Monday, February 17, 2014

नजर



यह पोस्ट किसी एक समुदाय के खिलाफ नही है और न ही यह श्रम विभाजन के एकाधिकार के किसी सिद्धांत को खंडित-मंडित करने के उद्देश्य से लिखी जा रही है यह पोस्ट बाजार में एक जाति विशेष के एकाधिकार में वक्त और हालात लडते एक वर्ग की परिस्थितिजन्य घुसपैठ से सम्बंधित है। इसमे कोई सन्देह नही है बाजार या व्यापार को हम बनियों का कर्मक्षेत्र या यूं कहूं एकाधिकार क्षेत्र समझते,जानते,देखते, सुनते और मानते हुए आयें है लेकिन देश विभाजन की त्रासदी की वजह से पाकिस्तान से आए रिफ्यूजी पंजाबी समुदाय ने इस क्षेत्र मे बनियों के वर्चस्व को ऐसी जबरदस्त चुनौति दी कि उनकी जीवटता और व्यवहारिकता नें बनियों के बाजार पर एकाधिकार की चूलें हिला कर रख दी।
विकासशील भारत की  मध्यमवर्गीय चेतना त्रासदी और दुख को स्थाई भाव मे जीने की आदत रखती है पाकिस्तान से भाग कर आए रिफ्यूजियों के लिए यहाँ आकर बसना और जमना दोनो ही मुश्किल काम था लेकिन शायद इस त्रासदी ने उन्हे अन्दर तक मांझ कर रख दिया इसलिए उनके लिए यहाँ शरणार्थी कैम्पों से निकलकर खुद का आसमां बनाने तक का सफर निसन्देह बेहद रोचक किस्म का है आज भले ही समाज़ का गालबजाई करने वाला तबका पाकिस्तान से रिफ्यूजी के रुप में आएं पंजाबियों को बेशर्म प्रचारित करता रहा हो लेकिन वो सच्चे अर्थो में जीवट लोग थे ऐसा मै मानता हूं उन्होने अपनी सरज़मी छोडी और यहाँ पनाह पाने के साथ शून्य से अपने जीवन को फिर से शुरु किया और न केवल शुरु किया बल्कि बुलंदी तक पहूंचाया आज उत्तर भारत के नगरों मे बाजार और व्यापार में इन पंजाबियों का खासा दबदबा है और इनके इसी विस्तार ने व्यापार से बनियों के एकाधिकार को भी समाप्त करके रख दिया।
बनिए सूदखोर थे लेकिन उनकी अपनी एक सीमाएं थी लेकिन पंजाबियों नें अपने लिए कोई सीमा ही तय नही की स्त्री-पुरुष दोनों ने मिलकर अपनी दुनिया खुद बनाई घर पर महिलाओं ने बूटीक, ब्यूटी पार्लर और खाने की होम डिलीवरी जैसे काम शुरु किए तो बाहर पुरुषों ने ऐसा कोई व्यापार का क्षेत्र नही छोडा जिसमे उन्होने हाथ न आजमाया हो आज भी लोग यह खिसिया कर कहते है कि इन पंजाबियों मे शर्म नही होती लेकिन मै कहता हूं वो मध्यमवर्गीय चेतना के उस आडम्बर से मुक्त है जिसे समाज़ का बडा तबका ढो रहा होता है उन्होने अपने काम को ही अपनी पूजा माना शहरी क्षेत्र में आज भी पंजाबियों का खाना-पीना और रहना सहना देखने काबिल होता है अपनी जडो को छोडकर लोग आज समाज़ के उस तबके मे शामिल है जो खुशी के बहाने पर खुश होना जानते है जो साई संध्या, मां का जागरण से लेकर भंगडा गिद्दा पाने का कोई मौका छोडना नही जानते है आज भी पंजाबी रसाई का स्वाद सबसे गज़ब का है।
मेरे हिसाब से पंजाबियों के खिलाफ तमाम प्रकार के दुष्प्रचार उनकी तरक्की के बढते ग्राफ से ज्यादा निकले है उनमे सच्चाई कम है और गल्प अधिक है। पंजाबण महिलाओं पर फब्तियां कसने वाले उनकी जीवटता को भूल जाते है कि कैसे उन्होने घर-घर काम पकड कर अपना आशियाना बनाया होता है कैसे ‘जगत भाभी’ बनकर घर-घर टिफिन पहूंचाया है, उनके संघर्ष पर कभी बात नही होती हाँ अपने अपने हिसाब से हम चरित्र चित्रण की कोई कसर बाकी नही छोडते है।
शहरी पंजाबी आज भी उत्सवधर्मी समाज़ है वह मस्त जीना जानता है वह खर्च करना जानता है और वह भी समाज़ की तथाकथित वर्जनाओं के परवाह किए बिना और दिन ब दिन जटिल होती जिन्दगी मे यह कोई कम बडी बात नही है। हमे इस जीवनशैली इसलिए दिक्कत है क्योंकि हम भी अन्दर से ऐसा ही जीना चाहते है लेकिन आदर्शवाद के झूठे आडम्बर के बोझ तले दबे होने की वजह से जी नही पाते है पंजाबी लोग सहज़ है मुक्त है इसलिए वो जीवन के उस रस का आनंद ले पाते है। बाजार की अपनी ताकतें और वर्चस्व की लडाईयां समाज़ के समाजशास्त्रिय ढांचे को कैसे प्रभावित करती है इस पर यदि कोई शोध करना चाहे तो बनिये बनाम पंजाबी और उनका सामाजिक-आर्थिक तंत्र यह एक रोचक शोध का विषय हो सकता है।

Wednesday, February 5, 2014

एकांत

कुछ लोगो के बारें में हम नाहक ही बेकार के पूर्वाग्रह पाल बैठते है जबकि वो दिल के अच्छे इंसान होते है जबकि इसके उलट कुछ को हम बेहद नजदीक ले आते है और हमारे आंतरिक एंकात में सम्पादन से लेकर आशा,अपेक्षाओं और आशंकाओं की ऐसी पौध तैयार करते है कि हमे वह हरियाली भी खरपतवार नजर आने लगती है। फेसबुक के सन्दर्भ में एक बात मै खास कर महसूस करता हूं कि कुछ लोगो का लिखा देखकर अच्छा लगता है उनकी तारीफ करने का भी मन होता है भले ही वो हमारी सूची मे हो या न हो लेकिन मन की तारीफ को शब्दों के रुप मे आकार देने से पहले ही ऊर्जा स्वाहा हो जाती है और हम एक भी शब्द नही लिख पाते है बस खाली लाईक मारकर खुद का अपराधबोध कम करने की कोशिस करते है जबकि मै महसूस करता हूं कि कुछ लोग बेहद संक्षिप्त मगर प्रभावी लिख रहे है फिर भी उनके पास पाठको का अभाव है शायद उन्हे सेल्फ ब्रांडिंग नही आती या फिर भी वह साधु भाव से अपना विरेचन करना सर्वोपरी मानतें है सहमति/असहमति/स्वीकृति/ मनुष्य की बाह्य प्रेरणाएं होती है कुछ लोग इनके अभिलाषी है तो कुछ इनसे मुक्त। मेरा दिल सदैव से हाशिए पर जीते लोगो के साथ जल्दी खडा हो जाता है शायद मेरी खुद की हीनता की ग्रंथि इससे जुडी हो बडे नामों और भीड का हिस्सा बनने का दिल नही करता है उनका लिखा जरुर पसन्द आता है लेकिन भीड मे खोने का कोई मजा नही है इसलिए वहाँ से निकल लेता हूं। तो आईये ऐसे लोगो की खोज करे जो एकांत में धूनी  रमाएं बैठे है क्यों न थोडी देर उनका चिमटा बजाया जाए और उनकी लेखनी की चिलम में एक लम्बा कश मारा जाए....अलख निरंजन !!!!

Monday, January 27, 2014

हम गांव से निकले बच्चे....

हम गांव से निकले बच्चे....

