Sunday, June 21, 2015

मनडे रागा

किसी की स्मृतियों के स्थगन काल का हिस्सा बन जाना ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक असुरक्षित जगह की नागरिकता के लिए आवदेन करने जैसा अनुभव था। मुद्दतों का सफर किस्तों में ख़तम हुआ मंजिल ने करवट बदली तो रास्तों ने पहचानने से इनकार कर दिया। एक सुबह आप जागतें तो पातें है कल रात सोने से पहलें आप जिस टापू पर अकेले नंगे पाँव टहल रहें थे उसको तो वक्त का समन्दर नील गया है वहां से अब दुर्लभ अनुभवों के संग्राहलय के लिए कुछ दस्तावेज़ मंगाए जा रहें हैं ताकि कम से कम उस जगह के नक्शे को संरक्षित करके रखा जा सके जहां अपनी मर्जी से आने जाने की आजादी सबको नहीं थी मगर जोखिम लेकर आप वहां के गाढ़े पानी में खुद की शक्ल देख सकते थे।
दरअसल बात सिर्फ इतनी सी होती है आप मन के स्तर सतत् प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए स्मृतियों से कुछ पल रोज़ उधार लेतें है और जिस दिन आप कर्जा माफी की उम्मीद में अपनी फटी जेब देखतें है उस दिन आपकी रोशनी का एक हिस्सा स्वत: चला जाता है फिर आप दृष्टि दोष के सहारे अनुमानों में जिंदगी जीतें है स्मृतियों का यह एक बड़ा स्याह पक्ष है।

'मनडे मॉर्निंग रागा'

Tuesday, June 9, 2015

दर ब दर

डेढ़ साल हो गए दिल्ली गए। ऐसा नही है दिल्ली में मेरे तलबगार नही है बस मेरी तलब दिल्ली को लेकर थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। दिल्ली में मेरे एकाध ठिए है जहां सत्संग होता रहा है। कम से कम दो नए दरवाजों की कॉल बेल मुझे बजानी थी मगर मेरी ऊंगलियां माथे का पसीना ही पूंछती रह गई।
कई बार दिल करता है दिल्ली जाऊं मगर ऐन वक्त पर मैं दूसरी बस में बैठ लेता हूँ ये बस मुझे किसी मंजिल तक नही ले जाती आधे रास्ते पर उतार देती है वहां खड़ा हो मैं दिशाशूल का विचार करता हूँ उस वक्त मेरी पीठ दिल्ली की तरफ हो जाती है।
मैं अब लखनऊ जाता हूँ वहां दरीबा कलां में होटल प्रीत के कमरा नम्बर 407 में रुकता हूँ। लखनऊ अदब का शहर है मुझे वहां का पॉलीटेक्निक चौराहा कुछ कुछ भूल भूलैय्या जैसा लगता है मैं नाक की सीध चलता हूँ फिर वहां से राईट ले लेता हूँ पिछले दिनों मैं बापू भवन मॉल एवेन्यू के चक्कर काटता रहा हूँ राजभवन और विधान सभा के बीच में मेरे जूतों नें कुछ चाँद जमीन पर बनाएं है वे सब एक दिन धूल में उड़ जाएंगे इस तरह इस शहर में मेरा आख़िरी कदम खत्म होगा।
दिल्ली दिलवालों का शहर है विक्टर्स की सिटी है दिल्ली में मुझे मेट्रो रेल मेरी बड़ी बहन जैसी लगती है उसके रहतें मैं आश्वस्त हो सकता हूँ कि किसी को तिलकनगर तो किसी को शाहदरा फोन करके बुला लूँगा वो मेरा हाथ थामें अपनें घर तक ले जाएंगे जैसे कोई लम्बी कैद के बाद रिहा होकर अनजान गलियों में भटकना चाहता है ठीक वैसे ही मैं भी एक दिन दिल्ली आना चाहता हूँ मगर कब ये पता नही।

'दर ब दर'

Wednesday, June 3, 2015

तीसरे पहर की बारिश

ये तीसरे पहर की बारिश है। कुछ ग्राम बूंदे तपती धरती पर शगुन के छींटे मारने आई थी। उनके पास आश्वस्ति के पैगाम थे। बादल दरअसल मौसम की चालाकियों में फंस गए है फिर भी वो अपनापन बचाकर रखना चाहतें है इसलिए धीरे धीरे टूट रहें हैं। धरती मौन है उसने थोडी देर के लिए आंखे मूंद ली है। जो बूंदे सबसे पहले धरती पर आई वो इतनी खुश नही थी वो तब आना चाहती थी जब धरती की त्वचा से शिकायत की गर्द उड जाए फिलहाल वो अनमनी इधर उधर गिर कर दम तोड रही है उनकी आंखों में हवा की खुशामद साफ नजर आती है।

तीसरे पहर की बारिश से शाम भी उदास है क्योंकि उसे अब चुपचाप रात के हवाले होना पडेगा आसमान में उडते कुछ परिन्दे दिशाभ्रम का शिकार हो अजनबी पेडों पर आश्रय तलाश रहें है। ये पेड किसी का इंतजार न करने के लिए शापित है इसलिए इन्हें किसी परिन्दे को देखकर रत्तीभर भी खुशी नही हुई है उनकी शाखें थोडी शर्मिन्दा जरुर है।

इस बारिश में कुछ शिकायतों के रंग भी घुले है इसलिए माथा धीरे धीरे ठंडा हो रहा है मगर कान अभी तक गरम है। इस बारिश के लहज़े अजनबी है इसलिए मै कमरें में ही बैठा हूं जब चाहने वाला कोई न हो तब बारिश के खतों की तलाशी लेने का मन नही होता है। बारिश के पास चाहतों के कुछ बैरंग खत है मगर वो उन्हें वापिस अपने साथ ही लेकर जाएगी उसने उनके पतें दिखाने से साफ इंकार कर दिया है।

कमरें की सीलन में बेहद मामूली इजाफा हुआ है। दीवार पर जमी धूल चिपक कर किसी पेंटिंग का आकार लेती है जैसे बिस्तर पर कुछ आडी तिरछी सिलवटें पडी हों मै इस पर थोडा विस्मय से मंत्रमुग्ध होता हूं। खिडकी से बाहर झांकता तो देखता हूं एक बादल के टुकडे के पीछे चांद झांक रहा है वो धरती की गर्दन पर एक स्वास्तिक का निशान बनाना चाहता है मगर बारिश के चलतें धरती के भीगें बालों ने उसका उत्साह कमजोर कर दिया है। वो अपना बचा हुआ आत्मविश्वास खो बैठा है।

ये तीसरे पहर की बारिश है इसलिए मेरा मन तीन हिस्सों में बंट गया है एक मेरे पास है एक तुम्हारे पास है और एक धरती की उदासी पर बारिश की मनुहार देख रहा है। समानांतर रुप से इन तीनों के पास अपने बंटे होने की कुछ पुख्ता वजहें है इसलिए मैने तीनों से बातें करनी बंद कर दी है क्योंकि यदि मै एक बार बातों में लग जाता तो फिर धरती और बारिश के विदा गीत में कोरस न बन पाता है। मेरे पास आश्वस्ति के स्वर नही है धमनियों में ध्वनि का बोध कमजोर है मगर मैं मध्य का एक सुर पकड कर कोरस बन खुद को इस तीसरे पहर की बारिश में शामिल कर रहा हूं। इस पहर की यही मेरी अधिकतम उपलब्धि है।

‘बारिश: तीसरें पहर की

Monday, June 1, 2015

मोशन इमोशन

गर्मी के कारण कल से मोशन लूज़ और इमोशन टाइट हो रखें है दोनों की थकान जीवन को विश्रांति से भर रही है। मैं पलकें मूंदे ध्यानस्थ हूँ तरल गरल के मध्य रेंगते शरीर को देखता हूँ। तन विरेचित होता है और मन अभी भी विषयगत दासता के चलतें गरिष्ठता की तरफ आकर्षित होता है। ताप के सन्ताप के मध्य मन की जलवायु समशीतोष्ण से ऊष्णकटिबंधीय हो चली है। छत पर एक कौआ कांव कांव करता है उसकी शिकायत है कोयल ने उससे सुर छल से छीन लिया है अब उसके पास कर्कश ध्वनि मात्र बची है मैं उसे यथास्थिति में जीने का सूत्र देने चाहता हूँ मगर वो भूख प्यास के कोलाहल के बीच अन्यत्र उड़ जाता है। चारदीवारी में कृत्रिम लू मुझ पर फैंकने वाले पंखें की तरफ मैंने एक बार अनमना होकर देखा तो लगा उसे जमाने भर से इतनी शिकायत है कि उसकी इच्छा कभी कोई नही पूछता दुनिया ने उपयोगितावाद के दर्शन के चलते उसका इतना उपयोग किया है कि वो खुद की गति भूल गया है बिजली से कोई दोस्ती नही है वो बस हवा को काट रहा है शायद मुझे देख उसे इंसान का इंसान से कमतर होना याद आता है इसलिए वो लू से मुझे पकाकर एक मुकम्मल इंसान बनाना चाहता है।
इस कमरें के चारों कोनों में चार छोटे त्रिभुज जितनी जगह खाली है वहां कोई झाड़ू नही पहूंच पाती है वो इन कोनों का खुद का बनाया निषिद्ध क्षेत्र है वो वहां कुछ बदलाव नही चाहते क्योंकि बदलाव का एक अर्थ सम्पादन भी होता है जो नैसर्गिक प्रवाह का मृत्यु गीत लिखता है बड़ी ही महीन लिखावट में।
नंगे पैर जमीन पर रखता हूँ तो तलवों को ठंडक का अहसास होता है ये ठण्ड बाह्य तापमान से प्रभावित नही है बल्कि इस एक स्थाई स्रोत भूगर्भ की नीरव शीतलता है जहां पिछले जन्म में मैनें अपने लिए एक टुकड़ा आरक्षित किया था।
धरती इसी जन्म में उऋण होना चाहती है इसलिए मेरे सपाट तलवों पर चन्दन वन का टीका लगा कहती है मन के ताप से मुझे मत तपाओं हो सके तो अपने पूर्व जन्म के संचित कर्म के बल से शीत स्तम्भित हो जाओं।
और मैं लूज मोशन तथा टाइट इमोशन के मध्य अपने तलवें सिकोड़ता हूँ फिर एड़ी घिसी चप्पल को पहनता हूँ धरती मुझसे नाराज़ नही होती बल्कि मुझे मुआफ़ कर देती है क्योंकि उसे पता है कल आज और कल मैं सोचालय के दर्शन पर टीकाएं कर रहा हूँ मुक्ति को अनुभूत किया जाता है अभिव्यक्त नही इस बात को धरती और इस कमरें से बेहतर कौन जान सकता है भला।

