Friday, October 17, 2025

शरद

 

शरद का आगमन है. प्रेमिल मन शरद की प्रतीक्षा करते हैं. शीत के अपने गीत हैं जिन्हें गुनगुनाने के लिए सुर की परवाह न करनी पड़ती है. विगत की स्मृतियाँ शीत में आकर ठहर जाती हैं वे पिघलने से इनकार कर देती हैं. उनके स्तम्भन में सुख भी है और दुख भी. मन का मौसम समय के कालचक्र से लगभग मुक्त है उसका अपना अलग पंचांग है उसके महूर्त और ईष्ट दोनों ही भिन्न है.

आसमान की तरफ देखता हूँ और हरीतिमा के हवाले से कुछ पीले फूल तुम्हारे लिए चुनता हूँ. पीला रंग स्वेच्छा से हरियाली को छोड़ने का प्रतीक है. जिससे मुझे साहस मिलता है कि अंतत: मेरी यात्रा भी यही है एकदिन मैं भी इसी तरह टूटकर रंगबोध से मुक्त होता हूँ पीतवर्णी होकर स्थगित होता चला जाऊँगा.

कितना सुंदर होता कि बातों में उदासी और आशाओं में विरोधाभास न बुना होता है. एक लय है जो छंद से बिछड़ गयी है एक सुर है जो सध नहीं रहा है और एक राग है बैराग बनता जा रहा है. जीवन की तमाम अनित्यताओं के मध्य एक दिशाशूल है जिसे देखने के लिए मन की यंत्र मानक त्रुटि के शिकार हो गए हैं.

शीत को आगमन यह बताता है कि मनोविज्ञान की गोद से निकल कर जीवन गणित की शुष्क धरती पर निर्वासित हो गया है. अब गणनाएँ यह बताएंगी कि कौन कितने अक्षांश और देशांतर पर अटका हुआ है और अँधेरे के बाद के अँधेरे को खगोल की भाषा में क्या कहते हैं. यह समय मन के भूगोल को समझने का नहीं है बल्कि यह नि:सहायताबोध से संबंधों के उन कोमल तंतुओं को निहारने का है जो दूर से देखने पर एक चोट की शक्ल लिए दिखते हैं और जिनका स्पर्श खुरदरा हो गया है.

यह समय उपचार तलाशने का नहीं उपचार से मुक्त होने का भी है.