हम गांव के मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे थे जो गांव से शहर में अपने सपनो को सच करने और दुनिया को बदलने आये थे हम अपनी शर्तो पर जीना चाहते थे हम सच्चे दोस्त थे यारों के यार...! हमारे बाप गांव के छोटे-बडे किसान थे या फिर मेहनतकश मजदूर हममे से कुछ के पिता सरकारी मुलाजिम भी थे कोई मास्टर था कोई पुलिस मे कांस्टेबल तो कोई बाबू था। हमारी मां अपने साथ वियोग का दहेज़ लेकर आयी थी वो हमारे पिताओं के लिए हमेशा दूर की ही बनी रही अपनी मां को उनको साथ बतियाते/गपियाते शायद ही हमने कभी देखा हो  वो गांव मे चूल्हा फूंकती पशुओं को चारा डालती और हमारे पिता खेत,शहर,कस्बों में हमारे उज्ज्वल भविष्य के लिए जद्दोजहद करते थे। हम मे से जिनके पिता किसान थे उन चेहरे पर खेती बचपन से ही उग आई थी उनके हाथों में फावडे की रगड से उपजे कठोर त्वचा  के स्थाई निशान थे लेकिन फिर भी वो शहर आये  अपनी खुली आंखो में वो सपनों की बंदरवार लेकर आये  उनकी कमर पर अपने  घर परिवार की जिम्मेदारी की बेल हमेशा चढती रही लेकिन वे उसके बोझ मे नही दबें बल्कि उसको जलती धूप से भरी दुनिया में एक छांव की तरह माना जहाँ सुस्ताने के लिए जगह मिल सकती थी।
हम वो बच्चे थे जिन्होने कक्षा 6 में पहली बार एबीसीडी पढी थी कक्षा 5 तक अक्षर ज्ञान आज की लडाई में हमारे लिए हमेशा निष्प्रयोज्य ही रहा और हमें लगा कि हम कक्षा 6 में भी कक्षा 1 की पढाई पढ रहे थे। हम गांव से निकले वो बच्चे थे जो शहरों में किराये पर कमरा लेकर पढते थे हमारे पास एक गैस का चूल्हा हुआ करता था जहाँ हम दूध को भुला कर चाय पीने की आदत विकसित कर रहे थे और शायद हम यह मानते थे कि चाय पीने से हमारे आंखे देर तक खुली रहेंगी यह पढने और बढने की होड थी जहाँ हम सोना नही चाहते थे बस अपने ख्वाबों की दुनिया को पाना चाहते थे।
हमारी मां ने कभी हमे अपने आंचल मे पनाह नही दी वो हमारे आने पर खुश और जाने पर गमज़दा जरुर रही लेकिन कभी जाहिर नही किया हमारी माओं नें घर पर पिता से छुपकर घी बेचकर हमारे लिए पैसे जोडे और हमें तब-तब दिए जब हमारी जरुरतें पिता की आमदनी से बडी हो गई थी हमारे लिए हमारी मां किसी रिर्जव बैंक से कम नही थी।
हम गांव के बच्चे कभी अपने भाई या बहन को दिल खोलकर यह नही बता सके कि हमे उन्हे कितना प्यार करते है खून के रिश्तें में बंधे होने के बाद भी हम अजनबियों की तरह ही रहे।
एक वक्त ऐसा भी आया कि हमारे कुछ दोस्त शहर की रंगीनीयत और अवारागर्दी में खोकर रह गए और बर्बाद हो गए लेकिन हम में से जिनकी पीठ पर जिम्मेदारियों की बेल उगी थी उन्होने हमेशा खुद को दृढता से खडा रखा और कभी बहके भी तो उसके बाद का अपराधबोध इतना भारी था कि हमे दोबारा भटकने की हिम्मत ही न हुई।
आज भी हम गांव से निकले बच्चे अपने वजूद की जद्दोजहद में रोज पीसते है हम जीते है समानांतर कई जिन्दगियाँ जिसमे से किसी के हम नायक है तो किसी के खलनायक।
हमारे कंधो पर अपेक्षाओं का इतना बोझ था कि हम नए रिश्तें का वजन नही उठा सकते थे इसलिए आदतन अंतर्मुखी बने रहें हम दुनिया से अंजान नही थे लेकिन दुनिया जरुर हमसे अंजान थी। हम गांव से निकले बच्चें अपने रिश्तेदारों को एक कठोर सन्देश देना चाहते थे कि वो हमारी काबलियत पर बेवजह सवाल न खडा करें और वह कठोर सन्देश देने का जरिया एक अदद सफलता ही थी।
हम गांव से निकले बच्चे अपने धुन के दुस्साहसी लोग थे हमारा वर्ग बहिष्कार हो चुका था और नया वर्ग हमें अपना नही रहा था क्योंकि उनके लिए हम कौतुहल का विषय थे मैत्री का नही।
दुनियादारी सीखते गिरते-सभंलते और ठोकर खाकर फिर शून्य से शुरु करते ऐसी थी हम गांव से निकले बच्चों की दुनिया। प्रेम के मामलें में हम अभागे ही रहे क्योंकि रोजाना अपेक्षाओ के जंगल में अकेली भागती हांफती जिन्दगी मे उसके लिए जगह ही नही बची थी क्या तो हम सफल होने की कोशिस कर सकते थे या फिर प्रेम इसलिए हमने प्रेम को कभी तरजीह नही दी हमें बडा आदमी बनना था क्योंकि हमारे लिए स्वाभिमान से जीना सबसे बडा लक्ष्य था अपने मां-बाप का सीना गर्व से चौडा कर देने का सपना लेकर हम शहर मे आये थे। हम गांव के बच्चें वो बेहूदे लोग थे जिन्होने समाज़ और दुनिया का सच जान लेने के बाद भी अपना सपना नही बदला और ना अपनी जिद बदली हम रोजाना खुद को झोंक कर पका रहे थी सपनो की रोटी इस दुनिया को कुछ कर दिखाने की कीमत पर...।
हम गांव के बच्चों की असफलता ने सबसे अधिक हमारे पिता को तोडा क्योंकि उनके लिए हमारी जीत उनकी मेहनत का फल था लेकिन हमारी मेहनत का फल बहुत से मोर्चो पर लडता हुआ हम तक पहूंचा कभी अंग्रेजी भाषा तो कभी देहात की बोली तो कभी जाति ने हमारी सफलता को हमसे उतनी ही दूर किया जितनी शिद्दत से हम उसे पाना चाहते थे लेकिन हमारी जिद आज भी उतनी बडी है जितनी कभी थी इसलिए हम गांव से निकले बच्चे जब जब शहर में आत्मविश्वास की सीमाएं तोडते है तब-तब लगता है कि हमारी मंजिले सुविधा से नही असुविधा से ही हमारे करीब आती है यह हर गांव से निकले बच्चें की नियति है और शायद प्रारब्ध भी।


Sunday, January 26, 2014

गणतंत्र विशेष



गांव में 26 जनवरी और 15 अगस्त को स्कूल की प्रभार फेरी के बाद सबसे बडा आकर्षण  दूरदर्शन पर आने वाली देशभक्ति की फिल्म का होता था। जिसे देखने के लिए पोर्टेबल टीवी और उसकी बेट्री का इंतजाम पहले से ही करके रखते थे और फिल्म देखते-देखते रोम रोम देशभक्ति की चासनी में डूबकर पुलकित हो उठता था।  पढकर लिखकर बडा होने और डिग्रीयां बटोरने के साथ मन की विशुद्ध देशभक्ति पर विचारधाराओं के ऐसे बादल छाए कि अब  देशभक्ति का अर्थ  देशभक्ति की  वो कोमल भावना नही रही अब देश की व्यवस्था से खिन्न होकर  शायद कमियां देखने का तंत्र अधिक विकसित एवं सक्रिय हो गया है।
हमने बचपन में जैसा भारत देखा था शायद यह हमारे सपनों का भारत नही था यहाँ जाति धर्म के भेद थे यहाँ रसूखदार और कमजोर की खाई थी यहाँ भ्रष्टाचार में डूबी राजनीति थी। अमीर और अमीर होता जा रहा था और गरीब और गरीब हम 21 वीं सदी सूचना प्रौद्योगिकी में जहाँ एक तरफ विश्व के ध्वजवाहक बन रहे थें वहीं हिन्दू-मुसलमान मंदिर-मस्जिद के लिए लड रहे थें गोधरा से लेकर मुजफ्फरनगर तक इंसानियत के जनाज़े निकल रहे थे।
बचपन में जो हसीन तस्वीर हमने अपने देश भारत की देखी थी वो अब इतनी बदरंग हो गई थी हम अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाने का साहस भी खो बैठे अब अपने देश के नागरिक होने के नाते मुझे फिक्र रहती है कि जिस मिट्टी पर मैने जन्म लिया है वह कभी विकास के नाम पर तो कभी राजनीति के नाम पर ऐसी इबारत लिख रही है जिसे देखकर साल दर साल मेरी फिक्र बढती गई और फख्र घटता गया।
अब मै तिरंगे के सामने गर्दन झुकाए खडा हूं अब मेरे पेट की लडाई, सही और गलत की लडाई देशभक्ति के उस ज़ज्बे से बडी हो गई है जो कभी बचपन में महसूस किया करता था सेना में भर्ती होने के सपने की चाह अब सेना के उस अमानवीय चेहरे को देखकर जिसमे वह (मानवाधिकार का हनन में वह अव्वल हो, सिवेलियन को जंतु समझने वाली हो, रेल के डिब्बे में बूट से ठोकर मारने वाली हो) उस सेना के शहीदों को सलाम जरुर करती है लेकिन अब मुझे डर लगता है खुद की सेना से ऐसा लगता है वह देश के दुश्मनों के साथ मेरे भी खिलाफ है।
कम से कम यह मेरे सपनों का भारत नही था। मै देश के संविधान में पूर्ण आस्था रखता हूँ इसकी सम्प्रभुता को अक्षुण्ण बनाये रखने का हिमायती हूँ  दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का निवासी होने पर मुझे अभिमान है लेकिन मेरी कुछ पीडाएं भी है जो मेरी समझ ने पैदा की है और यह समझ मेरे बचपन की देशभक्ति को रोज घुन की तरह चाट रही है जो मै नही चाहता है।

Wednesday, January 22, 2014

कायदे का सबक

...और अंतोत्गत्वा तुम भी एक कमजोर इंसान निकले दोस्त ! ठीक मेरी तरह..
मेरी तरह तुम्हारी सीमाएं तुम्हारी सम्वेदनाओं पर भारी पड गई है और तुम्हारी निजता के खतरे इतने बडे हो गए कि तुम डूबने के डर से साहिल को छोड दूर दिख रहे टापू की तरफ भाग निकलें वो भी बिना नाव/पतवार के । मै देख पा रहा हूँ तुम्हारी छटपटाहट बढती जा रही है लेकिन मुझे खुशी है तुमने हाथ चलाना नही छोडा है भले ही थके हुए तुम मंजिल तक पहूंचो लेकिन पहूंच जाओगे ऐसा यकीन किया जा सकता है। वक्त मनुष्य और रिश्तें कभी उस रुप मे लौट कर नही आते जिस रुप मे बिछडते है यह बात अपने तजरबे से कह रहा हूँ तुम्हे नही तुम्हारी स्मृतियों के उन प्रतिबिम्बों को जो अभी भी मेरे इर्द-गिर्द मंडरा रही है मैने उन्हे अभी इशारा किया है कि देखो ! तुम्हारी मंजिल वो निर्जन टापू है जहाँ अभिलाषाओं के जंगल में तुम्हारा मालिक् जिन्दगी जीने के लिए जद्दोजहद करता हुआ भोजन बनाने के लिए लकडियां बीन रहा है अकेला...वो अक्स  मुझ तक कम से कम दो बार लौट कर आएं लेकिन तब तक मैने अपने यादों के दरवाजे पर टीस की सांकल हमेशा के लिए चढा दी थी।
तुम्हारा छिटकना अपने आप में एक सबक है और शायद प्रेक्टिकल होने का कायदा भी। रिश्तों के मदरसें में आलिम बनने का हुनर बेहद जोखिम भरा काम है यह अब समझ पा रहा हूँ उस्ताद और शागिर्द के रिश्तें की गर्द दोस्ती की फूंक से नही उड सकती है इतना भरोसा है तभी तो ठहाका मारकर अभी हंसते-हंसते मेरी आंखे भर आयी और चौकनें के इस दौर में मै बिना चौंके ही अपनी ज्यादती पर हंसता रहा बहुत देर तक तब तक जब तक मुझे अफसोस न होने लगा रिश्तों की ज्यादती पर। चलो फर्ज़ कर लेते है हम मिलेंगे और हम जियेंगे जरुर वो एक टुकडा जिन्दगी फिर से जो फिलहाल किश्तों में रिस-रिस कर खत्म हो रही है अभी-अभी तुम्हारी मुश्किलों के लिए तुम्हारे साथ गुजरे हंसीन लम्हों के लोबान को जला कर मैने दुआ फूंक दी है तुम्हारे लिए बिना तुम्हारी जरुरत जाने क्योंकि लाख कोशिस करने पर भी मै फिक्र करने की आदत नही छोड पाता हूँ चाहे वो दोस्त कि दुश्मन।