'सोच और मोच,

Thursday, May 14, 2015

गर्मी

गर्मी का मौसम है। लू चल रही है। सर्दी की तरह मन की रुमानियत तलाशता हूं मगर लाख आवाज़ देने पर उसका कोई पता नही चलता है। गर्मी के ये चार महीनें अपनी उपेक्षा से इतने आहत होंगे कि तपाते हुए मुझे भस्म करना चाहेंगे। इन चार महीनों में नही लिख पाउंगा मैं एक भी खत कविता या गज़ल। तापमान के लिहाज़ से मन के ग्लेशियर को पिंघलना चाहिए मगर मेरी केवल देह पर पसीना आता है मन का तापमान वही जनवरी में अटका हुआ है। नही जानता कैसे दिल की कन्द्राओं में जमीं आंसूओं की बर्फ सुरक्षित है।

कभी कभी जी अतिवादी हो जाता है। बंद कमरें में खिडकी पंखा सब बंद करके समाधिस्थ हो बैठ जाता हूं पसीना ललाट से चलकर एडी तक पहूंच जाता है मगर मन की स्याह ठंडी बर्फीली दुनिया पर लेशमात्र भी प्रभाव नही पडता है। देह भीगकर ठंडी हो जाती है गर्मी का अहसास भी लगभग समाप्त हो जाता है फिर भी मन किसी सवाल का जवाब नही देना चाहता है। यह स्थिर प्रज्ञ होने जैसा जरुर प्रतीत होता है मगर वास्तव में यह ऐसा नही है। खुद की तलाशी लेने पर मै इसे कुछ-कुछ द्वन्दात्मक भौतिकवाद के नजदीक पाता हूं। पता नही यह बाहर की गर्मी का असर है या अन्दर की यादों की ठंडक का मगर मै खुद से बहुत दूर निकल आया हूं।

गर्मी के इन चार महीनों के परिवेशीय प्रतिकूलता मुझे विवेक का दास बनाना चाहती है जबकि मै सर्दियों से दिल के सहारे जी रहा हूं और इस तरह जीना मेरे लिए सुखद भले ही न रहा हो मगर मै उस मनस्थिति को ठीक ठीक समझ पाता हूं। फिलहाल मै यह तय नही कर पा रहा हूं कि मै गर्मी के ताप से खुद का चेहरा कैसे साफ करुं।

मुझे पहाड बुला रहें है उन छोटे छोटे रास्तों के खत मुझे मिलें है जहां कभी मैने अपनें जूते के फीते बांधे थे। पहाड की चढाई चढते हुए मैने थकान में यूं ही बेतरतीब ढंग कुछ फूलों पत्तियों को क्रुरता से मसल कर फैंक दिया था उन्होने कहा है कि आ जाओं हमनें तुम्हें नादान समझ माफ कर दिया है अब हम तुम्हारा इंतजार कर रहे है। स्वप्न में मुझे मीठे पानी के छोटे छोटे स्रोत कहते है हम तुम्हारी हथेलियों को चूमना चाहते है तुमने कितनी मासूमियत से अपने हाथ को जोड ओक बना कर हमारा पानी चखा था तुम दिल के बुरे आदमी नही हो इसलिए प्यास के बावजूद विनम्र दिखाई देते हो वो अपना अपना पता मेरी जेब में रखतें है सुबह उठकर देखता हूं तो मुझे मेरी जेब थोडी गीली महसूस होती है।

कुछ पत्थरों ने भी सन्देशे भिजवाएं है कि उनका भार कुछ ग्राम में कम हो गया है वो सूरज़ के ताप के बीच मेरी पीठ की छाया में थोडी देर सोना चाहते है। उनका आग्रह है इसी गर्मी में उन तक मै आ जाऊं क्योंकि अगली गर्मी तक वो अपना स्थान छोड नदी मे कूद आत्महत्या कर लेंगे उनका प्रेम देखकर मैं द्रवित हो जाता हूं।

गर्मी का आना महज ताप का आना नही है गर्मी का आना मेरे लिए सर्दी का जाना और चांद का कमजोर पड जाना है ऐसे में मैं पहाडों से आश्रय मांगता हूं वें मेरे निर्वासन को भली भांति समझते है इसलिए उन्होनें मुझे भौतिक/अभौतिक शरण देना स्वीकार कर लिया है।

तुम वातानूकूलित कक्षों में बैठ लिक्विड डाईट और लेमोनाईड के प्रयोग करते रहना मै इस गर्मी में जीने के लिए पहाड पर जा रहा हूं अब मुझ तक तुम्हें अपनी बात पहूंचानें के लिए दुगनी गति से चिल्लाना पडेगा खैर इसमें तो तुम माहिर भी हो। मै ऊपर से तुम्हारे माथे का पसीना देख केवल मुस्कुरा दिया करुंगा मेरी हंसी तुम बादलों के गडगडाहट मे सुन सकोगी और हां कभी बेमौसमी बारिश आ जाए तो समझ लेना यहां मैनें तुम्हें याद किया है याद करके रोया हूं इस बात पर तो तुम खैर यकीन करनें से रही।

‘इस गर्मी

Wednesday, May 13, 2015

बेमौसमी बारिश

बेमौसमी बारिश है।तुम्हारे हाथ की चाय पीने का मन है। तेज़ हवाएं बारिश के साथ आईस-पाईस खेल रही है। बादलों की अफवाह का असर सीधा दिल पर हो रहा है। बारिश ने जो तुम्हारें खत पहूंचाए है उनकों पढनें के लिए मैनें पहले बूंदों के हवाले कर दिया है तुम्हारी बेरुखी की स्याही थोडी नमी सोख कर बह रही है मै उसे छू कर अपनी अनामिका से लिफाफे पर स्वास्तिक बनाता हूं इसके बाद तुम्हारें तमाम उलाहनें भी पवित्र दिखने लगें है।
मेरे माथे पर नमी है दिल में खुश्की और आंखों मे तरावट कोई देखे तो साफ अनुमान लगा सकता है कि मै किसी की याद में हूं। मै बारिश को देखता हूं और हवा के कान में मंत्र फूंकता हूं मै चाहता हूं बारिश तब तक न थमें जब तुम तुम्हारे मन के गीले होने की खबर बादल मुझ तक न पहूंचा दें।
अभी सोचा चाय और बारिश दो अजीब से बहानें है जिनके जरिए तुम्हारें आंगन में मै गाहे बगाहे दाखिल होता रहता हूं जबकि आजतक न वक्त पर चाय मिली है और न बारिश। आज की बारिश में तुम्हारे गीले तौलिए की कसम खाकर कह सकता हूं मै बूंदों के बीच खडा जरुर हूं मगर भीग नही रहा हूं। मै केवल कुछ बातें सोच रहा हूं बारिश मे भीगनें के लिए थोडा लापरवाह होना पडता है सोचकर केवल हंसा जा सकता है क्योंकि रोने की भी अकसर कोई वजह नही होती है। मेरे पास भींगने की तमाम वजह है और बारिश से बचकर अन्दर कमरें में दाखिल होने की एक भी वजह मेरे पास नही है क्योंकि वहां चाय के साथ तुम मेरी प्रतीक्षा में नही हो। तुम फिलहाल कहां पर हो यह बात मुझे बारिश बादल हवा बूंद किसी ने भी नही बताया है।
कुछ बूंदे मेरी त्वचा के तापमान से आहत है उन्हें मेरे मनुष्य होने पर सन्देह है वो आपस में गुपचुप ढंग से बात करती है और बादलों पर ताने कसती है कि उन्हें मैदान में भी पहाड पर क्यों पटक दिया है। ठंडी हवा मेरे कान के सबसे निचले हिस्से को मन्दिर की घंटी की तरह हिलाती है मगर वहां से कोई ध्वनि नही निकलती है हवा को मेरे कान के समाधिस्थ होने पर सन्देह है इसलिए वो बार बार तुम्हारा नाम लेती है ताकि मेरी तन्द्रा टूट सके।
बारिश का गीलापन मन के गलियारें में आकर एक छोटी नदी बन जाता है फिर यह नदी आंसूओं का एक न्यूनतम जलस्तर को बनाए रखनें में मदद करती है मगर इतनी तरलता के बावजूद भी मन की बंद गलियों से बाहर निकलनें के लिए आंसूओं को रास्ता नही मिलता है वो अन्दर ही मेरे लिए पर्याप्त नमी का इंतजाम करते करते सूख जाते है मेरा हृदय इसलिए भी सबसे खारा है यह राज़ आज तुम्हें बारिश के बहाने से बता देता हूं।
बारिश आई है मेरे मन का पंचाग इसकी वजह के लिए ग्रहों,नक्षत्रों की गणना करते हुए तुमसे दूरी की प्रकाशवर्ष में कालगणना में लग गया है मगर एक बडी बात है मेरे पास न दशमलव है और न मेरे पास शून्य है ये दोनों अंक तुमने मुझसे कभी उधार लिए थे मगर आज तक नही लौटाए है इसलिए मेरा अनुमान अक्सर गलत सिद्ध हो जाता है और तुमसें दूरी घटती बढती जाती है।
फिलहाल, बस इतना ही निवेदन करुंगा अगली मौसमी बारिश से पहले मुझे मेरा दशमलव और शून्य लौटा देना ताकि किसी बेमौसमी बारिश में तुम्हारी भौतिक दूरी का सही से आंकलन करके मैं कुछ सही भविष्यवाणी कर सकूं।
बाहर की बारिश थम गई है मगर अन्दर एक झडी लगा गई है वो कब थमेगी कह नही सकता हूं मेरे कान थोडें ठंडे हो गए है और हथेलियां गर्म तुम्हारे हाथ की चाय तो अब मिलने से रही इसलिए खुद ही जा रहा हूं एक कप चाय बनानें ताकि घूंट घूंट तुम्हें याद करता हुआ भूल सकूं।


