि बची रहे शुद्धता।
रसोई के अंदर स्त्री की दुनिया बड़े वैचित्र्य से भरी होती है वो वहां जीवन में घुले दुखों को सब्जी की तरह कांटती छांटती है दाल से कंकड़ की तरह बुनती है और फिर उम्मीद की थाली में अपने अधिकतम् प्रयास से रोज़ सुख परोस देती है। पसन्द नापसन्द के पैमानें पर उसकी खुद की पसन्द सबसे निम्नतम स्तर पर होती है वो ख्याल रखती है बच्चें वयस्क और प्रौढ़ों का। कितने।लोग यह सच जान पातें होंगे कि बेहद स्वादिष्ट खाने बनाने की प्रक्रिया में खुद स्त्री का स्वादबोध इतना पीछे चला जाता है जब आप उसके बनाएं खाने से तृप्त हो रहे होते है सच तो ये है उस वक्त उसकी भूख मर चुकी होती है वो खा लेती है बेमन से सब बचा कुचा।
स्त्री को अपने मन की तरह रोज़ साफ़ करनी होती है रसोई।वो नियत करती है दाल मसालें और बर्तनों का स्थान ताकि चरम् दबाव में भी वो अस्त व्यस्त न हो। रसोई में बचता अन्न और उसे निष्प्रयोज्य समझ जब फैंकना होता है तब किसी किस्म के अपराधबोध से एक रोज स्त्री गुजरती है उसका आप अंदाज़ा नही लगा सकते है अन्न को फैंकना उसे लगता है उसके अनुमान के कौशल का असफल हो जाना।
स्त्री के जिन झक सफेद हाथो की सुंदरता पर आप होते है मोहित उन पर चढी होती है एक अंश आटे की सफेदी और बार बार डिटर्जेंट से हाथ धोने की आदत का रंग। रसोई में बहे पसीनें का मूल्य इसलिए नही समझ आता सबको क्योंकि वो रसोई से खाने की टेबिल तक आते आते निष्ठा और प्रेम की आंच में सूख जाता है और स्त्री उसी की ठंडक में रोज़ परोसती है गर्मागरम भोजन।
एक स्त्री के जीवन में रसोई जितनी जीवन्त है पुरुष के जीवन में वो इतना ही तटस्थ स्थान रखती है पुरुष के पास अर्थ है जहां से रसोई के साधन निकलतें है और वह इसे अपना अधिकतम योगदान समझ मुक्त हो जाता है मगर स्त्री के मनोरथ है जहां से रसोई के नए अर्थ विकसित होते है जीवन आगे बढ़ता है।
रसोई की साधना निसन्देह अधिक व्यापक और गहरी है स्त्री मन के विस्तार की सबसे निर्जीव किस्म की साक्षी है रसोई मगर एक छोटे स्थान पर स्त्री को स्वयं की मुक्त सत्ता का बोध इतना गहरा होता है कि वहां अधिकार से सब अपने मन मुताबिक़ नियोजित करती है ऐसे में रसोई के भूगोल में बड़ी गहराई से सांस लेता है स्त्री के स्वतन्त्रताबोध का गहरा मनोविज्ञान।
रसोई के सहारे स्त्री की यात्रा को देखा जा सकता है और इस यात्रा के मूल्य को समझने के लिए कम से कम एक दिन बिताना पड़ता है रसोई में वो भी बिना किसी खीझ के जोकि तमाम पुरुषों के लिए एक बेहद मुश्किल काम है इसलिए पुरुषो की उपस्थिति को रसोई खुद करती है अस्वीकार और प्रायः बड़बड़ाते हुए पुरुष बाहर निकल आतें है यह कहते हुए हमारे बसका नही ये तामझाम।

'रसोई का मनोविज्ञान'

वजीफे यादों के

मैं तुम्हें कभी याद नही करता। याद करना एक सायास उपक्रम है तुमसे मेरे हर बंधन अनायास किस्म के है ऐसे में तुम जब याद आती हो बस आ ही जाती हो। निसन्देह तुम्हारे साथ मेरी जीवन की कुछ बेहद सुखद स्मृतियाँ जुड़ी हुई है एकाध तकरार को छोड़कर। तुम्हारें बारें में सोचने भर से मेरी पलकों के झपकनें का अंतराल थोड़ा विलम्बित हो जाता है। आँखों के अंदरुनी हिस्सों में मुस्कान करवट लेने लगती है और बोझिल चेहरे पर भी एक इंच मुस्कान तैर जाती है।
तुम्हारे स्पर्श मेरे जीवन की अविस्मरणीय पूंजी है उन्हें मैं रोज़ सम्भाल कर रखता हूँ तुम्हारी धड़कनों के बंद मेरी धड़कनों की गिरह को रोज़ दूर से रफू कर जाते है। तुम्हारी खुशबू के अनुलोम विलोम से मेरे मन का बासीपन दूर हो जाता है।
रात में सोने से ठीक पहले मेरा तकिया मेरी गर्दन पर तुम्हारा नाम लिखता है और मैं थोड़े से तुम्हारे उन्माद में करवट लेता हूँ फिर बरबस ही मैं बेवजह मुस्कुरा उठता हूँ और नींद में तुमसे मिलनें की गुजारिश अपने अवचेतन के बड़े बाबू के यहां आमद कराता हूँ मगर अफ़सोस तुम ख़्वाब में नही मिलती हो।
तुम ख़्वाब में कैसे मिलोगी तुम मेरे मन की ध्वनि की कोई वर्जना नही हो जो तुम्हें अवचेतन में धकेल दिया गया हो तुम तो मेरी साक्षात अनुभूतियों का केंद्र हो इसलिए तुम्हें रोज़ मैं यादों के सहारे इकट्ठा करता जाता हूँ।
तुम्हें याद कर मैं मुस्कुरा सकता हूँ ये क्या कम बड़ी उपलब्धि है एक अलसाई करवट में तुम्हारी याद का वजीफा मुझे मिलता है और मैं रूह की खुराक से आश्वस्त हो जाता हूँ।
छोटे छोटे ख्यालों और अहसासों में तुम्हारी यादों को डुबोता हूँ और फिर उन्हें मन के छज्जे पर टांग देता हूँ उनसे टपकता अहसास मुझे पहाड़ की बारिश जैसा अहसास देता है अपनेपन की उसी ऊंचाई से मैं तुमसें तुम्हारी गहराई से मिलनें आता हूँ।
बहरहाल, कुछ दिनों से तुम्हारी यादों की नौकरी पर हूँ इसलिए लगता नही है कि तुमसे दूर हूँ। मेरे न लगने से तुम नजदीक नही हो जाती हैं यह बात जानता हूँ फिलहाल तुम्हें याद करके बस इस दूरी के भरम को मिटा रहा हूँ और ऐसा लग रहा है जैसे नींद में मुस्कुरा रहा हूँ।
अभी अभी ख्याल आया पता नही इस वक्त तुम क्या कर रही होगी कुछ भी कर रही होंगी मगर ये तय है कम से कम मेरी तरह से किसी को याद नही कर रही होंगी।

'यादों के वजीफें'

Wednesday, September 30, 2015

मेरे प्रिय

जो मुझे प्रिय है वो सदा के लिए प्रिय हैं। उसको खोने को लेकर मेरी लौकिक चिंताएं लगभग शून्य है। मुझे लगता है एक बार वो मेरे पते से भटक भी गया तब भी एक न एक दिन मुझ तक पहुँच ही जाएगा। मेरा चित्त जिसकी निकटता से आह्लाद महसूसता है उसको मुक्त रखना मेरे लिए अनिवार्य है तभी वह नैसर्गिक रूप से मुझसे जुड़ा रह सकता है। डर दुश्चिंता और अपेक्षाओं के बोझ से मैं अपने मन के प्रिय को निस्तेज या निष्प्रभ नही करना चाहता हूँ।
सम्भव है मुझे उससे सांसारिक शिकायतें भी हो मगर वो शिकायतें मेरे मन में उसका स्थान इंच भर भी इधर उधर नही कर पाती है इन शिकायतों का निस्तारण मैं बहुधा समय के ऊपर छोड़ देता हूँ।
जो मेरा प्रिय है वो किसी और प्रिय शायद ही बन पाता है यह एक मेरे अस्तित्व की कमजोरी कह लीजिए या खासियत मैं इसे स्व के गौरव के रूप में देखता हूँ।
मेरे लिए निकटता या दूरी से अधिक महत्वपूर्ण है सम्वेदना के कोमल तंतुओं को नर्म स्पर्शों से निहारते रहना उनमें गांठ न लगने देना इसके बाद मैं एक ऐसी गहरी आश्वस्ति से भर जाता हूँ कि मुझे यह भय नही रहता कि मेरे प्रिय को कोई अपने किसी भी साधन से मुझसे विलग कर सकता है।
क्षण भर के लिए यदि ऐसा आभास भी आता है तो मैं उस पर मुस्कुरा भर देता हूँ फिर वो शंका कपूर की डली की तरह उड़ जाती है मेरे लिए प्रिय होने का अर्थ है किसी का समग्रता के साथ प्रिय होना न कि कुछ कुछ बिन्दुओं के साथ किसी को प्रिय समझना।
मैं का अतिशय प्रयोग कतिपय मेरा अभिमान न लगें इसलिए बताना जरूरी समझता हूँ यहां मैं में भी हम समाहित है मतलब मैं जिन्हें प्रिय हूँ और जो मुझे प्रिय है यह सम्वाद दोनों के चित्त की यात्रा का एक संक्षिप्त आख्यान भर है।