Friday, January 17, 2014

इन दिनों

इन दिनों असहमतियों और नापसंदगियों के बीच जीने का अभ्यास विकसित कर रहा हूँ यह पहले से अधिक परिपक्व बनने जैसा नही है लेकिन पहले मै शीघ्र आवेगपूर्ण हो जाता था और तुरंत निर्णय ले बैठता था जिसके चलते जल्दी ही कुछ लोगो को विदा कह देता था अब खुद की प्रज्ञा चेतना और सम्वेदना पर सवालिया निशान लगा कर खुद को ही परख रहा हूँ हर परिस्थिति में मै ही ठीक हूँ ऐसा कोई अनिवार्य या घोषित नियम भी नही है मै भी गलत,बेतुका या बेहूदा हो सकता हूँ। मुझे लगा कि खुद को ईमानदारी से देखने के लिए आसपास नाराज़ लोगो का रहना भी जरुरी है यदि सभी आपसे सहमत या सुखी है तो फिर आप खुद को नही देख पाते है सभी का स्नेह आपको एक ऐसी छवि में बांधे रखता है जिसमे सही-गलत का भेद थोडा अपरिहार्य हो जाता है। मेरे से नाराज़ या शिकायतजदा लोगो को सुनना उनको समझना या उनका मुझे खारिज़ करते हुए देखना भी एक स्प्रिचुअल प्लीज़र दे रहा है। मै कोई साधक या दिव्य चेतना नही हूँ लेकिन मानवीय स्वभाव का अध्येता होने के नाते मुझे यह जानना रुचिकर लगता है कि कोई व्यक्ति किन परिस्थितियों में बागी,असहज़ या नाराज़ हो सकता है उसमे मेरी क्या भूमिका है और मै किस प्रकार से इस नाराज़गी को ग्रहण करता हूँ तथा उसके बाद अपनी प्रतिक्रिया किस रुप मे सुरक्षित रख लेता हूँ।

Thursday, January 16, 2014

राग

जीवन कभी ऐसा मोड भी आ सकता है जब आगे जाने के लिए रास्ता न दिखे आप खुद को क्षितिज़ पर खडे पाये और पीछे हटना भी मुनासिब न हो क्योंकि पीछे हटना हार जाने से बदतर हो सकता है वहाँ अपेक्षाओं के शुष्क जंगल में सम्बंधो के आदिवासी अपने तीर कमानो सहित आपसे उस वक्त का बदला लेने तैयार खडे हो जब आपने कहाँ था देख लेना एकदिन सबको जवाब मिल जाएगा वो जवाब कतई नही लेना चाहते थे वो आपके पीछे हटते कदमों पर निशान साध कर व्यंग्य के तीर मारने के लिए लम्बे अरसे से युद्ध अभ्यास करते रहे हो। यह निराशा से उपजा युद्ध ज्ञान भी नही हो आप अपने पुरुषार्थ से निष्काम और सकाम कर्म करते रहे हो लेकिन यथास्थितिवाद की जकडन ने आपको ऐसे जकड लिया जहाँ आप भेद-अभेद से परे विस्मय से भरे हो जहाँ रास्ते मंजिलों से बडे होकर खत्म हो गए हो। जहाँ उत्साह और रोमांच का कोई अभाव न हो लेकिन अनिर्णय की धूप इतनी सघन हो कि आप यह न तय कर पाये कि आपको जल चाहिए कि छांव या दोनो ही एकसाथ। सकार-नकार से परे आगे और पीछे देखते हुए यह ख्याल कभी चेता दे तो कभी गुदगुदा दे कि ये तमाशा क्या है...ऐसी मनस्थिति के व्यापक आध्यात्मिक अर्थ हो सकते है या सांत्वनाभिलाषियों के एक आदर्श स्थिति भी कह सकते है किंकर्तव्यविमूढ होकर यह सब देखना कतिपय कारणों से कायरता सम प्रतीत हो सकती है लेकिन प्रज्ञा,चेतना और सम्वेदना की जुगलबंदी में जीवन के इस राग के आलाप को सुनने के लिए पहाड से कान उधार मांगने पडते है।

Tuesday, January 14, 2014

फेसबुक: एक सच यह भी

फेसबुकिया रिश्तें बेहद नाजुक एवं संवेदनशील होते है आभासी दुनिया से निकलकर हकीकत में किसी की जिन्दगी मे बतौर मित्र शामिल होने मे काफी वक्त लग जाता है अलबत्ता तो यह लगभग असम्भव सा ही काम है क्योंकि मुझे लगता है दोस्त/मित्र/यार बस एक खास ही उम्र में बन सकते है बाद में परिचितों का संसार ही खडा हो सकता है ऐसे दोस्त जिन्हे आप आपकी मानवीय कमजोरियों के साथ पसन्द हो जिनका प्रेम शर्त रहित हो वो आपके उम्र की पहले दौर में ही बन सकते है यहाँ पर लोग आपके लिख-कहे से प्रभावित हो सकते है और शायद इसी वजह से मित्रता का प्रस्ताव रखें लेकिन साथ वो एक आक्षेपित आदर्शवाद की भी लोक रंजना के शिकार रहते है और यह स्वाभाविक भी होता है और जैसे आप अपने इस हद-कद-पद से एक भी पायदना नीचे उतरकर कुछ अवांछित किस्म की बातें या व्यवहार करते है तो फिर फेसबुकिया मित्रों की प्रतिमाएं खंडित होने लगती है ऐसे में उन्हे खुद के चयन पर कभी अपराधबोध होता है तो कभी कोफ्त भी होती है और स्थिति साप-छूंछन्दर वाली हो जाती है।
मेरे कई गैर फेसबुकिया दोस्त जिनके साथ मेरे सम्बंध ज्वार भाटे की तरह उपर-नीचे होते रहे लेकिन उनकी संवेदना की लोच में कभी मैने फर्क महसूस नही किया ऐसा कई बार हुआ कि मेरी बददिमागियों और बदतमीजियों के चलते उनसे लगभग संवाद समाप्त सा ही हो गया हो लेकिन फिर भी हम एक दूसरे के जीवन का स्थाई हिस्सा रही हमारी मित्रता स्थगित हुई लेकिन मृत कभी नही हुई और वक्त तथा हालात के हिसाब से जब मैने उन्हे पुकारा या उन्होनें मुझे पुकारा तो हम ठीक वैसे ही मिले जैसे हम कभी पहले मिला करते थे...यह रिश्तों की खूबसूरती का प्रमाण है जबकि इसके उलट फेसबुकिया रिश्तों को सहजने में मै अभी तक असफल ही रहा हूँ इसलिए नए लोगो से जुडने से पहले बहुत सी बाधाएं रख देता हूँ मेरे अपने मानसिक संकोच होते है जिसके चलते है अपनी निजता का हिस्सा बनने की इजाजत नही देता हूँ लेकिन फिर कुछ लोग साधिकार जीवन मे जरुर शामिल हो जाते है लेकिन अंतिम रुप से वो भी निराश ही होते है..:) 
फेसबुक के जरिए भी निसन्देह अपने दौर के कुछ बेहतरीन लोगो से मिलना हुआ और यह मेरी खुशनसीबी रही कि मुझे प्राय: सभी ने बिना शर्त स्वीकार भी और यथायोग्य मान सम्मान भी दिया लेकिन फिर भी दिल मे यह सवाल आज भी अटका रहता है कि फेसबुकिया रिश्तों की यात्रा हमेशा संदिग्ध ही रहेगी क्योंकि यहाँ आप बाद में आते आपकी इमेज़ आपसे पहले किसी की जिन्दगी मे दखल देती है और इमेज़ का टूटना हमेशा तय होता है यह डायनमिक ट्रुथ है जैसे ही एक इमेज़ टूटती है ठीक तभी उस रिश्तें में एक शिकन आ जाती है हालांकि हम खुद को मनाते-समझाते बदलते हर प्रकार से यह कोशिस करते है कि बात बनी रहे फिर भी मानवीय स्वभाव की गत्यात्मकता कब ऐसे आभासी रिश्ते की बलि ले लेगी यह कहा भी नही जा सकता है। निजि तौर पर जो लोग मेरे फेसबुकिया लेखन के जरिए मुझे जानते समझते है मै कोशिस करता रहता हूँ मै जैसा भी हूँ उसी को अपने स्टेट्स के रुप मे प्रस्तुत करुँ मै साक्षी भाव और सम्पादन रहित जीवन जीने का आदी हूँ जहाँ मन को एक ईकाई के रुप मे ग्रहण न करते हुए एक समग्र संस्थान के रुप मे देखने की आदत रही है इसलिए अपनी मानवीय कमजोरियों को मैने प्राय: नही छिपाया है...मै एक आम मनुष्य हूँ मेरी अपेक्षाएं, सुख-दुख, ताकत और कमजोरी सब जगजाहिर है इसलिए मै अपने ऐसे होने के साथ सुविधाजनक भी महसूस करता हूँ मेरे लिए यह सुख बडा है कि मै झूठ के सहारे अपनी कोई इमेज़ क्रिएट नही करता हूँ ना ही अपने किसी बौद्धिक प्रपंच से किसी को इम्प्रेस या आंतकित करने की मेरी कोई जुगत होती है बस जो है जैसा है उसी भाव से लिखता-पढता और जीता आया हूँ।
सम्बंधो की थाती के सन्दर्भ में मेरे लिए इंसान का इंसान होना ही महत्वपूर्ण है पद और कद से ना कभी विद्यार्थी जीवन मे प्रभावित हुआ हूँ और ना आज ही होता हूँ सहअस्तित्व के साथ मै मित्रों को समान ह्र्दय के आंगन का सहवासी मानता हूँ आप सभी के बीच मे मै बेहद अदना, अपरिपक्व और नासमझ हूँ और अभी सीखने समझने की प्रक्रिया में ही हूँ मुझे अपने लिखे-पढे-कहे डिग्री पदवी ओहदे न कोई अहंकार है और न ही मै इसे किसी के लिए जरुरी भी समझता हूँ बस जहाँ दिल मिल जाता है वहाँ थोडा भावुकता से जरुर जुड जाता हूँ शायद यही सबसे बडी कमजोरी भी है। 
वर्तमान समय में सम्बंधो की दीर्घायू होने के लिए दो बडी चीजे चाहिए जो मुझमे नही है या यूँ समझिए मै ऐसा नही कर सकता हूँ एक तो सम्बंधो मे इंटेलेक्चुअल स्पेस और दूसरी खुद को एक सीमा तक हमेशा रहस्यावादी बनाए रखना जैसे आप किसी के समक्ष अपनी गुह्यता तोडते हुए समग्र रुप से प्रकट होते है वैसे ही फेसबुकिया दुनिया के रिश्तों में आप ओजविहीन और अप्रासंगिक होने लगते है इसलिए यहाँ स्थाई बने रहने के लिए बौद्धिक रुप से एक स्पेस बनाकर चलना और एक रहस्यवादी इमेज़ बनाए रखना आपके लिए अनिवार्य शर्त होती है जैसे ही आपका अंतकरण समस्त रुप से प्रकट होता है यहाँ मित्रों को लगने लगता है नही रे ! ये बंदा उस टाईप का नही है जिसकी हमे तलाश थी....:) यहाँ हर कोई अपना अक्स अपने से बेहतर तलाश रहा है ऐसे मे कुछ दोस्तों का मिलना कभी खुशी देता है तो कभी खुद के चयन पर मानसिक निराशा भी भर देता है कि मैने अमुक व्यक्ति को क्या समझा था और अमुक व्यक्ति क्या निकला....:)
खैर !.....कुल मिलाकर मानवीय सम्बंधो की नियति यही होती है कभी मिलना तो कभी बिछडना...फिर भी फेसबुक के रिश्तों के संसार नें मानव व्यवहार की प्रयोगशाला में कई किस्म की पौध तैयार कर दी है जिसे आप कभी स्नेह,अपेक्षाओं के जल से सिचिंत करते है तो कभी उसके बागी निकलनें पर उसे खरपतवार समझकर उखाड फाडकर फैकने में भी विलम्ब नही करते है...।