‘बेमौसमी बारिश'

Monday, May 11, 2015

बातें

बहुत दिनों से तुमसे कुछ बातें करना चाहता हूं। ये कोई खास बातें नही है ये बेहद मामूली बातें है मसलन तुम्हारे स्लीपर का नम्बर क्या है? क्या तुम अब भी दस्तखत के नीचें छोटी लाईन खींच कर दो बिन्दू लगाती हो?तुम दाल से कंकर बीनते समय कौन सा गाना गुनगुनाती हो? तुम्हारे पर्स में क्या अब भी छोटी इलायची मिला करती है तुमनें चश्में का नम्बर लास्ट टाईम कब चैक करवाया था हंसते हंसते अचानक से तुम्हारी आंखों मे नमी क्यों उतर आती है वगैरह वगैरह। दरअसल ये बातें भी नही है ये तो कुछ अजीब से सवाल है जिन्हें सुनकर तुम अचरज़ से भर सकती हो या फिर खिलखिला कर हंस सकती हो। जब जब मै जिन्दगी के गणित मे उलझ जाता हूं सही-गलत नैतिक-अनैतिक सच-झूठ के अनुपात का आंकलन करनें में खुद को असमर्थ पाता हूं तब तब मुझे ख्याल आता है कि तुमसे फोन करके पूछूं कि तुम कपडें धोने के बाद कैसे नील और टिनोपाल का एकदम सही अनुपात रख लेती है ऐसे और भी छोटे छोटे सूत्र है जो मैं तुमसें सिखाना चाहता हूं।
मेरे पास इतने सवाल बचे है कि जवाब देते हुए तुम्हारी सारी उम्र कट जाएगी। इन सवालों के सबसे सही जवाब केवल और केवल तुम्हारे ही पास है इसलिए मै सवाल जोडता जा रहा हूं। ये सवाल मेरे लिए एक किस्म की पूंजी है जिनको मै समय आने पर खर्च करुंगा। कुछ सवाल मैने इसलिए भी बचाकर रख लिए है जब तुम लगभग मुझे भूलने वाली होगी या फिर मेरी किसी बात से बेहद आहत होंगी ठीक उस दिन मै एक सवाल तुम्हारी तरफ उछाल दूंगा और ये मेरा आत्मविश्वास है कि चरम नाराज़गी में भी तुम मेरे सवाल पर मुस्कुराए बिना न रह सकोगी।
ऐसा नही है मेरे पास सवालों की शक्ल में केवल बचकानी बातें है या कुछ अपरिपक्व किस्म की जिज्ञासाएं है मेरे पास इन सवालों के जरिए तुमसे वक्त बेवक्त बात करनें का एक विशेषाधिकार है यह विशेषाधिकार मैने कभी तुम्हारें सवालों के जवाब देकर कभी मौन रहकर तो कभी कुछ बातों को अनसुना करके अर्जित किया है।
दरअसल प्रतिदिन की बातों शिकवों शिकायतों और चाहतों के जरिए खर्च होती जिन्दगी में मै कुछ न कुछ बचाता आया हूं मेरे कहे गए के बीच हमेशा कुछ दशमलव में अनकहा बचता रहा है। इसी अनकहें की चिल्लर मेरी जेब में खुशी के साथ खनकती रहती है जब भी लगता है कि तुम्हें खोने वाला हूं मै एक ऐसी ही अनकही बात का सिक्का निकाल कर उसे टॉस के लिए हवा में उछाल देता हूं जिन्दगी की तमाम हार के बावजूद आज तक मै यह टॉस कभी नही हारा इसलिए कम से कम तुम्हारे बारें में कभी हारनें की नही सोचता हूं।
चलों ! एक शाम कुछ ऐसी ही अनकही बातों से रोशन करते है हो सकता है तुम्हारे पास भी कुछ ऐसे बेहद मामूली किस्म के सवाल हो मेरे जवाब तुम्हें संतुष्ट भले ही न कर पाएं मगर तुम उन्हें सुनकर खुशी जरुर महसूस करोगी मुझे ऐसा लगता है। मेरे सवालों का आदतन कोई निहितार्थ मत निकालनें लगना बस मै इतना ही निवेदन करना चाहता हूं क्योंकि मेरा कोई सवाल तुम्हारे विश्लेषण की उपज नही है तुम्हें आज तक मैनें बुद्धि और विश्लेषण के नजदीक नही जानें दिया है तुम्हारे लिए दिल और दिमाग के मध्य एक निर्जन टापू पर एक जगह सुरक्षित की है मैनें तुमसे बतियाने के लिए।उससे बढिया जगह मेरे अस्तित्व में नही है वहां अनुभूतियों घना जंगल है प्रेम के छोटे तटबंध वाली मीठी नदी है अपनत्व का झरना है और अपेक्षाओं से रहित एक खुला आसमान है मै चाहता हूं हम जब भी मिलें उसी जगह पर मिलें वो जगह ग्रह नक्षत्रों के सौभाग्य या दुर्भाग्य के प्रभाव से मुक्त है इसलिए भी वहां तुम्हें देखकर मै एक गहरी आश्वस्ति से भरा हुआ रह सकता हूं।
ये सब बातें केवल सवाल की शक्ल में नही है मेरे पास तुम्हारी कुछ बातों के जवाब भी है जवाब क्या मेरे पास कुछ कथन है कुछ कुछ उक्ति के जैसे जिन्हें तुम्हें सौप कर मै सन्दर्भ की कन्द्रा में सुरक्षित आराम करना चाहता हूं। मुझे उम्मीद है एकदिन हम अपनी अपनी बातें अपने अपने सवाल और कुछ थोडे से जवाब लेकर जरुर उस एकांत के टीले पर मिलेंगे इसी उम्मीद के सहारें मै अक्सर तुम से बतकही करता रहता हूं मै जितना लिखता बोलता हूं तुम्हारें बारें में वह उसका दशमांश भी नही है जितना सोचता और जीता आया हूं तुम और तुम्हारी बातों को। तुम्हें यह सब जानकर ठीक उतना आश्चर्य हो रहा होगा जितना एक जीबी के डेटा रिचार्ज़ में दो जीबी डाटा मिलनें पर हुआ था तुम यह सोच सकती हो कि मै इतना बोलने वाला लगता तो नही हूं मगर जिन्दगी अक्सर न लगने के सहारे ही आगे बढती है हमें जो जैसा लगता है वो वैसा होता है कब है। ये भी एक अधूरी बात है इसे मिलनें पर पूरी करुंगा हो सके तो मेरा इंतजार करना।

