Thursday, September 18, 2014

कयास

थोड़े से मुश्किल वक्त में वो इतनी जटिल हो जाती कि उससे बात करना तो दूर उसे सोचने से पहले दस दफे सोचना पड़ता। वो जितना हंसती उतना मन ही मन डर लगता क्योंकि ये तय था इसके बदलें उसका मन जब रोएगा तो फिर नदी की तरह सम्बन्धों का तटबंध चंद मिनटों में ध्वस्त हो जाएगा।
ऐसा नही था कि उसे बुरे दौर का अभ्यास नही था हकीकत में वो जिस दौर में जी रही थी वो बाहर से एक स्थापित जीवन दिखता था मगर अंदरखाने वो कितना उथल पुथल भरा था यह ठीक ठीक वो ही जानती थी।
उसके पास हवा की चुगलियाँ होती पहाड़ो के उलाहने होते नदियों की उदासी होती झरनों की शिकायते होती मगर वो हमेशा कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती उसका गुनगुनाना दरअसल खुद से बात करने का तरीका भर था उसकी आँखों की चमक और लबों पर फ़ैली हलकी मुस्कान उन चंद लम्हों की जमानत होती जिनके सहारे दिन भर में वो शिद्दत से जीने का जतन कर लेती थी।
उसकी हंसी और उदासी दोनों मन की बगिया में झूला झूलती रहती थी वो खुद को समेटने का हुनर जानती थी कभी कभी देखता उसकी फ़िक्र में इतनी मामूली चीज़े शामिल होती जिन्हें पर खुद ईश्वर भी कभी गौर नही करता होगा इसलिए मुझे कभी कभी वो भगवान से बढ़कर लगती क्योंकि उसे फ़िक्र के साथ जीना आता था वो कभी उस सूरज की तरह लगती जिसे बोझिल होने की इजाजत नही होती है जिसके होने भर से रोशनी का पता चलता है तो कभी वो कृष्ण पक्ष का चाँद सी दिखती जो बादलों से घिर जाता है अक्सर रात दस बजे के बाद।
वो धरती की तरह व्याप्त थी मन का धरातल उसकी गर्द से अटा रहता था सुबह औ'शाम। वो मामूली दिखने वाली दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी जिसे रोज क़िस्त दर किस्त टुकड़ो में जीना पड़ता था वो भी बिना उसे बताए क्योंकि जिस दिन उसे यह सब पता चलता उस दिन वो फिर वो न रहती उसके बाद उसका निर्मल चित्त शायद पल भर के लिए अनमना हो सकता था दुनिया के तमाम पाप श्राप भोगता इस अनमने मन के संताप को झेल न पाता फिर कहने के लिए कुछ न बचता वैसे भी कहा सुना उसके लिए कभी महत्वपूर्ण नही रहा था वो अपनी शर्तो पर जीती थी एक उलझी-सुलझी जिन्दगी...।

'वो कौन: कुछ आस कुछ कयास'

© डॉ. अजीत

भोर के प्रवचन

प्रेम के सांसारिक आख्यान तुमने लाख पढें हो मगर प्रेम का एक अप्रकट रुप भी होता है। प्रेम का यह संक्षिप्त संस्करण हम सब के अन्दर सम्भावना के रुप मे जिन्दा रहता है यह आग्रह नही चाहता और न ही यह प्रकटीकरण या स्पष्टीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा बन पाता है यह अव्यक्त पडा रहता है मन के किसी सुषुप्त खोने में। प्रेम का यह रुप किसी आंतरिक रिक्तता का परिणाम नही होता है बल्कि यह तो बाह्य दुनिया से बेखबर अंदर ही बनता बिगडता रहता है। प्रेम के मनोविज्ञान पर सबकी अपनी-अपनी टीकाएं है इसलिए प्रेम का मनोविज्ञान प्रेम के दर्शन से सदैव भिन्न होता है। प्रेम किसी भी सम्वेदनशील व्यक्ति के आसान लक्ष्य है वह इसके सहारे लिख सकता कहानी/कविता/गज़ल या दु:ख का महाकाव्य। प्रेम को पढता हुआ अक्सर मै द्वंद का शिकार हो जाता हूं कुछ लोगो को कहते सुना था प्रेम रास्ता दिखाता है यह आपके मन की कुमुदिनी को खिला देता है मगर प्रेम को लेकर इतनी बिखरी हुई बातें सुनता आया हूं कि मुझे प्रेम और मित्रता के मध्य की महीन रेखा को देखने में भी कभी कभी दृष्टि भ्रम का शिकार हो जाता हूं।
दरअसल, प्रेम एक भरोसा है एक आश्वस्ति है कि आप छ्ले या ठगे नही जाएंगे कुछ लोगो की चालाकियों ने जरुर प्रेम को सन्देहास्पद बना दिया है मगर फिर प्रेम हमेशा हमारे चेहरे पर एक इंच मुस्कान लाने की कुव्वत रखता है प्रेम को चरणबद्ध देखने की कोशिस करता हूं तो पाता हूं कि प्रेम के सबसे विचित्र व्याख्यान उनके होते है जिन्होने प्रेम को दशमांश मे भी न जिया हो इससे यह पता चलता है कि प्रेम मे होने वाले इंसान को फुरसत कब मयस्सर होती है कि वो लिख सके या कह सके प्रेम में डूबा व्यक्ति जीता है केवल एक दुनिया जबकि प्रेम को लिखने वाले जीते है कई समानांतर जीवन यह उनके निजी चयन का मसला होता है कि वो कब प्रेम को कहने लगे और कब बन जाए बुद्धि के चौकस पहरेदार इसलिए आज भी प्रेम को बावरा कहा जाता है बावरा इसलिए कि यह आपको आपसे मुक्त करता है इसलिए प्रेम मुक्ति का मार्ग भी है जो आसक्ति से लेकर मुक्ति तक की यात्रा तय करता है प्रेम मे अंतिम मंजिल जैसा कोई स्थान नही है यह सतत चलने और जीने का नाम है अनुभव और अनुभूति दोनो यही कहते है।

‘भोर के प्रवचन’