Sunday, January 12, 2014

डेढ इश्किया

शुरुवात में डेढ इश्किया देखने का तजरबा किसी मुशायरे में शिरकत करने से जैसा है यह विशाल भारद्वाज की ही कलंदरी है कि विशुद्ध व्यवसायिक फिल्म में भी वें ऊर्दू अदब की खुशबू इतने से करीने से रखते है कि दिल बाग-बाग हो जाता है मल्टी प्लेक्स में फिल्म शुरु होने के थोडी ही देर बाद शेर औ शायरी का ऐसा शमां बंधता है कि दर्शको की वाह-वाह से ऐसा लगने लगता है कि हम सिनेमा हॉल मे न होकर किसी मुशायरे में शिरकत फरमा है। फिल्म के कई सीन्स में हमारे दौर के हकीकत के शायर जैसे अनवर जलालपुरी साहब,डॉ नवाज़ देवबन्दी साहब को देखना मेरे जैसे ऊर्दू अदब के मुरीद के लिए बेहद सुकून भरा रहा है...डॉ.नवाज़ देवबन्दी साहब का शेर हो या डॉ बशीर बद्र के शेर से अनवर जलालपुरी साहब का महफिल का आगाज हो एकदम से फिल्म में ऊर्दू अदब का अहसास दिल को राहत देता है हाँ हो सकता है फिल्म का ऐसा कलेवर कुछ कम ही लोगो को पसन्द आये लेकिन मुझे बेहद पसन्द आया है जिस तरह से विशाल भारद्वाज़ ने असल के शायर को फिल्म मे शामिल किया है वह काबिल-ए-तारीफ है और अभी तक मैने और किसी फिल्म में अभी तक देखा भी नही है। फिल्म से मेरे जुडने की एक वजह यह भी हो सकती है कि फिल्म के डायलॉग पर पश्चिमी यूपी की बोली का प्रभाव है अरशद वारसी का खालिस बिजनौरी लहज़े में डायलॉग बोलना खुद ब खुद फिल्म से जोड देता है फिल्म में लखनवी अदब और ऊर्दू जबान का वकार भी है साथ दो ठग/चोर के रुप में अरशद वारसी और नसीरुद्दीन साहब का बिजनौरी स्टाईल भी...। विशाल भारद्वाज़ के चुस्त डायलॉग निसन्देह मुझे बेहद पसन्द आये मै उनके इस फन का मुरीद हो गया हूँ। फिल्म में दो हसीन अभिनेत्रियां दोनो ही मुझे बेहद पसंद है और बेगम पारा के रोल में तो माधुरी दीक्षित का हुस्न गजब का रुहानी अहसास लिए है उनकी अदा,हरकते,भाव भंगिमाएं और अभिनय सबके सब कमाल के है वो बेगम पारा के रोल को जिस उरुज तक ले गई यह उन्ही के बस की बात थी कोई और अभिनेत्री शायद ऐसा न कर पाती। हुमा कुरेशी मुझे निजि तौर पर दो वजह से पसन्द है एक तो उनकी लम्बाई और दूसरी उनकी बेइंतेहा खुबसूरती उनके चेहरे मे कस्बाई लुक है वह अपने मुहल्ले की सबसे खुबसूरत लडकी जैसी लगती है इसलिए हुमा कुरेशी का फिल्म में मुनिया का रोल फिल्म की जरुरत बनता चला जाता है। नसीर साहब के अभिनय पर मै क्या तब्सरा करुँ इतनी मेरी हैसियत नही है वो लिविंग लीजेंड है लेकिन उनके अलावा अरशद वारसी की एक्टिंग की भी तारीफ बनती है और सबसे अधिक मुझे प्रभावित किया नकली नवाब की भूमिका में विजय राज साहब नें नसीरुद्दीन साहब के साथ कई सीन्स में उनका नैचुरल एक्टिंग और कम्फर्ट उनका भी मुरीद बना देता है।
फिल्म के दो बडी कमजोरी मुझे नजर आई एक तो फिल्म का अंत जरुरत से अधिक नाटकीयता लिए है और जल्दी से हजम होने वाला नही है दूसरा हमरी अटरिया पे आजा सांवरिया गीत फिल्म के अंत के बाद शुरु होता है जब तक दर्शक उठकर चलने लगते है मै इस गीत में माधुरी के डांस और नाट्यशास्त्र के लिहाज़ मुद्राएं देखने के लिए भी प्रेरित होकर फिल्म देखने गया था जो आधे-अधूरे मन से ही पूरा हो पाया हालांकि मै अंत तक सीट पर जमा रहा शायद एक दो और माधुरी के ऐसे मुरीद थे जो बैठे थे लेकिन दर्शको के जाने के क्रम मे गीत का मजा किरकिरा हो जाता है।
फिल्म समीक्षकों और सिनेमा के जानकार बुद्धिवादी दर्शको के लिहाज से डेढ इश्किया को भले ही डेढ स्टार भी न मिलें मै बिना इसकी परवाह इस फिल्म को विशाल भारद्वाव की एक उम्दा फिल्म करार देता हूँ और हाँ पिछली इश्किया से मुझे यह डेढ इश्किया ज्यादा पसन्द आयी...कोई आग्रह नही है ना ही मै कोई फिल्म समीक्षक हूँ सिनेमा का दर्शक होने के नाते फिल्म देखने के बाद जैसा मैने महसूस किया लिख दिया इसे फिल्म देखने की अनुशंसा जैसा भी न समझा जाए कहीं फिर आप बाद मे उलाहना दें क्योंकि डेढ इश्किया को महसूस करने के लिए दिल का डेढ होना बेहद जरुरी है।

Sunday, December 29, 2013

प्रपंच

कल रात बेहद मानसिक खीझ के पलों में यह फैसला किया था कि यह फेसबुक डिलीट (डिएक्टिवेट नही) करना है रात कई दफा प्रयास किया लेकिन जुकरबर्ग साहब के कारिन्दें बार-बार टेक्निकल एरर दिखा रहे थक कर रात 11 बजे सो गया सुबह उठा इसी संकल्प के साथ कि उठते ही डिलीट कर दूंगा लेकिन सुबह भी वही दिक्कत आयी फेसबुक डिएक्टिवेट करने का ऑप्शन दे रहा है डिलीट के नाम पर ना नुकर कर रहा.... फिर सोचा जब अस्तित्व नही चाह रहा है तो बलात अपनी मानसिक कमजोरी को तकनीकी पर थोपना उचित नही है इसलिए न डिएक्टिवेट किया ( और अकाउंट डिलीट तो हो ही नही रहा था )
फेसबुक पर रहना और ठीक ठाक लोकप्रियता के साथ रहना लेकिन अचानक ही यहाँ से उच्चाटन हो जाना मेरे लिए नई बात नही है ऐसा कई बार हुआ है लेकिन बात अकाउंट डिएक्टिवेट पर जाकर थम जाती थी कल मै अकाउंट डिलीट करने का फैसला कर चुका था...यह प्रथम दृष्टया मानसिक अस्थिरता का प्रमाण लगता है लेकिन आध्यात्मिक अर्थो में यह उस शाश्वत भटकन का प्रभाव है जो एक स्थान,मनुष्य या तकनीकि अधिक समय तक आसक्ति या रस नही बने रहने देना चाहती है यह सपनों की उस मृगमरीचिका के जैसी है जिसका पीछा करना बाध्यता लगती है लेकिन वो है भी या नही इस पर भी सवाल हमेशा बना ही रहता है।
जीवन में स्थाई कुछ भी नही है यह शाश्वत बात है लेकिन कई बार यात्रा पर चलते-चलते लगता है शिखर से शून्य और शून्य से शिखर तक निरंतर यात्रा ही अपने अस्तित्व के सवालों का खुद जवाब दे सकती है यह निजि चयन का मामला है जहाँ आप लोक मे रहकर भी लोक से मुक्त रहना चाहते है और जब आपको लगता है कि आप किसी खास स्थान वस्तु या मनुष्य पर अटक गए है तभी इनरकॉल कहती है निकल लो यहाँ सें....लेकिन निकलने के क्रम और प्रयास में वृत्त की भांति गोल-गोल घूम कर वही आ जाते है जहाँ से कभी चले थे..।
बहरहाल, जिन-जिन फेसबुकिया मित्रों को मैने अकाउंट डिलीट करने जा रहा हूँ कि सूचना देकर उनका मानसिक दोहन किया उन सभी से क्षमा प्रार्थी हूँ अपनी पूरी काहिली और जाहिली के साथ मै यही पर हूँ....लेकिन कब तक यह मुझे भी नही पता है।