‘बातें-मुलाकातें

Monday, May 4, 2015

फेसबुक

दिखतें है जो सब जमें जमाए लोग
फेसबुक से है वो उकताए हुए लोग

लाइक पे हो जाते है खुश ओ'खफा
इसी पर अपने और पराए  हुए लोग

इनबॉक्स खाली है कमेंट भी हुए बंद
म्यूच्यूअल दोस्तों के है सताए हुए लोग

अपनी रिक्वेस्ट हुई एक्सेप्ट महीनों में
तन्हा मिलें सब मज़मा लगाए हुए लोग

गोया क्लिक न हुई तकदीर हो हमारी
दोस्तों को थे फॉलोवर बनाए हुए लोग

© डॉ. अजीत

Friday, May 1, 2015

शब्दों का सफर

मेरे पास शब्दों की कुल जमापूंजी इतनी थी जिससे मैं तुम्हारी कुछ पल की मुस्कान खरीद सकता था। मगर मैं अक्सर कुछ शब्द इसलिए भी बचा लेता था ताकि कभी तुम्हें तुम्हारें बारें में वो बात बता सकूं जो तुम खुद भी नही जानती हो। मन के भंवर में घूमते ये शब्द अक्सर आपस में इतने उलझ जाते थे कि मै यह तय नही कर पाता था कि इन्हें एक वाक्य में कैसे प्रयोग करुं।
निंदा और प्रशंसा से इतर ये शब्द मैने मन की उन दशाओं को बतानें के लिए बचाकर रखे थे जिनको व्यक्त करनें के लिए अक्सर भाव भी पीठ फेर लेते है। एक एक अक्षर को मैनें इस बात के लिए दीक्षित किया कि मेरी किसी बात से कला का अपमान या दुरुपयोग नही होना चाहिए तुम्हारे बारें इंच दर इंच ठीक वही बातें मैं कह सकूं जैसा मै महसूसता हूं मेरी अधिकतम तैयारी बस इतनी ही थी। इन शब्दों की वाग्मिता में भरम के फेर नही बल्कि ब्रह्म सी सच्चाई बची रहे इसके लिए मैंने इन्हें अपने अपमान के वटवृक्ष की छाया और आत्मीयता की नदी किनारें पाला है।
सुनो! कल रात मुझे अपनी कुछ किताबों के बीच तुम्हारी टूटी हुई चूडी का एक टुकडा मिला। उसका रंग मै फिलहाल भूल रहा हूं मगर उसकी खुशबू मुझे अभी तक याद है। उसके आर पार देखनें की कोशिस की तो चश्मा उतारना पडा और नंगी आंखों से मै तुम्हारी कलाई के वो महीन रोम देख पाया जिनके चित्र चूडी के एक इस टूकडें ने खींच कर कैद कर लिए थे। दो सोने के कंगनों के बीच जीते हुए यह जान पाया था सीमाओं के बीच जीने का बोझ। एक तरफ यह खुद को सुरक्षित महसूस करता था तो दूसरी तरह यह रहा है रात दिन बेहद बैचेन भी। और अंत: इसकी यही बैचेनी इसे तोड गई है। जानता हूं जब तुमसे यह बात कहूंगा तो तुम कहोगी एक निर्जीव चीज़ से यह सब कैसे पता चला तुम्हें? मै जवाब देने के लिए शब्दों को आवाज़ दूंगा तो वो तुम्हारी सन्देह भरी दृष्टि देख बाहर आने से इनकार कर देंगे।फिर भी मै इतना जरुर कह सकता हूं जब तुम्हारे इस चूडी के टुकडे को मै नंगी आंख से देख रहा था तभी यह छू गया था मेरी एक गाल से इसकी अधूरेपन की ठंडक नें ये सब राज़ मेरी गाल से कहा था जिसे कान के रास्तें मेरे दिल ने सुन लिया था। यकीन करो न करो तुम्हारी मर्जी।
आज सुबह मै सोचता रहा तुम्हारे बारें में और सोचता क्या रहा मैने देखा तुम्हारे मन और देह के इतर भी कुछ तुमसे जुडी हुई चीज़े ऐसी है जो तुम्हारें बारें मे जानती बेहद अनकहा भी। मैने जमापूंजी वाले शब्दों से कहा जरा बात करके तो देखों मगर वो उपयुक्त अवसर न होने की दुहाई देकर हमेशा की तरह चले गए नेपथ्य में। एक दिन तुम्हारा एक खत मिला उस पर तुम्हारा पता लिखा था मगर नाम किसी और का था मैने स्याही को सूंघ कर देखा तो कुछ अनुमान न मिला मगर दो वाक्यों के बीच मुझे तुम्हारी जानी पहचानी खुशबू आई दिमाग पर थोडा जोर देकर सोचा तो यह खुशबू तुम्हारी कलाई पर बंधे शुभता के धागे की थी जो रोज़ भीग भीग कर अपनी खुशबू को रुपांतरित करता चला रहा था यह खत उसके गंधहीन होने से ठीक पहले का था इसलिए मुझे खत पर तारीख देने की जरुरत महसूस नही हुई। खत को बिना पढे मैने रख लिया मगर लिखावट पर जमी स्पर्शो की नमी को जरुर अपनी पलकों से छुआ है एक बार यह किसी को याद करके भावुक होने से बचने का एक टोटका रहा है मेरा।

फिलहाल बातें बहुत सी है मगर आदतन जमापूंजी के शब्द साथ नही दे रहें इसलिए शेष फिर कभी।

‘शब्दों का सफर'

Thursday, April 30, 2015

सफर और नोट्स

मुझे हासिल क्या किया तुमनें, तुम्हारें खुद के बनाए सारे पैमाने ही ध्वस्त हो गए। मेरा बिखरा हुआ वजूद दूर से जो कौतुहल पैदा करता था नजदीक से देखने पर तुम्हें फिक्रमंद करनें लगा है।तुम्हारी बैचेनियों की गिरह रोज खुलतें-बंधते हुए देखता हूं। तुम मुझसे जुडी स्मृतियों को एक सुखद ख्वाब समझ कर भूलना चाहती हो क्योंकि अब मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता नही है। एक लम्बें समय तक तुम अपने जीवन में मेरी भूमिका को लेकर उधेडबुन में रही अंत में खुद से लडते हुए तुमनें अपना तयशुदा बडप्पन ही चुना। दरअसल तुम्हारा जीवन बाहर से जितना बहुफलकीय और घटनाओं से भरा दिखता है अन्दर से वहां एकालाप का उतना ही एक गहरा सन्नाटा है यह बात तुम भी जानती है और संयोग से मै भी मगर तुम कभी इसे स्वीकार नही करोगी यह बात भी जानता हूं।
तुम्हारें व्यक्तित्व में जिज्ञासा का थोडा सतही रुपांतरण हुआ है शायद यही वजह है कि जिस प्रयोगधर्मिता को तुम अपना कौशल समझती है वह दरअसल तुम्हारें मन के अस्थिर आवेंगो का खुरदरा प्रतिबिम्ब भर है। यह बात कहनें में बडा ही विचित्र किस्म का दार्शनिक सुख देती है कि कोई भी चीज़ मुझे स्थाई आकर्षण में नही बांध पाती ! इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक सच पता है क्या है? तुम्हारे अंदर खुद के कमजोर पड जानें का डर इतना गहरा व्याप्त है कि तुम अनुराग को अपनी चौखट की बाहर से ही बुद्धि की युक्ति से विदा करती आई हो मेरे हिसाब यह तुम्हारी सबसे बडी ज्ञात निर्धनता है।
जितना तुम्हें समझने की कोशिश करता हूं उतना ही सुलझता जाता हूं क्योंकि तुम्हारी उलझन को मै देख सकता हूं यह बात मै तुमसे कभी कहना नही चाहता था मगर कभी कभी जब तुम जीवन को अनुभव के चश्में से देखती तो तुम्हें खुद की होशियारी पर बडा फख्र होता है कि कैसे तुमनें अपनी यात्रा की विविधता को बिना कहीं अटके जारी रखा है मै उस वक्त तुम्हारे चश्में के पीछे की आंखों को पढ रहा होता हूं जो तुम्हारें मन के मानचित्र के निर्जन टापू का मानचित्र लिए उदास बैठी होती है।
मन के खेल बडे विचित्र किस्म के होते है यह बुद्धि को भी सांत्वना के सूत्र बांट सकता है उसे आत्ममुग्धता के खेल में अभिभूत कर सकता है मगर मन की एक कमजोरी होती है ये बिना बताए एक जिद पाल लेता है और जहां भी उस जिद से मिलता जुलता सामान दिखता है यह हमारें कदम रोक देता है। मेरा अस्तित्व तुम्हारी किसी खोई हुई जिद के आसपास का कोई बिखरा हुआ टुकडा रहा होगा तभी तुमनें उसको उठाया और अपने फ्रेम की कोई एक तस्वीर पूरी कर ली। मै कोई अकेला या अनूठा किस्म का व्यक्ति नही रहा हूं जो मै इस गर्व से भरा रहूं कि तुमनें मुझे चुनकर मेरा मूल्य पहचाना है दरअसल मै तो एक बडी फोटो एल्बम का एक छोटा सा टुकडा भर हूं जिसकी भूमिका एक पेज़ तक ही सीमित है जिस दिन कोई नई स्मृति कैद होगी मेरा पेज़ वक्त स्वत: ही पलट देगा फिर कभी गाहे-बगाहे नई पुरानी स्मृतियों के मेलें में कुछ लम्हें के लिए जरुर तुम्हारी आंखों के सामनें से गुजर जाया करुंगा। इस पर तुम हंसोगी या उदास हो जाओगी यह अभी नही बता सकता हूं।
खैर...! जिन्दगी की खूबसूरती कुछ लोग इससे गुजर कर महसूस करतें है कुछ लोग ठहर कर इसलिए किसी के तरीके पर सवाल खडा करने का कोई मतलब नही बचता है। अपनें बारें इतना जरुर बता सकता हूं मै लम्बें समय से वक्त के किसी एक पहर में अटक गया हूं और उसी के लिहाज़ से कभी जिन्दगी के खूबसूरत होने की बात करता रहता तो कभी उदासी के मज़में लगा लेता हूं। तुम्हारा चयन यात्रा के नाम पर अनुभवों का चयन है इसलिए अनुभूति अक्सर निर्वासित हो जाती है जब तक तुम अनुभव के तल से मुक्त नही हो जाओगी तब तक शायद तुम्हें रास्तें के मील के पत्थरों से दोस्ती करनें की फुरसत नसीब नही होगी। फिलहाल तुम मार्ग और साधनों के विमर्श में व्यस्त इसलिए मेरा तुम्हें कितनी भी आत्मीयता से आवाज़ लगाना शायद अप्रिय लग सकता है या तुम मेरे बचपनें पर भी खीझ सकती हो इसलिए मैं मौन होकर केवल देख सकता हूं और उम्मीद कर सकता हूं जिन्दगी के किसी मोड पर तुम जरुर मिलोगी और पुरानी दोस्ती के हक की बिनाह पर यह कहोगी यार तुम ठीक कहते थे तब ! क्योंकि हर वक्त मै और मेरी बातें सही ही रहेंगी इसकी भी कोई तयशुदा गारंटी नही है।
फिलहाल देने के लिए शुष्क शुभकामनाएं ही है जानता हूं कम से कम तुम्हें इस वक्त इनकी बिलकुल भी जरुरत नही है। फिर भी दे रहा हूं ताकि वक्त बेवक्त पर तुम्हारे काम आ सके।