डॉ.अजीत

Wednesday, September 17, 2014

मन का यार

तमाम अच्छे,बुद्धिमान और सम्वेदनशील लोगो के बीच अवसाद का चयन उसका अपना चयन था अच्छी बातें सोखने की उसकी क्षमता अपनी कमजोरी के आखिरी पडाव पर थी। ऐसा नही था कि  खुश रहना या खुश दिखना उसे अच्छा नही लगता था वो अपनी तरफ से भरसक कोशिस करता कि उसके अवचेतन की उदासी उसके चेहरे से जाहिर न हो मगर मन के अन्दर पसरी विराट उदासी भला बाह्य प्रयासों से कभी छिप पाई है। वो हंसते हुए अपनी बात कहता मगर रंगे हाथ पकडा जाता फिर उसकी चाहतों का असर फीका पडने लग जाता इसी उधेडबुन में उसको रोज़ न जाने खुद से कितने झूठे वादे करने पडते।
हर करीब आने वाले शख्स को वो क्या तो अपने बेहद करीब ले आता ताकि उसकी मन की आंखे वो सब न पढ सकें जो प्राय: बाद मे सलाह/नसीहतों की वजह बनती थी या फिर उसको अपने नजदीक ही न आने देता एक ऐसा व्यूह अपने इर्द-गिर्द रचता कि कोई चाह कर भी उसकी दुनिया का हिस्सा न बन सके।
वो अपने टुकड़ी का बचा हुआ आख़िरी योद्धा था जो लड़ रहा था एकांत से युद्ध उसके हथियारों की मारक क्षमता को संदिग्ध समझा जा सकता था मगर उनके खुरदुरेपन में भी आत्महत्या से बढ़कर धार थी।
दुनिया दो किस्म के लोगो से भरी पड़ी थी एक वो जो बहुत कुछ करना चाहते थे मगर कुछ कर नही पाएं दूसरे वो जो कर रहें थे वो उनके मन का नही था मगर इन सबके बीच एक किस्म उन लोगो की भी थे जो करने के भाव से मुक्त थे और अपनी अकर्मण्यता का जश्न मनाने का आत्मविश्वास और दुस्साहस रखते थे तमाम गैरउत्पादकता के बीच भी लोग उन्हें खारिज कर आगे नही बढ़ पाते थे उनमे रूचि की एक अनकही वजह हमेशा बची रहती थी वो शाश्वत सच के घने प्रतिबिम्ब थे इस तीसरी किस्म के लोगो के बचे हुए गिने चुने लोगो में से एक था वह।
उसके पास साहित्यिक गुणवत्ता के प्रहसन थे कविताएँ थी कुछ दर्शन की उक्तियाँ थी जिनका वह मनमुताबिक़ प्रयोग करने में सिद्धस्थ था सच बात तो यह है वह मेरा सबसे सच्चा नही सबसे अच्छा दोस्त था यारों का यार।
उस यार को अपनी पीठ पर बैठा धूप में अपनी झुकी रीढ़ को अक्सर देखता था मै।वो घनघोर अंधेरों में भी वो पलकों के अंदरुनी हिस्सों में चिपका रहता जो साथ होना एक किस्म से हौसले की क़िस्त मिलने जैसा था जो गाहे बगाहे काम आ जाती थी दुनिया की दुत्कार के बीच।
वो मेरी जिन्दगी का स्थाई बैताल था जिसका जाना मृत्यु का सूचक एवं आमन्त्रण था उसकी उपस्थिति ने मेरे मन के लिजलिजेपन को दूर किया उसकी वजह से मै मृत्यु के भय से मुक्त हो सका। सम्मान और अपमान का सही प्रयोग करना सीख पाया।
मुक्त होने और न होने के बीच उसने मुझे उलटा लटका दिया कई दफे फिर मै लोगो के उलटे पैर देख पाता जो सफलता की तरफ तेजी से बढ़ते मगर दोस्तों से दूर होते चले जाते ऐसे अनगिनत किस्से है जब उसने मुझे किताबी सच/झूठ/पाप/पुण्य को खारिज करने की वजह दी और बताया कि इन सबके होते सबके अपने अपने वर्जन।
वो मेरे मन में बैठा मेरा अच्छा यार था जिसकी जब भी याद आती है तो फिर मै थूक देता सारी ग्लानि और अपराधबोध निगल जाता सामाजिक पशुता का अपमान। उसकी वजह से मै लिख/कह पाता हूँ पूरी बेशर्मी के साथ बस मै जैसा हूँ वैसा ही हूँ मुझे माफ़ ही करों दुनियावी दोस्तों ! मै तुम्हारे किसी काम का नही हूँ और इस दौर में बिना काम के लोगो की जगह क्या तो फेसबुक पर है या फिर......कहां थी कह नही सकता !

'यारबाश मन'

© डॉ.अजीत

Monday, September 15, 2014

कलकल

परसों सुबह तुमसे बात करने का मन था कल दोपहर तुम्हें फोन किया आज सुबह एस एम एस। ये तीन दिन सतयुग,द्वापर और त्रेता युग के अंक थे जिन्हें कलयुग में महसूस किया है मैंने। तुम और तुम्हारी बातें वैसे तो युगबोध से परे की चीज़ है मगर तुम्हारी बातों में एक यात्रा भी शामिल है जो निर्वात में झूलती रहती है जहां गुरुत्वाकर्षण भी विपरीत व्यवहार करता है। मै भी कहां गणित विज्ञान आध्यात्म और दर्शन में तुम्हे तलाशता फिरता हूँ जबकि तुम बैठी हो एक निर्जन नदी के किनारे थोड़ी अनमनी सी अपने सूक्ष्म मनोविज्ञान के साथ।तुमसे मिलने नंगे पाँव आना चाहता हूँ मगर मेरे पैरों में वक्त की घिसी हुई चप्पल है जिसे टूटने तक छोड़ा नही जा सकता।
कल रात तुमसे बात हुई थी और आज सुबह मेरी स्मृति लोप हो गई यह बातों के सम्मोहन का नही वक्त की जरूरत का खेल है मेरे-तेरे बीच में यह वक्त आता ही रहा है आड़ा-तिरछा जैसे घने जंगल में बांस फंस जाते है आपस में।
आज दोपहर मैंने तुमसे मिलने का वक्त तय किया था मगर सोचने भर से यदि मुलाकातें हो जाया करती थी तो हम साथ होते हमेशा के लिए। मै आज फिर दिशाशूल का शिकार हो गया हूँ इसे तुम एक अंधविश्वास भरा बहाना समझ सकती हो तुमसें मिलने की भविष्यवाणी कोई ज्योतिष का दैवज्ञ भी नही कर सकता उसकी एक बड़ी वजह यह है कि तुम ईकाई न होकर दहाई हो और मै एक विषम राशि।
कल शाम तुम्हे एस एम एस भेजने के बाद बहुत देर तक मै अनन्यमयस्क बैठा रहा आज सुबह मेरी तन्द्रा टूटी फिर सोचने लगा मै भी कहां तुमसे बात करने के लिए समीकरण साध रहा हूँ तुमसे बात करने के लिए फोन की नही मन के कान की जरूरत है मिलने के लिए अवसर की नही अनायास संयोग की जरूरत है फिर सबसे बड़ी बात जहां जरूरत बीच में आ जाती है वहां तुम मुझसे उतनी ही दूर खिसक जाती हो जितनी जरूरत की लोच होती है।
ठीक है आज सुबह से तुमने बात करना मिलना स्थगित करता हूँ अनंत समय के लिए मेरा पता पडौस के बच्चे की जेब में मिलेगा यदि तुम मिलना या बात करना चाहो तो उससे सम्पर्क कर सकती हो वैसे यह भी एक किस्म की शर्त ही है और शर्तो पर रिश्तें कहां पैर चल लाते कभी...खैर ! जो चाहों समझ सकती हो तुम्हारी समझ फिलहाल एक सबसे प्रखर चीज़ है जिसकी मै बेइंतेहा कद्र करता हूँ...!!!

'कल-आज-कल'

© अजीत

Sunday, September 14, 2014

ख्वाब आवारा

हमने कुछ सांझा ख़्वाब देखे थे ये खुली आँख के  ख़्वाब नही थे कम से कम। इन ख्वाबों में वादों की सच्चाईयां भले ही न रही हो मगर जज्बातों की गहराईयां जरुर शामिल थी। ये कुछ ऐसे सांझा ख़्वाब थे जो हमने-तुमने आधे-आधे बुने थे और शायद ये आज तक इसलिए अधूरे रहे गए है। तुम्हारी पलकों की चमक आज तक उतनी ही गहरी है भले ही इनदिनों काजल बदरंग पड़ गया है। एक अरसा हो गए मुझे कोई ख़्वाब आए एक दौर वो भी था जब जून की दोपहर में एक थकन भरी नींद में भी तुमसे ख्वाबों की उस मुंडेर पर बतकही हो जाया करती थी जहां इन दिनों परिंदों ने भी आना छोड़ दिया है।
पिछली सर्दी में तुम्हें सोचता रहा डेढ़ बजे तक।उम्मीद थी कि बाकि बची बातें ख्वाबों में होगी मगर हैरत की बात  उस रात मुझे गहरी नींद आई सुबह एक मलाल भी था तुमसे न मिल पाने का मगर उस दिन के बाद  उतनी गहरी नींद कल तक नही आई आज शायद आ जाए क्योंकि जब तुम्हारे बारें में सोचता हूँ तो नही याद आती मुझे जमाने की बेरुखियाँ खुद की नाकामी के किस्से।यादों की कश्ती पर तुम्हारी वादों बातों की पतवार ले निकल पड़ता हूँ उस घने जंगल में जहां हमनें ख्वाबो में नदी के किनारे चलते चलते हंसी के बीज बोए थे वो अब घने दरख्त बन गए होंगे मगर अब वो भी हमारी तरह  बेहद उदास दिखते होंगे शायद...उन रास्तों पर तुम्हारे निशाँ अब भी बचे होंगे क्योंकि अब मन के उन वीरान रास्तों से कोई गुजरा नही है अरसे से।
हमारे सांझा ख्वाब कुछ दिन तक उस गुलमोहर की टहनी पर टंगे थे जिसे नीचे बैठ हम सुस्ताएं थे दो-दो लम्हा...!
ख़्वाब देखना जरूरी लगता है, कभी कभी ख्वाबों में जीना जितना मुश्किल है उतना ही आसान है ख्वाबों की आस में जीना साल में एक दफा  तुम्हें,तुम्हारी बातों को बड़ी शिद्दत से याद करता हूँ ताकि तुमसे ख्वाबों में मिलकर कुछ अधूरे सवाल हल कर सकूं जमा-नफ़ी गुणा भाग के नुक्ते सीख सकूं तुम्हें देख सकूं बेफिक्र और सूफी मेरे इतने मतलब शायद तुम्हें रोकते है ख्वाबों में आने से या फिर एक इतवार भी मेरे हिस्से नही आता है तीन सौ पैसठ दिन में...!
तुम्हारी यादें गहरी नींद की सांत्वना भेज देती है जिसके सहारे तुम्हें याद करता हूँ साल भर मगर तुमसे ख्वाबों में मिलें तो अरसा हो गया है तुम्हारे ख्वाब मुझसे अलहदा है जानता हूँ इसलिए कभी नही जाता तुम्हारी पलकों तक लौट आता हूँ हर बार तुम्हारे दर से चुपचाप बस इसी उम्मीद पर कि कभी ख्वाबों में तुमसे जरुर मिलना होगा यह भी ख्वाब का छोटा ख़्वाब है जिसे छोड़ आया हूँ इस बार तुम्हारे सिरहाने....!