'मेरे प्रिय'

Sunday, September 27, 2015

इतवारी खत

अकेला होना मेरे लिए इसलिए भी कोई त्रासदी नही है क्योंकि इसमें कुछ अंशों में तुम्हारी भी महती भूमिका है। जिस स्थिति में तुम परोक्ष रूप से शामिल हो वो मेरे लिए कभी त्रासद नही हो सकता है बल्कि मैं उसमें उत्सव तलाश लेता हूँ।
तुम्हारे अपने स्थापित मानकों में हिसाब से मेरा कद छोटा है वय की लकीर हमारें मध्य तुम सम्पूर्ण उत्साह के साथ खींच देती हो। प्रेम तो खैर बड़ी गहरी और व्यापक जिम्मेदारी है तुम सामान्य मैत्री की अर्हता में भी मुझे अनुत्तरीण पाती हो। बिना किसी प्रेम या मैत्री के तुम मुझ पर एक अधिकार समझती हो यह मेरे लिए थोड़ी द्वंदात्मक और थोड़ी विचित्र स्थिति है। तुम्हारी बातों से सीधे सीधे यह लगता है तुमनें मेरे बारें में कुछ अमूर्त किस्म का फ्रेंम तय किया हुआ है और उसमें मेरे वजूद को मनोकूलता से फिट करने का प्रयास करती रहती हो।
यदि मैं मुक्त यात्री की भाँति अपने अनुभव तुम से साँझा करूं तो तुम्हे यह मेरे अस्तित्व का सामान्य होना लगने जैसा प्रतीत होता है फिर तुम अपने चयन पर खीझती हुई एक हद तक उपदेशात्मक हो जाती है तुम्हारी खीझ में मुझे खारिज़ कर मेरा अन्य की भाँति सामान्य होना की धारणा को स्थापित करने का साफ़ दिखता भी है।
दरअसल, तुम अभी तय नही कर पाई हो कि मैं तुम्हारा क्या हूँ? यह अनिर्णय की अवस्था तुम्हें मेरी कक्षा के क्या तो बेहद नजदीक ले आता है या फिर बेहद दूर।
जानता हूँ तुम्हारा स्पष्ट बोलना निसन्देह कड़वा बोलना नही है मगर जितनी साफगोई से तुम सीधा मुझे कह देती हो कि मैं न तुम्हारा मित्र हूँ न प्रेमी और न परिचित उसे सुनकर एकबारगी मेरे कदम जमीन से लड़खड़ा जाते है मैं अपने गुरुत्वाकर्षण का केंद्र भूल जाता हूँ। इन शब्दों की ध्वनि मुझे पल भर के लिए दुनिया का सबसे निर्धन जीव बना देती है।
यथार्थ के धरातल मैं फिर भी खुद को समेटता हुआ तुम्हारे समानांतर चलता चला जाता हूँ यह ठीक वैसी बात है आप नदी के किनारे चलते चलते एकदिन इंसानी बस्ती तक पहुँचने की उपकल्पना अपने मन में बना लें खासकर तब जब आप जंगल में रास्ता भटक गए हो।
आत्मीयता के प्रकाशन में कतिपय तुम्हें मैं अपने अस्तित्व के संपादक के रूप में पाता हूँ गोया तुमनें मेरे जीवन के लिए कुछ असाईनमेंट तय किए हो और मुझे अपने तमाम कौशल से उन्हें पूरा करके आपकी नजरों में अपनी उपयोगिता और सतत् प्रासंगिकता सिद्ध करनी हो।
मैं किसी भी किस्म की बैचेनी का शिकार नही हूँ बल्कि तुम्हारी बातें बड़े ध्यान से सुनता हूँ और प्रकृति के खेल पर विस्मय से भरता हूँ। तुम्हारें मानक और मार्ग से चलता हुआ भले ही मैं तुमसे कितना दूर चला जाऊं तुम्हें इस बात की कोई पीड़ा नही है मगर यदि मैं अपनी अनियोजित यात्रा के अनुभव तुम्हारे साथ बांटना चाहूँ तो तुम्हें एक तो उनकी सत्यता पर सन्देह होता है दूसरा तुम्हे लगने लगता है मैं वाग् विलास के चलते भटक रहा हूँ।
मुझे अपने अकेलेपन से कोई असुविधा नही है जीवन को किसी किस्म की शिकायत या रंज के सहारे मैंने कभी ढोया भी नही है मगर तुम्हारे साथ न जाने क्यों मेरे कुछ आत्मीय अनुबन्ध के फंदे अटक गए है जानते हुए कि तुम स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए किसी भी सीमा तक निष्ठुर या क्रूर हो सकती हो।
खैर...! जब ये सब इतना एकतरफा है तो इसे मैं अपना ही पागलपन कहूँगा लेकिन फिलहाल इतना ही निवेदन कर सकता हूँ कि कम से कम मुझे अपनी धारणाओं से जंगल से मुक्त रखिए मैं स्वतः एक दिन खुद ब खुद उलट पाँव से तुम्हारी दुनिया से ओझल हो जाऊँगा जानता हूँ इससे तुम्हें कोई ख़ास फर्क नही पड़ेगा मेरे हिस्से में एक उदास शाम भी न आएगी मगर मेरी समग्रता और मौलिकता का मूल्य तुम्हें शायद तब थोड़ा बहुत समझ आएगा क्योंकि मेरे न होने पर तुम्हें और कोई फर्क पड़े न पड़े मगर इतना अहसास जरूर होगा कि आदमी दिल का साफ़ था।

'इतवारी खत'

Thursday, September 17, 2015

खता और खत

तुमसे बिछड़कर ऐसा कतई नही है कि मैं तुम्हें शिद्दत से याद करती हूँ। ना ही तुम्हारी अनुपस्थिति में मैं किसी किस्म का खालीपन महसूसती हूँ। बल्कि दिल की चश्मदीद गवाह हर मुलाकात के बाद हर बार ऐसा होता है कि मैं तुम्हारी शक्ल भी न देखना चाहती हूँ। कुछ दिन के लिए मैं हो जाती हूँ बिलकुल बंद तुम्हारी कोई बात तुम्हारा कोई ख्याल अंदर-बाहर नही आने देना चाहती। अक्सर ऐसा हुआ है कि तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारा ख्याल आया और मैंने उसे हिकारत से विदा कर दिया। हर समय तुम्हारे बारें में नही सोचती मैं और ना ही मुझे ऐसा लगा कि तुमसे मिलकर मुझे कोई बहुमूल्य चीज़ हासिल कर ली हो। तुम में यदि मैं नकार गिनने बैठ जाऊं तो मुलाक़ात तो क्या तुम्हारे बारें में कभी बात भी न करूँ। ना तुम अतीत हो ना ही भविष्य ना तुम्हें देखकर किसी किस्म की पूर्णता का बोध होता है मेरी प्यास को लेकर तुम्हारे पास किसी किस्म की आश्वस्ति भी नही है।
कई बार मुझे तुम्हारा मेरे जीवन में होनें पर भी संदेह होने लगता है क्योंकि यहां पर तुम्हारे होने के कोई निशाँ आगे या पीछे नजर नही आते है। तुम में मेरी दिलचस्पी अपने अंतिम द्वार पर खड़ी सिसकती है यह ठीक वैसा है किसी ऊंचे पहाड़ से आत्महत्या की सोचना और फिर वहां की गहराई और ठंडी हवाओं में खोकर सम्मोहन में खो जाना।
अपने एक सफल सुखी जीवन में तुम्हारे लिए कोई स्थान मैं कभी नही पाती हूँ तुम एक क्षण की तरह आकर किसी पल में अटक गए हो मैं उसी पल में तुम्हें देखती हो और देखते हुए हमेशा खुद को दो हिस्सों में बटा पाती हूँ।
सच बात तो ये है तुम से न मेरी मैत्री है और न प्रेम ना तुम मेरे जीवन के किसी रिक्त स्थान को भरने वाले शब्द हो।
तुम्हारे बार इतना क्रूर स्पष्ट और व्यवहारिक सोचने के बाद आज एक आत्म स्वीकृति जरूर करना चाहती हूँ।
ना मैं तुम्हें विस्मृत कर पाती हूँ और न घृणा तपती दुपहर में पुरवा की एक ठंडी बयार की तरह तुम्हारा इन्तजार मुझे रहता है।
हर बार अंतिम मुलाक़ात के मानस के बावजूद कुछ न कुछ छूट जाता है हमारे मध्य जिसे रोज़ तुम्हारे खिलाफ बातें सोचकर मिटाने की असफल कोशिश करती हूँ।
न तुम मिटते हो न घटते हो किसी मिट्टी के बनें हो तुम।
हर बार की तरह आज फिर बड़बड़ाकर यही कहती हूँ मुझे खत्म करना है ये सब मुझे बर्दाश्त नही होता तुम्हारी छाया का बोझ।