‘सफर के नोट्स

Monday, April 20, 2015

टेलर मास्टर

टेलर की दुकान पर पड़ी कत्तरें कितनी ही रंगीन क्यों न हो कतर ब्योंत उनके रंग को भी खा जाती है। अलग अलग आकार में कटी पड़ी कत्तरें अपने रंग को भूल सफेद रंग से थोड़ी शान्ति उधार मांगती है इस सफेद कत्तर अपना एक कोना चुपचाप हिला देती है। इन्चिंग टेप से मास्टर जी लोगो के कद औ हद नाप रहे है लोग सीना फुलाने के चक्कर में पेट अंदर नही करते है क्योंकि यहाँ का झूठ साल भर भारी पड़ सकता है उनके आग्रह बेस्ट फिटिंग की है और टेलर मास्टर किसी व्यस्त डॉ की तरह उनका आधा मर्ज़ ही सुनकर अपनी बिल बुक में संकेताक्षरों में उनकी पैमाइश दर्ज करता जाता है। मास्टर जी की दुकान के डिस्प्ले बोर्ड कुछ बूढ़े कोट लाइन से टंगे है उन्हें हैंगर पर टांग दिया गया है वो गर्व से भरे पुरुषों के कंधें को ढकनें की आस खो चुके है वो कोसते है मन ही मन कि क्यों उन्हें थान की विराट से निकाल कर यहां सजा दिया गया है उनकी जेब में हवा तक नही जाती वें उन पुरुषों को श्राप देतें है जिन्होंने उनको टेलर के यहां से ले जानें में महीनों या बरस भी लगा दिए है। वे एक दुसरे को सांत्वना देते है और खुद पर लगे कागज के टैग (जिस पर उस रसीद का नम्बर लिखा है जब उनके लिए नाप ली गई थी) के पीलेपन को देखकर मायूस हो जातें है। उनके सामनें गले का बटन बंद किए कुछ शर्ट भी टंगी है वो इस तरह पैबंद है जैसे अभी किसी बेहद जिम्मेदार शख्स के अभिमान को बचाने के लिए उन्हें ही आगे रहना होगा हालांकि देर से घर जानें पर उनमें भी खुसर फुसर होती रहती है। पेंट टेलर की दुकान में आश्वस्ति से टंगी है उन्हें लगता है कि अपनी नंगई छिपानें के लिए उनको मनुष्य जरूर सादर लेकर जाएगा। टेलर के गलें में पड़ा इन्चिंग टेप साक्षात् शिव के गले में पड़े नाग के समान है वो टेलर की निपुणता का प्रतीक है टेलर की कैंची अपने वजन के हिसाब से कपड़े की कई तहों को बड़ी सफाई से काटती उसकी स्वामी भक्ति असंदिग्ध है। टेबल पर पड़ा चाक टूटता है मगर निशान गहरें बनाता जाता है ताकि कारीगर उसके जरिए कटाई छंटाई करीने से कर सकें और मास्टर जी की लिहाज़ बची रहें।
मशीनों का पैडल की मदद से सुर में बचता संगीत मास्टर जी यह आश्वस्ति देता है कि काम ठीक चल रहा है। धागा और खाली रील के डब्बे उपेक्षित पड़े अपनें यौवन को याद कर सिसकतें है मगर उनकी आह कोई नही सुनता वो अपने सिएं हुए धागे को देखकर मजबूत बनें की दुआ फूंकते हुए दम तोड़ देते है।
टेलर की दुकान पर सभ्यता की दुनिया के फैशनेबल तरीकें सांस लेते है कपड़े आते है और परिधान बनकर जातें है किसी ग्राहक का कद कितना घटा या बढ़ा है इसके बारें में एक टेलर से बेहतर भला कौन बता सकता है।

टेलर मास्टर: एक संसार 

Tuesday, April 14, 2015

संवाद

शिव:

हे शिवप्रिया! तुम नित्य और अनित्य के मध्य सुरभित चैतन्य रागिनी हो। तुम्हारी शिराओं के स्पंदन से नाद प्रस्फुटित होता है। तुम्हारी चेतना के स्रोतों से बहनें वाली ऊर्जा देह और मन का शंकुल बनाती है। तुम विपर्य को भी जीवंत सिद्ध करने मे समर्थ हो। अनंत के विस्तार का केन्द्र तुम हो और सृजन के समस्त शिखर तुम्हारे गुरुत्वाकर्षण सें संतुलन साधे हुए है। तुम्हारी व्याप्ति प्रति प्रश्नों के संभावित उत्तर को गुह्य अवश्य रखती है परंतु अखिल ब्रहामांड की बिखरी चेतनाएं इसी गुह्यता से अभिप्रेरित हो प्रकृति के विषयों से आरम्भ में चमत्कृत होती है फिर तत्व का अंवेषण करती हुई आत्म के सच का साक्षात्कार करती है। तुम दृष्ट भाव में रहकर चेतनाओं की यात्राओं का मात्र अवलोकन ही नही करती हो बल्कि उनके अंदर एक सिद्ध सम्भावना का बीज भी कीलित करती हो। प्राय: लोकचेतनाओं में तुम्हारी अंशधारित उपस्थिति तटस्थ नजर आती हैं मगर तुम तभी तक तटस्थ रहती है जब तक कोई विस्मय और चमत्कार के ऐन्द्रजालिक अनुभवों से मुक्त नही हो जाता है। चेतनाओं के इस मुक्ति के बाद तुम उन्हें वह मार्ग दिखाती हो जो देवत्व से परें ब्रहमांड को अनुभूत करने का अनिवार्य मार्ग है। कोई भी यात्री तुम्हारी सहायता के बिना स्व से आत्म की यात्रा को नही कर सकता है इसलिए तुम सदैव अनिवार्य और अपरिहार्य हो।

शक्ति:

हे महादेव ! आप साक्षात पुरुष प्रकृति के समंवय के सूत्रधार हो। आपकी भूमिका पर इसलिए भी टीका असम्भव है क्योंकि आप कोई एकल चेतना नही हो। आप मुक्त और सिद्ध चेतनाओं का एक समूह हो जो शून्य और अनंत के मध्य बिखरें अस्तित्व के गूढ रहस्य को जानते है। प्राय: आपको मौन या तटस्थ इसलिए देखा जा सकता है क्योंकि आप हस्तक्षेप से मुक्त हो। आपके विस्मय मे भी एक छिपा हुआ विस्मय होता है इसलिए प्राय: मै कोई प्रश्न नही करती क्योंकि प्रश्न स्वयं मे उत्तर लिए होता है। मेरी भूमिका आपका विस्तार नही है और ना ही मै समानांतर ही हूं। दरअसल जहां आप आरम्भ होते है वहां मै संतृप्त होती हो और जहां से मै दृश्य मे सम्मिलित होती हूं वहां मुझे खुद मेरी भी छाया नही दिखाई देती है इसलिए मेरी एक स्वतंत्र यात्रा है परंतु इस स्वतंत्रता में भी आपके अंशों की रेखाएं मुझसे मेरा क्षेम पूछती है और यही बोध मुझे योगमाया से मुक्त भी करता है। आप दिगम्बर और चैतन्य है इसलिए काल गणना और देह तत्व से मुक्त है आपके स्पर्शों में तत्व और मीमांसा के सूत्र है जिनका पाठ आभासी मुक्ति से वास्तविक मुक्ति की यात्रा में लोकचेतनाओं के अत्यंत आवश्यक है। ब्रहम के अंश और भ्रम के दंश को समझनें के लिए आपका उदबोधन अनिवार्य है। मै आपके आत्मिक सम्बोधन की ऋचाओं में अव्यक्त सूक्त तलाशती हूं ताकि समंवय के समय चेतनाओं को और अधिक परिष्कृत कर सकूं। आप अपनें सरलतम रुप में इसलिए उपलब्ध है ताकि चेतनाओं के वर्गीकरण में मुझे कोई असुविधा न हो इसलिए आप मेरे लिए भी अनिवार्य अपरिहार्य ही है।

‘शिव-शक्ति संवाद: माध्यम शायद मैं’

Saturday, April 4, 2015

नाई

नाई की दुकान धैर्य की परीक्षणशाला है अपनी बारी का इन्तजार करना सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है। भले नाई से डेढ़ दशक पुराना रिश्ता हो मगर वहां नम्बर आने पर ही उसकी कुर्सी पर बैठने की इजाजत मिलती है। जल्दी होने की बात पर और दुकान में घुसने से पहलें यह पूछना कितना टाइम लगेगा भैय्या? नाई को चिढ़ा देता है वो चाहता है आप चुपचाप आए और अपनी क्यू में बैठ पंजाब केसरी अखबार पढ़ना शुरू कर दें।नाई से ज्यादा सिद्धांतवादी कोई नजर नही आता है उसके लिए व्यवस्था सर्वोपरी है सम्बन्ध द्वितीय।
कंची की तुनकती आवाजें और टी वी पर चलता चित्रहार नाई की ऊर्जा के स्थाई स्रोत हैं। जिस गति से कंची चलती है वो नाई की निपुणता को भी बताती है बीच में वो कंघे की पीठ ठोकती है और कहती है थोडा रास्ता आसान करों कतर ब्योंत का।कंघा दो तरफा घिरा है मगर वो सहज है।
जमीन पर बूढ़े बच्चें अधेड़ युवाओं के बिखरे बाल आपस में एक दुसरे की उम्र पूछते है और उदास हो जाते है।
नाई का सबसे निर्मम हथियार उस्तरा है इतने अत्याचार तो पुरुषो की गाल पर उनकी पत्नि,प्रेमिका और माता-पिता ने भी नही किए होंगे जितनें जख्म ये उस्तरा दे जाता है गाल के निचले हिस्सें पर नाईयों द्वारा उस्तरे को उलटा खींचना भले ही एकबारगी गाल को रोमविहीन प्रतीत करवा देता हो मगर आफ्टर सेव लोशन की जलन साफ़ तौर पर त्वचा के साथ हुए जुल्म का इश्तेहार सुना कर उड़ जाती हैं। कटिंग सेविंग कलर मालिश यह पैकेज़ ग्राहक एक साथ लें यह नाई की आदि अभिलाषा होती है। जिस नाई ने हमारें बाल काटे होते है वो हमारे बच्चों के बाल काटते समय एक बेहद नैसर्गिक खुशी से भरे होतें है बच्चों को बेटा कहते समय उन्हें लगता है कि उनकी यात्रा बाप से बेटे तक आ पहूंची है। वो हमारे बच्चों में हमसे ज्यादा दिलचस्पी लेते है नाईयों का यह एक बेहद संवेदनशील पक्ष है।
मनुष्य के आदिम से सभ्य बननें की प्रक्रिया में मनुष्य एक नस्ल को नाई बनना पड़ा है अमूमन नाई हाजिरजवाब होतें है उनकी बतकही ग्राहकों को भले ही रूचिपूर्ण न लगें मगर सामाजिक चटखारें के तमाम विषय नाई के पास होतें हैं।
जब आप एक अंतराल के बाद नाई की दुकान पर पहूंचते तो वो ठीक दोस्तों की तरह पूछता है कहां थे इतने दिन बहुत दिन बाद चक्कर लगा कई दिन से सोच रहा था आप आए नही ये सवाल एक सांस में नाई पूछता है फिर इसके बाद दुसरा काम नाई का यह होता है कटिंग और सेविंग देखकर पूछना कि कहां कटवाए थे बाल फेस पर दानें हो रखें है कलम छोटी बड़ी छोड़ रखी है तब आप उसकी प्रशंसा में दो शब्द कहें और दुसरे नाई को कोसे बस नाई इतना ही सुनकर आपके उसके पक्के ग्राहक होने की पुष्टि कर लेता है।
सामाजिक जीवन में नाई हमारे जीवन से कुछ इस तरह से जुड़ा है कि आप हफ्ते दस में उससे मिलकर अपना कुछ बोझ हलका कर लेतें है और एक बार आपको लत लग जाए तो आप चाहकर भी अपना नाई और टेलर बदल नही पातें हैं और मेरे ख्याल से बदलना भी नही चाहिए।

चलिए मेरा नंबर आ गया है...शेष फिर !