Wednesday, December 25, 2013

कोरस

एक तरफ हर पांच-सात मिनट फेसबुकिया पिंग (कमेंट्स और चैटिंग की) की गुडक-गुडक की आवाजें वही दूसरी तरफ दूसरे कमरे से कलर्स/स्टारप्लस की सास-बहुओं के सीरियल के कोरस की आं...आं...आं की नैपथ्य ध्वनि जो पत्नि के नेत्रों को सजल करने वाली आवाजें है इधर मै कभी चुप्पी में जीता हूँ तो कभी कभी किसी बात पर मुस्कुरा भी पडता हूँ हमारे इन दो कमरों के ध्वनिलोक में समानांतर दो दुनिया लम्बे समय से बसी हुई है। पत्नि जब कभी रसोई में होती है तो स्त्री दारुण कथा के धारावाहिकों की आवाज कार्टून में तब्दील हो जाती है फर्क बस इतना होता है कि मेरे कमरे की कमोबेश वही आवाजें होती है और पास के कमरे सें ओगी,डोरेमोन,भीम आदि की आवाजें आने लगती है इस तरह से घर के अन्दर चारदीवारी और सामानों के बीच तीन अलग अलग दुनियाओं का अस्तित्व है उनका अपना-अपना कोरस है और यह सब इतना सहज है कि कभी एक दूसरे को प्रभावित भी नही करता है इसमे बच्चों के लिए मनोरंजन प्रधान है पत्नि के लिए अपने अस्तित्व को तलाशना प्रमुख है और मेरे लिए लोक पर खुद बलात आरोपित करने की सारी कवायद चलती है जहाँ कभी मै कभी पसर्नल स्टेट्स लिखता हूँ तो कभी 'कवि' बन अपनी रचित कविताओं के जरिए अपने आसपास के संवेदनशील लोगो को यह बताना और जताना चाहता हूँ कि मै अन्दर से कितना द्रवित महसूस करता हूँ। कुल मिलाकर शब्दो के भ्रम और शब्दों के ब्रहम होने के मध्य हमारी ध्वनियां सूक्ष्म रुप से बसी हुई है जिससे हमे अपने अपने अर्थो में ऊर्जा मिलती है।
सांसारिक वजह जब आपको बांधने मे असमर्थ होती है तब हम अपनी एक समानांतर दुनिया रचते है जिसमें हम खुद को लगभग नायक सिद्ध करते हुए अपने संघर्ष को और तरल बनाने की कवायद भी करते है ऐसा ही नही है कि हर बार बात संघर्ष से शुरु होकर संघर्ष पर ही समाप्त होती हो कई बार हम खुद को एक युक्तियुक्त सांत्वना देने के लिए भी यह सब प्रपंच करते है फिर ध्वनियों के सन्दर्भ सें चाहे मेरे फेसबुक की पिंग की आवाज हो या फिर पत्नि के सीरियलस के कोरस का दुखद प्रलाप दोनो एक दूसरे को एक समकोण काटते हुए साथ चलते नजर आते है। बात बेहद आम है और कोई महत्व या मूल्य की नही लेकिन दो कमरों में जीती-मरती दो जिन्दगीयाँ कैसा अपने आप को बाह्य दुनिया से जोड लेती है यह निसन्देह रोचक है।

Thursday, December 19, 2013

सदी की सलाह



मदिरासेवनोपरांत सोशल मीडिया,फोन या अन्य संचार तंत्र पर बने रहना किसी भी प्रकार से विवेकपूर्ण और मित्रोहितकारी नही है। उक्त मनोदशा में मन पर पडी संकोच की चादर हट जाती है और मनुष्य भावनातिरेक अवस्था में भावुक किस्म की बातें करने लगता है ये बातें दिन भर दृढता से बंधे  मनुष्य के उस कमजोर पक्ष की तरफ भी ले जा सकती है जो सर्वथा अपवंचना का शिकार रहा होता है या फिर ऐसी अवस्था में वो हर एक बात आहत कर सकती है जिसको अमूमन रोजाना आप नोटिस न करते हुए लगभग नजरअन्दाज़ कर देते है। कुल मिला कर इस पेय के सेवन के बाद आपको खुद के करीब रहना चाहिए न कि लोक में अपने दमित अभिलाषाओं या शिकायतों को अभिव्यक्त या आरोपित करने में लग जाओं इससे आपकी बातों को गंभीरता से सुनने की प्रवृत्ति तो घटती ही है साथ ही सुबह जब आप अपने कहे लिखे ब्रहम वाक्यों के प्रमाण ( यथा एसएमएस, चैट बॉक्स) देखते है तो एक खास किस्म की ग्लानि और अपराधबोध का हैंगओवर जरुर होता है कि ये मैने क्या कह दिया और क्यों कह दिया....बातें  भी कम से कम एक दिन तो पीछा जरुर करती है फिर आप  दिन भर मूंह छिपाते रहे या फिर अपना माफीनामा तामील करायें नही...नही मेरा कहने का ऐसा मतलब नही था  हो सकता है उन्माद की अवस्था में कुछ ज्यादा लिख-बोल दिया हो आदि-आदि। ऐसी मनोदशा में मै किसी भी प्रकार का स्टेट्स/कमेंट/चैट/एसएमएस/कॉल से मुक्त रहकर अपने अस्तित्व को महसूस करने  और उसके उत्सव में खो जाने को सबसे अधिक उपयोगी समझता हूँ इसलिए जब कभी भी ऐसा अवसर फोन/इंटरनेट/टीवी आदि सब बंद करके मद्धम रोशनी में सूफी संगीत या गजल का लुत्फ लें,नाचें,गाएं,रोएं  तो सबसे बेहतर है ये सब भी न हो तो अपने साकी और रहबरों से गुफ्तगू भी की जा सकती है कुछ अपनी कहना कुछ उनकी सुनना इन संचार-सूचना के तंत्रों पर अटके रहने से कई गुना बेहतर अनुभव होगा कम से कम रात गई बात गई जैसा हाल तो रहेना न कि अगले दिन आप खुद के दिव्य रुप के प्रमाण देखकर कभी असहज तो कभी अचरज़ महसूस करते रहें। इति सिद्धम।

Monday, December 9, 2013

दोस्तों का सर्वे

दोस्तों से मुद्रा उधार मांगने के लिए कितनी लम्बी चौडी उधेडबुन और मानसिक भूमिका से गुजरना पडता है अब आप कहेंगे कि नही दोस्तो से कैसा संकोच नही भाई मै इससे सहमत नही हूँ दोस्त चाहे लंगोटिया किस्म का हो या फिर दूनियादारी दोनो से ही पैसा उधार मांगने के लिए उधार का साहस जुटाना पडता है और जब आप किसी से अपनी जरुरत कहे और सामने वाला जिज्ञासावश पूछ ही बैठे कि कहाँ जरुरत पड गई भाई ऐसे में अपनी जरुरत की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए तमाम शब्द सामर्थ्य का प्रयोग करना पडता है ये तो अच्छी बात है कि ऐन वक्त पर दोस्त मदद भी कर देते है वरना आप अपनी कहानी कहे और सामने वाला हाथ खडा कर दे ऐसे मे फोन काटना कितना भारी हो जाता है ब्याँ नही किया जा सकता है। आदर्श स्थिति वही है कि आपका अपनी ही आमदनी से काम चलता रहा है कभी मांगने का कारोबार नही करना पडे लेकिन दूनियादारी में बिना लेन-देन के काम नही चलता है शायद आदम के इगो को घटाने और बढाने के लिए इससे बढिया रीति विकसित ही नही हो पायी है पैसा स्वामित्व भाव तो पैदा कर ही देता है सो याचको की टोली का मेरे जैसा नायक अक्सर यही सोचता रहता है कि मुद्रा की अवधारणा सहअस्तित्व और इंसानी जरुरतों के इर्द-गिर्द क्यों नही रह पाती है।
बहरहाल इस पोस्ट के बहाने के बेशर्म किस्म का सर्वे भी करने जा रहा हूँ फेसबुक पर जुडे मेरे सभी मित्र यह बताएं कि वें जरुरत पडने पर मेरी कितनी (धनराशि) की मदद कर सकते है वह भी बिना यह पूछे कि मुझे क्या जरुरत आन पडी है इस पोस्ट पर आयें कमेंट मेरी फेसबुकिया दोस्तों के बीच मेरी क्रेडिट लिमिट का भी निर्धारण करेंगी...हालांकि जो लोग मेरी गांव की पृष्टभूमि जानते है ( मसलन जमींदार का पुत्र वगैरह-वगैरह) उनके लिए यह पोस्ट एक सदमे से कम नही होगी लेकिन अपनी फितरत ही ऐसी है हमेशा जैसा फील करते है वैसा ही लिखते है और इमेज़ कॉनशिएस मै कभी रहा भी नही हूँ। सो आपका समय शुरु होता है अब......जरा बताएं कि आप अपनी गाढी मेहनत की कमाई में से अधिकतम कितनी सहयोग राशि मुझे बतौर उधार देने की हिम्मत रखते है जबकि आपको यह भी पता हो कि हाल फिलहाल कम से कम से दो साल पैसा वापिस आने की कोई सम्भावना नही है।
यह एक अपने किस्म का पहला और गंभीर फेसबुकिया प्रयोग है इसे न तो व्यंग्य समझा जाए और न ही एक चलताऊ किस्म की पोस्ट ना ही मेरी अभिलाषा छ्द्म लोकप्रियता हासिल करने की है सो एक हाथ अपने दिल पर रखे और एक अपनी जेब पर और फिर उसके बाद अंको में वह राशि बताएं जितने की मदद करने की हिम्मत आप 24X7 रखते हैं... और हाँ किंचित भी यह सोचकर घबराये नही कि मै आपके कमेंट के बाद आपके इनबॉक्स में आकर अपनी तुरंत डिमांड रख दूंगा क्योंकि फिलहाल मुझे ऐसी कोई जरुरत नही आन पडी है। मेरी जिज्ञासा खुद की फेसबुकिया हैसियत (क्रेडिट लिमिट के सन्दर्भ में) जानने की है सो अभी तक मेरी गालबजाई पर हौसला बढाने वाले दोस्तों अब आपकी बारी है कि एक रोचक,अजीब और बेशर्म किस्म के सर्वे पर भी अपनी वैसी ही बेबाक राय रखें जैसी अभी तक आप मेरी फेसबुकिया पोस्ट पर रखते आयें है....