'खता और खत'

Wednesday, September 2, 2015

सर्दी और स्वेटर

ये सर्दी का पहला हफ्ता अपने आने के इन्तजार में है धूप ने नमी को सोखने के जतन सूरज से गुरुमंत्र के रूप सीख लिए है। तेरी गली के नन्हे कुकरमत्तो ने सूरज की तरफ करवट ली और तुमने छत पर पहली दफा सूरज से आँख मिलाई तो मन पर बरसात ने जो काई जमाई थी वो सूख कर उखड़ने लगी मन की सख्त दीवारों पर इस धूप के स्पर्श ने उनका रेत झाड़ दिया।
अभी तुम छत से नीचे उतरी भी न थी कि सीढ़ियों पर ख्याल आया उस अधूरे स्वेटर का जो बिन नाप लिए किसी एक सर्दी में तुमने बुनना शुरू किया था उसके फंदे तुम भूल गई हो और शायद अब उस नम्बर की सलाई भी न मिल पाएं मगर उस अधूरे स्वेटर को इस सर्दी की धूप में पूरा करके कम से कम तुम उस अधूरी मानसिकता से निकल सकती हो जिसमें रंगो डिजाइन की उलझन नही बल्कि स्मृति के विषम फंदे उलझे पड़े जिसमें आस्तीन  छोटी पड गई है तुमने अपनेपन की कुछ बटन इस अधूरे स्वेटर के लिए चुने थे अब उनके भी कोने टूटने शुरू हो गए है।
यह गुनगुनी धूप तुम्हारे मन की शिकायतों को सेंक कर शायद पका दें फिर ये तुम्हें तकलीफदेह नही लगेंगी फिर तुम अपनी जीवन के विषम रंगों में रंगी अपनी उँगलियों को मन के ठहरे हुए पानी में साफ़ करके फिर से उन सलाइयों में फंदे पिरोओगी जिनकी लड़ाई से एक अधूरा स्वेटर बनना है।
इस जाड़े की इस पहली धूप में दोपहर बाद यादों के सन्दूक से निकालना होगा वो दो रंगी ऊन का गोला जिस पर नमी चढ़ आई है फिर बुनने होंगे कुछ बेवजह के फंदे, सलाइयों के नम्बर के साथ भी समझौता करना पड़ सकता है मगर तुम्हारा मन जब गुनगुनाता हुआ बुनेगा यह स्वेटर तो इस उधड़े हुए रिश्तें की तुरपाई भी होगी इस स्वेटर के बहाने यह बात मुझे आश्वस्त करती है और इसी बिनाह पर अगली सर्दी तक मै खुद आऊंगा चाय के बहाने यह स्वेटर लेने जो तुम बुन रही हो कई सालो से यह कोई वादा नही बस अधूरेपन से ऊबे एक अधूरे मन की अभिलाषा है।

'सर्दी स्वेटर और अधूरा मन'

© अजीत

Thursday, August 6, 2015

सराय

दिल की बस्ती में अधूरेपन कुछ मुहल्ले हैं. कुछ तंग गलिया अंत पर जाकर आपस में मिल जाती हैं.दीवार दिखती जरूर है मगर उसके सहारे खड़ा नही हुआ जा सकता है.स्मृतियों के जंगल से कभी कभी ठंडी हवा आती है अफ़सोस ये हवा भी इस दीवार को लांघ नही पाती.हम जब खुद को  कुछ आवारा टीलो के ओट लेने के आदी बना चुके होते  हैं तब इन गलियों में आकर सच में हमारा दिशाबोध समाप्त हो जाता है.खुद के सबसे सुखद पल को इसी दीवार सहारे उकडू बैठ कर सोचने लगते है.दरअसल वक्त के बीतने के बावजूद भी बहुत कुछ हमारे अंदर ऐसा बच जाता है जो न बीत पाता है और न रीत ही पाता है. समय का एक छिपा हुआ सच हमें चौकाने का भी है. अंतर्मन हमेशा अनापेक्षित को सोचने से इंकार करता है मगर जब वो घटित हो जाता है तब दिल में अफ़सोस के बादल जरूर आकर बेमौसमी बारिश कर जाते हैं.
जीवन को एक यात्रा भी मान लिया जाए तब भी हमारी मंजिल के अदलते बदलते पतों की वजह से यह तय करना जरा मुश्किल होता है कि किसका साथ और किसका हाथ कब कहाँ छूटने वाला है.जीवन में सबसे उपेक्षित पड़े पल दुःख की घडी के सच्चे साथी सिद्ध होते हैं.एक वक्त पर जो लोग जीवन में अपरिहार्य रूप से शामिल थे वे कब किस असावधानी की वजह से हाथ छोड़ देते हैं पता ही नही चलता है. कुछ ऐसे लोग जिन पर हमारी 'एक्सक्लूसिव खोज' का दावा रहा होता है वो कब बेहद मामूली चीज़ों के लिए अपना चयन अलग दिशा में सिद्ध करने में लग जातें हैं.
दरअसल किसी का मिलना और मिलकर बिछड़ना एकबारगी फिर भी स्वीकार किया जा सकता है मगर समय की अवांछित षडयंत्रो और समय के एक खास दबाव से उपजे विकल्प को देखते हुए अपनी स्मृतियों के सबसे निर्वासित कोने में छोड़ कर आने में जो थकान होती है उसकी टीस गाहे बगाहे दिलों में बेचैनियों के लिफ़ाफ़े खुले छोड़ देती है उनसे रिसते लम्हों की नमी से दिल ओ जेहन की आद्रता हमेशा बढ़ाती रहती है.यह एक जानलेवा बात जरूर है. 
धीरे धीरे सब कुछ व्यवथित दिखता है क्योंकि समय इस नियति की चक्र पर हंसकर आगे बढ़ जाता है और हम पीछे मुड़कर देखते हुए अपनी आस्तीन अक्सर शाम को गीली करते रहते है.शाम और रात आवारा किस्सों और खयालो की सराय हैं जहाँ के नीम अँधेरे में हम चुपचाप सिसकते है और अपनी रौशनी पैदा कर लेते हैं. ये हंसी ये मुस्कुराहट इसी रौशनी की पैदाइश है जिस पर दुनिया फ़िदा होती है.