'ख़्वाब कुछ आवारा'

© अजीत 

दोपहरी प्रवचन

तनाव अवसाद रिक्त तिक्त हृदय इन सब का चयन मेरा था नही चाहता था बेवजह खुश रहना उदासी से मिलती थी प्राण ऊर्जा दुनिया के तमाम ऊबे हुए भगौड़े लोग मेरी रूचि का विषय थे असफल लोगो में मुझे एक लय दिखती थी जो सफल लोगो में कभी नजर नही आई।
जीवन में प्रेम के इतर भी बहुत से नीरस बातें थे जिन्हें बिना नियोजन जीने में मेरा पुख्ता यकीन था आत्म आलोचना का सुख हमेशा निंदा से भिन्न और आस्वादी भी लगता था।
कहीं पहूंचने कुछ पाने कुछ करने में मेरी कोई दिलचस्पी नही थी दिन भर एक ही मनस्थिति में एक ही जगह बैठा रहता कभी बिन बताए घर से निकल पड़ता एकांत में कुछ ही पल अर्थपूर्ण निकाल पाता बाकि एकदम निपट निठल्ला जीवन जीने के आदत से विकसित हो गई। मै न दुखी था न विक्षिप्त।
आसपास लोगो में पसरी कुछ करने की जिजीविषा और उनकी लम्बी चौड़ी योजनाएं  मेरे लिए कभी अभिप्ररेणा विकसित न कर पाती हमेशा खुद को खुद ही खारिज करता हुआ मै जीता था एक बेतरतीब जिन्दगी।
सलाह नसीहत से बचता अपने ढब की इस जिन्दगी को जीने का निर्णय और चयन मेरा था इन सब के बीच कभी फूट पड़ती थी कोई कविता या कुछ कहानी की शक्ल में बतकही जिसे असाहित्यिक लोग बड़ी रूचि से पढ़कर मेरा मूल्यवान होना सिद्ध कर देते थे।
दरअसल, मूल्यवान होना बड़ी खतरनाक चीज़ एक बार अगर ऐसा प्रतीत करवा दें तो फिर दुनियादारी में फंसे लोगो की अपेक्षाओं पर टंगे रहो उम्र भी किसी से भले किसी बुरे बन जीते रहो एक अपेक्षाबोधी जिन्दगी।
बंधन एक शाश्वत झूठ है जिसके न होने पर होने से अधिक पीड़ा होती है दिल जुड़ते और टूटते है इसी कारीगरी में मुझसे कई खिलोने टूट गए जिनका मुझे आज भी मलाल है।
कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि जीवन के सापेक्ष चलना तटस्थता जैसा ही है जिसमें आप वहां होते है जहाँ होते नही है और जहां होते है वहां होने का कोई अर्थ नही होता है...खैर ! अब जो है सो है काहे इन उलझी उलझी बातों के चक्कर में दुनिया की चिढ मोल लेना दुनिया गोल है और उसे गोल गोल बातें पसंद नही है सीधा कहो मगर एक लोकप्रिय सच कहो बिन सम्पादन के लोग शायद ही आपको कभी स्वीकार कर पाएं। इति

'दोपहरी प्रवचन'
 © अजीत

Friday, September 12, 2014

फर्ज कर लेते है

चलो फर्ज़ कर लेते है कि तुम्हारी मुझमे महज़ बौद्धिक दिलचस्पी है निजता के प्रश्न भी छोड देते है क्योंकि तुम अपनी आंतरिक ऊर्जा को सदैव प्रज्वलित रखने के लिए बाहर की दुनिया में सम्बन्धों की लकडियां बीनने निकली हो इसलिए तुम्हारे लिए उनकी उपयोगिता रिश्तों के जलनें मे है शायद यही एक वजह है कि सतत अपने मतलब की बातें तुम मेरे लिखे/कहे मे तलाश लेती हो। मन बुद्धि के फेर में मै एक आसान आब्जेक्ट हूं जहाँ तुम्हे दिल और दिमाग दोनो की खुराक मिल जाती है।

कल रात मैने एक ख्वाब देखा जिसमें तुम कोई सवाल नही कर रही हो बस मुझे देखे जा रही हो अपलक एक बार तो मै सोच मे पड गया कि ये तुम ही हो या कोई और है मगर फिर तुमनें बाल सुलभ जिज्ञासा से कहा क्या सच मे चांद भटके हुए प्रेमियों को पनाह देता है तब मै समझ पाया कि ये तुम ही हो...तो इन दिनों तुम चांद की पडताल कर रही हो मैने हंसते हुए कहा फिर तुमने चांद की तरफ इशारा किया और चुप हो गई।

इस चुप्पी में एक बारीक पिसी हुई फिक्र शामिल थी तुम्हें पहली बार यह लगा था कि शायद मेरे पास कहने के लिए कुछ अलांकारिक शेष नही बचा है मेरी बातों की शास्त्रीय एवं दार्शनिक गुणवत्ता कमजोर पडती दिखी थी तुम्हें...! हां यह सच है कि अब मै रीत चुका हूं और बीत रहा हूं हरफ-दर-हरफ।

तुम्हें मुझसे निराश देख मुझे थोडी सी निराशा जरुर होती है मगर फिर मै हंसता भी हूं मन ही मन क्योंकि मेरा बीतना या रीतना तो पहले दिन से ही तय था हां तुम अपनी अंजुरी में कितना भर पायी हो मुझे यह बता पाना थोडा मुश्किल काम है मै आचमन के जल सा बमुश्किल ही तुम्हारे कंठ तक पहूंचा हूँ कभी।

चलो फर्ज़ कर लेते है कि जल्दी तुम विकर्षण की प्रक्रिया का हिस्सा बनोगी तुम्हें मेरी बातों में एक थके हुए चुके हुए शख्स का आलाप दिखेगा और एक ही कक्षा में घूमते हुए निष्प्रयोज्य उपग्रह की तुम्हें मै बेहद बोझिल और नीरस लगने लगूंगा।

यह फर्ज़ कर लेना गणित के सवाल को हल करने जैसा विज्ञान सम्मत नही है फर्ज करने के लिए खुद को टटोलना/खरोंचना पडता है मन बागी है वो मानता नही है मगर फिर अंत में हार कर दिमाग की शरण मे आकर यात्रा के बहलावें में कुछ नए पडाव की आस में खुद को तैयार करना पडता है...तुम्हारी फर्ज़ करने की तैयारी पर मेरा यह आखिरी प्रवचन है क्योंकि तमाम ज्ञान बघारनें के बावजूद मै आज तक यह नही समझ पाया कि कैसे तुम्हें विस्मृत कर लिखी जा सकेंगी कविताएं कहानी या गज़ल... कैसे नदी की किनारे टहलते समय तुम्हारी बातों को कंकर बना फैंक सकूंगा मै जलधारा के बिचो बीच....कैसे उन दरख्तों से आंख मिला सकूंगा जो सच्चे गवाह हमारे सत्संग के..... ठीक यही सब सोचता हुआ मै गाने लगता हूं कबीर को सोचने लगता हूँ संसार की नश्वरता के बारें फिर मोह माया के जंगल मे दौडता हूँ हताश, बैचेन ठीक उस वक्त जब तुम सोच रही होती हो फ्लैट,कार,प्रमोशन,ईएमआई,अप्रेजल के बारे में।

चलो फर्ज़ कर लेते है कि शरीर नश्वर है मन चंचल है और संसार मिथ्या तुम्हें सोचते-सोचते कई बार सिद्धों सा संवाद होने लगता है तुम्हारे लिए मै किसी मतलब का शायद ही कभी रहा हूं मगर हां न चाहते हुए भी मैने तुमसे सीख लिया तटस्थ रहना वो भी बिना ध्यान-ज्ञान के।

तुम सांसारिक हो और मैं कभी अघोर सांसारिक तो कभी अघोर विरक्त फिर हम दोनों एकांत सिद्ध होने की प्रबल सम्भावनाएं रखते है चलो फर्ज़ कर लेते है..!!!