डिसक्लेमर: इस पोस्ट का उद्देश्य किसी मित्र की आत्मीयता धन के सन्दर्भ में आंकना कदापि नही है और न ही मै दोस्तों को परखने में यकीन रखता हूँ आप सभी मेरे लिए जीवन की स्थाई पूंजी से भी बढकर है। यह केवल एक खाली दिमाग की उपज मात्र है।

Tuesday, December 3, 2013

एक किरदार ऐसा भी-05


सुसी-गांव के बच्चों की बुआ 


गांव के विभिन्न किरदार ब्याँ करते-करते खुद ब खुद लोग सामने आकर खडे हो रहे है मैने कभी पूर्व योजना से नही सोचा था कि कैसे लोगो पर लिखना है और न ही यह तय किया था कि इन-इन लोगो पर लिखना है जैसे ही एक शख्सियत पर लिख कर समाप्त किया उसके तुरंत बाद ही मुझे दूसरा किरदार नजर आने लगा कि अब इसकी बारी है गांव के जीवन में सहअस्तित्व की अवधारणा में जीते ये किरदार हमारे गांव के लिए किसी पूंजी से कम नही है इनका मूल्य भले ही गांव के लोगो ने उस रुप मे नही पहचाना हो लेकिन मेरे दृष्टिकोण से अभी तक प्रकाशित किया जा चुका हर शख्स अपने आप में अनूठा है उसके व्यक्तित्व का अपना एक प्रकृतिजन्य वैशिष्टय है और इसी वजह से वो शख्सियत हमारे दिल औ दिमाग मे लम्बे समय तक बने रहेंगे।

सुसी (मूल नाम सुरेशो)मेरे गांव की लडकी है लडकी इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि वह गांव की बेटी है गांव के निर्धन ब्राहमण परिवार में उसका जन्म हुआ था अब उसकी उम्र अब पचास के पार हो चुकी है। सुसी को पैदाईशी रुप से वाकविकार (स्पीच डिसआर्डर) था संभवत: जन्म के समय मस्तिष्क में कोई क्षति हो गई होगी और इसी बीमारी का असर उसके संज्ञानात्मक विकास ( Cogitative Development) पर भी पडा वह मानसिक रुप से विकलांग नही थी लेकिन इसके अलावा उसके व्यक्तित्व और व्यवहार में असामान्यता जरुर थी वह ठीक से बोल न पाती थी उसका उच्चारण अस्पष्ट था वह बेहद तेज़ बोलती और चंचल भी थी एक जगह वह बैठी नही रह सकती है गांव की गलियों में उसके चक्कर लगते ही रहते थे कभी इस घर तो कभी इस घर गांव के लिहाज़ से वह ‘डारो’ (घूमंतू) थी। सुसी के सभी लक्षण मै उसके व्यस्क रुप के बता रहा हूँ उसकी अपने निजि जीवन की कहानी भी कम दुख और त्रासदी से भरी नही है।
मानसिक रुप से चुनौतिपूर्ण जीवन जीने वाले लोगो के लिए समाज़ में दया तो होती है लेकिन वो दया बेचारगी से उपजा आवेशभर होता है बाकि ऐसे लोगो के समुचित पुनर्वास की व्यवस्था अभी तक तो शहर में भी उपलब्ध नही है गांव में पुनर्वास जैसी कोई चीज़ होती है यह कोई जानता भी नही है।
सुसी का जितना किस्सा मुझे ज्ञात है उसके हिसाब से सुसी के घर वालों ने उसकी मानसिक अक्षमता के बावजूद उसका बाल विवाह कर दिया था उसके पति और ससुराल पक्ष को जैसे ही इस बात का पता चला कि सुसी एक सामान्य बहु नही है तो उन्होने उसके साथ बेहद अमानवीय किस्म का व्यवहार किया उसकी ससुराल पक्ष वालों ने उसका शोषण करना आरम्भ कर दिया उससे रात-दिन घर का काम करवाना और उसके साथ मारपीट करना भी शुरु कर दिया था। सुसी की शादी के कुछ दिन बाद हमारे गांव से उसके परिवार का कोई व्यक्ति जब सुसी से मिलने उसकी ससुराल गया तो सुसी उसके सामने फफक कर रो पडी और अपनी सारी व्यथा संकेतो के माध्यम से कह दी और उसने वहाँ अपना निर्णय भी सुना दिया कि अब उसे एक दिन भी यहाँ नही रहना है बस उसके बाद वह स्थाई रुप से अपने मायके यानि हमारे गांव आ गई। सुसी उसके बाद कभी वापिस अपनी ससुराल नही गई उसके गांव आने के बाद उसके सुसराल पक्ष ने भी शायद कभी उसकी सुध नही है उसके पति के बारे में कभी गांव में नही सुना गया हालांकि जो बाते सुसी के बारे में मुझे पता है वह नितांत ही स्मृति और जनश्रुति आधारित है।
सुसी ने इसके बाद अपने मायके को ही अपना सब कुछ मान लिया है सुसी अपने मनमर्जी से गांव में घूमती रहती थी गांव मे जब भी कोई शादी होती तो गांव की महिलाएं उसको कपडे भी देती थी सुसी के व्यक्तित्व की खास बात यह भी थी कि वह अपनी चाल-ढाल से बच्चों के मन में विशेष कौतुहल पैदा करती है वह जब गली मे चलती तो बच्चों की टोली उसके पीछे-पीछे चल पडते कई बार बच्चे उसको परेशान भी करते थे यानि उसको चिढाते भी थे अमूमन सुसी बच्चों पर गुस्सा नही करती थी लेकिन जब बच्चों की गुस्ताखियाँ बढ जाती तो वह बच्चो को अजीब तरह से डरा भी देती थी वो उसकी एक खास किस्म की भय पैदा करने की मुद्रा और आवाज़ होती थी उसका बच्चों को डराना केवल उनसे खुद को बचाना होता था क्योंकि कई बार बच्चे उसको बहुत परेशान करते थे। आज भी गांव की महिलाएं बच्चों को रोने से चुप कराने के लिए कह देती है कि चुप हो जा वरना सुसी आ जायेगी और जिस बच्चे ने सुसी का भय देख लिया वह तुरंत ही सुसी के नाम से चुप भी हो जाता थ। ऐसा भी नही था कि वह बच्चो मे भय का ही प्रतीक रही है वह स्वभाव से दयालु भी थी जब भी बच्चा बुआ जी कह कर माफी मांग लेता वह उसको प्यार भी करती थी।
सुसी के लिए आज भी गांव के हर घर का दर खुला है उसके लिए कोई भी भेद नही है उसे हर घर में आदर मिलता है महिलाएं उसको चाय भी पिला देती है और खाना भी खिला देती है और वो खुद भी मांग कर चाय पी लेती है सुसी के व्यक्तित्व में एक खासियत यह भी है कि सुसी अपने मन की मर्जी की मालिक है जहाँ उसका मन नही खाने का होता है वहाँ उससे कितना ही आंग्रह कर लो वह कुछ नही खायेगी...। सुबह-शाम उसको गांव के गलियों में घूमते देखा जा सकता था गांव के बच्चे जब उससे डर जाते तो बुआ जी-बुआ जी करने लगते थे और वैसे भी वह गांव के बच्चो की घोषित रुप से बुआ ही रही है।
सुसी से जब उसके पति की चर्चा करने की कोशिस करता था तो वह प्राय: कुछ चुप हो जाती या फिर अपनी ही अर्द्ध विकसित भाषा में अजीब-अजीब बडबडाने लगती है वह अपने पति को ‘बाबू’ कहती थी उसके सारे प्रलाप में केवल बाबू ही समझ मे आता था कई बार उसको चिढाने के लिए भी लोग कह देते कि बाबू आया हुआ है तुझे उसके साथ भेजेंगे बस फिर वो फट पडती उसकी भाषा तो समझ मे नही आती लेकिन उसकी अव्यक्त भाषा मे छिपा रोष जरुर प्रकट हो जाता हालांकि कुछ लोगो की यह भी मान्यता रही है कि सुसी अपने पति को भला-बुरा नही कहती है बल्कि अपने ससुराल पक्ष के दूसरे लोगो से वह ज्यादा खफा है।
सुसी ने सारा जीवन ऐसे ही ही संताप में बिता दिया उसका दुख किसी त्रासद कथा जैसा है जहाँ उसकी अक्षमता से उपजे उसके दुर्भाग्य ने उसको ऐसी जिन्दगी जीने के लिए बाध्य किया। यह तो गांव के जीवन की खुबसूरती कह लीजिए या गांव की सदाश्यता की सुसी ने अपना सारा जीवन गांव मे सहज और निष्कलंक बिता दिया है गांव में वह अपनी विधवा मां और भाई के साथ रहती थी अब उसकी मां का भी देहांत हो गया है सुसी का एक भाई शहर मे रहता है लेकिन भाईयों ने सुसी की कभी उस रुप मे देखभाल नही की सुसी के लिए सारा गांव ही भाई और पिता समान बनकर रहा है।
अब सुसी भी वृद्धावस्था की तरफ बढ रही है अब उसकी सक्रियता भी कम हो गई है उसको पेंशन मिलती है गांव से ही मुझे अपुष्ट जानकारी मिली उसके हिसाब से पता चला है कि उसका भाई उसको अपने साथ ले गया है शायद उसको मिलने वाली एक पेंशन भी एक वजह हो सकती है लेकिन यह खबर बेहद विचलित करने वाली है जो सुसी दिन भर गांव में घूमती थी उसके लिए शहर के दस बाई दस के दबडों मे रहना कितना दुष्कर हो रहा होगा इसकी कल्पना की जा सकती है।
बहरहाल सुसी के डर और प्यार को देखकर बडी हुई पीढी के लिए सुसी को भूल पाना जरुर मुश्किल है क्योंकि सुसी गांव के रिश्तों मे रची-बसी एक ऐसी शख्सियत है जिसको देखकर कभी डर लगता था तो कभी खुशी भी मिलती थी उसकी अट्टाहस भरी हंसी मुझे आज भी याद आती है आने वाली शादी ब्याहों और अन्य मांगलिक आयोजनो में सुसी की कमी जरुर खलने वाली है यह सारा गांव जानता और समझता है।