'नाई की दुकान और मैं'

Wednesday, April 1, 2015

सज़ा

दुनिया में हर चीज़ के होने की एक पुख़्ता वजह होती है। बेवजह जो भी होता क्या तो वो जुनून होता है या फिर पागलपन। आसपास और नजदीक होने के महीन भरम होते हैं। मुक्ति दरअसल बड़ी विचित्र चीज़ है ये जब हमें मिलती है तो इसकी जेब में अतीत का एक अधूरा पता भी होता है। कभी उदास शामों में तो कभी लम्बी होती रातों में उसको पढ़ना चाहतें है तो अक्सर रोशनी साथ नही देती है।
खुद के लिए सबसे बेहतर विकल्प क्या है यह सोचने का सर्वथा मौलिक अधिकार शायद हमारे ही पास होना चाहिए कैसा अजीब महसूस होता है एक तो आप अपने एकांत से ऊबे है बैठे हो ऊपर से आपकी दृष्टि और विकल्पों पर टीकाएं की जाएं। दो चेतनाओं के मध्य सुरक्षित दूरी विकसित होने में समय के सारे समीकरण निष्प्रोज्य होते है क्योंकि इसके सूत्र न सबंधो के बीजगणित में मिलतें है और न अनुमानों के खगोल विज्ञान में।
समय का सहारा लेकर खुद को छलना मनुष्य की आदि परम्परा है। समय भले ही खोया-पाया के भाव से मुक्ति दे सकता है मगर कुछ अनुत्तरित प्रश्नों के जवाब समय के पास भी नही होतें है। जैसे दो जमा दो का जोड़ हमेशा चार ही नही होता है।
खुद की अप्रासंगिकता के चालानों के बीच एक अर्जी वादामाफ़ गवाह बननें की लगाई जाती है जिस पर खुशियों की कीमत मय सूद जमा करनी पड़ती है। अचानक से जब वक्त हाकिम बनता है तब रिहाई जिसे मुक्ति भी कहा जाता है उसके लिए सर झुकाएं चुपचाप खुद के घुटनों के बीच फंसे यादों के भँवर को देख यही कह सकते है गलती हुई साहब !
आसपास की रंगीनियत तब ना खुशी देती है और ना बैचेन करती है एक अजीब सी नीरवता को अपने चित्त में लिए हम दोनों हाथ जोड़ते है मुस्कुरातें है और हाकिम से कहतें है जलावतनी क़ुबूल है जनाब।
ख्वाबों के इश्तेहारों की दुनिया ऐसी ही होती है यहां कब आँख खुलती है और कब बंद होती है किसी को पता नही लगता है। नींद में हंसते हुए कुछ लोग सुंदर लगते है और आँख खुलनें पर उनकी जेब से वो अधूरा पता झांकता है जो उनके मुक्त चेतना होने का एकमात्र ज्ञात दस्तावेज़ भी कहा जा सकता है।
इस पारपत्र के सहारे वो लांघ जाते है ख़्वाबों और पागलपन की एक गुमनाम दुनिया चुपचाप बिना किसी को बताएं अजनबी होना उनकी जमानत की एक शर्त होती है जो आधी उनकी पीठ पर छपी होती है आधी माथें पर।

'आख़िरी इश्तेहार'

Monday, March 30, 2015

सर्दी-गर्मी

कल मार्च भी खत्म हो रहा है। नए साल के नए तीन महीने और पुराने साल के आखिरी तीन महीने मिलाकर आधा साल मेरी जिन्दगी में कुछ इस तरह दर्ज हो गया है कि इसके एक-एक दिन पर मैं घंटो व्याख्यान दे सकता हूं। अब जब मौसम करवट ले रहा है मेरे मन का पतझड अपने यौवन पर है। तुम्हारी अनुपस्थिति में मन की नर्म जमीं पर ख्यालों के सूखे पत्तों की एक तह जमा हो गई है जिसकी वजह से मुझे सांस लेने में कभी-कभी तकलीफ होती है।

पिछले छ महीने का हिसाब-किताब करके तुम्हें ना भूलना चाहता हूं और ना याद ही रखना चाहता हूं। सर्दी की चाय की प्याली से बात शुरु होती है वो खत्म होने का नाम नही लेती है मेरे ज़बान पर कुछ जायके ऐसे चिपके है कि वो घुल नही पा रहें है। सर्दियों की धुंध और सर्दियों की बारिश में तुमसे जो मेरी बातचीत हुई उसको उलटा पढना शुरु करता हूं मेरी आखिरी बात का एक सिरा तुमसे हुई पहली बात से मिल जाता है फिर भी सारी बातें आपस मे दोस्त बन एक दूसरे की पीठ थपथपाने लग जाती है।

अब गर्मियां आने वाली है दिन अजीब से चिढचिढे हो गए है अब अगले चार महीनें मै तपता रहूंगा इस ताप से और मेरे जिस्म से बहता रहेगा तुम्हारा प्रेम इसकी ठंडक से ही मेरे शरीर का तापमान सामान्य रहेगा। चौबीस घंटे मे दोपहर और शाम का वक्त मुझ पर सबसे भारी गुजरता है दोपहर मेरे कान मे आकर कह देती है तुम मुझे भूलने ही वाली हो और शाम को जब मै सूरज से इस चुगली की सच्चाई जानना चाहता हूं वो चुपचाप आंख बचाकर निकल जाता है। अब इन चार महीनों में धूल-अंधड और बारिश के भरोसे ही रहूंगा ताकि मै कुछ भी स्थिर होकर सोच न सकूं।

तुम्हारा बारें में स्थिर होकर सोचना मुझे डराता भी और तपाता भी है फिर मै ताप के असर में मन ही मन न जाने क्या क्या बडबडाने लगता हूं। कहने को तो यह बसंत है मगर मेरा बसंत इस बार सर्दी की गोद में आकर चुपचाप चला भी गया है मेरा बसंत तब था जब सुबह सुबह उनींदी आंखों से बिस्तर पर तुम्हें याद कर मै मुस्कुरा देता था। तुम्हारे ताने सुनकर करवट बदलना भूल जाता था। इन सर्दियों में तुम्हारी वजह से मेरे संवेदनाएं इतनी जीवंत किस्म की थी कि मै बिस्तर तकिया गद्दा रजाई यहां तक दर ओ दीवार से भी बातें कर लेता था। और ये बातें कोई आम बातें नही थी बल्कि ये सब उतनी ही गहरी बातें थी जितनी कभी तुमसे आमने सामने हुई है। कल जब मै बिस्तर की सिलवट ठीक कर रहा था तब अचानक लगा किसी ने मेरा हाथ पकड लिया कुछ सिलवटों को शायद मेरी हस्तरेखाएं देखनी थी वो उनके जरिए तुम्हारे आने के महूर्त का पंचाग देखना चाहती होंगी शायद। आज सुबह तकिए को जब मोडना चाहना तो उसने इंनकार कर दिया पूछने पर कहने लगा थोडी देर आंखे बंद करके सीधे लेटे रहो मै तुम्हारी गर्दन पर फूंक मारना चाहता हूं मैने पूछा क्यों तो कहनें लगा मेरे ऐसा करनें से किसी के कान की बालियां होले-होले हिलेंगी और वो ऐसा करना चाहता है उसके पास ऐसा करने की सिफारिश है।

रोज सुबह मेरी चप्पल एक दूसरे के कान मे कुछ कहती हुई मिलती है उन्हें देख मुझे लगता है कि ये तो मेरी यात्रा का शकुन है मगर मुझे तुम्हारा पता नही मिलता है मै किताबों से लेकर कविताओं की तलाशी लेता हूं गुस्ताखियों की बंद दराज़ खोलता हूं जहां तुम्हारे खत तो मिलतें है मगर जहां पता लिखा होता है वहां की रोशनाई फैल गई है मै केवल उस पर स्पृश से तुम्हारी दिशा का अनुमान लगाता हूं और अपने जूतों पर पॉलिश करने लगता हूं।

गर्मी आ गई है। सर्दी चली गई है। मगर तुम ना कभी आई और ना कभी गई बस ये एक अच्छी बात है। यह अच्छी बात से बढकर एक भरोसा है कि कम से कम तुम आवागमन से मुक्त हो और कहीं एक दिशा में स्थिर हो। जब भी मुझे सही दिशाबोध हो जाएगा और मेरे जीवन का दिशाशूल निष्क्रिय हो जाएगा उस दिन मै भटकता हुआ तुम तक आ ही जाउंगा तब तक तुम इंतजार को मेरी तल्खियों से बीनती रहना और गुनगुनाती रहना कुछ ऐसा जिससे मै दूर से तुम्हारी आवाज़ पहचान लूं। आने वाली गर्मी में लू के बीच शीतल छाया की तरह तुम्हें अपने विकल जीवन में रखना चाहता हूं ताकि जब कहीं चैन न मिलें तो थोडी देर तुम्हारी छाया में चैन से बैठ सकूं पी सकूं तुम्हारे हाथ से दो घूंट पानी।

‘सर्दी से गर्मी तक’