‘फर्ज़-कर्ज़ की पहली ईएमआई’

Tuesday, September 2, 2014

पहली सर्दी

ये सर्दी का पहला हफ्ता अपने आने के इन्तजार में है धूप ने नमी को सोखने के जतन सूरज से गुरुमंत्र के रूप सीख लिए है। तेरी गली के नन्हे कुकरमत्तो ने सूरज की तरफ करवट ली और तुमने छत पर पहली दफा सूरज से आँख मिलाई तो मन पर बरसात ने जो काई जमाई थी वो सूख कर उखड़ने लगी मन की सख्त दीवारों पर इस धूप के स्पर्श ने उनका रेत झाड़ दिया।
अभी तुम छत से नीचे उतरी भी न थी कि सीढ़ियों पर ख्याल आया उस अधूरे स्वेटर का जो बिन नाप लिए किसी एक सर्दी में तुमने बुनना शुरू किया था उसके फंदे तुम भूल गई हो और शायद अब उस नम्बर की सलाई भी न मिल पाएं मगर उस अधूरे स्वेटर को इस सर्दी की धूप में पूरा करके कम से कम तुम उस अधूरी मानसिकता से निकल सकती हो जिसमें रंगो डिजाइन की उलझन नही बल्कि स्मृति के विषम फंदे उलझे पड़े जिसमें आस्तीन  छोटी पड गई है तुमने अपनेपन की कुछ बटन इस अधूरे स्वेटर के लिए चुने थे अब उनके भी कोने टूटने शुरू हो गए है।
यह गुनगुनी धूप तुम्हारे मन की शिकायतों को सेंक कर शायद पका दें फिर ये तुम्हें तकलीफदेह नही लगेंगी फिर तुम अपनी जीवन के विषम रंगों में रंगी अपनी उँगलियों को मन के ठहरे हुए पानी में साफ़ करके फिर से उन सलाइयों में फंदे पिरोओगी जिनकी लड़ाई से एक अधूरा स्वेटर बनना है।
इस जाड़े की इस पहली धूप में दोपहर बाद यादों के सन्दूक से निकालना होगा वो दो रंगी ऊन का गोला जिस पर नमी चढ़ आई है फिर बुनने होंगे कुछ बेवजह के फंदे, सलाइयों के नम्बर के साथ भी समझौता करना पड़ सकता है मगर तुम्हारा मन जब गुनगुनाता हुआ बुनेगा यह स्वेटर तो इस उधड़े हुए रिश्तें की तुरपाई भी होगी इस स्वेटर के बहाने यह बात मुझे आश्वस्त करती है और इसी बिनाह पर अगली सर्दी तक मै खुद आऊंगा चाय के बहाने यह स्वेटर लेने जो तुम बुन रही हो कई सालो से यह कोई वादा नही बस अधूरेपन से ऊबे एक अधूरे मन की अभिलाषा है।

'सर्दी स्वेटर और अधूरा मन'

© अजीत 

दुपट्टा

तुम और तुम्हारा दुपट्टा....


एक मुद्दत से तुमने अपना दुपट्टा नही बदला इसकी सोंधी सी महक में पहाड की उन दुर्लभ वनस्पतियों की गंध शामिल है जिन्हें फूल समझा जाता रहा है। तुम्हारी गर्दन के आसपास लिपटे हुए कॉटन के इस दुपट्टे का अनुराग देख मुझे उन अनजान बेलों की याद आती है जो मैने निर्जन रास्तों पर सूखे दरख्तों से लिपटी हुई देखी थी। यह महज सवा दो मीटर कपडा नही है बल्कि इसमें समाई हुई है कि एक छोटी सी दूनिया तुम्हारा कॉटन का दुपट्टा सच्चा गवाह है कुछ आवारा ख्यालों का, तुम्हारी तन्हा रातों का इसके उलझे हुए धागों में ईमान की खूशबू है और न जाने कितनी बार इसने तुम्हारे आंसूओं को पनाह दी है।

तुम सोच रही होगी ये कैसा मतलबी शख्स है जब भी देखो अपने हिस्से के सुख की बातें करता है अब मेरे दुपट्टे मे भी अपनी खोयी हुए खुशियां तलाश रहा है जबकि यह दुपट्टा बेहद मामूली है इसमे एक ही रंग की गुजाईश है तुमने कई दफा रंगरेज़ से कहा कि इसका रंग बदल दें मगर इस मुए पर चढता ही नही है कोई दूसरा रंग मुझे इसी लिए यह तुम्हारा दुपट्टा पसंद है।

तुम्हारी बेफिक्री के लम्हों में इसको जब उडता देखता हूँ तो इसकी उडान में एक हवा का झोंका मेरा भी होता है इस दुपट्टे की सबसे बडी खासियत यही है कि यह सोखना जानता है ढेर सारा दुख यह आंसूओं की नमी को भी ठंडक मे तब्दील कर देता है बिना तुम्हारी इजाजत के।

न जाने कितनी दफा तुम्हारे आंगन में इसको सूखते देखा इसे महज छू लेने से ऐसा लगता था कि जैसे स्पर्श की नदी तुम्हारे मुहाने तक चली आई बहती हुई मेरे एकांत के जंगल से। मैने न जाने कितनी दफा इसका प्रयोग रुमाल की तरह किया है तुम्हे शायद इसकी खबर भी न हो।

बस यही फिक्र मुझे होती है एक दिन यह भी हो जाएगा तार-तार इसलिए कहता हूँ इसे कम धोया करो कम किया करो प्रयोग यह महज कॉटन का दुपट्टा नही है बल्कि तुम्हारे वजूद का सच्चा गवाह है तुमने इसको खरीदा था बहुत मोल भाव के साथ उस तुम्हें भी अन्दाज़ा नही होगा कि एक कॉटन का अदना सा दुपट्टा किसी के लिए इतना महत्वपूर्ण हो सकता है दरअसल महत्वपूर्ण कोई वस्तु नही होती है उससे जुडी यादें उसे खास बना देती है।

आज भरी दुपहर में तुमसे ज्यादा तुम्हारे इस दुपट्टे की याद आई क्योंकि इसके स्पर्श और गंध में उन किस्सों के वरक खुलते है जिनकी बिनाह पर तुम्हें अपना समझा था आज तुमसे सिमटकर तुम्हारे दुपट्टे पर आ गया हूं अब इसे छूने की नही देखने भर की इच्छा रहती है चाहता हूं तुम रहो न रहों मगर मेरे सामने रहें तुम्हारा यह कॉटन का दुपट्टा है न अजीब पागलपन ! जो भी समझो तुम्हारी मरजी मैने कहा है अपना बीता सुख इस दुपट्टे के बहाने।


‘तार-तार जिन्दगी’