Monday, December 2, 2013

बातें गांव की---- एक किरदार ऐसा भी-04



यह ऐसा किस्सा है जिसका केन्द्रिय पात्र केवल शरीर से मेरे गांव से ताल्लुक रखता है बाकि उसके जैसी चारित्रिक विशेषताएं लगभग आपको हर गांव में देखने को मिल जायेगी इस तरह के किरदार लगभग हर गांव में ही पाये जाते है। ऐसे लोग अपनी पीढी के अकेले बचे हुए लोग है और इनके निर्वाण के बाद इन किरदारों के व्यक्तित्व मे रची-बसी एक परम्परा भी इनके साथ  समाप्त हो जाएगी।
गांव के रिश्ते के लिहाज़ से वह मेरा  भाई लगता है लेकिन उम्र मे मेरे पिताजी से भी बडा है गांव के बहुसंख्यक लोगो के लिए वह कोई चर्चा योग्य पात्र नही है ऐसा नही है वह कोई अपमानित होने वाला शख्स है लेकिन संयोग से वह अपनी पीढी और परम्परा का अकेला शख्स बन कर रह गया है गांव में मूल नाम के अपभ्रंश करने की बडी समृद्ध परम्परा भी रही है और नाम का सम्मानजनक सम्बोधन किसी की भी आर्थिक सबलता से तय होता है गांव भी इससे अछूते नही है। हमारे गांव के बडे परिवार मुखिया खानदान का एक छोटा और सीमांत श्रेणी का किसान है ‘पटम्बर आंधा’ आधिकारिक रुप से उसका नाम पीताम्बर है लेकिन गांव में वाचिक परम्परा की सुविधा और आर्थिक सम्पन्नता के वर्गीकरण के लिहाज़ से उसका नाम सदैव से ही ‘पटम्बर’ ही रहा है ( मै यह नही कहूंगा कि कालांतर मे पीताम्बर से अपभ्रंश होकर पटम्बर हो गया था) अब आंधा लिखने की वजह भी बताता हूँ पटम्बर को एक आंख से बेहद कम दिखाई देता है शायद बचपन मे ही ‘मायपोयिया’ हो गया होगा और सूर्यास्त के बाद उस आंख से लगभग दिखना बंद ही हो जाता है इसलिए पटम्बर को आंधा भी कहने लगे है गांव में शारिरिक अयोग्यता भी व्यक्तित्व के साथ ढोने वाली चीज़ बन जाती है इसलिए उसे गांव में सयुक्त रुप से पटम्बर आंधा कहा जाने लगा हालांकि उनको आन्धा कहने की एक और वजह यह भी है वो जिस मुखिया खानदान से सम्बंधित है वह भी गांव के बौंग ( लोकप्रचलित उपनाम) के लिहाज़ से आन्धे ही कहे जाते है इसलिए पटम्बर के साथ आन्धा शब्द दोहरे रुप मे चस्पा हो गया।
पटम्बर आंधा के पिताजी कभी हमारे जनपद के चोटी के पहलवान हुआ करते थे उनका नाम कुंदन था दंगल में उनसे हाथ मिलाने की जुर्रत बडे बडे शूरमा भी नही कर पाते थे उनके विषय में गांव में काफी किम्वदंतिया प्रचलित है मसलन उन्होने एक दंगल में सामने के पहलवान से हाथ मिलाकर उसके अंगुलियों के पोरो से खून की धारा चला दी थी, वो लडते हुए झोटे (भैंसा) को सींग पकडकर अलग कर देते थे, वो बैल के अगले दो पैरो को पकडकर उसे सीधा उपर उठा देते थे, वो वजन उठाने में भी बेहद बलशाली थे आदि आदि....ऐसे बलशाली पहलवान के पुत्र के रुप पटम्बर आंधा का जन्म हुआ लेकिन पिता की मृत्यु के बाद वो उनकी समृद्ध पहलवानी की विरासत को उस रुप मे आगे नही बढा सके हालांकि पटम्बर भी अपने जवानी के दिनों में अत्याधिक बलशाली रहे है लेकिन उनके किस्से दंगल में कुश्ती लडने के नही रहे बल्कि खेत से भारी वजन की घास की गठडी उठाकर गांव तक लाने तक ही सिमट कर रह गये।
गांव के लोगो के लिए पटम्बर आंधा एक कमअक्ला किस्म का इंसान हो सकता है लेकिन मै मनोवैज्ञानिक रुप से जब उसके व्यक्तित्व को जब देखता हूँ तो मुझे वह पिता की परम्परा की अपेक्षा और अपनी आंखो की कमजोरी तथा आर्थिक बदहाली से उपजे दबाव की उपज दिखने लगता है कदकाठी के लिहाज़ वह आज भी 6 फीट से अधिक लम्बा है और उम्र भी 70 के पार हो चुकी है। गांव में पटम्बर आन्धा का जिक्र जिस बात के लिए किया जाता है वह है उसकी खुराक। घोषित रुप से वह हमारे गांव का सबसे बडा खाऊ आदमी रहा है घर,शादी ब्याह या अन्य किसी भी कार्यक्रम में उसकी चर्चा उसकी गजब की डाईट को लेकर ही होती रही है गांव मे कभी दबे स्वर तो कभी मुखर रुप से उसका अत्याधिक खाना खाने की क्षमता और आदत होना एक प्रहसन का विषय रहा है लेकिन मै इसे उसके व्यक्तित्व की विशेषता के रुप में देखता हूँ।
लौकिक रुप से पटम्बर आंधा सम्मान/अपमान दोनो से ही मुक्त चेतना है वह लोगो की खुशियों में शामिल होना अपना अधिकार समझता है ईगो जैसी भी कोई चीज़ होती है वह कभी जान ही नही पाया है उसके व्यक्तित्व में जटिलताएं नही है भले ही उसके जीवन में प्रमुख अभिप्रेरणा भोजन है लेकिन इसके बदले मुझे उसके अन्दर एक सदाशयता ही नजर आती है।
पटम्बर आंधा एक अच्छा गल्प सुत्रधार भी वह किस्सागो भी है उसकी चुस्त जुमलेबाजी और अपने जवानी के दिनों के अनुभव खासकर यात्रा संस्मरण गजब के है जिसमे देहात के एक सरल और अनपढ इंसान के भदेशपन की महक आती है। पटम्बर आंधा भले ही सामाजिक रुप अधिक स्वीकृत या सम्मानित अवस्था में नही है लेकिन वह निर्द्वन्द है उसके जीवन में संकोच जैसी चीजों के लिए कोई  स्थान नही है गांव के मांगलिक कार्यक्रमों में वह आमंत्रण जैसी औपचारिकता का भी अभिलाषी नही है जिसे प्राय: उसकी कमजोरी के रुप मे देखा जाता है लेकिन मेरे हिसाब से ऐसा जीवन जीने का अभ्यास विकसित करना अपने आप में बडी बात है जहाँ आप लोक अपेक्षाओं से परे अपने जीवन के एक मात्र अनुराग ( भले ही भोजन हो) के सहारे जीवन जी पा रहे हो।
पटम्बर आंधे के खाना खाने के किस्से आज भी गांव मे इतने मशहूर है कि लगभग गांव के सभी लोग उनके बारे मे जानते है वह दो डोंगे भर के रसगुल्ले एक बारात मे खा गया था एक किलो बूरा चावल के साथ खाना उसके लिए कोई बडी बात नही रही है गांव में लडको की शादी मे दिए जाने वाले प्रीतिभोज ( मंढा) में उसके द्वारा 50-60 लड्डु खाया जाना भी कभी आम बात हुआ करती थी। अब बुढापे में उसकी भी डाईट घट गई है लेकिन मीठा खाने के मामले में आज भी उसको कोई सानी नही है। मैने एक दफा खुलकर उससे उसकी खाने की प्रवृत्तियों पर बात भी की थी तभी मुझे पता चला कि उसके लिए उसका इतनी बडी डाईट खाना कोई विषय ही नही है यह उसकी जीवन का हिस्सा भर है हालांकि वह अब यह भी कहता है कि गांव में उसके खाने को लेकर दुष्प्रचार अधिक हुआ है वह अब उतना बडा खाऊ नही रहा है लेकिन अपनी जवानी दिनों के दिनों को याद करते हुए वह खुद अपने खाने के किस्से ब्याँ करने लगता है।
अपनी उम्र के इस आखिरी पडाव पर पटम्बर आंधा अब भले ही अपने पुत्रों द्वारा बिना आमंत्रण के भोज पर जाने से रोका जाना लगा हो लेकिन इसके बावजूद भी उसके अन्दर कोई अपराधबोध नही है यह उसके व्यक्तित्व की सरलता ही है कि मैने शायद ही उसे कभी क्रोध मे देखा हो दरअसल वह अपनी ही धुन मे रहने वाला और सीधे रास्ते पर चलने वाला एक आम सच्चा देहाती मानुष है जो दूनियादारी के लंद-फंद नही जानता है अपनी क्षमताओं का ग्लैमराईजेशन भी उसको नही आता है वह साक्षी भाव से जीवन जीने का आदी है और अपने आसपास के लोगो को देखकर उनकी गति और बदलाव को देखकर यह जरुर लगता है पटम्बर आंधा जैसे लोगो अपनी पीढी के अंतिम लोग है ऐसे में उनके व्यक्तित्व का दस्तावेजीकरण हमारे लिए एक परम्परा के दस्तावेजीकरण का काम करेगा ताकि आने वाली पीढियों को ऐसे लोग सनद रहे। 

अंतर्मुखी

अंतर्मुखी व्यक्ति भले ही समाज की मुख्य धारा में उतने काम के न नजर आते हो लेकिन उनकी आत्मकेन्द्रिता प्रतीक होती होती है उनके अन्दर छिपी रचनात्मकता की, साथ ही आध्यात्म की सूक्ष्म वृत्तियों को समझने और बरतने की सबसे अधिक सम्भावना अंतर्मुखी व्यक्तियों के अन्दर छिपी होती है उनके चिंतन की व्यापकता का बडा आधार इससे भी तय होता है कि उनकी ऊर्जा संसार की अभिव्यक्तियों या संलिप्तताओं मे व्यय नही होती है यदि अंतर्मुखी व्यक्ति थोडा भी चैतन्य है तो वह अपने इस शीलगुण का प्रयोग अपने अस्तित्व के अनंत विस्तार और आत्म को समझने के लिए बखुबी कर सकता है। ध्यान,लेखन,सृजन के लिए परमात्मा के उपयुक्त चित्त यदि दिया है तो वह अंतर्मुखी जीव के अन्दर ही दिया है ऐसा नही है बर्हिमुखी इंसान किसी काम का नही है उसकी अपनी उपयोगिता है लेकिन प्राय: अंतर्मुखी इंसान खुद को हीनता के बोझ तले दबा पाता है जिसके चलते वह उस सृजनशील चेतना को विकसित होने का अवसर नही दे पाता है और अंतोत्गत्वा हानि विशुद्ध मानवीयता की ही होती है। समाज के दबाव से मुक्त होकर जीने की कला सीखने मे बरसो बीत जाते जाते है और तब तक ऐसे बहुत सी अंतर्मुखी प्रतिभाएं समाज़ की उस अपेक्षाओं की बलि छड चुकी होती है जहाँ मिलनसारिता और हंसमुख होना जिन्दा होने की अनिवार्य शर्त समझी जाती है।

Tuesday, November 19, 2013

तीन स्टेट्स

बुद्धिमान पत्नी
परिपक्व प्रेमिका
भावुक साथी
और सच्चे दोस्त

की तलाश में अपेक्षाओं के बीहड़ में भटकता जब रोज़ शाम अपनी कब्र में दाखिल होता है तब उसका एकांत उस पर हंसता है और वो नजर चुराकर बडबडाता है ये कमबख्त दूनिया मुझे गलत समझे जाने के लिए शापित है ।