Friday, March 27, 2015

इन्तजार

सुबह कहीं अटक गई है। सुबह कितने घंटे विलम्ब से चल रही है इसकी उद्घोषणा कोई नही करता है। रात अपने निर्धारित समय पर ही चली थी।याद करने की कोशिश करता हूँ तो मुझे शाम की एक चिट्ठी याद आती है जिसमें सूरज की तबीयत खराब होने का जिक्र हुआ था। अनुमान लगाता हूँ जहां अभी दिन निकला हुआ होगा वहां सूरज की बीमार रोशनी ही पहूंच रही होगी। मैं सुबह के इन्तजार में हूँ इसलिए मन्दिर की घंटियों,शंख और आरती की आवाज में मेरी कोई रूचि नही है। जो लोग मन्दिर के अंदर ये सब कर रहे है उन्हें सुबह का इन्तजार नही है बल्कि वो सुबह को विलम्बित होते देखना चाहते है ताकि उनकी उपयोगिता बची रहें।
काल का बोध एक चैतन्य घटना है परन्तु काल का चक्र एक भरम भी हो सकता है। दिन और रात की खगोलीय वजहों के अतिरिक्त कुछ दूसरी वजहें भी हो सकती है। कभी कभी दिन होता है और उसको रात समझनें को जी चाहता है ठीक ऐसे ही जब दुनिया थककर सो जाती है मैं रात को जागता हूँ और नींद से बात करने लगता हूँ पूछता हूँ क्या मेरी थकावट एकमात्र वजह है उसके आने की या फिर उसे मुझसे प्रेम है वो खुद थकी हुई आती है मेरे अंदर सोने के लिए। कल शाम जब सूरज डूब रहा था मैंने देखा धरती पर कुछ लोग खुश थे वो शायद रात के इन्तजार में रहें होंगे और रात का विलम्बित हो जाना शायद उन्ही की प्रार्थनाओं का परिणाम हो सकता है।
दोपहर अक्सर एक बात कहती है दिन आधा बचा है जबकि आधी रात अक्सर चुप रहती है वो न सोनें के लिए कुछ कहती है और न रोने के लिए। कुछ लोग निवृत्त हो सो जातें है और कुछ रोनें लगते हैं। रात दोनों के लिए आधी आधी बंट जाती है।
सुबह के इन्तजार में दो किस्म के लोग है एक मेरे जैसे जिन्हें सुबह से कुछ सवाल पूछनें है दुसरे जिन्हें सुबह को कुछ जवाब देनें हैं। आज सुबह तीसरें किस्म के लोगो के आग्रह से विलम्बित है ये वो लोग है जो रात की लम्बाई से संतुष्ट नही हैं इसलिए सुबह से एक टुकड़ा उधार मांगना चाहतें है और लगता है आज सुबह ने उनकी प्रार्थना सुन ली है।
मेरी प्रार्थना इतनी सी है कि सूरज की हरारत ठीक हो गई है क्योंकि यदि सूरज दिन में बीमारों वाली अंगड़ाई लेगा तो बादल इसका गलत अंदाजा लगा बरसनें के षड्यंत्र करनें लगेंगे फिलहाल न धरती चाहती और न मैं कि बारिश हो क्योंकि बारिश का मतलब है सुबह दोपहर शाम रात का फर्क का धुंधला जाना। यह फर्क दरअसल उस उम्मीद का प्रतीक है जो कहती है ना समय स्थिर है ना इसके प्रभाव इसलिए इसके हिसाब से अनुमान के छल से बचनें के साधन विकसित किये जाने चाहिए।
फिलहाल सुबह की आमद हो इसी के इन्तजार में हूँ क्योंकि वो एक चिट्ठी लेकर आनें वाली है जिस पर नाम किसी और का मगर पता मेरा लिखा है यदि वो मुझ तक सही सलामत पहूँच गई तो एक दिन उसकों जरूर उद्घोषणा के स्वर में बाचूंगा। आने वाली सुबह से इतना ही वादा है मेरा।

'सुबह का इन्तजार'

Wednesday, March 25, 2015

दोपहरी नोट्स

एक दिन आप तय कर लेते है अपनी जीने की एबीसीडी,फिर गढ़ना पड़ता है अपना खुद का व्याकरण। अकेला पड़ने के जोखिम तो होते ही है क्योंकि लोग आपको पढ़ते कुछ दूर साथ चलतें है फिर उन्हें समझ नही आपकी लिपि। ऐसे में सर्दी में भी बहकर सूख जाती पारस्परिक अभिरुचियों की छोटी सी नदी।
कोई दूर जाता तभी तक नजर आता है जब तक निगाह में रहता है फिर दृश्य से वो ऐसे हो जाता है ओझल जैसे अनजान शहर के रास्ते छूटते चले जातें हैं। मन का किसी के मन में  ठहरना एक घटना है बल्कि यूं समझिए एकतरफा घटना है आप जिस वक्त सोच रहे होते है अपनी भाषा में तब उसका अनुवाद करने वाली आँखें देख रही होती एक अलहदा ख़्वाब।
मन की सराय में सुस्ताते वक्त आप भूल जाते है अपना यात्री होने का चरित्र तब याद रहती एक ठंडी छाँव जिसमें बैठ आप जम्हाई ले रहे होते है तभी आँख से ढलक पड़ता है एक छोटा आंसू तब आप उसकी वजह भी नही जान पाते और वो एक छोटी समानांतर लकीर के रूप में समा जाता है चेहरे की खुश्क गलियों में।
आपका तय करना बहुत कुछ तय कर देता है अपने साथ फिर आप शिकायत नही कर सकतें क्योंकि शिकायत करने का अधिकार आपको कमाना पड़ता है और ये आप तभी कमा पातें है जब अपनें व्याकरण को प्रकाशित करके आप कम से कम अपना एक सहपाठी तैयार कर सकें। ध्यान रहें आपको एक सहपाठी चाहिए होता ना कि शिष्य या कोई गुरु।

'दोपहरी के नोट्स'

Friday, March 20, 2015

सनातन यात्रा

अब थक रहा हूं मैं।
एक ही बात कितनी ढंग से बताने की मेरी तमाम कोशिसें नाकाम रही है। शायद तुम्हारे पास वो चैनल ही नही जहां से तुम जज्बात की इन माईक्रो वेव्ज़ को रिसीव कर सको। मेरी सम्भावना तलाशने और तराशने की सभी युक्ति अब मेरे साथ ही थकने लगी है। मैं तुम्हें जो बताना दिखाना और जताना चाहता था उसके लिए दुनिया से अलग होने की जरुरत नही थी बस उसके लिए तुम्हें खुद को खुद से अलग करके देखने की आदत विकसित करनी थी जो तुम शायद नही कर पायी।
हर हाल मे खुद को सही साबित करके मै मानवीय सम्बंधो में अराजकतावादी नही होना चाहता हूं इसलिए अब खुद की अवधारणाओं की चादर समेट रहा हूं मेरी अनंत की यात्रा में उसकी भी अपनी उपयोगिता है। आज भी आपकी निजता और आपकी मानयताएं मेरे लिए उतनी ही समादृत है क्योंकि मै आपका मित्र रहा हूं कोई आपके जीवन दर्शन का सम्पादक नही था मैं।
मुझे अब तुमसे कोई शिकायत नही है दरअसल हम मनुष्य अपनें अनुभवों से अर्जित मान्यताओं में जीने के आदी है। यह हमें यह आश्वस्ति देता है कि हम कुछ गलत नही कर रहे है हर अनजानी डगर हमें डराती है उसके जोखिम हमें सिमटने पर मजबूर करते है। मनुष्य को समझ के साथ असंतुष्टि प्रारब्ध से ही मिली है वह प्राप्य से ऊब कर अप्राप्य की खोज मे लगा रहता है और इसी उपक्रम में उसे कथित रुप से आनंद भी मिलता है उसे लगता है उसके पास अंवेषणा है जिसके जरिए वो प्रयोग कर मानवीय सम्बन्ध की लोच को समझ सकता है। मिलना बिछडना इसी उपक्रम की अवैध संतानें होती है।
संवाद मे सम्प्रेषणशीलता का संकट सबसे बडा संकट होता है तब आप इतने संकोच से भर जाते है कि आपकी एक छोटी सी सामान्य बात भी अन्यथा लिए जाने की भूमिका लगने लगती है। मेरी चाह थोडी अजैविक किस्म की रही है मै मानव रचित मनोविज्ञान और समाजशास्त्र का अतिक्रमण कर सम्बंधों की नींव रखना चाहता रहा हूं इतना ही नही मेरे पास प्रकृति को भी मौसम विज्ञानियों, वनस्पतिविज्ञानियों, जीववैज्ञानिकों और पर्यावरण विदो से अलग देखने का चश्मा है।
मै नदी को दोस्त कहने लगता हूं उनके हवाले अपने गमों के बैरंग खत कर देता हूं कहता हूं दे देना मेरे उस नामुराद सागर दोस्त को। पहाड से सलाह मांगने उसकी चोटी पर अकेला चढ जाता हूं उसके कान में फूंकता हूं अग्निहोत्र मंत्र, झरनों से मेरी अजब सी दोस्ती है मै उनकी पीठ पर हाथ फेरता हूं और उनके बोझ के बारे मे पूछताछ करता हूं। बादलों से मै अफवाह शेयर करता हूं बारिश मे अपने आंसू मिला देता हूं ताकि वो थोडी खारी भी हो जाए। रास्तें की झाडियों और खरपतवार मुझसे से मेरे जूतों के फीते के मांग लेते है और मै उन्हें खुशी से दे कर आगे बढ जाता हूं। रोज मुंह धोने के बावजूद भी मेरी पलकों पर रास्तों की थोडी गर्द जमी ही रह जाती है और यकीन मानना इससे मेरी रोशनी बढती है मेरी आंखों मे बस यही तजरबे का सुरमा लगा होता है जिसके वजह से कभी तुम्हें ये आंखे बडी नशीली लगा करती थी।
मै अपने समय मे हमेशा अन्यथा लिए जाने के लिए शापित हूं एक दौर बीत जाने के बाद मै समझ आता हूं तब तक मै वहां नही मिलता हूं जहां से विदा हुआ था बस यही एक खेद जनक बात है। सनातन रुप से मेरी यात्रा अनावृत रुप से जारी है चेहरे बदलते है किरदार नही। अनुभव हमेशा मुझे नही सिखा पाता इसलिए अनुभव मुझसे नाराज़ रहता है। मुझसे नाराज़ लोगो की लंबी फेहरिस्त है मगर मुझे यकीन है जब मै उनके आसपास नही रहूंगा उनकी नाराज़गी भी ऐसे ही घुल जाएगी जैसे बरसात में पतनालें मे जमीं धूल घुल कर बह जाती है।