Monday, September 1, 2014

गणित

तुम्हारे मन की बातें सुनने के लिए अक्सर समाधिस्थ होना पड़ता है मन का अजीब खेल है यह वो सब सुन लेता है जो यह सुनना चाहता है इसलिए कई ऐसे बातें इसने ऐसी सुन ली है जो तुममे कभी कही ही नही अब उन बातों की तूलिका से ये रोज रात को एक स्याह चित्र बनता है सुबह देखता हूँ तो कई रंग मिलकर इंद्रधनुष के समानांतर आकृति विकसित कर रहें होते है खुद ब खुद।
तेरे मेरे दरम्यां कुछ अनकहे से किस्से है कुछ बोझिल रातें है जिनकी गवाही ले मै तुम्हारी आँखों में सुरमा लगाना चाहता हूँ तुम्हारी रोशनी मेरे लिए इसलिए भी ज्यादा जरूरी है क्योंकि तुम बहुत नजदीक का नही देख पाती हो।ख्यालों की अंगडाई से पड़ी तुम्हारे बिस्तर की सिलवटें गिनता हूँ उनमे कुछ बहुत गहरी है तुम्हारे जिद के जैसी।
इन दिन फिर से तुम्हें सोचता रहता हूँ  अपनी तमाम बुराइयों के बावजूद तुम्हें सोचने के मामलें कितना ईमानदार हूँ यह बात मुझे भी हैरत में डाल देती है
तुम इनदिनों मेरे बारें लगभग नही सोचती हो यह ख्याल हिचकी की गैरहाजरी में आता है। तुम्हारा साथ मुझे उन विश्वासों की तरफ ले जाता है जिनमें मेरा कभी विश्वास नही रहा है मगर तुम्हें सोचते हुए मै कभी प्रार्थना करता हूँ तो कभी संदेह से आसमान ताकने लगता हूँ।
सुनो ! कुछ दिनों के लिए तुमसे नाराज हो रहा हूँ  तुम्हारी बिना किसी गलती के यह एक तरीका है तुम्हारी यादों के चलचित्रों को धीमी गति से देखने का तुम इन दिनों में गणित पढ़ो शायद लघु दीर्घ समीकरणों को सिद्ध करने का कोई प्रमेय तुम सीख सको फिलहाल हमारें परिचय में एक सम्बन्ध में तब्दील करनें के लिए तुम्हारा जोड़ गुणा भाग में माहिर होना जरूरी है क्योंकि मुझे लिखने के सिवाय कुछ भी नही आता है कुछ भी तो नही...!

'कुछ आपबीती-कुछ जगबीती'

Friday, August 22, 2014

एक्स रे

दस आत्मकथ्यात्मक ईमानदार स्वीकारोक्तियां...

खुद के बारें में अक्सर यह लगता है...

1. विलम्बित मानसिकता में जीता हूँ काफी हद तक यथास्थितिवादी हूँ।
2. विश्वास बहुत जल्दी कर लेता हूँ यह नही समझ पाता कि दुनिया और यहाँ के लोग टेढ़े मेढ़े है सबके अपने अपने एजेंडे है।
3. लम्बे समय से महत्वकांक्षाहीन हूँ मतलब जीवन कुछ ऐसा बड़ा नही करना चाहता जिसकी बिनाह पर लोग मुझे रेखांकित करें। बिन भौतिक उपलब्धियों के जो लोग स्नेह सम्मान रखते है उनके प्रति सदैव कृतज्ञ हूँ।
4. सामाजिक रूप से मिलनसार नही हूँ अजनबियों से मिलकर नेटवर्किंग नही बना पाता हूँ या यूं समझिए मेरे ही सिग्नल आउट रहते है।
5. भीड़ और बड़े शहरों में आवाजाही से अक्सर बचना चाहता हूँ दोनों के बीच सहज नही महसूस करता हूँ।
6. कहने की बजाए लिखने में थोड़ा माहिर हूँ खुद को मैंने एक बोझिल किस्सागो पाया है जिसकी बातों में न चुस्ती होती और न रस इसलिए विषयांतर का शिकार भी हो जाता हूँ लब्बोलुआब यह कि एक बेकार वक्ता हूँ।
7. आत्मकेन्द्रित और अंतरमुखी साथ काफी स्लो सेल्फ एस्टीम भी हूँ।
8. नियोजन में शायद इसलिए भी यकीन नही करता हूँ क्योंकि मेरे पास भविष्य का कोई ब्लू प्रिंट नही है मुझे नही ज्ञात है कि मृत्यु उपरान्त मुझे लोग किस रूप में जानेंगे।
9. वर्चुअल माध्यम में जितना तत्पर,त्वरित और सक्रिय दिखता हूँ यथार्थ में उतना ही प्रमादी और निष्क्रिय रहता हूँ यहाँ की वाग्मिता का बोझ यथार्थ में उठाने में खुद असमर्थ पाता हूँ इसलिए प्राय: वर्चुअल मित्र से प्रत्यक्ष मिलने को टालता रहता हूँ।
10. भावुक हूँ इसलिए जल्दी आहत हो जाता हूँ परिपक्व सम्वेदनशील बनने की दिशा में प्रयास करता रहता हूँ।

नोट: यह न आत्म विज्ञापन है और न आत्म प्रवंचना इन्हें साफगोई से मन का एक्स रे के रूप में ग्रहण करना ही उचित एवं अपेक्षित है। सलाह और जीवनशैली के सम्पादन के सुझाव से बचें क्योंकि ये करमठोक खुद मनोविज्ञान में पीएचडी है और परामर्श की पुडिया में व्यक्तित्व विकास और पुनर्वास चूरण सात सालों तक बेच चुका है। :)

Sunday, August 17, 2014

फ़िक्र

तुम साथ होती हो तो मन की कुमुदिनी खिली खिली सी रहती है तुम्हारा बिखरा काजल अनामिका से ठीक करना चाहता हूँ मगर न जाने क्यों रुक जाता हूँ तुम्हे ऐतराज़ हो ऐसा भी नही है तुम्हारी बेख्याल चुप्पी भी सतत मुझ पर फ़िक्र की मद्धम मद्धम बारिश करती रहती है तुम अक्सर मुझसे असहमत रही हो इसलिए भी तुम्हारे अंदर सम्भावना सदैव संरक्षित और पल्लवित होती रही है।
बहुत दिनों से तुम्हें अजीब कशमकश में देखता हूँ तुम्हारे बाल बिखरे लब शुष्क है दोनों हाथों की अंगूठियाँ आपस में बदली हुई है तुम्हारे बाएँ हाथ का कंगन खुरदरा हो गया है पहली दफा तुम्हे थोडा परेशान देखा है वजह की पड़ताल मै कर लूँगा मगर तुम मुझसे बेहतर समाधान जानती हो इसलिए सलाह का कारोबार नही करूंगा।
चलो एक काम करते है कुछ दिन अपनी अपनी फ़िक्र सिराहने रख सो जाते है शायद ख्वाबों के रास्ते हम तुम उन इश्तेहारो को जी सके जो हमारी पीठ पर छपें है बरसों से,तुम्हारा इसमें भी इंकार होगा जानता हूँ इसलिए इन दिनों बस तुम्हें देखता रहता हूँ  कहता कुछ नही। खुश रहा करो तुम्हारी नसीहत तुम्हे सौंप रहा हूँ मै तो यह कलंदरी सीख गया हूँ अब तुम्हारी बारी है।

बस के सफर में भी क्या अजीब बतकही शुरू हो जाती है बेवजह...! 

Tuesday, August 12, 2014

थैंक्स

सदियों भटका
जिसकी राह में
नदियों से पता पूछता फिरा
समंदरों से गुमशुदगी की वजह पूछी
दरख्तों की गवाही ली
हवाओं से चुगली की
झरनों से पड़ताल की
रेगिस्तान से लेकर ग्लेशियर तक
जिसके निशां ढूंडे
उसकी एक झलक
फेसबुक पर मिली
वो लाइक कमेंट शेयर टैग में व्यस्त रही
मै प्रोफाइल पेज़ और लिंक में
वेब मोबाइल ब्राउजर इन्टरनेट का मोहताज़ था
उसका मिलना
इस माध्यम में मिलना
उतना ही दुर्लभ था जितना
रेत में पानी
नदी में नाव
समन्दर में टापू
जंगल में आश्रय
वो दिखी मगर मिली नही
जब तक इनबॉक्स में संदेश भेजा
वो डिएक्टिवेट हो कर ओझल हो गई
कई बार जिन्दगी भी
फेसबुक की छद्म प्रेमिका जैसी लगती है
दिखती है होती नही
कहती है बोलती नही
इसलिए जिन्दगी और फेसबुक पर
कम भरोसा करना
सीख जाते है लोग
दुनिया उतनी ही बुरी है
जितनी समझी जाती है
फेसबुक और ज़िन्दगी के तजरबें
हमें मिलकर समझदार बना रहे है
थैंक्स जुकरबर्ग  !