'मन की सराय'

Monday, August 3, 2015

सावन

सावन का महीना आधा साल बीतने पर हर साल आता है। जब आधा बीत चुका होता है तब यह हरजाईयों के दिल को तसल्ली देने के लिए अपने साथ बारिश बूंदो की झड़ी भी लाता है। न जाने क्यों सावन इस बात से अनजाना रहता है कि आधा साल बीतते बीतते मन की अंधेरी गलियों में रोज़ होती बारिश ने अंदर लगभग बाढ़ जैसी स्थिति बना दी होती है अब बचे हुए पांच चार महीनों में कुछ लोग उसकी की सीलन में दिल को जलाकर रोशनी की नाकाम सी कोशिस करने वाले होतें हैं। सावन का महीना मुझे कोई ईश्वरीय षड्यंत्र का हिस्सा लगने लगता है मानों बाहर की बारिश अंदर की बारिश से कोई बदला लेना चाहती हो। दिल के गलियारों से गुजरते हुए हम मन के उस निर्जन टापू पर बैठ अंखड रुद्राभिषेक को देख सकते है जो मन की छोटी छोटी कामनाओं की पूर्ति ना होने पर भी चेतना के शिव तत्व पर रोज़ नियमित रूप से करता जाता है। किसी की स्मृतियों के स्तम्भन में मन वचन कर्म की त्रियुक्ति से हरी भरी बेल पत्र का अर्घ्य देते हुए उसे शीत आंसूओं के भाप से धोते है हमारी अनामिका के निशान उन पर स्थाई रूप से छपे होते है।
दरअसल सावन का महीना उपासना और मन के अनुराग के बिना शर्त अपर्ण का महीना समझा जाता है मगर सही गलत की भौगोलिक सीमा रेखाओं में फंसे दिलों के लिए यह मन के रास्ते कुछ कोमल अहसासों के तर्पण का महीना बन जाता है। कुछ ऐसे विरक्त साधकों की पड़ताल करते हुए अपने चित्त में अवस्थित शिव शक्ति की अनुमति अनिवार्य होती है तभी अनहद के नाद में मध्य सूक्ष्म आहों की शंख ध्वनि हमारी प्रखर चैतन्यता को जाग्रत करती है और हम टिप टिप पड़ती बूंदों के मध्य प्रेम के पंचामृत का आचमन कर पातें हैं।
सावन का महीना मुक्ति के पांचजन्य शंख में ध्वनि फूंकता है तभी तो इस ध्वनि से जहां अंदर कुछ टूटता है हम  अतीत के आरोग्य के लिए महा मृत्युंजय मंत्र का जाप मन ही मन करने लगते है।मन का पंचाग उसी क्षण सावन की घोषणा कर देता है बाकि काल गणना के लिहाज़ से साल में एक बार सावन आता है जबकि काल से होड़ में लगे कुछ निर्वासित लोगो के बारह महीने के सावन में ही जीतें है।

'सावन में मन'

Saturday, August 1, 2015

चाँद

आसमां के रास्तें एक चांद रोज़ जमीं पर उतरता है। जिसे मै देखता हूं और नरगिस के फूलों की मानिंद उसे छूकर खुशबू को रुह का पता देना चाहता हूं मगर वो बेफिक्र मेरी बेकली देख सिर्फ मुस्कुरा भर देता है। उसकी अधखिली हंसी के नूर से मेरे जिस्म की महीन परत बिखर जाती है उसकी रोशनी में मै खुद को पहले से ज्यादा साफ पाता हूं। दिल के गलियारों में सूफियों की टोली बसती है जो मुझे कलन्दर होने का इल्म अता करना चाहती है मगर उसे अभी मेरे गाफिल होने को लेकर शक ओ सुबहा है।
कभी कभी कायनात भी सब्र का इम्तेहान लेने लगती है चांद के पास तारों की गवाही है इसलिए वो खुद को सिर्फ मेरा होने का समन तामील नही होने देता उसके पास बारिश की बूदों के छोटे छोटे वजीफे है जो उसने बादलों से उधार लिए थे मुझ से रोज़ चांद चंद आवारा मसीहाओं के पते पूछता है और रोज़ अपनी याददाश्त का हवाला देकर बच जाता हूं। मेरे अपने वजूद के डर मुझ पर इस कदर तारी है कि मै ख्यालों की कतरन से किस्सागोई की पंतग उडाता हूं मगर उसकी डोर मेरे हाथ में नही है उसे वफा के कारोबारियों ने मुझसे छीन लिया है। मरासिम के खलीफाओं की बसती का मै अकेला गैर इल्मदार फकीर हूं।
चांद से मै इल्तज़ा की शक्ल में गुजारिश सौपता हूं खुद को खारिज़ करके अपने इश्क और जुनून की गवाही देता हूं मगर वो मेरा हाकिम बनने से मुकर जाता है जबकि उसने तन्हाई की सिसकियों में मेरी माथे पर भरोसे और उम्मीद का बोसा रफू किया था। पता नही मुझमें और चांद में कौन किसका मुरीद है कौन किसका मुर्शिद है। चांद को मुझसे इश्क है यह नही जानता मगर रात के तीसरे पहरें मे जब चांद सबसे अकेला होता है तब उसे मेरी तलब जरुर लगती है तभी तो वो खिडकी से रोशनी की शक्ल में मेरे सिराहने दाखिल होता है उसे पता है उस वक्त मै ख्वाबों में उसी को तलाश रहा हूं।
तमाम इल्म और अदब की पैबन्द के बावजूद मेरे अक्स में रोशनी आरपार दाखिल होती है मेरा वजूद वक्त की नमी से पसरी सीलन की वजह से इतना चुपचाप करवट बदलता है कि खुद मुझे खबर नही होती है। चांद मेरी बर्बादियों का चुस्त तमाशबीन है वो रुह की हरारत की वजह जानता हुआ इल्म के दवाखाने से मेरे लिए शिफा का शरबत नही लाता उसकी ठंडी आहों में तपन है जिसमें मै रोज जलता हूं एकदिन ऐसे ही जलता हुआ चांदनी के बीच कोयले से राख में तब्दील हो जाउंगा।

...अब मैने गुनगुनाना बंद कर दिया है चंदा रे चंदा कभी तो ज़मी पर आ बैठेंगे बातें करेंगे !

©डॉ.अजित

अफ़सोस

अफ़सोस की शक्ल बदरंग होती है। ये न आता हुआ अच्छा लगता है न जाता हुआ। दिल जब धड़कते हुए इतनी आवाज़ करने लगता है कि आपके कान चाहकर भी अनसुना न कर सके तब पता चलता है दिल की बस्ती का आख़िरी पैरोकार भी इलज़ाम की तसदीक करके कहीं आगे निकल गया है। ज़ज्बात गैर जरूरी जाया न हो इस बात का इल्म रखते हुए भी अक्सर गलतफहमियों के शिकारे अपनेपन की झील में डूब जातें हैं। इंसानी वकार का ये कैसा दयार बनता जाता है जहां यकीं रोज़ नई शक्ल इख़्तियार कर लेता है।
ज़बां  नादाँ है ये जेहन की बारिकियों से वाकिफ नही होती है कभी दिल्लगी तो कभी दिल की लगी में ये उन वाकयो का जिक्र करते हुए फिसल जाती है जो जिक्र कभी अफ़साने में भी नही थे।
मुसलल रूप से किसी की निगाहों में अपने भरोसे का मुस्तकबिल तलाशना बेहद थकावट भरा काम है। बेसाख्ता ख्यालों की तुरपाई करते समय महज़ ऊँगली ही नही दिल के नरम गलियारें भी जख्मी हो जातें हैं। लफ्ज़ दर लफ्ज़ मरासिम के रेगिस्तान में तन्हा भटकतें दिल जेहन और जज्बात का कोरस न जाने कौन सी मौसकी छेड़ देता है और फिर कुछ भी सुनना मुनासिब नही लगता है।
दरअसल तुम्हारी निगाह में सिफर हो जाना सदी का सबसे बड़ा हादसा है यह महज एक हादसा ही नही रह जाता है ये खुद के रूह को जिल्लत के हवाले करने जैसा तजरबा देकर जाता है। दानिस्ता या गैर दानिस्ता कुछ लम्हें इस तरह हमारे दरम्यां दीवार की माफिक आकर खड़े हो जाते है कि उनके आरपार न मेरी आवाज़ जा सकती है न मेरी रूह की पाक गुहार तुम तलक पहूँचती है। वक्त कुछ इस तरह की लिखावट में मेरे माथे पर न जी गई तफ़रीह की तकरीरे लिखता है कि तुम्हें मेरा वजूद ही नाकाबिल ए बर्दाश्त हो जाता है।
बहरहाल ताल्लुकात में बहुत ज्यादा तकरीरे लफ्ज़ का वजन कम करती है इसलिए खुद की सफाई में कुछ कहने का वकार मेरे पास नही है। तुम जिस मेयार से मेरे बारें में राय कायम करती चली जाती हो उसकी बुनियाद बहुत गहरी नही है इसलिए मेरी तकलीफ बस इतनी सी है एक मुतमईन से सफर में तुम्हारी किस्सागोई में मेरा वजूद हाशिए पर बचा हुआ है,कहीं ऐसा न हो तल्खियों की आंधी में मेरे वजूद की पाकीजगी तौहीन का सबब बन तेरे दर से हवा हो जाएं इसलिए अपनी तमाम काहिली जाहिली के बावजूद मैं दुआं फूंकता हूँ कि रब तुम्हें इल्म की रोशनी और अदब का काजल अता फरमाए ताकि तुम सही गलत में फर्क कर सको मेरी रिहाई का मुस्तकबिल तुम्हारी मुंसफी में नही तुम्हारी रूहानी मौजूदगी में मुकर्रर हो बस मेरी इतनी सी ही आख़िरी ख्वाहिश है।