‘सनातन यात्रा

Sunday, March 15, 2015

दो बात

वर्तमान समय का सबसे बड़ा छल है जो भविष्य की गोद से निकल कब अतीत का हिस्सा बन जाता है पता नही चलता है। हम कौतुहल से भविष्य की तरफ देखतें है तो अतीत को दो हिस्सों में बाँट देते है। अतीत के एक हिस्से पर हम अपनी मूर्खताओं पर हंस सकते है फख्र कर सकतें है वही दुसरे हिस्से में अपराधबोध और भावुक मूर्खताओं के कैलेंडर टंगे होते है जिनके साल कभी नही बदलतें हैं।
वर्तमान के विषय में सबसे खतरनाक चीज़ एक यह भी होती है कि यदि जीवन में भौतिक उपलब्धियों की आमद नही है तो आपका वर्तमान भूत और भविष्य दोनों से ज्यादा क्रूर हो जाता है।
कुछ करने के भरम और कुछ भी न करने के करम के बीच फंसा होता है एक यथास्थितिवादी मन जो कभी बाह्य दुनिया के तमाशे देख ठहाका मार हंसता है तो कभी आत्मदोष का शिकार हो खुद से ही सवाल करता है कि इस व्यवहारिक और बुद्धिमान लोगो की दुनिया में आखिर मै कर क्या रहा हूँ क्या सहमति,समीक्षा और सांत्वना ही उसके जीवन की उपयोगिता के अधिकतम सूत्र है जिसका सर्वाधिक अभाव होते हुए भी उसे वही सबसे ज्यादा बांटनी पड़ती है ताकि वह काल के इस बोध में प्रासंगिक बना रहे।
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सबसे गहरी चोटें छिपाकर रखने के लिए शापित होती हैं। सबसे गहरे मलाल उन्हीं से जुड़ें होतें है जो दिल के बेहद करीब होते है। सबसे ज्यादा आहत वही बातें करती हैं जो कडवेंपन और स्पष्ट होनें में फर्क नही कर पाती। सबसे असुविधाजनक होता है किसी के जीवन में अपनी भूमिकाओं को बदलते हुए देखना। सबसे बड़ा भय किसी को खोने का होता है जिसके वजूद का हम खुद का हिस्सा मान जीने लगते हैं।
और सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है किसी के जीवन में अपरिहार्य न होना।
...इतनी बड़ी बड़ी बातों के बीच एक छोटा आदमी कैसे मुस्कुराने की सोच सकता था खुश रहनें की जरा सी आदत क्या हुई खुद को खुद की ही नजर लग गई।

Monday, March 2, 2015

अथ मुखपोथी कथा:

...फिर श्री माधव ने देवऋषि नारद जी से कौतुहल- कातर दृष्टि से पूछा
हे ! देवऋषि नारद आप इतने दिन कहां थे देवलोक में हम सूचना शून्य हो गए है यहां सबकुछ इतना व्यवस्थित है कि दिव्यता में भी रस नही आ रहा है। आप सम्भवतः मृत्युलोक की यात्रा से लौटें है कृपा करके वहां के मानवों का वृत्तांत कहो उसे सुनने की मेरी बड़ी अभिलाषा है।
देवऋषि नारद बोलें:
भगवन आपका अनुमान सही है मैं अभी सीधा मृत्युलोक से ही आ रहा हूँ अब वहां आपकी माया से प्रेरित होकर अज्ञानता का अभिनय नही होता है। मनुष्य उत्तरोत्तर चालाक होता जा रहा है वर्तमान में वहां के समस्त प्राणी समयरेखा के खेल में उलझे हुए है और कभी खुद को आनन्दित तो कभी अवसादित बताते हैं।
श्रीमाधव ने उत्सुकता से पूछा देवऋषि ये समयरेखा क्या है? क्या मनुष्य ने पृथ्वी ग्रह का विभाजन इस रेखा के माध्यम से किया है?
नारद जी बोले नही भगवन् यह कोई आकृति वाली रेखा नही है यह आभासी दुनिया की एक समयरेखा है। आंग्ल देश के एक उत्साही युवा जिसका नाम जुकरबर्ग बताते है उसनें एक ऐसा आभासी मंच तैयार किया है जिस पर संगणक अंतरजाल और चलदूरवाणी के माध्यम से मनुष्य अपने जैसे लोग तलाशता फिर रहा है देश काल धर्म भाषा लिंग से इतर मनुष्य ने अपने एकांत को समाप्त करने की एक युक्ति विकसित कर ली है। आर्यवर्त भारत में तो इस मुखपोथी की लोकप्रियता वर्तमान में शिखर पर है प्रभु। विद्यार्थी से लेकर उद्यमी तक शासकीय सेवा से लेकर निजी क्षेत्र तक,गृहणी,रोजगार और बेरोजगार श्रेणी के सभी मनुष्य इस मंच पर सक्रिय है। मृत्युलोक पर मनुष्य की शायद ही कोई ऐसी कोटि बची हो जो इस मुखपोथी और समयरेखा के फेर में न उलझा हो। मनुष्य की तकनीकी दासता की हालत यह है प्रभु कि अब मनुष्य के हाथ में चलदूरवाणी नामक यंत्र हमेशा रहता है और वो मार्ग पर चलता चलता भी उसमें खोया रहता है वो कभी मुस्कुराता है तो कभी अचानक से खामोश हो जाता है। मनुष्य अपनी निजता प्रकाशित करके लोकप्रियता हासिल कर रहा है। आपको समयरेखा पर खाने पीने रोने धोने,यात्रा, जीने मरने,सुख दुःख, लड़ने और पलायन तक सबकी सूचनाओं का आदान प्रदान मनुष्य को करते देख सकते है। वर्तमान में राजनीति का भी यह बड़ा साधन बना हुआ है।
मुखपोथी पर सुबह मनुष्य एक तस्वीर लगाता है फिर उसके अन्य मित्र उसकी प्रशंसा करते है शाम तक वो उसी प्रशंसा से ऊब कर नई तस्वीर लगा देता है फिर प्रशंसा का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। मनुष्य क्षणिक रूप से खुश होता है फिर गहरे अवसाद में चला जाता है।
प्रभु ! मै पिछले एक महीने से इंद्रप्रस्थ में था वहां पुस्तकों का एक बहुत बड़ा मेला लगा हुआ था। अब पुस्तकों की बिक्री भी अंतरजाल के माध्यम से होने लगी है वहां लेखकों/कवियों/साहित्यकारों ने मेले में घूमकर अपने पाठकों के साथ बहुत से चित्र खिंचवाएं। पाठक बहुत प्रसन्न थे और बिना विलम्ब किए मेले से सजीव चित्रों का प्रकाशन मुखपोथी पर कर रहे थे।
अब लोकप्रिय लेखक वही है जो मुखपोथी पर अपनें पाठक तैयार करता है ऐसे लेखकों को हिन्द का एक प्रकाशन बहुत आदर देता है। कुछ बड़े लेखक मुझे जरूर अनमने नजर आए अब उन्हें भी लेखक कोनें में बैठ प्रवचन देना पड़ा वें अपनी दुलर्भ रहस्यता को लेकर चिंतित दिखे।
भगवन् इस मुखपोथी और समयरेखा ने आर्यवर्त में कवित्व को बड़ा मंच दे दिया है जो लम्बे समय से भरे हुए घूम रहे थे वे अब खुलकर काव्य लिख रहे है और तेजी से लोकप्रिय हो रहे है उत्तर आधुनिक काल की इस नई कविता ने स्थापित कवियों को चिंता में डाल दिया है वें मुखपोथी की कविता की दबे स्वरों में आलोचना करते है मगर अब वें खुद की अज्ञात कविताएँ भी इस मुखपोथी पर प्रकाशित करके यह बताते है कि देखों एक मुखपोथी के कवि और प्रकाशित किताबों वालें कवि के कवित्व में गुणात्मक अंतर होता है।
मैंने कुछ बड़े कवियों को उनकी बैठकों में सोमरस और धूम्रदण्डिका के साथ मुखपोथी की कविता और कवियों की अभद्र आलोचना करते भी देखा और सुना है।वो अप्रसन्न है भयभीत है असुरक्षित है यह मैं बताने में असमर्थ हूँ। ये स्थापित कवि केवल एक बात से अवश्य प्रसन्न है कि इनकी सजिल्द कविताओं की पुस्तकों के स्थाई ग्राहक ये मुखपोथी के ही कवि है बाकि सारी किताबें तो युक्तियों से शासकीय पुस्तकालयों में सुशोभित होती है।
हे ! भगवन मुखपोथी की दुनिया विचित्र रहस्यों से भरी पड़ी है सम्भवः है अब मनुष्य के व्यवहार के अध्ययन के लिए एक मुखपोथी अध्ययन शाखा विकसित की जाए और इस पर स्वतन्त्र शोध हो।
देवनारायण विस्मय से शून्य में देखते हुए बोले यह तो चमत्कार जैसा है देवऋषि ! परन्तु हमें यह अंतरदृष्टि से भी दिखाई नही दे रहा है लगता है देवलोक के संचार अभियंता को बुलाना पड़ेगा तब तक आप मृत्युलोक से यंत्रो का प्रबंध करों मैं यहां अंतरजाल खुलवाता हूँ।
मनुष्य की यह लीला देखनी ही पड़ेगी।
जो आज्ञा प्रभु !कहकर देवऋषि नारद अंतर्ध्यान हो गए।