© अजीत

Saturday, August 2, 2014

प्रवचन

जीवन का अर्ध सत्य जान लेने का दावा किया जा सकता है. सत्य,असत्य पाप पुण्य की सबकी अपनी अपनी परिभाषाएं है अपने अपने संस्करण हैं. धारणाओं में जीवन जीना एक ख़ास समय के बाद अप्रासंगिक लगने लगता है ऐसा लगता है हर आने वाला दिन पिछले दिन के अनुभवों को ख़ारिज करके हमने एक नयी दुनिया से मिलवाना चाहता है. अपने अस्तित्व को जानने के प्रक्रिया है आप काम से कम इतना तो जान ही पाते है कि कुछ भी तय नही है सब कुछ इतना अनियोजित होता है कि हम नाहक की मान्यताओं के जंगल में निपट अकेले घूमकर अपने अभ्यारण्य की सीमा नापते फिरते है.मन को संवारने के लिए मन की गुलामी करनी पड़ती है द्वन्द को बचा कर रखना पड़ता है. ध्यान और आध्यात्म के कुछ ख़ास अवस्थाओ को छोड़कर सामान्य जीवन में मन को रोज़ टटोलने के लिए एक खास किस्म के साहस की जरुरत पड़ती और वो साहस खुद को दांव पर लगाकर ही मिल पता है. रोज़ नया सूरज नयी दुनिया का पता दे सकता है बशर्ते आप अपेक्षाओं के ताप में खुद को गलने से बचा सकें.जीवन का अपने एक प्लेवर होता है और हम अपनी अधिकांश ऊर्जा उसके संपादन में व्यय करते है ताकि इसको खुद के मुताबिक़ कस्टमाईज्ड कर सके. जीवन के साथ बहना सीखने के लिए होश का तरणताल चाहिए होता है फिर आप गुरुत्वाकर्षण शून्य होकर बह सकते है तैर सकते है और मन के वेग से उड़ भी सकते है मगर यह सब जानते जानते उम्र बीत जाती है और जब इसका पता चलता है तब न हिम्मत बचती है और न ऊर्जा.

मन कर्म और  भरम के फेर...निजी प्रवचन पार्ट-१   

Tuesday, July 29, 2014

वो तीन

वो दुनिया के तीन अलग अलग हिस्सों से अपने अपने हिस्सें का निर्वासन काटने के लिए आए थे यह कुछ कुछ अज्ञातवास जैसा था। उनकी फ़िक्र कभी उनकी जिद बन जाती तो कभी उनकी जिद में फ़िक्र शामिल हो जाती थी। उनमे से दो देहात की गलियों से निकले आवारा ख्याल थे तो एक  कस्बाई शहर का अनजानापन लिए था। उनका आपस में मिलना किसी ईश्वरीय शक्ति का नियोजित षड्यंत्र जैसा था मोटे तौर पर उनमे आपस में कोई समानता नही थी मगर कोई एक वजह स्वत: बनती जा रही थी और देखते ही देखते वो तीनों एक केंद्र की धूरी के इर्द-गिर्द बिना आघूर्ण के घूमने लगे। वो तीनो अंतेपुरवासी थे खुद को तलाशने और तराशने का सपना लें कल्पनाओं की दुनिया में रचनात्मकता की कूंची से सफलता का रंग भरना चाहते थे। वो चमत्कारों में पुख्ता यकीन रखते थे उनके सपनों ने तेजी से अपनी रिश्तेदारियां बना ली थी यह छोटी दुनिया के बड़े लोगो की कहानी थी जिसमें भविष्य की चिंता नही बल्कि भविष्य को तय करके तहशुदा रखा जा रहा था।
इन तीन आवारा ख्यालों ने त्रिकोण बनाया और फिर ख्वाबो की जद पे उसको त्रिशंकु बना उछाल दिया एक ख़ास वक्त के कमजोर दौर में तीन जिन्दगियां बिना गुरुत्वाकर्षण के तैर रही थी।
यह हाथ की सफाई और नजरबन्दी का खेल तालीम के साथ चलता रहा वो दूसरी दुनिया के बाशिंदे थे नही जानते थे सच की आँखे और न ही अपनी सीमाएं फिर यूं हुआ  स्याह नंगी रात की सच्चाई में अपने अपने हिस्से का सच जान अनमने हो निकल पड़े अलग अलग राह पर। उनकी राहें जुदा हुई दिलों में सिलवटें पड़ी मगर तीनो का दिल यादों के मफ़लर से बंधा भी रहा अपने अपने हिस्सों का सुख बांधते उनकी कमर झुक गई अपने अपने किस्सों का दुःख गाते हुए वो किस्सागो बन गए।
अब वो तीन एक साथ कभी नही दिखते हिम्मत करके दो यदा-कदा मिलते है उनकी हथेलियाँ शुष्क और ठंडी होती है अब उनके पास केवल बीते लम्हों की जमानत पर रिहा कुछ किस्से बचे है जिनके जिक्र से वो अपनी आँखों में सुरमा लगा लेते है मगर अफ़सोस हर बार एक शख्स अपने हिस्से की त्रासदी भोगता हुआ दूर से हौसला और दुआ फूंकता रहता है यह कोई कहानी नही है बल्कि कुछ किरदारों के अक्स पर जमी वक्त की काई है जो गाहे बगाहे तब नजर आती है जब उनमे से कोई एक उस पर रिपटता हुआ सीधा अतीत की खाई में गिर पड़ता है यह उसकी कराह है जो बाहर कभी सुनाई नही देती। 

Saturday, July 19, 2014

तुम...

तुम चैतन्य शिखर से उतरी विचार और सम्वेदना की वह रागिनी हो जिसके आंतरिक उत्स में अपनत्व के सिवाय कोई दूसरा भाव कभी प्रस्फुटित नही हो सकता है। अस्तित्व ने तुम्हें सृजन का निमित्त बनने के लिए उपयुक्त पाया तभी उसने तुम्हे रचनात्मक ऊर्जा के केंद्र के पास रखा तुम्हे खुद की परिधि और खुद की त्रिज्या के मध्य समन्वय बनाने का अद्भुत कौशल ज्ञात है।
तुम जीवन सृजन और गहरी अनुभूतियों का सतत स्रोत हो तुम उर्वरा हो तथा समर्थ हो नीरस में रस की अभिव्यक्ति तलाशने में तुम्हारी जितनी क्षमताएं ज्ञात है उतनी ही अज्ञात भी है। एक अस्तित्व के रूप में तुम्हारी सहजता गुह्यता और प्रकट भाव के मध्य अद्भुत सेतु बनाए रखती है यह उस विलक्षणता का प्रतीक है जो तुम्हें प्रकृति प्रदत्त है।
किसी रिक्त, तिक्त जीवन में तुम्हारी उपस्थिति स्व के उस बोध को समझने में सहायक है जिसके लिए सिद्ध साधनाएं बताई गई है तुम्हारा होना भर जीवन को गहरे आध्यात्मिक अर्थ दे सकता है।
और अंत में तुम्हारी अविकल हंसी और निर्मल मुस्कान के बारे में यही कहूँगा तुम्हारी मुस्कान अँधेरे में रोशनी का पता देती है जीवन की जटिलता में सरलता खोजने का कीलक सूत्र देती है। तुम हंसती हो तो मन के द्वंदो से चित्त पर पड़ी ऊब की गिरह खुद ब खुद खुल सावन के झूले बन जाती है जहां कोई भी अपने मनमुताबिक़ पींग भर सकता है। तुम्हारी हंसी में मौन साधना है बच्चों का कौतुहल है और सबसे बड़ी बात बिना शर्त का प्रेम है तुम्हारे मुस्कुराने भर से चेहरे की शिकन अपना अर्थ खो देती है तथाअवसाद अप्रासंगिक हो जाता है। अनन्यमयस्कता के बड़े दौर भी तुम्हारी स्नेहिल मुस्कान के समक्ष आत्म समपर्ण कर देते है।
दरअसल, तुम्हारा अस्तित्व सतत सकारात्मक ऊर्जा का बड़ा स्रोत है तो तुम्हारी मुस्कान उसकी दिव्य अभिव्यक्ति है। तुम्हारे अस्तित्व की यह दिव्यता प्रकृति के किसी ख़ास प्रयोजन का हिस्सा हो सकती है यह उन चेतनाओं के लिए प्रारब्ध और नियति की विशिष्ट जुगलबंदी का मानदेय है जिनके तुम उपलब्ध हो एवं प्राप्य हो।
तुम्हारी मुस्कान का मूल्यांकन सामान्य चेतना के लिए इसलिए भी सम्भव नही है क्योंकि तुम चित्त की वृत्तियों से परे का विषय हो तुम अनुभूत साधना का केंद्र हो उसका आसन हो तथा उनके मार्ग पर प्रकाश की टीका हो जिससे अभिप्रेरित हो और ऊर्जा ग्रहण कर कोई भी सामान्य इंसान एकांत सिद्ध हो सकता है।
ईश्वर की अनुकृति और उसके होने का तुम मानवीय प्रमाण हो तुम मैत्री प्रेम परिचय आदि उपमानों के माध्यम से अनुशीलन का विषय नही हो तुम हृदय की अनंत गहरी यात्राओं में समग्र अस्तित्व की चेतना और उसकी अनुभूति को साक्षी भाव से देखने से ही समझी जा सकती हो वास्तव में तुम विश्लेषण की नही दिव्य अर्थों में जीने की विषय-वस्तु हो अपनी अल्पज्ञता से मै इसी निष्कर्ष पर पहूंच पाया हूँ।