© डॉ.अजित

Monday, July 20, 2015

यात्रा

दो लम्हों में बीच सिसकती छोटी सी दूरी अचानक से कई सौ किलोमीटर में तब्दील हो जाती है। यादों के बीहड़ में भटकतें दिल एक बार बागी हो जाए तो फिर उसका विश्वास हर किस्म के तंत्र से स्वत: उठ जाता है अतीत की कोई वाचिक सांत्वना उसे आत्म समपर्ण के लिए प्रेरित नही कर पाती है।
यूं ही अकेलेपन की दहलीज़ पर बैठ बुदबुदाते ख्याल आता है कि दो विपरीत दिशा में खड़ी छाया की प्रतिलिपियां संरक्षित रखना कितना मुश्किल काम हैं। गाहे बगाहे दिन में एक बार कम से कम एकबार मन दूरियों की पैमाईश फांसलों के पैमाने से करने बैठ जाता है।
रात में ठीक सोने से पहले एक ख्याल की गंध बरबस चेहरे पर मुस्कान लाती है तो हम सिकुड़ कर खुद को उस क्षण के हवाले करतें है तभी वक्त की सिलवट हमें करवट बदलनें का हुक्म देती है और हम तकिए से खिसक कर उस दुनिया की गोद में सिर टिका देते है जहां नींद तो आती है मगर न सुकून मिलता है और न मनमुताबिक़ ख्वाब।
कभी कभी याद यूं भी आती है और हमें अकेला छोड़ जाती है दुनियादारी के गणित के बीच जोड़ घटा गुणा भाग और हासिल के बीच हम भूल जातें जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा और उसका एक छोटा सा किस्सा।

Sunday, June 21, 2015

मनडे रागा

किसी की स्मृतियों के स्थगन काल का हिस्सा बन जाना ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक असुरक्षित जगह की नागरिकता के लिए आवदेन करने जैसा अनुभव था। मुद्दतों का सफर किस्तों में ख़तम हुआ मंजिल ने करवट बदली तो रास्तों ने पहचानने से इनकार कर दिया। एक सुबह आप जागतें तो पातें है कल रात सोने से पहलें आप जिस टापू पर अकेले नंगे पाँव टहल रहें थे उसको तो वक्त का समन्दर नील गया है वहां से अब दुर्लभ अनुभवों के संग्राहलय के लिए कुछ दस्तावेज़ मंगाए जा रहें हैं ताकि कम से कम उस जगह के नक्शे को संरक्षित करके रखा जा सके जहां अपनी मर्जी से आने जाने की आजादी सबको नहीं थी मगर जोखिम लेकर आप वहां के गाढ़े पानी में खुद की शक्ल देख सकते थे।
दरअसल बात सिर्फ इतनी सी होती है आप मन के स्तर सतत् प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए स्मृतियों से कुछ पल रोज़ उधार लेतें है और जिस दिन आप कर्जा माफी की उम्मीद में अपनी फटी जेब देखतें है उस दिन आपकी रोशनी का एक हिस्सा स्वत: चला जाता है फिर आप दृष्टि दोष के सहारे अनुमानों में जिंदगी जीतें है स्मृतियों का यह एक बड़ा स्याह पक्ष है।

'मनडे मॉर्निंग रागा'

Tuesday, June 9, 2015

दर ब दर

डेढ़ साल हो गए दिल्ली गए। ऐसा नही है दिल्ली में मेरे तलबगार नही है बस मेरी तलब दिल्ली को लेकर थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। दिल्ली में मेरे एकाध ठिए है जहां सत्संग होता रहा है। कम से कम दो नए दरवाजों की कॉल बेल मुझे बजानी थी मगर मेरी ऊंगलियां माथे का पसीना ही पूंछती रह गई।
कई बार दिल करता है दिल्ली जाऊं मगर ऐन वक्त पर मैं दूसरी बस में बैठ लेता हूँ ये बस मुझे किसी मंजिल तक नही ले जाती आधे रास्ते पर उतार देती है वहां खड़ा हो मैं दिशाशूल का विचार करता हूँ उस वक्त मेरी पीठ दिल्ली की तरफ हो जाती है।
मैं अब लखनऊ जाता हूँ वहां दरीबा कलां में होटल प्रीत के कमरा नम्बर 407 में रुकता हूँ। लखनऊ अदब का शहर है मुझे वहां का पॉलीटेक्निक चौराहा कुछ कुछ भूल भूलैय्या जैसा लगता है मैं नाक की सीध चलता हूँ फिर वहां से राईट ले लेता हूँ पिछले दिनों मैं बापू भवन मॉल एवेन्यू के चक्कर काटता रहा हूँ राजभवन और विधान सभा के बीच में मेरे जूतों नें कुछ चाँद जमीन पर बनाएं है वे सब एक दिन धूल में उड़ जाएंगे इस तरह इस शहर में मेरा आख़िरी कदम खत्म होगा।
दिल्ली दिलवालों का शहर है विक्टर्स की सिटी है दिल्ली में मुझे मेट्रो रेल मेरी बड़ी बहन जैसी लगती है उसके रहतें मैं आश्वस्त हो सकता हूँ कि किसी को तिलकनगर तो किसी को शाहदरा फोन करके बुला लूँगा वो मेरा हाथ थामें अपनें घर तक ले जाएंगे जैसे कोई लम्बी कैद के बाद रिहा होकर अनजान गलियों में भटकना चाहता है ठीक वैसे ही मैं भी एक दिन दिल्ली आना चाहता हूँ मगर कब ये पता नही।

'दर ब दर'

Wednesday, June 3, 2015

तीसरे पहर की बारिश

ये तीसरे पहर की बारिश है। कुछ ग्राम बूंदे तपती धरती पर शगुन के छींटे मारने आई थी। उनके पास आश्वस्ति के पैगाम थे। बादल दरअसल मौसम की चालाकियों में फंस गए है फिर भी वो अपनापन बचाकर रखना चाहतें है इसलिए धीरे धीरे टूट रहें हैं। धरती मौन है उसने थोडी देर के लिए आंखे मूंद ली है। जो बूंदे सबसे पहले धरती पर आई वो इतनी खुश नही थी वो तब आना चाहती थी जब धरती की त्वचा से शिकायत की गर्द उड जाए फिलहाल वो अनमनी इधर उधर गिर कर दम तोड रही है उनकी आंखों में हवा की खुशामद साफ नजर आती है।

तीसरे पहर की बारिश से शाम भी उदास है क्योंकि उसे अब चुपचाप रात के हवाले होना पडेगा आसमान में उडते कुछ परिन्दे दिशाभ्रम का शिकार हो अजनबी पेडों पर आश्रय तलाश रहें है। ये पेड किसी का इंतजार न करने के लिए शापित है इसलिए इन्हें किसी परिन्दे को देखकर रत्तीभर भी खुशी नही हुई है उनकी शाखें थोडी शर्मिन्दा जरुर है।

इस बारिश में कुछ शिकायतों के रंग भी घुले है इसलिए माथा धीरे धीरे ठंडा हो रहा है मगर कान अभी तक गरम है। इस बारिश के लहज़े अजनबी है इसलिए मै कमरें में ही बैठा हूं जब चाहने वाला कोई न हो तब बारिश के खतों की तलाशी लेने का मन नही होता है। बारिश के पास चाहतों के कुछ बैरंग खत है मगर वो उन्हें वापिस अपने साथ ही लेकर जाएगी उसने उनके पतें दिखाने से साफ इंकार कर दिया है।

कमरें की सीलन में बेहद मामूली इजाफा हुआ है। दीवार पर जमी धूल चिपक कर किसी पेंटिंग का आकार लेती है जैसे बिस्तर पर कुछ आडी तिरछी सिलवटें पडी हों मै इस पर थोडा विस्मय से मंत्रमुग्ध होता हूं। खिडकी से बाहर झांकता तो देखता हूं एक बादल के टुकडे के पीछे चांद झांक रहा है वो धरती की गर्दन पर एक स्वास्तिक का निशान बनाना चाहता है मगर बारिश के चलतें धरती के भीगें बालों ने उसका उत्साह कमजोर कर दिया है। वो अपना बचा हुआ आत्मविश्वास खो बैठा है।