----------------------------------------------

कविता की सम्वेदना पर तब्सरा करने से पहले खुद का व्यवहार देखिए कि आप रिक्शेवाले,फल-सब्जी की रेहडी लगाने वाले,बूट पोलिश करने वाले,दिहाड़ी मजदूर,समाज के फिफ्थ क्लास लोगो के साथ किस तरह से पेश आतें है आपकी बातचीत की टोन कैसी होती है।

---------------------------------------------------

हर शख्स के अंदर एक साहित्यिक किरदार बसता है जिस पर कविता लिखी जा सकती है जो किसी भी उपन्यास का नायक हो सकता है।

Tuesday, November 12, 2013

मन

मन से मन का अतिक्रमण करने को सोचने मात्र से पूरा अस्तित्व विद्रोही हो जाने की धमकी देने लगता है. मन चंचल है यह तो शास्वत है लेकिन मन आदेश पालना के मामले में भी प्राय: एकाधिकारी होने की चेस्टा करता है.मन कॊई  इकाई नही है लेकिन मन के बिना कोई इकाई दहाई नही बन पाती है. मन की एक उड़ान है अपनी गति भी है लेकिन मन की  लय लोक से अभिप्रेरित प्रतीत होती है दिशाबोध के मामले में भी मन के कुछ अपने पूर्वानुमान हैं  जिनको वह अर्द्धचेतन में सुरक्षित रखता है और जब जब शाम गहराती है या धुंध के बादल छा जाते है तब मन उनसे पड़ताल करवाता है कि उसको किस दिशा में उड़ना है. एक अस्तित्व के अंदर कितने अस्तित्व और उन सभी अस्तित्व के भी  कितने स्तर गूथे हुए है इसको सुलझाने में वर्षो बीत सकते हैं. मन बावरा है मन  व्याकुल भी है मन निरुपाय भी है लेकिन ये मन ही तो है जो अचानक से हमे अंदर तक आनंद में तर कर देता है और अचानक से उदासी में लिपटी मुस्कान छोड़ जाता है. मन को समझाना व्यर्थ है हम मन को समझा नही सके है जब हम मन को समझा रहे होते है तब मन तो बंकिम हंसी से हमारी छटपटाहट पर मुस्कुरा होता है दरअसल हम मन के चक्कर में अपने इगो को समझा रहे होते है.मन इगो से परे है उसकी अपनी एक दुनिया है,इगो लोक का दास है तो मन अपने मन का मुरीद.यह दासता में जी ही  नही सकता है न यह किसी को अपना दास बनाना चाहता है हाँ ! ये उन्मुक्त खुला गगन चाहता है जहां लोक के अभिसारी बंधन न हो जहाँ अपेक्षाओ का बोझिल संसार न हो...मन को समझना दरअसल खुद को समझने जैसा है यह जितना प्रकट है उससे कंही अधिक गुह्य भी.मन को स्तरों पर न बांधो मन का विश्लेषण भी मत करो बस अपने मन कि सूक्ष्म उपस्थिति को अनुभूत करो इसके बाद मन के प्रश्न खुद जवाब में रूपांतरित हो जायेंगे फिर शायद आपको मन को जीतने की जरूरत भी न पढ़े क्योंकि तब तक आपका मन के साथ जीने का अभ्यास विकसित हो चूका होगा फिर गीता के उपदेश सुनने में आनंद ले सकोगे क्योंकि फिर ये उपदेश आपको अपराधबोध में नही ले जा सकेंगे बल्कि आप खुद योगिराज कृष्ण के वाक् चातुर्य और अर्जुन के अवसाद पुनर्वास का सच्चा आनंद ले सकेंगे जिससे आप अभी तक वंचित है. 

Sunday, November 10, 2013

हरजाई

मेरे जैसे गैर पेशेवर शख्स के जीवन में  यंत्रो की  भूमिका पर कई बार गहराई से सोचता हूँ यहाँ गैर पेशेवर से आशय कंप्यूटर की तकनीकी दुनिया से ताल्लुक न रखने से है.पिछले दो महीने से घर पर लैपटॉप पर नेट का कनेक्शन नही चल रहा है वजह दो है एक तो हर महीने हजार रुपये का टाटा फोटोन प्लस का रिचार्ज जेब पर भारी लग रहा था दूसरा यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट में ब्रॉडबैंड सुविधायुक्त एक पीसी मेरे कब्जे में आ गया है जहाँ से मैं देश दुनिया से जुड़ा रहता हूँ बस इसी सुविधा के चलते घर पर फोटोन प्लस की कुप्पी गोदरेज के अलमारी पर पड़ी धूल फांक रही है. मेरी इस मनमानी और बेरुखी का सबसे बड़ा भुक्तभोगी मेरा 4 साल पुराना लैपटॉप बना हुआ है आज मैंने उसको देखा तो मुझे अपने मतलबी होने का बड़ा अफ़सोस हुआ क्योंकि बिना इंटरनेट के उसको खुले भी कई कई दिन हो जाते है वो भी उसी गोदरेज के अलमारी कि छत पर धुल की खुराक ले रहा है. फोटोन प्लस की कुप्पी और लैपटॉप फिलहाल मेरे जीवन की सबसे उपेक्षित वस्तु बनी हुई है  . कभी कभी सोचता हूँ कि जो लैपटॉप मेरे  सुख दुःख का इतना बड़ा भागीदार रहा है जिसके कीपैड ने मेरे हताशा और नाराज़गी के पलों में अपनी छाती पिटने के लिए  मेरे निर्मम हाथो के हवाले कर दी हो और हमेशा मेरे मन के द्वन्द को शब्दो का आकार दिया हो वो इनदिनों कितना तन्हा महसूस करता होगा उसे तो ये भी नही पता होगा कि मैंने एक नया यार यूनिवर्सिटी में बना लिया है  अगर उस यंत्र का अपना कोई सोचने का तंत्र होता तो मनुष्य के रूप में उसके लिए सबसे घ्रणा का पात्र मै ही होता.लैपटॉप की मेमोरी  में बेतरतीब पड़ी फाइल्स भी मुझे लानत भेजती होगी जिनको खोले भी मुझे एक पखवाड़ा  हो गया है. कुल मिलकर मेरा लैपटॉप तभी तक गुलज़ार था जब तक उसमे इंटरनेट की प्राणऊर्जा बह रही थी जैसी ही इंटरनेट बंद हुआ लैपटॉप कि ड्राइव में पड़ी फाइल्स भी अपने अपने फोल्डर में कैद हो गयी है वो मुझ हरजाई की एक क्लिक के इन्तजार में बावरी हो रही होगी ये सोच कर मेरा जी भर आता है. लैपटॉप के यूएसबी हलक में लैला मजनूँ सी फंसी रहने वाली टाटा फोटोन प्लस की कुप्पी भी कितनी बेबस हो गयी है क्योंकि उसके पास नेटवर्क का सिग्नल तो है लेकिन मुद्रा की खुराक नहीं जिसके चलते टाटा कंपनी ने उसका दाना पानी बंद कर दिया है अब घर के एकांत में मेरा लैपटॉप और फोटोन प्लस की कुप्पी अपने अपने दुःख के संगी साथी बन थोडा मुझे कोस रहे होंगे और थोडा उसका कथित भगवान् को जो हर महीने मेरा हाथ तंग ही करता जा रहा है. फोटोन प्लस की कुप्पी की चिंता और भी बड़ी होगी क्योंकि अगर एक महीने मै अगर ऐसे ही सरकारी पीसी के इश्क़ में पड़ा रहा तो फिर टाटा कंपनी उसको हमेशा के लिए खामोश कर देगी.मनुष्य के तौर पर मैं केवल साक्षी भाव से अपने बुरे दिनों के अच्छे साथी रहे इन दोनो  साथी की पीड़ा देखकर बैचैन जरुर हूँ लेकिन फिलहाल अपनी जेब को देख कर चुप हो जाता हूँ बस आज सांत्वना के लिए मैंने इतना किया कि उन पर वक्त की मार ने जो गर्द चढ़ा थी उसको मैंने साफ़ किया और मै कर भी क्या सकता हूँ....:( 

Saturday, November 9, 2013

अथ फोन कथा

बहुत दिनों से स्पाईस का 2700 रुपये का खरीदा हुआ फोन प्रयोग कर रहा था अभी एक हफ्ते पहले फ्लिपकार्ट पर किताब तलाश रहा था तभी मेरी नजर इस फोन पर पडी और मेरी जी ललचा गया जब जेब टटोली तो वो फटेहाल थी फिर देखा कि इस फोन को खरीदने के लिए ईएमआई की सुविधा उपलब्ध है यह देखकर थोडा जी राजी हुआ लेकिन जब हमने आप्शन देखे तो वहाँ एचडीएफसी,आईसीआईसीआई जैसे बडे बैंकों के क्रेडिट कार्ड होल्डरस के लिए उक्त सुविधा थी फिर मन मसोस कर रह गया तभी छोटा भाई ऑनलाईन था उसको सारा मसला बताया वो नोएडा की एक साफ्टेवेअर कम्पनी मे कार्यरत है हालांकि तनख्वाह उसकी भी कमोबेश मेरे जितनी ही है लेकिन उसके पास एचडीएफसी का ऑफर देकर दिए जाने वाला क्रेडिट कार्ड है उससे बडे भाई की मन मसोस कर रह जाने हालत देखी नही गई और उसने तभी अपने क्रेडिट कार्ड से यह फोन जिसकी कीमत 17400/- (ईएमआई मोड पर) तुरंत आर्डर कर दिया अब मै हर महीने इसकी किस्त जमा कर दिया करुंगा 6 महीने की ईएमआई के बाद यह फोन पूर्णॅकालिक अपना हो जायेगा...सौभाग्य से अपना स्पाईस वाला फोन भी ठीक ठाक कीमत पर बिक गया है और उसमे कुछ पैसे डालकर इस फोन की पहली ईएमआई मैने जमा भी कर दी है...अगले महीने की तब की तब देखेंगे...फिलहाल तो 2-3 घंटे से इसके फंक्शन देख रहा था एंड्रायड फोन है सो नेट अच्छा चलता है...बस यही छोटी सी कहानी है अपनी भाई भाई के काम आ गया इससे यह खुशी फोन लेने की खुशी से कई गुना बडी है....
(हम ठहरे थे पीएनबी के बचत खाते वाले करमठोक इंसान जिनकी पे स्लिप देखकर खुद का बैंक भी मदद करने साफ मना कर देता है और हर महीने सेलरी आते है सबसे उत्साह से एक ही काम होता है वह होता है खाते को जीरो बैलेंस कर देना...ऐसे में पूर्णकालिक वेतनभोगी भाईयों का ही सहारा शेष बचता है..)