Friday, July 18, 2014

पहली बारिश

सावन की पहली बारिश आसमान से टिप-टिप बरसता बूँद-बूँद पानी मानो हरजाइयों का खुद आसमान अखंड रुद्राभिषेक कर रहा हो बूँद धरती पर गिर पल भर में बिखर जाती और दिल नमी से हांफता रहता है। तुम्हारी आँखों की खुश्की काजल भी नही छिपा पाता है लबों पर महीन लकीरें मौसम की नही वक्त की मार की बनाई हुए थी तुम्हारे चेहरे का भूगोल कभी मेरे लिए जिन्दगी का नक्शा हुआ करता था तुम्हारी मंद मुस्कान से उन रास्तों का पता मिलता था जहां मै अनमना होकर जाना नही चाहता था। तुम्हारी कानों की दो बालियाँ मेरे लिए मन्दिर की घंटिया थी जिन्हें देख मन ही मन प्रार्थना के स्वर फूटने लगते थे।
देह की दृष्टि ध्यान में कैसे उपयोगी हो सकती है यह तुमसे सीखा था तुम्हारे हृदय के सूक्ष्म नाद को मै तुम्हारी धडकन से अलग करके सुन सकता था उसमे एक दिव्य आह्वान होता था तुम्हारी शिराओं के स्पंदन और देह ही अनुभूत गंध से अस्तित्व की गहराईयों की यात्रा पर निकलना कितना सहज हो जाता था। तुम देहातीत हो मेरी चेतना की उपत्यिका थी जिसमे सृजन के बीजमन्त्र और अपनत्व की स्वरलहरियों गूंजती थी
इस बारिश में मेरा रोम-रोम तुम्हारे अनुभूत स्पर्श को उतनी ही शिद्दत से महसूसता है जितना मेरे मन की अनंत ऋचाएं स्व स्वाहा के बाद प्रखर हो प्रज्ज्वलित हो उठती है।
आज जब तुम नही हो तो ये मौसम मुझे तुम्हारे लिए एक वसीयत लिखने की जिद पे उतर आया है मै मन से भीगता हुआ तन से रीतता हुआ यह लिख रहा हूँ मेरे इस अनादि यज्ञ की पूर्णाहूति तुम हो जिसके बाद केवल राख शेष बचेगी उसे प्रवाहित कर यदि कोई टूटा हुआ हृदय पुण्य का भागी होना चाहता है वो निसंकोच ऐसा कर सकता है। मन को मन से मृत्यु भी कहां मिला पाती है मृत्यु केवल देह को मुक्त करती है तुम जीवन की प्रतीक हो इसलिए  देहातीत दर्शन का सहारा लेकर तुम्हे पाने की अभिलाषा रखना मेरे लिए सदैव अपरिहार्य ही रहेगा। सच तो यह भी तुम्हें पाना न मेरी इस जन्म की अभिलाषा है न उस जन्म की तुम्हें खोकर की शायद मै खुद को खोज पाऊं।

(अंदर-बाहर के बदलते मौसम का असर)

Wednesday, July 16, 2014

पाती


एक पाती... तुम्हारे अनाम..

"तुम्हारे जीवन में मेरी उपयोगिता  अपनी सुविधा से तय करना तुम्हारे अभ्यास का मामला बन गया है. सम्बन्धो में उपयोगितावाद इस दौर की नयी अवधारणा है इसलिए मैं  इसके औचित्य पर सवाल खड़ा  नही कर रहा हूँ. मैं हर दशा में स्थैतिक रहूंगा तुम्हारा यह अनुमान मुझे जरूर हैरत में डालता है.ज्ञान, वय, अनुभव और  समझ इन सब में वरिष्ठ होने के बावजूद अवधारणा निर्माण के मामले में तुम बड़े  निर्धन ही  रहे  यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि तुम्हारे जीवन में सच्चे दोस्तों का नितांत ही अभाव रहा है. तुम अपने आसपास की भीड़ में छवि के निर्माण में इतनी व्यस्त रहे की तुम्हे अपने अकेले होने का बोध तब हो पाया जब तुम खुद किसी के लिए  भीड़ का हिस्सा बन चुके थे.
सच्चे दोस्त रेत के टीले पर बैठ कर हवा का रुख भांपते हुए नही तलाशे जाते न ही शंका के जंगल में हाँफते हुए छाँव में बैठ आसमान की तरफ ताकते  हुए मिला करते है सच्चे दोस्त नियति, प्रारब्ध और संचित कर्मो की सुखद युक्ति से मिला करते है.सच्चे दोस्तों को पाने के लिए लगभग  पूजा के शंख को बजाने के लिए लगने वाली प्राणशक्ति की आवश्यकता होती है.  मेरी तल्खियों में तुम्हारे दिन ब दिन  अस्त व्यस्त होते  वजूद की फ़िक्र भी शामिल है क्योंकि मैंने तुम्हे कभी चैतन्य और संवेदनशील  माना और जाना था.
मित्र कभी उपदेशक न लगे इसलिए मैं अक्सर चुप रहता हूँ मगर मैं चुप्पी आपके जटिल जीवन को सरल नही कर सकती है. इसलिए आज कहना ही पड़ रहा है की बाह्य जीवन में संपादन के साथ सम्भावनाये तलाशने के बजाये तुम्हे अपने आंतरिक एकांत के सम्पादन की आवश्यकता है. तुम्हारा आंतरिक निर्वात तुम्हे उस दिशा में ले जाना चाहता है जहां जीवन सहज है तथा साक्षी भाव से जीना चाहता है परन्तु तुम्हरे व्यक्तित्व के बाह्य दबाव तुम्हे उस हर लौकिक पैंतरेबाजी में मशगूल रखना चाहते है जिसे तुम खुद की समझदारी समझ बैठे हो.
स्नेह एक बिना शर्त के सम्मान की नदी है जो सम्भावनाओ के तट पर आशा और विश्वास के कंकड़ पत्थरो के साथ बहती है इसकी गति इसका इंसान के अच्छे होने का प्रमाण है इसके तटबंध मनुष्य की कमजोरियों से ही बने होते है मगर तुम डूबने के  डर से या गहराई के गलत अनुमान की वजह से किनारे खड़े शंका और बुद्धि की कंकर मार इसकी गहराई मापने का यत्न कर रहे हो  इससे तुम्हे न जल की धारा के प्रवाह का पता चलेगा और न ही गहराई का. किनारे खड़े तुम्हे उतने की चिंताआतुर बने रहोगे जितने कभी इस नदी के वेग को देखकर हुए  थे. क्या तो वापिस लौट जाओ अपने कंक्रीट के जंगल में या फिर छलांग लगा दो बेफिक्र होकर यह अभी तुम्हे ठीक आत्महत्या जैसा प्रतीत होगा मगर  मरोगे नही यह मेरा विश्वास है.
...और अंत में यही कहूँगा जीवन को अस्तित्व के हवाले करो तुम्हारे अपने अनुभव और ज्ञान के जो मानवीय बाधाएं है उन्हें अपनी यात्रा की बाधा न बनाओ यदि तुम ऐसा कर पाये तो फिर जीवन के उस पक्ष को जी सकोगे जिसका दशमांश भी अभी तुम न देख पाये हो और न जी ही पाए हो. अपनी तमाम नकारात्मकता के बीच मेरे पास कुछ ऊर्जामय शुभकामनायें है वो तुम्हारे पास भेज रहा हूँ इनका उपयोग करने के लिए तुम्हे अपने मन की सुननी पड़ेगी यह नुक्ता इस प्रलाप में बोनस में तुम्हे सौप रहा हूँ शेष तुम्हारी इच्छा.... तुम्हारा अज्ञानी अमित्र....