ये तीसरे पहर की बारिश है इसलिए मेरा मन तीन हिस्सों में बंट गया है एक मेरे पास है एक तुम्हारे पास है और एक धरती की उदासी पर बारिश की मनुहार देख रहा है। समानांतर रुप से इन तीनों के पास अपने बंटे होने की कुछ पुख्ता वजहें है इसलिए मैने तीनों से बातें करनी बंद कर दी है क्योंकि यदि मै एक बार बातों में लग जाता तो फिर धरती और बारिश के विदा गीत में कोरस न बन पाता है। मेरे पास आश्वस्ति के स्वर नही है धमनियों में ध्वनि का बोध कमजोर है मगर मैं मध्य का एक सुर पकड कर कोरस बन खुद को इस तीसरे पहर की बारिश में शामिल कर रहा हूं। इस पहर की यही मेरी अधिकतम उपलब्धि है।

‘बारिश: तीसरें पहर की

Monday, June 1, 2015

मोशन इमोशन

गर्मी के कारण कल से मोशन लूज़ और इमोशन टाइट हो रखें है दोनों की थकान जीवन को विश्रांति से भर रही है। मैं पलकें मूंदे ध्यानस्थ हूँ तरल गरल के मध्य रेंगते शरीर को देखता हूँ। तन विरेचित होता है और मन अभी भी विषयगत दासता के चलतें गरिष्ठता की तरफ आकर्षित होता है। ताप के सन्ताप के मध्य मन की जलवायु समशीतोष्ण से ऊष्णकटिबंधीय हो चली है। छत पर एक कौआ कांव कांव करता है उसकी शिकायत है कोयल ने उससे सुर छल से छीन लिया है अब उसके पास कर्कश ध्वनि मात्र बची है मैं उसे यथास्थिति में जीने का सूत्र देने चाहता हूँ मगर वो भूख प्यास के कोलाहल के बीच अन्यत्र उड़ जाता है। चारदीवारी में कृत्रिम लू मुझ पर फैंकने वाले पंखें की तरफ मैंने एक बार अनमना होकर देखा तो लगा उसे जमाने भर से इतनी शिकायत है कि उसकी इच्छा कभी कोई नही पूछता दुनिया ने उपयोगितावाद के दर्शन के चलते उसका इतना उपयोग किया है कि वो खुद की गति भूल गया है बिजली से कोई दोस्ती नही है वो बस हवा को काट रहा है शायद मुझे देख उसे इंसान का इंसान से कमतर होना याद आता है इसलिए वो लू से मुझे पकाकर एक मुकम्मल इंसान बनाना चाहता है।
इस कमरें के चारों कोनों में चार छोटे त्रिभुज जितनी जगह खाली है वहां कोई झाड़ू नही पहूंच पाती है वो इन कोनों का खुद का बनाया निषिद्ध क्षेत्र है वो वहां कुछ बदलाव नही चाहते क्योंकि बदलाव का एक अर्थ सम्पादन भी होता है जो नैसर्गिक प्रवाह का मृत्यु गीत लिखता है बड़ी ही महीन लिखावट में।
नंगे पैर जमीन पर रखता हूँ तो तलवों को ठंडक का अहसास होता है ये ठण्ड बाह्य तापमान से प्रभावित नही है बल्कि इस एक स्थाई स्रोत भूगर्भ की नीरव शीतलता है जहां पिछले जन्म में मैनें अपने लिए एक टुकड़ा आरक्षित किया था।
धरती इसी जन्म में उऋण होना चाहती है इसलिए मेरे सपाट तलवों पर चन्दन वन का टीका लगा कहती है मन के ताप से मुझे मत तपाओं हो सके तो अपने पूर्व जन्म के संचित कर्म के बल से शीत स्तम्भित हो जाओं।
और मैं लूज मोशन तथा टाइट इमोशन के मध्य अपने तलवें सिकोड़ता हूँ फिर एड़ी घिसी चप्पल को पहनता हूँ धरती मुझसे नाराज़ नही होती बल्कि मुझे मुआफ़ कर देती है क्योंकि उसे पता है कल आज और कल मैं सोचालय के दर्शन पर टीकाएं कर रहा हूँ मुक्ति को अनुभूत किया जाता है अभिव्यक्त नही इस बात को धरती और इस कमरें से बेहतर कौन जान सकता है भला।

'सोच और मोच,

Thursday, May 14, 2015

गर्मी

गर्मी का मौसम है। लू चल रही है। सर्दी की तरह मन की रुमानियत तलाशता हूं मगर लाख आवाज़ देने पर उसका कोई पता नही चलता है। गर्मी के ये चार महीनें अपनी उपेक्षा से इतने आहत होंगे कि तपाते हुए मुझे भस्म करना चाहेंगे। इन चार महीनों में नही लिख पाउंगा मैं एक भी खत कविता या गज़ल। तापमान के लिहाज़ से मन के ग्लेशियर को पिंघलना चाहिए मगर मेरी केवल देह पर पसीना आता है मन का तापमान वही जनवरी में अटका हुआ है। नही जानता कैसे दिल की कन्द्राओं में जमीं आंसूओं की बर्फ सुरक्षित है।

कभी कभी जी अतिवादी हो जाता है। बंद कमरें में खिडकी पंखा सब बंद करके समाधिस्थ हो बैठ जाता हूं पसीना ललाट से चलकर एडी तक पहूंच जाता है मगर मन की स्याह ठंडी बर्फीली दुनिया पर लेशमात्र भी प्रभाव नही पडता है। देह भीगकर ठंडी हो जाती है गर्मी का अहसास भी लगभग समाप्त हो जाता है फिर भी मन किसी सवाल का जवाब नही देना चाहता है। यह स्थिर प्रज्ञ होने जैसा जरुर प्रतीत होता है मगर वास्तव में यह ऐसा नही है। खुद की तलाशी लेने पर मै इसे कुछ-कुछ द्वन्दात्मक भौतिकवाद के नजदीक पाता हूं। पता नही यह बाहर की गर्मी का असर है या अन्दर की यादों की ठंडक का मगर मै खुद से बहुत दूर निकल आया हूं।

गर्मी के इन चार महीनों के परिवेशीय प्रतिकूलता मुझे विवेक का दास बनाना चाहती है जबकि मै सर्दियों से दिल के सहारे जी रहा हूं और इस तरह जीना मेरे लिए सुखद भले ही न रहा हो मगर मै उस मनस्थिति को ठीक ठीक समझ पाता हूं। फिलहाल मै यह तय नही कर पा रहा हूं कि मै गर्मी के ताप से खुद का चेहरा कैसे साफ करुं।

मुझे पहाड बुला रहें है उन छोटे छोटे रास्तों के खत मुझे मिलें है जहां कभी मैने अपनें जूते के फीते बांधे थे। पहाड की चढाई चढते हुए मैने थकान में यूं ही बेतरतीब ढंग कुछ फूलों पत्तियों को क्रुरता से मसल कर फैंक दिया था उन्होने कहा है कि आ जाओं हमनें तुम्हें नादान समझ माफ कर दिया है अब हम तुम्हारा इंतजार कर रहे है। स्वप्न में मुझे मीठे पानी के छोटे छोटे स्रोत कहते है हम तुम्हारी हथेलियों को चूमना चाहते है तुमने कितनी मासूमियत से अपने हाथ को जोड ओक बना कर हमारा पानी चखा था तुम दिल के बुरे आदमी नही हो इसलिए प्यास के बावजूद विनम्र दिखाई देते हो वो अपना अपना पता मेरी जेब में रखतें है सुबह उठकर देखता हूं तो मुझे मेरी जेब थोडी गीली महसूस होती है।

कुछ पत्थरों ने भी सन्देशे भिजवाएं है कि उनका भार कुछ ग्राम में कम हो गया है वो सूरज़ के ताप के बीच मेरी पीठ की छाया में थोडी देर सोना चाहते है। उनका आग्रह है इसी गर्मी में उन तक मै आ जाऊं क्योंकि अगली गर्मी तक वो अपना स्थान छोड नदी मे कूद आत्महत्या कर लेंगे उनका प्रेम देखकर मैं द्रवित हो जाता हूं।

गर्मी का आना महज ताप का आना नही है गर्मी का आना मेरे लिए सर्दी का जाना और चांद का कमजोर पड जाना है ऐसे में मैं पहाडों से आश्रय मांगता हूं वें मेरे निर्वासन को भली भांति समझते है इसलिए उन्होनें मुझे भौतिक/अभौतिक शरण देना स्वीकार कर लिया है।

तुम वातानूकूलित कक्षों में बैठ लिक्विड डाईट और लेमोनाईड के प्रयोग करते रहना मै इस गर्मी में जीने के लिए पहाड पर जा रहा हूं अब मुझ तक तुम्हें अपनी बात पहूंचानें के लिए दुगनी गति से चिल्लाना पडेगा खैर इसमें तो तुम माहिर भी हो। मै ऊपर से तुम्हारे माथे का पसीना देख केवल मुस्कुरा दिया करुंगा मेरी हंसी तुम बादलों के गडगडाहट मे सुन सकोगी और हां कभी बेमौसमी बारिश आ जाए तो समझ लेना यहां मैनें तुम्हें याद किया है याद करके रोया हूं इस बात पर तो तुम खैर यकीन करनें से रही।

