Monday, March 9, 2026

‘शनि’

 

वो उसके जीवन में शनि के जैसा था. फ्रीजिंग पॉइंट तक कोल्ड. सब कुछ जमा देने वाला. उसके होने से सबकुछ यथास्थिति का शिकार हो गया था. दुःख जमकर ब्लैक आइस बन गए थे. जिन्हें पहाड़ी इलाके में काला पाला कहा जाता है वो ठीक वैसे थे उन पर चलते हुए गिरना तयशुदा मगर अनापेक्षित होता था. वो कई बार गिरते-गिरते बची. भले वो चोटिल न हुई हो मगर फिसलना आपके आत्मविश्वास पर जो चोट करता है वो उसके साथ भी घटित हुआ.

वो शनि की तरह काला नहीं था मगर उसका रंग चौबीस घंटे में इतनी बार बदलता था कि उसके रंग का मिलान दुनिया के किसी रंग से कर पाना संभव नहीं था. वो विलंबन का राजदूत था. उसके पास जीवन से उपलब्धियों को स्थगित करवाने की राजाज्ञा थी जिसे वो अनिच्छा से एकदम एकांत में बांचता था. वो आत्महीन नहीं था न किसी प्रकार ही हीनताग्रंथि से पीड़ित था मगर उसके होने से जीवन की प्रमेय उलझती जाती थी जब कि वो वास्तविक  समाधान देने के लिए विख्यात था.

शनि मात्र ग्रह या ज्योतिषीय फलादेश का प्रतीक नहीं है वो न्याय, कर्म और वस्तुनिष्ठता का प्रतिनिधि भी है. मनुष्य ग्रह या पिंड न होते हुए भी कारकतत्वों से ग्रह के गुणधर्म कैसे ढ़ोता है यह समझने के लिए उसका उदाहरण नव ज्योतिष जरुर दे सकते थे.

वो अपने वलय में कैद था वो ध्वनिरहित, अतिभारित था मगर उसकी गति का आभास इतना महीन था कि उसे देखकर अपने खराब समय की घोषणा करने वाला भी उदार होकर कहता था नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल बात तो यही थी वो जहां भी था वहां चीजें अप्रत्याशित ढंग से खराब होने लगती थी. उसे पिता ने त्यागा था और उसने पिता से बिना प्रतिशोध लिए खुद को सदा एक गहरे त्रासद एकांत में पाया था. वो साढ़े सात साल शायद ही किसी के जीवन में रुका हो इसलिए उसकी काल गणना को उसकी गति से नहीं जाना जा सकता है.

जब वो आया था जो चीजों ने एक नया आकार लिया मगर धीरे-धीरे वो आकार इतना अपरिमेय हो गया कि उसके किसी भी यंत्र से नहीं नापा जा सकता था और इस बेढंगे आकार के रोशनदानों से सबसे पहले प्यार से कूदकर आत्महत्या की. वो एक उपेक्षित यान की तरह मन-मस्तिष्क के अन्तरिक्ष में घूम रहा था जिसे नष्ट होने से पहले यह निश्चित करना था कि उसकी चपेट में वो न आए जिसे उसने प्राश्रय दिया था.

उसे देखकर एक बात ठंडी आह भरते हुए कही जा सकती थी कि यह तो एकदिन होना ही था. इस कथन को कहते हुए मनुष्य इतना सपाट दिखता था कि जीवन की काई पर फिसलते हुए कहीं पैर न अटकता था फिर अपनी छिली कोहनी को देखते हुए वक्त की गर्द को झाड़ते हुए एक थोडा लड़खड़ाते हुए अकेला आगे चलना था. पीछे से देखने वाला कोई भी व्यक्ति यह न कह सकता था कि इसकी चाल में जो वक्रता है वो अनिमंत्रित थी. इसलिए भी वो चलते हुए पीछे मुड़कर नही देखता था. क्या पता पीछे कोई देखने वाला भी न हो. उसके जाने के बाद का दिन इतवार का होता जिस दिन सब कुछ सामान्य और खुश दिखता था. यह उसके जाने की एकमात्र ज्ञात उपलब्धि थी.

 

© डॉ. अजित

‘शनि’