Tuesday, July 8, 2014

स्याह सच

गाँव में अपने पीढ़ी के बचे हुए गिने चुने लोगो में से एक है पंडित बलवंत शर्मा जी। उम्र अस्सी के पार है बच्चे सभी स्थापित है। गाँव के लिहाज़ से एक रास्ते के चले दिल के सच्चे और जबान के पक्के देहाती मानुष परम्परा के वो लगभग आख़िरी वाहक है। घर से खेत और खेत से घर तक की दुनिया में सिमटा हुआ एक छोटा सा संसार जिसमें लाग-लपेट और बेकार के लंद-फंद के लिए कभी कोई जगह रही भी नही।
पंडित जी की एक छोटी सी कहानी के जरिए आज गाँव की मर्दवादी और सम्वेदनहीन सोच का जिक्र करने जा रहा हूँ हुआ यूं कि आज से लगभग चार साल पहले पंडित जी की धर्मपत्नि का निधन हो गया। जीते जी पति-पत्नि के सम्बन्ध कमोबेश वैसे ही थे जैसे हर एक गाँववासी के हो जाते है एकदम से अनासक्त किस्म के ,यह उनकी दूसरी पत्नी थी पहली पत्नि विवाह के कुछ समय उपरान्त चल बसी थी। उससे एक बेटी थी बस बाकि संतति दूसरी पत्नि से ही चली पंडित जी की पत्नि का नाम प्रेमो था।
पत्नि का आकस्मिक निधन पंडित जी पर वज्रपात के समान सिद्ध हुआ और इस सदमे में पंडित जी अपना अनिवार्य पुरुषवादी चरित्र को भूल बैठे पुरुषवादी से मतलब है कि चालीस- पचास के पार पत्नि से संक्षिप्त सम्वाद भावात्मक एवं रागात्मक सम्बधों की इति श्री।
पंडित जी प्रेमो के निधन से व्याकुल और अधीर हो गए गाँव ने मर्दवादी समाज में यह एक सामाजिक चटखारे और प्रहसन का विषय बन गया। कुछ तो उम्र के प्रभाव दूसरा पत्नि की मौत का गम पंडित जी का मानसिक संतुलन थोड़ा डगमगा गया और डगमगा भी क्या गया आप वो हर दूसरी बात में प्रेमो का जिक्र ले आते या कभी रो भी पड़ते गाँव में उनका पत्नि के दाहसंस्कार में शामिल होना और अग्निकर्म में रोना भी एक चटखारे का विषय बना था गौरतलब हो कि गाँव में पति का पत्नि के निधन होने पर उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होना ठीक नही समझा जाता है।
आज गाँव का क्रुर समाज उन्हें सामाजिक चटखारे का विषय मानते है जहां वो बैठते है वहां कोई एक जन उनकी पत्नि का जिक्र कर देगा फिर वो अपना व्यथा कहने लगेगें या कोई कहेगा कि पंडित जी का ब्याह करवाना है वो मानसिक रूप से अस्थिर तो है ही फिर वो कुछ बहकी-बहकी बातें करना शुरू कर देते है बस उनकी यह आंतरिक पीड़ा लोगो के लिए मनोरंजन का कटेंट बन जाती है।
अमूमन गाँव के लोग भोले होते है सब यही सोचते है मगर मुझे गाँव के लोगो के इस चरित्र से घिन्न होती है पंडित जी हमारे कुल पुरोहित भी है इसलिए प्राय:  हमारे घेर( बैठक) में आ जाते है एक बार मै खुद उनके इस शोषण का गवाह बना तब मैंने लोगो को बाद में नसीहत भी किया कि ये क्या तमाशा बना रहे हो एक भले आदमी का।मैंने बतौर मनोवैज्ञानिक उनकी समस्या का मनोविश्लेषण भी किया। पंडित जी एक पुत्र जो गाँव में रहते है वो भी गाँव के लोगो को इस व्यवहार से आहत और असहज महसूस करते है लोग उनसे भी मजाक में कहते है कि भाई पंडित जी का तो ब्याह करवाना पड़ेगा ये प्रेमो के बैराग में है। मैंने उनके बेटे को भी समझाया कि वो उनके साथ कैसे डील करें क्योंकि पंडित जी अब घर पर भी कुसमायोजित हो गए है पत्नि के जाने के बाद घर पर उनका एकांत उनके अस्तित्व की अप्रासंगिकता तय करता है अब वो एक तयशुदा मौत का इन्तजार कर रहे है।
सामुदायिक स्तर पर जो गाँव के लोगो का व्यंग्य या सामाजिक चटखारे का चरित्र है वह पूर्णत: असम्वेदनशील और मर्दवादी सोच का प्रतिनिधित्व करता है। वह उम्र के इस दौर में अकेलेपन की त्रासदी और पत्नि के वियोग को भोगते एक सच्चे बुजुर्ग को सोशल सपोर्ट की गारंटी नही देता है।
यह समूह व्यवहार निसंदेह गाँव के लोगो की आत्मीयता पर प्रश्नचिन्ह है जिसमें बदलाव की गुंजाइश हाल फिलहाल तो नजर नही आती मेरे हिसाब यह एक चिंतनीय बात जरुर है।

(मैंने बहुत सी पोस्ट गाँव के जीवन के सकारात्मक पक्षों पर लिखी है अब इस जीवन के कुछ स्याह पक्षों पर भी लिखूंगा ताकि संतुलन बना रहे)

Sunday, July 6, 2014

मन बुद्धि के फेर

मन अल्लहड मस्त फक्कड फकीर बनने के लिए बहुत से इंसानों को जीवन में कम से कम एक बार अवसर जरुर देता है परन्तु बुद्धि उसको अर्जित ज्ञान के अभिमान में गुणा भाग लाभ-हानि में लगा देती है यह एक ऐसा आभासी बंधन होता है जिसकी बाह्य चेतना को खबर तक नही हो पाती है सबकुछ बुद्धि के नियोजन से बिन्दू बिन्दू नाप तौल कर चल रहा होता है।
मनुष्य के अनुमान सदैव ठीक ठीक होंगे इसकी कोई प्रत्याभूति नही दे सकता है इसलिए बुद्धि आपको कई बार अकेलेपन के उस टीले पर भी छोड़ आती है जहां से आपको फक्कड़ो की टोली,बच्चों की मुस्कान, कमजोर उपेक्षित की पीड़ा नही दिखाई देती है आप वहां निपट अकेले होते है भले ही आप बुद्धि के अभिमान में उस अकेलेपन को भी एक विशिष्टता के रूप में देखना शुरू कर दें। बेतरतीब,बिना नियोजन  छद्म आदर्शवाद और छद्म अभिप्ररेणावाद से मुक्त रहकर भी एक फक्कड़ जिन्दगी जी जा सकती है बिना देवता बने मानवीय भूलों के साथ गिरते- सम्भलते हुए भी एक बढ़िया जिन्दगी जी जा सकती है।
इस दौर में जब भावुक या अतिसम्वेदनशील होना आपकी कमजोरी के रूप में देखा जाता है यहाँ हर वक्त एक जंग जारी रहती है जहां प्रेक्टिकल होने का मतलब है आपको अपने लिए जीना आता है या नही।
सबका अपना अपना चयन होता है इसलिए उपदेशात्मक कुछ नही कहना चाहता लेकिन मुझे बेहद मुश्किल दौर में भी यह बात एक सच्ची खुशी देती है कि आउटडेटिड और अपरिपक्व या फिर धूर्त समझे जाने के खतरे के बीच भी मै आज भी दिल की सुनता हूँ और जीवन के बड़े फैसले दिल से लेता हूँ इसकी कीमत के रूप में मुझे आजीवन पीड़ा कष्ट कुछ भी मिलें सब सहने को सदैव सहर्ष  तैयार हूँ क्योंकि डिग्री पदवी ओहदे ज्ञान बुद्धि की गुलामी करने से कई गुना बेहतर है अपने मन का मीत बनकर कर एक आम मनुष्य की जिन्दगी जीना जो गलती भी करता तो उसको जस्टीफाई करने के लिए बुद्धिवादी प्रयोजन नही करता दुनिया के लिए यह प्रपंची जिन्दगी हो सकती है लेकिन मेरे लिए यह वह जिन्दगी है जिसको मैंने अपने दिल से चुना है दिमाग से नही।