‘इस गर्मी

Wednesday, May 13, 2015

बेमौसमी बारिश

बेमौसमी बारिश है।तुम्हारे हाथ की चाय पीने का मन है। तेज़ हवाएं बारिश के साथ आईस-पाईस खेल रही है। बादलों की अफवाह का असर सीधा दिल पर हो रहा है। बारिश ने जो तुम्हारें खत पहूंचाए है उनकों पढनें के लिए मैनें पहले बूंदों के हवाले कर दिया है तुम्हारी बेरुखी की स्याही थोडी नमी सोख कर बह रही है मै उसे छू कर अपनी अनामिका से लिफाफे पर स्वास्तिक बनाता हूं इसके बाद तुम्हारें तमाम उलाहनें भी पवित्र दिखने लगें है।
मेरे माथे पर नमी है दिल में खुश्की और आंखों मे तरावट कोई देखे तो साफ अनुमान लगा सकता है कि मै किसी की याद में हूं। मै बारिश को देखता हूं और हवा के कान में मंत्र फूंकता हूं मै चाहता हूं बारिश तब तक न थमें जब तुम तुम्हारे मन के गीले होने की खबर बादल मुझ तक न पहूंचा दें।
अभी सोचा चाय और बारिश दो अजीब से बहानें है जिनके जरिए तुम्हारें आंगन में मै गाहे बगाहे दाखिल होता रहता हूं जबकि आजतक न वक्त पर चाय मिली है और न बारिश। आज की बारिश में तुम्हारे गीले तौलिए की कसम खाकर कह सकता हूं मै बूंदों के बीच खडा जरुर हूं मगर भीग नही रहा हूं। मै केवल कुछ बातें सोच रहा हूं बारिश मे भीगनें के लिए थोडा लापरवाह होना पडता है सोचकर केवल हंसा जा सकता है क्योंकि रोने की भी अकसर कोई वजह नही होती है। मेरे पास भींगने की तमाम वजह है और बारिश से बचकर अन्दर कमरें में दाखिल होने की एक भी वजह मेरे पास नही है क्योंकि वहां चाय के साथ तुम मेरी प्रतीक्षा में नही हो। तुम फिलहाल कहां पर हो यह बात मुझे बारिश बादल हवा बूंद किसी ने भी नही बताया है।
कुछ बूंदे मेरी त्वचा के तापमान से आहत है उन्हें मेरे मनुष्य होने पर सन्देह है वो आपस में गुपचुप ढंग से बात करती है और बादलों पर ताने कसती है कि उन्हें मैदान में भी पहाड पर क्यों पटक दिया है। ठंडी हवा मेरे कान के सबसे निचले हिस्से को मन्दिर की घंटी की तरह हिलाती है मगर वहां से कोई ध्वनि नही निकलती है हवा को मेरे कान के समाधिस्थ होने पर सन्देह है इसलिए वो बार बार तुम्हारा नाम लेती है ताकि मेरी तन्द्रा टूट सके।
बारिश का गीलापन मन के गलियारें में आकर एक छोटी नदी बन जाता है फिर यह नदी आंसूओं का एक न्यूनतम जलस्तर को बनाए रखनें में मदद करती है मगर इतनी तरलता के बावजूद भी मन की बंद गलियों से बाहर निकलनें के लिए आंसूओं को रास्ता नही मिलता है वो अन्दर ही मेरे लिए पर्याप्त नमी का इंतजाम करते करते सूख जाते है मेरा हृदय इसलिए भी सबसे खारा है यह राज़ आज तुम्हें बारिश के बहाने से बता देता हूं।
बारिश आई है मेरे मन का पंचाग इसकी वजह के लिए ग्रहों,नक्षत्रों की गणना करते हुए तुमसे दूरी की प्रकाशवर्ष में कालगणना में लग गया है मगर एक बडी बात है मेरे पास न दशमलव है और न मेरे पास शून्य है ये दोनों अंक तुमने मुझसे कभी उधार लिए थे मगर आज तक नही लौटाए है इसलिए मेरा अनुमान अक्सर गलत सिद्ध हो जाता है और तुमसें दूरी घटती बढती जाती है।
फिलहाल, बस इतना ही निवेदन करुंगा अगली मौसमी बारिश से पहले मुझे मेरा दशमलव और शून्य लौटा देना ताकि किसी बेमौसमी बारिश में तुम्हारी भौतिक दूरी का सही से आंकलन करके मैं कुछ सही भविष्यवाणी कर सकूं।
बाहर की बारिश थम गई है मगर अन्दर एक झडी लगा गई है वो कब थमेगी कह नही सकता हूं मेरे कान थोडें ठंडे हो गए है और हथेलियां गर्म तुम्हारे हाथ की चाय तो अब मिलने से रही इसलिए खुद ही जा रहा हूं एक कप चाय बनानें ताकि घूंट घूंट तुम्हें याद करता हुआ भूल सकूं।


‘बेमौसमी बारिश'

Monday, May 11, 2015

बातें

बहुत दिनों से तुमसे कुछ बातें करना चाहता हूं। ये कोई खास बातें नही है ये बेहद मामूली बातें है मसलन तुम्हारे स्लीपर का नम्बर क्या है? क्या तुम अब भी दस्तखत के नीचें छोटी लाईन खींच कर दो बिन्दू लगाती हो?तुम दाल से कंकर बीनते समय कौन सा गाना गुनगुनाती हो? तुम्हारे पर्स में क्या अब भी छोटी इलायची मिला करती है तुमनें चश्में का नम्बर लास्ट टाईम कब चैक करवाया था हंसते हंसते अचानक से तुम्हारी आंखों मे नमी क्यों उतर आती है वगैरह वगैरह। दरअसल ये बातें भी नही है ये तो कुछ अजीब से सवाल है जिन्हें सुनकर तुम अचरज़ से भर सकती हो या फिर खिलखिला कर हंस सकती हो। जब जब मै जिन्दगी के गणित मे उलझ जाता हूं सही-गलत नैतिक-अनैतिक सच-झूठ के अनुपात का आंकलन करनें में खुद को असमर्थ पाता हूं तब तब मुझे ख्याल आता है कि तुमसे फोन करके पूछूं कि तुम कपडें धोने के बाद कैसे नील और टिनोपाल का एकदम सही अनुपात रख लेती है ऐसे और भी छोटे छोटे सूत्र है जो मैं तुमसें सिखाना चाहता हूं।
मेरे पास इतने सवाल बचे है कि जवाब देते हुए तुम्हारी सारी उम्र कट जाएगी। इन सवालों के सबसे सही जवाब केवल और केवल तुम्हारे ही पास है इसलिए मै सवाल जोडता जा रहा हूं। ये सवाल मेरे लिए एक किस्म की पूंजी है जिनको मै समय आने पर खर्च करुंगा। कुछ सवाल मैने इसलिए भी बचाकर रख लिए है जब तुम लगभग मुझे भूलने वाली होगी या फिर मेरी किसी बात से बेहद आहत होंगी ठीक उस दिन मै एक सवाल तुम्हारी तरफ उछाल दूंगा और ये मेरा आत्मविश्वास है कि चरम नाराज़गी में भी तुम मेरे सवाल पर मुस्कुराए बिना न रह सकोगी।
ऐसा नही है मेरे पास सवालों की शक्ल में केवल बचकानी बातें है या कुछ अपरिपक्व किस्म की जिज्ञासाएं है मेरे पास इन सवालों के जरिए तुमसे वक्त बेवक्त बात करनें का एक विशेषाधिकार है यह विशेषाधिकार मैने कभी तुम्हारें सवालों के जवाब देकर कभी मौन रहकर तो कभी कुछ बातों को अनसुना करके अर्जित किया है।
दरअसल प्रतिदिन की बातों शिकवों शिकायतों और चाहतों के जरिए खर्च होती जिन्दगी में मै कुछ न कुछ बचाता आया हूं मेरे कहे गए के बीच हमेशा कुछ दशमलव में अनकहा बचता रहा है। इसी अनकहें की चिल्लर मेरी जेब में खुशी के साथ खनकती रहती है जब भी लगता है कि तुम्हें खोने वाला हूं मै एक ऐसी ही अनकही बात का सिक्का निकाल कर उसे टॉस के लिए हवा में उछाल देता हूं जिन्दगी की तमाम हार के बावजूद आज तक मै यह टॉस कभी नही हारा इसलिए कम से कम तुम्हारे बारें में कभी हारनें की नही सोचता हूं।
चलों ! एक शाम कुछ ऐसी ही अनकही बातों से रोशन करते है हो सकता है तुम्हारे पास भी कुछ ऐसे बेहद मामूली किस्म के सवाल हो मेरे जवाब तुम्हें संतुष्ट भले ही न कर पाएं मगर तुम उन्हें सुनकर खुशी जरुर महसूस करोगी मुझे ऐसा लगता है। मेरे सवालों का आदतन कोई निहितार्थ मत निकालनें लगना बस मै इतना ही निवेदन करना चाहता हूं क्योंकि मेरा कोई सवाल तुम्हारे विश्लेषण की उपज नही है तुम्हें आज तक मैनें बुद्धि और विश्लेषण के नजदीक नही जानें दिया है तुम्हारे लिए दिल और दिमाग के मध्य एक निर्जन टापू पर एक जगह सुरक्षित की है मैनें तुमसे बतियाने के लिए।उससे बढिया जगह मेरे अस्तित्व में नही है वहां अनुभूतियों घना जंगल है प्रेम के छोटे तटबंध वाली मीठी नदी है अपनत्व का झरना है और अपेक्षाओं से रहित एक खुला आसमान है मै चाहता हूं हम जब भी मिलें उसी जगह पर मिलें वो जगह ग्रह नक्षत्रों के सौभाग्य या दुर्भाग्य के प्रभाव से मुक्त है इसलिए भी वहां तुम्हें देखकर मै एक गहरी आश्वस्ति से भरा हुआ रह सकता हूं।
ये सब बातें केवल सवाल की शक्ल में नही है मेरे पास तुम्हारी कुछ बातों के जवाब भी है जवाब क्या मेरे पास कुछ कथन है कुछ कुछ उक्ति के जैसे जिन्हें तुम्हें सौप कर मै सन्दर्भ की कन्द्रा में सुरक्षित आराम करना चाहता हूं। मुझे उम्मीद है एकदिन हम अपनी अपनी बातें अपने अपने सवाल और कुछ थोडे से जवाब लेकर जरुर उस एकांत के टीले पर मिलेंगे इसी उम्मीद के सहारें मै अक्सर तुम से बतकही करता रहता हूं मै जितना लिखता बोलता हूं तुम्हारें बारें में वह उसका दशमांश भी नही है जितना सोचता और जीता आया हूं तुम और तुम्हारी बातों को। तुम्हें यह सब जानकर ठीक उतना आश्चर्य हो रहा होगा जितना एक जीबी के डेटा रिचार्ज़ में दो जीबी डाटा मिलनें पर हुआ था तुम यह सोच सकती हो कि मै इतना बोलने वाला लगता तो नही हूं मगर जिन्दगी अक्सर न लगने के सहारे ही आगे बढती है हमें जो जैसा लगता है वो वैसा होता है कब है। ये भी एक अधूरी बात है इसे मिलनें पर पूरी करुंगा हो सके तो मेरा इंतजार करना।

‘बातें-मुलाकातें

Monday, May 4, 2015

फेसबुक

दिखतें है जो सब जमें जमाए लोग
फेसबुक से है वो उकताए हुए लोग

लाइक पे हो जाते है खुश ओ'खफा
इसी पर अपने और पराए  हुए लोग

इनबॉक्स खाली है कमेंट भी हुए बंद
म्यूच्यूअल दोस्तों के है सताए हुए लोग

अपनी रिक्वेस्ट हुई एक्सेप्ट महीनों में
तन्हा मिलें सब मज़मा लगाए हुए लोग

गोया क्लिक न हुई तकदीर हो हमारी
दोस्तों को थे फॉलोवर बनाए हुए लोग

© डॉ. अजीत

Friday, May 1, 2015

शब्दों का सफर

मेरे पास शब्दों की कुल जमापूंजी इतनी थी जिससे मैं तुम्हारी कुछ पल की मुस्कान खरीद सकता था। मगर मैं अक्सर कुछ शब्द इसलिए भी बचा लेता था ताकि कभी तुम्हें तुम्हारें बारें में वो बात बता सकूं जो तुम खुद भी नही जानती हो। मन के भंवर में घूमते ये शब्द अक्सर आपस में इतने उलझ जाते थे कि मै यह तय नही कर पाता था कि इन्हें एक वाक्य में कैसे प्रयोग करुं।
निंदा और प्रशंसा से इतर ये शब्द मैने मन की उन दशाओं को बतानें के लिए बचाकर रखे थे जिनको व्यक्त करनें के लिए अक्सर भाव भी पीठ फेर लेते है। एक एक अक्षर को मैनें इस बात के लिए दीक्षित किया कि मेरी किसी बात से कला का अपमान या दुरुपयोग नही होना चाहिए तुम्हारे बारें इंच दर इंच ठीक वही बातें मैं कह सकूं जैसा मै महसूसता हूं मेरी अधिकतम तैयारी बस इतनी ही थी। इन शब्दों की वाग्मिता में भरम के फेर नही बल्कि ब्रह्म सी सच्चाई बची रहे इसके लिए मैंने इन्हें अपने अपमान के वटवृक्ष की छाया और आत्मीयता की नदी किनारें पाला है।
सुनो! कल रात मुझे अपनी कुछ किताबों के बीच तुम्हारी टूटी हुई चूडी का एक टुकडा मिला। उसका रंग मै फिलहाल भूल रहा हूं मगर उसकी खुशबू मुझे अभी तक याद है। उसके आर पार देखनें की कोशिस की तो चश्मा उतारना पडा और नंगी आंखों से मै तुम्हारी कलाई के वो महीन रोम देख पाया जिनके चित्र चूडी के एक इस टूकडें ने खींच कर कैद कर लिए थे। दो सोने के कंगनों के बीच जीते हुए यह जान पाया था सीमाओं के बीच जीने का बोझ। एक तरफ यह खुद को सुरक्षित महसूस करता था तो दूसरी तरह यह रहा है रात दिन बेहद बैचेन भी। और अंत: इसकी यही बैचेनी इसे तोड गई है। जानता हूं जब तुमसे यह बात कहूंगा तो तुम कहोगी एक निर्जीव चीज़ से यह सब कैसे पता चला तुम्हें? मै जवाब देने के लिए शब्दों को आवाज़ दूंगा तो वो तुम्हारी सन्देह भरी दृष्टि देख बाहर आने से इनकार कर देंगे।फिर भी मै इतना जरुर कह सकता हूं जब तुम्हारे इस चूडी के टुकडे को मै नंगी आंख से देख रहा था तभी यह छू गया था मेरी एक गाल से इसकी अधूरेपन की ठंडक नें ये सब राज़ मेरी गाल से कहा था जिसे कान के रास्तें मेरे दिल ने सुन लिया था। यकीन करो न करो तुम्हारी मर्जी।
आज सुबह मै सोचता रहा तुम्हारे बारें में और सोचता क्या रहा मैने देखा तुम्हारे मन और देह के इतर भी कुछ तुमसे जुडी हुई चीज़े ऐसी है जो तुम्हारें बारें मे जानती बेहद अनकहा भी। मैने जमापूंजी वाले शब्दों से कहा जरा बात करके तो देखों मगर वो उपयुक्त अवसर न होने की दुहाई देकर हमेशा की तरह चले गए नेपथ्य में। एक दिन तुम्हारा एक खत मिला उस पर तुम्हारा पता लिखा था मगर नाम किसी और का था मैने स्याही को सूंघ कर देखा तो कुछ अनुमान न मिला मगर दो वाक्यों के बीच मुझे तुम्हारी जानी पहचानी खुशबू आई दिमाग पर थोडा जोर देकर सोचा तो यह खुशबू तुम्हारी कलाई पर बंधे शुभता के धागे की थी जो रोज़ भीग भीग कर अपनी खुशबू को रुपांतरित करता चला रहा था यह खत उसके गंधहीन होने से ठीक पहले का था इसलिए मुझे खत पर तारीख देने की जरुरत महसूस नही हुई। खत को बिना पढे मैने रख लिया मगर लिखावट पर जमी स्पर्शो की नमी को जरुर अपनी पलकों से छुआ है एक बार यह किसी को याद करके भावुक होने से बचने का एक टोटका रहा है मेरा।

फिलहाल बातें बहुत सी है मगर आदतन जमापूंजी के शब्द साथ नही दे रहें इसलिए शेष फिर कभी।

‘शब्दों का सफर'